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सोमवार, जनवरी 03, 2022

शिखण्डी | उपन्यास | शरद सिंह | समीक्षा | आजकल पत्रिका

मित्रो, मेरे उपन्यास "शिखण्डी" की समीक्षा प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार की लोकप्रिय पत्रिका "आजकल" के जनवरी 2022 अंक में प्रकाशित हुई है
आभारी हूं समीक्षक प्रदीप कुमार जी की🙏हार्दिक धन्यवाद आजकल🌷हार्दिक धन्यवाद सामयिक प्रकाशन 🌷

बुधवार, जनवरी 27, 2021

शिखण्डी उपन्यास | समीक्षा | समीक्षक शैलेंद्र शैल | सामयिक सरस्वती | उपन्यासकार शरद सिंह

  



Shikhandi - Novel Dr (Miss) Sharad Singh

साहित्य जगत की चर्चित पत्रिका "सामयिक सरस्वती" में मेरे उपन्यास "शिखण्डी " की  प्रतिष्ठित समालोचक शैलेंद्र शैल जी ने जिस गहनता से समीक्षा की है उसके लिए मैं उनकी हार्दिक आभारी हूं🙏

  तथा, आभारी हूं "सामयिक सरस्वती" पत्रिका की भी🙏🙏

- डॉ शरद सिंह





सोमवार, अगस्त 24, 2020

उपन्यास "शिखंडी : स्त्री देह से परे" की समीक्षा "दैनिक हिन्दुस्तान" में - डॉ शरद सिंह

"दैनिक हिन्दुस्तान" में  मेरे उपन्यास "शिखंडी : स्त्री देह से परे" की समीक्षा प्रकाशित ।
सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित मेरा यह उपन्यास आप Online भी मंगा सकते हैं -
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सागर शहर में यह उपलब्ध है-

वैरायटी बुक्स, द्वारिकाजी कांपलेक्स, सिविल लाइंस पर।

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सोमवार, सितंबर 07, 2015

Book review: ये हैं औरत की तीन तस्‍वीरें... "आज तक" में की गई समीक्षा ...

"आज तक"  में की गई मेरी किताब "औरत: तीन तस्वीरें"  की समीक्षा ...

http://aajtak.intoday.in/story/book-review-aaurat-teen-tasverein-1-779729.html

किताब: औरत: तीन तस्वीरें
लेखिका:
शरद सिंह
प्रकाशक:
सामयिक प्रकाशन
मूल्य:
460 रुपये
आंधी-तूफान के बाद खिलने वाली सुनहरी धूप जैसा चित्रण करती हैं शरद सिंह अपनी पुस्तकों में महिलाओं का. 'औरत : तीन तस्वीरें' पुस्तक विश्व भर में स्त्रियों की स्थिति या सिर्फ उनके संघर्ष पर ही आधारित नहीं है. यह पुस्तक शरद सिंह की सोच को सार्थक करती है कि लड़की ऋग्वेद की पहली ऋचा है.

'इस पुरुष प्रधान समाज में औरत की सुबह केतली में उबलती है, ओवन में पकती है, टोस्टर में सिंकती है. पल दो पल के लिए हांफती, फिर रोटियों की तरह तपती और सब्‍जी के साथ भुनती है. दाल के साथ भाप बनने और लंच बॉक्स में पैक हो जाने पर टाटा बाय बाय के बाद टंगी रह जाती है बाथरूम में छूटे गीले तौलिये की तरह.' - ऐसी तमाम अवधारणाओं का प्रतिकार करती है यह पुस्तक.
इस पुस्तक में कई कहानियों के संग्रह से शरद सिंह ने औरतों की ऐतिहासिक और समकालीन छवियां प्रस्तुत की हैं. तीन तस्वीरों का अर्थ है 3 तरह से औरतों के संघर्ष को समझने की कोशिश. पहले खंड में औरतों ने अपने साहस और योग्यता के दम पर पुरुषों से बराबरी की है. दूसरे खंड में उन औरतों की कहानियां हैं जिनका समर्थ स्वरुप साहित्य और विचारों में गढ़ा गया है और तीसरे खंड में उन औरतों की कहानियां हैं जो प्रताड़ित हैं और अभी भी संघर्ष कर रही हैं.
लेखिका ने जोर दिया है महिलाओं के आत्म-मूल्यांकन पर. समकालीन स्त्री प्रश्‍नों को समझने में शरद सिंह की यह पुस्तक समर्थ है.
क्यों पढ़ें?
-इरोम शर्मीला, गुलसीरीन ओनांक, नवककुल कारमान, फातिमा मुर्तज़ा भुट्टो, जेसिका फोनी, सारा, दारा और सरकोजी जैसी हस्तियों के संघर्ष की कहानियों का अनूठा संग्रह.
- देश, भाषा, जाति, नस्ल आदि का कोई विभाजन नहीं.
- राजनीति में ब्यूटी विद ब्रेन का भी उत्तम उदाहरण.
- 'टैगोर, स्त्री और प्रेम', 'पंडित मदन मोहन मालवीय का स्त्री विमर्श', 'बाबा नागार्जुन की नायिकाएं' आदि संवदेनशील विषय.
- प्रवासी महिला कथाकारों की भी कहानियां
- स्त्री के उत्पीड़न और तमाम कारणों पर विचार
- देवी से लेकर डर्टी पिक्चर तक का सफर
- भरपूर तथ्यात्मकता


बुधवार, नवंबर 07, 2012

‘ पिछले पन्ने की औरतें ’ की समीक्षा साहित्य नेस्ट में.....

‘साहित्य नेस्ट’ पत्रिका , अक्टूबर 2012 में  डॉ.संदीप अवस्थी द्वारा की गई 
‘ पिछले पन्ने की औरतें ’ उपन्यास की समीक्षा यहां प्रस्तुत है......

Sahitya Nest,Cover Page, October 2012


Sahitya Nest,Back Cover, October 2012




गुरुवार, फ़रवरी 10, 2011

पुस्तक समीक्षा


‘समीक्षा’ अक्टूबर-दिसम्बर 2010
समीक्षक- डॉ. शरद सिंह


राज्यसत्ता और संस्कृति के अंतर्सम्बंधों पर सहज ही सबका ध्यान केन्द्रित रहता है किन्तु रचना, प्रकाशन और समीक्षा के अंतर्सम्बंध पर दृष्टिपात करने का अवसर कम ही आता है। या तो रचना और प्रकाशन या फिर रचना और समीक्षा के पारस्परिक संबंधों पर ही विचार-विमर्श सिमट कर रह जाता है।  यह एक शाश्वत सत्य है कि समीक्षा विधा रचनाकार की रचना प्रक्रिया को दिशा प्रदान करती है। इस विधा पर प्रायः भेद-भाव या प्रयोजित होने का आरोप भी लगता रहा है। ऐसी स्थिति में एक ऐसी पत्रिका का महत्व बढ़ जाता है जो समीक्षा विधा पर ही केन्द्रित हो। ‘आलोचना’ और ‘समीक्षा’ पत्रिकाएं मूल रूप से समीक्षा पर केन्द्रित पत्रिकाएं हैं। ‘समीक्षा’ की प्रकाशन-यात्रा सन् 1967 में पटना से आरम्भ हुई और दिल्ली स्थानान्तरित होने के बाद भी सतत् जारी रही। इस पत्रिका की यात्रा में एक सुनहरा मोड़ तब आया जब यह सामयिक प्रकाशन, दिल्ली के प्रबंधन से जुड़ गई। यह जुड़ाव इसलिए महत्वपूर्ण है कि जुड़ाव के बाद निकले पहले अंक से ही ‘समीक्षा’ के रूप-रंग में परिवर्तन आने लगा। इसका श्रेय सामयिक प्रकाशन के आधारस्तम्भ और युवा प्रबंधक महेश भारद्वाज की समसामयिक दृष्टिकोण को दिया जाना चाहिए। दूसरा पक्ष यह भी है कि इसके युवा संपादक सत्यकाम और महेश भारद्वाज के बीच प्रकाशकीय समझ का एक अच्छा तालमेल है जिसका प्रमाण ‘समीक्षा’ के वे अंक हैं जो निरंतर चित्ताकर्षक एवं संग्रहणीय रूप में सामने आते गए।......शेषांश ‘पुस्तक समीक्षा’ के पन्ने पर पढ़ने के लिए यहां  क्लिक करें ...