शुक्रवार, जून 19, 2026

"नई धारा" के फरवरी-मार्च 2026 अंक में डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "बिरह पवन सोई मारै झोला"

"नई धारा" के फरवरी-मार्च 2026 अंक में डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "बिरह पवन सोई मारै झोला"

कहानी 
बिरह पवन होई मारै झोला 

- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

     आकाश पर छाए हुए काले बादलों को देख कर मैं अनुमान लगा रही थी कि बारिश कितनी देर में शुरू होगी। मैं उस समय छत पर उस छप्पर के नीचे थी जहां रजनीगंधा के पौधे गमलों में लगे हुए थे। ये पौधे मैंने ही लगाए थे। एक बड़े गमले में रातरानी और दूसरे बड़े गमले में बेला। सभी रात को फूलने और महकने वाले फूल। सभी हाईब्रिड किस्म के। किसी ने मुझे बताया था कि हाईब्रिड पौधे हर सीजन में खिले हैं और अधिक फूल देते हैं। बस, उनके लिए विशेष खाद की आवश्यकता होती है। अच्छा रहने के लिए कुछ विशेष भला किसे नहीं चाहिए? इंसान भी सब कुछ विशेष पाने के जुगाड़ में लगा रहता है। मेरे इन फूलों के सााि विशेष यह भी है कि ये सभी रात में खिलने वाले फूल हैं।  

मैंने दिन में खिलने वाले फूलों के बारे में क्यों नहीं सोचा? 

मुझे गुलाब लगाना चाहिए। 

लेकिन गुलाब के कांटें? 

नहीं, गुलाब ठीक नहीं। 

गुलदाऊदी? 

लेकिन इस बारिश के मौसम में? 

उसका मौसम तो जाड़े का रहता है, शायद!

ओह, इस बार माली से पूछूंगी कि क्या ठीक रहेगा?

मैं अभी बादलों और फूलों के बीच मनन-चिंतन के हिंडोले में झूला झूल ही रही थी कि एक मोटी बूंद छत की फर्श पर गिरी। फिर दूसरी बूंद, तीसरी बूंद और फर्श पर बड़े-बड़े छप्पे बनाती हुई बूंदों ने देखते ही देखते फर्श के उस पूरे हिस्से को ढांक दिया जो छप्पर से बाहर खुले में था। देखते ही देखते छत के फर्श पर बूंदें मानो सातिया काढ़ने लगीं।

फिर दूसरे ही पल वही बूंदों मानो सातिया काढ़ना छोड़ कर छत भिगोने को आतुर हो चली थीं। वे आरंभिक बूंदें छत के फर्श पर गिर कर ही इस तरह उसमें जज़्ब हो रही थीं गोया उसमें समाकर एकाकार हो जाना चाहती हों। फर्श में समा कर अपना अस्तित्व खो देना चाहती हों। मुझे सहसा याद आया कि ऐसी ही एक बारिश में ललित ने मुझसे कहा था-‘‘उदया, देखो बूंदें प्रेमरस में डूबी हुई हैं।’’

‘‘वो कैसे?’’ मैंने चकित हो कर पूछा था।

‘‘देख नहीं रही हो कि वे अपने स्पर्श में आने वाली हर वस्तु में रच-बस जाना चाहती हैं, बिलकुल एक आतुर प्रेयसी की तरह।’’ ललित ने कहा था।

‘‘प्रेयसी ही क्यों? प्रेमी नहीं हो सकता है क्या? क्या प्रेमी में यह आतुरता नहीं रहती है?’’ हठात् मैं बोल उठी थी और फिर दांतों से अपनी जीभ काट ली थी कि उफ! मैं ये क्या कह दिया!

‘‘बारिश की बूंदें सभी को अपने रंग में रंग लेती हैं। वे हर किसी को प्रेम की आतुरता में डुबा देती हैं, स्त्री-पुरुष का भेद किए बिना।’’ ललित ने मेरे प्रश्न पर गहराई से ध्यान नहीं दिया, वह अपनी ही धुन में कहता चला गया। मेरी भी सांस में सांस आई।

‘‘पर मेरे मन में तो कोई आतुरता नहीं जागी है।’’ मैंने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए कहा। 

‘‘हो सकता है, आजकल का जीवन शुष्क जो हो चला है। यांत्रिक जीवन। बारिश की फुहारों का आनंद लेना है तो घर के सबसे भीतरी दड़बे में यानी बाथरूम में घुस जाओ, शाॅवर चलाओ और कल्पना करो कि बारिश की फुहारों में भीग रहे हैं। क्या धातुई शाॅवर बादलों का पर्याय बन सकता है? क्या बादलों का स्वच्छ पानी ओव्हरहेड टैंक के बासी पानी का मुकाबला कर सकता है? कभी नहीं। हम खुद को बादलों से दूर करते जा रहे हैं, बारिश के पानी से दूर करते जा रहे हैं और प्रकृति की सबसे बड़ी नेमत से दूर कर रहे हैं।’’ ललति भावावेश में कहता चला गया।

‘‘विवशता है। अब वह माहौल ही कहां रहा कि खुले आंगन या खेतों या फिर सड़कों पर बारिश में भीगा जाए।’’ मैंने याद दिलाया।

‘‘हां, अब हम ज्यादा सभ्य हो गए हैं न!’’ ललित व्यंग से बोला।

‘‘नहीं, पर अब लोग शायद टी.वी. के पर्दें पर बारिश देखना अधिक पसंद करते हैं।...लेकिन ठहरो, हम ये बहस क्यों कर रहे हैं? हम तो आनंद ले सकते हैं इस बारिश का। यह हमारे घर की छत है और हम जब तक चाहें इस बारिश में भीगते रह सकते हैं।’’ मैंने ललित से कहा।

‘‘हां, जब तक कि तुम्हारे पड़ोसी ताक-झांक न करने लगें।’’ ललित ने चुभते हुए स्वर में कहा। कई बार ऐसा हुआ कि ललित छत पर आया और कोई न कोई पड़ोसी आ खड़ा हुआ, घूरता हुआ। 

सो, ललित का क्रोध स्वाभाविक था। वह प्रकृति प्रेमी है। उसे प्रकृति अपने मौलिक रूप में ही पसंद है। उसे बिजली के हीटर की बजाए धूप पसंद है, उसे एसी या कूलर की बजाए नीम की घनी छांव के नीचे बहने वाली हवाएं पसंद है, उसे शाॅवर की बौछार की बजाए बादलों से पड़ने वाली फुहारें पसंद है। 

उसे मैं पसंद हूं कि नहीं? अचानक यह प्रश्न कौंधा। आखिर मैं तो बारिश में प्रेयसी की भांति आतुर नहीं हुई, तो क्या मैं स्वाभाविक नहीं हूं? क्या मेरी भावनाएं मौलिक नहीं हैं? ललित को तो स्वाभाविक और मौलिक ही पसंद है। फिर मैं? मैं कैसी हूं? मैं क्या हूं?

‘‘मुझ पर इन बूंदों का कैसा प्रभाव पड़ना चाहिए, ललित?’’ साहस जुटा कर मैंने पूछ ही लिया था।

‘‘तुम पर?’’ पल भर सोचने के बाद एक गहरी शरारत उसके चेहरे पर कौंध गई और उसने कहा,’’तुम्हे हुलस कर मेरे गले लग जाना चाहिए। किसी रीतिकालीन प्रेयसी की तरह।’’

‘‘लेकिन ऐसा नहीं होने वाला है, क्योंकि मैं रीतिकालीन नहीं, इक्कीसवीं सदी की प्रेयसी हूं।’’ मैंने मुस्कुरा कर उत्तर दिया।

‘‘यानी यह तो माना कि तुम मेरी प्रेयसी हो।’’

‘‘धत्!’’

‘‘धत् क्या? आज तुम व्याकुल नहीं हो रही हो क्यों कि मैं तुम्हारे पास, तुम्हारे सामने हूं लेकिन जिस दिन मैं किसी दूसरे शहर में, कहीं और रहूंगा, तब यही बादल, बिजली और बारिश तुम्हें मेरी ओर खींचेगी।’’ ललित ने रोमांटिक होते हुए कहा।

‘‘कभी नहीं, नेव्हर!’’मैंने भी दृढ़ बनते हुए कहा।

‘‘ठीक है, देखूंगा मैं भी!’’

‘‘हां, हां! देख लेना!’’ मैंने भी मानो चुनौती स्वीकार करते हुए कहा था।

उस समय मुझे पता नहीं था कि ललित एक दिन सचमुच महानगर में नौकरी करने चला जाएगा और मैं रह जाऊंगी यहां, अकेली, अपने दायित्वों से घिरी हुई। ललित के जाने के बाद मैंने जाना कि विरह भी कोई भावना है जिसमें पीड़ा का सागर हिलोरें लेता रहता है। यह हिलोरें ‘व्हाट्एप्प’ या ‘वीडियो काॅलिंग’ से भी धीमी नहीं पड़ती हैं। ऐसे समय मुझे याद आती है ललित की वह बात कि ‘‘प्रकृति की मौलिकता का स्थान यांत्रिक कृत्रिमता नहीं ले सकती है।’’

ललित के जाने के बाद मैंने अपनी पुरानी आदत को पुनः जगा लिया। अब मैं प्रतिदिन एक न एक किताब जरूर पढ़ती हूं। कभी-कभी कल्पना के फाहे यथार्थ के घाव को ठंडक पहुंचाने का चमत्कारी काम करते हैं। 

दो-तीन सप्ताह पहले ही मैंने मलिक मोहम्मद जायसी का ‘‘नागमती का विरह वर्णन’’ पढ़ा था। मैं पढ़ कर स्तब्ध रह गई थी कि किस प्रकार नागमती अपने प्रिय के विरह में इतनी दुबली हो गई थी कि उसकी अंगूठी उसका कंगन बन गई थी। निःसंदेह यह वर्णन अतिशयोक्ति है लेकिन इस वर्णन में छिपी पीड़ा अतिशयोक्ति नहीं है। विरह की पीड़ा व्यक्ति को एकाकी, अवश और दुर्बल बना देती है, मन ही मन में सही। पता नहीं क्यों, मैं नागमती की पीड़ा से इतनी गहरे जुड़ गई कि कई बार मेरे सपनों में नागमती ने प्रवेश पा लिया। वह मेरी अदृश्य सखी बनती जा रही है। या फिर मेरा अपना वजूद।

शायद इसीलिए पानी की बूंदों को छत भिगोते हुए देख कर आज मेरे मन के किसी कोने में छिपी हुई नागमती मानो बाहर आ गई और मेरी चेतना को दस्तक देती हुई कहने लगी -‘‘उठो उदया! जागो! अपने प्रियतम को अपने पास बुला लो!’’

‘‘धत्! उसे वहां काम है। वह नहीं आएगा मेरे बुलाने पर।’’ मैंनेे नागमती से कहा।

‘‘क्यों नहीं आएगा? तुम एक बार बुला कर तो देखो।’’ नागमती ने कहा।

‘‘क्या तुम्हारा प्रियतम तुम्हारे बुलाने पर आया था?’’ मैंनेे पूछा।

‘‘मेरी बात अलग है....वो जमाना दूसरा था...वो पस्थितियां भिन्न थीं....।’’ नागमती ने ठंडी सांस भरते हुए कहा। उदासी के बादल उसके सुंदर मुखमंडल पर उतर आए। यह देख कर मुझे अपने प्रश्न पर पछतावा हुआ। किन्तु अब प्रश्न तो किया ही जा चुका था। जो पीड़ा पहुंचनी थी, पहुंच चुकी थी।

‘‘नागमती, प्रेम मन को इतना व्याकुल क्यों कर देता है?’’ मैंनेे बात बदलने का प्रयास करते हुए पूछा।

‘‘मुझे नहीं पता। लेकिन अनुभव मैंने भी किया है। मैंने तो इतनी व्याकुलता सही है जितनी शायद ही किसी और ने सही हो।’’ नागमती उदास हो कर बोली।

‘‘नहीं मुझे लगता है कि दुनिया की हर स्त्री, जो अपने प्रिय से दूर रहने को विवश रहती है, उसे वर्षा ़ऋतु आते ही उतनी ही पीड़ा होती है जितनी की तुम्हें हुई थी, नागमती।’’ मैंने नागमती के कथन का प्रतिवाद किया। आखिर प्रेम की भावना आदिम युग से एक-सी चली आ रही है।

‘‘मेरी बात और थी। मैं विवश थी। मेरे पास संवाद के साधन नहीं थे। तुम्हारे पास वह सब कुछ है जो तुम्हें तुम्हारे प्रियतम से मिला सकता है। एक बार प्रयास तो करो।’’ नागमती ने समझाने का प्रयास किया।

‘‘मैं ऐसा नहीं कर सकती। वह मुझे मूर्ख समझेगा। शायद पागल ही।’’ मैंने मना करते हुए कहा।

‘‘वह तुम्हें पागल क्यों समझेगा? वह भी तो तुमसे मिलने को व्याकुल हो रहा होगा।’’ नागमती ने भोलेपन से कहा।

‘‘क्या पता?’’

‘‘क्यों नहीं पता होना चाहिए तुम्हें? अभी कुछ देर पहले ही तो तुमने उससे बात की थी।’’

‘‘वह तो औपचारिक बात थी। वह फोन नंबर उसके आॅफिस का है, उस नंबर पर मैं उससे अधिक बातें नहीं करती हूं। खुलकर तो कदापि नहीं। क्या पता उस फोन का कोई एक्सटेंशन भी हो। वह अपने आॅफिस में तमाशा बनना पसंद नहीं करेगा।’’ मैंने कहा।

‘‘उफ! कैसे हो तुम लोग? हम तो हवा और बादल को भी अपने मन की पीड़ा खुलकर बता दिया करते थे, मगर तुम लोग एक-दूसरे से भी खुल कर बात नहीं कर पाते हो। मुझे आश्चर्य होता है तुम लोगों के परस्पर प्रेम पर, और संदेह भी।’’ नागमती ने रूखे स्वर में कहा।

‘‘नहीं हमारा प्रेम सच्चा है, बस, अभिव्यक्ति का माध्यम कृत्रिम है।’’ पता नहीं कैसे मैं ललित की शैली में बोलने लगी।

‘‘तो सच्चा माध्यम क्यों नहीं अपनातीं? एक ओर मेरी पीड़ा समझने का दावा करती हो और दूसरी ओर उस पीड़ा की भयावहता को अनुभव भी नहीं कर पा रही हो, यह कैसी विडम्बना है तुम्हारी?’’ नागमती ने क्षुब्ध होते हुए कहा। फिर वह आगे कहने लगी,‘‘ मुझे तुम्हारे पास आना ही नहीं चाहिए था। तुम प्रेम को बांच सकती हो लेकिन अनुभव नहीं कर सकतीं। मेरी भूल थी जो मैंने तुम्हें अपना प्रतिरूप मान लिया। इसीलिए अब मैं जा रही हूं, कभी न आने के लिए।’’ नागमती रुष्ट होते हुए बोली। 

‘‘नहीं, नहीं! तुम कहीं मत जाओ। तुम्हारे बिना मैं इस ऋतु को, इस प्रेम को और इस प्रेम की व्याकुलता को समझ ही नहीं पाऊंगी।’’ मैंने उसके जाने की कल्पना से ही घबरा उठी।

‘‘यदि तुम सचमुच यह सब समझना चाहती हो तो उठो, अपने प्रियतम से बात करो। तब तुम्हें सब कुछ अपने-आप समझ में आ जाएगा।’’

लेकिन अभी कुछ देर पहले ही तो मैंने बात की थी, फोन पर।’’ मैंने नागमती को याद दिलाया।

‘‘उस समय तुमने यह सोचते हुए बात की थी कि तुम और तुम्हारा प्रियतम एक-दूसरे से दूर हैं, लेकिन अब यह अनुभव करते हुए बात करो कि वह तुम्हारे ठीक सामने है, यहीं, इसी छत पर, बारिश की बूंदों के ठीक नीचे।’’

‘‘ठीक है, कोशिश करती हूं।’’ 

मैं उठी। मैंने मोबाईल उठाया और नागमती के कथनानुसार यह कल्पना करने का प्रयास किया कि छत पर बारिश में वह मेरे साथ भीग रहा है। कांपती उंगलियों से मैंने नंबर डायल किया। फोन कनेक्ट होते ही उसकी ‘‘हलो!’’ ने मेरी कल्पना के दृष्य को एक झटके से बदल दिया। मैंने देखा कि मैं छत पर अकेली खड़ी भीग रही हूं और ललित वहां दूर-दूर तक नहीं है। 

‘‘कैसी हो?’’ ललित पूछा।

और मानो सहसा मैं स्वयं नागमती बन गई। पता नहीं कैसे, किन्तु ‘जायसी’ की यह पंक्तियां मेरे होठों से फूट पड़ीं -  

            टप-टप बूंद परहिं जस ओला।

            बिरह पवन होई मारै झोला।।


‘‘ठीक है, मैं आ रहा हूं...इसी हफ्ते....!’’ ललित का अप्रत्याशित उत्तर मेरे मन को भिगो गया। 

.....और मैंने देखा कि ‘जायसी’ की नागमती छत की मुंडेर से टिकी मेरी ओर देख कर मुस्कुरा रही है......शायद इसलिए कि अब मैं उसमें ढल कर स्वयं को अभिव्यक्त कर चुकी थी और बारिश की बूंदें अभी भी टप-टप की ध्वनि में अपनी सार्थकता का बखान कर रही थीं।
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शनिवार, नवंबर 01, 2025

"जनसत्ता" के दीपावली विशेषांक 2025 में डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "पुनर्जागरण"

"जनसत्ता" दीपावली विशेषांक में कहानी का प्रकाशन अपने आप में अत्यंत सुखद लगता है .... इस वर्ष के विशेषांक में मेरी कहानी "पुनर्जागरण" प्रकाशित करने के लिए जनसत्ता के संपादक आदरणीय मुकेश भारद्वाज जी एवं मृणाल वल्लरी जी का हार्दिक आभार 🌹🙏🌹
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बुधवार, जुलाई 16, 2025

डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "चल चकवा वा देस को, जहाँ रैन नहिं होय" सीमा सिंह के स्वर में | Dr (Ms) Sharad Singh story - "Chal chakva va des ko, jahan rain nahi hoy" - in the voice of Seema Singh


डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी  "चल चकवा वा देस को, जहाँ रैन नहिं होय" सीमा सिंह के स्वर में | Dr (Ms) Sharad Singh story - "Chal chakva va des ko, jahan rain nahi hoy" - in the voice of Seema Singh
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सीमा सिंह जी के मधुर स्वर में सुनिए मेरी एक और कहानी "चल चकवा वा देस को, जहाँ रैन नहिं होय"। 
      सीमा जी द्वारा अपने स्वरों के सटीक उतार-चढ़ाव से जीवन्त की गई इस कहानी को आप भी सुनिए यूट्यूब में उनके चैनल "कथा-कथन" पर.....
 🔹हार्दिक धन्यवाद एवं आभार प्रिय सीमा सिंह जी 🌹🙏🌹
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बुधवार, अप्रैल 30, 2025

डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "क्या तुम पर वसंत आएगा, इला?" सुष्मिता सिंह के स्वर में | Dr (Ms) Sharad Singh story - "Kya tum par Vasant aayega Ela" - in the voice of Sushmita Singh


सुष्मिता सिंह जी के भावपूर्ण स्वर में सुनिए मेरी कहानी -
❗️ क्या तुम पर वसंत आएगा, इला ?❗️
... लोकप्रिय साहित्यिक Youtube Channel "आज सुनिए कहानी" में..👇
https://youtu.be/8dXDbrPYerM?si=mQ811uFVUvFDsQ1n

इतनी भाव प्रवणता के साथ मेरी कहानी का वाचन करने के लिए हार्दिक धन्यवाद प्रिय सुष्मिता सिंह जी 🌹🙏🌹
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गुरुवार, अप्रैल 24, 2025

डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "सोचा तो होता" सुष्मिता सिंह के स्वर में | Dr (Ms) Sharad Singh story - "Socha to hota" - in the voice of Sushmita Singh

मधुर आवाज़ की धनी सुष्मिता सिंह जी से सुनिए मेरी कहानी -
 ❗️सोचा तो होता❗️
... लोकप्रिय साहित्यिक Youtube Channel "आज सुनिए कहानी" में..👇
     सचमुच, सुष्मिता जी माहिर हैं कथा वाचन में।
 हार्दिक धन्यवाद प्रिय सुष्मिता सिंह जी 🌹🙏🌹
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डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "तुम कहां हो पुरुरवा?" सीमा सिंह के स्वर में | Dr (Ms) Sharad Singh story - "Tum kahan ho Pururava?" - in the voice of Seema Singh

सीमा सिंह जी के मधुर स्वर में सुनिए मेरी एक और कहानी "तुम कहां हो पुरुरवा?"    
      सीमा जी द्वारा अपने स्वरों के सटीक उतार-चढ़ाव से जीवन्त की गई इस कहानी को आप भी सुनिए यूट्यूब में उनके चैनल "कथा-कथन" पर.....
 🔹हार्दिक धन्यवाद एवं आभार प्रिय सीमा सिंह जी 🌹🙏🌹

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शुक्रवार, अप्रैल 18, 2025

कहानी, प्रेम न बारी ऊपजे प्रेम न हाट बिकाए, लेखिका डॉ (सुश्री) शरद सिंह, स्वर सुष्मिता सिंह

लोकप्रिय साहित्यिक Youtube Channel "आज सुनिए कहानी" में मधुर आवाज़ की धनी सुष्मिता सिंह जी से सुनिए मेरी कहानी 👇प्रेम न बारी ऊपजे, प्रेम न हाट बिकाए 👇
     सचमुच, सुष्मिता जी कहानी के पात्रों की मनोदशा को पकड़ने में माहिर हैं।
 हार्दिक धन्यवाद प्रिय सुष्मिता सिंह जी 🌹🙏🌹

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