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शनिवार, नवंबर 01, 2025

"जनसत्ता" के दीपावली विशेषांक 2025 में डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "पुनर्जागरण"

"जनसत्ता" दीपावली विशेषांक में कहानी का प्रकाशन अपने आप में अत्यंत सुखद लगता है .... इस वर्ष के विशेषांक में मेरी कहानी "पुनर्जागरण" प्रकाशित करने के लिए जनसत्ता के संपादक आदरणीय मुकेश भारद्वाज जी एवं मृणाल वल्लरी जी का हार्दिक आभार 🌹🙏🌹
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सोमवार, नवंबर 20, 2023

कहानी "ट्रेंडिंग लव वाया मलूकदास" - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, जनसत्ता वार्षिक अंक (दीपावली 2023) में प्रकाशित

कहानी
ट्रेंडिंग लव वाया मलूकदास
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

    उसने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट डाली, साथ में दर्जन भर हैशटैग लगा दिए। उनमें एक हैशटैग ‘‘लव’’ भी है, जो तुरंत ट्रेंडिंग करने लगता है। लौकिक  हो  या अलौकिक हो, बस, प्रेम का विषय चुन कर उसमें ‘‘हैशटैग लव’’ चिन्हित कर देना इसीलिए उसे अच्छा लगता है। यद्यपि वह कभी-कभी सोचती है कि उसके इस हैशटैग को कोई गौर करता भी या नहीं? क्योंकि अकसर ट्रेंडिंग  के पीछे कोई चिंतन-मनन नहीं हुआ करता है। खै़र, कोई हैशटैग के खूंटे पर लटके प्रेम के बारे में सोचे या न सोचे, उसे सोशल मीडिया का ‘‘फेक लव’’ चाहिए भी नहीं।
मगर क्या उसे सच्चा सौ टका प्रेम भी नहीं चाहिए? उसने अपने आप से प्रश्न किया। फिर तत्काल निष्कर्ष पर भी पहुंच गई।
‘‘मुझे अब किसी से प्यार करना चाहिए।’’ उसने अपने आप से कहा, ’’शादी का तो कुछ कहा नहीं जा सकता है किन्तु प्यार तो कर ही सकती हूं।’’ वह मोबाईल वहीं सोफे पर छोड़ कर आईने के सामने जा बैठी। प्रेम करने के इरादे का निष्कर्ष भले ही तात्कालिक लगे किन्तु वर्षों से मन को कुरेदता अकेलापन उसे इस निष्कर्ष कीे ओर शनैः शनैः निरंतर धकेल रहा था।
कितने वसंत निकले हैं, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता, दिल में प्रेम की चाहत तो अभी ज़िन्दा है। प्यार करने की असली उम्र तो वयस्कता के साथ ही आती है। सोलहवें साल में यही समझ में नहीं आता है कि हम प्यार कर रहे हैं या ‘घर-घर’ की तर्ज़ में ‘प्यार-प्यार’ खेल रहे हैं। उस समय तो बड़े भी दुत्कारते हुए कह देते हैं कि यह उम्र प्यार करने की नहीं है या फिर यह प्यार नहीं लड़कपना है। ये सब उसके अपने तर्क थे।
‘‘कौन कहता कि तुम बुढ़ा रही हो? ये काले-काले बाल, वे गौरवर्ण! ऐ विपुला! इनके बारे में तुम आज तक बेखबर क्यों रहीं ?’’ उसने आईने में दिखाई पड़ रहे अपने प्रतिबिम्ब से पूछा।
प्रतिबिम्ब भी उसी के समान उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा। वह हंस पड़ी। हंसी उसे इसलिए आई कि अपनी सुंदरता तो वह लगभग रोज ही सेल्फी में निहार कर संतुष्ट हो लेती है।

हां! उसका नाम है विपुला । मां-बाप ने रखा था। अगर वे अचला, विमला, कमला भी रख देते तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। नाम नियति नहीं बदला करते हैं। यदि उसकी नियति में किसी का प्रेम रंच मात्र नहीं लिखा है, तो नाम विपुला होने भर से क्या हो सकता है? ये तो अच्छा हुआ कि उसकी अभी तक शादी नहीं हुई वरना उसे शायद अपने पति के प्यार से भी वंचित रहना पड़ता। वैसे दुनिया में कितनी औरतें हैं जो अपने पति का प्रेम हासिल कर पाती हैं? बहुतों को तो पता ही नहीं होता है कि पति का प्यार होता क्या है, फिर भी अच्छी कटती है ज़िन्दगी। कभी-कभी बहुत कुछ जानने से, न जानना भी अच्छा होता है। खैर, ये बिलकुल अलग मसला है। कम से कम विपुला के मामले से एकदम अलग।
 खैर, उसने कभी सोचा नहीं था कि उसे भी कभी प्यार करने की ‘‘तलब’’ होगी। ऐसा नहीं है कि वह कभी पुरुषों के संपर्क में नहीं आई लेकिन यह संपर्क न तो काम-क्रीड़ा के रूप में रहा और न प्रेम के। वह घंटो बैठी-उठी है पुरुषों के साथ। उसने उनके कंधों पर हाथ रखा है, पीठ पर धौल जमाया है, उंगलियों की तेज हरकत से उनके बालों को माथे पर बिखेरा। हां, एक-दो अवसर ऐसे भी आए जब उसने अपने गाल पर चुम्बन लेने दिया। बस, दोस्ताना। अब अगर कोई इसे भी वासना या प्रेम से जोड़े, तो विपुला के हिसाब से ये नासमझी ही होगी। नहीं-नहीं, ये मत समझिए कि वह फ्लर्ट करती है। वह फ्लर्ट करने वाली लड़कियों में से नहीं है। आज भी उसके दिल में फ्लर्ट करने की नहीं अपितु प्यार करने की इच्छा जागी है। इस मामले में वह फाईव-जी के जमाने में थ्री-जी है।

किससे प्यार करे वह? विपुला सोचने लगी। विनय। हां, विनय कैसा रहेगा? हर समय उसके चक्कर लगाया करता है। अपनी बीवी के सामने भी उसी की तारीफ के पुल बांधता रहता है ।
ये पुरूष भी बड़े विचित्र जीव होते हैं। उन्हें अपनी बीवी के सामने पराई औरत की प्रशंसा करने में इन्हें कोई संकोच नहीं होता है लेकिन उनकी बीवी उनके सामने किसी पराए पुरुष की प्रशंसा में एक वाक्य ही बोल दे तो पति नामक पुरुष अंगारों पर लोट जाता है। अवैध संबंधों के समीकरण गढ़ने लगता है। अब विनय को ही ले लो, वह अपनी बीवी के सामने विपुला की तारीफ करते नहीं अघाता । वह तो अपनी बीवी से यहां तक कह देता है कि तुम विपुलाजी से कुछ सीखती क्यों नहीं ?
क्या सोचती होगी विनय की बीवी? उंह, कुछ भी सोचे! जब विनय को अपनी बीवी की परवाह नहीं है तो वह क्यों सोचे ? वह शादीशुदा है तो क्या हुआ, कौन उससे शादी करनी है, विपुला ने सोचा और विनय का नंबर डायल करने लगी।
‘‘हैलो ! हां, विनय! मैं विपुला, तुम अभी मेरे घर आ जाओ।’’
‘‘अभी?’’
‘‘हां-हां, अभी!’’
‘‘कोई इमर्जेन्सी है क्या?’’
‘‘हां जी, इमर्जेन्सी ही समझो।’’
‘‘ऐसा क्या? बताओ न!’’
‘‘बता दूं? नहीं, फोन पर नहीं, यहां आने पर बताऊंगी।’’
‘‘तबीयत तो ठीक है, न ?’’
‘‘हां, तबीयत ठीक है!’’
‘‘वो क्या है कि मैं दोपहर बाद अगर आऊं तो चलेगा? दरअसल, अभी वाईफ को शॉपिंग पर ले जाना है।’’
‘‘क्या कहा, दोपहर बाद तक आ सकोगे? अगर अभी आ जाते....’’ विपुला का मन तनिक बुझा किन्तु उसे तत्क्षण विचार आया कि वह विनय को साफ-साफ कह दे कि वह उसे प्यार करना चाहती है फिर तो दौड़ा चला आएगा। कह कर देखे?
‘‘अच्छा सुनो !’’
‘‘हां बोलो !’’
‘‘अं... कुछ नहीं, जाने दो!’’
‘‘क्या छिपा रही हो?’’
‘‘ऊंहूं। कुछ भी तो नहीं। मन नहीं लग रहा था सो तुमसे बाते करना चाह रही थी। खैर, छोड़ो!’’ अपने मन की बात सचमुच छिपा गई विपुला। उसे डर लगा कि कहीं वह प्रेम का कोई और अर्थ न निकाल बैठे।
‘‘ठीक है। शाम से पहले आने की कोशिश करता हूं।’’
‘‘अरे नही... आराम से आना!’’ विपुला ने फोन बंद करते हुए टिकाते मुंह बनाया। उसका चेहरा उत्तर गया था। उसे विनय से ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी। उसे लगा था कि विनय उसकी बात सुन कर दौड़ा चला आएगा।

खैर, मुझे निराश नहीं होना चाहिए, हर इंसान की अपनी अपनी व्यस्तता होती है। विनय को फ़ुर्सत नहीं है तो अनिमेष को ट्राई करती हूं। विपुला ने अपने आप से कहा और अनिमेष का नंबर डायल करने लगी।
‘‘हेलो!’’
‘‘हेलो, मैं मिनी बोल रही हूं आंटी!’’ फोन अनिमेष की बेटी ने उठाया था।
‘‘कैसी हो मिनी? पापा घर पर हैं?’’
‘‘आई एम फाईन! एक मिनट में, अभी पापा को बुलाती हूं, होल्ड प्लीज।
‘‘हां, हलो विपुला, कहो कैसे याद किया?’’
‘‘क्या कर रहे हो?’’
‘‘बस कुछ खास नहीं, बच्चो की प्रोग्रेस रिपोर्ट चेक कर रहा था।’’
‘‘घर आ सकते हो?’’
‘‘कब?’’
‘‘अभी!’’
‘‘अभी? ओ.के. आता हूं। मिनी कल शाम को ही कह रही थी कि विपुला आंटी के घर चलना है। आधे घंटे के भीतर पहुंचता हूं।’’
‘‘अरे, अभी नहीं! मैं तो मज़ाक कर रही थी। किसी दिन शाम को आना मिनी, सरोज भाभी वगैरह सभी को लेकर। सब इत्मीनान से बैठेंगे, गप्पे-शप्पें करेंगे।’’
‘‘ठीक है, जैसा तुम कहो!’’
‘‘हां, यही ठीक रहेगा।’’
‘‘वो वासुदेव की क्रमोन्नति का क्या हुआ?’’ अनिमेंष ने पूछा।  
‘‘पता नहीं। कोई दरवाजे पर आया है.... फिर बात करूंगी... शायद दूधवाला है। ओके बाय!’’ विपुला ने अनिमेंष का उत्तर सुने बिना झट से फोन काट दिया।
कोई नहीं आया था दरवाजे पर, लेकिन अनिमेष की बातें ही विपुला झुंझलाने लगी थीं। अपनी बेटी को साथ लेकर आने वाले से कैसे कहे कि वह उसे मिलने के लिए नहीं बल्कि प्यार करने को बुला रही है। माना कि उसके मन में अनिमेष को लेकर कामासक्ति नहीं है, लेकिन उसकी बेटी के सामने उससे कैसे कह पाएगी- ‘‘आई लव यू!’’
उसे दैहिक प्रेम नहीं मानसिक प्रेम की तीव्र इच्छा हो रही है। कोई हो उसके क़रीब, जो उसे अहसास करा सके कि कोई उसकी चिंता करता है, कोई उसे सचमुच पसंद करता है। एक भरेपन का अहसास, और कुछ नहीं!
अब क्या किया जाए? झुंझलाती हुई विपुला अपनी तर्जनी के नाखून का छोर कुतरने लगी।

उसे याद आने लगा चिराग नाम का वह लड़का जो कालेज के प्रथम वर्ष में उसके साथ पढ़ता था। सेठ दयालचंद के खानदान का रोशन चिराग था वह। कई लड़कियां उस पर मरती थीं, मगर वह विपुला के इर्द-गिर्द फेरे लगाया करता था। उसने अनेक बार विपुला को डेट पर चलने का आमंत्रण दिया किन्तु विपुला को फ्लर्ट करने वालों से सख्त नफरत रही। इसी नफरत के चलते उसने चिराग को खूब उल्लू बनाया। उससे जी भर कर ट्रीट ली। सहेलियों के साथ सिनेमा देखने को उससे टिकटें भी खरीदवाई। लेकिन, जब चिराग ने अपना प्रस्ताव विपुला के सामने रखा तब उसने चिराग को शुष्क सैद्धांतिक व्याख्यान दे डाला । चिराग में पेशंस की कमी थी। वह दूसरे ही दिन दूसरी लड़की को चारा डालने लगा। तो क्या चिराग उसे प्यार करता था? नहीं, चिराग जैसे लड़के कभी किसी से प्यार कर ही नहीं सकते हैं, अपनी पत्नी से भी नहीं।
यदि आज चिराग मिल जाए तो? विपुला ने सोचा। दूसरे ही पल उसने अपने इस विचार को यह कहते हुए अपने मन से निकाल फेंका कि ‘‘तुझे प्यार करना है या फ्लर्ट’’?’’
वह अपने आप में सिमट गई।
उसे याद आया कि उसके छप्पन वर्षीय बॉस ने संजीदा होते हुए उससे कहा था ‘‘विपुला, मैं तुम्हें चाहता हूं। मुझे अपनी जिन्दगी में सब कुछ मिला फिर भी कोई कमी महसूस होती रही है। लेकिन जब से तुम्हें देखा है तो ऐसा लगता है कि वो कमी तुम हो। क्या तुम मुझे मिल सकती हो ?’’
‘‘क्यों नहीं। पर, क्या आप अपनी वाइफ से तलाक लेंगे?’’ विपुला ने दो टूक शब्दों में पूछा था।
बॉस ने हाथ बढ़ाया था तो वह पीछे हट गई थी लेकिन मुस्कुराकर और कुछ-कुछ अपने चेहरे पर विवशता ला कर। विपुला का मुस्कुराना भी विवशता थी और विवशता का प्रदर्शन करना भी विवशता ही थी। असमंजस में रह गया था उसका बॉस और इससे अधिक कठोर नहीं हो पाई थी विपुला । कामकाजी औरतों के अधिकार कानून की किताबों में ही अधिक सहज, सरल लगते हैं. वास्तविकता में उन अधिकारों को पाना बड़ा कठिन होता है, कुछ-कुछ वैसे ही जैसे कबीर ने कहा था- ‘‘जो घर बारे आपना, आए हमारे साथ।’’
उसे अपना बॉस एक लिजलिजा प्राणी लगता है। मोटा, थुलथुल, बिकुल किसी गंदे टोड के समान। वह तो उसे छूने की कल्पना मात्र से सिहर उठती है। शायद, उसके बॉस जैसा ही निकलता गिरीश। अचानक मिला था वह। पहचान हुई। दोस्ती हुई। दोस्ती लम्बी नहीं चली क्योंकि वह नौकरी बदल कर दूसरे शहर चला गया वह कम्युनिस्ट था। वह भी उन दिनों कम्युनिस्ट हुआ करती थी। जैसे आजकल का युवा जैसे सर्फर या चैटर हुआ करता है। उस दौर का लगभग युवा कम्युनिस्ट हुआ करता था, विपुला का तो यही मानना है। गिरीश के साथ लम्बी-लम्बी अंतहीन बहसे होतीं। उसका जोश, उसकी उत्तेजना अच्छी लगती। वह जब उत्तेजित हो कर पूंजीवाद की खामियां गिनाता तो विपुला को बड़ा भला लगता । अच्छा लगता था उसे गिरीश का साथ। यह साथ छूटा तो लगभग चार साल बाद फिर जुड़ा। उस समय तक गिरीश कम्युनिस्ट नहीं रहा था, वह एक उच्चपद पर पदासीन हो चुका था, उसकी रंगों में पूंजीवादी रक्त हिलोरे लेने लगा था। अगर रफ-टफ शब्दों में कहा जाए तो वह ‘‘हराम की कमाई खा-खा कर मुटा गया’’ था।
‘‘मुझसे शादी करोगी?’’ गिरीश ने एक छोटी-सी मुलाकात के दौरान पूछा था।
‘‘मैंने तुम्हारे बारे में इस दृष्टिकोण से कभी सोचा नहीं।’’विपुला ने कहा था।
‘‘अब सोचना। मैं तो शुरू से ही तुम्हे चाहता हूं।’’
‘‘तो पहले क्यों नहीं कहा?’’
‘‘बस, यूं ही। शायद, मैं विवाह की आवश्यकता को नहीं समझ पाया था।’’
‘‘अब कैसे समझ लिया?’’
‘‘मेरी बाहों में आ जाओ तो समझा दूं।’’ धृष्टतापूर्वक कहा था गिरीश ने।
‘‘सचमुच शादी करोगे मुझसे? तुम्हें दहेज में कुछ नहीं मिलेगा। तुम्हारी मां, तुम्हारे पिताजी, तुम्हारे रिश्तेदार मान जाएंगे?’’ विपुला ने अपनी सारी शंकाएं व्यक्त कर दी थीं।
‘‘नहीं मानेंगे तो मना लूंगा।’’ गिरीश का उत्तर सुन कर वह उसकी बाहों में समा गई थी। उसने जीवन में पहली बार अपने अधरों का चुम्बन लेने दिया था। एक ऐसा दग्ध चुम्बन जिसने उसके सारे शरीर को झंकृत कर दिया था। इस प्रथम चुम्बन का प्रथम अनुभव आगामी बहुत दिनों तक उसे रोंमांचित करता रहा। फिर भी इससे आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी थी उसने। अगली मुलाकातों में भी गिरीश चुम्बनों से आगे नहीं बढ़ पाया। गोया चुम्बन को विपुला ने लक्ष्मणरेखा बना दिया। हां, यह जरूर पूछती रही कि शादी कब करोगे? इस पर गिरीश का व्यवहार बदलने लगा। गिरीश कभी विपुला को दकियानूसी ठहराता, तो कभी विचित्र से उलाहने देने लगता ।
‘‘तुम मोटी क्यों होती जा रही हो?’’
‘‘कोई लेन-देन करने वाला घर पर आ गया तो उसे भगा तो नहीं दोगी?’’
‘‘तुम्हारे दांत कुछ टेढ़े-मेढ़े हैं, इन्हें कॉस्मेटिक से ठीक क्यों नहीं करवातीं?’’
‘‘खुले बाल क्यों रखती हो? इससे तुम्हारा सिर बड़ा दिखाई देता है, तुम आईना ठीक से नही देखती हो क्या?’’
‘‘तुम्हारे निकट के रिश्तेदारों में विवाह के नेग करने वाले तो हैं ही नहीं फिर विवाह के बाद के नेग कौन पूरे करेगा ?’’
गिरीश के इन नए प्रश्नों से थक गई वह और उसने मौन की चादर लपेटनी शुरू कर दी । शीघ्र ही वह समय भी आ गया जब इस सारे किस्से का अंत हो गया। गिरीश ने एक उच्चाधिकारी की लड़की के साथ ‘‘अरैंजमैरिज’’ कर ली। बाद में विपुला को अहसास हुआ कि गिरीश वाले मामले में प्यार का कोई सरोकार नहीं था। जो था, वह भ्रम था। गोया कोई अज्ञात को ज्ञात मान कर उससे चैंटिंग और शेयरिंग करता रहे।
इसके बाद उसे प्यार करने की आवश्यकता कभी महसूस ही नहीं हुई। अपने आप में डूबी हुई थी वह। पर, आज अचानक न जाने क्या हुआ कि मानो, नींद से जागते ही उसे लगने लगा कि उसे भी किसी से प्यार करना चाहिए। हो सकता है कि प्यार करने के बाद उसके अंदर भी काम भावना सिर उठाने लगे। कौन मानेगा कि पुरुषों के साथ उठने बैठने वाली अकेली जान विपुला अभी तक काम-भावना से प्रेशराईज़ नहीं है ? लोग यह क्यों मानते हैं कि एक लड़की युवा होते ही रतिदेवी की जेरॉक्स कॉपी बन जाती है और उसके रोम-रोम से काम-भावनाएं फूटने लगती हैं? है न अजीब फंडा?

विपुला अपने विचारों की दिशा बदल कर सोचने लगी कि अब किसके सामने प्यार का प्रस्ताव रखे? उसका दिल प्यार करने को कुलाचंे भरने लगा। अगर रूना के पति के सामने प्रस्ताव रखे तो? प्रशंसा तो उसकी आंखों में भी झलकती है। लेकिन कह सकेगी अपनी प्रिय सहेली के पति से? रूना कहीं हिन्दी फिल्मों की नायिका की भांति यह न कहने लगे कि ‘‘डाका डालने को तुझे मेरा ही घर मिला था।’’
रुना के लुटे-पिटे चेहरे की कल्पना कर के हंसी आ गई विपुला को।
‘‘हाऊ फुलिश।’’विपुला के मुंह से निकला ।
घुटनों को बाहों में बांध कर बैठे-बैठे खूब सोचा विपुला ने। कोई नाम नहीं सूझने पर उसने कपड़े बदले और दरवाज़े पर ताला डाल कर निकल पड़ी। मुख्य सड़क पर आते ही उसे पुरुषों की भीड़ दिखाई पड़ने लगी। सायकिल पर पुरुष, स्कूटर पर पुरुष, बाईक पर पुरुष, कार में पुरुष, खोमचों पर पुरुष। गर्दन तान कर चलते पुरुष, सिर झुका कर चलते पुरुष, फब्तियां कसते पुरुष, घूर-घूर कर देखते हुए पुरुष। गोया ये दुनिया मात्र पुरुषों की हो।
किससे करे प्रेम निवेदन वह ? सभी पुरुष हैं लेकिन सभी अपरिचित। अब, रास्ता चलते किसी पुरुष से तो वह कह नहीं सकती है कि मैं तुमसे प्यार करना चाहती हूं!
क्यों जागी प्यार करने की इच्छा उसके मन में ? वह झुंझलाने लगी। इस वृहतर समाज में प्यार कहां है? किस रूप में है? समाज है क्या. भावनाओं, विचारों, एक दूसरे के प्रति उपलब्धता- अनुपलब्धता का गुणा-भाग ही तो है। फिर भी प्रभावी रहती है समाजिक नियमों की अदृश्य आकृति। प्यार हमेशा इस आकृति के पांवों तले ही क्यों होता है?
हर औरत को कभी न कभी प्यार की चाहत होती होगी। प्यार भी किससे एक पुरुष से। उसी पुरुष से जिसके बेज़ा दबाव से वह आजाद रहना चाहती। उफ ! कितने सारे अंतर्विरोधों को अपने दिल में समेटे घूमती है एक औरत। यह सब कुछ कितना उलझा हुआ है। अकेलापन तो वह कई वर्षों से झेल रही है फिर अब ये अकुलाहट क्यों ? क्या उसकी बढ़ती उम्र उसे डरा रही है ? उसे अंतस से उठने वाले प्रश्नों का धुंआ उसकी आंखों पर छाने लगा फिर भी वह रुकी नहीं, चलती रही।
‘‘मैम. जरा देख के!’’
‘‘आह!!!’’ विपुला चिंहुक उठी। उसके बायें घुटने में ठोकर लगी थी। सामने बीस-बाईस साल का लड़का अपनी बाईक पर बैठा हुआ था। उसके चेहरे पर खेद के भाव थे।
‘‘मैम आपको लगी तो नहीं? सॉरी, मैं ब्रेक नहीं लगा पाया। यूं भी कुछ लूज है ब्रेक! रियली सॉरी!’’ लड़के ने क्षमायाचना की मानो झड़ी लगा दी।
‘‘इट्स ओ. के.!’’ विपुला ने कहा।
उस लड़के के चेहरे की ताज़गी देखकर अचानक वह अपने आप को थका-थका सा महसूस करने लगी। जाने कितनी दूर निकल आई थी वह, उसे तो होश ही नहीं था। ठोकर तो एक पैर में लगी थी लेकिन दुख रहे थे दोनों पैर। निश्चित रूप से कई किलोमीटर चल चुकी थी वह। उसने महसूस किया कि वह हांफ भी रही है। उसे अपना चेहरा धुआं-धुआं सा होता महसूस होने लगा। क्या उसे घर बैठ कर नंबर डायल करते रहना चाहिए था ? उसने अपने आप से प्रश्न किया और तत्काल ही उसके मन ने उत्तर दिया,‘‘पता नहीं!’’
और विपुला अपने आप से बतियाने लगी गोया वह अपने भीतर ही भीतर प्यार के अस्तित्व को बूझ लेना चाहती हो। ये बात दूसरी है कि उसके मन को एक सशक्त पलायनवादी उत्तर ‘‘पता नहीं’’ के रूप मे मिल गया था।
‘‘प्यार कहा मिलेगा?’’
‘‘पता नहीं!’’
‘‘प्यार किससे किया जाए?’’
‘‘पता नहीं!’’
‘‘प्यार क्यों किया जाए?’’
‘‘पता नहीं।’’
यदि वह सामने से आते किसी भी पुरुष को रोक कर कहे कि वह उससे प्यार करना चाहती है तो वह पुरुष उसके बारे में क्या सोचेगा ? क्या कहेगा ?
‘‘पता नहीं !’’
चौराहे पर खड़े हो कर प्रेम की खोज, क्या यही है असली हैशटैग लव?
आटो रिक्शा ले लेना चाहिए, अपने सिर को झटकते हुए उसने सोचा और एक आटोरिक्शा रोकने के लिए जैसे ही हाथ उठाया वैसे ही एक और बाईक उसके सामने आ कर रुकी।
‘‘तुम यहां कहां घूम रही हो?’’यह विनय था। ‘‘चलो बैठो! तुम्हारे ही घर जा रहा था। वाईफ को उसके भाई के घर पहुंचा कर। मगर तुम यहां कहां भटक रही हो ?’’ विनय ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा।
‘‘बस, यूं ही!’’ भला और क्या कहती विपुला?
“चलो, बैठो पीछे घर चलते हैं।’’ विनय ने संकेत किया।
‘‘किसके घर ?’’
‘‘तुम्हारे! और किसके ? घर नहीं जाना है क्या ? ऐसे क्या देख रही हो ? चलो, बैठो।’’
‘‘तुम तो अपनी पत्नी को शॉपिंग पर ले जाने वाले थे ?’’ विपुला ने पूछा।
‘‘हा, लेकिन उसका मूड बदल गया। उसके भाई का फोन आ गया तो वह भाई के घर जाने की जिद करने लगी। अब छोड़ो भी उसे। बैठो, पेट्रोल फुंका जा रहा है.।’’ विनय हंसा।
‘‘ठीक है चलो।’’ विपुला विनय के स्कूटर पर सवार हो गई। रास्ते भर विनय बोलता रहा जिसे विपुला ने सुना भी नहीं क्योंकि उसका मन सिर्फ एक प्रश्न पर अटका हुआ था, कैसा प्यार चाहिए उसे? कैसा?
घर पहुंच कर विपुला को विनय की जो पहली बात सुनाई दी, वह थी- ‘‘क्यों बुला रही थीं मुझे? कोई खास बात है?’’
‘‘अं... नहीं, बस, यूं ही।’’ एक बार फिर विपुला अपने यह कहने की लालसा को दबा गई कि मुझे तुमसे प्यार करना है। कोई लाभ भी तो नहीं है अब कहने का, उसके मन में उठा ज्वार अब उतर चुका है। लहरों के पीछे छूट गई है मरी हुई मछलियों-सा बुझा हुआ उत्साह और निर्जीव सीपियों सी ठंडी देह। इस पूर्ण वयस्क आयु में देह की आंच को आत्मनियंत्रण की ठंडी राख के नीचे दबाए रहने की आदत पड़ चुकी है। अब आसान नहीं है इस आंच को हवा देना । और फिर.. सिर्फ एक बार हवा दे कर ही क्या होगा. क्या वह इस आंच को सुलगाए रख सकेगी?
‘‘क्या सोचने लगीं?’’
‘‘कुछ नहीं!’’
‘‘फिर भी!’’
‘‘और सुनाओ? वो वासुदेव की क्रमोन्नति का क्या हुआ ?’’ विपुला सहसा औपचारिक होते हुए पूछ बैठी।
विनय से बातें करती-करती न जाने कब उसने सोशल मीडिया पर मलूकदास का यह दोहा लिख दिया कि -
‘‘जो तेरे घट प्रेम है, तो कहि-कहि न सुनाव।
 अंतरजामी जानि है, अंतरगत का भाव।।’’
फिर एक बड़ा-सा इस्माईली लगाया। हैशटैग लव लगा कर पोस्ट कर दिया और मशगूल हो गई विनय के साथ दुनियादारी की बातों में। प्रेम उसके भीतर ही भीतर देर तक उमड़ता-घुमड़ता रहा और उसकी पोस्ट पर देर तक लाईक, कमेंट्स आते रहे। विपुला प्रेम के अंतरंग की शिक्षा दे कर एक अदद हैशटैग से उसे बहिरंग कर चुकी थी। आभासीय दुनिया के चौराहे पर प्रेम विहीन प्रेम एक बार फिर ट्रेंडिंग कर रहा था, वह भी वाया मलूकदास    
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शुक्रवार, नवंबर 04, 2022

कहानी | सोचा तो होता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | "जनसत्ता" दीपावली विशेषांक 2022 में प्रकाशित

देश के प्रतिष्ठित समाचारपत्र "जनसत्ता" के वार्षिक अंक "दीपावली 2022" में अपनी कहानी "सोचा तो होता" को प्रकाशित देख कर जो प्रसन्नता हो रही है, उसे आप सब से साझा कर रही हूं। 
   🌷हार्दिक धन्यवाद एवं हार्दिक आभार  Mukesh Bhardwaj जी तथा Surya Nath Singh जी 🙏
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कहानी
सोचा तो होता
  - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

‘‘क्या जरूरत थी झगड़ा करने की? है!‘‘ आरती पुकारते हुए बोली उसके मन में दबी हुई चिंगारी अचानक भड़क उठी। उसे लगने लगा कि वह कृष्णा को मार- मार कर अधमरा कर दे। इस मुए ने ऐसा लांछन लगवाया है कि पिछली जिंदगी के सारे बही खाते एक बार फिर खोल कर रख दिए गए।
आज दोपहर से आरती का मन खराब हो चला था और इसका जिम्मेदार था उसका अपना बेटा कृष्णा। आरती को यूं भी आए दिन सत्रह तरह की बातें सुननी पड़ती हैं। आरती ने ब्याह के बाद जिस दिन, जिस घड़ी इस घर में पांव रखा था उसी दिन से बल्कि उससे भी पहले से उसके साथ कई ताने जुड़ गए थे। ब्याह पक्का होने के साथ ही उसे यह जता दिया गया था की आरती जैसी लड़की को अपने घर की बहू बनाने जा रहे उसके सास-ससुर देवतुल्य उदार हैं। वरना कोई भी उसे अपने घर की बहू बनाना स्वीकार न करेगा। सारे गांव समाज के साथ साथ आरती की मां और मामा भी आरती के ससुराल पक्ष के कृतज्ञ थे जिन्होंने उनके कलंकित घर की लड़की को बहू के रूप में स्वीकार किया था।
‘‘संभल के रहियो, लल्ली! कहीं यह भी अपने बाप जैसी निकली तो समझो हो गया कल्याण तुम्हारे कुल-खानदान का!‘‘ आरती की मुंह दिखाई की रस्म के समय किसी औरत ने लल्ली यानी आरती की सास को सचेत करते हुए कहा था। इस चेतावनी का स्वर इतना ऊंचा था की कम से कम आरती तो साफ-साफ सुन ही ले। कलेजा कट कर रह गया था आरती का। लेकिन वह कर ही क्या सकती थी? यह सब तो उसके भाग्य में उसके पिता ने ही लिख दिया था। वह सिर झुकाए अपने पैरों के मेहंदी रची अंगूठों को इस प्रकार आंखें गड़ाए देखती रह गई थी, जैसे दोनों अंगूठों की मेहंदी में कोई अंतर तलाश रही हो। या फिर, अंगूठे से धरती को कुरेदते हुए इतना गहरा गड्ढा कर लेना चाहती हो कि उसमें समा सके। आसान नहीं होता है सरेआम कोई लांछन सुनना और सहना। घूंघट के भीतर आरती की काजल रची आंखें आंसुओं से भर गई थीं। वह रोना नहीं चाहती थी लेकिन रोना तो उसके भाग्य में लिखा जा चुका था, कम से कम वह तो यही मानती थी।
‘‘नहीं री, भुजना की मां! यह सब घर के माहौल की बात होती है। हमारे यहां सब ठीक रहेगा।‘‘ आरती की सास ने उस औरत अर्थात भुजना की मां को ढाढस बंधा ते हुए कहा।
‘‘बुरा मत मानियो लल्ली, मगर वो कहते हैं न कि ऐसी चीजें इंसान के खून में रहती है जैसा बाप वैसे बच्चे। आखिर ये भी है तो कीरत की ही बेटी।‘‘ भुजना की मां तो मानो आरती को नीचा दिखाने की कसम खाकर आई थी। गोया आरती से उसकी कोई जाती दुश्मनी थी। आरती भुजना की मां से पूछना चाह रही थी कि तुम्हारी मुझ से क्या दुश्मनी है? क्यों मेरे पीछे पड़ी हो? यह तो ठीक था कि आरती की सास आरती का पक्ष ले रही थी भले ही अहसान जताने की मुद्रा में।
‘‘यह बात बेटों पर जाती है, बेटियों पर नहीं! बेटी तो पैदा ही होती हैं दूसरे के घर के लिए.... और फिर ऐसे घर की बेटियों का कोई उद्धार न करें तो क्या होगा इन बेचारियों का? आखिर इसमें इनका क्या दोष? यह क्यों भुगते अपने बाप के कुकर्मों को? आरती की सास ने भुजना की मां को जवाब देते हुए अपने बड़प्पन को भी बड़ी सरलता से स्थापित कर लिया।
आरती के भीतर उमड़ता घुमड़ता क्रोध और विवशता का दबाव इस तरह एकाकार हो गया की आंखों से आंसू बह निकले। घूंघट की ओट में आंसू बहाती रही।
‘‘अरे भौजी तो रो रही हैं!‘‘ पास बैठी एक बालिका का ध्यान आरती के आंसुओं की ओर गया और वह बोल उठी।
‘‘पीहर की याद आ रही होगी।‘‘ एक अन्य स्वर सुनाई पड़ा।
वैसे यह अनुमान गलत था। आरती अपने पीहर को याद भी नहीं करना चाहती थी। करें भी क्यों? उसे अपने पीहर से जीवन भर का कलंक ही तो मिला है, कोई खजाना तो नहीं मिला। मां और भाइयों ने भी झेला है उस कलंक को और झेल भी रहे हैं। काश! बापू ने ऐसा न किया होता।


मुंह दिखाई की रस्म का एक-एक पल एक एक युग के समान बीता था। उसी समय से आरती के मन में एक अनजाना डर बैठ गया था कि जाने अब क्या होगा? उसके इस भय नहीं उसे अपने ससुराल में कभी सिर उठाकर जीने नहीं दिया। आरती सिर उठाती भी तो किसके भरोसे? पहली रात को ही उसके पति ने उससे यही बोला था कि तुम तो हमारा सिर नहीं फोड़ोगी न!
अपने पति से यह सुनकर आरती फफक कर रो पड़ी थी।
‘‘अरे? हम तो मजाक़ कर रहे थे। तुम तो रोने लगीं।‘‘ आरती के पति ने उसे बहलाते हुए कहा था। लेकिन आरती के मन में चुभी फांस चुभी ही रह गई थी। यह भी कोई मजाक है? उसका पति उससे मजाक न करता, बदले में उसे कानी, कुबड़ी, बदसूरत, काली-कलूटी - कुछ भी कह लेता। वह हंसकर सुन लेती। मगर ऐसा मजाक, जैसे कोई हंसिए से दिल चीर कर रख दे।
   

आरती भरसक प्रयास करती कि उसे किसी भी बात पर गुस्सा न आए, मगर वह भी इंसान है, कभी गुस्सा आ ही जाता है। एक बार उसे अपने छोटे देवर पर किसी बात पर गुस्सा आ गया था। गुस्से में आकर आरती ने अपने छोटे देवर की बांह पकड़ कर उसे झकझोर दिया था। उसका छोटा देवर उस समय 10 बरस का था। छोटे देवर ने बुक्का फाड़ कर रोते हुए चिल्लाना शुरू कर दिया था, ‘‘अम्मा! बचाओ ! भौजी हमें मारे डाल रही हैं।‘‘
‘‘हाय रे! क्या हुआ? क्या हुआ रे छुटके?‘‘ आरती की सास बदहवास सी दौड़ी चली आई थी मानो आरती छोटे देवर को सचमुच मार डालेगी। बात जरा- सी थी, लेकिन देखते ही देखते तिल का ताड़ बन गई।
‘‘मेरी ही मति मारी गई थी जो मैं एक हत्यारे की बेटी को बहू बना के लाई।‘‘ आरती की सास ने विलापना और कोसना शुरू कर दिया और अपने माथे पर हाथ मारते हुए बोली, अब तो जन्म भर यही डर बना रहेगा कि यह कहीं किसी रोज हम में से किसी को निपटा न दे।
आरती रोती रही, बस रोती! कर भी क्या सकती थी वह रोने के सिवा। उसके भीतर का लावा आंसू बनकर ही निकलता था। खारा-खारा, लावे से कहीं ठंडा। किसी को भी भस्म नहीं कर सकता था। भीतर से खौलती और बाहर से रोती आरती अपने दुर्भाग्य के साथ जी रही थी कि आज उसके बेटे कृष्णा ने उसके घावों को बहुत गहरे कुरेद डाला।

‘‘तूने ऐसा क्यों किया रे कृष्णा?‘‘ आरती ने कृष्णा की दोनों बाहें पकड़कर उसे हिलाते हुए पूछा।
‘‘तो और क्या करता? उसने मुन्नी को छेड़ा था।‘‘ कृष्णा ने पलट कर जवाब दिया,‘‘ कोई मेरी बहन को छेड़े और मैं मुंह बाए देखता रहूं, मुझसे यह ना होगा।‘‘
कृष्णा का जवाब सुनकर सन्न रह गई आरती। क्या कृष्णा अपने नाना पर गया है? क्या भुजना की अम्मा ने सही कहा था कि यह सब इंसान के खून में रहता है? क्या उसके पिता का खून उसके शरीर से होता हुआ कृष्णा तक जा पहुंचा? आरती की पकड़ ढीली पड़ गई। कृष्णा आरती की पकड़ से छूटते ही घर से बाहर निकल गया। इधर आरती की आत्मा त्राहि-त्राहि कर उठी। यूं उसे पता है कि अगर उसकी परिस्थितियां सामान्य होतीं तो कृष्णा की इस हरकत पर उसे गर्व होता। केवल वही नहीं, अपितु दूसरे लोग भी कृष्णा की प्रशंसा करते हुए कहते कि भाई हो तो ऐसा जो अपनी बहन के साथ छेड़छाड़ किए जाने को सहन नहीं कर सका और चार-पांच लफंगे लड़कों से अकेले ही जूझ पड़ा।
कृष्णा ने किसी और घर में जन्म लिया होता तो भी उसके इस साहस की तारीफ होती, लेकिन कृष्णा ने तो आरती की कोख से जन्म लिया है और आरती उस पिता की बेटी है जो हत्या के अपराध में आजन्म कारावास की सज़ा काट चुका है। इसलिए कृष्णा को उसके साहस पर बधाई कोई नहीं देगा बल्कि सभी यही कहेंगे कि कृष्णा की रगों में उसके नाना का खून दौड़ रहा है। एक हत्यारे का खून।
आरती की इच्छा होने लगी कि वह उसी समय अपने पिता के पास जाए और उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया? क्या उसे एक पल को भी अपने बच्चों का ख्याल नहीं आया?
वैसे आरती को सब कुछ पता है। उसे पता है कि उसके पिता ने फुग्गन की हत्या क्यों की थी। फिर भी उसे क्षोभ है अपने पिता के कृत्य पर। इसलिए नहीं कि उसके पिता ने अपराध किया बल्कि इसलिए कि उसके पिता के इस कर्म की सज़ा उसे भी भुगतनी पड़ रही है।
बुरा समय शायद वहीं से शुरू हुआ जब से आरती के बापू कीरत और फुग्गन में दोस्ती आरंभ हुई। कहने को दोस्ती थी किंतु इसके पीछे सच्चाई कुछ और ही थी। आरती की मां सुखबाई को फुग्गन फूटी आंखों नहीं सुहाता था। उसने कीरत को इस बारे में चेताया भी था। यूं तो फुग्गन की नीयत पर कीरत को भी शंका थी। फिर भी कीरत अनदेखी करता रहा आखिर फुग्गन रसूख वाला आदमी था। किरत फुग्गन को आसानी से नहीं टाल सकता था। इसलिए उसने फुग्गन को टोंकने के बजाय अपनी बीवी सुखबाई को सचेत कर रखा था कि वह फुग्गन के सामने न निकला करें। सुखबाई को कौन- सी अटकी थी कि वह फुग्गन के सामने आती। वह तो स्वयं फुग्गन से डरी-डरी रहती थी। उसे केवल अपनी ही नहीं बल्कि अपनी दोनों बेटियों आरती और भारती की अस्मत की भी चिंता थी। हैवान आदमी का क्या भरोसा ऐसे आदमी औरतजात की उम्र नहीं देखते।
अवसर मिलते ही फुग्गन छिछोरे हंसीँमजाक करने से नहीं चूकता। कहने को रिश्ता देवर भाभी का बना रखा था। उसने टालने का लाख प्रयास करने पर भी वह दिन आ ही गया जब फुग्गन का सगर फोड़ने की नौबत आ गई। हुआ यह कि कीरत की अनुपस्थिति में आ टपका फुग्गन। पहले आंगन में बिछी चारपाई पर पसर गया। फिर उसने सुखबाई को आवाज देकर उससे पीने को एक गिलास पानी मांगा। उस समय घर पर न तो दद्दा थे और न बच्चे। दद्दा रिश्तेदारी में गए हुए थे और बच्चे बाहर कहीं खेल में मस्त थे। अब सुखबाई पानी के लिए मना कर नहीं सकती थी अतः झक मारकर सुखबाई को ही पानी लेकर फुग्गन के सामने आना पड़ा। उसने पानी का गिलास पकड़ने के बदले, सुखबाई की बांह पकड़ ली। उसने सुखबाई की अस्मत लूटने की कोशिश की। सुखबाई की चींख-पुकार के कारण फुग्गन अपने इरादे में सफल तो नहीं हो पाया, लेकिन सुखबाई दहशत से देर तक थर-थर कांपती रही। उसकी आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। अपमान और भय का मिलाजुला प्रभाव सुखबाई को गार रहा था।
जब कीरत घर आया तो सुखबाई उसे रोती हुई मिली। सुखबाई की हालत देखकर कीरत आपे से बाहर हो क्या और उसी समय चल पड़ा फुग्गन को खोजने। सुखबाई ने उसे रोकने का प्रयास किया था लेकिन वह प्रयास आग में घी का काम कर गया था।
सुखबाई को बाद में खुद कीरत ने बताया था कि फुग्गन को देखते ही उसका खून खौल उठा। उसने आव देखा न ताव और पास में पड़ी कुल्हाड़ी उठाकर फुग्गन के सिर पर दे मारी। उस क्षण उसने सोचा भी नहीं था कि उसके हाथों एक हत्या होने जा रही है। उसने तो यह भी नहीं देखा था कि कुल्हाड़ी की धार किधर है?  संयोगवश कुल्हाड़ी की धार उल्टी थी, मगर उसकी कुल्हाड़ी का वार पड़ते है फुग्गन धराशयी हो गया था। उसने तत्काल दम तोड़ दिया था। यद्यपि कीरत को बहुत देर बाद थाने में पता चला था कि फुग्गन ने उसी समय दम तोड़ दिया था। सुखबाई को इस घटना का पता उस समय चला, जब गांव का ही एक आदमी दौड़ा- दौड़ा आया और उसने हांफते-हांफते बताया था कि कीरत पुलिस चौकी में है क्योंकि उसने फुग्गन को मार डाला है। यह सुनकर सन्न रह गई थी सुखबाई। हे भगवान ! यह क्या कर डाला कीरत ने। वह एक बार फिर थरथर कांपने लगी थी।
कीरत का मुकदमा बना उधार के लेनदेन के कारण हुई हत्या का। फुग्गन के परिवार वालों के वकील ने कहा कि पीड़ित ने फुग्गन से बड़ी रकम उधार ली थी। जब फुग्गन ने वह रकम वापस मांगी तो कीरत ने उसकी हत्या कर दी। कीरत ने भी सुखबाई वाले मामले को दबा रहने दिया। आखिर जोरू की इज्ज़त घर की इज्ज़त होती है। लोग तो यही मान बैठेंगे कि सुखबाई अपनी इज्जत नहीं बचाई बचा पाई। इससे बेटे-बेटियों का भविष्य भी चौपट हो जाएगा । ना कोई बहू देगा ना कोई बेटी लेगा। फिर भी उंगली उठाने वालों की कहीं कोई कमी होती है भला? तब कीरत  को कहां पता था की वह लाख प्रयत्न कर ले लेकिन उंगली उठाने वालों की उंगलियां वह नहीं रोक सकेगा। आजन्म कारावास की सज़ा भी उसके किए के परिणाम को बदल नहीं सकेगी। यह बात उसके छोटे बेटे सूरत की शादी के समय और भी स्पष्ट हो गई थी।
यह सारी बातें आरती को उसकी मां सुखबाई ने उस दिन स्वयं बताई थी, जिस दिन आरती पहली बार रोती हुई स्कूल से घर आई थी और चिल्लाने लगी थी कि ‘‘हमें नहीं जाना स्कूल। वहां सब लोग हमारी हंसी उड़ाते हैं। सब हमें हत्यारे की बिटिया कहते हैं, ऐसा क्यों किया बापू ने?’’
तब मां ने उसे उसके बापू की सच्चाई बताई थी किंतु आरती उस समय न तो समझ सकती थी और न समझ सकी। उसका स्कूल जाना अवश्य छूट गया। आरती स्कूल जाए या न जाए किसी को इस बात की चिंता नहीं थी। चिंता थी तो आरती के ब्याह की। नाते-रिश्तेदार भी यही सोचते थे कि ऐसे घर की लड़की को कोई अपनाएगा नही?
गांव में तो ऐसी घटनाएं आए दिन होती रहती हैं। शौच के लिए घर से बाहर निकली औरतों की अस्मत लूट ली जाती है या फिर सूने घर में घुस कर औरतों की देह को रौंदा जाता है। बात-बात पर हंसिए-दरांते और कुल्हाड़ियां चल जाती हैं। ज़रा-ज़रा सी बात पर लोग अपना विवेक खो बैठते हैं। हर घटना का सार-समाचार होता है-‘‘आपसी रंजिश के चलते फलां ने फलां को मारा।’’ इसके पीछे का सच भला कौन टटोलता है? कोई नहीं! गांववाले भी नहीं!
कीरत सरकार की कृपा से सज़ा पूरी होने से पहले ही ज़ेल से छूट गया था, मगर उसके छोटे बेटे सूरत ने अड़ियल रवैया अपनाते हुए स्पष्ट शब्दों में कह दिया था कि उसके होने वाले ससुर नहीं चाहते हैं कि उसके बापू विवाह के समय घर पर रहें। इसलिए बेहतर है कि वे तीरथ पर चले जाएं।सूरत के बड़े भाई मूरत की घरवाली यानी सूरत की भौजी ने भी इसका समर्थन किया था। आरती भी अपने भाई और भौजी के पक्ष में जा खड़ी हुई थी।कीरत को जब इस बात का पता चला तो वह खून के आंसू रो दिया। उसने अपने बच्चों की इच्छााओं का ध्यान रखते हुए अपने दिल पर पत्थर रख लिया और तय किया कि वह तीरथ यात्रा पर चला जाएगा। सुखबाई भी अब अकेली क्या करती? कीरत को उसके बहू-बेटों ओर बेटी ने नई सज़ा सुना दी थी लेकिन इस बार सुखबाई इस नई सज़ा में अपने पति का साथ देने सुखबाई भी हो ली। दोनों ने अपनी गठरी-मोठरी बांध ली।
‘‘अम्मा तुम क्यों जा रही हो? तुम्हारे यहां होने से किसी को परेशानी नहीं है।’’ आरती ने झिझकते हुए सुखबाई से कहा थां। मूरत ने भी आरती की बात का समर्थन किया था। मगर सुखबाई नहीं मानी। आरती के मन में उस समय चोर आ बैठा था। वह चाहती थी कि अम्मा न जाएं। जाना है तो बापू ही जाएं। सबको बापू के रहने से परेशानी है, अम्मा के रहने से नहीं। मगर सुखबाई तो न जाने किस मिट्टी की बनी थी।
‘'मैंने और तुम्हारे बापू ने अलग-अलग रह कर बहुत सज़ा काट ली। अब जरा साथ-साथ रह कर भी सज़ा काट लें।’’ बड़ा चुभता उत्तर दिया था सुखबाई ने।
अम्मा का उत्तर सुन कर आरती के मन में कड़वाहट भर गई थी। बापू के लिए ऐसा ही दर्द का तो बापू को हत्या करनेे से क्यों नहीं रोका था?
सुखबाई और कीरत तीर्थ यात्रा पर चले गए। सूरत का विवाह धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। आरती अपनी ससुराल लौट आई। आरती ने अपने भाई की शादी में जी भर कर ढोलक बजाई थी। कृष्णा अपने मामा की बारात में खूब नाचा था। मुन्नी भी साथ गई थी। उसने भी ढोलक पर गाने गाए थे अपने मामा की शादी पर।
यूं तो मुन्नी साधारण नैन-नैक्श की थी लेकिन आवारा लड़कों को इससे क्या? उनके लिए तो मुन्नी का लड़की होना ही पर्याप्त था।
ज़रूर छेड़ा होगा उन लड़कों ने मुन्नी को, वरना कृष्णा उनसे यूं झगड़ा नहीं करता। आरती इतना सोच कर ही सकपका गई। उसे अपनी वह बात याद आ गई जो उसने अपनी मां को ताना मारते हुए कही थी-‘‘अच्छा!! हमारे पीछे तो कोई नहीं आता है, तुम्हारे पीछे फुग्गन क्यों पड़ा था?’’ बेटी आरती ने अपनी सच्चरित्रता को स्थापित करते हुए सुखबाई के चरित्र पर कीचड़ उछाल दिय था।
अब क्या यही बात वह अपनी बेटी मुन्नी से कह सकती है? उसी पल आरती को अपनी मां की परिस्थिति, पिता के क्रोध की सीमा और उनके द्वारा किए गए अपराध का औचित्य खुल कर सामने आ गया। दोष तो उसके बापू कीरत का भी नहीं था, यह बात आज उसकी समझ में आई। मगर अब हो भी क्या सकता था, उसकी अम्मा और बापू तो एक और सज़ा भुगतने घर से जा चुके थे। जबकि आरती और उसका बेटा एक अलग तरह की सज़ा काट रहे थे, जिसके मूल में एक ही बात थी कि -‘‘कृष्णा भी अपने नाना की तरह किसी दिन किसी की हत्या न कर दे।’’
‘‘हे भगवान, कृष्णा ऐसी गलती मत करना। मैं जीवन भर हर महीने पांच रुपए का प्रसाद चढ़ाऊंगी, देवी मैया! तुम कृष्णा की रक्षा करना!’’ आरती बाहों में सिर दे कर सुबकने लगी।
कौन जानता था कि भावावेश में उठाया गया एक कदम इतने निर्दोष लोगों को जीवन भर कोई न कोई सज़ा भुगतने को विवश कर देगा।
आरती का मन चीत्कार कर उठा, ये सज़ा ओर कब तक भुगतनी पड़ेगी? वह आज भी अपने बापू को झकझोर कर कहना चाहती है कि कम से कम एक बार सोचा तो होता।
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मंगलवार, जून 09, 2020

जिंदा मुहावरों का समय ... डाॅ शरद सिंह के संस्मरण पुस्तक के अंश - 2

ये है 'जनसत्ता' में सन् 1988 में प्रकाशित हुई मेरी रिपोर्ट ....
Jansatta, 27 Feb1985, Dr Sharad Singh

जिंदा मुहावरों का समय ... डाॅ शरद सिंह के संस्मरण पुस्तक के अंश

मेरे संस्मरणों की पुस्तक ‘‘जिंदा मुहावरों का समय’’ में मैं एक अध्याय मेरे उस दिनों के संस्मरणों का है जब मैं एक सक्रिय पत्रकार थी। उसके कुछ अंश अपनी प्रकाशित रिपोर्टस और तस्वीरों के साथ इस अपने ब्लाॅग में साझा करती रहूंगी ......

अपने कॉलेज जीवन से ही मैंने जर्नलिज्म शुरू कर दिया था। सन् 1980 से 1988 तक बतौर रिपोर्टर विभिन्न समाचार पत्रों के लिए मैंने सक्रियता से काम किया। उन दिनों की चर्चित पत्रिका 'रविवार' और 'आज' समूह के प्रकाशन की पत्रिका 'अवकाश' के लिए भी मैंने रिपोर्टिंग की थी।

आज अपनी एक पुरानी फाइल खोलने पर मेरी कुछ पुरानी रिपोर्टिंग्स मेरी नजरों से गुज़री जिन्हें मैं आपसे क्रमशः साझा करती रहूंगी.....

जिनमें से ये है 'जनसत्ता' में सन् 1985 में प्रकाशित हुई मेरी रिपोर्ट ....
Jansatta, 31 May 1985, NMDC Panna,  Dr Sharad Singh