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मंगलवार, जनवरी 12, 2016

पुस्तक समीक्षा ..... समाज के यथार्थ का कोलाज़ - डॉ. शरद सिंह



Dr (Ms) Sharad Singh

पुस्तक समीक्षा


          - डॉ. शरद सिंह

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पुस्तक   - कुर्की और अन्य कहानियां 
लेखिका  - उर्मिला शिरीष   

प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज, नई दिल्ली-2

मूल्य- रुपए 250 मात्र                                          
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Kurki aur anya kahaniyan
समाज में दुख-सुख, राग-द्वेष, जीतने और हारने के अनेक रंग दिखाई देते हैं। इन्हीं रंगों के बीच अनेक ऐसी घटनाएं छिपी होती हैं जो कहानी बन कर उभरने पर मन को गहरे तक छीलती चली जाती हैं। एक स्त्री जो अपने ढंग से जीना चाहती हो, एक किसान जो अपनी ज़मीन के लिए मर-मिटना चाहता हो और एक एक आम आदमी जो परिस्थितियों के द्वारा हर क़दम पर छला जा रहा हो यदि कहानियों में इस तरह उतर आएं कि मानो आंखों के आगे  चलचित्र चल रहा हो तो ऐसी कहानियां किसी सिद्धहस्त कथाकार की कलम से ही बाहर आ सकती हैं। हिन्दी कथाजगत में उर्मिला शिरीष निर्विवाद रूप से एक ऐसी सिद्धहस्त कथाकार हैं जिनकी कहानियों के कथानक ही नहीं वरन् कथापात्रा भी बहुत जाने-पहचाने और बहुत समीप के लगते हैं क्यों कि वे आम जि़न्दगी ये कथावस्तु चुनती हैं और आमजि़न्दगी के चरित्रों को अपनी कहानियों में पात्र के रूप में पिरोती चली जाती हैं। कुर्की और अन्य कहानियांउर्मिला शिरीष का नया कहानी संग्रह है। संग्रह में छोटी-बड़ी ग्यारह कहानियां हैं। ये सभी कहानियां जीवन के ग्यारह रंगों का बयान करती हैं।

संग्रह की पहली कहानी एम. एल. सी.है जो निम्नवर्ग के तबके की एक ऐसी स्त्री की कथा है जो पारिवारिक दुर्भावना की शिकार है। वह स्त्री है खेरुनबाई जिसे उसके ही परिवारवालों द्वारा विवश किया जाता है कि वह परिवार का पेट पालने के लिए देह व्यापार करे। उसके लिए ग्राहकों का जुगाड़ किया जाता है चाहे उसे उन ग्राहाकोंसे देह संबंध स्थापित करना पसंद हो या न हो। सच तो यह है कि उन स्त्रिायों का प्रतीक है जिनकी देह पर उनका स्वयं का अधिकार नहीं होता वरन् पुरुष ही उनके जीवन के साथ-साथ उनकी देह का भी मनचाहा उपयोग करते हैं। खेरुनबाई को यह भी अधिकार नहीं है कि वह किसी से प्रेम कर सके अथवा जिसे प्रेम करती है उसे अपनी इच्छा से अपनी देह सौंप सके। वह विरोध करती है तो बदचलन कहलाती है। खेरुनबाई में स्वयं के शोषण के विरुद्ध चेतना है और वह थाने पहुंच कर बेझिझक बयान देती है कि ‘‘मेरे देवर ने मारा है और उस हरामी, कमीने ने मेरे साथ ग़लत काम भी किया है।’’ वह आगे कहती है कि  ‘‘उसने मेरे साथ बलात्कार किया है। देखो मेरे कपड़े फाड़ डाले। मेरी छातियों को पांवों से कुचला। आप जांच करवा लो! मैं झूठ नहीं बोल रही। उस हरामी को गि़रफ़्तार करो , साब! वो मुझे मार डालेगा।’’ (पृ.11)

पर थानेदार प्रतिप्रश्न करता है,‘‘क्यों मारा? कोई तो बात रही होगी और तूने ग़लत काम होने दिया?’’ (पृष्ठ.11) गोया ग़लत कामस्त्री की सहमति से किया जाता हो। उर्मिला शिरीष ने खेरुन और थानेदार के संवाद के रूप में समाज की विकृत सोच का अनावृत्त चेहरा सामने रख दिया है।

दूसरी कहानी है बिवाईयां। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाएं तेजी से बढ़ीं। कर्ज के बोझ तले दबा किसान जब जीने का कोई उपाय नहीं ढूंढ पाता है तो थक-हार कर मौत को गले लगा लेता है। कर्ज और भारतीय किसानों का साथ सदियों पुराना है। कोई हार जाता है तो कोई पीढि़यों तक कर्ज के बोझ को ढोता चला जाता है। किसान के जीवन में कर्ज बिवाईंयों की तरह होता है जो निरन्तर पीड़ा देता है किन्तु उससे बच पाना कठिन होता है। कर्ज के बोझ तले किसान की स्त्री के मन पर न जाने कितने मारक क्षण  गुज़रते हैं जब उसे अपने प्रिय गहने साहूकार के पास गिरवी रखने पड़ते हैं। उसे भी पता होता है कि अब ये गहने उसे कभी वापस नहीं मिल सकेंगे। उन्हें वापस पाने की कल्पना एक भ्रम मात्रा है। उर्मिला शिरीष ने किसान की पत्नी के पैरों की बिवाइयों और कर्ज से जीवन के ऊसर हो कर दरकने का बड़ा मार्मिक रूपक कथानक के रूप में प्रस्तुत किया है - ‘‘उसे लगा औरत की बिवाइयां चैड़ी से चैड़ी होती जा रही हैं, इतनी चैड़ी, इतनी लम्बी, इतनी गहरी कि वे बिवाइयां खेत में बदल गईं, दरारों से फटता खेत, रूखा-सूखा वीरान खेत, जिसे न पानी मिला था, न खाद, न बीज, न छाया, जिसका सौंदर्य-सौंधापन और हरीतिम खत्म हो गई थी, जिसमें परिंदों का आना ठहर गया था, जिसके बीच खड़ा हो कर न कोई हंसता था, न गाता था, न सपने देखता था।’’ (पृ.31)

जीवन की परेशानियां किस तरह व्यक्ति को ढोंगी बाबाओं के फेर में डाल देती हैं, इसका रोचक प्रस्तुतिकरण है कहानी अभिशाप। विशेषरूप से एक स्त्री जिसके भीतर मातृत्व धारण करने की अदम्य लालसा है और साथ ही अव्यक्त सामाजिक दबाव भी, वह हर उपाय आजमाने को तैयार है, भले ही ढोंग और आडम्बरधारी बाबा और तथाकथित सिद्धस्त्री माताजीही क्यों न हों। ऐसा भ्रमित मन यह भी मानने को तैयार हो जाता है कि ‘‘जहां मेडिकल साईंस और दवाएं काम नहीं करती हैं, वहां चमत्कार होते हैं। स्पर्श मात्रा से बीमारियां दूर हो जाती हैं।’’ (पृ. 46) इसी मानसिक दशा का अनुचित लाभ उठाते हैं छद्मवेशी बाबागण और माताएं।

स्थानान्तरण और भ्रष्टाचार के समीकरण के तार-तार को सामने रखने वाली कहानी है लूप लाईन। हर वह अधिकारी, कर्मचारी जो रिश्वतखोरी का लती होता है, सदा ऐसे अनुभाग में पदस्थापना चाहता है जहां उसकी रिश्वत लेने की प्रवृत्ति संतुष्ट होती रहे। मनचाहे अनुभाग की चाहत में वह सारे दांव-पेंच लड़ाता है और स्थितियों को अपने पक्ष में करके ही मानता है। वह बेलाग कहता है कि ‘‘सर! मैं आपको भी मालामाल कर दूंगा, क्या रखा है इस तरह के जीवन जीने में, आप तो जानते हैं बाढ़ पीडि़तों, भूकंप पीडि़तों के लिए कितना बजट आता है, उस बजट का कितना हिससा इस्तेमाल होता है और कितना बचाया जा सकता है-ज़मीन और प्लाट खरीद कर डाल लेना। बच्चों के काम आएंगे। बताइए, आपने बच्चों के लिए क्या किया, क्या जोड़ा, बताइए भाभी जी, इनकी आदर्श सोच को कौन पूछ रहा है। आप देख रही हैं मेरी हालत।’’

भ्रष्टाचार के पनपने और फैलने के नग्न सत्य को लूप-लाईनके माध्यम से बखूबी व्यक्त किया गया है।

असमाप्तसर्वथा अलग रंग की कहानी है। कथानायक हमीद लंगड़ा जो पेशे से दूकानदार है, जिसकी दूकान में हवा भरने, पंक्चर सुधारने व्यवस्था से ले कर,बीड़ी, सिगरेट, पान, तंबाकू, गुटखा, नमकीन, चना, साबुन जैसी वस्तुएं भी उपलब्ध रहती थीं। अतः उसकी दूकान पर ट्रकचालकों का मजमा लगा रहना स्वाभाविक था। फिर भी एक औसत  किस्म का आदमी था हमीद लंगड़ा। वह गालियां देता था, उसकी जुबान अश्लील और क्रूर थी। इन सबके होते हुए भी हमीद लंगड़ा यह मानता था कि ‘‘ औरत ही इस कायनत को चलाती है, मर्द तो केवल पीछे-पीछे चलता है।’’ (पृ. 73)

हमीद लंगड़ा के जीवन की कायनात को चलाने वाली औरत रिजवाना थी जिसकी अपनी कुछ आवश्यकताएं और आकांक्षाएं थीं। इन्हीं आकांक्षाओं ने रिजवाना को हमीद से विमुख करके उसके प्रति समर्पित कर दिया जो उसे  हर तरह से अपने योग्य लगा। ‘‘ये तो खुदा ही जानता है कि वह अंदर ही अंदर अंकुरित-पल्लवित होने वाली मोहब्बत की खुशबू थी या रिजवाना की अतृप्त वासानाओं का विस्फोट, जो उम्र के तकाजे के कारण एकाएक पहाड़ी की छाती फोड़ लावा की तरह धधक रहा था या हमीद लंगड़ा की घोर उपेक्षा और कमजोरी का प्रति-परिणाम। तिस पर घर का एकांतिक माहौल उन भावनाओं को हवा देने के लिए काफी था।’’ (पृ. 76)

परिणामतः हमीद और रिजवाना के जीवन की धुरी बन जाता है प्रिंस, और तीनों का जीवन चौंका देने वाले रास्ते पर चल पड़ता है। मानवीय संवेगों का अत्यंत बारीकी से और बहुत ही सुंदर चित्राण किया है लेखिका ने। निश्चित रूप से संग्रह की यह एक सशक्त कहानी है।

कुछ इस तरहएकाकी जीवन जीने वाले दो प्रौढ़ों की सुखांत कथा है। यदि समाज अपने-अपने जीवनसाथी खो चुके विधवा और विधुर हो चुके प्रौढ़ों को एक दूसरे के साथ जीवन जीने का भरपूर अवसर दें तो उनका जीवन भी सुखद हो सकता है, आल्हाद से भर सकता है। इस तथ्य को सबसे अधिक समझने की आवश्यकता है उन युवाओं को जो अपना जीवन अपने ढ़ंग से जीने और अपना भविष्य संवारने के लिए बुढ़ापे की ओर बढ़ चले अपने माता-पिता को अकेला छोड़ जाते हैं।

हरजानापब्लिक-शो के सहारे जीवन जीने वाले कलाकारों की संघर्ष एवं शोषण की कथा है। मानवीय मूल्यों और स्वार्थ के बीच चलने वाले दांव-पेंच पारस्परिक संबंधों को किस तरह उलझा देते हैं, यह चेहरेकहानी में  बखूबी पढ़ा और समझा जा सकता है।

निगाहेंठेकेदारों द्वारा श्रमिकों के शोषण की मार्मिक कथा है। दो समय की रोटी के लिए हाड़तोड़ मेहनत करते हैं उसी दो समय की रोटी पर कब्जा करके उन श्रमिकों को बंधुआ की स्थिति तक ला दिया जाता है।  बेरोजगारी के आलम में श्रमिकों की कोई कमी नहीं है। इस कटु सत्य को ठेकेदार हथियार की तरह प्रयोग में लाते हैं। जैसे इस कहानी में ठेकेदार कहता है-‘‘ ऐसे दयनीय बन जाते हैं कि अभी मर जाएंगे। अरे मजदूरों की क्या कमी है, गांव में फसल बरबाद हो गई। अभी कुछ खाने-करने को बचा नहीं। शहरों में दौड़- दौड़ कर आ रहे हैं। मजेरों की कमी थोड़ी न है। थोक के भाव मिल रहे हैं। ’’ (पृ. 122)

छोटे रुपहले परदों पर नाच-गाने की प्रतियोगिताओं और धारावाहिकों  ने इस तरह चकाचैंध फैला रखी है कि हर माता-पिता सेलीब्रिटीबनना चाहता है। जब वह स्वयं कुछ नहीं बन पाता है तो अपनी इच्छाओं की वेदी पर अपने मासूम बच्चों के बचपन की बलि देने को तत्पर हो उठता है। यदि बच्चे उनकी आशाओं को, उनकी चाहत को पूरा नहीं कर पाते हैं तो अपने मातृत्व की प्रकृतिदत्त कोमलता को भूल कर मां भी चिड़चिड़ा कर कहने लगती है कि - ‘‘इतना सिखाया था, इतना समझाया था। अरे, ध्यान से चार लाईनों गा लेती तो किस्मत बदल जाती, अब तू मर। यहीं पर सड़। कुछ नहीं कर सकती, तू जीवन में।’’ (पृ. 128)

संग्रह की शीर्षक कथा कुर्कीकर्ज और कर्ज लेने पर उत्पन्न होने वाली विपत्तियों का आख्यान है। ‘‘लगभग सभी गांव वाले कर्जदार थे। कुछ पुराने कर्जदार थे कुछ पीढि़यों के कर्जदार थे, कुछ नए कर्जदार थे, पर थे सभी कर्जदार। कोई साहूकार का कर्जदार था, तो कोई सहकारी समिति का, तो कोई बैंक का, तो कोई सर्राफे का।’’ (पृ. 134)

कर्ज लेने वालों को भी गोया कोई हिचक नहीं, एक विचित्रा, अबूझ आर्थिक व्यवस्था। वसूली और कुर्की का खतरा जाना-बूझा हुआ है, फिर भी कर्ज लेने में कोई कोताही नहीं। ‘‘भैया! कुल चालीस हजार बैंक से उठाया था। ब्याज सहित हो गया साठ हजार। जितना सोना था वो गिरवी रखा है बिजली का बिल बचा है अट्ठारह हजार।’’  (पृ. 135) सरकारी मुआवजे की बैसाखियां भी कम घातक नहीं होती हैं। वे कुछ कदम चलने में तो सहायता करती हैं किन्तु लंगड़ापन दूर नहीं कर सकती हैं। कर्ज के बोझ तले दबा इंसान इस आश्वासन के सहारे सुख के दो पल की बाट जोहता रहता है कि ‘‘सरकार मुआवजा देगी, चिन्ता क्यों करते हो।........सरकार कर्ज माफ करने के लिए कह रही है, सर्वे में जितनी राशि बनेगी दी जाएगी।’’

‘‘कब तलक?’’ (पृ. 138)

यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर कभी मिलता है कभी नहीं। कर्ज ले कर खरीदे गए ट्रेक्टर, बोए गए बीज  और उगाई गई फसल को कुर्की से बचा पाना जीवन-मरण के प्रश्न के समान हर पल सामने खड़ा रहता है।

कुर्की और अन्य कहानियांउर्मिला शिरीष की उन कहानियों का पठनीय संग्रह है जिनमें स्त्री विमर्श, श्रमिक विमर्श, कृषक विमर्श अर्थात् समूचे समाज का एक विचारणीय विमर्श है, एक रोचकतापूर्ण वैचारिक कोलाज़ है।

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सोमवार, जनवरी 11, 2016

पुस्तक समीक्षा ....नारद की चिन्ता उर्फ नावक के तीर - डॉ. शरद सिंह



Dr (Ms) Sharad Singh

पुस्तक समीक्षा






 - डॉ. शरद सिंह

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पुस्तक   - नारद की चिन्ता (व्यंग) 
लेखक   - सुशील सिद्धार्थ 
प्रकाशक- सामयिक बुक्स, 3320-21, जटवाड़ा, दरियागंज
              नई दिल्ली-110002
मूल्य    - रुपए 395 मात्र

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Narad ki Chinta
समकालीन परिदृश्य बेहद जटिल है। आज मानव जीवन का प्रत्येक यथार्थ उपभोक्तावादी यथार्थ बन कर रह गया है। अपनी इच्छा पूरी करने के लिए सारे नियम-कायदे ताक में रखना आम बात हो गई है। उपभोक्तावादी प्रवृत्ति ने जोड़-तोड़ के द्वारा इच्छित वस्तु अथवा स्थिति को पाना दैनिक व्यवसाय बना दिया है। जब प्रत्येक व्यक्ति अग्रघर्षण प्रेरणा शक्ति (एग्रेसिव पावर) के अपरिमार्जित रूप से प्रेरित हो कर परम अहम् (सुपर ईगो) और इदम (इड) के प्रभाव में अविवेकी चेष्टाओं को बिना झिझक अपनी जीवन शैली में आत्मसात करने लगता है तब इससे उत्पन्न दूषित मनोवृत्तियों पर चोट करने का सबसे सशक्त माध्यम होती है-व्यंग विधा। यह लेखक के लिए चुनौती के रूप में सामने आती है। एक संवेदनशील, सजग, पैनीदृष्टि रखने वाला विवेकशील लेखक ही व्यंग को उसके सही रूप में साध सकता है। सुशील सिद्धार्थ एक ऐसे ही सिद्धहस्त व्यंगकार हैं जो अपने व्यंगों के माध्यम से जहंा अव्यवस्थाओं, विषमताओं एवं दुरभि चेष्टाओं पर करारी चोट करते हैं वहीं उनका कथ्य पूरी कोमलता के साथ प्रवाहित होता है। नारद की चिन्तासुशील सिद्धार्थ का नवीनतम व्यंग संग्रह है। इसमें वे पुस्तक की भूमिका लिखते हुए भूमिका कोे आत्मश्लाघाका नाम देते हैं। जो स्वयं पर व्यंग कर सकता है वही सशक्त एवं प्रभावी ढंग से तमाम विसंगतियों पर व्यंग कर सकता है। यही से संग्रह में संग्रहीत व्यंगों के पैनेपन और चुटीलेपन का अहसास शुरू हो जाता है। 
व्यंग समाज में व्याप्त उन विसंगतियों, विषमताओं एवं विद्रूपों की ओर ध्यान आकृष्ट करता है जो मानवीय आचरण के विकारों अथवा मनोविकारों से उत्पन्न होते हैं। व्यंग लेखन एक ऐसी साहित्यिक कला है जो रोचक, आकर्षक होने के साथ ही साथ मनोचेतना पर प्रहार भी करती हैं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार-‘‘व्यंग वह है, जहां कहने वाला अधरोष्ठ में हंए रहा हो और सुनने वाला तिलमिला उठा हो और फिर भी कहने वाले को जवाब देना अपने को और भी उपहासात्मक बना लेना हो जाता हो।’’

द्विवेदी जी ने व्यंग को जहंा कटाक्ष करने का अचूक अस्त्र माना वहीं हरिशंकर परसाई ने इसे जीवन का परिचायक माना। परसाई के अनुसार जीवन मात्र अच्छाइयों से भरा हुआ नहीं है, इसमें बुराइयां भी हैं, झूठ भी है और विसंगतियां भी हैं। परसाई ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि -‘‘व्यंग जीवन से साक्षात्कार कराता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखण्डों का पर्दाफाश करता है......यह नारा नहीं है।’’ वहीं अमृत राय मानते हैं कि ‘‘व्यंग पाठक के क्रोध या क्षोभ को जगा कर प्रकारान्तर से उसे अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए सन्नद्ध करता है।’’

हिंदी साहित्य में व्यंग लेखन के क्षेत्र में अनेक उतार-चढ़ाव आए हैं। इसलिए यह क्षेत्र चुनौतियों से भरा रहा है और अक्सर व्यंग के नाम पर बेहद सतही चीजें ही सामने आती रही हैं। हिन्दी व्यंग लेखन को समृद्ध करने वाले हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के बाद इस क्षेत्र में श्रीलाल शुक्ल का नाम लिया जाता है। श्रीलाल शुक्ल के नाम राग दरबारी जैसा उपन्यास है जिसकी स्थिति व्यंग की उनकी अपनी भंगिमा के कारण हिन्दी उपन्यासों में बिल्कुल अलग रही है। इसी क्रम में व्यंग लेखन के क्षेत्र में सुशील सिद्धार्थ एक विश्वास भरा नाम है। 
सुशील सिद्धार्थ के व्यंग भी पाठक के अंतर्मन को झकझोर कर उसे जगाने और उसकी चेतना लौटा लाने का माद्दा रखते हैं। उनके ताजा व्यंग संग्रह नारद की चिन्तामें कुल पचहत्तर व्यंग संग्रहीत हैं।
संस्कृति के संरक्षण की आड़ में स्वार्थ की पैंतरेबाजी को लेखक ने खूब ताड़ा है। लोक संस्कृति और लोक साहित्य के नाम पर किए जाने वाले छद्म यानी तथाकथित प्रोजेक्ट्स योजनाओं के सच को सामने लाते हुए सुशील सिद्धार्थ लिखते हैं कि ‘‘जीप लोकतंत्र की तरह किसी गंाव की ओर भागी जा रही थी। मिशन लोक साहित्य। लोक काल के गुलगुले गाल में समा जाए, इससे पहले उसे पकड़ कर प्रोजेक्ट के पिंजरे में डाल देना था।’’ (लोक साहित्य के अहेरी, पृ.15)

सुशील सिद्धार्थ की व्यंग्य रचनाएं मन में गुदगुदी मात्र पैदा नहीं करतीं बल्कि उन सामाजिक वास्तविकताओं से रूबरू कराती हंै, जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग संभव नहीं है। लगातार खोखली और भ्रष्ट होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को लेखक ने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढि़वादी जीवन-मूल्यों पर चोट करते हुए लेखक ने विषय की गंभीरता को सदा ध्यान में रखा है और आधारभूत जीवन मूल्यों को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है।

साहित्य जगत में आलोचना की पैतरेबाजी पर भी लेखक ने जम कर कलम चलाई है। स्वनामधन्य आलोचक किसी नए लेखक को किस प्रकार बनाते और बिगाड़ते हैं तथा किस प्रकार अपनी हठधर्मिता को दूसरों पर आरोपित करने का प्रयास करते हैं, यह कटु सच्चाई व्यंग लेख नए को नापोमें बड़े ही रोचक ढंग से सामने रखी गई है। एक आत्ममुग्ध आलोचक उद्घोष करता है कि ‘‘मैं हूं आलोचक।’’ फिर वह अपनी बड़ाई इन शब्दों में करता है कि ‘‘मैं अनथक अनवरत लिखे जा रहा हूं। सारी पत्रिकाएं खंगालता हूं और रचनाओं, लेखक-लेखिकाओं रूपी मोती सूचियों में बिखेर देता हूं। मेरी ग्रहणशीलता और संवेदनशीलता पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। कई बार तो रचना छपने से पहले ही मेरे द्वारा महाकाव्यात्मक घोषित कर दी जाती है, भले ही छपने के बाद वह गुटका संस्करण ही साबित हो।’’ (पृ.39-40) नए लेखकों की रचनाओं को नापने का स्वयंभू आलोचकों का पूर्वाग्रही सांचा कुछ इस प्रकार रहता है-‘‘मेरे लिए कसौटी यह है कि इसे किसने लिखा है। लिखने वाला उचित है तो कहानी भी समुचित होगी।’’ (पृ.41)

लेखक की भाषा-शैली में खास किस्म का अपनापा है, जिससे पाठक को यही लगेगा कि लेखक उसके सामने ही बैठा उससे संवाद कर रहा है। एक पटु पटकथामें साहित्य और धारावाहिकों की पटकथा लेखन के विषयगत समीकरण का रेशा-रेशा खोल कर रख दिया गया है। इसी व्यंग से एक उदाहरण देखें-‘‘आपके साहित्य में भी तो सुपारी लेने-देने का रिवाज है। मैं खुद कई सुपारी लेखकों को जानता हूं। आप सहर्ष धारावाहिक की सुपारी लें। धारावाहिक का नाम है-गुण्डाकथा वाया तड़ीपार।’’ (पृ.69)
 
सामाजिक विसंगतियो के प्रति गहरा सरोकार रखने वाला ही लेखक सच्चा व्यंगकार हो सकता है। सामाजिक सिद्धांतों के नाम पर दोहरापन ओढ़ कर जीने वालों पर करारी चोट करता है व्यंग लेख ए सुटेबल ब्वाय’’। स्त्री स्वतंत्रता पर बढ़-चढ़ कर बात करने वालों के घर में स्त्री शोषित रहती है और ऐसे ही लोग अपने बच्चों के दोषों को बड़ी सफाई से गोलमाल कर के उन्हें सुटेबलके रूप में स्थापित कर देते हैं -‘‘अब मेरी समझ में आ रहा है कि सुटेबल ब्वाय या सुटेबल गर्ल होने के लिए आवश्यक है कि सुटेबल फादर या मदर भी हो।’’ (पृ़.87)
परंपरागत अध्यापकीय बोझिलता से परे उनके व्यंग सहज संवाद करते हैं और अपनी बात को पाठक के मन-मस्तिष्क में उतार देने में पूर्णतया सक्षम हैं। शैली का प्रवाह और भाषा का बोधगम्यता उनके व्यंगों को और अधिक मुखरता प्रदान करती है। विचारों को सरलता से सामान्य जगत से गहनता में उतार ले जाने वाला कौशल लेखक की कलात्मक क्षमता एवं विद्वता को भी प्रमाणित करता है। कहीं भी बनावटी भाषा नहीं दिखाई देती। व्यंग्य में जो बिंब होने चाहिए, जो रूपक और चित्र-विधान होने चाहिए, वे सब स्वाभाविक रूप से विद्यमान हैं। सतर्कता और विवेक व्यंग्य रचना के लिए अनिवार्य है। इस सतर्कता और विवेक के अभाव में छद्म को न तो अनुभव किया जा सकता है और न जांचा सकता। सुशील सिद्धार्थ के व्यंगों में समाज में पाई जाने वाली सभी विसंगतियों का बेबाक चित्रण मिलता है।

साठ पार की कुछ योजनाएं’, ‘भूतपूर्व प्रेमिका से मुठभेड़’, ‘मेरा ज्योतिष प्रेम’, ‘मुखड़ा क्या देखे दर्पण मेंहास्य का भाव लिए गुदगुदाने वाले व्यंग हैं। कामलगाओपनिषद से साभारभी एक ऐसा ही रोचक व्यंग है जो विघ्नसंतोषियों के जीवन दर्शन से साक्षात्कार कराता है। ‘‘अपना जीवन सरल बनाने और नजदीकी लोगों का जीवन कठिन बनाने की कला को काम लगानाकहते हैं।’’

देश की वर्तमान दशा पर पर चोट करता है व्यंग -कृपया पैर मजबूत करें। अपने इस लेख में सुशील सिद्धार्थ बड़ी बारीकी से विवरण प्रस्तुत करते हैं-‘‘मेरे भाई, अपना देश कब से अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा है। लोगों के महल खड़े हो गए, कारखाने खड़े हो गए, बैंक बैलेंस खड़े हो गए मगर देश? कुछ लोगों के अनुसार देश के पैरों पर बहस जारी है। इनको किस कंपनी, किस नंबर का जूता पहनाया जाए, जूतों का रंग कैसा हो, इन तमाम बातों पर राष्ट्रीय सहमति नहीं बन पाई है।’’ (पृ.170) इसी प्रकार मृत्युबोधमें व्यंजनात्मकता की वह सुन्दर छटा देखने को मिलती है, जो अंतर्मन को झकझोरे बिना नहीं रहती है-‘‘जानम समझा करो, हम उस देश के वासी है, जहां जीवन नहीं मृत्यु की पूजा होती है। कई लोगों के मरने की खबर अखबार में छपती है तो मालूम होता है कि ये भी जीवित थे। जिन्दगी की खोज खबर लेना हमारी संस्कृति को रास नहीं आता।’’ (पृ.171)

नारद की चिन्ताएक चु  टीला व्यंग है। ‘‘भारत में जो होता है, बस होता है या यूं कहो कि भारत में सब कुछ कुछ कुछ होता है।’’ इस एक वाक्य में देश वर्तमान दशा और दिशा का अनावरण हो जाता है। सुशील सिद्धार्थ के व्यंग लेखन की यह विशेषता है कि वे सजग वेत्ता की भांति अपने चारो ओर के वातावरण को परखते, जांचते हैं और फिर उन्हें विश्लेषणात्मक ढंग से अपने व्यंग में पिरोते हैं। संग्रह के लेख सत्य पर आधारित हैं। इनकी केन्द्रीय वस्तु पाठक को सोचने पर विवश करती है। प्रत्येक व्यंग कही गुदगुदाते हुए शुरू होता है , समाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक कुप्रथाओं पर प्रहार करता है और अंत में सहमतियों से भरा एक गंभीर चिन्तन छोड़ जाता है। बहुत सीमित शब्दों में अपनी बात इस सुंदर शैली में कह पाना सुशील सिद्धार्थ की विशेषता है। दैनंदनी जीवन की वे अनेक विसंगतियां जिन्हें देखकर भी हम अनदेखा कर देते हैं , सुशील सिद्धार्थ की अन्वेषक दृष्टि से बच नही पाई हैं। इसलिए प्रत्येक व्यंग के कथ्य में पर्याप्त विविधता है। नारद की चिन्तामें संग्रहीत व्यंग नावक के तीरों की भांति देखने में छोटे भले हों किन्तु उनमें चोट करने की क्षमता भरपूर है। यही खूबी इस पुस्तक को बार-बार पढ़ने के लिए उत्साहित करती है।
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शुक्रवार, जनवरी 08, 2016

पुस्तक-समीक्षा....मुस्लिम महिलाओं के जीवन की सशक्त पड़ताल - डॉ. शरद सिंह



        
पुस्तक-समीक्षा


मुस्लिम महिलाओं के जीवन की  
                                 

                                           
- डॉ. शरद सिंह



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पुस्तक   - लेडीज क्लब

लेखिका  - नमिता सिंह

प्रकाशक  - सामयिक बुक्स, दरियागंज, नई दिल्ली-2,

मूल्य     -  360 रुपए

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जब हम भारत की आधी आबादी की बात करते हैं तो इसका अर्थ होता है वे तमाम औरतें जो भारत में रह रही हैं। वे चाहे किसी भी वर्ग, जाति, धर्म या समुदाय की हों। फिर भी हिन्दी साहित्य में मुस्लिम समुदाय की स्त्रियों के जीवन को समग्रता से कम ही उकेरा गया है। जब कि मुस्लिम समुदाय के सतत् विकास में उनकी स्त्रियों का अभिन्न योगदान रहता है। वे अन्य समुदाय की स्त्रियों की भांति अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य के प्रति समर्पित रहती हैं। वे अपने बच्चों को पालती-पोसती हैं और उन्हें जीवन में संघर्ष करने के योग्य बनाती हैं। किन्तु प्रायः उनका यह योगदान अनदेखा रह जाता है क्योंकि वे स्वयं को सामने नहीं लातीं। उनके सामने न आ पाने का कारण एक तो उनकी परम्परागत झिझक है और दूसरी सकल समाज की भांति पुरुषवर्चस्व का दबाव। अपने जुझारु व्यक्तित्व के लिए सुविख्यात लेखिका नमिता सिंह ने अपने ताज़ा उपन्यास लेडीज़ क्लबमें इस तथ्य को बखूबी सामने रखा है।

लेडीज़ क्लबके रूप में नमिता सिंह ने एक ऐसा केन्द्र या सिम्बॅलचुना है जहंा विभिन्न समाज और विभिन्न धर्म की स्त्रियां परस्पर मिलती हैं, अपना-अपना मनोरंजन करने के साथ ही अपने-अपने दुख-सुख भी परस्पर बांटती हैं जिसमें उनका स्नेह और उनकी ईर्ष्या-द्वेष भी शामिल होते हैं। कुलमिला कर कोई भी लेडीज़ क्लब वह केन्द्र होता है जहां वे औरतें भी स्वयं को अभिव्यक्त करने का प्रयास करती हैं जो कहीं अन्यत्र अभिव्यक्त नहीं कर पाती हैं। ऐसे केन्द्र बिन्दु से ही लेडीज़ क्लबउपन्यास के कथानक का आरम्भ होता है और कथा के प्रवाह के साथ ही अनेक घटनाएं जुड़ती चली जाती हैं। इनमें से कई घटनाएं चैंकाती हैं, स्तब्ध करती हैं, और कई घटनाएं ऐसी हैं जो मन को दुख और सहानुभूति से भर देती हैं।

समाज में घटित होने वाली हर घटना या विचार का प्रभाव स्त्री-जीवन पर भी पड़ता है। यदि समाज विभिन्न खानों में बंटता है तो स्त्रियों से भी आशा की जाती है कि वे उस बंटवारे के अनुरूप जिएं। एक समुदाय की स्त्रियां यदि उन्मुक्त और साधिकार  जी रही हों तो यह जरूरी नहीं है कि उसरे समुदाय का समाज अपनी स्त्रियों को वह स्वतंत्रता और अधिकार प्रदान करने के बारे में सहज हो। समाज के विभिन्न जाति एवं धर्म में बंटे होने के बारे में उपन्यास की नायिका क्षोभ व्यक्त करते हुए कहती है कि ‘‘मैं भूल गई थी कि हमारा हिन्दुस्तानी समाज जाति-दर-जाति सैंकड़ों खानों में ऐसा बंटा है कि इसकी जड़ें दूर-दूर तक फैल गई हैं। ज़मीन के नीच गहरे धंसी ये जड़ें उन बस्तियों और कुनबों तक जा पहुंची हैं, जहां इन विभाजन रेखाओं का अस्तित्व ही नहीं होना चाहिए था। धर्म और जाति के ये विभाजन के दंश समाज की हर धड़कन में मौजूद हैं।’’ (पृ. 17)

शहनाज़ आपा, ग़ज़ाला, अजरा जैसी स्त्रिएं सामाजिक बंधनों से जूझती दिखाई देती हैं। वहीं लेडीज़ क्लब भी सामाजिक दुष्प्रभावों से अछूता नहीं रहता है। शहर में साम्प्रदायिक कटुता बढ़ने पर क्लब की सदस्य लीला गुप्ता ने अपने घर बदलने को एक बहाने के रूप में प्रयोग करते हुए क्लब में शामिल होना ही छोड़ दिया। लीला के अनुसार जब वह कैंपस में थी तो आना सुगम था किन्तु अब घर दूर है अतः क्लब में नहीं पहुंच पाती है। इस पर शहनाज़ आपा टोकती हैं कि ‘‘ क्या पढ़ाने नहीं आतीं तुम? रोज डिपार्टमेंट तक आती हो। महीने में एक दिन गेस्टहाऊस तक आना अब इतनी मुसीबत का काम हो गया?’’ (पृ 33) लीला गुप्ता के क्लब में न पहुंचने और शहनाज़ आपा की पीड़ा के बहाने लेखिका ने उस अलगाव के रेखांकित किया है जो जाने-अनजाने आकार लेता चला जाता है।

एक युवा लड़की ग़ज़ाला अमेरिका में पढ़ी और बड़ी हुई। वह भारत के उस वातावरण में नहीं आना चाहती है जहां रूढि़यों के बंधन ही बंधन हैं। वह विरोध करती है किन्तु उसके पिता मौलाना अपनी पैंतरेबाज़ी से उसे भारत चलने को विवश कर देते हैं। भारत आ कर ग़ज़ाला कर मन हर पल छटपटाता रहता है और उसे अपनी मंा के मौन पर आश्चर्य भी होता है।

‘‘कितना कठिन होता है अपने-आप से लड़ते हुए जीवन बिताना। औरतों की जि़न्दगी में मूक-बधिर की तरह हुकुम का पालन करना, रेवड़ के साथ चलते जाना क्यों होता है?’’ (पृ 93) लेखिका इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढती हुई जिस दिशा में जाती हैं वहां साम्प्रदायिक कट्टरता, परस्पर अविश्वास, हिंसा, और वैमनस्य के ऐसे घिनौने रंग दिखाई देते हैं कि मन में टीस उठती है-क्या हमने अपने सामाजिक वातावरण को इतना बदरंग कर दिया है? दुर्भाग्य से यही सच है। देश में औरतों की प्रगति को मात्र चंद उदाहरणों से नहीं मापा जा सकता है, उनकी ओर भी दृष्टिपात करना आवश्यक है जो घुटन भरे माहौल में जीने को विवश हैं। लेखिका ने इस तथ्य को भी उजागर किया है कि दकियानूसी सोच अपढ़ या आर्थिक रूप से निम्नवर्ग में ही नहीं भद्र और पढ़े-लिखे वर्ग में भी कट्टरता से जमी हुई है।

स्त्री की दशा और समाज की जंग खाई बुनावट का बारीकी से विश्लेषण करने में सक्षम उपन्यासकार नमिता सिंह ने अपने इस नए उपन्यास लेडीज क्लबके  द्वारा देश और समाज के उस कोने को भी उजागर कर दिया है जहां मुस्लिम समाज की महिलाएं  पुरातन विचारों से उत्पन्न विसंगतियों को जीने के लिए विवश हैं। यह उपन्यास मात्र एक कथानक नहीं वरन् एक साहसिक विमर्श है मुस्लिम स्त्रियों के जीवन पर।



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