शुक्रवार, जनवरी 18, 2019

चर्चित कथाकार और स्त्री-विमर्शकार लेखिका शरद सिंह की नई किताब ' थर्ड जेंडर विमर्श '

Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh
यही है मेरी नई किताब "थर्ड जेंडर विमर्श" ... इसकी सामग्री आपको चौंकाएगी और समाज के उस पक्ष से परिचित कराएगी जिसे अभी आप ठीक से नहीं जानते हैं और जानते भी हैं तो सिर्फ़ किन्नर, हिजड़ा, छक्का जैसे संबोधनों तक.... यदि जानना चाहते हैं अधिक तो मेरी इस किताब को एकबार जरूर पढ़िए......
-  डॉ शरद सिंह

  
Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh (Book Cover)

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सामयिक प्रकाशन
थर्ड जेंडर विमर्श - डॉ. शरद सिंह
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गुरुवार, जनवरी 10, 2019

शब्दों का उत्सव ... ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203---नाला सोपारा’ - संपादकीय - शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh, Editor & Author
‘‘सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के जनवरी - मार्च 2019 अंक में मेरा संपादकीय ...
 
("सामयिक सरस्‍वती", कार्यकारी संपादक Sharad Singh, संपादक Mahesh Bhardwaj जनवरी - मार्च 2019 अंक )


संपादकीय
शब्दों का उत्सव ... 

‘पोस्ट बॉक्स नं. 203---नाला सोपारा’
- शरद सिंह
शब्दों का उत्सव ज़ारी है। वर्ष 2018 ने जाते-जाते सामयिक प्रकाशन को जो उपहार दिया वह न केवल सामयिक प्रकाशन वरन् हिन्दी के समस्त साहित्य सर्जकों के लिए उत्सवी माहौल पैदा कर रहा है। हिन्दी की वरिष्ठ लेखिका चित्रा मुद्गल को वर्ष 2018 का प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलना उस लेखकीय प्रतिबद्धता का सम्मान है जो समाज के शोषित पक्ष की निरंतर पैरवी कर रही है। चित्रा जी की सत्यनिष्ठा और सादगी यह कि साहित्य अकादमी पुरस्कार की घोषणा होने पर उन्होंने कहा कि ‘‘यह वंचित तबकों के प्रति मेरी सामाजिक प्रतिबद्धता और उससे उपजे मेरे साहित्य का सम्मान है।’’
हिन्दी साहित्य जगत् का एक विश्वस्त नाम हैं चित्रा मुद्गल। एक लम्बा जीवन-अनुभव ही नहीं वरन् अनवरत साहित्यिक प्रतिबद्धता चित्रा मुद्गल को दो लेखकीय पीढ़ियों के बीच सेतु के समान स्थापित किए हुए है। उन्होंने समय की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए समकालीन धरातल से जिस प्रकार स्वयं को जोड़े रखा है, वह युवा ही नहीं वरन् अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत कहा जा सकता है। व्यक्तिगत जीवन के उतार-चढ़ाव के झंझावातों से गुज़रते हुए परपीड़ा को आत्मसात करके उसे शब्दों में उतारना और औपन्यासिक विन्यास में पिरो कर सर्वजन के समक्ष रखना असीम धैर्य, गहन संवेदना और अभिव्यक्ति की सक्षमता का द्योतक है। ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203-- नाला सोपारा’ जैसा उपन्यास यूं ही नहीं लिखा जा सकता है। इस उपन्यास के कथानक को चुनने और फिर कथानक को उपन्यास के रूप में ढालने के बीच जिस मनोदशा से चित्रा जी गुज़री हैं उसे उनके साक्षात्कारों से जाना और समझा जा सकता है, फिर भी बहुत कुछ छूटा हुआ है अभी भी उनके भीतर। कोई भी व्यक्ति अपनी संवेदना को अक्षरशः बयां नहीं कर सकता है लेकिन उसी संवेदना को उसकी रचना के पात्रा रेशा-रेशा बयां कर देते हैं।
‘‘मैं पेड़ नहीं बनना चाहता, मैं पेड़ का मतलब होना चाहता हूं।’’ नोबेल पुरस्कार विजेता टर्किश लेखक ओरहान पामुक जब यह कहते हैं तो वे पेड़ को जी रहे होते हैं। यही तो है कि जब बात किसी अनुभव के पर्याय बनने की होती है तो आवश्यक हो जाता है उसमें ढल कर उसी के जैसे हो जाया जाए। यहां ध्यान देने की बात है कि ‘वह नहीं’ अपितु ‘उसी के जैसे’। वही हो जाने में अभिव्यक्ति उसी की तरह अवरुद्ध हो जाएगी, मौन रह जाएगी जबकि उसका पर्याय बनने में उसकी पीड़ा, उसकी प्रसन्नता, उसकी संवेदना और उसके स्वप्नों को बयां किया जा सकता है। शहद के छत्ते से शहद की बूंदें कभी अपने-आप नहीं रिसती हैं। शहद की मिठास तक पहुंचने के लिए छत्ते के चक्रव्यूह को भेदना पड़ता है। ठीक इसी तरह पात्रों को चुनना और उन पात्रों के मनोभावों के तह तक पहुंचने के लिए उनके परिवेश को भेदना जरूरी हो जाता है। जो कथाकार जितनी सजगता और तन्मयता से अपने पात्रों के गोपन तक पहुंच जाता है और उसे उसके अनुरुप अभिव्यक्ति दे देता है, वही कालजयी कथाएं रचता है। ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203---नाला सोपारा’ जैसी कालजयीकृति को पढ़ना एक उपेक्षित समाज से तादात्म्य स्थापित कर लेने के समान है।
‘पो. बॉक्स नं. 203- नालासोपारा’ हिन्दी साहित्य में ऐसा पहला उपन्यास है जो किसी किन्नर की उस भावना से साक्षात्कार कराता है जो उसे उसके जैविक परिवार से सदैव जोड़े रखता है। यह उपन्यास समाज में किन्नरों की मनोदैहिक उपस्थिति को रेखांकित करता है। ‘पो. बॉक्स नं. 203- नालासोपारा’ की लेखिका चित्रा मुद्गल ने अपनी सिद्धहस्त लेखनी से एक मां और उसके किन्नर पुत्रा के परस्पर प्रेम को जिस मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है, वह अद्भुत है। ‘एक ज़मीन अपनी-सी’, ‘आवां’, ‘गिलिगडू’ जैसे सामाजिक सरोकारों के बहुचर्चित उपन्यासों की लेखिका चित्रा मुद्गल समाजसेवा से जुड़ी हैं। उनके ज़मीनी अनुभव उनके उपन्यासों को दस्तावेज़ी बना देते हैं। उनका उपन्यास ‘पो. बॉक्स नं. 203- नालासोपारा’ भी अपने आप में यथार्थ का एक ऐसा दस्तावेज़ सामने रखता है जिसका एक-एक शब्द पढ़ते हुए कभी रोमांच होता है तो कभी सिहरन, तो कभी मानसिक उद्वेलन। लेखिका ने अपने उपन्यास के माध्यम से यह प्रश्न उठाया है कि यदि कोई शिशु लिंग दोष के साथ जन्म लेता है तो भला उसमें इसका क्या दोष? 
आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि प्रत्येक किन्नर अपने समुदाय के बीच पला-बढ़ा होता है इसलिए उसकी सारी संवेदनाएं, सारे सरोकार अपने समुदाय के प्रति ही रहते हैं किन्तु इस मिथक को तोड़ते हुए चित्रा मुद्गल ने यह पक्ष  उजागर किया है कि माता-पिता की स्मृतियां ठीक उसी तरह उनके साथ भी रहती हैं जैसे कि किसी सामान्य व्यक्ति के साथ। ‘नाला सोपारा’ एक ऐसे किन्नर की कथा है जो अपनी मां का पता लगाकर उसके साथ पत्रा व्यवहार करता है। मां भी परिवार से छिपा कर अपने बेटे को उसके पत्रों के उत्तर देती है। लेकिन वह पत्राचार को गोपनीय रखती है। उसे इस बात का भय है कि यदि लोगों को उसकी किन्नर संतान का पता चल गया तो उसकी दूसरी संतानों के वैवाहिक संबंध में भी रुकावट आ जाएगी। उपन्यास पत्रा शैली में है। इस उपन्यास में कई चुभते हुए प्रसंग हैं जो मन-मस्तिष्क को झकझोरने में सक्षम हैं। सरकार ‘थर्ड जें़डर’ को आरक्षण दिए जाने पर विचार कर रही होती है तब उपन्यास का किन्नर नायक कहता है कि ‘‘सरकार को चाहिए कि वह किन्नरों के लिए आरक्षण के बजाय मां-बाप को दंडित करने का प्रावधान करे। अगर भ्रूण के लिंग परीक्षण करने पर आप सजा का प्रावधान कर सकते हैं तो ऐसे मां-बाप को क्यों नहीं दंडित किया जाना चाहिए जो अपने किन्नर बच्चों को कहीं छोड़ आते हैं या फिर किन्नरों को दे देते हैं?’’
बाज़ारवाद, भू-मण्डलीकरण अथवा अपसंस्कृति का विश्लेषण एवं विवेचन करते समय समाज का वह हिस्सा छूट जाता है जिसके जीवन पर चिन्तन करना सदियों पहले शुरू कर दिया जाना चाहिए था। समाज का अभिन्न हिस्सा ही तो हैं किन्नर, और उन्हें भी समाज में सम्मान एवं समानता पाने का अधिकार है।
चित्रा जी के अब तक लगभग तेरह कहानी संग्रह, तीन उपन्यास, तीन बाल उपन्यास, चार बाल कथा संग्रह, पांच संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. बहुचर्चित उपन्यास ’आवां’ के लिए उन्हें व्यास सम्मान से भी सम्मनित जा चुका है। इसके अलावा उन्हें इंदु शर्मा कथा सम्मान, साहित्य भूषण, वीर सिंह देव सम्मान आदि प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार इनमें सबसे ताज़ा सम्मान है।
कथाएं काव्य से अधिक मुखर हो कर तत्कालीन परिवेश के रंगों को साहित्य में उभार देती हैं, इसीलिए काव्य में भी कथाएं रची गईं। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ कथात्मक महाकाव्य हैं। बुंदेलखण्ड के कवि जगनिक ने ‘‘आल्हाखण्ड’’ में आल्हा-ऊदल के वीरता के किस्से काव्यबद्ध किए हैं। बुंदेली लोककवि ईसुरी ने भी काव्य में कथा रची। लेकिन वह है प्रेयसी ‘रजऊ’ के प्रति उनकी प्रेमकथा। जिसका विन्यास कथात्मक न होते हुए भी प्रेमकथा के दृश्य उकेरता चलता है। विगत दिनों एक किताब आई है ‘‘लोककवि ईसुरी’’ जिसके लेखक हैं श्यामसुंदर दुबे। इस पुस्तक को ईसुरी के काव्य-साहित्य की पुनर्व्याख्या कहा जा सकता है। ईसुरी ने जिस तरह का काव्य रचा उसे ‘फाग’ कहा जाता है। ईसुरी ने फागों की एक विशिष्ट शैली  ‘चौघड़िया फाग’ को जन्म दिया। वहीं यह भी माना जाता है कि ईसुरी ने अपनी प्रेमिका ‘रजऊ’ को अपने कृतित्व में अमर कर दिया। 
जो तुम छैल छला हो जाते परे उंगरियन राते
मां पांछत गालन खों लगते कजरा देत दिखाते
घरी-घरी घूंघट खोलत में नजर के सामें राते
ईसुर दूर दरस के लानें ऐसे कायं ललाते।
वसंत निरगुणे ने लिखा है कि ‘‘मेरी दृष्टि में ईसुरी ने रजऊ में उस विराट स्त्रा के दर्शन कर लिए थे, जिसे ब्रह्मा ने पहली बार रचा था। यह ईसुरी का लोक रहा जिसमें रजऊ बार-बार आती है और स्त्रा की नई व्याख्या ईसुरी के छंद में उतरती जाती है।’’ वस्तुतः ईसुरी के काव्य में स्त्रा के स्वरूप को समझे बिना ईसुरी के काव्य को समझा नहीं जा सकता है। लेकिन इस समझ की फ़़ुरसत किसे है? हिन्दी काव्य से पारम्परिक छंद ही धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। कभी-कभी लगता है मानो हमारे लोक काव्य से ईसुरी जैसे कवि विलुप्ति के कगार पर जा पहुंचे हैं और छंदमुक्त कविता को ‘टूल’ मानकर यथार्थ की दुंदुभी बजाने का भ्रम पाले हुए कवियों का हुजूम काव्य की सरसता को सोखता जा रहा है। छंदमुक्त कविता में भी सरसता हो सकती है, बशर्ते वह नारे के सपाटपन से आगे बढ़ कर उतार-चढ़ावमय ध्वन्यात्मकता को अपनाए।
कथा के प्रति आश्वस्ति और काव्य के प्रति चिंतन के साथ ही ‘सामयिक सरस्वती’ की ओर से सभी रचनाधर्मियों एवं सुधी पाठकों को नववर्ष 2019 की हार्दिक शुभकामनाएं!
और अंत में एक कामना, मेरी कविता के रूप में-
नए साल की धूप
जब-जब माथे को चूमे
तो लिख जाए -
एक कथा, एक कविता, एक लेख
उनके नाम
जिन तक कभी पहुंची ही नहीं धूप।
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Samayik Saraswati Jan.-March 2019 Cover

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सोमवार, दिसंबर 10, 2018

सागर पाठक मंच में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ शरद सिंह ने 'नींद क्यों रात भर नहीं आती' उपन्यास की विशेषताओं पर प्रकाश डाला

 
Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

दिनांक 09.12.2018 को साहित्य अकादेमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद भोपाल के स्थानीय उपक्रम सागर पाठक मंच के तत्वाधान में उपन्यासकार सूर्यनाथ सिंह के उपन्यास "नींद क्यों रात भर नहीं आती" पर चर्चा-गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में मैंने उपन्यास की विशेषताओं पर प्रकाश डाला।  मैंने कहा कि-‘‘ पारम्परिक किस्सागोई की उम्दा मिसाल है सूर्यनाथ का उपन्यास। एक कहानी में एक से अधिक कहानियों का जुड़ते जाना किस्सागोई शैली की खूबी है। जब इस शैली का प्रयोग उपन्यास में किया जाता है तो जोखिम बढ़ जाते हैं।  सूर्यनाथ सिंह ने अपने उपन्यास 'नींद क्यों रात भर नहीं आती' में इस जोखिम को उठाते हुए किस्सागोई शैली का बेहतरीन प्रयोग किया है। यही इस उपन्यास की विशेषता भी है। लेखक की अन्वेषक दृष्टि से प्रस्तुत कहानियों ने उपन्यास की समसामायिकता को जिस ढंग से उभारा है, वह उल्लेखनीय है। उपन्यास लेखन में नए प्रयोग उपन्यास की महत्ता को बढ़ा देते हैं।’’ 
  आयोजन का आरम्भ हुआ मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह की सस्वर सरस्वती वंदना से, तदोपरांत पाठकमंच सागर इकाई के संयोजक श्री उमाकांत मिश्र जी के कुशल संचालन में समीक्षा आलेखों का वाचन किया गया। 🏵️ मुझे मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार साझा करने का आत्मीय अवसर देने हेतु हार्दिक धन्यवाद सागर पाठक मंच एवं बड़े भाई उमाकांत मिश्र जी 🙏 📰आज समाचारपत्रों ने आयोजन को जिस प्रमुखता से स्थान दिया है उसके लिए मैं सागर मीडिया की हृदय से आभारी हूं 🙏
Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018
Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

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Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

Dr Varsha Singh as a Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

Dr Varsha Singh as a Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

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Dr Varsha Singh as Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

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Dr Varsha Singh as Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

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Dr Sharad Singh as Chief Guest and Dr Varsha Singh as Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018

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Dr Varsha Singh as Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018
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मंगलवार, दिसंबर 04, 2018

लोक कथाओं का महत्व - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University Sagar on Tribal Literature held on 03.03 2017
लोक कथाओं का महत्व 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

(‘प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास’ तथा ‘खजुराहो की मूर्तिकला में सौंदर्यात्मक तत्व’ आदि विभिन्न विषयों पर पचास से अधिक पुस्तकों की लेखिका, इतिहासविद्, साहित्यकार।)
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व्याख्यान की संक्षेपिका :
 किसी भी क्षेत्र के विकास में उस क्षेत्र की संस्कृति की अहम् भूमिका रहती है। संस्कृति में भाषा, बोली आदि के साथ-साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, लोकसाहित्य, लोकविश्वास,जनजीवन की परम्पराएं एवं लोकाचार निबद्ध रहते हैं।
किसी भी लोकभाषा अर्थात् बोली की अपनी एक जातीय पहचान होती है। यह जातीय पहचान ही उसे अन्य भाषाओं से अलग कर के स्वतंत्र अस्तित्व का स्वामी बनाती है। पहले बोली एक सीमित क्षेत्र में बोली जाती थी किन्तु धीरे-धीरे सीमित क्षेत्र के निवासियों के असीमित फैलाव ने बोली को भी असीमित विस्तार दे दिया है। इसलिए आज बोली का महत्व मात्र उसके क्षेत्र विशेष से जुड़ा न हो कर पूरी तरह से जातीय गुणों एवं जातीय गरिमा से जुड़ गया है। 
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University Sagar on Tribal Literature held on 03.03. 2017

प्रत्येक लोकभाषा का अपना अलग साहित्य होता है जो लोक कथाओं, लोक गीतों, मुहावरों, कहावतों तथा समसामयिक सृजन के रूप में विद्यमान रहता है। अपने आरंभिक रूप में यह वाचिक रहता है तथा स्मृतियों के प्रवाह के साथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रवाहित होता रहता है।
 किसी भी संस्कृति के उद्गम के विषय में जानने और समझने में वाचिक परम्परा की उस विधा से आधारभूत सहायता मिलती है जिसे लोककथा कहा जाता है। लोककथाएं वे कथाएं हैं जो सदियों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी और दूसरी पीढ़ी से तीसरी पीढ़ी के सतत क्रम में प्रवाहित होती चली आ रही हैं। यह प्रवाह उस समय से प्रारम्भ होता है जिस समय से मनुष्य ने अपने अनुभवों, कल्पनाओं एवं विचारों का परस्पर आदान-प्रदान प्रारम्भ किया। लोकसमुदायों में लोककथाओं का जो रूप आज भी विद्यमान है, वह लोककथाओं के उस रूप के सर्वाधिक निकट है जो विचारों के संप्रेषण और ग्रहण की प्रक्रिया आरम्भ होने के समय रहा होगा। लोककथाओं में मनुष्य के जन्म, पृथ्वी के निर्माण, देवता के व्यवहार, भूत, प्रेत, राक्षस आदि से लेकर लोकव्यवहार से जुड़ी कथाएं निहित हैं।
लोक कथाओं का जन्म उस समय से माना जा सकता है जब मनुष्य ने अपनी कल्पनाओं एवं अनुभवों को कथात्मक रूप में कहना शुरू किया। लोककथाएं लोकसाहित्य का अभिन्न अंग हैं। हिन्दी में लोक साहित्य शब्द अंग्रेजी के ‘फोकलोर’ के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होता है। अंग्रेजी में ‘फोकलोर’ शब्द का प्रयोग सन् 1887 ई. में अंग्रेज विद्वान सर थामस ने किया था। इससे पूर्व लोक साहित्य तथा अन्य लोक विधाओं के लिए ‘पापुलर एंटीक्वीटीज़’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। भारत में लोक साहित्य का संकलन एवं अध्ययन 18 वीं शती के उत्तरार्द्ध में उस समय हुआ जब सन् 1784 ई. में कलकत्ता हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश सर विलियम जोन्स ने ‘रॉयल एशियाटिक सोसायटी’ नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था के द्वारा एक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया जिसमें भारतीय लोक कथाओं एवं लोक गीतों को स्थान दिया गया। भारतीय लोककथाओं के संकलन का प्रथम श्रेय कर्नल जेम्स टॉड को है जिन्होंने सन् 1829 ई. में ‘एनल्स एण्ड एंटीक्वीटीज़ ऑफ राजस्थान’ नामक ग्रंथ लिखा। इस
ग्रंथ में उन्होंने राजस्थान की लोक कथाओं एवं लोक गाथाओं का संकलन किया।
         कर्नल टॉड के
ग्रंथ के बाद कुछ और ग्रंथ आए जिनमें भारतीय लोककथाओं का अमूल्य संकलन था। इनमें प्रमुख थे- लेडी फेयर का ‘ओल्ड डेक्कन डेज़’ (1868), डॉल्टन का ‘डिस्क्रिप्टिव इथनोलॉजी अॅाफ बेंगाल’ (1872), आर.सी. टेंपल का ‘लीज़ेण्ड ऑफ दी पंजाब’ (1884), मिसेस स्टील का ‘वाईड अवेक स्टोरीज़’ (1885) आदि। वेरियर एल्विन की दो पुस्तकें ‘फॉकटेल्स ऑफ महाकोशल’ तथा ‘मिथ्स ऑफ मिडिल इंडिया’, रसेल एवं हीरालाल की ‘कास्ट्स एण्ड ट्राइब्स ऑफ साउथ इंडिया’, थर्सटन की ‘दी ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स ऑफ नार्थ-वेस्टर्न प्राविन्सेस एण्ड कास्ट्स ऑफ अवध’, इंथोवेन की ‘ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स ऑफ बॉम्बे’ आदि पुस्तकों में क्षेत्रीय लोककथाओं का उल्लेख किया गया। इन आरम्भिक ग्रंथों के उपरान्त अनेक ग्रंथों में क्षेत्रीय लोककथाओं को सहेजा और समेटा गया। 
Adivasi - Bharat ke Adivasi Kshetron ki Lok Kathayen - Book of Dr Sharad Singh .
उदाहरण के लिए यदि कोई लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने जाता है और वहां उसका सामना शेर से हो जाता है, तो अपने प्राण बचा कर गांव लौटने पर वह शेर के खतरे को इस उद्देश्य से बढ़ा-चढ़ा कर कहेगा कि जिससे जंगल में जाने वाले अन्य व्यक्ति सावधान और सतर्क रहें। शेर से सामना होने तथा शेर के प्रति भय का संचरण होने पर सहज भाव से किस्सागोई आरम्भ हो जाती है। यह स्थापित किया जाने लगता है कि अमुक समय में अमुक गांव के अमुक व्यक्ति को इससे भी बड़ा और भयानक शेर मिला था। जिसे उस व्यक्ति ने अपनी चतुराई से मार भगाया था। वनों के निकट बसे हुए ग्राम्य जीवन में इस प्रकार की कथाओं का चलन निराशा में आशा का , भय में निर्भयता का और हताशा में उत्साह का संचार करता है।
    वस्तुतः लोककथा वह कथा है जो लोक द्वारा लोक के लिए लोक से कही जाती है।    इसका स्वरूप वाचिक होता है। इसमें वक्ता और श्रोता  अनिवार्य तत्व होते हैं। वक्ता एक होता है किन्तु श्रोता एक से अनेक हो सकते हैं। इन कथाओं को गांव की चौपालों, नीम या वटवृक्ष के नीचे बने हुए चबूतरों पर, घर के आंगन में चारपरई पर लेटे हुए अथवा अलाव को धेर कर बैठे हुए कहा-सुना जाता है। ‘कथा’ शब्द का अर्थ ही यही है कि ‘जो कही जाए’। जब कथा कही जाएगी तो श्रोता की उपस्थिति स्वतः अनिवार्य हो जाती है। लोककथा को कहे और सुने जाने के मध्य ‘हुंकारू’ की अहम भूमिका होती है। ‘हुंकारू’ कथा सुनते हुए श्रोता द्वारा ‘हूं’-‘हूं’ की ध्वनि निकालने की प्रक्रिया होती है। जिसके माध्यम से श्रोता द्वारा यह जताया जाता है कि  वह सजग है और चैतन्य हो कर कथा सुन रहा है। साथ ही  कथा में उसकी उत्सुकता बनी हुई है। इस ‘हुंकारू’ से कथा कहने वाले को भी उत्साह मिलता रहता है। उसे भी पता चलता रहता है कि श्रोता उसकी कथा में  रुचि ले रहा है, चैतन्य हो कर सुन रहा है, सजग है तथा कथा में आगे कौन -सा घटनाक्रम आने वाला है इसके प्रति उत्सुक है। लोककथा की भाषा लोकभाषा और शैली प्रायः इतिवृत्तात्मक होती है।

Books of Dr Sharad Singh on Indian Tribal Life & Culture
लोककथाओं के प्रकार :
लोककथाओं में विषय की पर्याप्त विविधता होती है। इन कथाओं के विषय को देश, काल परिस्थिति के साथ ही कल्पनाशीलता से विस्तार मिलता है। लोककथाओं के भी विषयगत कई प्रकार हैं-
1. साहसिक लोककथाएं - इस प्रकार की कथाओं में नायक अथवा नायिका के साहसिक अभियानों का विवरण रहता है।
2. मनोरंजनपरक लोककथाएं- इन कथाओं में हास्य का पुट समाहित रहता है।
3. नीतिपरक लोककथाएं- वे कथाएं जो जीवन सही ढंग से जीने की शिक्षा देती हैं ,
4. कर्मफलक एवं भाग्यपरक लोककथाएं- इन कहानियों में कर्म की प्रधानता अथवा कर्म के महत्व को स्थापित किया जाता है। , 
5. मूल्यपरक लोककथाएं- जीवन में मानवीय मूल्यों के महत्व को स्थापित करती हैं।
6. अटका लोककथाएं- वे लोककथाएं जिसमें एक पात्र किसी रहस्य के बारे में जिज्ञासा प्रकट करता और दूसरा पात्र रहस्य को सुलझा कर उसकी जिज्ञासा शांत करता। 
7. धार्मिक लोककथाएं- लोकजीवन में धार्मिक मूल्यों के महत्व को रेखांकित करती है।

लोककथा और मानवमूल्य :
मानव जीवन को मूल्यवान बनाने की क्षमता रखने वाले गुणों को मानव मूल्य कहा जाता है। आज मूल्य शब्द का प्रयोग सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक आदि सभी क्षेत्रों में समान रूप से व्यवहार के लिए होने लगा है। मूल्य शाश्वत व्यवहार है। इसका निर्माण मानव के साथ-साथ हुआ है। यदि इसका अंत होगा तो फिर सभ्यता के साथ मानवता भी समाप्त हो जायेगी। ‘मूल्य’ उन्हीं व्यवहारों को कहा जाता है जिनमें मानव जीवन का हित समाविष्ट हो, जिनकी रक्षा करना समाज अपना सर्वाच्च कर्त्तव्य मानता है। मूल्य परम्परा का प्राण तत्त्व है। ये जीवन के आदर्श एवं सर्वसम्मत सिद्धान्त होते हैं। मूल्यों को अपनाकर जाति, धर्म और समाज को, मानव जीवन को सुन्दर बनाने का प्रयास किया जाता है।
मूल्य सामाजिक मान्यताओं के साथ बदलते भी रहते हैं, किन्तु उनमें अन्तर्निहित मंगल कामना और सार्वजनिक हित की भावना कभी तिरोहित नहीं होती। नए परिवेश में जब पुरानी मान्यताएं कालातीत हो जाती हैं तो समाज नयी मान्यताओं को स्वीकार कर लेता है और वे ही मान्यताएं ‘मूल्य’  बन जाती हैं। पुरातन काल में जीवन मूल्यों के रूप में श्रद्धा, आस्था, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को स्वीकार किया गया है। वहीं नवीन मूल्यों में सत्य, अहिंसा, सहअस्तित्व, सहानुभूति, करुणा, दया आदि आते हैं।
लोक कथाएं मानव मूल्यों पर ही आधारित होती हैं और उनमें मानव-जीवन के साथ ही उन सभी तत्वों का विमर्श मौजूद रहता है जो इस सृष्टि के आधारभूत तत्व हैं और जो मानव-जीवन की उपस्थिति को निर्धारित करते हैं। जैसे- जल, थल, वायु, समस्त प्रकार की वनस्पति, समस्त प्रकार के जीव-जन्तु आदि।
लोक कथाओं में मानव मूल्य को जांचने के लिए इन बिन्दुओं पर ध्यान दिया जा सकता है कि -
1.    लोक कथाएं संस्कृति की संवाहक होती हैं।
2.    लोक कथाओं की अभिव्यक्ति एवं प्रवाह मूल रूप से वाचिक होती है।
3.    इसका प्रवाह कालजयी होता है यानी यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी
   प्रवाहित होती रहती है।
4.    सामाजिक संबंधों के कारण लोककथाओं का एक स्थान से दूसरे
   स्थान तक विस्तार होता जाता है।
5.    एक स्थान में प्रचलित लोक कथा स्थानीय प्रभावों के सहित दूसरे
   स्थान पर भी कही-सुनी जाती है।
6.    लोकथाओं का भाषिक स्वरूप स्थानीय बोली का होता है।
7.    इसमें लोकोत्तियों एवं मुहावरों का भी खुल कर प्रयोग होता है जो स्थानीय अथवा आंचलिक रूप में होते हैं।
8.    कई बार लोक कथाएं कहावतों की व्याख्या करती हैं। जैसे सौंर कथा है-‘ आम के बियाओं में सगौना फूलो’।
9.    लोक कथाओं में जनरुचि के सभी बिन्दुओं का समावेश रहता है।
10.    इन कथाओं में स्त्री या पुरुष के बुद्धिमान या शक्तिवान होने के विभाजन जैसी कोई स्पष्ट रेखा नहीं होती है। कोई कथा नायक प्रधान हो सकती है तो कोई नायिका प्रधान।
11.    विशेष रूप से बुंदेली लोक कथाओं में नायिका का अति सुन्दर होना या आर्थिक रूप से सम्पन्न होना पहली शर्त नहीं है। एक मामूली लड़की से  ले कर एक मेंढकी तक कथा की नायिका हो सकती है और एक दासी भी रानी पर भारी पड़ सकती है।
12.    लोक कथाओं का मूल उद्देश्य लोकमंगल हेतु रास्ता दिखाना और ऐसा आदर्श प्रस्तुत करना होता है जिससे समाज में प्रत्येक व्यक्ति को महत्व मिल सके।
13.    कथ्य में स्पष्टता होती है। जो कहना होता है, वह सीधे-सीधे कहा जाता है, घुमा-फिरा कर नहीं।
14.    उद्देष्य की स्पष्टता भी लोक कथाओं की अपनी मौलिक विशिष्टता है। सच्चे और ईमानदार की जीत स्थापित करना इन कथाओं का मूल उद्देष्य होता है, चाहे वह मनुष्य की जीत हो, पशु-पक्षी की या फिर बुरे भूत-प्रेत पर अच्छे भूत-प्रेत की विजय हो।
15.    असत् सदा पराजित होता है और सत् सदा विजयी होता है।
16.    आसुरी शक्तियां मनुष्य को परेशान करती हैं, मनुष्य अपने साहस के बल पर उन पर विजय प्राप्त करता है। वह साहसी व्यक्ति शस्त्रधारी राजा या सिपाही हो यह जरूरी नहीं है, वह गरीब लकड़हारा या कोई विकलांग व्यक्ति भी हो सकता है।
17.    जो मनुष्य साहसी होता है, बड़ा देव उसकी सहायता करते हैं।
18. लगभग प्रत्येक गांव में एक न एक ऐसा विद्वान होता है जिसके पास सभी प्रश्नों और जिज्ञासाओं के सटीक उत्तर होते हैं। यह ‘सयाना’ कथा का महत्वपूर्ण पात्र होता है।
एक वाक्य में कहा जाए तो लोक कथाएं हमें आत्म सम्मान, साहस और पारस्परिक सद्भावना के साथ जीवन जीने का तरीका सिखाती हैं।
लोककथाओं का मूल उद्देश्य मात्र मनोरंजन कभी नहीं रहा, इनके माध्यम से अनुभवों का आदान-प्रदान, मानवता की शिक्षा, सद्कर्म का महत्व तथा अनुचित कर्म से दूर रहने का संदेश दिया जाता रहा है। इसीलिए इन कथाओं में भूत-प्रेत के भय की कल्पना और विभिन्न प्रकार के मिथक विद्यमान हैं जिससे मनुष्य ऐसे कार्य न करे जिससे उसे किसी भी प्रकार का कष्ट उठाना पड़े। इसे मनुष्यता के विरुद्ध कार्य करने वालों के लिए लोकचेतना का आग्रह कहा जा सकता है।
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Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University Sagar on Tribal Literature held on 03.03.2017


शुक्रवार, नवंबर 30, 2018

कहानियां यूं ही नहीं बनतीं - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University Sagar M.P. on Tribal Literature held on 03.03. 2017
"कहानियां यूं ही नहीं बनतीं। एक या एक से अधिक व्यक्ति, कोई विशेष घटना और उस घटना से जुड़े नाना प्रकार के विचार परस्पर मिल कर जिस कथावस्तु को गढ़ते हैं, उसी का परिष्कृत, संस्कारित रूप कहानी में ढल कर सामने आता है। कहानी अपना लेखक अथवा वाचक स्वयं चुनती है। लेखक को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि उसने कथानक को चुना है। उसके आस-पास तो ढेरों कथानक होते हैं लेकिन वह तो एक समय पर किसी एक को ही अपना पाता है। यही तो खूबी है कहानी की।" 
- डॉ. शरद सिंह 
(डॉ. हरी सिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर, मध्यप्रदेश में लोककथाओं पर सेमिनार में )

शुक्रवार, नवंबर 16, 2018

संस्मरण - 2 .. नानाजी, मां और भय की लाठी - डॉ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh, Book Author and Social Worker
मेरे नाना संत श्यामचरण सिंह हेडमास्टर रहे थे। यद्यपि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय होने के लिए मेरे जन्म से बहुत पहले ही नौकरी से तयागपत्र दे दिया था। उन्हें मोतियाबिंद था इसलिए वे ठीक से देख नहीं पाते थे किन्तु बिना देखे ही वे मुझे और मेरी दीदी वर्षा सिंह को गणित, अंग्रेजी आदि विषय पढ़ाया करते थे। स्वभाव से वे गुस्सैल थे। यदि मैं सवाल ठीक से हल नहीं कर पाती तो उन्हें बहुत गुस्सा आता। वैसे वे हम बहनों को कभी मारते थे नहीं थे। उनका मानना था कि लड़कियों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए। फिर भी हमें, विशेरूप रूप से मुझे हमेशा यह भय बना रहता था कि मुझे ठीक से पढ़ाई करने पर नानाजी बहुत मारेंगे। मुझे उनकी मार कभी नहीं पड़ी लेकिन उनके भय की लाठी हमेशा मेरी आंखों के सामने खड़ी रही।
हम दोनों बहनें नानाजी की लाड़ली थीं। वे हमसे प्रेम भी बहुत करते थे। पढ़ाई के मामले को छोड़ दिया जाए तो उनसे हमें कभी डर नहीं लगता था। वैसे मुझे एक घटना याद है कि मैं अपनी मां डॉ विद्यावती के साथ बल्देवजी के मंदिर गई।
Baldev Tempal, Panna MP, India, Photo by Dr Sharad Singh
 बल्देवजी का प्रसिद्ध मंदिर मध्यप्रदेश के पन्ना जिला मुख्यालय में है। पन्ना मेरी जन्मस्थली है। हां तो, उस समय मैं शायद दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। मंदिर से लौटते समय मैंने मां से कुछ खरीदने की ज़िद की (सामान का स्मरण मुझे नहीं है, कोई मिठाई या खिलौना रहा होगा)। उन्होंने मना कर दिया। मैंने गुस्से में आ कर उनकी चोटी खींच दी। मां ने मेरी इस हरकत पर गुस्सा हो कर मुझे धमकाया कि वे घर पहुंच कर नानाजी से शिक़ायत करेंगी। 
Sant Shyam Charan Singh

घर पहुंचते ही मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। मैं जा कर पलंग के नीचे छिप गई। मुझे लगा कि अब मां नानाजी से शिक़ायत करेंगी और मुझे मार पड़ कर रहेगी। लगभग आधा घंटा मैं वहां छिपी रही। फिर मां ने ही मुझे पुकारा-‘‘पलंग के नीचे से निकल आ, तुझे कोई कुछ नहीं कहेगा!’’
यानी मां ने मुझे पलंग के नीचे छिपते हुए देख लिया था और यही मेरी सज़ा साबित हुई कि मैं आधा घंटा पलंग के नीचे छिपी रही।
Dr Varsha Singh with her mother Dr Vidyawati Malvika
उस दिन के बाद से मैंने कभी भी मां से कोई सामान खरीदने की ज़िद नहीं की। सिर्फ़ दबे शब्दों में इच्छा ज़ाहिर करती और यदि मांग पूरी करने लायक होती तो मां अवश्य पूरी करतीं। यूं भी उन्होंने हम दोनों बहनों को कभी कोई अभाव महसूस नहीं होने दिया। एकल मातृत्व की मिसाल बन कर हम दोनों बहनों को पाला, पढ़ा
या-लिखाया।


संस्मरण - 1 .. सच कहते थे नाना जी - डॉ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh, Book Author and Social Worker
मेरे नाना ठाकुर संत श्यामचरण सिंह के कारण मुझे बचपन से अख़बार पढ़ने की आदत पड़ी। सच कहा जाए तो मैंने स्कूल की किताबें पढ़ना बाद में सीखा और अख़बार पढ़ना पहले सीख लिया था। कारण यह था कि मेरे नाना जी को मोतियाबिंद हो गया था। वे स्वतंत्रतासंग्राम सेनानी थे। पक्के गांधीवादी।
Dr Sharad Singh's Grandfather Freedom Fighter Thakur Sant Shyam Charan Singh
 आजादी की लड़ाई की धुन में उन्होंने खुद की सेहत पर ध्यान ही नहीं दिया और असमय मोतियाबिंद की चपेट में आ गए। उन दिनों मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराना जोखिम भरा माना जाता था। लिहाजा रोग बढ़ता गया और नानाजी को दिखाई देना कम हो गया। लेकिन समाचारों के मामले में वे हमेशा जागरुक रहते थे। सवेरे से अख़बार पढ़ना उनकी आदत थी किन्तु जब से दृष्टि कमज़ोर हुई, मेरी और मेरी दीदी वर्षा सिंह की यह ड्यूटी थी कि उन्हें अख़बार पढ़ कर सुनाया करें। 
उन दिनों मुझे समाचारों की तो समझ थी नहीं लेकिन अख़बार पढ़ कर सुनाना एक विशेष काम लगता था। बड़ा मज़ा आता था उस समय जब मेरी सहेलियां पूछतीं कि तुम सुबह क्या करती हो? और मैं गर्व से कहती मैं अख़बार पढ़ती हूं। पढ़ कर सुनाने वाली बात गोलमाल रहती। मेरी सहेलियां मुंह बाए मेरी ओर ताकती रह जातीं। 
Daink Aaj News Paper
उन दिनों हमारे घर वाराणसी से प्रकाशित होने वाला दैनिक ‘आज’ समाचार पत्र डाक द्वारा आया करता था। पोस्टमेन की कृपा से कभी-कभी नागा हो जाता और फिर चार अंक इकट्ठे आ जाते। फिर भी उन दिनों रेडियो के अलावा अख़बार ही समाचार के माध्यम होते थे, इसलिए बासी अख़बार भी ताज़ा ही रहता। नाना जी बड़े चाव से सुनते और जब कोई परिचित घर आता तो उससे समाचारों के बारे में चर्चा-परिचर्चा करते।
मैंने बचपन में दैनिक ‘आज’ में गाजापट्टी की समस्या के बारे में पढ़ा था। उस समय मुझे रत्तीभर पता नहीं था कि ये गाजापट्टी है कहां। आज सोचती हूं तो लगता कि हे भगवान ये समस्या तो वर्षों पुरानी है! इसी तरह के कई राजनीतिक और आर्थिक मुद्दे आज इसीलिए चौंकाते हैं कि जिस समस्या के बारे में मैंने अपने बचपन में पढ़ा था, वह आ तक बरकरार है। हम इंसान समस्याओं को शायद ख़त्म ही नहीं करना चाहते हैं।
नानाजी कहा करते थे-‘‘लड़ाई-झगड़े से कोई हल नहीं निकलता, यदि निकलता होता तो महात्मा गांधी अहिंसा का रास्ता नहीं चुनते। वे जानते थे कि शांति से निकाला गया हल स्थायी रहता है।’’
सच कहते थे नाना जी!!!


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