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रविवार, दिसंबर 05, 2021

एक ज़रूरी कहानी | 2 | झींगुर और वह | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

एक ज़रूरी कहानी... 2
झींगुर और वह 
डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक झींगुर घर में शोर कर रहा था जिससे वह आदमी परेशान हो गया। उसने झींगुर को पकड़ कर बाहर फेंक दिया। दूसरे दिन वह बहुत अकेला महसूस कर रहा था। घर में भी सन्नाटा पसरा हुआ था। ऐसे में उसे उस झींगुर की याद आने लगी। मगर उसे तो वह रात को ही बाहर फेंक चुका था। वह उदास हो गया। तभी उसे खिड़की पर झींगुर की आवाज़ सुनाई दी।आवाज़ सुनकर वह इतना ख़ुश हो गया जैसे बरसों पहले बिछड़ा कोई मिल गया हो। उसने खिड़की खोल कर झींगुर को अंदर आने दिया।
👩कमज़ोर और अनुपयोगी लगने वाला भी महत्वपूर्ण होता है, उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। है न!
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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मंगलवार, मई 01, 2012

लघुकथा - शुक्र है कि टौमी बच गया

शुक्र है कि टौमी बच गया ....(लघुकथा) 

- सुनील कुमार

चमचमाती कार बंगले  के अन्दर तेज़ गति से घुसी और अचानक ही ड्राइवर ने  ब्रेक लगा कर कार रोक दी क्योंकि कार के आगे साहेब का विदेशी कुत्ता टौमी आ गया था ।
ड्राइवर ने किसी तरह टौमी को बचा दिया । मगर इस हादसे में घर में काम करने वाली आया का चार साल के  बच्चे  को चोट आ गयी ।
साहेब ने जल्दी से कार से उतर कर आये और आया  को सौ रुपये दिए और कहा जाओ इसकी मलहम पट्टी करवा लो ।
थोड़ी देर बाद घर कें अंदर सबके चेहरे  खिले हुए थे और जुवान पर एक बात थी ।
भगवान का शुक्र है कि टौमी बच गया ...... 

(साभार प्रस्तुति- डॉ. शरद सिंह)

बुधवार, अप्रैल 18, 2012

भिखारी (लघुकथा)

-डॉ. शरद सिंह


वह भिखारिन थी। जवान और सुन्दर भिखारिन। 
वह एक कार के पहुँची और उसने कार के भीतर बैठे आदमी से गिड़गिड़ाते हुए कहा- "दो दिन से इस पापी पेट में अन्न का एक भी दाना नहीं पड़ा है....कुछ दे दो बाबूजी !...भगवान तुम्हारा भला करेगा, बाबूजी ! "
भिखारिन की बात सुन कर कार में बैठे हुए आदमी ने एक भरपूर नज़र भिखारिन के शरीर पर डाली और ललचाए हुए स्वर में बोला-" ...और बदले में तुम मुझे क्या दोगी ?"
यह सुनते ही भिखारिन ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा- "धत् तेरे की ! मैं भी किस भिखारी से भीख माँगने लगी ?"
......और उस आदमी ने झेंप कर अपनी कार आगे बढ़ा ली।











































































































सोमवार, अप्रैल 09, 2012

मेजबान (लघुकथा)

–खलील जिब्रान

'कभी हमारे घर को भी पवित्र करो।' करूणा से भीगे स्वर में भेड़िये ने भोली-भाली भेड़ से कहा

'मैं जरूर आती बशर्ते तुम्हारे घर का मतलब तुम्हारा पेट न होता।' भेड़ ने नम्रतापूर्वक जवाब दिया।

शुक्रवार, नवंबर 26, 2010

महिला साक्षरता (लघुकथा )

- डॉ. शरद सिंह     

साक्षरता केन्द्र में गुरू जी ने महिलाओं को पढ़ाना प्रारम्भ किया। आज जो पाठ वे पढ़ाने जा रहे थे उसका शीर्षक था-‘महिलाओं के अधिकार’।
     पढ़ाते-पढ़ाते गुरू जी ने देखा कि पढ़ने वाली महिलाओं के बीच माथे तक घूंघट काढ़े उनकी बीवी भी बैठी है। उसे देखते ही गुरू जी झल्ला पड़े और उन्होंने अपनी बीवी को डपटते हुए कहा-‘क्यों री! तू यहां क्या कर रही है? यहां तेरा क्या काम है? तू अगर यहां बैठी रहेगी तो वहां घर पर बच्चों को कौन सम्हालेगा? गाय-गोरू को कौन चारा-पानी देगा? कौन खाना पकाएगा? जा, भाग यहां से!’
      गुरू जी के क्रोध से डर कर उनकी बीवी चुपचाप वहां से उठ कर चली गई और गुरू जी ने अपने केन्द्र की साप्ताहिक रिपोर्ट में लिखा-‘इस सप्ताह का साक्षरता कार्यक्रम शतप्रतिशत सम्पन्न हुआ।’