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सोमवार, दिसंबर 07, 2020

डॉ शरद सिंह ने 'पिछले पन्ने की औरतें' उपन्यास में.... | बुंदेली महिला कथाकार और लोक संस्कृति | डॉ. अवधेश चंसौलिया

Dr (Miss) Sharad Singh, Novelist, Columnist, Historian & Poetess

 ★डा0 शरद सिंह ने पिछले पन्ने की औरतें उपन्यास में चंदेरी (गुना) में लगने वाले बेड़नियों के मेले में ‘राई नृत्य’ का सुंदर चित्रण किया है-‘‘मशाल के इर्द-गिर्द पचासों दलों के रूप में सैकड़ों पुरुषों की भीड़ और उन दलों के मध्य पूरी सज-धज के साथ पचासों बेड़नियां...। रंग पंचमी की रात को ग्राम करीला में बेड़नियों का विराट मेला लगता है। समूची पहाड़ी बेड़नियों और उनके सोहबतियों के नाच रंग से नहा जाती है।’’ ★
....प्रस्तुत लेख से...

यह लेख  "बुंदेली महिला कथाकार और लोक संस्कृति"  "स्पंदन" में 17सितम्बर 2009 को प्रकाशित किया गया था ...इसके लेखक हैं डॉ. अवधेश चंसौलिया। इसमें मेरे उपन्यास का भी उल्लेख है अतः साभार यह लेख मूल लिंक सहित अपने इस ब्लॉग पर प्रस्तुत कर रही हूं-
Spandan Magazine

बुंदेली महिला कथाकार और लोक संस्कृति
- डॉ. अवधेश चंसौलिया
       बुंदेली माटी में जन्मी महिला कथाकार आज भले ही बुन्देलखण्ड से दूर अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हांे लेकिन उनके संस्कारों में, उनके मन में, रोम-रोम में बुन्देली जन-जीवन रचा-बसा है। यही कारण है कि जन्म से मरण तक के संस्कारों, रीतिरिवाजों एवं यहाँ के तीज त्यौहारों का जीवंत चित्रण इनके कथा साहित्य में सहजता से प्राप्त हो जाता है। बुंदेली महिला कथाकारों में मैत्रेयी पुष्पा का नाम सर्वोपरि है। मैत्रेयी जी ने बुदेली समाज को बहुत नजदीकी से देखा-परखा है। इसलिए इनके कथा साहित्य में बुंदेली जन-जीवन पूरी सूक्ष्मता, गहन आत्मीयता के साथ रूपायित हुआ है। बुंदेलखण्ड ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत में पुत्री की अपेक्षा पुत्र जन्म पर लोगों को अधिक प्रसन्नता होती है। पुत्र जन्म पर दिल खोलकर खर्च किया जाता है, नेग बाँटे जाते हैं, जबकि पुत्री जन्म पर लोग जन्म संस्कार से जुड़ी दाई का मेहनताना देने में भी संकोच करते हैं। ऐसी स्थिति में दाई, पुत्र-पुत्री में भेद न करती हुई सोहर गाती है -
‘‘जसोदा जी से हँस-हँस पूंछत दाई,
नंदरानी जी से हँस-हँस पूंछत दाई,
रातैं तो मैं लली जनाय गयी,
लालन कहाँ से लाई। जसोदा जी से....।’’ 1
रूढ़ियों से ग्रस्त बंदेली समाज में पुत्र को जन्म देने वाली माता को जो सम्मान प्राप्त है, वह पुत्री जन्मने वाली माता को नहीं है। तुम किसकी हो बिन्नी कहानी में पुत्री की माँ की मानसिक संघर्ष की स्थिति दृष्टव्य है-‘‘बिना पुत्र की जननी बने, वे माँ के गौरवान्वित पद को स्वीकार नहीं कर पा रहीं थी।...अधूरेपन का एहसास मकड़ी के जाले सा मन पर चारों ओर लिपट गया। सामाजिक परिवेश कटीला सा हो चला। तीज त्यौहार चिढ़ाते-बिराते से निकलने लगे। कलेजे में हीनता की हूक सी उठती, तो बेचारगी में पलट जाती.....यह एक बात उनके कलेजे को निरंतर उधेड़ती रहती कि-वे बेटे को जन्म नहीं दे सकी।’’ 2
पुत्र जन्म की प्रसन्न्ता अवर्णनीय होती है। ‘‘चाची आ गयीं। गोमा ने बालक को जनम दिया है। चाची थाली बजाने लगीं.....घर-घर बुलावे दिये जा रहे हैं। चैक पूरकर सांतियां घरे जायेंगे। चाची कोरा चरुआ भर रहीं हैं। बत्तीसा डालकर उबालने धरेगीं। गोमा को बत्तीसा का पानी पीना है। नेग सगुन हो रहे हें।....सोहर गाये जा रहे हैं-
ऐसे फूले सालिग राम डोलें, हाथ लिये रुपइया,
ए लाला के बाबा, आज बधाई बाजी त्यारे।।’’ 3
मैत्रेयी पुष्पा के अल्मा कबूतरी में बच्चे की छठी संस्कार का चित्रण यथार्थपरक है। ‘कदमबाई कबूतरी ने बेटे को जन्म दिया है। कबूतरे के डेरों पर गाँव के पंडित जी तो आते नहीं अतः पंडिताई का कार्य मलियाकाका ही करते हैं। बच्चे का पालना बाहर निकाला गया। चैक जगमगाने लगा। सरमन की औरत देवर को गालियाँ देकर, हल्की हो चुकी थी, सो सोहर गाने लगी। आधा गज नया कपड़ा भी ले आयी। कुर्ता टोपी के लिए।' 4
मैत्रेयी पुष्पा के कथा संसार में सामाजिक रीति-रिवाजों का जैसा विशद और सुन्दर चित्रण है वैसा अन्य किसी बुन्देली कथालेखिका के कथा लेखन में नहीं है। इस दृष्टि से उनके उपन्यास इदन्नमम्, बेतवा बहती रही, अल्मा कबूतरी, झूला नट तथा कहानी संग्रह ललमनिया तथा अन्य कहानियाँ अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। कहानी ललमनिया तो बारात चित्रण का विहंगम एवं मनमोहन दृश्य उपस्थित करने में बेजोड़ है। इदन्नमम् उपन्यास में ‘नव वधू की रोटी छुआई’ का दृश्य इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जिसमें बुढ़िया, जब पुराना नाम ले लेकर नव वधू को बुलाती हैं तो वह कमरे से बाहर नहीं निकलती। लेकिन जैसे ही मंदा, बहू को नर्मदा नाम से पुकारती है तो वह झट से बाहर निकल आती है और उसका नाम ससुराल में नर्मदा पड़ जाता है। मैत्रेयी जी के कथा साहित्य में बुन्देली वाद्य यंत्रों को भी यथास्थान महत्व प्राप्त हुआ है। मंगल अवसरों पर यहाँ रमतूला बजाया जाता है। ‘मन्दाकिनी की पक्यात में रमतूला बजा टू ऊं टू ऊं बुलउवा दिये गये। कुसुमा का स्वर मंगल गीतों में सबसे ऊपर है।
‘‘सिया बारी बनरी, रघुनन्दन बनरे।
को को बरातें जाय मोरो लाल।।’ 5
बुन्देलखण्ड में जब नववधू आती है तब उसकी गोद में छोटे देवर को बिठाया जाता है। इस रस्म का सजीव चित्रण मैत्रेयी पुष्पा झूला नट उपन्यास में विस्तार से करती हैं।
मैत्रेयी पुष्पा के लोक कवि ईसुरी पर आधारित उपन्यास कही ईसुरी फाग में बुंदेली लोक-संस्कृति में रची-बसी फागों के अनेक दृश्य जीवंत हो उठे हैं। मैत्रेयी जी के कथा साहित्य में नौटंकी, रास, राई नृत्य, सुअटा खेल आदि लोक नृत्यों का दृश्यांकन बहुत ही आकर्षक रूप में हुआ है। ‘नारे सुअटा’ बुंदेली क्वांरी कन्याओं का एक महत्वपूर्ण पर्व है। अगनपाखी उपन्यास में क्वार के महीने में इस पर्व की मनोरम झाँकी प्रस्तुत हुई है। क्वांरी कन्याओं के द्वारा सुअटा की मूर्ति के सामने पूजा-अर्चना कर प्रभाती गाये जाने का दृश्य इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है -
‘‘उठो सूरजमल भैया भोर भये
उठो-उठो चन्दुमल भइया भोर भये
नारे सुअटा, मालिनी खड़ी तेरे द्वार
इन्दरगढ़ की, मालिनी नारे सुअटा, हाटा ई हाअ बिकाय।’’ 6
इन्हीं के उपन्यास इदन्नमम् में बुंदेली लोकनृत्य दिवारी का मनोहारी चित्रण बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है-
‘‘दिबरिया लोग, गाते हुए नाचते हैं। होऽऽ! होऽऽ! होऽऽ! होऽऽऽऽ!
दिबारी माय लक्ष्मी माय। हो मोरे गनपत महाराजऽऽऽज!
नाच जमने लगा। मोर पंख हिल रहे हैं। लोग डूबे हुए हैं रेग में। एक दिबरिया भागता हुआ आया और जा मिला समूह में.....बऊ थाली में खील बतासा गुड़ धरकर ले आयीं।’’ 7
मैत्रेयी पुष्पा के अतिरिक्त अन्य लेखिकाओं ने भी अपने साहित्य में बुंदेली रीति-रिवाजों, परम्पराओं को उकेरा है। डा0 छाया श्रीवास्तव की कहानी असगुनी में भी पुत्र जन्म पर खुशी में सोहर गाते हुए स्त्रियों के मनमोहक दृश्य हैं। ननद के कहने पर छोटी भाभी गाती है-‘‘हमको तो पीर आवें, ननद हँसत डोलें।’’ 8
डा0 कामिनी ने गुलदस्ता कहानी में सातवें महीने के गर्भ के समय लड़की के मायके से आने वाले पच की बात इस प्रकार की ‘बिटिया के अगर लड़का हुआ तो पच के लिए दो धोती, अच्छा ब्लाउज, बच्चे को कपड़े, दामाद को कुर्ता-धोती चाहिए। मिठाईयाँ, गेहूँ, दालें, चावल अलग। सोने की नहीं तो चाँदी की हाथ की पुतरिया, तबिजिया चाहिए। गिरिजा को तीन-तीन बिछिया नहीं तो गाँव वाले नाम धरेंगे। कोई क्या कहेगा कि घर में जुआरा बंधा है। खेती भी है और कुछ न भेजा।’’ 9
सामाजिक रीति-रिवाजों की विस्तृत और यथार्थपरक जानकारी होने के कारण लेखिकाओं के चित्रण अधिक सजीव और यथार्थ बन पड़े हैं। डा0 छाया श्रीवास्तव कहानी विकल्प में लड़की देखने का दृश्य इस प्रकार उपस्थित करती हैं-‘‘कानपुर के सब-इंजीनियर आये थे, दलबल सहित माँ, दो बहिनें, एक भाई के साथ। पिता ने आदर सत्कार में कमी नहीं रखी थी। लड़के ने भांति-भांति से इंटरव्यू लिया था। बहिनों ने तो नचाकर देखा था। पूरे दो दिन में वे महीनों का हिसाब बिगाड़ गये थे।’’ 10 जीवन पथ कहानी में भी छाया श्रीवास्तव ने वर-वधू के विवाह की रस्म के सुन्दर चित्रांकन के साथ बेटी की विदाई का बहुत ही कारुणिक दृश्य उपस्थित कर पाठकों को द्रवित करने में पूर्ण सफलता प्राप्त की है।’’ 11
डा0 पद्मा शर्मा ने रेत का घरोंदा कहानी में वधू के ससुराल आने पर कंकन खोलने के रिवाज का बड़ा ही मनोरंजक चित्र उपस्थित किया है। इसी कहानी में ससुराल में नई वधू से गाना गाने को कहा जाता है, इस प्रथा को दादरे गाने की रस्म कहा जाता है। नई वधू के समक्ष यह बहुत ही दुविधा की घड़ी होती है। वह सोचती है क्या गाऊँ क्या न गाऊँ। कहानी की नव वधू स्मिता ढोलक पर थाप देकर गा उठती है-
‘‘राजा की ऊँची अटरिया, दइया मर गई, मर गई
सासू कहे बहू रोटी कर लो, सब्जी कर लो,
राजा कहे मेरी रामकली की उंगली जल गई।’’ 12
विवाह में मामा द्वारा भात लाने की परम्परा बुन्देली समाज में बहुत महत्व रखती है। इस अवसर पर मामा अपनी सामथ्र्य के अनुसार सामान आदि की व्यवस्था करते हैं। भतैयों के स्वागत में बहिनें गाती हैं-
‘‘सुनो भैया करूँ विनती समय पर भात दे जाना।
ससुर को सूट सिलवाना, सास को साड़ी ले आना।
अगर इतना न हो भैया तो खाली हाथ आ जाना।
मण्डप की शोभा रख जाना।।’’ 13
बुंदेली महिला कथाकारों ने बुंदेली संस्कृति का अपने कथा साहित्य में जिस गहराई के साथ संरक्षण किया है, संस्कृति के प्रति वैसा समर्पण भाव, पुरुष कथा लेखन में लगभग अप्राप्त है। मेले, दंगल, पर्वों, त्यौहारों की विशेष सजधज तथा ग्रामीण संस्कृति की झलक पूरी तन्मयता और तीव्रता के साथ हमें महिला कथाकारों के कथा साहित्य में दृष्टिगत होती है। करवाचैथ भारतीय नारियों का विशेष पर्व है। इसका चित्राकन रजनी सक्सेना ने अपनी कहानी अन्तर संवाद में बहुत ही अच्छी तरह से किया है। इसी कहानी में शारदीय नवरात्रि का दृश्य भी अवलोकनीय है। 
Pichhale Panne Ki Auraten | Novel of Dr (Miss) Sharad Singh

डा0 शरद सिंह ने पिछले पन्ने की औरतें उपन्यास में चंदेरी (गुना) में लगने वाले बेड़नियों के मेले में ‘राई नृत्य’ का सुंदर चित्रण किया है-‘‘मशाल के इर्द-गिर्द पचासों दलों के रूप में सैकड़ों पुरुषों की भीड़ और उन दलों के मध्य पूरी सज-धज के साथ पचासों बेड़नियां...। रंग पंचमी की रात को ग्राम करीला में बेड़नियों का विराट मेला लगता है। समूची पहाड़ी बेड़नियों और उनके सोहबतियों के नाच रंग से नहा जाती है।’’ 14
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि बुंदेली महिला कथाकार बुंदेली संस्कृति के लुप्त होते स्वरूप को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रही है। उनका कथा लेखन सोउद्देश्य है और वे इसमें पूरी तरह सफल भी हो रही हैं। महिलाएँ सचमुच लोक संस्कृति की सच्ची वाहिकाएँ हैं। लोक संस्कृति के संरक्षण में बुंदेली महिला कथाकारों के इस योगदान को निरंतरता मिलनी चाहिए।
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संदर्भ-
1. मैत्रेयी पुष्पा-रिजक, ललमनिया तथा अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह) पृ0 18
2. वही पृ0 126
3. मैत्रेयी पुष्पा-गोमा हंसती है, ललमनिया तथा अन्य कहानियाँ(कहानी संग्रह) पृ0 167-168
4. मैत्रेयी पुष्पा-अल्मा कबूतरी पृ0 34 राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, 2004
5. मैत्रेयी पुष्पा-इदन्नमम पृ0 106, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली 1999
6. मैत्रेयी पुष्पा, अगनपाखी, पृ0 24-25, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 2003
7. वही पृ0 312
8. डा0 छाया श्रीवास्तव-असगुनी, आकांक्षी (कहानी संग्रह) पृ0 40, राजीव प्रकाशन, टीकमगढ़, 1997-98
9. डा0 कामिनी-गुलदस्ता पृ0 46 आराधना ब्रदर्स, गोविन्द नगर, कानपुर 1991
10. डा0 छाया श्रीवास्तव-विकल्प, आकांक्षी (कहानी संग्रह) पृ0 60
11. डा0 छाया श्रीवास्तव-परित्यक्ता पृ0 8 अमन प्रकाशन 1/20, महरौली दिल्ली 1981
12. वही पृ0 32
13. वही पृ0 105-106
14. डा0 शरद सिंह, पिछले पन्ने की औरतें, पृ0 278 सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली,2005
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शुक्रवार, सितंबर 25, 2020

पिछले पन्ने की औरतें | उपन्यास | लेखिका डॉ शरद सिंह | पुनर्पाठ | डॉ वर्षा सिंह

मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह दैनिक आचरण में "पुनर्पाठ" कॉलम लिखती हैं। आज उन्होंने अपने कॉलम में मेरे पहले उपन्यास "पिछले पन्ने की औरतें को जगह दी है... जो यहां साझा कर रही हूं...

Pichhale Panne Ki Auraten - Novel of Sharad Singh


सागर: साहित्य एवं चिंतन


       पुनर्पाठ: ‘पिछले पन्ने की औरतें’ उपन्यास

                          -डॉ. वर्षा सिंह

                            Email-               drvarshasingh1@gmail.com


इस बार पुनर्पाठ में मैं जिस उपन्यास की चर्चा करने जा रही हूं उसका नाम है ’’पिछले पन्ने की औरतें‘‘। इस उपन्यास की लेखिका है डॉ. शरद सिंह। यह उपन्यास मुझे हर बार प्रभावित करता है इसलिए नहीं कि यह मेरी छोटी बहन शरद के द्वारा लिखा गया है बल्कि इसलिए कि इसे हिंदी साहित्य का बेस्ट सेलर उपन्यास और हिंदी साहित्य का टर्निंग प्वाइंट माना गया है। इसे बार-बार पढ़ने की ललक इसलिए भी जागती है कि इसमें एक अछूते विषय को बहुत ही प्रभावी ढंग से उठाया गया है। जी हां, इस उपन्यास में हाशिए में जी रही उन महिलाओं के जीवन की गाथा उनकी सभी विडंबनाओं के साथ सामने रखी गई है, जिन्हें हम बेड़नी के नाम से जानते हैं। समग्र हिन्दी साहित्य में स्त्रीविमर्श एवं आधुनिक हिन्दी कथा लेखन के क्षेत्र में सागर नगर की डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह का योगदान अतिमहत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने पहले उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ से हिन्दी साहित्य जगत में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराई। ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ उपन्यास का प्रथम संस्करण सन् 2005 में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद अब तक इस उपन्यास के हार्ड बाऊंड और पेपर बैक सहित अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। यह न केवल पाठकों में बल्कि शोधार्थियों में भी बहुत लोकप्रिय है। देश के अनेक विश्वविद्यालयों में इस उपन्यास पर शोध कार्य किया जा चुका है और वर्तमान में भी अनेक विद्यार्थी इस उपन्यास पर शोध कार्य कर रहे हैं।

हिन्दी साहित्य में ’’पिछले पन्ने की औरतें‘‘ ऐसा प्रथम उपन्यास है जिसका कथानक बेड़नियों के जीवन को आाधार बना कर प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास की शैली भी हिन्दी साहित्य के लिए नई है। यह उपन्यास अतीत और वर्तमान की कड़ियों को बड़ी ही कलात्मकता से जोड़ते हुए इसे पढ़ने वाले को वहां पहुंचा देता है जहां बेड़नियों के रूप में औरतें आज भी अपने पैरों में घंघरू बांधने के लिए विवश हैं। यह उपन्यास ‘‘रहस्यमयी श्यामा’’ से लेखिका की मुलाकात से आरम्भ होता है। कहने को तो यह मामूली सी घटना है कि लेखिका को सागर से भोपाल की बस-यात्रा के दौरान एक महिला सहयात्री मिलती है। लेकिन कथानक का श्रीगणेश ठीक वहीं से हो जाता है जब लेखिका को बातचीत में पता चलता है उस स्त्री का नाम श्यामा है और वह एक बेड़नी है। श्यामा राई नृत्य करती है और नृत्य करके अपने परिजन का पेट पालती है। यहीं से आरम्भ होती है एक जिज्ञासु यात्रा। इसके बाद लेखिका बेड़िया समाज के इतिहास और पारिवारिक संरचना पर अपनी शोधात्मक दृष्टि डालती है। वह स्वयं उन गांवों में जाती है जहां बेड़नियां रहती हैं। उनसे बात करती है, उनके जीवन को टटोलती है और उनके साथ, उनके घर पर रह कर उनके जीवन की बारीकियों को समझने का प्रयास करती है। यह एक बहुत बड़ा क़दम था। वाचिक और लिखित स्रोतों और ज़मीनी कार्यों के बीच तालमेल बिठाती हुई लेखिका शरद सिंह उपन्यास की अंतर्कथा के रूप में लिखती हैं गोदई की नचनारी बालाबाई की मर्मांतक कथा। जब एक गर्भवती बेड़नी को भी देह-पिपासु पुरुषों ने भावी मंा नहीं अपितु मात्र स्त्रीदेह के रूप में ही देखा। यह कथा मन को विचलित कर देती है। उपन्यास आगे बढ़ता है चंदाबाई, फुलवा के जीवन से होता हुआ रसूबाई के जीवन तक जा पहुंचता है। स्त्री को मात्र देह मानने वालों के द्वारा स्त्री के सम्मान और स्वाभिमान पर चोट पहुंचाने, उन पर अत्याचार करने वालों की दुर्दांत कुचेष्टाएं झेलती ये स्त्रियां। जिनके बारे में शरद सिंह कहती हैं कि ये वे औरतें हैं जिन्हें समाज अपनी खुशियों को बढ़ाने के लिए अपने पारिवारिक उत्सवों में नाचने के लिए तो बुलाता है लेकिन इन्हें अपने परिवार में शामिल करने से हिचकता है। वह इनकी खुशियों से कतई सरोकार नहीं रखना चाहता है।

Article on Novel Pichhale Panne Ki Auraten by Dr Varsha Singh

इस उपन्यास का एक और पहलू है कि यह उपन्यास परिचित कराता है उस औरत से जिसने अल्मोड़ा में जन्म लिया, लेकिन अपने जीवन का उद्देश्य बेड़िया समाज के लिए समर्पित करते हुए ‘बेड़नी पथरिया’ नामक गंाव में ‘सत्य शोधन आश्रम’ की स्थापना की। उसका नाम था चंदाबेन। इस उपन्यास की खांटी वास्तविक पात्र हैं चंदाबेन, जिन्होंने अपने जीवन के विवरण को इस उपन्यास का हिस्सा बनने दिया। वस्तुतः ’’पिछले पन्ने की औरतें‘‘ एक उपन्यास होने के साथ-साथ यथार्थ का औपन्यासिक दस्तावेज़ भी है। इसमें बेड़िया समाज का इतिहास है, बेड़नियों के त्रासद जीवन का रेशा-रेशा है, बेड़नियों के संघर्ष का विवरण है, उनकी आकांक्षाओं एवं आशाओं का लेखा-जोखा है। यही तो है सच्चा स्त्रीविमर्श कि जब किसी उपन्यास में जीवन की सच्चाई को पिरो कर उसे सच के क़रीब ही रखा जाए, इतना क़रीब कि इस उपन्यास को पढ़ने वाला पाठक बेड़नियों की त्रासदी से उद्वेलित हुए बिना नहीं रह पाए और उपन्यास के अंतिम पृष्ठ तक पहुंचते हुए बेड़नियों के उज्ज्वल भविष्य की दुआएं करने लगे।    


परमानंद श्रीवास्तव जैसे समीक्षकों ने उनके इस उपन्यास को हिन्दी उपन्यास शैली का ‘‘टर्निंग प्वाइंट’’ कहा है। यह हिन्दी में रिपोर्ताजिक शैली का ऐसा पहला मौलिक उपन्यास है जिसमें आंकड़ों और इतिहास के संतुलित समावेश के माध्यम से कल्पना की अपेक्षा यथार्थ को अधिक स्थान दिया गया है। यही कारण है कि यह उपन्यास हिन्दी के ‘‘फिक्शन उपन्यासों’’ के बीच न केवल अपनी अलग पहचान बनाता है अपितु शैलीगत एक नया मार्ग भी प्रशस्त करता है। शरद सिंह जहां एक ओर नए कथानकों को अपने उपन्यासों एवं कहानियों का विषय बनाती हैं वहीं उनके कथा साहित्य में धारदार स्त्रीविमर्श दिखाई देता है।

‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ शरद सिंह द्वारा लिखित उनका पहला शोधपरक उपन्यास है जिसमें सामाजिक स्तरों में दबी-कुचली और पिछले पन्नों में दर्ज कर भुला दी गईं औरतों को मुखपृष्ठ पर लाने का सफल प्रयास किया है। तीन भागों और सत्ताईस उपभागों में लिखे गए उपन्यास के स्त्री पात्र महत्वपूर्ण हैं। किसी स्त्री की वेदना एवं पीडा को रिर्पोताज शैली में लेखन करना लेखिका की कुशलता का परिचायक है। विभिन्न औरतों से होकर संपूर्ण भारतीय औरतों के अस्तित्व, अधिकार पर लेखिका ने प्रकाश डाला है। ’पिछले पन्ने की औरतें’ उपन्यास में शरदसिंह ने समाज की आन्तरिक और बाह्य परतों को खोलने का प्रयास किया वे समाज के कुरूप सत्य को बड़े ही बोल्ड ढंग से प्रस्तुत करती हैं उनकी लेखकीय क्षमता की विशेषता है कि वे जीवन और समाज के अनछुए विषयों को उठाती हैं।

जब भी मैं इस उपन्यास को पढ़ती हूं तो मुझे सुप्रसि़द्ध समीक्षक स्व. परमानंद श्रीवास्तव का वह समीक्षा-लेख याद आने लगता है जो उन्होंने ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ के बारे में लिखा था - “ रोमांस की मिथकीयता के लिए कोई भी कथा छलांग लगा सकती है। शरद सिंह का उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ बेड़िया समाज की देह व्यापार करने वाली औरतों की यातना भरी दास्तान है। शरद सिंह की प्रतिभा ‘तीली-तीली आग’ कहानी संग्रह से खुली। स्त्री विमर्श में उनका हस्तक्षेप और प्रामाणिक अनुभव अनुसंधान के आधार पर है। शरद सिंह वर्जना मुक्त हो कर इस अंधेरी दुनिया में धंसती हैं। उन्हें पता है कि स्त्री देह के संपर्क में हर कोई फायदे में रहना चाहता है। शरद सिंह ने ईश्वरचंद विद्यासागर, ज्योतिबाफुले आदि के स्त्री जागरण को समझते हुए इस नरककुंड से सीधा साक्षात किया है। शरद सिंह को दुख है कि जब देश में स्त्री उद्धार के आंदोलन चल रहे थे तब बेड़िया जाति की नचनारी, पतुरिया-जैसी स्त्रियों की मुक्ति का सवाल क्यों नहीं उठा? नैतिकता के दावेदार कहां थे? विडम्बना यह कि जो पुरुष इन बेड़िया औरतों को रखैल बना कर रखते, उन्हीं के घर के उत्सवों में इन्हें नाचने जाना पड़ता था।......शरद सिंह का बीहड़ क्षेत्रों में प्रवेश ही इतना महत्वपूर्ण है कि एक बार ही नहीं, कई-कई बार इस कृति को पढ़ना जरूरी जान पड़ेगा। अंत में शरद सिंह के शब्द हैं- ‘लेकिन गुड्डी के निश्चय को देख कर मुझे लगा कि नचनारी, रसूबाई, चम्पा, फुलवा और श्यामा जैसी स्त्रियों ने जिस आशा की लौ को अपने मन में संजोया था, वह अभी बुझी नहीं है.....।’ शरद सिंह ने जैसे एक.सर्वेक्षण के आधार पर बेड़नियों के देहव्यापार का कच्चा चिट्ठा लिख दिया है। तथ्य कल्पना पर हावी है। शरद सिंह की बोल्डनेस राही मासूम रजा जैसी है। या मृदुला गर्ग जैसी। या लवलीन जैसी। पर शरद सिंह एक और अकेली हैं। फिलहाल उनका कोई प्रतिद्वन्द्वी कथाक्षेत्र में नहीं है। ‘पिछले पन्ने की औरतें’’ उपन्यास लिखित से अधिक वाचिक (ओरल) इतिहास पर आधारित है। इस बेलाग कथा पर शील-अश्लील का आरोप संभव नहीं है। अश्लील दिखता हुआ ज्यादा नैतिक दिख सकता है। भद्रलोक की कुरूपताएं छिपी नहीं रह गई हैं। शरद सिंह के उपन्यास को एक लम्बे समय-प्रबंध की तरह पढ़ना होगा जिसके साथ संदर्भ और टिप्पणियों की जानकारी जरूरी होगी। पर कथा-रस से वंचित नहीं है यह कृति ‘पिछले पन्ने की औरतें’’। जब दलित विमर्श और स्त्री विमर्श केन्द्र में हैं, संसद में स्त्री सीटों के आरक्षण पर जोर दिया जा रहा हो पर पुरुष वर्चस्व के पास टालने के हजार बहाने हों- यह उपन्यास एक नए तरह की प्रासंगिकता अर्जित करेगा।”

निःसंदेह यह उपन्यास तब तक प्रासंगिक रहेगा जब तक औरतें समाज के पिछले पन्नों में क़ैद रखी जाएंगी। और अंत में मैं दे रही हूं बार-बार पढ़े जाने योग्य इस उपन्यास के आरम्भिक पन्ने में लिखी शरद सिंह की ही वे काव्य पंक्तियां जो एक नए स्त्रीविमर्श के पक्ष में आवाज़ उठाती हैं-

छिपी रहती है

हर औरत के भीतर

एक और औरत

लेकिन

लोग अक्सर

देखते हैं

सिर्फ बाहर की औरत।


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( दैनिक, आचरण  दि.19.09.2020)

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बुधवार, अप्रैल 23, 2014

कई-कई बार इस कृति को पढ़ना ज़रूरी

पुस्तक समीक्षा


कृति : पिछले पन्ने की औरतें(उपन्यास)
लेखिका - शरद सिंह
सामयिक प्रकाशन,
3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग
दरियागंज, नई दिल्ली-110002
पृष्ठ : 304, मूल्य : 150 रुपये(पेपर बैक)


कई-कई बार इस कृति को पढ़ना ज़रूरी- परमानन्द श्रीवास्तव

रोमांस की मिथकीयता के लिए कोई भी कथा छलांग लगा सकती है। शरद सिंह का उपन्यास 'पिछले पन्ने की औरतें' बेड़िया समाज की देह व्यापार करने वाली औरतों की यातना भरी दास्तान है। शरद सिंह की प्रतिभा 'तीली-तीली आग' कहानी संग्रह से खुली। स्त्री विमर्श में उनका हस्तक्षेप और प्रामाणिक अनुभव अनुसंधान के आधार पर है। शरद सिंह वर्जना मुक्त हो कर इस अंधेरी दुनिया में धंसती हैं। उन्हें पता है कि स्त्री देह के संपर्क में हर कोई फायदे में रहना चाहता है। शरद सिंह ने ईश्वरचंद विद्यासागर, ज्योतिबाफुले आदि के स्त्री जागरण को समझते हुए इस नरककुंड से सीधा साक्षात किया है। शरद सिंह को दुख है कि जब देश में स्त्री उद्धार के आंदोलन चल रहे थे तब बेड़िया जाति की नचनारी, पतुरिया-जैसी स्त्रियों की मुक्ति का सवाल क्यों नहीं उठा? नैतिकता के दावेदार कहां थे?
विडम्बना यह कि जो पुरुष इन बेड़िया औरतों को रखैल बना कर रखते, उन्हीं के घर के उत्सवों में इन्हें नाचने जाना पड़ता था। कहानी में एक प्रसंग किन्हीं ठाकुर साहब की रखैल कौशल्याबाई का आता है जो दुगुनी आयु के हैं। पर पुरुष का तो मन है, चाहे जिस पर आ जाए। एक ग्रामीण लंबरदार दो बेड़नियों का 'सिंर ढंकना' कर चुका है। यह रस्म 'नथ उतराई' जैसी है जो वेश्यावृत्ति की स्वीकृति है। शरद सिंह के शोध के अनुसार पथरिया गांव में लगभग पचास राई नर्तकियां थीं। राई नृत्य भी बेड़िया जाति का अपना नृत्य है। कभी किसी बालाबाई पर फिरंगी का मन आ गया तो वह उसी की रखैल बन गई। उनका प्रेम परवान चढ़ता गया। चमन सिंह अपनी प्रेमिका को अंग्रेज की रखैल कैसे बनने देता, वह उसकी हत्या कर देता है। नचनारी को जब एक ठाकुर के संसर्ग से गर्भ रह गया, ठाकुर ने संसर्ग का सिलसिला बंद नहीं किया। यह लैंगिक कामोत्तेजन का परिणाम है।
शरद सिंह उपन्यास लिखते-लिखते इतिहास लिखने लगती हैं। बुन्देलखण्ड का बुन्देला विद्रोह अंग्रेजों के दमन की वजह बना। दो रोटी नसीब हो यह भी असंभव हो गया। फुलवा बेड़नी की सुन्दरता उत्तेजक थी। फुलवा को चोरी के नए ढंग-कुढंग मां ने ही बताए। रजस्वला होने के पहले ही साप्ताहिक हाट में बिछोड़े देखते-देखते मां के दबाव में अपनी योनि में छिपा लिए। वह सोने का फूल था। फुलवा का डेलन से ब्याह हुआ जिससे छ: बच्चे हुए। एक रसूबाई जो बेड़िन के रूप में प्रसिद्ध हुई। कभी इतिहास जान कर पुलिस रसूबाई के पीछे पड़ गई। दल के कई सदस्य पुलिस की चपेट में आ गए। उधर पुरुषों की स्त्री शोषण की प्रवृति ने कोई विकल्प नहीं छोड़ा। वे देह व्यापार में ही लिप्त रहने लगीं। बेड़िया जाति को भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति में गिना गया है। शरद सिंह इस बहाने जनजातियों का इतिहास बता जाती हैं। ये जातियां हैं- वधिक, बेड़िया, बैदिया, जादुआ, कंजर, खंगर, कोलो, गरैरी आदि। बेड़ियों के बारे में बताया गया है कि यह एक घुमक्कड़ खानाबदोश जाति है। बेड़िनों ने आर्थिक आधार पर पुरुषों से देहसंबंध तो बनाया बदले में किसी रिश्ते का अधिकार नहीं मांगा। अविवाहित मातृत्व निषिद्ध नहीं था। हां, बच्चों को जन्म देने के बाद पिता का नाम बताना जरूरी हो गया।
एक नचनारी ठाकुर की रखैल थी। उसकी प्रवसपूर्व अवस्था में भी ठाकुर संसर्ग से बाज नहीं आता। न्यौते बिचौलिया है पर उसका प्रेम बेड़िनी या नचनारी को सच्चा जान पड़ता है। नचनारी ने बेटी को जन्म दिया। ठाकुर की कल्पना में यह उसकी भावी संतान नहीं, भावी प्रेमिका या विलास चर्चा में सहयोगिनी बनेगी। ब्रिक्सटन के संपर्क में नचनारी का आना एक संयोग था। लाट साहब सागर चले गए तो नचनारी न्यौते के साथ उनकी खोज में गई। फिरंगी चकित था कि ठाकुर को छोड़ कर उसके प्रेम में पागल हो कर नचनारी उस तक आई। वह बताती है -'हम बेड़नियों का कोई न कोई ठाकुर होता ही है, हुजूर! वे हमें अपनी बना कर रखते हैं लेकिन खुद वे हमारे कभी नहीं होते।....बेड़नी के गले में पड़ा पट्टा किसी को दिखाई नहीं देता.....क्योंकि वह तो सोने से मढ़ दिया जाता है न!' बस, वह धंधा नहीं छोड़ सकती। नचनारी चकित थी कि उसके प्रेमी लाट साहब ने उसे छुआ भी नहीं, बस कोई और धंधा अपनाने के लिए प्रेरित करता रहा। शरद सिंह वेश्यावृत्ति के कारणों पर विचार करती हैं और जो मनोसामाजिक अध्ययन हुए हैं, उनके सूत्र बताती हैं, जैसे-दरिद्रता से ऊब कर, बहकावे में आ कर, महिला दलालों के प्रलोभन पा कर, पति द्वारा तलाक ले लेने पर, पति की प्रेरणा से, बुरी संगत के कारण। मां-बाप भी कम उम्र की लड़कियों से वेश्यावृत्ति करा सकते हैं। शरद सिंह के अनुसार वातावरण और सामाजिक दशाएं भी बेड़नियों के देह धंधे में लिप्त होने का एक प्रमुख कारण है। निर्मला देशपांडे जैसी समाजसेवी स्त्रियों ने इस स्थिति को बदलने के लिए अथक संघर्ष किया है। अब कई एनजीओ नए-नए काम उपलब्ध कराते हैं। शिक्षा अभियान चलाते हैं। उधर बेड़नियों के समाज में रखैल स्त्री की तरह रखैल पुरुष का भी चलन है। शरद सिंह फ्रायड, एडलर, युंग के सिद्धांतों के आधार पर भी स्त्री विमर्श का रास्ता बनाती हैं।
इधर कुछ नई घटनाएं सामने हैं। चुनाव में बेड़नी स्त्री जीत कर सरपंच तक बन सकती है। चंदा बेड़नी चुनाव में विजयी हुई पर वे बेड़नी जाति से देह धंधा खत्म नहीं करा पाई। शरद सिंह लिखती हैं -'नए रास्ते की खोज में श्यामा का भटकाव अब मैं जान चुकी थी। मंत्री के घर जा कर राई नाचने से ले कर चंद महीनों की रखैल बनने की कथा श्यामा की उस जिजीविषा को व्यक्त करती है जो अपनी जीवनधारा बदलने की प्रबल इच्छा के रूप में उसके मन में विद्यमान है।' संदेह है कि आगे श्यामा क्या करेगी। जब देह में कसावट नहीं रहेगी तो क्या-क्या कर पाएगी। यह जान कर खिन्न हुई कि ऐसे भी सामंत इसी समाज में है जो अपने शयनकक्ष में पत्नी के साथ बेड़नी रखैल को भी रख पाते हैं। उन्हें प्रेम नहीं सनसनी चाहिए।
शरद सिंह का बीहड़ क्षेत्रों में प्रवेश ही इतना महत्वपूर्ण है कि एक बार ही नहीं, कई-कई बार इस कृति को पढ़ना जरूरी जान पड़ेगा। अंत में शरद सिंह के शब्द हैं- 'लेकिन गुड्डी के निश्चय को देख कर मुझे लगा कि नचनारी, रसूबाई, चम्पा, फुलवा और श्यामा जैसी स्त्रियों ने जिस आशा की लौ को अपने मन में संजोया था, वह अभी बुझी नहीं है.....।' शरद सिंह ने जैसे एक सर्वेक्षण के आधार पर बेड़नियों के देहव्यापार का कच्चा चिट्ठा लिख दिया है। तथ्य कल्पना पर हावी है। शरद सिंह की बोल्डनेस राही मासूम रजा जैसी है। या मृदुला गर्ग जैसी। या लवलीन जैसी। पर शरद सिंह एक और अकेली हैं। फिलहाल उनका कोई प्रतिद्वन्द्वी कथाक्षेत्र में नहीं है।
'पिछले पन्ने की औरतें' उपन्यास लिखित से अधिक वाचिक (ओरल) इतिहास पर आधारित है। इस बेलाग कथा पर शील-अश्लील का आरोप संभव नहीं है। अश्लील दिखता हुआ ज्यादा नैतिक दिख सकता है। भद्रलोक की कुरूपताएं छिपी नहीं रह गई हैं।
शरद सिंह के उपन्यास को एक लम्बे समय-प्रबंध की तरह पढ़ना होगा जिसके साथ संदर्भ और टिप्पणियों की जानकारी जरूरी होगी। पर कथा-रस से वंचित नहीं है यह कृति 'पिछले पन्ने की औरतें'।
जब दलित विमर्श और स्त्री विमर्श केन्द्र में हैं, संसद में स्त्री सीटों के आरक्षण पर जोर दिया जा रहा हो पर पुरुष वर्चस्व के पास टालने के हजार बहाने हों- यह उपन्यास एक नए तरह की प्रासंगिकता अर्जित करेगा।
जर्मन ग्रियर कहती हैं- 'स्त्रियों से अब रति का आनन्द उठाने की अपेक्षा की जाती है लेकिन केन्द्र से निकल कर बुर्जुवा मंदिर में आने की नहीं। इसके बजाए रति को अनुष्ठान के जंग के रूप में मंदिर में लाया जा रहा है।' शरद सिंह को श्रेय दिया जाना चाहिए कि वे बिना फेमिनिस्ट या स्त्रीवादी होने का दावा किए स्त्री मुक्ति की अग्रिम पंक्ति में जगह बना सकीं।
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(साभारः साहित्य सृजन ... http://sahityasrijan.blogspot.in/2009/12/blog-post.html )

सोमवार, अप्रैल 01, 2013

सम्मान दांव पर लगाती‘पिछले पन्ने की औरतें’

पुस्तक समीक्षा - पिछले पन्ने की औरतें .... साभार ‘रचनाकार’ वेब पत्रिका

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स्थायित्व हेतु सम्मान दांव पर लगाती‘पिछले पन्ने की औरतें’
- डॉ.विजय शिंदे

http://www.rachanakar.org/2013/03/blog-post_2280.html#ixzz2NP08lGGQ

 
विविधताओं से संपन्न देश-भारत। विविध भाषा, धर्म, संस्कृति,आचार, विचार, परंपराएं....और बहुत कुछ। वैविधपूर्ण। वैसे ही विभिन्न आर्थिक स्थितियों के चलते असमानताएं और इन असमानताओं के चलते अपराध जगत् का वैविध्यपूर्ण होना। सीधे-सीधे अपराध, जो कानूनी तौर पर अपराध ठहराए जा सकते हैं और ऐसे कई निषिद्ध कार्य है जो सांस्कृतिक विविधता के साथ जुड़कर अपराध लगते नहीं परंतु मानवियता के नाते विचार करें तो घोरतम् अपराध लगेंगे। देश के भीतर कितनी जातियां हैं जिन्होंने आजादी का रस अभी तक चखा नहीं और भारतीय होने के नाते भारतीयत्व क्या है जाना नहीं। वह आज भी अपनी आदिम अवस्था में पौराणिक रीति-रिवाज एवं परंपराओं के साथ चिपके हैं; जहां से वे निकलना नहीं चाहते, सामाजिक स्थितियां उन्हें निकलने नहीं देती। जो परिवर्तन की धारा में कुदते हैं वे स्पर्धात्मक युग में पिछड़ जाते हैं और अपाहिज होकर परंपरागत निषिद्ध कार्य करने के लिए मजबूर होते हैं। ऐसे ही कानूनी तौर पर निषिद्ध कार्य करनेवाले परंतु जातिगत परंपरा के नाते सही परंपरा का निर्वाह करनेवाले‘बेडिया’जाति की स्थितियां है। मध्यप्रदेश में जन्मी शरद सिंह हिंदी के आधुनिक कथा साहित्य का सितारा हैं। उनके लेखन में जबरदस्त क्षमता है और अनछुए विषयों को उजागर करने की तड़प है।‘पिछले पन्ने की औरतें’उप न्यास हिंदी साहित्य के भविष्य को नया आयाम देगा। ऐसा नहीं ऐसे उपन्यास पहले लिखे नहीं गए; लिखे गए परंतु उनमें एक कथात्मकता रहा करती थी जो कल्पना का आधार लेकर पाठकों को मनोरंजनात्मक तुष्टि दे सकती थी। शरद सिंह द्वारा लिखित‘पिछले पन्ने की औरतें’चिंतनात्मक-समीक्षात्मक-समाजशास्त्रीय-खोजपरख उपन्यास है जिसे पढ़कर पाठकों का मुंह खुला का खुला रह जाता है। आज भी भारत में ऐसी जनजातियां हैं जो अस्तित्व के लिए झगड़ रही है, जिनकी वास्तविकता प्रगति की ओर ताकतवर कदम उठा रहे भारत देश के चेहरे पर काला धब्बा लगा देती है। लगभग तीन दर्जन बेड़नियों का चित्रण एवं उल्लेख करते-करते शरद सिंह ने बेड़नियों के सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों पर प्रकाश डाला और अपने देश में औरतों की दशा (औकात!) को भी उजागर किया है। रामायण-महाभारत तथा ऐत्यासिक स्त्री पात्रों का समीक्षात्मक मूल्यांकन भी किया है और कहा उन्हें भी बेड़नियों जैसा इस्तमाल कर फेंक दिया गया। बेड़नियों के जीवन पर प्रकाश डालते-डालते लेखिका कहती है, औरत बरसात के पानी जैसी है, उसे न जमीन चुनने का अधिकार होता है न अपनी प्यास बुझाने का।(पृ.100) औरत बस पान की तरह है, जिसे जब चाहा मुंह में डालकर चबाया,स्वाद लिया और जब चाहा थूक दिया।(पृ.110) एक आम स्त्री की दशा बाडे में बांधकर रखी जानेवाली गाय के समान है होती जिसे यदि किसी दिन घूमने-फिरने के लिए बाडे से बाहर जाने दिया जाए तो कोई भी व्यक्ति सहजता से उसके गले में अपनी रस्सी डालकर घर ले जा सकता है। ....वह अपनी अनिच्छा के मामूली प्रदर्शन के बाद रस्सी की दिशा में खिंचती चली जाती है, क्योंकि उसे रस्सी का सबल एवं प्रबल प्रतिरोध सीखने का कभी अवसर ही नहीं दिया गया।(पृ.165) शरद जी की यह टिप्पणियां झकझोर देती हैं, सोचने को मजबूर कर देती हैं कि न केवल भारत संपूर्ण दुनिया औरत एवं पुरुष के होने से परिपूर्ण बनी है तो फिर औरतों को पिछले पन्नों में क्यों दबाया जाता है? उनकी अस्मिता-अधिकारों क्यों नकारा जाता है? और औरतें भी यह सबकुछ क्यों सहन करती है? वह मुक-बधिर-अंधी-अपाहिज है? उन्हें हाशिए पर छोडे जाने की स्थितियों का पता नहीं?
महादेवी वर्मा ने औरतों के दुखों को बदरी मानकर वर्णित किया। खैर औरतों के दुःखों को मिटाने के लिए ईश्वर तो अवतरित होंगे नहीं? महाभारत में कृष्ण का द्रौपदी की लाज बचाने के लिए अवतरित होना चाहे काल्पनिक हो या वास्तविक, वर्तमान में कोई कृष्ण अवतरित नहीं होगा। हां कोई पुरुष अवतरित हो भी गया तो दलाली जरुर करेगा....! महादेवी ने लिखा तो था-

"मैं निरभरी दुःख की बदली !
× × × ×
विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना।
परिचय इतना इतिहास यहीं,
उमडी कल थी मिट आज चली !"

"ठीक है बदली,....बदली है और उसका विस्तृत नभ में कोई कायम कोना रहेगा भी नहीं। उसका मिटना स्वीकारा जाएगा परंतु बदली को औरत से जोडकर उसका अधिकार छिनना और उसे मिटने के लिए मजबूर करना अन्याकारक है। खुद औरत भी ध्यान रखें, अब अफ़सोस करने का वक्त गुजर चुका, अस्मिता-अस्तित्व और अधिकार की लडाई खुद लडनी पडेगी। अफ़सोस से निरंतर शोषण होता रहेगा। औरतें सामाजिक संस्थाओं में उपस्थित तो हैं परंतु उनको संवेदनात्मक अनुभूति नहीं। उन्हें समाज के पिछले पन्नों में फेंका जाता है। ऐसे ही पिछले पन्नों में दबी औरतों के वास्तविक पिडाओं का रेखांकन शरद सिंह ने किया है।


1.वर्तमान स्थिति -
‘पिछले पन्ने की औरतें’उपन्यास में शरद सिंह ने मध्यप्रदेश में स्थित पथरिया, लिधोरा, लुहारी हबला, फतेहपुर, बिजावर, देवेंद्रनगर.... जैसे कुछ गांवों का जिक्र किया है जहां बेडिया समाज रहता है। इन परिवारों के आय का मूल स्रोत उस परिवार की औरत होती है जिसे बाकायदा बेड़नी बनाया जाता है, उस एक बेड़नी पर दस-बीस जनों का परिवार निर्भर रहता है। हजार भर की आबादी वाले बेडिया गांव में लगभग पचास के आसपास बेड़नियां रहती है; जो नृत्य और शरीर विक्रय कर अपने सारे कुनबे-परिवार का पालनपोषण करती है। इनकी सामाजिक स्थिति का वर्णन करते लेखिका संपूर्ण नारी जाति की स्थिति पर सावधानी से प्रकाश डालती है। सावधानी से इसीलिए कि यह समाज औरत-पुरुष से बना है, वह एक दूसरे के दुश्मन नहीं, दोस्त है। एक नाजुक रिश्ता इन दोनों में है जो एक दूसरे के अस्तित्व के लिए पुरक है लेखिका लिखती है,"मैं पुरुषों की विरोधी नहीं हूं, किंतु उस विचारधारा की विरोधी हूं जिसके अंतर्गत स्त्री को मात्र उपभोग की वस्तु के रूप में देखा जाता है।"(पृ.7) पुरूष भीड़ में भी और सुनसान जगह पर भी स्त्री को दबोचकर अत्याचार करने की मानसिकता रखता है। कोई चिकोटी काटता है तो कोई पुरुषांगों के भद्दे स्पर्श से अपमानित करता है या कोई उसे प्रत्यक्ष भोगने की स्थिति में नहीं पाता तो शब्दों और आंखों से भोगना शुरू करता है। "क्या स्त्री-पुरुष के संबंधों का अंतिम सत्य संभोग ही होता है? लेकिन अधिकांश भारतीय स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को समान रूप से भोगते ही कहां है? पुरुष भोगता है और स्त्री भोग्या बनी रहती है।"( पृ.12) लेखिका द्वारा इसे लिखना भारतीय औरतों की वर्तमान स्थिति को बेपरदा करता है।
बेडिया समाज में कोई स्त्री जानबूझकर शरीर विक्रय नहीं करती, न ही रखैल बनना चाहती है और न ही नृत्य करना चाहती है। इनकी पिछडी स्थिति, अशिक्षा, आर्थिक विपन्नता एवं परंपराएं इन्हें इस ओर लेकर जाती है जो सहजता से होता है। परंपरा से ऐसे ही हो रहा है इसीलिए इसमें उन्हें कुछ गलत भी नहीं लगता। जिन ठाकुरों, जमिनदारों, पैसे वालों एवं ताकतवरों.... की वे रखैल होती हैं वह बेड़नियों को औरत का दर्जा तो देता है पर दूसरी पत्नी का नहीं, चाहे वह औरत कितनी भी ईमानदारी से उससे जुडी हो। उसे हमेशा अपमानित कर पिछले पन्नों में दबाने के लिए तत्पर होता है। अपनी जांघों की ओर इशार कर बडे बेशर्मी से, भद्देपन से कहेगा कि‘हम और हमारा ये तो तुम्हें ही ठकुराइन मानते हैं।(पृ.28) देश की आजादी को सालों गुजर चुके परंतु बेड़नियों की स्थिति में कोई अंतर नहीं आया उनका नृत्य और रखैल बनाए जाना धनिकों के लिए गौरव की बात होती है। गांव की कोठियां, मत्रियों के बंगलों पर नाच के लिए बेड़नियों को आमंत्रित किया जाता है। वहीं पर उनका चुनाव शरीर भोग के लिए होता है। वेश्या, गणिका, नगरवधु, बेड़नी, राजनर्तकी, देवदासी, मुरली, लोकनाट्य तमाशों में काम करती औरतें, लावनी अदाकार, बारियों में नृत्य करती औरतें, बार बालाएं, आयटम गर्ल्स....और रंगिन चष्में चढाकर लाईट,कट एवं ओके की चकाचौंध में फंसी औरतों को चटखारे के साथ चर्चाओं में लाया जाता है और मेजों पर, पलंगों पर सजाया जाता है। हाथी-घोडों के समान बेड़नियों को जानवर मानकर पाला जाना वर्तमान वास्तव है। समाज के भीतर मौजुद खूबसूरत स्त्री के के चेहरे की मुस्कराहट लपकने-लिलने के लिए पुरुषों का झूंड़ तैयार रहता है यह अच्छी स्थिति नहीं है। आज जो औरतें लीड कर रही है वह अपवाद स्वरूप है, उन्हें सलाम तो करना ही पडेगा। परंतु बहुसंख्य औरतों का मूलाधार पुरुष है जो उन्हें भीख स्वरूप नेतृत्व देता है जो अच्छा नहीं माना जाएगा। "समाज में स्त्री की स्थिति अब पहले से अधिक जटिल है। एक ओर स्त्री को अपेक्षित रखा जाता है तो दूसरी ओर उपेक्षित बनाकर रखा जाता है। सत्ता, समाज, संपत्ति पर उसका अधिकार है भी, और नहीं भी। न्याय की पोथियों में ये तीनों अधिकार स्त्री के नाम लिखे गए हैं, लेकिन यथार्थ पोथियों के बाहर पाया जाता है।.... न्याय दिलाने वाले से लेकर उसे एक ग्लास पानी पिलाने वाले भी दया और सहानुभूति के नाम पर लार टपकाने से नहीं चूकते है।"(पृ.261)
2.सरकारी भूमिका -
भारत एक आजाद देश है और यहां लोगों से चुनी सरकार काम करती है। अर्थात् सरकार द्वारा लोकहित में कार्य किया जाना अपेक्षित है परंतु ऐसा होता है या नहीं? पूछा जाए तो उत्तर स्वरूप कुछ आवाजें‘हां’में तो कुछ ‘ना’में उठेगी और कुछ ‘चुप्पी’साधे बैठेगी।‘हां’वाली सरकार समर्थक, ‘ना’वाली सरकार विरोधक और‘चुप्पी’वाली सरकार को न जानने वाली, आजादी से कोसों दूर वाली मानी जाएगी। बेडिया समाज‘चुप्पी’का हकदार है पर धीरे-धीरे उनमें भी सरकार के विरोध में नाराजगी का स्वर उठ रहा है। उसका कारण है उनके घरों में पहुंचा टी.वी. और टी.वी. के विभिन्न चैनल्स, खबरें। थोडे-बहुत चेतनाएं पा रहे हैं वे सालों-साल की अकर्मण्यता से उठने का नाम नहीं ले रहे हैं। उन्हें लगता है सरकार हमारे घरों में नोटों की गड्डियां फिकवाएं या अनाज की बोरियां डाले। खुद योजनाओं का लाभ लेकर हाथ-पैर चलाने की मानसिकता नहीं। इसमें जितना दोष बेडियों का उतना सरकार का भी है क्योंकि जितनी गंभीरता से इनकी स्थितियों पर सोचना चाहिए उतना सोचा नहीं जाता, कारण हजार-पांच सौ के मतदाताओं से उनके लिए कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता बेडिया समाज को पिछडी अनुसूची में समाविष्ट किया गया परंतु इससे भी उनकी सामाजिक स्थितियों में अंतर नहीं आया। लेखिका लिखती है,"शायद यह अंतर बहुत बारीक था, अंतर के पाए जाने का भ्रम था जो किसी छलावे की तरह कभी आभासित होता तो कभी ऐसे अदृश्य हो जाता जैसे हो ही नहीं, क्योंकि मैंने पाया कि बेड़नियां तो अभी भी नाच रही है – वर्तमान सांमतों के सामने ! वे अभी भी परोस रही है अपनी देह को किसी‘बुके की मेज’पर व्यंजन की तरह।(पृ.64)" सरकार उदासिन, सरकारी योजनाओं का लाभ इन तक नहीं पहुंचना, इनके नाम से अलॉट की गई राशियां एवं सहुलतें बीच में ही गुम हो जाती है, अतः आर्थिक तंगी और विपन्नता से परेशान बेड़नियां जो परंपरा से दायित्व निभा रही है आगे आती है और परिवार का पोषणकर्ता बनती है; कुलमिलाकर बेडिया समाज की औरतें स्थायित्व पाने के लिए अपने स्त्रीत्व के सम्मान एवं अधिकार को दांव पर लगाती है और परिवार एवं साथियों के आर्थिक सुरक्षा का जिम्मा उठाती है। खूबसूरत और राई नृत्य में निपुण कुछ बेड़नियां शासकीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रतिनिधित्व के नाते रूस, अमरिका, जापान आदि देशों की यात्रा भी कर चुकी है परंतु वापसी पर वहीं विपन्नता एवं संघर्ष जारी रहता है। इनके गांवों में स्कूलों की स्थिति दयनीय है, न इमारत, न अध्यापक। बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे, जाए तो पढाए कौन, बैठे कहां? हजारों सवाल। और अंतिम सवाल पढ़-लिखकर स्पर्धात्मक युग में दौडे कब तक? ऐसी स्थिति में बच्चों को स्कूलों में बिना भेजे पुश्तैनी धंधों से जोडा जाए तो किसे दोष दें?
सामाजिक कार्य करने वाली संस्थाएं सरकार के साथ मिल कर कई योजनाओं को गावों में चलाती हैं जिसके चलते बेडियों की स्थिति बदले। परंतु बेडियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में संदेह-असंमजस है। दोनों पक्ष एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं। बीच में खाई है, जुडाव नहीं।"यह दरार इस बात की है कि न जाने कितने लोगों ने, समाजसेवी और उद्धारकर्ता के रूप में इन बेडियों से छल किया है.... न जाने कितने लोग इनकी लड़कियों को बहला-फुसलाकर दूसरे शहरों में ले जाकर बेच देते हैं।"(पृ.218) इसीलिए शासन की ओर से बेडियों के उद्धार के लिए चलाई जा रही‘जाबाली योजना’जैसी तमाम योजनाएं विफल हो गई। सामाजिक महिला कार्यकर्ताओं के लिए बेड़नियों के मुंह से‘वे अपना बदन बना रही है’जैसी अविस्वासभरी’टिप्पणी इन्हीं संदेहास्पद स्थिति के कारण निकलती है।

3.आत्मविश्वास की कमी, परंपरा एवं सामाजिक दबाव -
बाहरी समाज में जैसे स्त्री-पुरुष वैसे ही बेडियां समाज में स्त्री-पुरुष है परंतु दोनों की मानसिकता में बडा अंतर है। सामाजिक स्थितियां, दबाव ,परंपराएं और आत्मविश्वास की कमी, इन पुरुषों और औरतों को दयनिय स्थिति से उभरने नहीं देते। बेडियां जाति का पुरुष पूर्णतः अकर्मण्य है वह अपनी बीवी, बहन, मां, बेटी से कमाया खाना खाएगा, केवल खाएगा नहीं अपितु शराब एवं अन्य गतिविधियों में उसकी कमाई रकम को उडाएगा। उसका मन कभी भी मेहनत और स्वाभिमान की जिंदगी नहीं चाहता। उसके परोपजीवि अस्तित्व को ढोते-ढोते औरतें थक जाती है पर कभी भी दायित्व से पलायन नहीं करती। बेड़नियां ठाकुर, जमींदार एवं धनिकों से परिवार के पालन-पोषण के लिए धन तो पाती ही है साथ ही जमीनें भी पाती है। लेकिन बेडिया पुरुष और न औरत अपनी खेती में पसिना बहाकर ईमान की रोटी खाना चाहते हैं। केवल औरत का शरीर बेचकर आराम से पैसा कमाने की आदत उनको सुख भोगी बनाती है मेहनत-मशक्कत कर दस-बीस रुपए कमाने की अपेक्षा थोडे समय में हजारों रुपए कमाने का शॉर्टकट पुरुष व औरतें चुनती है जो उने आत्मविश्वास की कमी को दिखाता है।
बेडिया समाज में सालों से देह विक्रय ,चोरी एवं नृत्य से जीवनयापन की परंपरा है, उसे छोड़ कर नवीन जीवन शैली अपनाने की उसकी इच्छा नहीं है। यह जनजाति अपराधी प्रवृत्ति की है और अपराध पैसौं के लिए किया जाता है। जहां पर इन्हें पैसा उपलब्ध होता है वहां अपराध और जीवन की सुरक्षा भी मिलती है; अतः बेड़नियां ताकतवर-धनिकों की रखैल बन कर रहना पसंद करती है। वैसे उनके रीति-रिवाज में विधिवत‘सिर ढकने’की प्रक्रिया कर बाकायदा रखैल बनने की इजाजत भी दी जाती है। परंपरा, आर्थिक दबाव एवं सामाजिक दबाओं के चलते वह देह व्यापार करती है। बेड़नियों ने पाया कि "उनके अपने समुदाय के पुरुष न तो उनका सहारा बन पाते हैं और न उन्हें सुरक्षित जीवन दे पाते हैं तो उन्होंने पूंजिपतियों की संपत्ति के रूप में जीना स्वीकार किया। वे जानती थी कि एक धनवान अपने धन की रक्षा हर हाल में करता है। उन्हें यह सौदा महंगा नहीं लगा क्योंकि उन्हें बदले में रहने के लिए एक निश्चित स्थान, जीवनयापन के लिए आर्थिक स्रोत और सुरक्षा के लिए एक संरक्षक मिल रहा था।"(पृ.139.) इन सारी स्थितियों के बावजूद बेड़नियां संसार और धनिकों को लूटने की मंशा नहीं रखती। देह व्यापार उन पर थोपा गया है, जिससे बाहर निकलना उनके लिए बहुत मुश्किल है।

4.बाजारवाद -
आधुनिक युग में खरीद-फरोख जोर-शोर से शुरू है। लोग अपनी संस्कृति, देश, सभ्यता, आत्मा.... को बेचने पर उतारू है। पैसों की ताकत बढ़ती जा रही है और उसके लिए कोई कुछ भी करने के लिए तत्पर है। अर्थात् बाजारवादी प्रवृत्ति हर कहीं देखी जाएगी। बेडिया समाज को भी अपने पेट को पालने के लिए और कुछ भौतिक सुविधाओं को जुटाने के लिए पैसों की जरूरत होती है। उनके पास न जमीन-जायदाद, न नौकरी, न शिक्षा, न सत्ता.... पैसा पाए तो कैसै पाए? पैसा पाने के इनके जरिए अपराध की परिधि में आते हैं पर इन्होंने इसे परंपरा मान किया, कर रहे हैं। नृत्य, शरीर विक्रय, चोरी और कभी-कभार झूठी गवाहियां इनके आय का स्रोत हैं। इसमें भी प्रथम तीन ही इनकी पैसों की नैया को पार लगा सकते हैं। नृत्य के पश्चात् देह विक्रय और चोरी पकडी जाए तो देह परोसकर छुटकारा पाना इनकी तकनिक है। बात घुम-फिरकर शरीर विक्रय तक पहुंचती है। हर बेड़नी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष इस धंधे में लिप्त है और पैसा कमाना चाह रही है। धनिक पैसा फेंक इन पर यौनत्याचार करते हैं तथा अनैसर्गिक यौन संबंध रखते हैं। योनी मैथुन, गुदा मैथुन, मुख मैथुन करने की इजाज़त देती बेड़नियां नरम बिस्तर से लेकर चलती गाडियों में भी यौनत्याचार सहन करती है; केवल पैसों के लिए। इन संबंधों से जो बच्चे जन्मते हैं उनके बाप नहीं होते, जो असली बाप है वह इन्हें अपने बच्चे नहीं मानता। यहां तक असली बाप का बेड़नियों को पता भी नहीं होता। उनका कहना है, "का जाने.... पतो नईं! बाकी जब हमने अपने मोडा खों नांव सकूल में लिखाओ रहो सो उसे मोडा को बाप को नांव सोई लिखाने परो....सो हमने ऊ को नांव रुपैया लिखा दयो....।"(पृ.155) बच्चों के बाप का नाम रुपैया और पैसा कितनी बडी विड़बना है आजाद भारत देश के आजाद देसवासियों की।
बाजारवादी संस्कृति में हमेशा व्यवसायी व्यक्ति लाभ में रहता है परंतु यहां व्यावसायिक विरोधाभास दिखाई देगा। "अन्य व्यवसाय में विक्रेता प्रथम दर्जे में तथा ग्राहक दोयम दर्जे में होता है, किंतु इस व्यवसाय में ग्राहक रूपी पुरुष प्रथम दर्जे में तथा विक्रेता रूपी स्त्री दोयम दर्जे में होती है।"(पृ.226)

5.बेटी के जन्म का स्वागत -
जिस देश की तमाम जनता इधर स्त्री भ्रूण हत्या करने पर तुली है उसी देश की एक जनजाति बेडिया स्त्री जन्म का स्वागत बडी खुशी के साथ करती है। उसका कारण है इस जाति में लड़की ही परिवार का मुख्य आधार और पालनकर्ता होती है। इनमें पुरुष शराबी, जुआरी, अकर्मण्य रहा है; अतः उसे नकारा जाता है और लड़की का स्वागत किया जाता है। शरद सिंह को इनके वास्तव का जब पता चलता है तब वे चकित होती हैं। और इसे पढ़ पाठक के नाते हम भी दंग रह जाते हैं। भारतीय समाज में "सच तो यह है कि स्त्री का जन्म एक अवांछित घटना होती है। समाज की व्यापारिक बुद्धि स्त्री के जन्म को साहूकार के खाते में चढे हुए एक ऐसे कर्ज के रूप में देखती है जिस पर ब्याज-पर-ब्याज लगते जाना है।"(पृ.163) कहां आम भारतीय समाज और कहां बेडिया। वैसे बेडियां परिवार में मुख्य आर्थिक स्रोत लड़कियों की खूबसूरती-यौवन से जुड़ने के कारण यह दृष्टिकोण है। जो भी हो इससे खुशी होती है कि कहीं तो स्त्री जन्म का स्वागत हो रहा है। पर स्वागत के कारणों को खंगालने से पीडा और दुःख होता है। इससे यह सीख मिल सकती है कि बेटी को जिंदा रखना है, नारी जाति का अस्तित्व बनाए रखना है, स्त्री-पुरुष समानता लानी है तो औरत ही आगे आकर वह परिवार के आर्थिक स्रोतों का भार वहन करें, ईमानदारी से, और परिवार में इज्जत पाए। ऐसी स्थिति में नारी सम्मान का सूरज उग सकता है। लेखिका ने बेडिया समाज में जन्मी लड़की के स्वागत के कारणों पर प्रकाश डाला है,"आज एक बेड़नी उस समय फूली नहीं समाती जब वह एक स्त्री शिशु को जन्म देती है। वह और उसके परिवार जन स्त्री-शिशु के जन्म पर खुशियां मनाते हैं। इसका सबसे बडा कारण यह है कि एक बेड़नी को अपने बेटी के भविष्य में ही अपना सुरक्षित भविष्य दिखाई देता है।"(पृ.167)

6.क्या किया जाए ?
‘पिछले पन्ने की औरतें’उपन्यास को पढ़ने के पश्चात् कोई भी नहीं चाहेगा कि भारत में ऐसी जनजातियां बची रहें। अपेक्षा की जाएगी बदलाव की। ऐसे जातिगत लोगों के जीवन में सूरज की किरणें उगे और यह भी राष्ट्रीय प्रवाह में शामिल होकर आजाद देश के निवासी होने के नाते आजादी-अधिकारों को चखें। इन परिवारों के बच्चे जब पढ़-लिख कर आगे बढेंगे तभी यह संभव होगा। पर इनके लिए पढाई का रास्ता आसान नहीं और स्पर्धात्मक युग में टिक पाना मुश्किल भी है। परंतु आज सरकारी नौकरियों की कमी तथा प्रायव्हेट नौकरियों की बढोत्तरी आशावादी चित्र दिखा रही है। इन बच्चों के लिए सरकारी तौर पर पढाई के लिए हर सुविधा मुहैया की जाए जिससे वे शिक्षा की चरम को छूकर अपने टैलेंट के बल पर विभिन्न क्षेत्रों में झंडे गाढ़ सके। प्रायव्हेट क्षेत्र में टैलेंट को तराशा जाए तो एक से दो, दो से चार, चार से आठ.... में परिवर्तन की लहर उठ सकती है।
शरद सिंह ने‘पिछले पन्ने की औरतें’उपन्यास में बेडिया समाज में औरतों द्वारा देह व्यापार करने के कुल पांच प्रेरक तत्वों का जिक्र किया है -
1. देह व्यापार की परंपरा,
2. वातावरण एवं सामाजिक दशाएं,
3. पुरुषों की अकर्मण्यता,
4. कमजोर आर्थिक स्थिति,
5. कमाई के आसान रास्ते के प्रति रुझान।
लेखिका द्वारा दिए गए इन पांच तत्वों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यह उपन्यास सरकार एवं सामाजिक कार्य करने वाली संस्थाओं के लिए मार्गदर्शक तत्वों को बताता है। कुछ सरकार, कुछ समाज और कुछ बेडियां एक-दूसरे के प्रति विश्वास से हाथ बढाए तो परिस्थितियां बदल सकती है। पिछडी जनजातियां लगन विश्वास से शिक्षा प्राप्त करें बडी आसानी से अपने-आपको परिवर्तित कर सकते हैं। पिछले पन्नों में दबे सामाजिक हिस्से को जब तक मुखपृष्ठ पर लेकर नहीं आएंगे तब तक इन्हें मनुष्य माना नहीं जाएगा; अतः उठकर मुखपृष्ठ की ओर चलने का सफर शुरू करना अत्यंत आवश्यक है।

उपसंहार -
‘पिछले पन्ने की औरतें’शरद सिंह द्वारा लिखित उनका पहला खोजपरख उपन्यास है जिसमें सामाजिक स्तरों में दबी-कुचली और पिछले पन्नों में गई औरतों को मुखपृष्ठ पर लाने का सफल प्रयास किया है। तीन भागों और सत्ताईस उपभागों में लिखे गए उपन्यास में कोई नायिका नहीं, हर हिस्से में स्त्री पात्र बदलता है। किसी स्त्री की वेदना एवं पीडा को रिर्पोताज शैली में लेखन करना लेखिका की कुशलता का परिचायक है। विभिन्न औरतों से होकर संपूर्ण भारतीय औरतों के अस्तित्व, अधिकार पर लेखिका ने प्रकाश डाला है। औरतों को अपने अस्तित्व की तलाश करनी होगी। पुरुष उसे तलाशने में मदत करने का नाटक कर भटका सकता है, अतः उसकी मदत के बिना‘आधी दुनिया’होने के नाते वे अपनी‘आधी दुनिया’की हकदार है, उसे पाए। औरत का अस्तित्व पुरुष के समकक्ष है इसे कभी न भुले।
‘पिछले पन्ने की औरतें’उपन्यास में चित्रित संपूर्ण औरतों के मन में सादगी भरा जीवन जीने की मंशा है। उन्हें भी लगता है कि उनका भी एक पति और घर हो, उनके बच्चों को उनके पिता के नाम मिले, वे पढे-लिखे। बच्चों की प्रगति अपनी आंखों से देखें। लड़की और लड़कों की शादी अच्छे घरों में हो....। इन मंशाओ-इच्छाओं को पूरा करने के लिए बेड़नियां प्रयासरत रहती है परंतु उपन्यास से यह भी तथ्य बाहर निकलता है कि सारे प्रयासों के बावजूद उनके बच्चे उसी दलदल में दुबारा फंस जाते हैं। इतिहास और परंपरा उनका पीछा नहीं छोड़ती। उनकी स्थिति सूरदास के पंछी जैसे होती है-
"अब मेरा मन अनंत कहां सुख पावै।
जैसे उडि जहाज पै पंछी, फिर जहाज पर लौट आवै।"
शरद सिंह ने पात्रों का दुबारा दलदल में फंसने का वर्णन किया है परंतु कुछ पात्र सलामति से दबाओं और परंपराओं को तोड़कर आत्मविश्वास से उडान भरने में सफलता हासिल करने का भी चित्रांकन किया है। जीवन में पिछले पन्नों से मुखपृष्ठों पर स्थान पाना है तो जीवट, पेशन्स, आत्मविश्वास, ईमानदारी और ज्ञान की जरूरत है; अगर बेड़नियां यह सब कुछ पाए तो वे‘पिछले पन्नों की औरतें’नहीं कही जाएगी।
आधार ग्रंथ –
पिछले पन्ने की औरतें (उपन्यास) - शरद सिंह
सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, तृतीय संस्करण - 2010
पृष्ठ संख्या - 304, मूल्य-395 रुपए
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डॉ.विजय शिंदे
देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद.
फोन 09423222808
ई-मेल drvtshinde@gmail.com

बुधवार, नवंबर 07, 2012

‘ पिछले पन्ने की औरतें ’ की समीक्षा साहित्य नेस्ट में.....

‘साहित्य नेस्ट’ पत्रिका , अक्टूबर 2012 में  डॉ.संदीप अवस्थी द्वारा की गई 
‘ पिछले पन्ने की औरतें ’ उपन्यास की समीक्षा यहां प्रस्तुत है......

Sahitya Nest,Cover Page, October 2012


Sahitya Nest,Back Cover, October 2012