गुरुवार, अगस्त 12, 2021

बेताल, मैंड्रेक और फ्लेश गॉर्डन कभी भुलाए नहीं जा सकते - डॉ (सुश्री) शरद सिंह



बेताल, मैंड्रेक और फ्लेश गॉर्डन कभी भुलाए नहीं जा सकते
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रिय ब्लॉग साथियों, 
आज  बचपन की कुछ यादें ताज़ा की जाएं... आप में से जिसने भी इंद्रजाल कॉमिक्स सिरीज़ के बेताल (Phantom) मैंड्रेक (Mandrake) और फ्लेश गॉर्डन (Flash Gordon) के कॉमिक्स पढ़े होंगे, वे समझ सकते हैं कि उन कॉमिक्स ने हमें मनोरंजन के साथ ज्ञान भी दिया। मैंने तो बहुत पढ़े थे ये कॉमिक्स। आज भी गूगल पर पुराने अंक मिल जाते हैं।
फैंटम और मेंड्रेक को रचा था ली फाक ने जबकि फ्लेश गॉर्डन को एलेक्स रेमंड और डॉन मूर ने।
...जिन्होंने बेताल यानी फैंटम के कॉमिक्स पढ़े वे अपराध की दुनिया और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक मसलों, तानाशाह की हुकूमत, आफ्रीकी देशों की समस्याओं के बारे में बखूबी समझ सकते हैं। याद हैं न आफ्रिका के घने जंगल के बीच रहने वाले फैंटम, यूनीसेफ के लिए काम करने वाली नर्स डायना पामर,  फैंटम का आफ्रीकी कबीलियाई साथी गुर्रन, फैंटम का घोड़ा हीरो (तूफान) और भेड़िया डॉग डेविल। 
     ... जिन्होंने मैंड्रेक को पढ़ा, वे इस बात को समझ सकते हैं कि पश्चिमी और अफ्रीकी देश मिलकर आपराधिक वातावरण को किस तरह रोक सकते हैं और जरूरत पड़ने पर अपराध रोकने में जादू का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। आपको याद है न मैंड्रेक, लोथार, नारडा की टीम जो ज़नाडू नामक विला में रहते थे।
     ...और जिन्होंने फ्लेश गॉर्डन पढ़ा है उनके लिए आज अंतरिक्ष में बस्तियां बसाई जाने की बात कोई नई नहीं है। वे तो फ्लेश गॉर्डन के कॉमिक्स के जरिए पहले ही अंतरिक्ष बस्तियों की सैर कर चुके हैं। एस्ट्रोनॉट फ्लेश गॉर्डन, एस्ट्रोनॉट डेल ऑर्डेन और उनका रशियन साइंटिस्ट साथी हैंस ज़ारकोव।
      ... यानी इन कॉमिक्स के जरिए हमने बचपन में जिस दुनिया को जाना, समझा और जिसकी कल्पना की, उनमें से बहुत कुछ आज साकार होता भी दिख रहा है ...और कुछ के लिए लगता है कि काश! आज भी फैंटम, मैंड्रेक, फ्लेश गॉर्डन जैसी शख्स़ियत हो तो दुनिया और भी खूबसूरत बन सकती है।

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#कॉमिक्स #comics #Phantom #Mandrake #बेताल  #मैंड्रेक  #फ्लेश_गॉर्डन #Flash_Gordon #LeeFalk

रविवार, मई 30, 2021

शिखंडी | उपन्यास | डॉ शरद सिह | दैनिक प्रजातंत्र में प्रकाशित उपन्यास अंश

इंदौर से प्रकाशित दैनिक प्रजातंत्र  में आज 30.05.2021 को मेरे उपन्यास "शिखंडी" का अंश प्रकाशित हुआ है आपसे साझा कर रही हूं ....
हार्दिक धन्यवाद दैनिक #प्रजातंत्र🙏

अपनत्व मित्र मंडली | कहानी | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक नेशनल एक्सप्रेस में प्रकाशित

मित्रो, दिल्ली से प्रकाशित दैनिक "नेशनल एक्सप्रेस" ने आज मेरी कहानी "अपनत्व मित्र मंडली" प्रकाशित की है।
हार्दिक आभार #नेशनलएक्सप्रेस एवं हार्दिक आभार गिरीश पंकज जी 🙏
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कहानी
  अपनत्व  मित्र मंडल
           - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘हैलो, मैं सिया बोल रही हूं.... नहीं-नहीं राकेश जी, आप अपने आपको अकेला न समझें हम सभी आपके साथ हैं। खाने के पैकेट्स तो आपको मिल रहे हैं न? नहीं-नहीं, संकोच मत करिए हम सभी आपके मित्र भी हैं, भाई भी, बहन भी। हम सब आपका परिवार हैं। जो भी ज़रूरत हो निःसंकोच बताइए...।’’
‘‘दूधवाला नहीं आया! ओके मैं व्यवस्था करती हूं दूध का पैकेट भिजवाने की। आप चिंता न करें! मैं फिर कह रही हूं... आप अपने आप को अकेला महसूस न करें...हम हैं न आपके साथ।’’
लगभग पच्चीस मिनट बात हुई राकेश नामक उस व्यक्ति से जिसने चार दिन पहले ही अपनी बहन और माता-पिता को कोरोना में खोया था। हर व्यक्ति को अपना दुख सबसे बड़ा लगता है। व्यथित राकेश सिया से कह बैठा कि ‘‘आप मेरी पीड़ा नहीं समझ सकती हैं। जो अपनों को खोता है, वही जानता है कि अपनों के बिना जीना कितना कठिन होता है।’’ सिया ने राकेश को समझाया-बुझाया। लेकिन फोन बंद करते ही सिया की अपनी पीड़ा जाग उठी। उसे वह रात याद आ गई जिस रात उसके जीवन ने अकेलेपन की पहली दस्तक दी थी।   
  
उस रात वह गहरी नींद में थी कि उसे मां ने आवाज़ दी। वह हड़बड़ा कर उठी। लाईट जलाते समय सोफे से उसके दाएं पांव का अंगूठा जा टकराया। मगर अपनी पीड़ा की परवाह न करती हुई वह मां के कमरे की ओर लपकी। उसने मां के कमरे की भी लाईट जलाई। मां अपने हाथों से अपना सीना मल रही थी और उनका चेहरा काला-सा पड़ गया था। यह देख कर सिया बौखला उठी। उसे कुछ समझ में नहीं आया कि वह क्या करे।
‘‘कैसा लग रहा है मां? ठीक तो हैं न आप?’’ सिया ने मां के सीने पर हाथ रखते हुए पूछा।
‘‘घबराहट लग रही है। बैचेनी हो रही है। हार्टबीट भी तेज है।’’
ठीक है मां, उठो, ले पानी पियो थोड़ा। अभी सब ठीक हो जाएगा। शायद गैस्ट्रिक ट्रबल होगा।’’ सिया ने मां को सहारा दे कर बिठाया और दो घूूंट पानी पिलाया। मां की बैचेनी फिर भी कम नहीं हुई। ऐसा लगा जैसे उनकी देह शिथिल पड़ती जा रही है। यह देख सिया घबरा उठी। उसने तत्काल एम्बुलेंस के लिए फोन लगाया।
‘‘जी, इस पते पर फौरन एम्बुलेंस भेंंंंौौज दीजिए। यहां पेशेंट की हालत सीरियस है। जी, महिला पेशेंट है।’’ सिया ने अनुरोध किया। लेकिन उसे जवाब मिला कि अभी अस्पताल में एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं है। एक ही प्रायवेट अस्पताल का नंबर उसे मालूम था। अच्छा ईलाज प्रायवेट अस्पाल में ही मिल सकता है, इसी सोच के चलते सिया शहर के उस नामी अस्पताल में मां को ले जाना चाह रही थी। मगर एम्बुलेंस के बिना वहां पहुंचना संभव नहीं था। 
सिया ने घबरा कर पड़ोसी भाई साहब के घर की काॅलबेल बजाई। सुबह साढ़े तीन बजे का समय यूं भी गाढ़ी नींद का समय माना जाता है। दो-तीन बार काॅलबेल बजाने पर पड़ोसी भाई साहब की नींद खुली। घबराई हुई सिया को सामने पर कर भाई साहब भी स्थिति की गंभीरता समझ गए और उन्होंने तत्काल अपनी कार निकाली। सिया की मां को सहारा दे कर काम में बिठाया और उस प्रायवेट अस्पताल की ओर चल पड़े। 

‘‘इनका तो ऑक्सीजन लेबल बहुत कम है और हमारे पर ऑक्सीजन नहीं है। आप इन्हें किसी और अस्पताल ले जाइए।’’ नर्स ने अस्पताल के बाहर ही ऑक्सीमीटर से लेबल जांच कर टका-सा उत्तर दे दिया। 
मां की हालत गिरती जा रही थी। भाई साहब काल तेजी से दौड़ाए जा रहे थे। दूसरे निजी अस्पताल में पहुंचने पर वही उत्तर मिला कि ‘‘हमारे पास ऑक्सीजन नहीं है।’’
‘‘मेडिकल काॅलेज में है। कल ही दो टैंकर वहां आए हैं।’’ अस्पताल के गार्ड ने सिया को बताया।
एक बार फिर भाई साहब ने कार दौड़ा दी। लगभग दस किलोमीटर की दूरी तय कर के मेडिकल काॅलेज पहुंचे। न स्ट्रेचर और न व्हीलचेयर। भाई साहब ही कहीं से ढूंढ-ढांढ कर एक घिसा-पिटा स्ट्रेचर धकेल लाए।
‘‘डाॅक्टर अंदर हैं। उनका कहना है कि वे बाहर नहीं आ सकते हैं, हमें मां जी को ही उनके पास ले जाना होगा।’’ कोई विकल्प नहीं था। सिया और भाई साहब ने मिल कर मां को स्ट्रेचर पर लिटाया और डाॅक्टर की ओर चल पड़े। 
‘‘इनका ऑक्सीजन लेबल बहुत कम है। इन्हें फौरन कोविड वार्ड में भर्ती करना पड़ेगा।’’ डाॅक्टर की यह बात सुन कर सिया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मां कोरोना संक्रमित? सिया के लिए विश्वास करना कठिन था।
‘‘मगर डाॅक्टर साहब, मां को न तो बुखार आया, न खांसी, न सर्दी। यहां तक कि गंध और स्वाद में भी कोई फ़र्क़ नहीं आया फिर कोरोना कैसे संभव है? आप श्योर हैं न?’’ सिया ने अविश्वास भरे स्वर में पूछा। 
 ‘‘जी, मैं श्योर हूं! कितने परसेंट इन्फेक्शन है, यह अभी एक्सरे से पता चल जाएगा। ’’डाक्टर ने कहा। उसके लिए यह रोज़मर्रा का मामला था। इन दिनों, दिन भर में न जाने कितने कोरोना पेशेंट्स वह देख रहा था लेकिन सिया तो विश्वास नहीं कर पा रही थी कि मां को कोरोना संक्रमण हो चुका है।
‘‘ये नोसिम्टोमेटिक हैं। इसीलिए सिम्टम्स नहीं दिखे। आप इनके साथ रहती हैं तो ज़रूरी है कि आप भी अपना टेस्ट करा लीजिए।’’ डाॅक्टर ने सलाह दी।
‘‘मगर मुझे कोई प्राॅब्लम नहीं है।’’ सिया ने कहा।
‘‘फिर भी आपको टेस्ट कराना ज़रूरी है।’’ डाक्टर ने कहा और वह उठ कर कोविड वार्ड की ओर चल दिया जिस ओर मां को ले जाया जा चुका था।

एक बार कोविड वार्ड में भर्ती होने के बाद मां से मिलना संभव नहीं था। बस, मोबाईल फोन ही था जो मां-बेटी के बीच संवाद सूत्र था। सिया की रिपोर्ट भी ‘‘पाॅज़िटिव’’ आई और उसे होम आईसोलेशन में रहना पड़ा। चौदह दिन का यह समय सिया के लिए चौदह साल के समान रहा। न वह घर से बाहर निकल सकती थी और न उससे मिलने कोई आ सकता था। इसी बीच पांचवे दिन मां कोरोना के साथ संघर्ष हार गईं। फोन पर मिली इस सूचना ने सिया को मानो तोड़ कर रख दिया। होम आईसोलेशन के कारण कोई भी व्यक्ति उसके पास नहीं आ सकता था। उसके सिर पर हाथ फेर कर उसे ढाढस नहीं बंधा सकता था। घर की दीवारों के बीच अकेले रोना और अपना ही रुदन सुनना सिया की नियति बन गया था। बस, कुछ परिचित, पड़ोसी ऐसे थे जिन्होंने ऐसे कठिन समय में उसका साथ दिया। सुबह-शाम उसके घर के दरवाज़े पर खाने के पैकेट्स रख जाते। दवा समय पर ली या नहीं, फोन कर के पूछते रहते। 

चौदह दिन बाद सिया ‘‘निगेटिव’’ ज़ोन में आ गई। यद्यपि कोरोना कर्फ्यू के कारण उसका किसी से भी मिलना-जुलना या कहीं भी आना-जाना बंद था। ऐसे अकेले दौर में ही सिया को यह महसूस हुआ कि ऐसे पीड़ा से गुज़रने वाली वह अकेली नहीं है। न जाने कितने लोग होंगे जो उसकी तरह अकेलेपन से जूझ रहे होंगे। सिया ने अपने कुछ परिचितों के साथ मिल कर एक संवाद सेवा शुरू की जिसका नाम रखा ‘अपनत्व मित्र मंडली’। कोरोना के कारण अपनों को खोने वाले व्यक्तियों से संवाद करना और स्वयंसेवी संस्थाओं को उनके बारे में बता कर उनके लिए दवा, खाना, फल आदि बुनियादी वस्तुएं पहुंचाने के लिए कहना, यही काम था उसकी संवाद सेवा का। घर बैठे यदि किसी के दुख का भागीदार बन कर उसके दुख को कम किया जा सकता हो तो, इससे बढ़ कर और कोई काम नहीं हो सकता है। अब तक वह अकेली लगभग पैंतीस लोगों से संवाद कर के उनका दुख बांट चुकी है। यही काम कर के सिया अपने दुखों को भी भुलाए रखती है और दूसरों के काम आने की भावना उसमें सकारात्मकता का संचार करती रहती है। सिया से जुड़ने वाले लोग भी अब समझते जा रहे हैं कि कोरोना आपदा के इस कठिन दौर में जीवन को आसान बनाना असंभव नहीं। चौदह दिनों तक गुमसुम रहने वाली सिया के मन में आत्मघाती कदम उठाने जैसे नकारात्मक विचार भी आए थे लेकिन दूसरे के दुखों को साझा करने के प्रयास में अब वह कभी-कभी मुस्कुरा भी लेती है और हंस भी लेती है। आखिर अपनत्व से बढ़ कर दुख की दवा और कोई नहीं होती।
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#कहानी #अपनत्व #मित्रमंडली #कोरोना #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #नेशनलएक्सप्रेस

मंगलवार, फ़रवरी 16, 2021

तुम पर वसंत क्यों नहीं आया, इला | कहानी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Tum Pr Vasan Kyon Nahi Aaya Ela, Story by Dr. (Miss) Sharad Singh

कहानी

तुम पर वसंत क्यों नहीं आया, इला !

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

 

कामदेव ! क्यों सचमुच  ऐसी ही गोमटो काया और छोटे-छोटे पंखों वाा होता है, कितना नुकीा है इसका बाण ! इा ने हथेी पर रखे हुए डेढ़-दो इंच  के कामदेव की ओर देखते हुए सोचा । क्रिस्ट के इस पारदर्शी कामदेव के आरपार भी देखा जा सकता है । इा ने कामदेव के बारे में इससे पहे कभी इस प्रकार से नहीं सोचा था ।

यह कामदेव कितना ही प्यारा और सुंदर क्यों न हो ेकिन उदय को यह कामदेव उपहार के रूप में इा को नहीं देना चाहिए था । आखिर किसी अविवाहिता को ऐसा उपहार नहीं दिया जाना चाहिए, वह भी किसी सहकर्मी द्वारा । वह इसे वापस कर देगी । इा ने सोचा ।

‘इला, मेरी कमीज़ कहां है ? ज़रा देखना तो !’ भाई की आवाज़ सुन कर इला हड़बड़ा गई। उसके मन के चोर ने उससे कहा, जल्दी छिपा इस कामदेव को, कहीं भैया ने देख लिया तो? ‘तुम्हारी भाभी जाने कब सीखेगी सामान को सही जगह पर रखना, उफ ! ’... और भैया सचमुच इा के कमरे के दरवाज़े तक आ गए । इा ने कामदेव को झट से अपने ब्लाउज़  में छिपा िया ।

‘आप नहाने जाइए,मैं शर्ट निकाल देती हूं ।’ इला उठ खड़ी हुई । यद्यपि कामदेव का नुकीला बाण उसके वक्ष में चुभ रहा था ।

भैया का हो-हल्ा मचाना इा के िए कोई नई बात नहीं है । बिा नागा प्रतिदिन सवेरे से यही चींख-पुकार मची रहती है । भाभी ड़कियों के स्कू में पढ़ाती हैं । उनकी सुबह की शिफ्ट में ड्यूटी रहती है । वैसे सच तो ये है कि भाभी ने जानबूझ कर सुबह की शिफ्ट में अपनी ड्यूटी लगवा रखी है । इससे घर के कामों से बचत रहती है । भैया इतने ापरवाह हैं कि वे अपने सामान भी स्वयं नहीं सम्हा पाते हैं । िहाज़ा, घर सम्हाने से े कर भैया के समान सम्हाने तक की जिम्मेदारी इा पर रहती है । इा को अपनी इस जिम्मेदारी पर कोई आपत्ति भी नहीं है । वह अब तक में जान चुकी है कि दुनिया में हर तरह के ोग रहते हैं । भैया और भाभी भी ऐसे ही दो अग-अग प्रकार के व्यक्तित्व हैं ।

‘या रबबा ! तू कैसे सब मैनेज कर ेती है ? भैया-भाभी की गृहस्थी भी सम्हाती है और दफ्तर भी समय पर पहुंच  जाती है ... कमा करती है तू तो !’ सबरजीत कौर अकसर इा से कहा करती है । विशेष रूप से उस दिन जिस दिन सबरजीत कौर को दफ्तर पहुंच ने में देर हो जाती है । सबरजीत कौर को अकसर देर हो जाया करती है । वह अपने पति, बच्चों और सास-ससुर के असहयोग का रोना रोती रहती है ।

‘काश ! तेरे जैसी ननद मुझे मिी होती तो मैं तो उसकी ाख बाएं ेती ! ’ प्रवीणा शर्मा को इा की भाभी से ईर्ष्या होती और वह अपनी इस ईर्ष्या को सहज भाव से इा के आगे व्यक्त भी कर दिया करती।

‘तुझे क्या अपनी गृहस्थी नहीं बसानी है इला? लेकिन साथ में वे इला से यह भी पूछती रहतीं ।

‘करूंगी अग से गृहस्थी बसा कर? भैया-भाभी की गृहस्थी भी तो मेरी ही गृहस्थी है ।’ इा शांत भाव से उत्तर देती ।

हां ! अब इस उम्र में तो यही सोच  कर संतोष करना होगा ।’ इा से चिढ़ने वाी कांता सक्सेना मुंह बिचका कर कहती ।  कांता सक्सेना की  टिप्पणी सुन कर बुरा नहीं गता इा को । आखिर  शराबी  पति  की व्यथित पत्नी की टिप्पणी का क्या बुरा मानना ? यूं भी इा के  मन में  कभी अपनी निजी गृहस्थी बसाने का विचार दृढ़तापूवर्क नहीं आया । जब वह किसी के विवाह समारोह में जाती तो उसे गता कि अगर उसकी शादी होती तो वह भी इस दुल्हन की तरह सजाई जाती .... ेकिन विवाह समारोह से वापस घर आते तक उसे भैया-भाभी की गृहस्थी ही याद रह जाती ।

भैया-भाभी की गृहस्थी की जिम्मेदारी किसी ने उस पर थोपी नहीं थी वरन् इा ने स्वत: ही अपने ओढ़ ी थी । अब कोई जिम्मेदारी ओढ़ना ही चाहे तो दूसरा क्यों मना करेगा ? भाभी ने कभी मना नहीं किया । संभवत: उन्होंने कई बार मन ही मन प्राथर्ना भी की हो कि इा के मन में शादी करने का विचार न आए । इा ची जाएगी तो उनकी बसी-बसाई गृहस्थी की चूें हि जाएंगी । वे तो इस घर में आते ही आदी हो गई थीं इा की मदद की । इा को भी गता है कि उसकी भाभी उसकी मदद की बैसाखियों के बिना एक क़दम भी नहीं च सकती हैं ।

भाभी तो भाभी-भैया को भी इा के सहारे की जबदर्स्त आदत पड़ी हुई है । भैया इा से चार सा बड़े हैं ेकिन इा ने छुटपन में जब से ‘घर-घर’ खेना शुरू किया बस, तभी से भैया इा पर निर्भर होते चे गए । जब किसी व्यक्ति के नाज़-नखरे उठाने के िए मां के साथ-साथ बहन भी तत्पर हो तो परनिर्भरता का दुगुर्ण भैया में आना ही था । कई बार ऐसा गता गोया इा छोटी नहीं अपितु बड़ी बहन हो । भैया ने इा की शादी के बारे में कभी गंभीरता से विचार नहीं किया । पहे भैया पढ़ते रहे फिर नौकरी पाने की भाग-दौड़ में जुट गए । नौकरी मिते ही भैया की शादी कर दी गई । इा के बारे में कोई सोच  पाता इसके पहे मां का स्वगर्वास हो गया । मां के जाने के बाद भैया इा में ही मां की छवि देखने गे और रिश्तेदारों ने इस विचार से इा की शादी की चर्चा खु कर नहीं छेड़ी कि कहीं उन्हें ही सारी जिम्मेदारी वहन न करनी पड़ जाए । आखिर ड़की की शादी कोई हंसी-खे नहीं होती है, दान-दहेज में भी हाथ बंटाना होता है !

अपनी इस स्थिति के िए भा किसे दोष दे इ ?ा को दोष देना आता ही नहीं है। वह खुश है अपनी परिस्थितियों के साथ ।

जाने क्यों उदय  को इा का अकेापन नहीं भाता है । वह अपने साथ के द्वारा  ा के इस अकेेपन को भर देना चाहता है । जब से उदय  स्थानान्तरित हो कर इा के दफ्तर में आया है, तभी से वह इा के व्यक्तित्व से प्रभावित हो गया । इा उदय  के बारे में अधिक नहीं जानती है और न उसने कभी जानना चाहा किन्तु उदय ने थोड़े ही समय  में इा के बारे में गभग सब कुछ जान िया । इा को इस बात का अहसास तब हुआ जब एक दिन उदय  ने इा के पास रखी कुर्सी पर बैठते हुए कहा - ‘ इा जी, आपके बारे में अगर आपके भैया-भाभी ने नहीं सोचा तो आपको चाहिए कि आप स्वयं अपने बारे में सोचें । ’

‘मैं समझी नहीं आपका आशय ? ’ इा सच मुच  नहीं समझ पाई थी कि उदय  क्या करना चाहता है । उसे अनुमान नहीं था कि उदय उसके बारे में दिन-रात सोचता रहता है ।

‘मेरा मतब यही है कि आपको घर बसाने के बारे में स्वयं विचार करना चाहिए । आप आत्मनिर्भर हैं और ऐसा कर सकती हैं ।’ उदय  ने कहा था और मौन रह गई थी इा ।

अब क शाम को दûतर से निकते समय  उदय  ने उसे छोटा-सा पैकेट पकड़ाते हुए कहा था, ‘ यह आपके िए ! वसंत के आगमन पर ! प्लीज़ मना मत करिएगा । ’

घर आ कर इा ने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर के धड़कते दि पर काबू पाते हुए उस पैकेट को खो कर देखा । क्रिस्ट का बना हुआ एक नन्हा-सा कामदेव था पैकेट में । भौचक रह गई थी इा । प्रथम दृष्टि में उसे उदय की ये हरकत बुरी गी....बहुत बुरी। किन्तु रात को बिस्तर पर ेटे-ेटे उसने उदय  के बारे में गंभीरता से सोचा तो उसे गा कि उदय  को क्षमा किया जा सकता है। ेकिन क्या उसके संकेत को स्वीकार किया जा सकता है जो संकेत उसने क्रिस्ट  के कामदेव दे कर किया है ? वह तय  नहीं कर पाई । रात को नहीं, सवेरे भी नहीं ।

ा ने घर के काम जल्दी-जल्दी निपटाए और तैयार हो कर दफ्तर के िए निक पड़ी । दफ्तर से एक चौराहे पहे ही उदय  मि गया जो इा की प्रतीक्षा कर रहा था ।

‘इा रूको !’ उदय  ने इा को रूकने का संकेत करते हुए आवाज़ दी । इा ने अपनी मोपेड रोक दी ।

‘आप यहां क्या कर रहे है ? ’ इा ने उदय  से पूछा ।

‘तुम्हारी प्रतीक्षा ! मैं जानना चाहता हूं कि तुम्हारा क्या जवाब है ? ’ उदय ने उतावे होते हुए पूछा।

‘जवाब ?’ इा ने अनजान बनते हुए कहा ।

‘हां, क्या जवाब है तुम्हारा ? ’ उदय अधीर हो उठा ।

ेकिन फिर भी मैं कह रही हूं कि उम्र के जिस पड़ाव में हम हैं वहां किशोरों के उपहार मन गुदगुदा तो सकते हैं किन्तु ठोस निर्णय नहीं करने में मदद नहीं कर सकते हैं । इस उम्र में जीवन का हर निर्णय  ठोस निर्णय  होता है और वह किसी मेज पर आमने-सामने बैठ कर, गंभीरतापूवर्क चर्चा कर के ही िया जा सकता है । समझ रहे हैं न आप !’ इा ने पूरी गंभीरता के साथ कहा ।

उदय  को इा से ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी । वह अवाक् रह गया । उसने तो दो ही प्रतिक्रियाओं की आशा की थी कि या तो इा नाराज़ हो जाएगी और उसे बुरा-भा कहेगी या फिर हंस कर उसके  मुजबंध स्वीकार कर ेगी ।

दफ्तर पहुंचते-पहुंचते इा को गने गा कि कहीं उसने उदय के साथ आवश्यकता से अधिक कठोरता तो नहीं बरत दी? यदि इा के पर वसंत नहीं आया तो इसमें उदय का क्या दोष? अपने-आप पर झुंझाती हुई इा को गा कि अगर वह इसी प्रकार सोच-विचार करती हुई अपनी कुर्सी पर बैठी रहेगी तो दूसरे ोग उसकी प्रसाधन-कक्ष में उससे तरह-तरह के सवा करने गेंगे । वह कुर्सी से उठ कर प्रसाधन-कक्ष की ओर च पड़ी ।

प्रसाधन-कक्ष में पहुंचते ही इा का दर्पण में खुद से आमना-सामना हो गया । उसे ऐसा गा जैसे उसका प्रतिबिम्ब उससे पूछ रहा हो, ‘तुम पर वसंत क्यों नहीं आया, इा ज़रा सोचो ! वसंत तो किसी भी इंसान पर कभी भी आ जाता है फिर तुम पर क्यों नहीं ...?

पसीना-पसीना हो उठी, इा । उसे अपना प्रतिबिम्ब अपरिचित गने गा ...संभवत: प्रतिबिम्ब पर वसंत पूरी तरह आ चुका था जबकि इा के मन में पतझर के सूखे पत्ते बुहार कर बाहर फेंके जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

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शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2021

टीवी चैनल आज तक के बुक कैफे में मेरे उपन्यास शिखण्डी पर चर्चा - डॉ शरद सिंह

 


प्रिय ब्लॉगर साथियों,  

 देश के चर्चित टीवी चैनल 'आजतक' के साहित्यिक कार्यक्रम BookCafe 'साहित्य तक' में 'आजतक' के साहित्यमर्मज्ञ, समीक्षक जयप्रकाश पाण्डेय जी ने बहुचर्चित पांच क़िताबों में मेरे उपन्यास 'शिखण्डी' पर भी विस्तृत चर्चा की है। इस पूरी प्रस्तुति को आप यू ट्यूब की इस लिंक पर देख सकते हैं - 

https://youtu.be/pQKX4jHXCtM

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बुधवार, जनवरी 27, 2021

शिखण्डी उपन्यास | समीक्षा | समीक्षक शैलेंद्र शैल | सामयिक सरस्वती | उपन्यासकार शरद सिंह

  



Shikhandi - Novel Dr (Miss) Sharad Singh

साहित्य जगत की चर्चित पत्रिका "सामयिक सरस्वती" में मेरे उपन्यास "शिखण्डी " की  प्रतिष्ठित समालोचक शैलेंद्र शैल जी ने जिस गहनता से समीक्षा की है उसके लिए मैं उनकी हार्दिक आभारी हूं🙏

  तथा, आभारी हूं "सामयिक सरस्वती" पत्रिका की भी🙏🙏

- डॉ शरद सिंह





रविवार, जनवरी 24, 2021

छुटकी, धूप के टुकड़े और संविधान | कहानी | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | कहानी संग्रह - बाबा फ़रीद अब नहीं आते

Chhutki, Dhoop Ke Tukade Aur Samvidhan - Story of Dr (Miss) Sharad Singh

कहानी

छुटकी, धूप के टुकड़े और संविधान

- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह



यूकेलिप्टस की डालियां हवा में धीरे-धीरे डोल रही थी। जिसके कारण आंगन में फैले धूप के टुकड़े-टुकड़े फुटकते हुए प्रतीत हो रहे थे। सात बरस की छुटकी को धूप के टुकड़ों को इस तरह फुदकते  हुए देखना अच्छा लगता था। उस समय ये धूप के टुकड़े उसके काल्पनिक दोस्त बन जाते और छुटकी का मन भी उन्हीं धूप के टुकड़ों के साथ फुदकने लगता। अम्मा के पास इतनी फ़ुर्सत कभी नहीं रहती कि छुटकी का ध्यान रख सके। वह तो जब स्कूल जाने का समय होने लगता है तब अम्मा को छुटकी की सुध आती है।


‘‘चल री, पढ़ाई बंद कर और जल्दी से सपर-खोर ले। नें तो देरी हो जे हे।’’ अम्मा आवाज़ देती और छुटकी धूप के टुकड़ों का साथ छोड़कर झटपट उठ बैठती। जब वह चार बरस की थी तभी से उसने अपने हाथों नहाना-धोना सीख लिया था। अब तो कंघी -चोटी भी खुद ही कर लेती है। दरअसल, जब वह चार वर्ष की थी तभी अम्मा ने उसकी तीसरी बहन को जन्म दिया था। अम्मा की तबीयत दो-तीन माह ख़राब रही। उसी दौरान छुटकी में एक विशेष प्रकार की समझदारी आ गई। वह अपना काम तो निपटा ही लेती बल्कि अपनी छोटी बहन ननकी के बालों में भी कंघा फेर दिया करती। भले ही उसके इस अबोध प्रयास में ननकी के सिर की कोमल त्वचा खुरच जाती और ननकी बुक्का फाड़कर रोने लगती। ननकी का रुदन सुनकर अम्मा बिस्तर पर पड़ी-पड़ी चिल्ला उठती। छुटकी ननकी को चुप कराने जुट जाती। ज़िम्मेदारियों के बोझ तले छुटकी का बचपन कहीं दब-कुचल गया होता अगर इन धूप के टुकड़ों का साथ उसे न मिला होता।


स्कूल से लौटने पर उसे चाय बनानी पड़ती। अम्मा को चाय का प्याला देने के बाद बसी में चाय डाल-डाल कर ननकी को पिलानी पड़ती। ननकी जब सुड़प-सुड़प की आवाज़ें करती हुई चाय पीती तो छुटकी को उस पर बड़ा लाड आता। वह सोचने लगती कि यदि धूप के टुकड़े भी चाय पीते होते तो इसी प्रकार की आवाजें करते। उसकी यह बचकानी कल्पना उसे अजीब-सा सुख देती। तरह तरह के विचार उसके नन्हे मस्तिष्क में कौंधते रहते। कभी-कभी वह सोचती कि जब बादल की छाया को ‘बदली’ कहते हैं तो आदमी की छाया को ‘अदली’ क्यों नहीं कहते? अपने ऐसे सवाल जब कभी वह अम्मा से पूछ बैठती तो अम्मा झुंझलाकर कहती-‘‘मोय नाय पतो। अपनी मैडम जी से पूछ लइयो।’’


मैडम जी से पूछने की कभी हिम्मत नहीं हुई। अब कल की ही बात है मैडम जी ने बताया कि कल 26 जनवरी है। कल गणतंत्र दिवस मनाया जाएगा। छुटकी के मन में सवाल जागा कि ये गणतंत्र क्या होता है? वह मैडम जी से पूछना चाहती थी किंतु उसे लगा कि वह मैडम जी से पूछेगी तो वे उसे मारेंगी नहीं तो डांटेंगी ज़रूर। मैडमजी छुटकी की पट्टी पर बैठने वाली शालू को डांट चुकी है-‘‘बहुत पटर पटर करती हो, चुप बैठो।’’

शालू तो फिर भी पटर-पटर करती रहती मगर छुटकी की बोलती पूरी तरह बंद रहती है। मैडमजी के कक्षा में प्रवेश करते ही छुटकी की जुबान तालू से जा चिपकती है। 


‘‘काय री छुटकी, स्कूल जाने के नाय? काय कितने बजे पहुंचने हैं?’’ अम्मा ने हाथ-मुंह धोती छुटकी को आवाज़ लगाई।

‘‘सात बजे लों पहुंचने है अम्मां।’’ छुटकी ने हड़बड़ा कर उत्तर दिया। फिर छुटकी भीतर की ओर दौड़ पड़ी। उसने अपना गणवेश निकाला। स्कर्ट की दशा तो फिर भी ठीक थी किंतु कमीज की दशा देखकर छुटकी रुंआसी हो गई। मैडमजी ने कहा था कि सभी को धुली हुई, प्रेस की हुई ‘ड्रेस’ पहन कर आना है। कोई अगर कुछ बोलना चाहे- जैसे कविता, भाषण आदि तो बोल सकता है। फिर बूंदी बटेगी और फिर सब परेड ग्राउंड जाएंगे। कविता और भाषण क्या होते हैं, छुटकी को ठीक-ठीक पता भी नहीं है। भाषण तो शायद वही होता है जो प्राचार्य जी बोला करते हैं। वह भला छुटकी कैसे बोल सकती है? रहा सवाल कविता का, तो उसे एक ही कविता आती है-‘‘मछली जल की रानी है...’’। दूसरी कोई कविता उसे अब तक ठीक से याद नहीं हुई। यह कविता भी उसे इसलिए याद हो गई क्योंकि उसने कई-कई बार कल्पना की है कि यदि वह भी मछली होती तो छुटकी नहीं बल्कि ‘रानी’ कहलाती। छुटकी अपनी बहनों में सबसे बड़ी होकर भी अपनी बित्ता भर की कद-काठी के कारण छुटकी कहलाती है। उसने एक बार अपनी अम्मा से कहा भी था,‘‘हमाओ नाम रानी रख देओ।’’

‘‘अपने बापू से कहियो। बेई तो लिवा ले गए रहे स्कूल। पढ़बे की न लिखबे की, बाकी स्कूल के नाम से जी चुराबे खों खूबई मिल जाता है।’’ अम्मा ने हुड़क दिया था।

छुटकी सकपका कर चुप हो गई थी। लेकिन मन ही मन उसने तय कर लिया था कि जब वह अम्मा जितनी बड़ी हो जाएगी तो अपना नाम छुटकी से बदल कर रानी रख लेगी। 


शायद आज पता चल जाएगा कि गणतंत्र क्या है?- छुटकी ने सोचा। छुटकी ने जब से स्कूल में दाखिला लिया है, तीन गणतंत्र दिवस पड़ चुके हैं। प्रत्येक गणतंत्र दिवस पर वह सवेरे से स्कूल गई है किन्तु आज तक उसकी समझ में यह नहीं आ सका है कि यह गणतंत्र दिवस है क्या? पिछले साल गणतंत्र दिवस पर प्राचार्य जी ने बताया था कि इसी दिन संविधान लागू किया गया था पर यह संविधान क्या है? इस बार वह ज़रूर पता लगाएगी कि यह संविधान है क्या बला? छुटकी ने मन ही मन निश्चय किया और कमीज पर हथेली फेर-फेर कर सिलवटों को दूर करने का प्रयास करने लगी।

‘‘काय री छुटकी, इते का कर रई है? स्कूल नई जाने का?’’ अम्मा ने छुटकी को चेताया। 

‘‘अम्मा, जे बुश्शर्ट....।’’ छुटकी ने सफ़ाई देनी चाही।

‘‘हौ तो, चल, जल्दी कर!’’ अम्मा ने छुटकी की बात काटते हुए कहा,‘‘चाय पी ले, चैका में उतई ढंकी धरी है।’’


छुटकी ने फटाफट स्कर्ट और कमीज पहनी। चोटियां पहले ही गूंथ चुकी थी। जल्दी से चैका में पहुंची और ननकी की तरह सुड़प-सुड़प कर के चाय पीने लगी। चाय गरम थी। बसी ढूंढने का ‘टेम’ नहीं बचा था। गरमा-गरम चाय गले से उतारते समय छुटकी की जीभ चटाक से जल गई। आंखों में आंसू छलछला आए। किन्तु स्कूल पहुंचने की जल्दबाज़ी ने उसके कष्टों की पीड़ा की कम कर दिया। चाय ख़त्म करते ही उसने अपने दाहिने हाथ की हथेली के उल्टे भाग से अपना मुंह पोंछा और अम्मा को आवाज़ देती हुई बोली-‘‘अम्मा दरवाज़ा भिड़ा लइयो!’’

‘‘तुमई भिड़ात जइयो! मोए तो इते दम मारबे खों फ़ुरसत नइयां।’’ अम्मा ने पलट कर आवाज़ दी।


छुटकी ने बाहर निकल कर दरवाज़े के पल्ले उढ़काए और स्कूल की ओर भाग चली। उसके तेज-तेज उठते पैरों के साथ-साथ उसकी हवाई चप्पलें फटर-फटर आवाज़ें करती रही थीं। चप्पलों के कारण उड़ती धूल सरसों का तेल लगे उसके पैरों पर चिपकती जा रही थी। पर छुटकी को इसकी परवाह नहीं थी। बल्कि कहना चाहिए कि छुटकी का ध्यान अपने पैरों की ओर था ही नहीं। 


स्कूल के दरवाज़े पर पहुंचते-पहुंचते छुटकी की सांसें भर आईं। वह हांफने-सी लगी। स्कूल का छोटा-सा मैदान लड़कियों से भरा हुआ था। झंडे वाले खंबे पर झंडा गुड़ीमुड़ी कर के बंधा था। प्राचार्य जी जब रस्सी खींच कर जब झंडे को खोलते हैं तो उसमें से गेंदा, गुलाब और चांदनी के फूल गिरते हैं। छुटकी की तीव्र इच्छा हुआ करती है कि वह झंडे के नीचे जा पहुंचे और सारे के सारे फूल बटोर ले। 


आज भी घंटा बजते ही सबकी सब लड़कियां कक्षावार पंक्ति में खड़ी हो गईं। मैडमजी लोग और प्राचार्य जी झंडे वाले खंबे के पास आ कर खड़े हो गए। प्राचार्य ने रस्सी खींची। झंडा फहराने लगा। फूल ज़मीन पर आ गिरे। सब लड़कियां जोर-जोर से ‘‘जन गण मन’’ गाने लगीं। छुटकी भी सभी के साथ होंठ हिला रही थी। किन्तु उसका ध्यान ज़मीन पर बिखरे फूलों पर केन्द्रित था। उसके हाथ उन फूलों को उठा लेने के लिए कुलबुलाने लगे। इतने में गान समाप्त हो गया। प्राचार्य जी भाषण देने के लिए आगे आए। छुटकी चैकन्नी हो गई। वह ध्यान से भाषण सुनने लगी। छुटकी को लगा कि वह यह सब तो नहले भी सुन चुकी है। शायद पिछले साल या फिर इसी साल पंद्रह अगस्त को। उसी समय उसे सुनाई पड़ा प्राचार्य जी कह रहे थे कि -‘‘संविधान का मतलब होता है नियम-क़ायदा। हमें नियम-क़ायदे से रहना चाहिए। किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करना चाहिए। अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।’’


तो ये होता है संविधान, छुटकी ने सोचा। उसे खुशी हुई कि उसे संविधान का मतलब पता चल गया। उसने खुश हो कर इधर-उधर देखा। मैडमजी लोग प्राचार्य जी का भाषण सुनती हुई कुछ खुसुप-पुसुर कर रही थीं। प्राचार्य जी का भाषण समाप्त हुआ। मैंडमजी ने आगे बढ़ कर कहा। सग लड़कियां अपनी-अपनी जगह पर बैठ जाएं। अब दो-तीन लड़कियां गाना गाएंगी फिर बूंदी बांटी जाएगी। छुटकी भी बैठ गई। गाना ख़त्म होते ही बूंदी बंटनी शुरू हो गई। छुटकी की हथेली जितने छोटे-छोटे पैकेट में भरी हुई बूंदी। बूंदी ले कर सब लड़कियां परेड ग्राउंड चल दीं। छुटकी को घर लौटना था। अम्मा ने सीधे घर आने को कहा था। वह घर की ओर भागी।


घर के आंगन तक पहंुचते ही उसे ननकी का रोना और भीतर से गाली-गलौज़ की आवाज़ें एक साथ सुनाई पड़ीं। उसके लिए यह कोई नई बात नहीं थी। बाबू अम्मा को मार रहे थे। रोज़ मारते हैं, गालियां देते हैं। अम्मा रोती है, चिल्लाती है और कुटती-पिटती रहती हैं। दरवाज़े पर रोती खड़ी ननकी को छुटकी ने उठा कर कइयां ले लिया। वह आंगन के उस कोने में पहुंच गई जहां धूप के टुकड़े फुदकते रहते हैं। उसने ननकी को कइयां से उतार कर ज़मीन पर बिठा दिया। खुद भी बैठ गई। और बूंदी का पैकेट खोलने लगी। छुटकी ने आधी बूंदी ननकी की नन्हीं हथेली पर रख दी। ननकी रोना भूल कर बूंदी की ओर ताकने लगी। छुटकी ने आधी बूंदी खुद फांक ली। 


बूंदी की मिठास महसूस करती हुई छुटकी सोचने लगी कि आज प्राचार्य जी ने बताया कि संविधान का मतलब होता है, हमें लड़ाई-झगड़ा नहीं करना चाहिए। पढ़ना-लिखना चाहिए। इसका मतलब हुआ कि संविधान पढ़ने-लिखने वालों के लिए होता है, अम्मा-बाबू के लिए संविधान नहीं होता, शायद। और इन धूप के टुकड़ों के लिए? ननकी के लिए? क्या सबके लिए नहीं होता संविधान? छुटकी अपने सवालों के जाल में उलझने लगी।    

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( मेरे कहानी संग्रह ‘‘बाबा फ़रीद अब नहीं आते’’ से )