आलेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आलेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, अक्टूबर 06, 2020

आलेख | नागार्जुन की दृष्टि में समाज और स्त्रियां | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

 

Dr (Miss) Sharad Singh

आलेख

नागार्जुन की दृष्टि में समाज और स्त्रियां

- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


बाबा के नाम से पुकारे जाने वाले नागार्जुन का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। वे अपने बचपन में ही मां की ममता से वंचित हो गए थे। पिता स्वभाव से लापरवाह होने के कारण पुत्र की ओर समुचित ध्यान नहीं देते थे। पोस्ट मधुबनी, जिला दरभंगा में जन्में नागार्जुन ने अपनी आरम्भिक रचनाएं मैथिली में ‘यात्री’ उपनाम से लिखीं। फिर हिन्दी में ‘नागार्जुन’ के उपनाम से लेखन किया। नागार्जुन ने सदा न्यायपूर्ण समाज का सपना देखा। उन्हें आमजन के दुख एवं पीड़ा से गहन लगाव था। वे जनसंघर्ष में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि जब आमजन अपनी पीड़ा को पहचान कर अपने हित में आवाज उठाएगा तभी उसे उसका अधिकार मिल सकेगा। बाबा सही अर्थो में जनकवि थे। जिस समय वे जनता के बारे में चिन्तन करते थे उस समय वे स्वयं को जनता के प्रति उत्तरदायी मानने लगते थे। आमजन के प्रति ऐसा जुड़ाव हिन्दी काव्य साहित्य में विरल ही देखने को मिलता है।

Baba Nagarjun


नागार्जुन प्राचीन संस्कृति के अध्येता थे किन्तु उन्होंने रूढ़ियों और आडम्बरों का खुल कर विरोध किया। अपनी कविता में ‘‘ओम्’’ को अभिव्यंजना का आधार बनाते हुए कटाक्ष किया है -

ओम् शब्द ही ब्रह्म है

ओम् शब्द और शब्द

..................................

ओम् गुटनिरपेक्ष, सत्ता सापेक्ष जोड़-तोड़

ओम् छल-छंद, ओम् मिथ्या, ओम् होड़ माम होड़।


नागार्जुन ने समाज की विसंगतियों पर प्रहार करने के लिए अपने काव्य में तीखे व्यंग को अस्त्र बनाया। ‘‘अकाल और उसके बाद’’ कविता में नागार्जुन अत्यंत भावुक किन्तु सजग स्वर में कटाक्ष करते हैं कि -

दाने  आए  घर के  अन्दर  कई दिनों के बाद

धुंआ उठा  आंगन  से ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठीं घर भर की आंखें कई दिनों के बाद

कौए ने    खुजलाई पांखें   कई दिनों के बाद


नागार्जुन की संवेदना का केन्द्र गंाव रहा। किसानों और मजदूरों की दुर्दशा नागार्जुन से छिपी नहीं थी। उन्होंने आजादी के तेरह वर्ष पूरे होने के समय ग्रामीण क्षेत्र में शक्ति के दुरुपयोग और कमजोरों के प्रति दुव्र्यवहार को बड़ी ही दृश्यात्मकता के साथ वर्णित किया। 

मरो  भूख से,  फौरन  आ धमकेगा  थानेदार

लिखवा लेगा  घरवालों से,  वह तो थ बीमार

जीभ कटी है  भारत माता  मचा न पाती शोर

देखो धंसी-धसीं ये आंखें, पिचके-पिचके गाल

कौन कहेगा, आजादी के बीते तेरह साल।। 


‘‘जनशक्ति’’ के 14 अगस्त 1960 के विशेषांक में प्रकाशित कविता में नागार्जुन के भीतर का निर्भीक कवि अन्याय करने वालों को ललकारते हुए पूछता है-

लाख-लाख श्रमिकों की गरदन कौन रहा है रेत

छीन चुका हे कौन करोड़ों खेतिहरों के खेत

किसके बल पर कूद रहे हैं सत्ताधारी प्रेत.......


ग्रामीण परिवेश और मां के प्रेम के अभाव ने नागार्जुन को समाज और स्त्रियों के प्रति विशेष दृष्टिकोण दिया। जब वे किसी खेतिहर मजदूर का शोषण होते देखते तो व्याकुल हो उठते कि एक सबल मनुष्य दूसरे निर्बल मनुष्य का शोषण क्यों कर रहा है? दोनों मनुष्य होकर भी एक-दूसरे से इतने भिन्न क्यों हैं? इसी प्रकार विधवा स्त्रियों की दीन-दशा देख कर उन्हें लगता कि यह स्त्री भी मनुष्य है, फिर यह अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह कयों नहीं करती है? यह समाज से अपने अधिकार क्यों नहीं मांगती है? यह सभी प्रश्न नागार्जुन के मन को जीवनपर्यन्त उद्वेलित करते रहे जिससे उनकी प्रत्येक रचना पहले से अधिक धारदार होती गई। उन्होंने अपनी कविताओं में वामपंथी विचारों का अनुमोदन किया किन्तु इससे उनके भावबोध, भाषा एवं लालित्य पर तनिक भी आंच नहीं आई। 

नागार्जुन ने अपनी कविताओं में जिस प्रकार सामाजिक विकृतियों पर प्रहार किया है वह समाज दर्शन की गहन दृष्टि के बिना संभव नहीं था। उन्होंने आमजन के जीवन को निकट से देखा और अनुभव किया था। उन्होंने ग्रामीण परिवेश में स्त्री के कष्टप्रद जीवन को मानवीय स्तर पर जांचा और परखा था। गांव में स्त्री के रहन-सहन का सूक्ष्म चित्रण नागार्जुन के गद्य साहित्य में भी देखने को मिलता है। जहां परिवार के पुरुष सदस्य इकट्ठे हों वहां स्त्री की उपस्थिति स्वीकार नहीं की जाती है। पुरुषों के बीच स्त्रियों का क्या काम? जैसी मानसिकता के कारण ग्रामीण स्त्री पारिवारिक मसलों में भी शामिल नहीं हो पाती है। जहां पुरुष हों वहां पुरुष का ही कब्जा रहता है, चाहे घर का आंगन ही क्यों न हो। इस तथ्य को ‘वरुण के बेटे में ’ नागार्जुन ने बड़े ही सहज ढंग से प्रस्तुत किया है-‘‘प्रायमरी स्कूल का वह मितहा मकान गंाव के पूर्वी छोर पर था, तीन तरफ से घिरा हुआ। अंगनई का अगला हिस्सा तग्गर कनेर, बेला हरसिंगार के बाड़ों से घिरा था। बिरादरी के बालिग मेम्बरान जुटे थे, भोला, खुरखुन, बिलुनी, रंगलाल....नंदे वगैरह-सारे के सारे। पचास-साठ जने होंगे। औरत एक भी नहीं।’’


Ratinath Ki Chachi - Novel of Nagarjun

‘‘ रतिनाथ की चाची’’ और जमुनिया का बाबा’’ जैसे उपन्यासों में नागार्जुन भारतीय समाज में स्त्रियों के शोषण के विरुद्ध डट कर खड़े मिलते हैं।

Dukhmochan - Novel of Nagarjun

‘‘दुख मोचन’’ की माया विधवा है। लेकिन उसमें अदम्य साहस है। वह अपने प्रेमी से अपने पुनर्विवाह के बारे में स्पष्ट शब्दों में चर्चा करने का माद्दा रखती है। उसे समाज के कोप का भय नहीं है। हिन्दी उपन्यासों में संभवतः वह पहली स्त्री पात्र है जो इस प्रकार के साहस का प्रदर्शन करती है। यह नागार्जुन के स्त्रियों के प्रति सम्मान भाव के साथ ही स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा का भी भाव था। वे मानते थे कि जिस प्रकार पुरुष समग्रतापूर्वक अपना जीवन जीना चाहता है उसी प्रकार स्त्री को भी जीवन जीने के समग्र अधिकार मिलने चाहिए। 

Paro - Novel of Nagarjun

‘‘पारो’’ में नागार्जुन वैचारिक स्तर पर स्त्री के विद्रोह को सामने रखते हैं। पन्द्रह वर्ष की पारों का विवाह पैंतालीस वर्ष के चौधरी से होता है। एक बच्चे को जन्म दे कर पारो की मृत्यु हो जाती है। ऊपर से शिष्ट और शालीन दिखने वाले चौधरी जी पशुवत् आचरण करते हैं। जिससे मृत्युपूर्व का अल्पकालिक वैवाहिक जीवन पारो के लिए नर्क की भांति कष्टदायक रहता है। भारतीय विवाहिता स्त्री के ‘पति परमेश्वर’ वाले संस्कारों से रची-बसी पारो भी चौधरी को पशु ही मानती है। नागार्जुन ने विवाह के संदर्भ में नाबालिग चौदह वर्षीया पारो के भय को इस संवाद के माध्यम से बड़े ही मार्मिक ढंग से उकेरा है, जिसमें वह बिरजू से कहती है-‘‘भाई-बहन में ही शादी होती तो कितना अच्छा रहता, जहां-तहां के अनजान को लोग उठा लाते हैं। इसमें कहां की अकलमंदी है।’’

Kumbhipak - Novel of Nagarjun

‘‘कुम्भीपाक’’ में स्त्रियों को बेचने वालों के विरुद्ध स्त्रियों के संघर्ष की गाथा है। नागार्जुन ने ‘‘कुम्भीपाक’’ के स्त्रीपात्रों के माध्यम से जता दिया कि जो स्त्रियां समाज द्वारा प्रताड़ित हैं वे समाज के ठेकेदारों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल भी बजा सकती हैं। 

                                   ------------------------

At World Book Fair Delhi, From Left- Pooja Pandey, Ms Vyas, Dr Sharad Singh, Susham Bedi, Sunita Shanoo and Sushil Siddharth



गुरुवार, सितंबर 24, 2020

मुनि क्षमा सागर की कविताओं में है दर्शन के तदर्थ प्रकृति | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | व्याख्यान-आलेख

Dr (Miss) Sharad Singh as Special Geust given Lecture on the Poetries of Muni Kshama Sagar, 13 March 2019  

 व्याख्यान-आलेख

मुनि क्षमा सागर की कविताओं में है

दर्शन के तदर्थ प्रकृति 

  

                             - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

                               एम-111, शांतिविहार, रजाखेड़ी,                           

                               मकरोनिया,सागर (म.प्र.) 470004 

                                 मोबाः 9425192542

                                Email : drsharadsingh@gmail.Com

Muni Kshama Sagar

      यह मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे मुनि क्षमा सागर से भेंट करने और उनसे चर्चा का अवसर मिला। प्रथम बार अपने शहर की अंकुर काॅलोनी में जहां उन्होंने कुछ समय वास किया था। इसके बाद खुरई में सुअवसर प्राप्त हुआ और फिर बीना बारहा में। बीना बारहा में मैंने उन्हें अपना दूसरा कहानी संग्रह ‘तीली-तीली आग’’ भेंट किया था। मैं नहीं जानती थी कि वे मेरा कहानी संग्रह पढेंगे भी या नहीं, किन्तु एक ललक थी अपनी पुस्तक उनके चरणों में प्रस्तुत करने की। अंतिमबार मैंने उनके दर्शन किए थे शाहपुर में। वे वहां वर्षावास कर रहे थे। उस समय उनका शरीर क्षीण हो चला था, एकदम कृषकाय। वे बोलने में असमर्थ हो चले थे। किन्तु उन्होंने संकेतों से जो उद्गार प्रकट किए वे उस समय में भी रोशनदान पर बैठी एक चिड़िया के प्रति लक्षित थे। चिड़िया को बिम्ब के रूप में चुन का मुनिश्री ने अनेक कविताएं लिखी हैं। 

चिड़िया ही क्यों? तितली अथवा कोई और पंखोंवाला प्राणी क्यों नहीं? इस बारे में मैंने कई बार सोचा। चिंतन-मनन किया और मुनिश्री की कविताओं को बार-बार पढ़ा। सन् 1992 को प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘पगडंडी सूरज तक’’ से लेकर ‘‘मुक्ति’’ में संग्रह तक की कविताआं में चिड़िया मौजूद है। चिड़िया के रूप में उन्होंने एक अद्भुत बिम्ब तलाशा था। उनकी कविताओं की चिड़िया के मूल में गौरैया है। एक घरेलू पक्षी। जिसे मनुष्यों के बीच रहना है और अपनी अलग दुनिया बसाना है। गौरैया जो बहुत नन्हां, कोमल और असहाय-सा प्रतीत होने वाला सुंदर जीव है, अपनी कर्मठ प्रवृत्ति और लगन से सबको चकित करता रहता है। मुनि क्षमा सागर चिड़िया के बहाने बहुत गहन बात कह देते हैं। ‘‘विश्वास’’ शीर्षक की उनकी यह कविता देखें-

मैंने पूछा

चिड़िया से

कि आकाश 

असीम है

क्या तुम्हें अपने

खो जाने का

भय नहीं लगता

चिड़िया कहती है

कि वह

अपने घर

लौटना जानती है।


चिड़िया का यह घर लौटना सकल सांसारिकताओं के बीच रह कर भी मोक्ष के, कैवल्य के मार्ग की ओर लौटने जैसा है। वैसे, मुनि क्षमा सागर ने चिड़िया ही नहीं अपितु प्रकृति के जड़-चेतन सभी तत्वों से दर्शन के बिन्दु सहेजे हैं। 

उनकी की एक कविता है- “बोध“। जब मैंने पहली बार इस कविता को पढ़ा तो मुझे छान्दोग्य उपनिषद् (अध्याय 6, खंड 13) में संवाद रूप में दी गई ऋषि उद्दालक एवं उनके पुत्र श्वेतकेतु की वह रोचक कथा याद आ गई जिसमें श्वेतकेतु अपने पिता उद्दालक से काषाय का विनाश कर परमसत्ता में एकाकार होने अर्थात् मोक्ष पाने की युक्ति पूछता है।  श्वेतकेतु जिज्ञासु प्रवृत्ति का था। उसने अपने पिता उद्दालक से प्रश्न किया कि -‘‘कोई व्यक्ति ईश्वरी शक्तियों में गुरु की सत्ता में या प्रकृति के निमित्तियों में कैसे समाहित हो सकता है? कैसे एकाकार हो सकता है?’’

ऋषि उद्दालक ने श्वेतकेतु को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने गुरु-गंभीर उदाहरण देकर यह बात समझ आनी चाहिए किंतु श्वेतकेतु को अपने प्रश्न का उत्तर शीघ्र पा लेने की उत्कंठा थी, जिसके कारण वह अपने पिता की गंभीर बातों को समझ ही नहीं पा रहा था। जब पिता उद्दालक ने देखा कि पुत्र को इस तरह से ज्ञान दे पाना तो कठिन है तो उन्होंने एक सरल उपाय निकाला और उन्होंने नमक की एक गली देते हुए श्वेतकेतु से कहा कि जाओ इसे एक कटोरा पानी में डाल दो। श्वेतकेतु ने ऐसा ही किया उसके बाद उद्दालक और श्वेतकेतु दूसरे विषयों के चिंतन-मनन में लिप्त हो गए। थोड़ी देर बाद, ऋषि उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कहा कि -‘‘पुत्र जाओ और वह नमक की डली ले आओ जो कल मैंने तुम्हें कटोरा भर जल में रखने को दी थी। श्वेतकेतु गया उसने कटोरी के पानी में उंगली डालकर दिल्ली को ढूंढने का प्रयास किया किंतु डली तो रात भर में घुल चुकी थी। पानी में समाहित हो चुकी थी। एकाकार हो चुकी थी। अब श्वेतकेतु बड़ा चिंतित हुआ कि यह तो बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई पिता ने नमक की डली सहेजने के लिए दी थी और यहां तो डली है ही नहीं। अब क्या करूं ? अंततः वह अपने पिता के पास गया और उसने वस्तु स्थिति बताई। पुत्र की बात सुन कर ऋषि उद्दालक मुस्कुराए और उन्होंने कहा, ‘‘पुत्र मैं बताता हूं कि वह नमक की डली कहां गई है।’’ 

श्वेतकेतु ने हड़बड़ा कर कहा अगर वह मुझे नमक की डली फिर से मिल सकती है तो पिताजी शीघ्र बताइए कि वह कहां है?

उद्दालक ने कहा कि ठीक है जाओ वह पानी से भरा कटोरा ले आओ जिसमें कल तुमने नमक की डली डाली थी। श्वेतकेतु गया और वह कटोरा उठा लाया। उद्दालक ने उस कटोरे के पानी में उंगली डाली और श्वेतकेतु के हथेली पर पानी की एक बूंद रख दी और कहा - इसका स्वाद लो पुत्र। श्वेतकेतु ने नमक की डली को घुले हुए पानी को चखा तो उसे पानी नमकीन लगा। इसके बाद उद्दालक ने कहा, ‘‘पुत्र अब तुम अपनी उंगली से कटोरी के किनारे के पानी को चाखो।’’ श्वेतकेतु ने ऐसा ही किया, किनारे के पानी को चखा। वह भी खारा था। बीच के पानी को चखा वह भी खारा था।  तब उद्दालक ने कहा कि- “पुत्र, जिस तरह नमक पानी से मिल कर एकाकार हो गया, ठीक उसी तरह मनुष्य को प्रकृति और ईयवर से एकाकार हो जाना चाहिए तभी वह अपने स्व, अपने, अहम् और अपने अस्तित्व को भूल कर जगत कल्याण कर सकता है।’’

पिताश्री की बात सुनते ही श्वेतकेतु को यह ज्ञान प्राप्त हो गया की ‘स्व’ को भूल कर ही परमसत्ता का अभिन्न अंग बना जा सकता है। ठीक यही भाव मुनि क्षमा सागर की इस कविता में देखे जा सकते हैं-

नदी 

सागर, आकाश 

धरती 

जो भी था 

मैंने उसे दिया 

पर मन नहीं भरा 

बनी रही गहरी रिक्तता 

और आज जब 

अपने को दिया, 

तो लगा 

देने का अहम् व्यर्थ था।


जब व्यक्ति अपने अहम् से बाहर निकल आता है तब उसे अपने भीत के नादस्वर सुनाई देने लगते हैं। किन्तु परमसत्ता का अनहद नाद सुनते ही मन के भीतर के सारे नादस्वर मौन हो जाते हैं और रह जाता है सिर्फ़ अनहद नाद परमसत्ता का। मोक्ष की ओर ले जाने वाला अनहद नाद। जब इस तथ्य को मुनिश्री व्याख्यायित करते हैं तो यहां फिर एक बार नदी बिम्ब बनती है नादस्वरों की पर्याय। मुनि क्षमा सागर जी अपनी ‘नाद’ शीर्षक कविता में लिखते हैं-


नदियों की 

कल कल ध्वनियां 

मौन हुईं

लो पहुंच गए हम 

सागर तट पर 

जब से नाद 

सुना अनहद का 

लगता है 

ठहर गया स्वर 

पहुंच गए हम 

अपने तट पर।

    

दरअसल, मुनि क्षमा सागर ने अपनी कविताओं के द्वारा दार्शनिक परम्पराओं की मूल स्थापनाओं, उनके सरोकारों और सार-तत्व को बोधगम्य बनाया और प्राकृतिक सहजता के साथ उन्हें शब्दों में पिरोया। उनकी कविता साधारण से उदात्त की ओर, भौतिक से आधिभौतिक की ओर और अस्तित्व से शून्य की ओर यात्रा करती है।. वे प्रकृति में एक निजी अध्यात्म की खोज करते रहे।

आमतौर पर दार्शनिकता कविताओं को बोझिल और अबूझ बना देती है, लेकिन मुनि क्षमा सागर की कविताएं सरल शब्दों में संवाद के रूप में पाठकों से बात करती हैं और जीवन के कठिन प्रश्नों को सुलझाती हुई उनके उत्तर देती हैं तथा पाठक या श्रोता के मानस में बहुत गहरे तक उतर जाती हैं। क्यों कि इन कविताओं में मात्र ‘स्व’ नहीं था, वरन् वैश्विक मानववादी चिंतन भी निहित है।


एक और प्राकृतिक बिम्ब है ‘‘माटी’’। इसी शीर्षक की कविता में मुनि क्षमा सागर तप और समर्पण की श्रेष्ठता को माटी के द्वारा समझाते हैं। कविता देखिए-


अपने को 

पूरा गला कर 

माटी 

भगवान बन गई 

दुनिया 

उसके चरणों में 

झुक गई 

बनाने वाले की आंख 

अभी भी 

खोजती है 

कि उसमें कहां क्या कमी रह गई


तप और समर्पण की यह वही पराकाष्ठा है जहां कहा जाता है बकौल अल्लामा इक़बाल -

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले 

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है ?


मुनिक्षमा सागर आकाश को चुनते हैं मानव जीवन और मानवीय संबंधों को समझाने के लिए। वे कहते हैं-

रात आती है 

सारा आकाश 

तारों से 

भर जाता है 

दिन होते ही 

मानो सब 

झर जाता है 

इसमें सोचो 

तो सोचते ही रहो 

हाथ क्या आता है 

जो समझते हैं 

वे समझते हैं 

कि डूबते-उगते 

सितारे हैं 

आकाश 

अकेला था 

अकेला ही 

रह जाता है।


जैन दर्शन में कषाय के मुख्य चार भेद- क्रोध, मान, माया तथा लोभ माने गए हैं। इनके कारण जीव में पुद्गल कणों का आश्रव होता है और यह कर्मबंधन से अधिकाधिक ग्रस्त होता जाता है। जीव की कषाय सहित तथा कषायरहित, ये दो अवस्थाएँ होती हैं। कषायों का विनाश होने पर ही जीव को मोक्ष प्राप्त होता है। जब काषाय से मुक्ति मिल जाती है तभी मोक्ष संभाव्य होता है। काषाय को ले कर भर्तृहरि ने अपने ‘‘नीतिशतकम्’’ में कहा है कि - 

येषां न विद्या, न तपो, न दानं ज्ञानं, न शीलं, न गुणो, न धर्मः !

ते मत्र्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति !!


अर्थात् जिन लोगो के पास विद्या, तप, दान, शील, गुण और धर्म नहीं होता, ऐसे लोग इस धरती के लिए भार है और मनुष्य के रूप में पशुवत् घूमते हैं। पशुवत् से मनुष्यत्व और मनुष्यत्व से मोक्ष की ओर यात्रा के लिए किसी न किसी आलम्बन की भी आवश्यकता होती है। 

इसी यात्रा को सुगम बनाने के लिए मंदिर बनाए जाते हैं। यहां प्रकृति नहीं प्रकृति की प्रतिकृति उनकी कविता का बिम्ब बनती है। ‘‘अंतर’’ शीर्षक उनकी यह कविता मंदिरों के औचित्य को निरुपित करती है-

ये मंदिर 

इसलिए कि हम 

आ सकें

बाहर से 

अपने भीतर 

ये मूर्तियां 

अनुपम सुंदर 

इसलिए कि हम 

पा सकें कोई रूप 

अपने अनुत्तर 

और 

श्रद्धा से झुक कर 

गलाते जाएं 

अपना मान-मद 

परत दर परत निरंतर 

ताकि 

कम होता जाए 

हमारे और प्रभु के 

बीच का अंतर।  


और अंत में उस कविता का उल्लेख करना जरूरी है जो जड़ से चेतन और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है अपने साथ पहला क़दम उठाते ही .... 

सारे द्वार

खोल कर

बाहर निकल आया हूं

यह 

मेरे भीतर

प्रवेश का

पहला क़दम है।


यह पहला क़दम ही है जो अनन्त यात्रा की ओर ले जाती हैं, विभिन्न बिम्बों के जरिए उन्हीं का विवरण है मुनि क्षमा सागर की कविताओं में। उनके काव्य में प्रकृति के तदर्थ दर्शन नहीं वरन् दर्शन के तदर्थ प्रकृति है। प्रकृति के संरक्षण और प्रकृति से शिक्षण दोनों की बात वे एक साथ, एक स्वर में करते हैं। वे सिद्ध कर देते हैं कि प्रकृति हो या प्रतिकृति दोनों के मूल में है जीवन दर्शन जो जीने का तरीका सिखाता है और उसके आगे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। 

----------------------------------


-.डॉ (सुश्री) शरद सिंह 

एम-111, शांतिविहार, रजाखेड़ी, मकरोनिया,  सागर (म.प्र.) 470004

मोबाः 9425192542

 Email : drsharadsingh@gmail.Com

 

Dr (Miss) Sharad Singh as Special Geust given Lecture on the Poetries of Muni Kshama Sagar, 13 March 2019  

Dr (Miss) Sharad Singh as Special Geust given Lecture on the Poetries of Muni Kshama Sagar, 13 March 2019  

Dr (Miss) Sharad Singh as Special Geust given Lecture on the Poetries of Muni Kshama Sagar, 13 March 2019  

Dr (Miss) Sharad Singh as Special Geust given Lecture on the Poetries of Muni Kshama Sagar, 13 March 2019  

Dr (Miss) Sharad Singh as Special Geust given Lecture on the Poetries of Muni Kshama Sagar, 13 March 2019  

Dr (Miss) Sharad Singh as Special Geust given Lecture on the Poetries of Muni Kshama Sagar, 13 March 2019  

Dr (Miss) Sharad Singh as Special Geust given Lecture on the Poetries of Muni Kshama Sagar, 13 March 2019  

Dr (Miss) Sharad Singh as Special Geust given Lecture on the Poetries of Muni Kshama Sagar, 13 March 2019  

Dr (Miss) Sharad Singh as Special Geust given Lecture on the Poetries of Muni Kshama Sagar, 13 March 2019  

Dr (Miss) Sharad Singh as Special Geust given Lecture on the Poetries of Muni Kshama Sagar, 13 March 2019  


बुधवार, मार्च 28, 2012

युवा कथाकारों की कहानियों का पोस्‍टमार्टम

आलेख (अंश) -   
लेखक - अरविन्‍द कुमार 

कुछ प्रसिद्ध कहानियों का पोस्‍टमार्टम
समय और सभ्‍यता और इतिहास की परिधि को अपने आगोश में समेटे हुए हैं। इन चुन्‍निदा कहानियों में समय की परिधि ‘उत्तर' अस्‍मितावादी विमर्शों की समस्‍त श्रृंखलाएं आपको स्‍पष्‍ट रूप से परिलक्षित होगी। ये प्रमुख कहानियां हैं- बाकी इतिहास (राजेंद्र राव) ‘नंदीग्राम के चूहे' (मधु कांकरिया), नाटे कद का आदमी (संतोष गौतम) कागज का जहाज, चोर सिपाही (मो0 आरिफ), सपने कभी मरते नहीं, जंगल जमींन और तारे (महुआ माझी), वारदों, हमन हैं इश्‍क मस्‍ताना, लो आ गई मैं तुम्‍हारे पास (स्‍नोवा बानोंर्), हाँ मैं अपराधी हूँ कामरेड, (रंजना जायसवाल) ‘जो सदियों से चुप है (जया जादबानी), शारूख शारूख ! कैसे हो शारूख' (प्रत्‍यक्षा), ‘पेड़ लगाकर फल खाने का वक्‍त नहीं (सुभाष चंद्र कुशवाहा), लल्‍लू लाल को रूपैया (विभांशु दिव्‍याल), कामरेड और चूहे (अभिज्ञात), चीखे (एस0 आर0 हरनोट), अमरीकी चूहे, गिद्धों का प्रीत भोज (प्रदीप पंत), एम0 एल0 सी0 (उर्मिला शिरीष), ये धुआँ धुआँ, अंधेरा, रास्‍ता किधर है, (हरिओम) ‘कहानीकार' (राजूर्श्‍मा), मठाधीश (उदय प्रकाश), ब्‍लू फिल्‍म (गौरव सोलंकी), कंडम (अरूण कुमार असफल), पुरूष-विमर्श (कुसुमभट्‌ट), मर्डर ऑफ मार्क्‍स (गिरिराज किराडू), बल्‍ली धुआँ (मेराज अहमद), विलौती बाबू की उधार फिकिर, एक चुप्‍पे की चुपकथा (पंकज मित्र), धर्मातरण (सत्‍यम श्रीवासतव), ख्‍यालनामा (बंदनाराग), केयर ऑफ स्‍वातघाटी (मनीषा कुलश्रेष्‍ठ) सूकर मछव (अरूण कुमार सिंह), बयार (रामचंद्र), बैक पेपर बाउंसर (संजय कुंदन), वो आखिरी बार सैन फ्रांसिस्‍को में देखी गई थी (सोहन शर्मा) इन्‍हीं कहानियों से निकल रहा है ‘कच्‍चा पक्‍का' अनुभव जो ‘वैश्‍वीकृत होती ‘संस्‍कृति' के लिए आवश्‍यक है।
               इतिहास की पुनर्व्‍याख्‍या करते हुए ‘शरद सिंह' ने अपनी कहानी ‘हुस्‍न बानू का आठवाँ सवाल' में ‘स्‍त्री' को पुनर्परिभाषित करती है। यह कहानी फारसी में ‘हातिमताई' नामक से प्रसिद्ध है जो लोक प्रचलित ‘लोककथा' है। जिसका पुनर्लेखन शरदसिंह ने किया है। जिसमें ‘स्‍त्री के दृष्‍टि कोण' से पुनः देखने की कोशिश की गयी है। ‘स्‍त्री विमर्श' के मुद्दे को उठाया गया, जिसमें पुरूषों का परंपरा से चले आ रहे ‘वर्चस्‍व' का खण्‍डन करना है। कई सवाल वह आम पाठकों के समक्ष रखती है ‘‘इससे क्‍या अंतर पड़ता है कि वह फारस की है या भारत की, चीन की है या योरोप की, सचमुच इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है, मुख्‍य बात यह है कि वह स्‍त्री है। ‘किस्‍सा-ए-हातिमताई' में हुस्‍नबाबू का एक स्‍त्री होना पर्याप्‍त है। बस्‍स ! देश, काल अथवा समाज कोई भी हो सकता था। समूची दुनिया की स्‍त्रियाँ लगभग एक- सी त्रासदी सहती हैं- पुरूषों द्वारा अपने से दोयम समझे जाने का।''[v] यह अतीत और वर्तमान की व्‍याख्‍या ‘मुनीरसामी' और ‘हुस्‍नबानू' के माध्‍यम द्वारा की गई है। ‘स्‍त्री' की परिधि को सीमित न करके वृहद कर दिया है। तब यह कहानी ‘रेडिकल' हो जाती है, और सबाल्‍टर्न स्‍टोरी- कहा जा सकता है। गिरिराज किराडू की कहानी ‘मर्डर ऑफ मार्क्‍स' कला के अंत की ओर ले जाती ह। साहित्‍य-कलाकारों के सूचनाओं प्रेमचंद और मुक्‍तिबोध' की प्रगतिशीलता को रेखांकित करते हुए रघुवीर सहाय की राजनीतिक चेतना की ओर ध्‍यान ले जाती है। कहानी परंपरागत लेखन का विरोध करते हुए साहित्‍य में मार्क्‍सवादी विचार धारा का मूल्‍यांकन करती है। कथाकार धीरज बेजामिन को एक ‘उदास कलाकार' (पेंटिग्‍स बनाने वाले के) के रूप में प्रस्‍तुत करता है। ‘उदास' माना जा सकता है क्‍योंकि धीरज बेंजामिन समाज की उन गहराइओं में जाना चाहता है और अपनी ‘पेंटिंग्‍स' में नग्‍न यथार्थ, लाना चाहता है जिसे सुन्‍दर किसी मायने में नहीं कहा जा सकता है धीरज बेंजामिन के लिए ‘असुन्‍दर' ही ‘उदासी' है जो अपनी तूलिका से निकालकर लाना चाहता है। ‘‘मैं इन्‍फेस करता हूँ कि मुझे मॉडर्न आर्ट कभी समझ में नहीं आई। मैं उसे सिर्फ थियरी में, कला-इतिहास की माँग कर पढ़ी गई किताबों के जरिये जानता।''[vi]
         साहित्‍य कला का उत्‍कर्ष राजू शर्मा की लम्‍बी कहानी ‘कहानीकार (तद्‌भव, जन0 2009) मैं देखा जा सकता है। कथाकार ने बुर्जुआ लेखन को स्‍पष्‍ट करता है। यह प्रेम की मनोविश्‍लेषणात्‍मक महाकथात्‍मक गाथा है, जो प्रेम के ‘आवसेशन डिसार्डर' को प्रकट करता है और एक फैंटेसी की तरह कथानक ‘ब्‍यूटी' से जीता है। प्रेमी के मानस पटल पर अपनी प्रेयसी के लिए जितनी परिकल्‍पनाएं होती हैं, इस कहानी का कथानायक उन अवस्‍थाओं से गुजरता जाता है प्रेम के सारे नियमों कानूनों और बंधनों को तोड़ना चाहता है जिसे एक साधारण प्रेमी तोड़ना चाहता है कहानी फ्‍लैश शैली में घटित होती दिखाई गई है। यही इस कथा की आधार शिला भी। वह प्रेम के साहित्‍योतिहास दर्शन से हिंदी एवं अंग्रेजी के समस्‍त कथाओं का अध्‍ययन करता है। ‘प्रेम' नामक तत्त्व को जानना चाहता है। किन्‍तु वह इसमें असफल सा हो जाता है।
‘‘इन हफ्‍तों में मैंने कई एक महान प्रेम कहानियां पढ़ी, उनका चिंतन किया और उनसे सीखा कि इश्‍क के सरोवर के उत्तेजक तजुर्बे में विडम्‍बनाओं को कैसे पहचानते हैं और उनका रस लेते हैं। जैसे इस नतीजे पर पहुंचा कि और प्रणय गीत की अलौकि आभा को कायम रखने के लिए जरूरी था कि अपना मलिन, उनीदा रूटीन एक आत्‍मग्रस्‍त कठोरता से जारी रखूँ। यह पृष्‍ठभूमि कि सब कुछ पूर्ववत्‌ है एक उजले रोमांस की शुद्धता बरकरार रखने के लिए जरूरी था। यह समीकरण अनेक सामान्‍य और सही उक्‍तियों के अनुकूल था जैसेः एक प्रतिशत अंतप्रेरणा के पीछे निन्‍यानबे प्रतिशत पसीने की चट्‌टान होती है; महान नेतृत्‍व असंख्‍य चेहराविहीन जनमानस के हाथों पर ऊँचाई पाता है वगैरह।''[vii] एक बार फिर प्रेम के पाठ को पुनपीठ द्वाराे परिभाषित करते हैं, ‘‘शायद इस सबमें एक पाठ है, सीख है, एेसा होता है जब तुम कला को जिंदगी के ऊपर आंकते हो। जिंदगी कला को जन्‍म देती है, कला जीवन का सृजन नहीं करती...................।''[viii] यहां कहानीकार ‘प्रेम' को कला से विलग मानता रहा है और यह सिद्ध करना चाहता है प्रेम कला नहीं है। प्रेम शाश्‍वत और चिरंतन है जिसका स्‍वरूप तो बदल सकता है पर ‘प्रेम' नहीं बदल सकता।
वैश्‍विक होती दुनिया ने समाज की संरचना को बदलने में अहम भूमिका निभायी है रफी जी का गाया हुआ एक मशहूर गीत लाइन है- ‘इस रंग बदलती दुनिया में इंसान की नियत ठीक नहीं।' जब ‘नियत' का दुश्‍चक्र चल रहा है तो ‘लव केमेस्‍ट्री' बदलेगी ही। जो प्रांजल प्रेम पहले था वह आज नहीं रहा, वह कच्‍चे धागे में बंधा रहने वाला भी नहीं रहा।, वह इसको तोड़ कर दूर निकल गया, फिर भी हिंदी की प्रसिद्ध पत्रिकाओं ने अपने अपने स्‍तर पर ‘प्रेम कथाओं', को स्‍थान दिया ही है। इधर हिंदी साहित्‍य जगत की मशहूर पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय' ने प्रेम महाविशषांक की कड़ी में पाँच अंक निकाले। पहला प्रेम विशेषांक क्‍लासिकल कथाकारों की अमर कहानियां हैं। जिनमें उसने कहा था। (चंद्रधर वर्मा मुलेरी), आकाशदीप (जयशंकर प्रसाद), तीसरी कसम इत्‍यादि। प्रेम महाविशेषांक-3 युवा कथा की कहानियों पर आधारित है जिनमें है पापू कांट लव-सा..........(पंकज मित्र), लव यू हमेशा (अनुज), चन्‍द्रबिन्‍दु बच्‍चों का खेल (महुआ माझी), सुधा कहाँ है ? गौरव सोलंकी इत्‍यादि। उत्तर आधुनिक जगत की कहानियों में युवाओं में प्रेम का जो स्‍वरूप आया है वह अकादमिक जगत का है युवाओं का प्रथम प्रेम सबसे पहले महसूस कालेज या विश्‍वविद्यालय (अकादमिक संस्‍थाओं से) में होता है। अनुज की कहानी ‘लव यू हमेशा' अकादमिक जगत में होने अंतर्द्धन्‍द का खुला चित्रण करती है। सोनल और तिमिर का ‘प्‍लेटोनिक लव' नहीं ‘रीयल लव' है, ‘‘हाँ मिलते हैं। चल फिर, लव यू है.................। लव यू है............।''[ix] इसी तरह की कहानियों में है गौरव सोलंकी ‘सुधा कहा है ?' राजीव कुमार ‘तेजाब' नहीं इतिहास को स्रोत मानकर प्रेम का ‘नया रूप' चित्रित किया है महुआ माझी की कहानी चंद्रबिन्‍दु में, प्रेम को अनावृत्त करने के बजाय आवृत्त किया है। अनुकृति पुनः अपने न्‍यूडमॉडल्‍स के स्‍थान पर ‘स्‍त्री रूप' में आ जाती है, यही इस कहानी की सफलता है।
इधर प्रेम के युवापक्ष को चित्रित करने में युवा कथाकार लेखिका स्‍नोवा बानों की ‘वारदों' लो फिर मैं लौट आई' नये सम्‍बन्‍धों का रेखांकन किया गया है। सुधीश पचौरी ने लिखा है, ‘‘माध्‍यमों ने यथार्थ के साथ हमारे संबन्‍ध को बदल दिया है। हम सीधे ऐंदि्रक बोध से पुष्‍ट यथार्थ को ग्रहण नहीं करते, तनिक उसके माध्‍यमीकृत (दृश्‍य अथवा श्रव्‍य अथव पाठ्‌य) रूप को ग्रहण करते हैं। तकनीक ने सूचना का अतिबोध बढ़ा दिया है, हम स्‍थानीय हो उठे हैं या भूमण्‍डलीय ‘एक दूसरी प्रकृति' (संस्‍कृति) पहली प्रकृति को ढके जा रही है। हमारी भाषा बदल रही है। हमारे प्रतीक बदल रहे हैं। हमारे ढंग बदल रहे हैं।''[x] युवा कथाकारों को प्रेम की भाषा एवं मानकीकरण बदल गये हैं।
‘राजनीतिक ध्रुवीयकरण ने सामाजिक संरचना को बदल ही डाला है। राजनीति के विषय में एक कहावत कही जाती है कि ‘राजनीति में जो कहा जाता है वह किया नहीं जाता है।' राज्‍य की अवधारणा के विषय में प्‍लेटो का विचार है कि ‘राज्‍य का जो स्‍वरूप होना चाहिए वह ‘आदर्शवादी' होना चाहिए।' राजनीति के बदलते तेवर ने ‘आम जनता' को हिलाकर रख दिया है जिसका महत्त्वपूर्ण कारण ‘अवसरवादी राजनीति होना है। ‘सत्ता' प्राप्‍त करने के होड़ में अवसरवादी नेता' किसी भी हद तक गुजर सकते हैं। सलिल सुधाकर ने अपनी कहानी ‘बिरादर' में जातिगत समीकरण' का स्‍पष्‍ट उल्‍लेखकर राजनीति में एक बार फिर ‘जातिगत गोट' बिठाने में ‘राम लगन बाबू' की चतुर राजनीतिक की खिलाड़ी के रूप में सामने आये हैं।‘ सर्वजन समाज' की राजनीति करने का आह्‍्‌वान करते हैं। भारतीय राजनीति में ‘आरक्षण' को फिर से तूल दे दिया गया। ‘आरक्षण' न होकर इसे एक ‘हथियार' के रूप में प्रयोग किया गया है जो भारत की राजनीति का ‘तीखा' और ‘कड़ुवा' सच है जिससे जाति व्‍यवस्‍था मजबूत होती दिखाई देती है, ‘रामलगन बाबू ने समझा कि वातावरण में उलझन व्‍याप्‍त रही है, तो उन्‍होंने सस्‍पेंस खोलने की जल्‍दबाजी दिखाई, ‘‘इसीलिए आप लोगों अर्थात्‌ अपने लोगों की अपेक्षाओं और उम्‍मींदों को पूरा करने के लिए और सर्वजन का समाज बनाने के लिए हमने अब अगड़ों अर्थात्‌ कथित ऊँची जातियों को भी साथ-साथ लेकर चलने का फैसला किया है। आज इस मंच से मैं घोषणा करता हूँ कि हमारी पार्टी अब सवणोंर् के अरकछन के लिए भी संघर्ष करेगी और सत्ता में आने पर इसके लिए कानून भी बनायेगी।''[xi]
‘अस्‍मितावादी साहित्‍य' की बढ़ती मांग ने साहित्‍य की ‘चूले' हिला हिलाकर रख दी हैं अरविन्‍द अडिगा का उपन्‍यास ‘दि ह्‌वाइट टाइगर' में हांशिये पर पड़े पश्‍चिम बंगाल की राजधानी में ‘कोलकाता के रिक्‍शा चालकों की दयनीय दशा को ‘जीते-जागते यथार्थ रूप में उद्‌घाटित किया है। ‘बिजुअल मीडिया' ने हमारे समाज पर सीधा अटैक किया है जिसका प्रभाव हमारी जनरेशन पर पड़ रहा है आगे और भी पड़ता रहेगा। यांत्रिक होती दुनिया, बढ़ती ‘सूचना प्रौद्योगिकी' ने तेजी से हमारे ‘रिश्‍तों' में बदलाव लायी है। ओमा शर्मा की कहानी ‘ग्‍लोबलाइजेशन' सुभाष शर्मा की ‘बर्बादी काम' संजय कुंदन की ‘बाउंसर'। ‘बाउंसर' का गोपी अथक प्रयास के बावजूद भी मशीन जैसा महज आक्रामक शरीर बनकर नहीं रह पाता, जो उसके कार्य की पहली बुनियाद है। उसे परिवार, प्‍यार और अपनापन चाहिए। संजय कुंदन ने अपनी कहानी में एक कला बिकसित कर एक ‘अद्‌भुत' चरित्र गोपी का निर्माण किया है। महामंदी की वापसी ने गोपी सिंहानिया के लिए बाउंसर का कार्य करते हुए भी अपने को निष्‍कृष्‍ट नहीं बना पाता, और न अपने सम्‍बन्‍धों में दरार उत्‍पन्‍न कर पाता है। घर में बने शकरपारे की तरफ उसका मन दौड़ जाता है। उसके सामने सबकुछ व्‍यर्थ लगता है उसे अपनी ‘देशी संस्‍कृति' ही अच्‍छी लगती है ‘फास्‍ट फूड संस्‍कृति' नहीं। गोपी में जीवन जीने की अदम्‍य लालसा है, इसलिए वह अपनी तरह के स्‍वयं के संसार में जीना चाहता है।
भारत की ‘अर्थनीति' ने ‘आम जनमानस' की कमर लचका दी है जिस पर ‘अर्थशास्‍त्रियों' का यह ‘तुर्रा' है कि हम अर्थनीति' के ग्‍लोबल बादशाह बन रहे हैं। अर्थ शास्‍त्रियों ने आँकड़ों पर आँकड़े पर प्रस्‍तुत कर यह सिद्ध भी कर दिया है कि हम कितने भी ‘नालायक हो हमारी ‘अर्थनीति' ‘सबके लिए' सुखदायी है यानी कि अमीर-गरीब या धनी-निर्धन होने के लिए। उनकी कृषि नीति लम्‍बे चौड़े व्‍याख्‍यान दिये जाते हैं हाँ कृषि को वैज्ञानिक विधि से खेती करने पर उत्‍पादन क्षमता का तो विकास हुआ नहीं पर खेती पर लागत दूना हो गयी है। जिसका मुख्‍य कारण रहा है कृषि रसायनों, उर्वरकों, डीजल इत्‍यादि पर मूल्‍यवृद्धि। दूसरी तरफ नहरों में समय पर पानी नहीं छोड़ा जाता है जिससे पैदावार, व उत्‍पादन क्षमता में कम आती है। पंकज मित्र की कहानी ‘बिलौती महतो की उधार फिकिर', ‘शाहूकार' बनते बैंकों की कथा है। जहाँ सब कुछ ‘हाइब्रिड' हो गया है। किसानों को मल्‍टीनेशनल कम्‍पनियों द्वारा ‘खाद-बीज' ऊँचे मूल्‍य में बेचना, अधिक पैदावार का प्रलोभन देना है। यह प्रलोभन किसानों को ऋणग्रस्‍तता की ओर ले जाता है, जिससे उनकी ‘नयी पीढ़ी' भी ‘ऋण' अदायगी में अपना जीवन समाप्‍त कर दें। विलौती महतो को केन्‍द्र में रखकर ‘पंकज मित्र' ने मात्र बिहार के किसानों की ‘दीन-हीन' स्‍थिति का जिक्र नहीं है अपितु किसानों पर बढ़ता ‘प्रकोप' है जिससे किसान को असामान्‍य बनाने या किसान को मृत्‍यु की ओर ले जाने की ओर प्रवृत्त करता है। ‘‘फिकिर तो थी ही। फसल का यही हाल रहा तो क्‍या हाल होगा। उधार लेना पड़ जाएगा क्‍या ? पानी वाला का पैसा तो बैंक में बचे रूपया से चुका देंगे लेकिन उतने पैसा से साल भी खेंपेंगे कैसे। हदरू कब तक देगा आखिर।''[xii] उसे अपनी नहीं अपने परिवार के भविष्‍य की चिंता सता रही है।
‘ग्‍लोबल ‘होता' ‘मनुष्‍य' आन्‍तरिक पीड़ा के अवसाद से ग्रसित हो जाता है उसकी सम्‍वेदनाएं क्षीण होना आरम्‍भ हो जाती हैं वह ‘सत्‍यम ब्रूरता' से असत्‍यम्‌ ब्रूयात की ओर अग्रसर होने लगता है, अपने को वह ‘टाप क्‍लास' का हीरो समझने लगता है और उसके आगे अन्‍य सारे चीजे ‘फ्‍लाप' हो जाती है। खुद को ‘उपभोक्‍ता' समझने लगता है यहीं पर ‘मनुष्‍य का अंत' हो जाता है अर्थात्‌ उसका मनुष्‍यत्‍व समाप्‍त हो गया। सुभाषा शर्मा ने उपभोक्‍तावाद के दो रूप माने हैं पहला, हम मनुष्‍य नहीं रह गये हैं बल्‍कि ‘विभाजित व्‍यक्‍तित्‍व', और ‘देह-विमर्श के रूप में।''[xiii] गाँवों को संवेदनाओं का गढ़ माना जाता है पर आज परिस्‍थितियां बदल गयी हैं वो सारे ‘कुरूप चेहरे' गाँव की भोली भाली जनता को ‘डसने' लगे हैं। इसीलिए शायद अशोक मिश्र ने अपनी कलम से ‘गाँव की मौत' का उद्‌घोष कर दिया। यह उद्‌घोष उनका जायज है। गाँव के युवा जो पढ़ लिखकर सर्विस पा जाते हैं तो वे गाँव की तरफ मुड़कर नहीं देखते हैं उसे दूर से ही नमस्‍कार करना प्रारम्‍भ कर देते हैं। रतन का गाँव अब वह गाँव नहीं रहा, जहाँ आपसी भाईचारा, प्रेम व्‍यवहार, सौहाद्र, मानवीय पीड़ा, सबके दुख-सुख में सामिल होना, ये जैसे ‘भूत' की तरह गायब हो गये। गाँव की चौपाल जहाँ न्‍याय होता था सब समाप्‍त हो गया। रतन अपने गाँव ‘बाबा' की मौत खबर पाकर जा रहा है। उसके गाँव का अन्‍त उसे बार-बार झकझोर रहा है। वह स्‍मृतियों में ‘गोता' लगाता रहता वर्तमान गाँव के हालात से तुलना करता चलता है। ‘‘उसने एक बात गाँव की नई पीढ़ी के संबन्‍ध में काफी गहरे अहसास के साथ नोट की कि वे एक तीसरी दुनियां के व्‍यक्‍ति हैं। ज्‍यादातर युवक किसी से नमस्‍कार तक नहीं करते और मान-सम्‍मान व बड़े-छोटे का लिहाज तो क्‍या। गाँव वाले हर कष्‍ट को एक होकर मिल-जुल कर बाँट लेते थे। शहर में पढ़ी लिखी, पीढ़ी उस सभ्‍य संस्‍कृति से कोसों दूर है। गाँव का जीवन स्‍तर ऊँचा उठाने के लिए सरकार ने जो भी आभास किया उससे अधिकारियों-दलालों का भला हुआ और उसका विकृत रूप सामने आया है।''[xiv]
+ + + + + + +
‘‘उसके गाँव का दर्द यही है कि शहर की भौतिकवादी संस्‍कृति ने गाँव का धर्म बिगाड़ दिया है। गाँव की शक्‍ल थके हारे बूढ़े जैसे हो गई है जो हर रोज क्षण-क्षण मर रहा है। फिलहाल रतन के गाँव के गाँव का दर्द यही है।''[xv]
कारण यह है कि गाँव, कंकरीट में तब्‍दील हो रहे हैं यह सुखद भविष्‍य है उन्‍हें भी एक पक्‍की छत की आवश्‍यकता है नैतिक मूल्‍य धराशायी हो गये हैं यह दुखद पक्ष है। ‘विकास' की तीव्रगति में भाग लेना चाहता था। विकास की अंधी चकाचौंध ने मानव की गरिमा का महिमा मंडन किया है। ‘एक चुटकी' (डॉ0 दीर्घ नारायाण) भारतीय ‘पंचायती राज ‘व्‍यवस्‍था की कलाई खोलती है। बिहार' (सम्‍पूर्ण भारत) के गाँवों की उस स्‍थिति का चित्रांकन करती हैं जहाँ ‘पंचायती राज' व्‍यवस्‍था पूरा पैसा (रूपया) व्‍यूरोंक्रेट्‌स, और पंचायत का मुखिया मिल बाँटकर हजम कर जाते हैं। मुखिया अपनी स्‍थिति तो सुधार लेता है किन्‍तु गाँव की समस्‍याएं जस की तस बनी रहती हैं, उन्‍हीं समस्‍याओं को केन्‍द्र में रखकर फिर चुनाव लड़ा जाता है। गुंजी और दीनानाथ उसी संस्‍कृति में रम गए।
‘‘मोटर साइकिल में बैठते ही िसर ऊपर आसमान की ओर उठाए, लाख-लाख शुक्रिया' बुदबुदाते हुए वह पंचायत भवन की ओर रूख किया है। स्‍पष्‍टतः कुलानंन्‍द ने पंचायत राज देवी को नई शैली में ‘सस्‍ते' ने वशीभूत कर लिया है, वैसे पंचायती-राज के लगभग सभी देवता और कई देवियों को पंचायती राज-व्‍यवस्‍था के ‘कुलानंदों' ने पहले से ही अपने मन्‍दिर में स्‍थापित कर रखा है, विभिन्‍न प्रकार के स्‍वादिष्‍ट और रंग-विरंगा ‘प्रसाद' देकर मोटा चढ़ावा के साथ। यह बात दीगर है कि कुछ पंचायतें में ‘सबल' दीनानाथ ने पंचायत सचिवों को ‘बेचारा कुलानंन्‍द बनाकर पाल रखा है, कलम की स्‍याही की भाँति इस्‍तेमाल करते हुए।''[xvi] वही हाल है तुम भी खाओ मुझे भी खाने दो।
बर्बर होते समाज ने कुछ ऐसे शरारती तत्त्व पैदा कर दिये हैं जिनका मुख्‍य मकसद समाज में अशांति का वातावरण उत्‍पन्‍न करना होता है। धार्मिक कठमुल्‍लापन, धार्मिक संकीर्णता, कट्‌टरता समाज के लिए हितकारी नहीं होती है। यही कारण रहा है कि जब-जब धार्मिक उन्‍माद की स्‍थितियाँ उत्‍पन्‍न हुई हैं। तब-तब राजनीतिक अस्‍थिरता सामाजिक अस्‍थिरता अवश्‍य बड़ी है। हिंदी कथा लेखकों ने अपने ढंग से उसे चित्रित कर सामाजिक सौहाद्र को बनाये रखने की अपील की है। युवा कथाकारों की इधर कई साम्‍प्रदायिकता कहानियाँ आई हैं। सुशांत सुप्रिम ‘कबीरदास', विजय शर्मा, ‘आतंक' आदि। ‘कबीरदास' अब तक लिखी गयीं साम्‍प्रदायिक कहानियों पर भारी पड़ती हैं यह साम्‍प्रदायिकता का ‘पोस्‍ट मार्टम' करती हैं। जिसमें हिन्‍दू-मुसलमान दोनों ही ‘लावारिस' लाश को देखने के लिए आते हैं, किन्‍तु वह लाश न हिन्‍दू की होती है न मुसलमान की। उस लाश पर दोनों समुदाय के लोगों ने अपनी-अपनी दलीली पेश की। तभी वहां पर उपस्‍थिति ‘कबीरदास' को किसी शरारती तत्त्व ने गोली मार दी स्‍थिति बेकाबू हो गयी-
‘‘अचानक ‘धांय' की आवाज के साथ कहीं से गोली चली। पता नहीं, गोली इधर वालों ने चलाई या उधर वालों ने। पर दूसरे ही पल कबीरदास उस सिरकटी लाश के पास जमीन पर पड़ा, तड़पता नजर आया। लगा जैसे भयंकर आंधी-तूफान में किसी छायादार पेड़ पर बिजली गिर गई हो। देखते ही देखते दोनों ओर की भीड़ में मौजूद दरिंदों के हाथों में बम, देशी कट्‌टे और तलवारें निकल आई। ‘जय श्री राम' और ‘अल्‍लाह-ओ-अकबर' के नारों के बीच दंगे-फसाद शुरू हो गए। चारों ओर चीख-पुकार मच गई। जमीन पर लाशों के ढेर लगने लगे।''[xvii] शासन और प्रशासन दोनों मौन थे इसी तरह स्‍वयं प्रकाश की ‘पार्टिशन' कहानी की रचना करते हैं कबीरदास के विषय में लोग इतना बताते हैं कि वह भाषण देता रहता था-
‘‘भाइयों, हवा किस धर्म की होती है ? धूप का संप्रदाय क्‍या है ? नदी के पानी की क्‍या नस्‍ल है ? आकाश की जात क्‍या है ? परिदें किस कौम के हैं ? बादलों का मुल्‍क क्‍या है ? इंद्रधनुष की बिरादरी तो बताओ, लोगों। सूरज, चांद और सितारों का मजहब क्‍या है ?''[xviii]
हिन्‍दी साहित्‍य में ‘अस्‍मिता-विमर्श' को लेकर ‘दहशतगर्दी-सी' सी व्‍याप्‍त हो गयी। कवि, लेखक, आलोचक, समाजशास्‍त्री, अर्थशास्‍त्री, दर्शनशास्‍त्री, मनोविश्‍लेषक इत्‍यादि नित नये तरीकों से इसकी ‘छान-बीन' कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है कोई तेज बवंडर आ जायेगा जिसमें सब ध्‍वस्‍त हो जायेगा, शेष कुछ नहीं रहेगा। दलित-स्‍त्री लेखन न हो गया मानो कोई ‘कोबरा' आ गया है जो डस लेगा हैरानी किस बात की ‘अभिव्‍यक्‍ति' तो है अभिव्‍यक्‍त होने दो कुछ ‘नया' निकल कर आयेगा। दलित लेखन, स्‍त्री-लेखन की होड़ में हर कोई सामिल होना चाहता, किन्‍तु ‘जेंडर' बदलकर। ये ‘डर' कब समाप्‍त होगा। ‘पापुलर' भी होना चाहते हें और डर भी रहे हैं यह खटकता है। उत्तर आधुनिकता ने जो घोषणा कर रखी है कि ‘साहित्‍य मर' चुका है तो मैं कहना चाहता हूँ दलित-साहित्‍य स्‍त्री साहित्‍य पर जो आज गरमा -गर्म बहसें, सेमिनार, डिबेटस आयोजित किये जा रहे हैं यह उनकी भागीदारी को सुनिश्‍चित करता है। समय के साथ बदलाव की मांग है हम आपको बदलना होगा।
दलित कथाकार ने ‘दलित जीवन' की उस त्रासदी का चित्रण कर रहे है जो अब तक हाशिये पर पढ़ा था। इधर ‘ताजा तरीन' कथाकारों में अजय नावरिया, सूरज पाल चौहान, दलपत चौहान, रत्‍नकुमार सांभरिया, अरूण कुमार सिंह, रूपनारायण सोनकर, कर्मशील भारती, सुशील कुमार इत्‍यादि। सूरजपाल चौहान की ‘दो चित्र' दलपत चौहान की ‘नया ब्राह्मण' अपने स्‍तर की नई कथा परिकल्‍पना है जो अब तक छूटी हुई थी। अरूण कुमार सिंह ने ‘सूकर मछव' में संजीवना को ‘दलित पुरोहित' बनाने का प्रयास किया है और सफल भी है, लेकिन दलित चेतना से संजीवना का मोहभंग हो गया है और वह बन गया ‘दलित-पुरोहित-ब्राह्मण' उस पर सामाजिक जातिदंश हावी है। ‘दलित राजनीति' के क्षेत्र में संजीवना को ऊपर उठते दिखाया गया है।
‘‘नौकरी की उमर जाने पर भी संजीवना दिन भर कुछ न कुछ पढ़ता लिखता रहता। वह आते - जाते जिसे भी पकड़ लेता उससे घण्‍टों ज्ञान बघारता। दलित चेतना की आवश्‍यकता, दलित के उत्‍थान के लिए जरूरी बातें, सरकार की छद्‌म दलित नीतियों, वोट की राजनीति और दलित वोट बैंक, गाँधी द्वारा चलाये गये हरिजन आन्‍दोलन की सच्‍चाइयों, राजनीति पार्टियों का दलित प्रेम बाबा साहब अम्‍बेडकर के क्रिया-कलापों, उनके विचार दर्शन और जीवन के बारे में जब वह बोलने लगता तो देखते ही घण्‍टों निकल जाते। संजीवना अक्‍सर चाय की दुकान पर किसी न किसी से बहस लड़ाता बतियाता मिल जाता। वह अक्‍सर बौद्धिक जमाने के लिए रटे-रटाये जुमने बोलता-राजनीति दुष्‍टों की अंतिम शरण स्‍थल है' फिर उसमें संसोधन करते हुए बोलता- ‘मैं इस विद्धान की बात से पूर्णता सहमत नहीं हूँ।' धीरे-धीरे इलाके के लोग उसे बुद्धिजीवी के रूप में देखने लगे। अब वह जनवादी गतिविधियों में भी बढ़ चढ़कर हिस्‍सा लेने लगा। सामाजिक परिवर्तन की बड़ी-बड़ी बाते करते उसे अक्‍सर छोटी-मोटी सभाओं में देखा जाता। स्‍थानीय निकाय के चुनाव में वह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा। उसके चलते दलितों का वोट बैंक बन चुका था। दलितों का ध्रुवीकरण होता जा रहा था। दलितों की राजनीतिक शक्‍ति भी बढ़ती जा रही थी।''[xix] रामचंद्र की ‘बयार' जाति को तोड़ती है जो ‘अन्‍तर्जातीय विवाह' को ‘प्रकट दर्शन' के रूप में व्‍याख्‍यायित करती है।
स्‍त्री लेखिकाओं ने ‘नारी मन' के उस चित्र को उबार की कोशिश की है जो पुरूष लेखक अब तक नहीं कर पाये। इधर कुछ नई कथा संरचना का जन्‍म हुआ है। कुसुम भट्‌ट की कहानी ‘पुरूष-विमर्श' रंजना जायसवाल की ‘हाँ, मैं अपराधी हूँ कामरेड।', जया जादवानी की ‘जो ‘सदियों से चुप हैं', सीमा शफ़क की ‘हम बेकैद मन बेकैद', वदनाराग की ‘ख्‍यालनामा' इत्‍यादि। ये लेखिकाएं परंपरा से चले आ रहे उस लेखन का विरोध कर रही सहधर्मिणी जहां स्‍त्री को ‘मात्र भोग विलास' की समझा जाता रहा है वह पुरूष वर्चस्‍व को तोड़ना चाहती है। ‘एस्‍थेटिक' की बंधी-बधाई' कड़ियों को तोड़ती हुई दिखती हैं। यह ‘एस्‍थेटिक' ही उन्‍हें बार-बार उनके दिमांग को ‘क्‍लिक' करता है। वह ‘घर' और ‘बाहर' अर्थात्‌ वे ‘कदम ताल' मिलाकर चलना चाहती है। किसी भी क्षेत्र में। कुसुम भट्‌ट ने ‘पुरूष-विमर्श' में पुरूषिया डाह को अभिव्‍यक्‍त किया है। पुरूष के नैतिक पतन पर सीधा-सा आक्षेप करती है। नारायण तिवारी सच्‍चचरित्र है। नीलम दुबे व अन्‍य लोग ‘नारायण तिवारी' को सच्‍चचरित्र होने का सर्टीफिकेट देते हैं और अपने ही आफिस में चपरासी ‘बंडू' के कहने पर सभी लोग उसे ‘दुश्‍चरित्र' साबित करते हें। दूसरी तरफ यह कहानी ‘देह विमर्श' और पारिवारिक मूल्‍यों का विघटन दिखाती हैं और ईश्‍वर के अस्‍तित्‍व को नकारती है।
‘‘इतनी छोटी-सी बात के लिए उसे कष्‍ट देना उचित होगा............? उन्‍होंने खुद से कहा और चलते......................मंदिर की चौखट पर पाया खुद को............मूर्तियों को निहारने लगे नारायण.....................पुजारी ने शंख बजाया तो उन्‍हें बोध हुआ खालिस पत्‍थरों की मूर्ति................।''[xx] छूसरी तरफ सेक्‍स की भूख को प्रथम प्राथमिकता देती है।
हिन्‍दी सिनेमा पर फोकस करती अशोक गुप्‍ता की ‘कोई तो सुनेगा' फैशन टैक्‍नोलाजी पर या विज्ञापन माडलिंग की दुनिया का पाठ करती सोहन शर्मा की ‘वो आखिरी बार सैन फ्रांसिस्‍को में देखी गयी थी', विस्‍थापन जमीन के मुद्दों पर मधुकांकरिया की ‘नंदीग्राम के चूहे' अभिज्ञात की ‘कामरेड और चूहे' गौरव सोलंकी की ‘ब्‍लू फिल्‍म' साइबर क्राइम की अंधड़ प्रेम कथा है।
निष्‍कर्षतः कहा जा सकता है कि युवा कथाकार उन समस्‍त बिन्‍दुओं पर फोकस कर रहे हैं जो ‘क्‍लासिकल कथाकारों की दृष्‍टि से दूर रहा। उन पर न ‘बाजार' हावी है न ‘बाजारीकरण' की प्रविधि। वे ‘इतिहास' और ‘सभ्‍यता' को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं। नयी सांस्‍कृतिक अवधारणा को स्‍थापित कर ‘विश्‍व' को ‘स्‍थानीय' बना देना चाहते हैं जहां समानता की अवधारणा कायम की जा सके। तभी तो उनकी सृजनात्‍मक, कहानियों में परंपरा, रूढ़ियाँ, रीति-रिवाज, जड़ता, विखण्‍डन, धर्म, संस्‍कृति, राजनीति, विचारधारा, मानव-मूल्‍य, नैतिकता, श्‍लील-अश्‍लील, सेक्‍स, यांत्रिकता, प्रोद्यौगिकी, सूचनाक्रांति, साइबर क्राइम, कार्पोरेट कल्‍चर, कार्पोरेट सोसाइटी, उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति, माल संस्‍कृति, फैशन टेक्‍नालाजी, विज्ञापन की दुनिया, लिव-इन-रिलेशनशिप, समलैंगिक चित्रण, सेक्‍स का उन्‍मुक्‍त चित्रण, देह की संस्‍कृति, बाजारवाद, मीडिया-विमर्श, प्रेम का बदलता स्‍वरूप मास कल्‍चर, मास लिटरेचर, नक्‍सलवाद, आतंकवाद, साम्‍प्रादायिकता, वैयक्‍तिक पीड़ा, पानी की समस्‍या, किसान, आदिवासी विस्‍थापन की समस्‍या, प्रवासी-अप्रवासी बदलने की क्रियाएं, सम्‍वेदनाओं का होता क्षरण, बढ़ती महंगाई, नवसाम्राज्‍यवाद, नव उपनिवेशवाद इत्‍यादि मूलभूत समस्‍याओं पर पाठकों का ध्‍यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। जीवन के विविध पक्षों को लेकर वह आगे की ओर बढ़ रहे हैं एक नये विकल्‍प के साथ।
संदर्भ -

[i] समीक्ष के नये प्रतिमान ः डॉ0 रघुवीर सिंह, पृ0 20 (तक्षशिला प्रकाशन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्‍ली प्रथम सं0 1977)
[ii] वही, पृ0 20-21
[iii] हंस, जनवरी 2010, पृ0 96 (संजीव ः हिंदी कहानी आज के सरोकार और भविष्‍यकी चिंता)
[iv] समयान्‍तर, फरवरी 2009, पृ0 32 (प्रियम अंकित ः नए समय की आहट)
[v] हंस, अक्‍टूबर 2009, पृ0 14
[vi] बया, दिसम्‍बर 2008 - मई 2009, पृ0 82
[vii] तद्‌भव, जनवरी 2009, पृ0 242
[viii] वही, पृ0 272
[ix] नया ज्ञानोदय, सितम्‍बर 2009, पृ0 33
[x] उत्तर आधुनिकता ः कुछ विचार, सं0 देवशंकर नवीन, सुशान्‍त कुमार मिश्र, पृ0 18
[xi] हंस, फरवरी 2009, पृ0 20
[xii] प्रगतिशील उद्‌भव, अक्‍टूबर-दिसम्‍बर 2009, पृ0 48
[xiii] नया ज्ञानोदय, जनवरी 2009, पृ0 60 (सुभाष शर्मा ः उपभोक्‍तावाद की त्रासदी)
[xiv] लमही, अक्‍टूबर-दिसम्‍बर 2009, पृ0 92
[xv] वही, पृ0 93
[xvi] वाक्‌, अंक-6, जून-अक्‍टूबर 2009, पृ0 156-157
[xvii] वही, पृ0 145
[xviii] वही, पृ0 146
[xix] पक्षधर, अंक-8, पृ0 118
[xx] हंस, नवम्‍बर 2009, पृ0 64
संपर्क
असिस्‍टेण्‍ट प्रोफेसर हिंदी विभाग कौषल्‍या भारत सिंह ‘गाँधी' राजकीय महिला महाविद्यालय, ढिंढुई पट्टी प्रतापगढ़

रविवार, अप्रैल 17, 2011

समकालीन हिन्दी कथा साहित्य की कुछ प्रमुख विशेषताएं

- डॉ. शरद सिंह


साहित्य की किसी विधा की विशेषताओं को कुछ बिन्दुओं में प्रस्तुत करना अति संक्षेपीकरण माना जा सकता है तथापि मेरी दृष्टि में समकालीन हिन्दी कथा साहित्य की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नानुसार हैं-

1- पहले की अपेक्षा अधिक यथार्थवादी कथानक
2- सामाजिक सरोकारों के साथ राजनीतिक एवं आर्थिक मूल्यों की चर्चा
3-स्त्री विमर्श पर आधारित कथानक
4-अपने अस्तित्व के लिए जूझती हुई, दोयम दर्जे से ऊपर उठती नायिका
5-दलित चेतना पर केन्द्रित कथावस्तु
6-स्त्रियों और दलितो की आन्तरिक पीड़ा का मुखर प्रस्तुतिकरण
7-फंतासी के बदले प्रेम का अधिक यथार्थ एवं व्यवहारिक वर्णन
8-भारतेन्दुयुग की कहानियों की तुलना में परिवर्तन के अधिक प्रभावी आग्रह
9-अलंकारिकता के आडम्बर  से परे सरल, सहज, आम बोलचाल की भाषा
10-निरन्तर प्रयोगधर्मी शैली
11-स्थानीय शब्दों और मुहावरों का अधिक प्रयोग
12-आंचलिक परिवेश की कहानियां
13-प्रेमचन्द और यशपाल से शुरू हो कर निरन्तर विकसित होता कथा-शिल्प
14-जीवन के नित नवीन पक्षों को उजागर करती कहानियां

बुधवार, मार्च 30, 2011

हिन्दी का लोकप्रिय उपेक्षित साहित्य उर्फ लुगदी साहित्य

 - डॉ. शरद सिंह

        रेल्वे व्हीलर्स और बस स्टेन्ड्स की दूकानों से ले कर फुटपाथों तक राज करने वाली हिन्दी साहित्य की इन पुस्तकों को समीक्षकों द्वारा कभी गंभीर समीक्षा के दायरे में नहीं रखा गया। मोटे, दरदरे, भूरे-पीले से सफेद काग़ज़ पर छपने वाला यह साहित्य उपन्यासों के रूप में पाठकों के दिल-दिमाग़ पर छाया रहता था। कहा जाता है कि माता-पिता द्वारा रोके जाने पर भी स्कूल, कॉलेज के विद्यार्थी अपनी पाठ्य पुस्तकों में छिपा कर इन्हें पढ़ते थे। दूसरी ओर इनमें से कई लेखक ऐसे थे जिनके उपन्यास स्वयं माता-पिता की पहली पसन्द होते थे। अस्सी के दशक तक पूरे उठान के साथ ऐसे उपन्यासों की उपस्थिति रही है। वर्तमान में पठन में रुचि कम होने का प्रभाव इस तरह के उपन्यासों पर भी पड़ा है। यह साहित्य लुगदी साहित्य के नाम से जाना जाता था। जिसे अंग्रेजी में पल्प फिक्शन कहा जाता है। आज भी ऐसे उपन्यास चलन में हैं पर अपेक्षाकृत बहुत कम।
       इस प्रकार के साहित्य को लुगदी साहित्य इसलिए कहा गया क्योंकि ये रचनाएं जिस कागज पर छपा करती थीं, वह कागज अखबारी कचरे और किताबों के कबाड़ की लुगदी बनाकर दोबारा तैयार किया जाता था अर्थात रीसाइकल्ड पेपर के रूप में।
लुगदी साहित्य अर्थात् ऐसा कथा साहित्य या गल्प जो बाज़ार में बिक्री के पैमाने पर तो लोकप्रिय रहा किंतु जिसका साहित्यिक मूल्य बहुत कम आंका जाता रहा।
लुगदी साहित्य के दौर में हिन्दी के जो लेखक सामने आए उनमें प्रमुख थे- दत्त भारती, प्रेमशंकर बाजपेयी, कुशवाहा कांत, राजवंश, रानू आदि... लेकिन इनमें सबसे प्रसिद्ध थे- गुलशन नंदा।
     गुलशन नंदा हिन्दी में लुगदी साहित्य के सबसे ज़्यादा बिकने वाले लेखक रहे।  वे  60 से लेकर 80 के दशक तक, की दर्जनों सिल्वर जुबिली, गोल्डन जुबिली फिल्मों के लेखक थे। हिन्दी साहित्यकारों के बीच एक उपेक्षत नाम और उस दौर की युवा पीढ़ी के लिए आराध्य एवं आदर्श लेखक गुलशन नंदा के अनेक बहुचर्चित उपन्यास थे-  जलती चट्टान, नीलकंठ, घाट का पत्थर, गेलार्ड, झील के उस पार, पालेखां आदि।
         ‘झील के उस पार वह उपन्यास था जिसका हिन्दी पुस्तक प्रकाशन के इतिहास में शायद ही इससे पहले इतना जबर्दस्त प्रोमोशन हुआ हो। देश भर के अखबारों, पत्रिकाओं, रेडियो पर प्रचार के अलावा होटल, पान की दुकान से लेकर सिनेमाघरों तक प्रचार किया गया। प्रचार में इस बात का भी खुलासा किया गया कि पहली बार हिन्दी में किसी पुस्तक का पहला एडीशन ही पांच लाख कापी का छापा गया है।
       गुलशन नंदा के अनेक उपन्यासों पर फिल्में बनीं और बॉक्स ऑफिस पर हिट रहीं जैसे- सावन की घटा, जोशीला, जुगनू, झील के उस पार, नया जमाना, अजनबी, कटी पतंग, नीलकमल, शर्मीली, नज़राना, दाग़, खिलौना आदि।
      बुक स्टॉल्स पर गंभीर साहित्य की तुलना में इब्ने सफी, कुशवाहा कांत, गुलशन नंदा, रानू, राजवंश, वेदप्रकाश कम्बोज, कर्नल रंजीत, सुरेंद्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा जैसे लुगदी साहित्यकार ज्यादा बिकते रहे। इन रचनाकारों के उपन्यासों को बस, ट्रेन की यात्रा के दौरान बहुत पढ़ा जाता था।
प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने एक बार कहा था कि रेल यात्राओं का एक बड़ा फायदा उनकी जिंदगी में यह रहा है कि इसी दौरान उन्होंने कई अहम किताबें पढ़ लीं। रेल यात्रियों के मनोरंजन में किताबों की जो भूमिका रही है, उसमें एक बड़ा हाथ एएच ह्वीलर बुक कंपनी और सर्वोदय पुस्तक भंडार जैसे स्टॉल का भी रहा।
               
दूसरी दृष्टि से देखा जाए तो जिस लुगदी साहित्य ने पाठकों में पढ़ने का रुझान पैदा किया तथा जिस लुगदी साहित्य ने पाठकों को गंभीर अर्थात् समीक्षकों एवं आलोचकों द्वारा जांचे-परखे गए साहित्य की ओर प्रेरित किया उस लुगदी साहित्य को कभी भी समीक्षकों एवं आलोचकों ने नहीं स्वीकारा। इसके विपरीत उसे तुच्छ़, हेय और घटिया साहित्य माना गया। हिन्दी साहित्य के किसी भी मानक साहित्यकार की पुस्तकों की तुलना में लुगदी कागज पर छपने वाले वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यास लाखों की संख्या में छपते रहे हैं। कम मूल्य में अधिक पृष्ठों वाली यह रोचक पुस्तकें पाठकों को सहज आकर्षित करती थीं। 

        ओमप्रकाश शर्मा के उपन्यासों ने भी पाठकों को वर्षों तक अपने आकर्षण में बांधे रखा। एस सी बेदी के उपन्यास समाज में घटित होने वाले अपराधों का सुन्दर विश्लेषण करते थे। इनमें अपराध के दुष्परिणामों की भी व्याख्या विस्तृत रूप से की जाती थी।
          ये उपन्यास आर्थिक दृष्टि से पाठकों के लिए ‘बटुआ फ्रेण्डली’ होते थे। ये किराए पर उपलब्ध रहते थे, आधे और चौथाई मूल्य में भी खरीदे-बेचे जाते थे।
                लुगदी साहित्य को हिन्दी साहित्य से अलग अथवा उपेक्षित रखा जाता रहा जबकि इस साहित्य की भी सदा अपनी विशिष्ट उपादेयता रही है और इस विशिष्ट उपादेयता को भुलाया नहीं किया जा सकता है।