डाॅ शरद सिंह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
डाॅ शरद सिंह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, जनवरी 19, 2021

दैनिक जागरण, नईदुनिया के सप्तरंग परिशिष्ट में मेरे उपन्यास ‘‘शिखण्डी’’ की वरिष्ठ समीक्षक राजेन्द्र राव जी द्वारा की गई समीक्षा - डाॅ शरद सिंह

Shikhandi, Novel of Dr Sharad Singh - Review in Dainik Jagran, Saptrang, Punarnava, 18.01.2021 by Rajendra Rao
Shikhandi, Novel of Dr Sharad Singh - Review in Jagaran, Naidunia, Satrang Punarnava, 18.01.2021 by Rajendra Rao

 दिनांक 18.01.2021 को दैनिक जागरण, नईदुनिया के सप्तरंग परिशिष्ट में मेरे उपन्यास ‘‘शिखण्डी’’ की वरिष्ठ समीक्षक राजेन्द्र राव जी द्वारा की गई समीक्षा प्रकाशित हुई है। 

https://epaper.naidunia.com/mepaper/18-jan-2021-74-indore-edition-indore-page-10.html

--------------------------------------------------------------------

ब्लाॅग पाठकों की पठन-सुविधा हेतु प्रकाशित समीक्षा लेख जस का तस मैं यहां टेक्स्ट रूप में प्रस्तुत कर रही हूं- 

"डाॅ. शरद सिंह हिंदी के उन विरल कथाकारों में हैं, जो लेखन पूर्व शोध में संलग्न होते हैं। यह कृति विरल कथासागर महाभारत से एक अनोखे चरित्र के जीवन और संघर्ष को पर्त-दर-पर्त उद्घाटित करती है, एमदम नए नज़रिए और नए अंदाज़ से।

काशी नरेश की ज्येष्ठ पुत्री अंबा और उसकी दो बहनों का अपहरण भीष्म द्वारा बलपूर्वक किए जाने के और कुरु वंश के राजकुमारों से विवाह किए जाने को सहन न करने और प्रतिकार करने के बाद वह निस्संग और निरुपाय हो कर भी अपने साथ हुए अन्याय का प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा करती है और इसके लिए उसे किस तरह तीन जन्म और स्त्री-पुरुष दोनों के चोले धारण करने पड़ते हैं, इसका उद्देश्यपूर्ण और रोचक चित्रण इस उपन्यास में हुआ है। अंत होते-होते इसका वैचारिक पक्ष सघन स्त्रीविमर्श के रूप में सामने आता है जो पाठक को सहज ही स्वीकार्य हो सकता है। यूं तो शिखंडी की कथा युग-युग से सुनी जाती रही है परंतु इसे मानवीय और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से कहा जाना एक अभिनव प्रयोग है।"

- राजेन्द्र राव

दैनिक जागरण (सप्तरंग), नईदुनिया (सतरंग) साहित्यिक पुनर्नवा, 18.01.2021

-------------------------------------------------

हार्दिक धन्यवाद आदरणीय राजेन्द्र राव जी 🌹🙏🌹

हार्दिक धन्यवाद नईदुनिया 🌹🙏🌹

Shikhandi Novel of Dr (Miss) Sharad Singh


बुधवार, दिसंबर 16, 2020

बाबू जी मायाराम सुरजन, पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी और प्रो. कमला प्रसाद: जिनसे मिलना मेरे जीवन के लिए महत्वपूर्ण रहा | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | संस्मरण

 

Dr (Miss) Sharad Singh

बाबू जी मायाराम सुरजन, पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी और प्रो. कमला प्रसाद: जिनसे मिलना मेरे जीवन के लिए महत्वपूर्ण रहा


 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


सन् 1988 में पूर्णतया सागर में निवासरत होने से पूर्व सन् 1983 मैं व्यक्तिगत काम से पन्ना से सागर विश्वविद्यालय आई थी। वहां अर्थशास्त्र विभाग के सामने अचानक डाॅ. कमला प्रसाद जी से मुलाक़ात हो गई। इससे पहले मैं उनसे पन्ना में प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन में मिल चुकी थी। उन दिनों जैसे कि हर युवा कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ा होता था, मैं भी थी। सोवियत कम्युनिज़्म और भारतीय कम्युनिज़्म पर मेरी उनसे लम्बी-चौड़ी वार्ता भी हुई थी। ज़ाहिर है कि वे भी मुझे भूले नहीं थे। मुझे देखते ही वे बोल उठे,‘‘अरे, शरद सिंह तुम यहां कहां? तुमसे तो मैं पन्ना में मिला था।’’

Pro. Kamla Prasad

मैंने उनका अभिवादन किया और अपने आने का कारण बताया। 

‘‘कोई मदद करूं?’’ उन्होंने पूछा। 

मैंने कहा ‘‘नहीं’’। 

तो बोले, ‘‘अगर समय हो तो चलो फिर मैं तुम्हें एक विशेष व्यक्ति से मिलवाता हूं। मैं उन्हीं के पास जा रहा हूं।’’ डाॅ. कमला प्रसाद जी बोले।

‘‘ठीक है।’’ मैंने कहा 

...और मैं और मेरी दीदी वर्षा सिंह उनके साथ कार में सवार हो कर चल पड़े। मुझे अच्छी तरह याद है कि वह सफ़ेद रंग की एम्बेस्डर कार थी। किसकी थी, यह पता नहीं। कम से कम कमला प्रसाद जी की नहीं थी। यूनीवर्सिटी की पहाड़ी से उतर कर बसस्टेंड, परकोटा होते हुए, शहर की किसी गली से गुज़रते हुए एक घर के सामने रुके। उस समय मुझे सागर के मोहल्लों का नाम भी ठीक से पता नहीं था और न ही नगरीय क्षेत्र के अंदरुनी हिस्सों की जानकारी थी।

हम कार से उतरे। सीढ़ियां चढ़ कर उनके पास पहुंचे जिनसे मिलने गए थे। एक बुजुर्ग व्यक्ति सामने थे। कमला प्रसाद जी ने उनका परिचय कराते हुए कहा,‘‘ये ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी हैं। जानती हो इनके बारे में?’’

‘‘हो, मां सागर के संदर्भ में हमेशा इनका जिक्र करती हैं।’’ मैं कहा और मैंने तथा दीदी ने आगे बढ़ उनके पैर छुए।

‘‘नहीं, नहीं! बेटियां पिता के पैर नहीं छूतीं। सदा सफलता प्राप्त करो।’’ ये उद्गार थे ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी के। 

‘‘मैं आपको दादा कह कर संबोधित कर सकती हूं?’’ मैंने पूछ लिया।

‘‘अवश्य!’’ उन्होंने मुस्कुरा कर कहा।

Pt. Jwala Prasad Jyotishi

फिर कमला प्रसाद जी और ज्वाला प्रसाद जी बातों में मशगूल हो गए। ज्वाला प्रसाद जी बीच-बीच में हम दोनों बहनों से भी कुछ न कुछ बात कर लिया करते। इसी दौरान पोहा और चाय का नाश्ता आया। ज्वाला प्रसाद जी ने पानी भरे गिलास में रखी अपनी बत्तीसी (डेंचर) निकाल कर मुंह में लगाया। इससे पहले मैंने कभी किसी को डेंचर लगाते अपनी आंखों से नहीं देखा था। अज़ीब-सी अनुभूति हुई। शयद मेरी मनोदशा ज्योतिषी दादा भांप गए। वे हंस कर बोले,‘‘मेरे ये दांत नकली हैं, इसलिए मैं इन्हें लगा कर भी अहिंसक ही हूं।’’

उनके इस कथन से उनके विनोदी स्वभाव का भी मुझे परिचय मिला। मुझे सहज होने में भी सहायता मिली। हम सभी ने पोहा खाया और चाय पी। कुछ देर और चर्चा के बाद हम लोग वहां से विदा हुए। विदा लेते समय ज्योतिषी दादा ने हम दोनों बहनों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था,‘‘जब भी सागर आओ, जरूर मिलना और अपनी माता जी डाॅ विद्यावती ‘मालविका’ को भी मेरा नमस्कार कहना।’’

चर्चा के दौरान ही पता चला था कि ज्योतिषी दादा मेरी मां को ही नहीं अपितु मेरे नाना संत श्यामचरण सिंह को भी जानते थे। मेरे नाना जी भी गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। ज्योतिषी दादा से पहली बार मिल कर ऐसा नहीं लगा था कि उनसे हम लोग पहली बार मिल रहे हैं। मुझे यही लगा था कि मेरे स्वर्गीय नाना जी एक बार फिर सजीव मेरे सामने बैठे हुए हैं। यदि उन दिनों दूरभाष या मोबाईल हमारी पहुंच में होता तो मैं अकसर उनसे बात करती रहती। लेकिन वे चिट्ठी-पत्री के दिन थे। मैंने एक-दो बार उन्हें पत्र लिखा जिसका तत्परता से उन्होंने जवाब भी दिया किन्तु फिर जीवन के उतार-चढ़ाव में पत्राचार छूट गया। 

उस दिन ज्योतिषी दादा से मिलने के बाद कमला प्रसाद जी ने हमें सरकारी बसस्टेंड पहुंचा दिया था जहां से हमें पन्ना के लिए बस पकड़नी थी। उन दिनों बसस्टेंड अपनी पुरानी जगह पर था और सागर झील भी बहुत बड़ी थी।

मैं अपनी पढ़ाई-लिखाई में रम गई। उन्हीं दिनों मुझे पत्रकारिता का भूत भी सवार हो गया और पढ़ाई के साथ जबलपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘‘नवीन दुनिया’’ और ‘‘ज्ञानयुग प्रभात’’ के लिए स्वतंत्र पत्रकार के रूप में रिपोर्टिंग करने लगी। दमोह से प्रकाशित होने वाले ‘‘साप्ताहिक दमोह संदेश’’ के लिए कार्डधारी रिपोर्टर का भी काम किया। ‘जनसत्ता’ और ‘रविवार’ के लिए भी रिपोर्टिंग की। तब मुझे नहीं पता पता था कि एक दिन मैं किताबें लिखूंगी और दिल्ली से पहली पुस्तक प्रकाशन की भूमिका के साक्षी बनेंगे ज्योतिषी दादा। हां, उस समय तक यह अवश्य तय होने लगा था कि मां की संवानिवृत्ति के बाद हम लोग सागर में बस जाएंगे। स्कूल शिक्षा विभाग का संभागीय कार्यालय सागर में होने के कारण तथा परीक्षा काॅपी जांचने के लिए मां को पन्ना से सागर आना-जाना पड़ता था। यहां सुश्री लक्ष्मी ताम्रकार जो महारानी लक्ष्मीबाई शा.उ.मा. विद्यालय में पीटीआई थीं, उनकी अच्छी सहेली बन गई थीं। मां को सागर बहुत पसंद आ गया था, उस पर ताम्रकार आंटी ने भी उन्हें प्रोत्साहित किया और हम सन् 1988 में सागर में आ बसे। सागर आने के बाद कभी मां के साथ तो कभी दीदी के साथ मैं ज्योतिषी दादा से मिलने गई। 

सन् 1990 में, माह तो मुझे याद नहीं है लेकिन बारिश के दिन थे। रायपुर से मायाराम सुरजन जी का पत्र मिला कि वे सागर आने वाले हैं और विश्वविद्यालय के गेस्टहाउस में ठहरेंगे। दरअसल, सन् 1988 में स्थानीय मुकेश प्रिंटिंग प्रेस से मैंने अपनी पहली पुस्तक छपवाई थी। इसे छपवाने की प्रेरणा दी थी त्रिलोचन शास्त्री जी ने। यह नवगीत संग्रह था। नाम था-‘‘आंसू बूंद चुए’’। काव्य जगत ने तो मेरे पहले नवगीत संग्रह का स्वागत किया लेकिन पुस्तक की बिक्री को ले कर मेरा अनुभव आंसू बहाने वाला ही रहा। इसी दौरान मैं साक्षरता मिशन से जुड़ी और मेरी कहानियां मिशन की पत्रिका में प्रकाशित हुई। मेरे मन में विचार आया कि काश! मेरी वे कहानियां पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो जातीं। डाॅ राजमती दिवाकर जी ने मुझे सलाह दी कि शिवकुमार श्रीवास्तव जी का कई प्रकाशकों से परिचय है अतः मैं उनसे बात कर के देखूं। मैंने शिवकुमार श्रीवास्तव जी से चर्चा की। उन्होंने मुझसे पांडुलिपि मांगी। मैंने उन्हें दे दी। लगभग डेढ़ साल व्यतीत हो गए लेकिन शिवकुमार भाई साहब ने पांडुलिपियों के बारे में कोई चर्चा ही नहीं की। मुझे स्पष्टवादिता हमेशा अच्छी लगती है। यदि आप से कोई काम नहीं हो सकता है तो आप स्पष्ट मना कर दें। किंतु राजनीति में दखल रखने वाले शिवकुमार भाई साहब के लिए शायद कठिन रहा होगा कि वे स्पष्ट मना कर दें। 

Mayaram Surajan Babu Ji

उन्हीं दिनों ‘‘देशबंधु’’ समाचारपत्र ने प्रकाशन संस्थान आरम्भ किया था जिसके तहत वे पुस्तकें प्रकाशित करने वाले थे। मैंने मायाराम सुरजन जी को पत्र लिखा कि मैं अपनी साक्षरता विषयक कहानियों का संग्रह प्रकाशित करना चाहती हूं। उसी तारतम्य में उन्होंने मुझे पत्र लिख कर अपने सागर आने के कार्यक्रम के बारे में सूचित किया था।

उन दिनों हम लोग नरसिंहपुर रोड स्थित मध्यप्रदेश विद्युत मंडल की आवासीय काॅलोनी में रहते थे। वहां से मकरोनिया चौराहा काफी दूर था और उस ओर ऑटो भी नहीं मिल पाती थी। हमारे पास दूरभाष का कोई साधन नहीं था। अतः गेस्टहाउस पहुंचने से पूर्व हम लोग (मैं और वर्षा दीदी) सुरजन दादा से बात भी नहीं कर सके। उन्होंने सुबह दस बजे तक गेस्टहाउस में मिलने का समय चिट्ठी में लिखा था। साधन के अभाव में हमें वहां पहुंचने में तनिक देर हो गई। वहां पहुंच कर पता चला कि बाबू जी (मायाराम सुरजन जी) अभी-अभी ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी से मिलने उनके घर के लिए निकल गए हैं। पल भर को हताशा तो हुई किंतु फिर हमने तत्काल गेस्टहाउस से निकल कर ऑटो की और ज्योतिषी दादा के घर जा पहुंचे। बाबू जी भी वहां मिल गए। 

‘‘अरे, तुम लोगों की प्रतीक्षा करते-करते मैं निकल आया।’’ बाबू जी ने कहा। फिर उन्होंने बताया कि साक्षरता विषय किताबें प्रकाशित करना अभी देशबंधु प्रकाशन की योजना में शामिल नहीं है लेकिन वे दिल्ली के किसी प्रकाशक से इस बारे में बात कर सकते हैं। अंधा क्या चाहे, दो आंखे। मैं खुश हो गई उनकी बात सुन कर। लेकिन उन्होंने जब पांडुलिपि मांगी तो मैंने उन्हें सारा किस्सा सुना दिया कि लगभग डेढ़-दो साल से मेरी पांडुलिपियां शिवकुमार भाई साहब के पास रखी हैं।

‘‘शिवकुमार से वापस ले लो। वह नहीं छपाएगा।’’ ज्योतिषी दादा ने मेरी बात सुनते ही कहा। बाबू जी ने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए मुझे सलाह दी कि मैं शिवकुमार भाई साहब से अपनी पांडुलिपियां वापस ले कर डाक द्वारा उनके पास रायपुर भेज दूं। 

‘‘मुझसे पूछा होता तो मैं पहले ही कहता कि शिवकुमार को पांडुलिपियां मत दो।’’ ज्योतिषी दादा ने पुनः मुझसे कहा। मुझे उस समय यह पछतावा हुआ कि मैंने ज्योतिषी दादा से इस बारे में पहले ही सलाह क्यों नहीं ली। 

दूसरे ही दिन मैंने शिवकुमार श्रीवास्तव भाई साहब से अपनी पांडुलिपियां वापस मांग ली। उन्होंने ने भी इस भाव से वापस कीं मानों उन्हें मेरे द्वारा वापस मांगे जाने की ही प्रतीक्षा थी। लेकिन जैसे कहा जाता है न कि हर अवरोध के बाद एक नया रास्ता खुलता है। इस बार अवरोधक नहीं, मार्गदर्शक मुझे मिले थे। ज्योतिषी दादा ने मेरी कहानियों को पढ़ा था। उन्हें वे पसंद आई थीं। अतः उन्होंने भी मायाराम सुरजन बाबू जी के निर्णय का समर्थन किया था। वे उन लोगों में से नहीं थे कि मुंह के सामने तारफ़ करें और पीठ पीछे कटाई करें। वे सभी का भला चाहने और सभी का भला करने वाले व्यक्ति थे। यह मैं अपने अनुभव के आधार पर दावे से कह सकती हूं। आज ऐसे लोगों की अनुपस्थिति बहुत खटकती है। सामाजिक वातावरण में गिरावट की एक वजह यह भी है कि आज  ज्योतिषी दादा जैसे सरल स्वभाव, युवाओं के पथप्रदर्शक एवं परोपकारी व्यक्तियों की कमी हो चली है। 

बहरहाल, मैंने अपनी पांडुलिपियां सुरजन दादा के पास भेज दीं। कुछ समय बाद सीधे दिल्ली से सामयिक प्रकाशन के मालिक जगदीश भारद्वाज जी का पत्र मेरे पास आया जिसमें उन्होंने मेरी साक्षरता विषयक कहानियों की किताबें छापना स्वीकृति दी थी। दरअसल मायाराम सुरजन बाबू जी ने मेरी पांडुलिपियां जगदीश भारद्वाज जी के पास दिल्ली भेज दी थीं। सन् 1993 में एक साथ दो किताबें प्रकाशित हुईं- ‘‘बधाई की चिट्ठी’’ और ‘‘बेटी-बेटा एक समान’’। उस समय मैंने दो ही लोगों को सबसे पहले अपनी किताबें दिखाई थीं। सबसे पहले ज्योतिषी दादा को और उसके बाद कपिल बैसाखिया जी को जिन्होंने मित्रवत सदा मेरा भला चाहा।

Badhi Ki Chitthi - Dr Sharad Singh


अच्छे लोगों के हाथों अच्छे भविष्य की नींव रखी जाती है, यह कहावत मेरे जीवन में चरितार्थ होती मैंने स्वयं अनुभव की है। उस समय मुझे पता नहीं था कि एक दिन सामयिक प्रकाशन मेरी ‘‘सिग्नेचर उपन्यासों’’ का प्रकाशक बनेगा। या वाणी प्रकाशन, साहित्य अकादमी, नेशनलबुक ट्रस्ट आदि से मेरी पुस्तकें प्रकाशित होंगी।

Beti Beta Ek Saman -  Dr Sharad Singh

 मायाराम सुरजन बाबू जी ने जो मार्ग प्रशस्त किया मानो उसका शिलान्यास स्वयं ज्योतिषी दादा ने किया था। बड़ों का आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाता है। मैं वे दोनों किताबें ले कर ज्योतिषी दादा के पास गई। उन दिनों वे अस्वस्थ चल रहे थे। किन्तु मेरी किताबें देख कर वे बहुत खुश हुए। उस समय उन्होंने मुझे जो आशीर्वाद दिया वह मेरे लिए पथ प्रदर्शक की तरह है। उन्होंने कहा था-‘‘अब इस यात्रा को जारी रखना और पीछे मुड़ कर कभी मत देखना।’’

दादा ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी, मायाराम सुरजन बाबू जी और कमला प्रसाद जी भले ही हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उन तीनों का आर्शीवाद सदा अपने साथ महसूस करती हूं जिससे मुझे हमेशा आत्मिक संबल मिलता है। 

             --------------------- 


बुधवार, अक्टूबर 28, 2020

कठिन है समझना राजेन्द्र यादव होने का अर्थ | डाॅ शरद सिंह


28 अक्टूबर-पुण्यतिथि 
कठिन है समझना राजेन्द्र यादव होने का अर्थ
   - डाॅ शरद सिंह
         हिंदी साहित्य की मशहूर पत्रिका ‘‘हंस’’ के संपादक, हिंदी में नई कहानी आंदोलन के प्रवर्तकों में एक, कहानीकार, उपन्यासकार राजेंद्र यादव ने हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श को मजबूती से खड़ा करने में अपना जो योगदान दिया वह अद्वितीय है। बेशक वे हमेशा विवादों से घिरे रहे लेकिन विवादों से घबराने के बजाए उन्होंने विवादों से प्रेम किया। राजेन्द्र यादव के जाने के बाद हिन्दी साहित्य जगत में जो शून्य उत्पन्न हुआ है उसे अभी तक कोई भर नहीं सका है। गोया ज्वलंत विचारों की एक चिंनगारी थी जो बुझ गई लेकिन उसकी तपिश भविष्य के गर्त में कहीं दबी हुई है। 
हिन्दी साहित्य के ‘मील का पत्थर’ कहे जाने वाले राजेन्द्र यादव जी से मेरी पहली मुलाक़ात सन् 1998 में सागर में ही हुई थी जब वे एक साहित्यिक समारोह में सागर आए थे। स्थानीय रवीन्द्र भवन में समारोह के उद्घाटन के दिन उनसे मेरी प्रथम भेंट हुई। इससे पूर्व मात्र पत्राचार था। उन्होंने मेरा परिचय पाते ही कहा-‘‘ ऐसी भी क्या नाराज़गी, हंस के लिए और कहानी भेजो!’’ उस समय भी उन्हें सागर नगर और विश्वविद्यालय के साहित्य प्रेमियों ने घेर रखा था। मगर वे किसी घेराव के परवाह करने वाले व्यक्ति थे ही नहीं। मैंने उनसे कहा कि आप जानते हैं मेरी नाराज़गी का कारण। राजेन्द्र जी बोले -‘‘ ठीक है आइन्दा ध्यान रखा जाएगा।’’ इतना कह कर वे हंसने लगे। हमारे बीच हुई वार्ता का सिर-पैर वहां उपस्थित लोगों के समझ से परे था। दरअसल हुआ यूं था कि मेरी एक कहानी ‘‘हंस’’ में प्रकाशित हुई और उस कहानी के साथ कुछ ज़्यादा ही बोल्ड रेखाचित्र प्रकाशित कर दिए गए। जो देखने में तो अटपटे थे ही और जिनसे कहानी की गंभीरता को भी चोट पहुंच रही थी। मैंने फोन कर के अपनी आपत्ति से उन्हें अवगत कराया था और साथ ही जोश में आ कर यह भी कह दिया था कि आइन्दा मैं ‘‘हंस’’ के लिए अपनी कोई कहानी नहीं भेजूंगी। बस, इसी बात पर वे मुझे टोंक रहे थे। सिर्फ़ मुझे ही नहीं, मेरी दीदी डाॅ. वर्षा सिंह से भी कहा था,‘‘आप तो अपनी ग़ज़लें भेज दिया करिए और इसे भी समझाइए।

दोबारा लखनऊ में ‘‘कथाक्रम’’ के आयोजन में राजेन्द्र यादव जी से भेंट हुई। उस समय तक वे मेरी कुछ और कहानियां ‘‘हंस’’ में प्रकाशित कर चुके थे और मेरा प्रथम उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ प्रकाशित हो चुका था। मुझे भी वहां बोलना था। मैंने अपनी बात रखते हुए कहा कि "साहित्य जगत में उठाने-गिराने का खेल चल रहा है, उससे साहित्य को ही क्षति पहुंच रही है।’’ और भी बहुत कुछ बोला था मैंने, लेकिन इस बात को राजेन्द्र यादव जी ने पकड़ लिया। दोपहर के भोजन के दौरान उन्होंने मुझसे कहा-‘‘बहुत ज़्यादा खरा-खरा बोल दिया तुमने। अब कई लोग तुमसे नाराज़ हो जाएंगे।’’ फिर हंस कर बोले-’’यह खरापन ही तुम्हें सबसे अलग बनाता है, इसे ऐसे ही ज़िन्दा रखना।’’ उनका यह कथन मेरे लिए चौंकाने वाला था। ‘‘उठाने-गिराने’’ का आरोप राजेन्द्र जी पर भी लगता रहा था इसलिए मुझे लगा था कि उन्हें भी मेरी बात बुरी लगी होगी लेकिन इसके विपरीत उन्होंने मेरा उत्साहवर्द्धन किया। उस समय मुझे लगा था कि जो दावा करते हैं कि वे राजेन्द्र यादव को समझते हैं, दरअसल उन्हें कोई नहीं समझ सकता है। वस्तुतः यह अबूझपन ही राजेन्द्र यादव को एक ऐसा संपादक बनाता था जो हिन्दी साहित्य को अपनी मनचाही दिशा देता जा रहा था। राजेन्द्र यादव जी ने स्वीकार किया था कि उन्हें मेरा पहला उपन्यास बहुत पसंद आया। ‘‘लीक से हट कर है’’ यही कहा था उन्होंने। 
समय-समय पर अन्य समारोहों में राजेन्द्र यादव जी से संक्षिप्त भेंट होती रही। किन्तु सन् 2013 में जब मैं एक आयोजन के सिलसिले में दिल्ली गई तो पता चला कि राजेन्द्र यादव जी अस्वस्थ चल रहे हैं। दिल्ली के ही एक मित्र के साथ मैं उनके निवास पर पहुंची। मैं पहली बार उनके घर गई थी। तब मुझे पता नहीं था कि यह मेरी उनसे अंतिम भेंट है। वे बीमार थे लेकिन उनका उत्साह देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वे बीमार हैं। मुझे देख कर वे बहुत खुश हुए। काफी साहित्यिक चर्चाएं हुईं। उनसे विदा लेते हुए मैंने कहा था कि-‘‘आप जल्दी स्वस्थ हों। अगली बार दिल्ली आऊंगी तो फिर भेंट होगी।’’

मगर 28 अक्टूबर 2013 को रात्रि में टीवी समाचारों से ज्ञात हुआ कि राजेन्द्र यादव अब नहीं रहे। विश्वास करना कठिन था, मगर विश्वास करना पड़ा। मानो एक युग समाप्त हो गया था। 

28 अगस्त 1929 को आगरा में जन्मे राजेंद्र यादव ने आगरा विश्वविद्यालय से 1951 में हिन्दी विषय से एमए की डिग्री हासिल की थी। वे काफी दिनों तक कोलकाता में रहे। बाद में दिल्ली आ गए और और राजधानी के बौद्धिक जगत का एक अहम हिस्सा बन गए। उनका विवाह सुपरिचित हिन्दी लेखिका मन्नू भण्डारी के साथ हुआ था। संयुक्त मोर्चा सरकार में वह प्रसार भारती के सदस्य भी बनाए गए थे। वे हिन्दी के सुपरिचित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार व आलोचक थे। ‘‘नयी कहानी’’ के नाम से हिन्दी साहित्य में उन्होंने एक नयी विधा का सूत्रपात किया। उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द द्वारा सन् 1930 में स्थापित साहित्यिक पत्रिका ‘‘हंस’’ का पुनर्प्रकाशन प्रेमचन्द की जयन्ती के दिन 31 जुलाई 1986 को उन्होंने प्रारम्भ किया। इसके प्रकाशन का दायित्व पूरे 27 वर्ष यानी जीवनपर्यन्त निभाया। हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा राजेन्द्र यादव को उनके समग्र लेखन के लिये वर्ष 2003-04 का सर्वोच्च सम्मान (शलाका सम्मान) प्रदान किया गया था।

राजेन्द्र यादव जी की यह विशेषता थी कि उनसे वैचारिक मतभेद होते हुए भी उनके कार्यों को अनदेखा नहीं किया जा सकता था। राजेन्द्र यादव के निधन के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे मैनेजर पांडेय ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था-‘‘राजेंद्र यादव पिछली आधी सदी से हिंदी साहित्य में सक्रिय रहे। उन्होंने तीन-चार क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण काम किया है। नई कहानी के लेखकों में महत्वपूर्ण थे राजेंद्र यादव। उन्होंने कुछ अच्छे उपन्यास भी लिखे जिस पर ‘‘सारा आकाश’’ जैसी फिल्म भी बनी। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने ‘‘हंस’’ पत्रिका निकाली, जो हिंदी की लोकप्रिय और विचारोत्तेजक पत्रिका मानी जाती है। इसके जरिए उन्होंने दो काम किए, पहला यह कि उन्होंने स्त्री दृष्टि और लेखन को बढ़ावा दिया। स्त्री दृष्टि पर उनकी राय विवादास्पद लेकिन विचारणीय रही। उन्होंने दूसरा काम यह किया कि हंस के जरिए उन्होंने दलित चिंतन और दलित साहित्य को बढ़ावा दिया। दलित साहित्य को हिंदी साहित्य में स्थापित करने में राजेंद्र यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिंदी में दलित साहित्य को आगे बढ़ाने में राजेंद्र यादव का बहुत बड़ा योगदान है। मेरी जानकारी में हिंदी में दलित साहित्य पर पहली गोष्ठी उन्होंने 1990 के दशक में कराई थी। उसके माध्यम से लोग यह जान सके कि हिंदी में दलित साहित्य की धारा विकसित हो रही है। उन्होंने दलित लेखकों की रचनाओं को हंस में प्रमुखता से छापा। दलित साहित्य पर हंस के कई विशेषांक निकाले। इसके जरिए दलित साहित्य को समझने और आगे बढ़ाने का काम राजेंद्र यादव ने किया। इसकी बदौलत दलित साहित्य हिंदी में स्थापित धारा बन पाया। युवा लेखकों को आगे बढ़ाने में भी राजेंद्र यादव का बड़ा योगदान है।  

सन् 2014 में स्त्रीविमर्श पर मेरी पुस्तक प्रकाशित हुई थी-‘‘औरत तीन तस्वीरें’’। उसमें मेरा एक लेख है-‘‘स्त्रीविमर्श के माईलस्टोन पुरुष’’। इस लेख में मैंने स्त्रीविमर्श के प्रति राजेन्द्र यादव के योगदान की चर्चा की है। लेख का अंश इस प्रकार है-‘‘स्त्री-विमर्श के संदर्भ में एक सुखद तथ्य यह भी है कि हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श को एक वैचारिक आन्दोलन के रूप में एक पुरुष ने स्थापित किया और उसमें स्त्रियों की सहभागिता को हरसंभव तरीके से बढ़ाया। यह नाम है राजेन्द्र यादव का। यह सच है कि स्त्रीविमर्श के अपने वैचारिक आन्दोलन के कारण उन्हें समय-समय पर अनेक कटाक्ष सहने पड़े हैं तथा लेखिकाओं के लेखन को ‘बिगाड़ने’ का आरोप भी उन पर लगाया जाता रहा है किन्तु सभी तरह के कटाक्षों और आरोपों से परे राजेन्द्र यादव ने साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के पटल पर लेखिकाओं को अपने विचारों को खुल कर सामने रखने का भरपूर अवसर दिया। राजेन्द्र यादव अपने सामाजिक सरोकार रखने वाले साहित्यक विचारों और उद्देश्य को ले कर सदा स्पष्ट रहे। उन्होंने कभी गोलमोल या बनावटी बातों का सहारा नहीं लिया। यूं भी अपनी स्पष्टवादिता के लिए वे विख्यात रहे हैं।  
राजेन्द्र यादव ने स्त्री स्वातंत्र्य की पैरवी की तो उसे अपने जीवन में भी जिया। एक बार जयंती रंगनाथन को साक्षात्कार देते हुए उन्होंने स्त्री विमर्श पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘मैंने हमेशा स्पष्ट कहा है कि स्त्री विमर्श पर बात करनी है तो मां, बेटी और बहन इन तीन संबंधों पर बात नहीं करूंगा। घर के अंदर भी स्त्री को जितनी आजादी चाहिए, बहन-बेटी को जो फ्रीडम चाहिए, एजुकेशन चाहिए,  मैंने दी है। बेटी को ज़िन्दगी में एक बार थप्पड़ मारा, आज तक उसका अफसोस है। बाद में ज़िन्दगी के सारे निर्णय उसने खुद ही लिए, यह फ्रीडम तो देनी ही पड़ेगी।’ वे स्त्री-लेखन और पुरुष लेखन के बुनियादी अन्तर को हमेशा रेखांकित करते रहे हैं। उनके अनुसार ‘जो पुरुष मानसिकता से लिखा गया है और जो स्त्री की मानसिकता से लिखा गया है, बेसिक अंतर है। दो अलग एप्रोच हैं। उस चीज को तो हमें मानना होगा।’ 

निःसंदेह, यह एक ऐसा तथ्य है जिसको नकारा नहीं जा सकता है कि हिन्दी साहित्य में लेखिकाओं को यदि किसी ने सही अर्थ में मुखरता प्रदान की तो वह हैं राजेन्द्र यादव। यह हिन्दी साहित्य जगत में सतत् परिवर्तन की प्रक्रिया थी जो  कभी न कभी, कहीं से तो शुरू होनी ही थी। इस यात्रा का प्रस्थान बिन्दु बना राजेन्द्र यादव का वह साहस जो उन्हें यश-अपयश के बीच अडिग बनाए रखा।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद भी मानते हैं कि तमाम विवादों के बावजूद राजेन्द्र यादव के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा था-‘‘हंस साहित्यिक पत्रिका का पुनर्प्रकाशन उनका सबसे बड़ा योगदान माना जाएगा। इसे उन्होंने एक ऐसे मंच का रूप दिया, जिस पर कई नए कहानीकार आए, जिन्हें कोई जानता तक नहीं था। राजेंद्र यादव ने उन्हें जगह दी। विवादों को जानबूझकर जन्म देते हुए और विवाद झेलते हुए भी उन्होंने नए लोगों को मौका दिया। इसके लिए उन्होंने इस बात की चिंता नहीं की कि इसका परिणाम क्या होगा। हंस में उन्होंने साहित्य के इर्द-गिर्द सामाजिक विषयों पर बहस शुरू की। दलितों के सवाल पर, स्त्रियों के सवाल पर और यौन वृत्तियों के सवाल पर। यह भी उनका बड़ा योगदान है। राजेंद्र यादव उस त्रयी के सदस्य थे, जिनमें कमलेश्वर और मोहन राकेश का नाम आता है। इस त्रयी ने हिंदी कहानी को एक नई दिशा दी और उसके तेवर को बदलकर रख दिया।’’ 

दरअसल राजेन्द्र यादव ने उन सभी को मुखर होने का भरपूर अवसर दिया जो शायद कभी मुखर नहीं हो पाते यदि राजेन्द्र यादव न होते। लेकिन स्वयं राजेन्द्र यादव स्वयं विवाद और विमर्श के रूप में ही मुखर होते रहे। आज के साहित्यिक परिवेश में जिसे राजेन्द्र यादव के युग के बाद का समय कहा जा सकता है, राजेन्द्र यादव होने का अर्थ समझ पाना बहुत कठिन है। 
                   
         ------------------------------   

(दैनिक सागर दिनकर में 28.10.2020 को प्रकाशित)
#दैनिक #सागर_दिनकर #शरदसिंह #चर्चाप्लस #DrSharadSingh #CharchaPlus #miss_sharad
#RajendraYadav #Hans #राजेंद्रयादव #हंस #मैनेजरपांडेय #अपूर्वानंद #जयंतीरंगनाथन #संपादक #पुण्यतिथि

रविवार, जून 14, 2020

जिंदा मुहावरों का समय ... डाॅ शरद सिंह के संस्मरण पुस्तक के अंश - 8

जिला पत्रकार संघ पन्ना में मुझे पदाधिकारी रहने का भी अवसर मिला। सन् 1982 में सह सचिव रही तथा सन् 1984 में मंत्री के पद के लिए निर्वाचित हुई। पन्ना का जिला पत्रकार संघ एक औपचारिक पत्रकार संघ न होकर एक परिवार जैसा था, जिसमें सभी पत्रकार परिवार के सदस्यों की तरह एक दूसरे से स्नेह रखते हुए थे। यद्यपि संघ के अन्य सभी पदाधिकारी एवं सदस्य आयु में मुझसे बड़े थे तथा मेरे लिए सम्मानीय थे।
  ( तस्वीर में दो लम्बी चोटियों में मैं ही हूं।)
#ज़िंदा_मुहावरों_का_समय
#संस्मरण #मेरेसंस्मरण #डॉशरदसिंह #शरदसिंह #Memoir #MyMemoir #Zinda_Muhavaron_Ka_Samay
#DrSharadSingh #miss_sharad

शनिवार, जून 13, 2020

जिंदा मुहावरों का समय ... डाॅ शरद सिंह के संस्मरण पुस्तक के अंश - 6

मेरा पहला सम्वाददाता पत्र ... 
मित्रो, यह फोटो मैंने अपने कॉलेज ID के लिए पन्ना में जुगलकिशोर जी के मंदिर के पास जड़िया स्टूडियो में खिंचवाई थी। दो चोटी और बेलबॉटम का ज़माना ज़ारी था। उस पर जुनून पत्रकारिता का। 
         दैनिक "कृष्ण क्रांति" पन्ना के पड़ोसी ज़िला छतरपुर से प्रकाशित होता था। डॉ. अजय दोसाज इसके संपादक थे। उन दिनों पत्रकारिता जगत में छतरपुर की पत्रकारिता ने अपनी अलग ही पहचान बना रखी थी। उल्लेखनीय है कि सन् 1979-80  के प्रसिद्ध "छतरपुर कांड" जिसमें पत्रकारों के दमन उत्पीड़न की जुडिशल इंक्वायरी और प्रेस काउंसिल द्वारा जांच की गई थी। पत्रकारों ने इस संघर्ष में जीत हासिल की थी। इसी कांड के बाद छतरपुर के पत्रकार राजेश बादल (जो अब देश के जानेमाने पत्रकार हैं) ने आंचलिक पत्रकार से पूर्णकालिक पत्रकार की पारी शुरू की थी।

#ज़िंदा_मुहावरों_का_समय
#संस्मरण #मेरेसंस्मरण #डॉशरदसिंह #शरदसिंह #Memoir #MyMemoir #Zinda_Muhavaron_Ka_Samay
#DrSharadSingh #miss_sharad

मंगलवार, जून 09, 2020

जिंदा मुहावरों का समय ... डाॅ शरद सिंह के संस्मरण पुस्तक के अंश - 5

 इंटरव्यू जो मैंने तत्कालीन सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस श्री एस पी नायडू से लिया था। आपको बता दूं कि श्री एसपी नायडू मशहूर क्रिकेटर कर्नल सीके नायडू के पुत्र थे। उनसे मेरी लंबी-चौड़ी सार्थक बातचीत हुई थी। यह इंटरव्यू मैंने दस्यु चाली राजा के सरेंडर के बाद लिया था जिसमें बाकी बचे डकैतों के सरेंडर के बारे में भी उनसे चर्चा हुई थी। यह 11 जुलाई 1982 को साप्ताहिक "रेवांचल" में प्रकाशित हुआ था।
Revanchal, 11 July 1982, Naidu Interview, Dr Sharad Singh


जिंदा मुहावरों का समय ... डाॅ शरद सिंह के संस्मरण पुस्तक के अंश - 4

कल रात मैंने अपनी फाईल पलटी तो उसमें मुझे अपनी 08 जुलाई 1982 की वह रिपोर्ट मिली जो मैंने दस्यु चाली राजा के सरेंडर पर लिखी थी।

निश्चित रूप से योगेंद्र सिंह सिकरवार जी के लिए भी वे दिन अविस्मरणीय होंगे क्योंकि उन दिनों संपूर्ण बुंदेलखंड क्षेत्र में डकैतों का आतंक था । विशेष रुप से पन्ना जिले में डकैत चाली राजा ने आतंक मचा रखा था और इस आतंक को मिटाने के लिए स्थानीय पुलिस बल के साथ में बीएसएफ का भी सहयोग लिया गया था।

मुझे आज भी याद है चाली उर्फ़ चार्ली राजा एक निहायत दुबला-पतला सामान्य-सी कद-काठी वाला एक आम ग्रामीण युवक दिखता था। यदि उसके हाथ में बंदूक न होती तो शायद वह किसी को भी मारने की हिम्मत नहीं रखता। यदि देखा जाए तो ग्रामीणों में से किसी का भी डकैत बनना बदले की भावना के हाथों में हथियार आ जाने की प्रक्रिया थी।
जिन्होंने सरेंडर किया वे जीवित रहे और अपने जीवन की दूसरी पारी जी सके जबकि अनेक डकैत पुलिस के हाथों मारे गए।
इसी संदर्भ में एक और वाकया मुझे याद आ रहा है जब मैं उन दिनों छतरपुर में कक्षा सातवीं में पढ़ती थी। मेरी मां उन दिनों B.Ed ट्रेनिंग के लिए छतरपुर में रह रही थीं और मैं उनके साथ वही पढ़ती थी। उन दिनों छतरपुर जिले में भी डकैतों का आतंक था। जब डकैत पुलिस के हाथों मारे जाते तो पुलिस वाले उनके शवों को ट्रैक्टर ट्रॉली में रखकर सार्वजनिक स्थान पर प्रदर्शित करते थे ताकि बाकी डकैतों तक यह संदेश जा सके कि यदि वे सरेंडर नहीं करेंगे तो उनका भी यही हश्र होगा। साथ ही जनता आश्वस्त हो सके कि डकैत मारे जा रहे हैं।

एक दिन स्कूल से लौटते समय मैंने भी छत्रसाल चौराहे पर ऐसी ही एक ट्रॉली देखी थी जिसमें तीन या चार शव प्रदर्शित थे । मुझे बहुत अज़ीब लगा था, वह सब देख कर। मैंने मां से इस बारे में चर्चा की थी। तब मां ने मुझे समझाया था कि आइंदा मैं ऐसा कोई दृश्य न देखूं और जो देखा है वह सब भुला दूं । उन दिनों तो शायद मैंने भुला भी दिया था लेकिन मेरी स्मृतियों के किसी कोने में वह दृश्य आज भी ताज़ा है और मुझे लगता है कि इस तरह से शवों के प्रदर्शन का वह तरीक़ा बिल्कुल भी ठीक नहीं था क्योंकि सार्वजनिक स्थान पर मेरी तरह बच्चे भी मौजूद होते थे।
पन्ना में पत्रकारिता करते हुए दस्यु उन्मूलन अभियान के बारे में बारीक़ी से जानने का मुझे मौका मिला। डकैत चाली राजा के सरेंडर के बाद यह समस्या खत्म नहीं हुई। कोई न कोई छुटपुट डकैत पैदा होता रहा। एक बार मुझे भी एक एनकाउंटर स्थल देखने का मौका मिला। दरअसल, हम पत्रकारों को सुबह पुलिस की ओर से सूचना मिली कि रात को कुछ डकैतों के साथ एनकाउंटर किया गया है, जिसमें कुछ डकैत मारे गए हैं। घटनास्थल पर उनके शव यथास्थिति मौजूद थे। जिन्हें देखने के लिए हम पत्रकारों को आमंत्रित किया गया था। मैं भी साथी पत्रकारों के साथ घटना स्थल पर गई। वहां मैंने पहली बार किसी ऐसे शव को देखा जिसके सिर पर गोली लगी थी और उसका भेजा बाहर आ गया था। वह मृतक डकैत बिल्कुल भी डकैत जैसा नहीं लग रहा था बल्कि किसी आम ग्रामीण की भांति दिखाई दे रहा था। उन दिनों यह भी अफ़वाह थी कि पुलिस अपना रिकॉर्ड ठीक करने के लिए फेक एनकाउंटर भी कर रही है। उन शवों को देखने के बाद यह कहना कठिन था कि वह रियल एनकाउंटर है या फेक एनकाउंटर। पर हमारे पास पुलिस पर विश्वास करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था क्योंकि हम चाली राजा को देख चुके थे जो देखने में एकदम आम ग्रामीण युवक दिखाई देता था। वैसे मैंने डकैत मूरत सिंह, डकैत मौनीराम सहाय को छतरपुर में उनके आत्मसमर्पण के समय देखा था। जबकि डकैत पूजा बब्बा से मेरी मुलाकात पन्ना में स्थित लक्ष्मीपुर की खुली जेल में हुई थी और उनसे चर्चा भी हुई थी यद्यपि मैं वहां पत्रकार के रूप में नहीं बल्कि वहां के जेलर जो हमारे पारिवारिक परिचित थे, उनके आमंत्रण पर मां और दीदी के साथ गई थी। पूजा बब्बा बहुत ही सुलझे हुए व्यक्ति लगे थे। उनकी एक आंख पत्थर की थी जिससे उन्हें देखने से एक अजीब भय उत्पन्न होता था। लेकिन बातचीत करने के बाद वह भय दूर हो गया था। उन्होंने हमें दूध और इलायची से बनी शरबत पिलाई थी। जब मैंने उनके बारे में जानकारी ली तो पता चला कि वह परिस्थितिवश डकैत बने थे और सरकार के द्वारा खुली जेल में रहकर सामान्य जीवन की ओर फिर से लौटने का प्रस्ताव मिलने पर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था। वैसे दस्यु मूरत सिंह, मोनी राम सहाय और पूजा बब्बा का व्यक्तित्व उसी प्रकार का था जैसे फिल्मों में अच्छे वाले डकैत दिखाए जाते हैं। डकैत मूरत सिंह के बारे में कहा जाता था कि वे सिर्फ़ अमीरों को लूटते थे और गरीबों की मदद करते थे। वे छतरपुर स्थित जटाशंकर मंदिर के लिए दान-दक्षिणा दिया करते थे। जिस प्रकार मूरत सिंह के सरेंडर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की विशेष भूमिका रही, उसी प्रकार चाली राजा के सरेंडर में म.प्र.शासन के तत्कालीन संसदीय सचिव कैप्टन जयपाल सिंह की खास भूमिका रही, जो कि पन्ना के ही थे।
Damoh Sandesh, 08,07,1982, Chaali Raaja, Dr Sharad Singh



जिंदा मुहावरों का समय ... डाॅ शरद सिंह के संस्मरण पुस्तक के अंश - 3

सन् 1983 में जबलपुर से प्रकाशित होने वाले "नवीन दुनिया" में छपी मेरी तस्वीर...
उन दिनों हमारे पास सोनी कंपनी का ब्लैक एंड वाइट फोटो वाला एक छोटा-सा कैमरा था, उसी कैमरे से वर्षा दीदी ने मेरी यह तस्वीर खींची थी।
Sharad Singh, 1983 By Sony Camera Published in Navin Dunia, Jabalpur

जिंदा मुहावरों का समय ... डाॅ शरद सिंह के संस्मरण पुस्तक के अंश - 2

ये है 'जनसत्ता' में सन् 1988 में प्रकाशित हुई मेरी रिपोर्ट ....
Jansatta, 27 Feb1985, Dr Sharad Singh

जिंदा मुहावरों का समय ... डाॅ शरद सिंह के संस्मरण पुस्तक के अंश

मेरे संस्मरणों की पुस्तक ‘‘जिंदा मुहावरों का समय’’ में मैं एक अध्याय मेरे उस दिनों के संस्मरणों का है जब मैं एक सक्रिय पत्रकार थी। उसके कुछ अंश अपनी प्रकाशित रिपोर्टस और तस्वीरों के साथ इस अपने ब्लाॅग में साझा करती रहूंगी ......

अपने कॉलेज जीवन से ही मैंने जर्नलिज्म शुरू कर दिया था। सन् 1980 से 1988 तक बतौर रिपोर्टर विभिन्न समाचार पत्रों के लिए मैंने सक्रियता से काम किया। उन दिनों की चर्चित पत्रिका 'रविवार' और 'आज' समूह के प्रकाशन की पत्रिका 'अवकाश' के लिए भी मैंने रिपोर्टिंग की थी।

आज अपनी एक पुरानी फाइल खोलने पर मेरी कुछ पुरानी रिपोर्टिंग्स मेरी नजरों से गुज़री जिन्हें मैं आपसे क्रमशः साझा करती रहूंगी.....

जिनमें से ये है 'जनसत्ता' में सन् 1985 में प्रकाशित हुई मेरी रिपोर्ट ....
Jansatta, 31 May 1985, NMDC Panna,  Dr Sharad Singh


बुधवार, अगस्त 31, 2016

मुक्तिबोध ! तुम्हें बोध था मुक्ति के द्वार का - शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
‘‘सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के मुक्तिबोध विशेषांक में मेरा संपादकीय ...
(सामयिक सरस्‍वती, संपादक Mahesh Bhardwaj, कार्यकारी संपादक Sharad Singh) का अप्रैल-जून 2016 अंक गजानन माधव मुक्तिबोध पर केंद्रित विशेषांक )

मुक्तिबोध ! तुम्हें बोध था मुक्ति के द्वार का
- शरद सिंह
गजानन माधव मुक्तिबोध का शताब्दी वर्ष इसी वर्ष अर्थात्  2016 के नवंबर माह में आरम्भ हो जाएगा। शताब्दी वर्ष आरम्भ होते ही मुक्तिबोध की रचनाशीलता और सृजन पर चर्चा-परिचर्चा, संगोष्ठियों तथा आकलन का दौर भी आरम्भ हो जाएगा। इस कोलाहल से पहले ‘सामयिक सरस्वती’ का यह अंक ‘मुक्तिबोध विशेषांक’ के रूप में रखने का उद्देश्य मात्रा यही है कि मुक्तिबोध के तमाम सृजन को आत्मसात करते हुए शताब्दी वर्ष तक पहुंचा जाए... ताकि हम उन्हें भली-भांति जान, समझ लें जिनका शताब्दी वर्ष मनाने जा रहे हैं।
वस्तुतः मुक्तिबोध के विचारों को समझना सरल नहीं हैं। उनके शब्द सरल प्रतीत हो सकते हैं किन्तु उन शब्दों की गहराई उस तल तक ले जाती है जहां वाद-विवाद से परे मानवधर्म सम्वाद करता मिलता है। मुक्तिबोध का काव्य छायावादी शैली से आरम्भ हो कर यथार्थवाद की ओर अग्रसर हुआ। वे अपनी कविताओं में कबीर की तरह मुखर दिखाई देते हैं। ‘खतरे उठाने ही होंगे’ में समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है। यदि मुक्तिबोध के समग्र साहित्य का पुनर्मूल्यांकन किया जाए तो हम पाएंगे कि आज जिन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रश्नों के उत्तर हम ढूंढ रहे हैं, उन अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर हैं मुक्तिबोध के साहित्य में। समय की नब्ज़ को थामने और धड़कनें गिनने की क्षमता अपने समकालीन साहित्यकारों की अपेक्षा मुक्तिबोध में कहीं अधिक थी। यह भी उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध अपने साहित्य को ले कर अपने जीवनकाल में उतने लोकप्रिय नहीं हुए जितने कि मरणोपरांत।
सन् 1980 में जबलपुर में राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक संघ का महाअधिवेशन हुआ। अनेक लेखक उसमें उपस्थित हुए। उस समय मध्यप्रदेश के शिक्षा एवं संस्कृति सचिव अशोक वाजपेयी थे तथा मुख्यमंत्राी थे अर्जुन सिंह। अर्जुन सिंह ने उस सम्मेलन में लेखकों का स्वागत करने के लिए आने की इच्छा जताई। लेखकों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। शिव कुमार मिश्र नाराज़ हो कर गुजरात लौट गए और विश्वंभर उपाध्याय ने भी विरोध किया। सम्मेलन की अध्यक्षता हरिशंकर परसाई ने की, उद्घाटन केदारनाथ अग्रवाल ने किया तथा संचालन ज्ञानरंजन एवं कमला प्रसाद ने किया। बहरहाल, इसी सम्मेलन में यह प्रस्ताव रखा गया कि किसी विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ की स्थापना की जाए। इसके लगभग महीने भर बाद मुख्यमंत्राी की ओर से घोषणा कर दी गई कि सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ की स्थापना की जाएगी। पीठ की जिम्मेदारी सौंपी गई हरिशंकर परसाई को। हरिशंकर परसाई इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार नहीं थे किन्तु उनके मित्रों ने उन पर दबाव बनाया और तब उन्हें मुक्तिबोध पीठ का दायित्व स्वीकार करना ही पड़ा।
त्रिलोचन शास्त्राी ने दो बार मुक्तिबोध पीठ का कार्यभार सम्हाला। अपने पहले कार्यकाल में वे अत्यंत सक्रिय रहे किन्तु दूसरे कार्यकाल तक वे अपनी अद्र्धांगिनी को खो चुके थे जिसके कारण भीतर ही भीतर उन्हें अवसाद घेरने लगा था। इसीलिए दूसरा कार्यकाल, पहले कार्यकाल की अपेक्षा शिथिल रहा। इस पीठ का दायित्व नरेश सक्सेना तथा श्याम सुंदर दुबे ने भी सम्हाला।
मुक्तिबोध तारसप्तक के पहले कवि थे। उन्होंने अपने जीवन को सक्रियता से जिया तथा साहित्य सृजन के प्रति समर्पित रहे किन्तु विडम्बना यह कि उनकी कविताओं का पहला संकलन ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ उनकी मृत्यु के बाद ही प्रकाशित हुआ। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ का दूसरा संस्करण भी उनकी मृत्यु के दो महीने बाद प्रकाशित हुआ। मुक्तिबोध की कविताओं में भावनाओं की एक अलग ही आंच रही। इस आंच की तपिश को महसूस करते हुए वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने टिप्पणी की थी कि ‘‘अपनी आलोचनात्मक क्षमता के द्वारा मुक्तिबोध ने प्रमाणित कर दिया कि कोई भी चीज तभी स्पष्ट होती है जब कम-से-कम एक ईमानदार व्यक्ति मौजूद हो।’’
मुक्तिबोध को कविताओं के लिए अधिक ख्याति मिली किन्तु उनकी कहानियां भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। मुक्तिबोध की कहानियों में कथानकों की विविधता और कथन की तीक्ष्णता को देखते हुए इस बात की कसक रह जाती है कि यदि वे और कहानियां लिख पाए होते तो हिन्दी कथा साहित्य को समृद्ध करने में उनकी एक अलग पहचान होती। जहां तक मुक्तिबोध की विचारधारा का प्रश्न है तो कुछ विद्वानों ने मुक्तिबोध को माक्र्सवादी और समाजवादी विचारों से प्रभावित कहा, तो कुछ ने उन्हें अस्तित्ववाद से प्रभावित ठहराया। डाॅ. रामविलास शर्मा ने भी उन्हें अस्तित्ववाद से प्रभावित बताते हुए उनकी कविताओं को खारिज किया। लेकिन प्रत्येक वाद-विवाद के सार में मुक्तिबोध मानववादी मूल्यों पर खड़े दिखाई दिए।
एक लेखिका एवं एक पाठिका दोनों ही दृष्टि से मैंने जब मुक्तिबोध की कहानियों को पढ़ा तो मैंने अनुभव किया कि मुक्तिबोध कविताओं में भले ही वामपंथी अथवा अस्तित्ववादी दिखाई दें किन्तु कहानियों में वे विशुद्ध मानवतावादी और स्वस्थ सामाजिक मूल्यों से परिपूर्ण विचारों की पैरवी करते दिखाई देते हैं, और यही तथ्य उनकी मूल्यवत्ता को सौ गुना बढ़ा देता है। मुक्तिबोध की कहानियों से हो कर गुजरने के बाद मुक्तिबोध के कथा संसार के मानवतावादी मूल्यों को सहज ही अनुभव किया जा सकता है।
आजकल उच्चशिक्षा केन्द्रों में राजनीति का जो रूप देखने को मिल रहा है उसके तारतम्य में याद आती है मुक्तिबोध की कहानी ‘ब्रह्मराक्षस’ जिसमें उन्होंने भारतीय शिक्षा परम्परा को अपने अनूठे ढंग से रेखांकित किया है। यह एक अभिशप्त गुरु की कथा है। एक ऐसे गुरु की कथा जो अपने प्रत्येक शिष्य में उस योग्य शिष्य की तलाश करता है जो उसकी समस्त विद्या को ग्रहण कर ले। अंततः उसे एक ऐसा शिष्य मिल ही जाता है जो उसकी समस्त आज्ञाओं का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करता है। गुरु का अपना एक भेद था किन्तु समस्या यह थी कि वह केवल निष्णात शिष्य से ही अपना भेद साझा कर सकता था। जब उसका परम आज्ञाकारी शिष्य शिक्षा में निष्णात हो गया तब उसने अपने शिष्य के सामने अपना भेद खोलते हुए बताया कि वह शापित ब्रह्मराक्षस है और अब वह अपने सबसे योग्य शिष्य अर्थात् उसे अपना गुरुपद सौंप कर मुक्त हो रहा है। वह अपने शिष्य से कहता है-‘‘मैंने अज्ञान से तुम्हारी मुक्ति की। तुमने मेरा ज्ञान प्राप्त कर मेरी आत्मा को मुक्ति दिला दी। ज्ञान का पाया हुआ उत्तरदायित्व मैंने पूरा किया। अब मेरा यह उत्तरदायित्व तुम पर आ गया है। जब तक मेरा दिया तुम किसी और को न दोगे तब तक तुम्हारी मुक्ति नहीं।’’
मुक्तिबोध न तो साम्यवादी विचारधारा के थे और न पूंजीवादी विचारधारा के, वे मूलरूप में मानवतावादी थे, मात्रा मानवतावादी। मुक्तिबोध एक उच्चकोटि के कवि ही नहीं वरन् एक कुशल कहानीकार भी थे जिन्होंने अपनी प्रत्येक कहानी में जीवन की सार्थकता के लिए मानववाद की पैरवी की। चाहे ‘ब्रह्मराक्षस’ हो या ‘दीमक और पक्षी’, चाहे ‘काठ का सपना’ हो या ‘क्लाॅड ईथरली’ या फिर ‘प्रश्न’- मुक्तिबोध संबंधों की ईमानदारी, स्त्राी-पुरुष पारस्परिक संवेगों के महत्व, समाज और व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध को प्राथमिकता देते हैं। वे अपनी कहानियों में जहां एक ओर स्वाद रूपी दीमक के लिए अपने पंख बेचने वाले पक्षी की नीतिकथा को अंतर्निहित करते हैं तो वहीं, संत बने रहने के लिए अपनी जननेंद्रीय को चाकू से काट देने वाले एबीलार्ड का भी स्मरण कराते हैं। मुक्तिबोध अपनी कहानियों में साम्यवादी विचारों के अंधानुकरण पर चोट करते दिखाई पड़ते हैं। वे ‘क्लाॅड ईथरली’ में खुल कर लिखते हैं-‘‘क्या हमने इंडोनेशियाई या चीनी या अफ्रीकी साहित्य से प्रेरणा ली है या लुमुंबा के काव्य से? छिः छिः ! वह जानवरों का, चैपायों का साहित्य है! और रूस का? अरे! यह तो स्वार्थ की बात है! इसका राज और ही है। रूस से हम मदद चाहते हैं, लेकिन डरते भी हैं।’’
मुक्तिबोध ने ‘जनता का साहित्य क्या है?’, इस विषय पर ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में लिखा है कि- ‘‘साहित्य का संबंध आपकी भूख-प्यास से है, मानसिक और सामाजिक। किसी भी प्रकार का आदर्शात्मक साहित्य जनता से असबंद्ध नहीं है। दरअसल जनता का साहित्य का अर्थ, जनता को तुरंत ही समझ में आने वाले साहित्य से हरगिज नहीं। ऐसा होता तो किस्सा, तोता-मैना और नौटंकी ही साहित्य के प्रधान रूप होते।कृतो फिर जनता का साहित्य का अर्थ क्या है। इसका अर्थ है ऐसा साहित्य जो जनता के जीवन मूल्यों को, जनता के जीवन आदर्शों को प्रतिस्थापित करता हो, उसे अपने मुक्तिपथ पर अग्रसर करता हो। इस मुक्तिपथ का अर्थ राजनीतिक मुक्ति से लेकर अज्ञान से मुक्ति तक है।’’ इस दृष्टि से देखा जाए तो मुक्तिबोध की कहानियों का आकलन उनके ‘वामपंथी प्रेरित होने’ के विचार से हट कर, किसी भी ध्रुवीय वादविशेष को आधार न मानते हुए मानवतावादी कहानीकार होने के रूप में किए जाने पर ये कहानियां अपेक्षाकृत अधिक बड़े फलक की कहानियां सिद्ध होती हैं।
‘सामयिक सरस्वती’ के इस अंक में मुक्तिबोध के कवि, लेखक, आलोचक, कहानीकार एवं पत्राकार पक्ष का परिचय तो मिलेगा ही साथ ही उनके जीवन से जुड़े रोचक संस्मरणों से गुज़रने का भी अवसर मिलेगा। इस विशेषांक के अतिथि संपादक हैं युवा साहित्यकार एवं समीक्षक दिनेश कुमार।
मुझे विश्वास है कि यह अंक ‘सामयिक सरस्वती’ के सुधी पाठकों को पसंद आएगा।
और अंत में मुक्तिबोध के सृजन के प्रति समर्पित मेरी एक कविता ....
मुक्तिबोध !
तुम्हें बोध था
मुक्ति के द्वार का
तभी तो ‘अंधेरे में’ तुमने
उजाले के रख दिए कुछ बिन्दु
टिमटिमाते हुए
फिर जुगनुओं की खेप
उपजा दी स्याही से, कागज़ पर
ताकि अंधेरे में रह कर भी
हम पा सकें उजाले की
असीमित संभावनाएं
और जी सकें अपने यथार्थ को।
------------------------------------------

Also can read on this Link ...
https://issuu.com/samyiksamiksha/docs/samayik_saraswati_april_june_2016

https://www.slideshare.net/samyiksamiksha/samayik-saraswati-april-june-2016
Samayik Saraswati April-June 2016 - Editorial (1)

Samayik Saraswati April-June 2016 - Editorial (2)
Samayik Saraswati April-June 2016 - Cover