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शनिवार, जनवरी 11, 2025

कहानी | प्रेम वाया एल. डी. आर. | डॅा.(सुश्री) शरद सिंह | पहला अंतरा में प्रकाशित

"पहला अन्तरा" अक्टूबर-दिसंबर 2024 में प्रकाशित :

कहानी
   प्रेम वाया एल. डी. आर.  
       - डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

  ‘‘सुरू! देख यदि तुझे कोई पसंद है तो पहले बता दे। तेरे लिए कई जगह से रिश्ते आ रहे हैं। यदि तुझे ऑब्जेक्शन न हो तो हम तेरे लिए लड़का पसंद करें।’’ मां ने सुरू यानी सुरेखा से दो-टूक शब्दों में पूछा। यह अच्छी बात थी कि मां ने एक न्यू जेनरेशन माॅम की तरह सुरेखा से खुल कर उसकी इच्छा पूछी। जबकि खुद सुरेखा की मां को यह अवसर नहीं दिया गया था। वह तो ऊपर वाले की कृपा से सुरेखा की मां को खुले विचारों वाला, सुलझा हुआ पति मिला। इसीलिए यह संभव हो सका कि सुरेखा की मां ने सुरेखा के पिता के सामने यह प्रश्न सुरेखा से पूछ लिया।
‘‘हां बेटी बोलो! अगर तुम्हारी कोई च्वाइस हो तो हम उसका रिस्पेक्ट करेंगे। बस, थोड़ी जांच-पड़ताल जरूर करेंगे। पेरेंट्स होने के नाते। लेकिन अपनी मर्जी तुम पर थोपेंगे नहीं। आई स्वेयर!’’ सुरेखा के पिता ने अपनी पत्नी के प्रश्न का समर्थन करते हुए कहा।
‘‘थैंक्यू ममा! थैंक यू पाॅप! मैं आप लोगों को बताने ही वाली थी कि मुझे एक लड़के पर क्रश है।’’ कह कर सुरेखा चुप हो गई।
‘‘सिर्फ़ क्रश? लव नहीं?’’ मां ने मुस्कुरा कर पूछा।
‘‘आई थिंक आई हैव फालेन लव विथ हिम!’’ सुरेखा ने कुछ सोचते हुए कहा।
‘‘यू थिंक? नाॅट श्योर?’’ अब पिता ने चिंतित होते हुए पूछा।
‘‘याह! बिकाज़ वी आर लिविंग इन एल.डी. आर.।’’ सुरेखा ने सधे हुए स्वर में उत्तर दिया।
‘‘व्हाट मीन एल.डी. आर.?’’ मां और पिता दोनों एक साथ पूछ बैठे।
‘‘लिव इन?’’ फिर मां ने सशंकित स्वर में पूछा।
‘‘लिव इन! माॅम आप ये क्या कह रही हैं? मैं पूरे समय अपने कमरे में अकेली बंद रहती हूं। क्या आपने किसी बंदे को मेरे रूम में आते देखा है कभी?’’ सुरेखा खिलखिला कर हंस पड़ी।
मां झेंप गई। बेटी सही कह रही थी। वह अकेली अपने कमरे बैठी रहती है अपनी कंपनी की ड्यूटी बजाती हुई। क्या पूछ बैठी वह भी! मां ने मन ही मन अपने माथे को ठोंका।
‘‘ओके! लड़का कहां का है? अपने ही शहर का है?’’ पिता ने एल.डी. आर. का फुल फार्म पूछने का रिस्क नहीं लिया। क्या पता उसे भी बेटी के सामने अपने अज्ञान पर लज्जित होना पड़े।
‘‘भावनगर का है।’’ सुरेखा ने बताया।
‘‘यानी गुजरात?’’ पिता ने कहा।
‘‘जी, अभी तक तो भावनगर गुजरात में ही है।’’ सुरेखा ने चुटकी ली। वह नए जेनरेशन की बेटी थी, मांता-पिता से झिझकने का तो सवाल ही नहीं था। मौका पाते ही अटैक!
‘‘तुम्हारे साथ पढ़ता था? या तुम्हारी कंपनी में है?’’ पिता ने सावधानीपूर्वक पूछा।
‘‘दोनों गलत! बट नाऊ आई एम बिज़ी! बाकी बातें बाद में करूंगी।’’ सुरेखा ने माता-पिता से कहा और बैठक से उठ कर अपने कमरे की ओर बढ़ ली। फिर सहसा पलट कर बोली,‘‘मेरे लिए फिलहाल लड़का मत ढूंढिए। यदि मुझे कोई सही बंदा नहीं मिला तो एट लास्ट मैं आप लोगों को बता दूंगी।’’
सुरेखा मुस्कुराती हुई अपने कमरे में चली गई। उसके पीछे उसके कमरे का दरवाज़ा डोर-क्लोज़र के द्वारा अपने-आप बंद हो गया। बंद दरवाज़े पर बड़ा-सा पोस्टर लगा था -‘‘डोंट ट्राई इंटर माई रूम! इट वुड बी ए क्राईम!’’ (मेरे कमरे में प्रवेश करने का प्रयास मत करना! यह अपराध होगा!) साथ में एक घूंसे की तस्वीर थी।
घर में तीन प्राणी रह रहे थे। सुरेखा, उसकी मां और पिता। सुरेखा का बड़ा भाई चार साल पहले बैंकाक चला गया था। आज भी वहीं है। लौट कर आने का उसका इरादा भी नहीं है। घर में काम करने वाली नौकरानी इतनी अंग्रेजी समझती नहीं है, हां, वह घूंसा जरूर समझ जाती होगी। तो यह लिखित चेतावनी स्पष्ट है कि माता-पिता के लिए ही है कि वे अपनी सीमाओं का ध्यान रखें और उसका उल्लंघन करने के बारे में सोचे भी नहीं।    
वैसे इस कहानी का शीर्षक पढ़ कर इस भ्रम में मत पड़ जाइएगा कि यह कोई पारंपरिक प्रेम का किस्सा है। वैसे प्रेम पारंपरिक हो सकता है किन्तु प्रेम का तरीका पारंपरिक हो, यह आवश्यक तो नहीं।
जब प्रेम की हवाएं चलती हैं तो उसमें कभी रातरानी की सुंगध भर जाती है तो कभी महुए की मदकता। कभी आम्रमंजरी झूमने लगती है तो कभी माॅर्निंग ग्लोरी की घंटेनुमा फूलों वाली बेलें डोलने लगती हैं। यह बात और है कि प्रेम आजकल बागीचों ने नहीं बल्कि मोबाईल या टेबलेट या फिर लैपटाॅप के स्क्रीन से गुरू होता है। वह भी किसी एप्प के जरिए। चाहे वह चेहरे वाली किताब का एप्प हो या क्या हुआ एप्प या फिर ग्राम-छटाक वाला एप्प। उस पर अगर कहीं रील वाला एप्प हुआ तो प्रेम नाचता-गाता, थिरकता या फिर प्रैंक करता हुआ आता है। है न, विचित्र बात? नहीं! ये सारी बातें भी अब पुरानी हो चली हैं। अब प्रेमी जोड़े का एक प्राणी बैंगलुरु में होता है तो दूसरा गुरुग्राम में। एक चेन्नई में तो दूसरा लद्दाख में। एक दिल्ली में तो दूसरा वाशिंगटन में। लो कर लो प्यार!
मगर प्यार तो प्यार है जैसे सुरेखा और कार्तिक को हो गया। बुंदेलखंड के ठाकुर साहब की बेटी और भावनगर के पटेल साहब के छोकरे कार्तिक के बीच प्यार। अब आप सोचेंगे कि दोनों एक साथ पढ़ते रहे होंगे। सहपाठियों में प्रेम होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं था। उस छोटे से वायुयान में उड़ने सेे पहले वे दोनों एक दूसरे से मिले ही नहीं थे। भले ही वह उड़ान उनकी साथ-साथ पहली उड़ान थी, भले ही उससे पहले उन्होंने एक-दूसरे को साक्षात नहीं देखा था, परस्पर स्पर्श की बात तो बहुत दूर की है। लेकिन दोनों उस उड़ान से पहले ही एक-दूसरे के प्रेम में तन-मन से सिर से ऊपर तक डूब चुके थे, फिर भी अपने प्रेम को ले कर आश्वस्त नहीं थे।
अपने एक साझा मित्र के सौजन्य से दोनों ने एक पापुलर एप्प पर एक-दूसरे की तस्वीर देखी और बस फ़िदा हो गए एक-दूसरे पर। प्रथम दृष्टि में प्रेम ज़रिए सोशल मीडिया एप्प। जिस दिन से दोनों को यह अनुभव हुआ कि वे दोनों एक-दूसरे के लिए बने हैं बस, उसी दिन से दोनों का समय सोशल मीडिया के थ्रू एक-दूसरे के हवाले हो गया। यह भी एक तरह का फ़ोमो ही था। फ़ोमो यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट। यानी कहीं कुछ छूट न जाए। दोनों एक दूसरे की हर पोस्ट को लाईक करते। उस पर कमेंट करते। बड़ी मेहनत से ढूंढ-खोज कर सटीक इमोजीज़ लगाते। ऐसा करते हुए दोनों का दिल तेजी से धड़कता। आंखों की पुतलियां फैल जातीं। होंठों पर मुस्कुराहट गहराने लगती। दोनों की पीठ अपने कमरे के बंद दावाज़े की ओर होती। यूं भी बिना थापा दिए किसी को कमरे में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। फिर भी यदि कहीं कोई भूले से अचानक प्रवेश कर जाए तो उनके चेहरे की भाव-भंगिमा न देख सके। फिर एक अदृश्य उंगली विंडो टैब पर हमेशा रहती। ताकि आपातकाल में एक्टिव विंडो को गिरा कर किसी इनेक्टिव विंडो को जगा दिए जाए। जैसे कार्यालयों में ड्यूटी टाईम में अपने कम्प्यूटर पर ताश के पत्तों का गेम खेलने वाले अकसर करते हैं। बाॅस अगर सिर पर आ कर खड़ा हो जाए तो वह यही पाएगा कि बेचारा बंदा कितने मनोयोग से डाटा अपडेट कर रहा है।
सुरेखा और कार्तिक के कमरों में भी यदि किसी का आपात प्रवेश होता तो वह यही पाता कि वे अपने लैपटाॅप पर कितनी तन्मयता से अपनी-अपनी ऑनलाईन ड्यूटी कर रहे हैं। वर्क फ्राम होम के ढेर सारे लाभों में से एक बहुत बड़ा लाभ यह भी है। अपना कमरा, अपना लैपटाप, अपनी दुनिया। चाहें आप ऑन लाईन गेमिंग करें या ऑन लाईन लविंग, सब कुछ पूरी पर्देदारी के साथ, निश्चिंत हो कर। दरअसल इश्क़ परवान चढ़ने के तरीके ढूंढ ही लेता है, उसके लिए किसी को अतिरिक्त श्रम करने की या माथा खपाने की आवश्यकता नहीं होती है।
सुरेखा से कहीं अधिक ‘‘मोस्ट एलिजिबल बैचलर’’ कार्तिक था। धनाढ्य व्यवसायी परिवार का दैदिप्यमान नक्षत्र। सारे बड़े ग्रहों से ले कर क्षुद्र ग्रह तक अपनी-अपनी सुपुत्री के लिए उसके लिए परिक्रमा करना शुरू कर चुके थे। मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर काम करने वाला। एक बड़े पैकेज का कमाऊ पूत। हर माता-पिता को उसके साथ अपनी बेटी का भविष्य सुरक्षित और सुखद दिखाई दे रहा था। कार्तिक के परेशान माता-पिता पचहत्तर प्रतिशत प्रगतिशील थे। उन्होंने चंद लड़कियां की तस्वीरें बटोर लीं और फिर वही प्रश्न कार्तिक से किया जो उधर सुरेखा से किया गया था।
‘‘हूं कहूं छूं, कार्तिक तेरे को कोई छोकरी पसंद है क्या? टेल मी!’’ कार्तिक की मां ने उसकी प्लेट में सैंडविंच रखते हुए पूछा। उनकी भाषा भी गुजराती हिंदी और अंग्रेजी की सेंडविच थी।
नाश्ते का समय अर्थात् पटेल परिवार में पारिवारिक बातें करने का सही समय। क्योंकि उसके बाद कार्तिक अपने कमरे में बंद हो जाता है। उसकी छोटी बहन चारुल इंस्टीट्यूट चली जाती। कार्तिक के पिता अपनी कंपनी के आफिस चले जाते थे और मां अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाती थी जिसमें शाॅपिंग से ले कर किटी पार्टी तक शामिल थी। रात को थके-मांदे मन से कोई बातें करने के मूड में नहीं रहता था। उनका दोपहर का भोजन कभी साथ नहीं होता था। सभी अपनी-अपनी सुविधानुसार दोपहर का भोजन करते थे। कार्तिक तो प्रायः अपनी थाली अपने कमरे में ही ले जाता था। उसके कमरे के बंद दरवाज़े के बाहर उसी तरह की लगभग चेतावनी वाला पोस्टर लगा था, जैसा कि सुरेखा के कमरे के दरवाज़े के बाहर। सैंकड़ों मील की दूरी, पर पोस्टर एक-सा, विचार एक से, जिसका सार था-‘‘हमारे जीवन में ताक-झांक मत करो! यह अपराध है।’’
वस्तुतः आयु के हर पड़ाव पर अपराध के अर्थ बदलते रहते हैं। बचपन में चाॅकलेट चुराने वाले के लिए चेतावनी होती है, अर्द्ध युवावस्था में कौतूहल पर रोक लगाने वालों के लिए चेतावनी होती है और पूर्ण युवावस्था निजता के मौलिक अधिकार की ताल ठोंक कर घोषणा कर देती है। समझदार माता-पिता अपने बेटे या बेटी के इस अधिकार का सम्मान कर के घर में शांति बनाए रखते हैं। वहीं, चंद अविवेकी माता-पिता इस अधिकार को नकार कर घर में गंभीर कलह को दावत दे देते हैं। कार्तिक के माता-पिता प्रथम श्रेणी के थे। उन्होंने तब तक कार्तिक की निजता को निजी रहने दिया जब तक कि उन पर लड़की वालों का दबाव नहीं पड़ने लगा।
‘‘हां बेटा, शुं तमने कोई छोकरी गमे छे?’’ पिता ने भी मां का ही प्रश्न दोहराया कि क्या तुम्हें कोई लड़की पसंद है?
‘‘हां कदाच! आई थिंक सो!’’ कार्तिक ने उत्तर दिया।
‘‘थिंक ऑर श्योर?’’ वही प्रश्न किया कार्तिक के पिता ने। सुरेखा के पिता वाला प्रश्न। मसला वही, पिता का उत्तरदायित्व वही, सो प्रश्न भी वही रहना ही था। फिर यह प्रश्न दुनिया की चाहे जिस भाषा, जिस समुदाय या जिस देश में किया जाता।
‘‘आई एम श्योर, बट नाॅट श्योर टू।’’ कार्तिक ने उलझन भरे स्वर में कहा।
‘‘क्या मतलब? तुम श्योर भी हो और नहीं भी? ये क्या बात हुई?’’ पिता का सिर चकरा गया।
‘‘आई लाईक हर! आई लव हर! बट अभी हम एल.डी. आर. में हैं। हम एक बार मिल लें फिर मैं बता सकूंगा कि मैं श्योर हूं कि नहीं।’’ कार्तिक ने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया।
मगर अफ़सोस कि बात अभी भी माता-पिता के लिए स्पष्ट नहीं हुई थी।
‘‘आ एल.डी. आर. शुं छे?’’ मां ने पूछ ही लिया।
मां की बात सुन कर कार्तिक की छोटी बहन चारुल मुंह दबा कर हंसने लगी।
‘‘छोड़ो भी मां! बाद में बात करेंगे। वैसे अभी आप लोग लड़की देखने के चक्कर में मत पड़ो।’’ कहते हुए कार्तिक ने एक हाथ से अपना बचा हुआ सेंडविच उठाया और दूसरे हाथ से काॅफी का मग उठा कर अपने कमरे में जा समाया। माता-पिता और पुत्र की दुनियाएं फिर अलग-अलग हो गईं। निजता के अधिकार का पोस्टर दरवाजे पर दबंगई से मुंह चिढ़ा रहा था।
‘‘तू क्यों हंस रही है? ये एल.डी. आर. क्या है? तुझे पता है तो तू ही बता दे, वरना चुपचाप अपना नाश्ता खतम कर।’’ कार्तिक की मां ने बेटी चारुल को डांट लगाई।
‘‘अरे, मां यू आर वेल एजुकेटेड पर इतना नहीं समझतीं? एल.डी. आर. मतलब लांड डिस्टेंस रिलेशन। और भाई का सीक्रेट बताऊं? उनकी लांग डिस्टेंस रिलेशन गर्ल मध्यप्रदेश की है।’’ चारुल ने शान से बताया।
‘‘उसकी क्लासमेट थी?’’ मां ने पूछा।
‘‘नहीं!’’चारुल ने इनकार में सिर हिलाया।
‘‘कंपनी फैलो होगी!’’ पिता ने विश्वासपूर्वक कहा।
‘‘नहीं!’’ चारुल फिर मुस्कुराई।
‘‘यहां कोई केबीसी का क्विज नहीं चल रहा है। सो, जो जानती है वह पूरी बात बता।’’ मां ने फिर चारुल को झिड़का।
‘‘मां, मैं ज्यादा नहीं जानती। बस, इतना जानती हूं कि वे दोनों सोशल मीडिया पर मिले और उनमें अफेयर हो गया।’’ कहती हुई चारुल भी उठ खड़ी हुई। उसका नाश्ता समाप्त हो गया था।
बेटी के जाने के बाद पीछे छूट गए चिंतित मां-बाप।
कुछ देर दोनों ने आपस में सलाह-मशविरा किया फिर कार्तिक के कमरे का दरवाजा थपथपाया।
‘‘क्या है?’’ कार्तिक ने दरवाजा खोलते हुए पूछा।
‘‘बेटा हम लोग सोचते हैं कि तू एक बार उस लड़की से मिल ले। ताकि तू श्योर हो सके।’’ पिता ने कार्तिक से कहा।
‘‘हां, मैं भी यही सोच रहा था। मैं सुरेखा से प्लान कर के आप लोगों को बताता हूं।’’ कहते हुए कार्तिक ने फिर दरवाजा बंद कर लिया।
‘‘सुरेखा’’- कार्तिक के माता-पिता को पहली बार लड़की का नाम पता चला।

दूसरे दिन सुबह नाश्ते के समय कार्तिक ने बताया कि उसने और सुरेखा ने तय किया है कि वे लोग वीकेंड पर दो दिन के लिए पटाया जाएंगे।
‘‘पटाया यानी थाईलैंड?’’ माता-पिता दोनों चौंके।
‘‘क्या वो पटाया में रहती है?’’ मां ने पूछा।
‘‘नहीं, उसका भाई वहां बैंकाक में रहता है। लेकिन हम लोग उसके पास नहीं जाएंगे। हमने अपनी पटाया की ट्रिप ऑनलाइन बुक कर ली है। होटल में रुकेंगे।’’ कार्तिक ने बेझिझक बताया।
पर माता-पिता ने बेटे की बातें झिझक के साथ सुनी।
‘‘उसके पेरेंट्स मान गए? एक अनजान लड़के के साथ दूसरे देश जाने देने के लिए?’’ मां ने आश्चर्य भरे स्वर में का।
‘‘सो व्हाट मां? आमा नुकसान शूं छे? हम एक-दूसरे को खा थोड़े ही जाएंगे? मिलेंगे, एक-दूसरे को जानेंगे। ठीक लगा तो रिलेशन आगे बढ़ाएंगे, नहीं तो अपने-अपने रास्ते! और रही अनजान होने की बात, तो हम लोग डेढ़ साल से एल.डी. आर. में हैं। और मां जब मैं जर्मनी गया था ट्रेनिंग में तो यहां से मेरे साथ दो-तीन लड़के-लड़कियां गई थे। उस समय तो आपने ऑब्जेक्शन नहीं किया था। तो हवे शा माटे? अब क्यों?’’ कार्तिक ने धैर्यपूर्वक उत्तर देते हुए पूछा।
‘‘ठीक है, जैसा तुम ठीक समझो।’’ पिता ने हथियार डालते हुए कहा। वैसे भी उनका तो बेटा था। उन्हें कोई आंच आने वाली नहीं थी। एक ठेठ भारतीय पिता की भांति उन्होंने सोचा। अब यदि लड़की के मां-बाप परवाह नहीं कर रहे हैं तो वे क्यों चिंता करें? पिता ने स्वयं को समझाया।

ठीक यही प्रश्नोत्तरी उधर सुरेखा के साथ हुई जब उसने बताया कि वह अपने एल.डी. आर. के साथ दो दिन के लिए पटाया जा रही है। टिकट्स और होटल टूर एजेंसी के द्वारा बुक कराए लिए हैं।
स्पष्ट था कि सुरेखा के माता-पिता स्तब्ध रह गए। उस समय तक तो उन्हें एल.डी. आर. का भी अर्थ पता नहीं चल सका था।
‘‘पहले हमें बताओं के ये सब क्या चल रहा है?’’ सुरेखा की मां भड़क कर बोलीं। उनके धैर्य का बांध अब टूट गया था।
‘‘कुछ नहीं मां, हम लोग अभी लांग डिस्टेंस रिलेशनशिप में हैं लेकिन अब कार्तिक चाहता है कि हम एक बार मिल कर एक-दूसरे को अच्छे से जान लें कि हमारा भविष्य एक-दूसरे के साथ सही रहेगा कि नहीं।’’ सुरेखा ने सहज भाव से बताया।
‘‘तो उसे यहां क्यों नहीं बुला लेती हो? पटाया जाने की क्या जरूरत है?’’ मां ने कहा।
‘‘ओह माॅम! व्हाट काइंड आर यूं? हम लोग पर्सनल स्पेस में एक-दूसरे को अच्छे से समझ सकेंगे। आप समझती क्यों नहीं?’’ सुरेखा ने मां पर झुंझलाते हुए कहा।
‘‘देखो सुरू! वो अनजान लड़का है, फिर वह दूसरा देश है, अनजान जगह....’’ मां ने समझाना चाहा लेकिन मां की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी कि सुरेखा ने उनकी बात काट दी।
‘‘कैसी बातें कर रही हो मां? अभी अगर मेरी पटाया में मेरी जाॅब लगी होती तो तुम ये अनजान-अनजान की रट नहीं लगातीं। कोरोना पेंडेमिक के पहले कंपनी की ओर से मैं दुबई भी तो गई थी। कंपनी के चार लड़के भी साथ गए थे। तुम्हें यह पता था तब भी तुमने यह नहीं कहा था कि अनजान लड़कों के साथ... अब ऐसा क्यों सोच रही हो?’’ सुरेखा की बात तार्किक थी, लेकिन उसमें कड़वाहट थी। सच कड़वा जो होता है।
‘‘वो तू कंपनी की तरफ से गई थी।’’ पिता ने हस्तक्षेप किया।
‘‘ये भी मान लीजिए कि कंपनी की तरफ से जा रही हूं। वैसे भी सारी बुकिंग कार्तिक ने ही कराई है।’’ सुरेखा ने सब कुछ साफ-साफ बता दिया।
‘‘फिर भी सुरू!’’ मां ने टोकना चाहा।
‘‘नो, ममा! आप लोग ग्रांड पेरेंट्स जैसी बात मत करिए। आप लोग अच्छे पेरेंट्स हैं। ट्रस्ट ऑन मी एंड ऑन योर सेल्फ टू।’’ सुरेखा ने कहा।
माता-पिता समझ गए कि बेटी के पास ठोस तर्क हैं, वे उसे डिगा नहीं सकते हैं।
‘‘ठीक है, अपना ध्यान रखना। और कोई जरूरत पड़े तो अपने भाई को काॅल कर लेना।’’ पिता ने सुरेखा की बात मानते हुए यह तसल्ली की कि उनका बेटा यानी सुरेखा का भाई बैंकाक में ही है। जरूरत पड़ने पर फौरन पटाया पहुंच सकता है।
इस तरह एल.डी. आर. वाले सुरेखा और कार्तिक दिल्ली पहुंचे। जहां उन्होंने दिल्ली से बैंकाक वाली फ्लाईट पकड़ी। संयोग यह कि जहाज पर सवार होने के बाद दोनों ने एक-दूसरे को आफ स्क्रीन यानी साक्षात पहली बार देखा। स्पाइस जेट के छोटे से जहाज में हजारों मील की ऊंचाई पर उठते हुए दोनों ने एक-दूसरे के प्रेम की गहराई को नापना शुरू किया। बैंकाक पहुंचते-पहुंचते दोनों ने एक-दूसरे को काफी जान लिया था। बैंकाक से पटाया और पटाया में प्रेम का परीक्षण।
दो दिन कैसे गुज़र गए पता ही नहीं चला।
वापस दिल्ली वाया बैंकाक। फिर एक ने गुजरात का रास्ता पकड़ा तो दूसरे ने मध्यप्रदेश का।
यात्रा की दो लोगों ने लेकिन सांसे थमी रही कई लोगों की।
दोनों अपने-अपने घर सुरक्षित पहुंचे। घर के लोगों ने चैन की सांस ली।
‘‘क्या तय हुआ?’’ दोनों से एक ही प्रश्न पूछा गया।
उत्तर दोनों का एक ही था-‘‘अगली मुलाक़ात तक एल.डी. आर. ही जारी रखेंगे।’’
दोनों के परिवार वाले तय नहीं कर पा रहे थे कि वे उनके इस निर्णय पर प्रसन्न हों या शोक मनाएं। लेकिन कार्तिक और सुरेखा के मन में कोई उलझन नहीं थी। वे खुश थे। शांत थे। अपने-अपने कमरों में बंद थे अपने एल.डी. आर. के साथ।                        
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शनिवार, अक्टूबर 07, 2023

कहानी | तुम मुक्तकेशी क्यों नहीं बनी, रूपाली? | डॅा.(सुश्री) शरद सिंह | पहला अंतरा में प्रकाशित

कहानी  
   
तुम मुक्तकेशी क्यों नहीं बनी, रूपाली?

 - डॅा.(सुश्री) शरद सिंह


‘‘तुमने आज का अख़बार पढ़ा?’’ सुलभा ने हांफते हुए मुझसे पूछा। 
वह अपने दाएं हाथ से अख़बार लहराती दौड़ी चली आ रही थी। आवेग के कारण उसके शब्द लड़खड़ा रहे थे। 
‘‘शांत हो जाओ! रिलेक्स! बैठ जाओ। पानी लाती हूं तुम्हारे लिए।’’ कहती हुई मैंने उसे हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए सोफे पर बिठाया। वह बैठी भी तो इस मुद्रा में मानो सोफे में स्प्रिंग लगी हो और वह अभी उछल पड़ेगी। मैंने मेज पर रखे जग से गिलास में पानी ढाला और गिलास उसे पकड़ा दिया।
वह गट्गट् कर के एक सांस में पूरा गिलास खाली कर गई। अपने दुपट्टे के छोर से अपना मुंह पोंछते हुए अख़बार मेरी आंखों के आगे लहरा दिया। मेरा ध्यान गया कि अभी तक अख़बार उसके दाएं हाथ की उंगलियों में ही फंसा हुआ था। 
‘‘तुमने पढ़ा?’’ सुलभा ने एक बार फिर मुझसे प्रश्न किया।
‘‘हां, पढ़ा। विश्वास करना कठिन है।’’ मैंने कहा।
‘‘हां, यार देखो, जलन होती थी उससे कि उसे कितना अच्छा गुड लुकिंग, हैंडसम पति मिला है। श्रेयांश के पापा से लाख गुना चार्मिंग।’’ सुलभा ने अपना दिल खोल दिया।
‘‘क्या कह रही हो!’’ मैंने टोंका।
‘‘अब तुमसे क्या छिपाना? मैंने तो उससे एक बार मज़ाक में कह भी दिया था कि यदि हसबैंड की एक्सचेंज आॅफर की कोई स्कीम होती तो मैं तुम्हारे हस्बैंड से अपना वाला एक्सचेंज कर लेती। और जानती हो उसने तब क्या जवाब दिया था?’’ सुलभा ने मुझे पूछा।
‘‘उसने फटकार लगाई होगी तुम्हें।’’ मैंने फीकी-सी हंसी हंसते हुए कहा। 
‘‘नहीं उसने कहा था- मैं भी!’’ सुलभा ने बताया। उसकी बात सुन कर मैं चौंक गई।
‘‘चल क्या रहा था उसके साथ? तुम्हारी बात तो समझ में आती है कि तुम कुछ भी कह डालती हो लेकिन वो क्यों राजी थी अपना हस्बैंड बदलने को? क्या उस समय से ही कुछ गलत चल रहा था?’’ मैंने कहा।
‘‘हां यार, ये तो मैंने सोचा ही नहीं। क्योंकि उस समय भी बात आई-गई हो गई थी। ऐसा कुछ होने वाला था भी नहीं। वह तो बस यूं ही कह दिया था मैंने। हंा, इससे मैं इंनकार नहीं करूंगी कि उसके हस्बैंड पर मुझे उस समय से ही क्रश था जब मैंने सगाई के समय उसे पहली बार देखा था। उस समय तो श्रेयांश भी नहीं हुआ था और श्रेयांश के पापा भी उतने फैटी नहीं थे जितने कि अब हो गए हैं। मैं तो कहती हूं कि सुबह उठ कर एक्सरसाईज़ किया करें, जिम जाएं, मगर वे हैं कि मेरी एक नहीं सुनते। जबकि उसके हस्बैंड को देखो अभी भी स्मार्ट है, डैशिंग है।’’ सुलभा आदतन बहकती हुई बोली।
‘‘ऐसी स्मार्टनेस भी किस काम की सुल्लू, जो किसी की जान ले ले। मुझे तो इतनी घृणा हो रही है उससे, कि अगर अभी वह मेरे सामने आ जाए तो मैं मार-मार के उसकी चमड़ी उधेड़ दूं। आखिर कोई कैसे इतना नृशंस हो सकता है?’’ मैं अपने घृणा के भावों को छिपा नहीं पा रही थी। वैसे छिपाना भी नहीं चाहती थी। मैं इतनी महान या साधु प्रवृत्ति की नहीं हूं कि पाप से घृणा करूं और पापी से नहीं। मुझे दोनों से बराबर की घृणा होती है।
‘‘हां, आज तो मुझे भी उसके हस्बैंड से घृणा हो रही है। बल्कि मेरी तांे यह सोच कर रूह कांप रही है कि मेरा एक डिमोन, एक नरपिशाच पर क्रश था। मुझे तो यह सोच कर भी झुरझुरी हो रही है कि यदि वो मेरा हस्बैंड होता तो....।’’ सुलभा की आगे की बात उसकी हलक में अटक कर रह गई। 
किसी भी औरत के लिए यह भयानक दुःस्वप्न हो सकता है कि उसका पति एक नृशंस हत्यारा निकले। 
‘‘यार कोई किसी पर इतना शक़ कैसे कर सकता है?’’ सुलभा बोली। उसका स्वर अभी भी स्थिर नहीं हुआ था।
‘‘शक़ की कोई सीमा नहीं होती है सुल्लू! वह तो अमरबेल की तरह होती है। जिस रिश्ते पर चढ़ी, उसका सारा रस चूस कर उसे मार डालती है। क्या तुम्हें डेसडिमोना याद नहीं है? काॅलेज में तो तुम ओथेलो और इयागो पर कितना गुस्सा करती थीं। मानो वे दोनों शेक्सपीयर के नाटक के पात्र न हो, बल्कि जीते-जागते वास्तविक व्यक्ति हो। वह भी तो पत्नी के चरित्र पर संदेह की ही कहानी थी। क्या हुआ था अंत उस कहानी का, याद है न?’’ मैंने सुलभा से पूछा।
‘‘हां याद है! मगर तब मैं सोचती थी कि यह योरोप में ही संभव है, हमारी संस्कृति में ऐसा नहीं हो सकता है।’’ सुलभा ने निराशा भरे स्वर में कहा। फिर विचित्र ढंग से मेरी ओर देखती हुई पूछ बैठी,‘‘यदि किसी दिन श्रेयांस के पापा को मुझे पर शक़ हो गया तो?’’
‘‘क्या बकवास कर रही हो! अव्वल तो श्रेयांस के पापा ऐसे हैं नहीं और फिर सुल्लू, हर मर्द एक जैसा नहीं होता है। वो तो कितनी केयर करते हैं तुम्हारी! उल्टे तुम्हीं कभी-कभी उन्हें डांट दिया करती हो। और फिर तुम्हारा किसी और से तो अफेयर भी नहीं है, तो फिर डर क्यों रही हो?’’ मैंने सुलभा को प्यार से समझाया। 
‘‘फिर भी! शक़ होने के लिए किसी से अफेयर होना जरूरी तो नहीं है!’’ सुलभा ने बड़े मार्के की बात बोली। 
‘‘सही कहती हो, सुल्लू! यदि कभी तुम्हारी ज़िन्दगी में ऐसा समय आए तो तुम अपने हस्बैंड से दो-टूक बात करना। यदि फिर भी उसे तुम पर विश्वास न हो तो तत्काल उसे छोड़ देना। यदि उसने भी समय रहते निर्णय लिया होता तो उस दरिंदे को यह मौका नहीं मिलता।’’ मैंने सुलभा को समझाया। 
‘‘क्या ये सब कुछ इतना आसान होगा?’’ सुलभा के स्वर में हिचक थी।
‘‘या तो आसान बनाओ या फिर दरिंदे के हत्थे चढ़ जाओ!’’ मैंने सुलभा से कहा।
‘‘नहीं! यह कैसे माना जा सकता है कि हर कोई इस हद तक जा सकता है?’’ सुलभा डर भी रही थी और मानने का साहस भी नहीं जुटा पा रही थी।
‘‘यह भी कैसे मान लिया जाए कि कोई इस हद तक नहीं जाएगा? ऐसे एक्सपेरीमेंट से क्या लाभ जिसका रिजल्ट अपनी जान दे कर पता चले।’’ मैंने सुलभा से कहा। 
संशय और घबराहट सुलभा के चेहरे से टपक रही थी। वह स्वयं को आश्वस्त नहीं कर पा रही थी। यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी, क्योंकि आज अख़बार में जिसकी ख़बर छपी है वह हमारी सगी सहेली थी। हम काॅलेज में साथ-साथ घूमा करती थीं। हमारी तिकड़ी मशहूर थी। फिर समय के साथ जीवन में परिवर्तन आते गए। सुलभा का विवाह हों गया। मुझे एकाकी जीवन मिला और वह यानी रूपाली को तनिक देर से लेकिन सुलभा के शब्दों में ‘‘गुड लुकिंग और डेशिंग’’ हस्बैंड मिला। मैं और सुलभा इसी शहर में रहती रहीं, लेकिन रूपाली का हस्बैंड एक मुंबई में एक मल्टी नेशनल कंपनी में सीईओ था। अतः उसे मुंबई में बसना पड़ा। शादी के बाद वह यहां एक-दो बार ही आई। जब आई भी तो इतने कम समय के लिए कि रिश्तेदारों में ही घूमते हुए उसका समय निकल गया, हम दोनों से संक्षिप्त भेंट हुई। हां, शुरू-शुरू में फोन पर हमारी बात होती रही, फिर वह भी धीरे-धीरे कम हो गई। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। हर कोई अपनी जिन्दगी में रम जाता है। हमें क्या पता था कि उसकी ज़िन्दगी जो ऊपर से शांत और ‘कूल’ दिखाई पड़ रही है, उसके भीतर ज्वालामुखी का लावा धधक रहा है। उस लावे के छींटों से रूपाली हर दिन तिल-तिल कर जल रही थी, पर ‘उफ!’ भी नहीं कर रही थी। ऐसा क्यों किया रूपाली ने? हम दोनों में से किसी से भी साझा करती अपने दर्द को, हम कोई न कोई रास्ता निकाल लेते। उसे यूं अकेली नहीं छोड़ते।
‘‘क्या सोच रही हो?’’ सुलभा ने मुझे टोंका।
‘‘कुछ नहीं! बस, संस्कृत की एक कहानी याद आ गई जो कभी ‘कथासरित्सागर’ में पढ़ी थी। तुम कह रही हो न कि हमारी संस्कृति में ऐसा नहीं हो सकता था। तो सुनो, तुम्हें वह कहानी सुनाती हूं। मुक्तकेशी की कहानी है यह।’’ मैंले सुलभा से कहा।
‘‘हां, यार! सुना ही दो, कुछ ध्यान तो बंटे। बार-बार उसका चेहरा आंखों के आगे आ जाता है। घबराहट होने लगती है।’’ सुलभा अपने शरीर को ढीला छोड़ती हुई सोफे पर अधलेटी हो गई।
‘‘सुनो, पुराने समय की बात है काशी में एक सुंदर युवती थी जिसका नाम था मुक्तकेशी। वह सुंदर ही नहीं अपितु सुशील और आज्ञाकारी भी थी। उसके घने लंबे बाल अत्यंत सुंदर थे जिन्हें वह सादा खोल कर रखती थी, इसीलिए उसका नाम मुक्तकेशी पड़ गया था। उसके बचपन का नामकरण वाला नाम सभी भूल चुके थे। वह मुक्तकेशी ही कहलाती थी। उसके पिता ने सोचा कि अपनी पुत्री के लिए ऐसा वर चुनूं जो देखने में तो अच्छा हो ही साथ में सीधा हो और मेरी बेटी का पूरा ध्यान रखे। हर पिता यही आकांक्षा रखता है। पिता ने कौशांबी नरेश की राजसभा में काम करने वाले वज्रसार को अपनी बेटी मुक्तकेशी के लिए वर के रूप में चुना। मुक्तकेशी को जब पता चला तो वह भी अपने भावी जीवन के सुखद स्वप्न बुनने लगी। दोनों की कुंडलियां मिलवाई गईं। गुणों का मिलान सटीक बैठा। शुभमुहूर्त पर व्रज़सार और मुक्तकेशी का विवाह हो गया। मुक्तकेशी अपने पति के घर कौशांबी आ गई। यूं तो वह अपने पति के मित्रों के सामने नहीं निकलती थी किन्तु एकाध बार ऐसा अवसर आया कि उसे सामने आना पड़ा। कुछ मित्र ऐसे थे जो मुक्तकेशी को देखते ही वज्रसार के प्रति ईष्र्या से भर उठे। उन्हें लगा कि वज्रसार को इतनी सुंदर पत्नी नहीं मिलनी चाहिए थी।
वज्रसार के तथाकथित मित्र उसे उल्टी-सीधी पट्टी पढ़ाने लगे। उनका कहना था किे यदि पत्नी सुंदर हो सके उसे कभी कहीं अकेली नहीं जाने देना चाहिए। कोई भी उसकी सुंदरता की प्रशंसा कर के उसे मूर्ख बना सकता है। कभी वे ये कहते कि कुछ सुंदर स्त्रियां बहुत चतुर होती हैं। ऊपर से भोली होने का नाटक करती है जबकि भीतर से वे छल-कपट और कामवासना से भरी होती हैं। यानी कुल मिला कर वज्रसार के मित्र उसके मन में मुक्तकेशी के विरुद्ध संदेह के बीज रोपते रहते थे। उन्हें पूरा विश्वास था कि एक न एक दिन कोई न कोई बीज अंकुरित अवश्य होगा और वज्रसार एक मूर्ख की भांति अपने ही हाथों अपनी गृहस्थी को आग लगा देगा।
वज्रसार धीरे-धीरे शंकालु होता जा रहा था। वह मुक्तकेशी को कहीं अकेली नहीं जाने देता था। मुक्तकेशी अपने पति के इस व्यवहार से यही समझती थी कि उसका पति उसे बहुत प्रेम करता है इसलिए उसे पल भर को भी कहीं अकेली नहीं जाने देना चाहता है। वह अपनी इस सोच पर प्रसन्न होती और इतराने लगती। 
कुछ समय बाद मुक्तकेशी के पिता और भाई किसी काम से कौशांबी आए। उन्होंने वज्रसार से कहा कि विवाह के बाद मुक्तकेशी अपने मायके नहीं आई है, वहां सभी उससे मिलने को आतुर हैं अतः कुछ दिन के लिए वह मुक्तकेशी को उन लोगों के साथ मायके जाने दे। वज्रसार अपने श्वसुर और साले को मना तो कर नहीं सकता था, अतः उसने उनसे यह कहा कि ‘‘मुक्तकेशी के बिना यहां काम नहीं चल सकेगा अतः वह स्वयं मुक्तकेशी के साथ चलेगा। इससे लौटने पर किसी को पहुंचाने नहीं आना पड़ेगा, वह मुक्तकेशी को अपने साथ वापस ले आएगा।’’ मुक्तकेशी के पिता और भाई को भला इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी? वे तो यह सोच कर खुश हो गए कि उन्हें अपने दामाद की सेवा करने का अवसर मिलेगा। 
वज्रसार कुछ दिन अपनी ससुराल में रहा। फिर उसकी छुट्टियां समाप्त हो गईं और उसके लौटने का समय आ गया। उसने मुक्तकेशी को साथ वापस चलने को कहा। लेकिन मुक्तकेशी की मां ने अनुनय-विनय किया कि उनकी बेटी को कुछ दिन और अपने मायके में रहने दे। विवश हो कर वज्रसार को अकेले वापस लौटना पड़ा। उसके लौटते ही उसके मित्रों को मानो अच्छा मौका मिल गया। वे रात-दिन यही कान भरने लगे कि ‘‘विवाह के बाद तो पत्नी को अपने पति का घर प्रिय होता है, मगर तुम्हारी पत्नी ने अपने मायके में रुकने का हठ किया। इसका सीधा अर्थ है कि वहां उसका कोई पुराना प्रेमी है जिसके साथ वह प्रेमालाप करना चाहती है, तभी तो वह तुम्हारे साथ नहीं आई।’’
यह सुन कर वज्रसार से नहीं रहा गया और वह चार दिन में ही अपनी ससुराल जा पहुंचा। उसे इस तरह अचानक आया देख कर सभी यह सोच कर प्रसन्न हो उठे कि मुक्तकेशी को कितना प्रेम करने वाला पति मिला है जो चार दिन भी अकेले नहीं रह सका। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मुक्तकेशी को वज्रसार के साथ विदा कर दिया। 
वज्रसार जब मुक्तकेशी को ले कर लौट रहा था तो उसने बीच घने जंगल में बैलगाड़ी रोकी और मुक्तकेशी को उसके केशों से पकड़कर घसीटता हुआ एक पेड़ के पास ले गया। उसने मुक्तकेशी का उत्तरीय खींचा और उसी से उसे पेड़ से बांध दिया। फिर क्रोध में भर कर उसके कपड़े फाड़ते हुए पूछने लगा कि -‘‘बता तूने अपने किस पुराने प्रेमी के साथ प्रेमालाप किया? इसीलिए तू रुकी थी न अपने मायके? माता-पिता तो बहाना मात्र थे, है न?’’
अपने पति के इस अप्रत्याशित व्यवहार से स्तब्ध मुक्तकेशी को कोई उत्तर नहीं सूझा। वह तो समझ ही नहीं पा रही थी कि उससे इतना प्रेम करने वाले पति को यह अचानक क्या हुआ?
‘‘क्यों पुराने प्रेमी से प्रेमालाप करते समय लाज नहीं आई और अब बताने में लाज आ रही है? मैं सब समझता हूं तेरी चतुराई!’’ वज्रसार पर तो मानों उन्माद सवार था।
‘‘ये आप क्या कह रहे हैं? आपसे ये सब किसने कहा?’’ मुक्तकेशी ने अपनी स्तब्धता से बाहर आते हुए वज्रसार से पूछा।
‘‘किसी को कहने की क्या आवश्यकता? मैं और मेरे सारे मित्र जानते हैं कि तू अपने मायके में क्यों रुकी थी।’’ वज्रसार मुक्तकेशी के पुनः कपड़े फाड़ते हुए बोला, ‘‘मेरे मित्र ठीक कहते हैं कि तेरी जैसी रूपवती पत्नी के होने से तो अच्छा है कि कोई पत्नी ही न रहे। आज मैं तुझे जीवित नहीं छोडूंगा।
वज्रसार ने मुक्तकेशी पर झपटते हुए उसके पूरे कपड़े तार-तार कर दिए। किन्तु तभी मुक्तकेशी को नग्नावस्था में देख कर उसके मन में कामभवना जाग उठी। वज्रसार ने सोचा कि जब इसे मारना ही है तो पहले तनिक आनन्द उठा लिया जाए फिर मारा जाए। मुक्तकेशी पति की भावना ताड़ गई। उसने वज्रसार से कहा कि ‘‘ठीक है यदि तुम मुझे मारना चाहते हो तो मार दो, लेकिन मरने से पहले मैं तुम्हारे साथ उन्मुक्त भाव से सहवास करना चाहती हूं।’’
यह सुन कर वज्रसार और वासनामय हो उठा। उसने तत्काल मुक्तकेशी के बंधन को खोल दिया। मुक्तकेशी ने भी अवसर पाते ही अपने उसी उत्तरीय से जिससे उसे पेड़ में बांधा गया था, वज्रसार को उसी पेड़ से बांध दिया। फिर वह गर्जना करती हुई बोली-‘‘अरे मूर्ख पुरुष! तेरा नाम वज्रसार नहीं बल्कि वज्रमूर्ख होना चाहिए था। तूने अपने कपटी मित्रों की बातों में आ कर मुझे चरित्रहीन मान लिया, कम से कम एक बार तो ढंग से जांच-पड़ताल कर लेता। मुझसे खुल कर पूछ लेता। तू तो संदेह में अंधा हो गया और तुझे अपनी पत्नी की सच्चरित्रता ही दिखना बंद हो गई।’’
मुक्तकेशी की बात सुन कर वज्रसार को मानो होश आ गया कि वह कितनी बड़ी गलती कर बैठा है। वह मुक्तकेशी से क्षमा मांगने लगा।
‘‘मुझसे बहुत बड़ी त्रुटि हो गई मुक्तकेशी! मुझे क्षमा कर दो और एक और अवसर दे दो! अब मैं पुनः कभी तुम पर शंका नहीं करूंगा।’’ वज्रसार गिड़गिड़ाने लगा।
‘‘नहीं वज्रसार! तुम मुझे अपनी पत्नी बनने योग्य नहीं मान रहे थे, सच तो ये है कि तुम मेरे पति रहने योग्य नहीं हो। जो व्यक्ति दूसरों की बातों में आ कर अपनी पत्नी की हत्या करने पर उतारू हो जाए, उस पति को दूसरा क्या आधा अवसर भी नहीं दिया जा सकता है। सो, मैं आज से न तो तुम्हारी पत्नी हूं और न तुम मेरे पति।’’ इतना कह कर मुक्तकेशी वहां से वापस अपने मायके लौट गई।
मायके में मुक्तकेशी ने जब पूरा हाल कह सुनाया तो उसके माता-पिता और भाई-बहनों ने भी उसके निर्णय को स्वागत किया। मुक्तकेशी ने शेष जीवन एक ब्रह्मचारिणी के रूप में व्यतीत करने का निश्चय किया। वहीं दूसरी ओर वज्रसार जब लौट कर अपने मित्रों के पास पहुंचा तो सबने उसकी बहुत खिल्ली उड़ाई कि वह कैसे मूर्ख बन गया। इस घटना का प्रभाव यह हुआ कि वज्रसार का दूसरा विवाह भी नहीं हो सका। जिसे भी उस घटना को पता चलता वह अपनी बेटी के साथ वज्रसार का विवाह करने से मना कर देता। वज्रसार का शेष जीवन पश्चाताप में व्यतीत हुआ। 
‘‘तो ये थी कहानी मुक्तकेशी की, सुल्लू!’’ कहानी समाप्त करते हुए मैंने सुलभा से कहा।
कुछ पल ख़ामोश रहने के बाद सुलभा बोली,‘‘रूपाली को भी मुक्तकेशी बनना चाहिए था। कभी तो शुरुआत हुई होगी संदेह भरी कटुता की। उसे चुपचाप नहीं सहना चाहिए था।’’
‘‘हां, सुल्लू! आज सुबह जब से मैंने यह रोंगटे खड़े कर देने वाली ख़बर पढ़ी है कि उसके पति ने उसे मार कर उसके टुकड़े-टुकड़े कर यहां-वहां कूड़ादान में फेंक दिया था, मुझे जितना गुस्सा उस हैवान पर आ रहा है उतना ही रूपाली की सहनशक्ति पर भी गुस्सा आ रहा है। ऐसी भी सहनशक्ति किस काम की जो जानलेवा साबित हो? यदि शीशे में दरार पड़ जाए तो वह एक न एक दिन टूट कर किसी न किसी को चुभता ही है। ऐसे शीशे को समय रहते ही अपने से दूर कर देना चाहिए।’’ मैंने सुलभा से कहा।
सुलभा कुछ नहीं बोली। इससे आगे मेरे पास भी कुछ नहीं था कहने, सुनने को। बस, एक समाचार का एक शीर्षक बुरी तरह चुभ रहा था कि रूपाली को उसके शंकालु पति ने नृशंतापूर्वक मार डाला। वह शीर्षक खंज़र बन का हम दोनों के दिलों में भी उतर चुका था। लहू की रिसती अदृश्य बूंदों के साथ अनेक ‘काश!’ थे, जिनके होने का अब कोई अर्थ नहीं था। एक मुक्तकेशी साहस नहीं दिखा पाई थी और हैवान जीत गया था। यह सोच-सोच कर हम दोनों इतनी निःशब्द हो गईं कि सीलिंग फैन के ब्लेड्स के द्वारा हवा को काटने की आवाज़ भी किसी तूफान या अंधड़ की आवाज़ के समान लग रही थी। फिर भी हमारे मन के किसी कोने से एक प्रश्न आंतरिक चींख बन कर शोर कर रहा था कि ‘तुम मुक्तकेशी क्यों नहीं बनीं, रूपाली? काश! तुम बन सकी होतीं!’   
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बुधवार, अप्रैल 12, 2023

कहानी | प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए |डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | पहला अंतरा

कहानी
प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

उसकी उम्र यही कोई अट्ठारह-उन्नीस साल की रही होगी। अपनी सहेलियों के साथ बैठी हंस रही थी, खिलखिला रही थी। एकदम मस्तमौला जीव दिख रही थी। हाथ-हिला कर बात करना और बीच-बीच में अपनी कुर्सी से उठ-उठ पड़ना मेरे सहित वहां मौजूद सभी का ध्यान खींच रहा था। इसका अनुभव मुझे तब हुआ जब मेरे पास वाली मेज पर बैठी महिला ने कुढ़ कर कहा,‘‘ओवहर स्मार्ट बन रही है।’’
‘‘सही है, आज कल के बच्चों को होश ही नहीं रहता है कि उनके आस-पास भी कोई मौजूद है या फिर वे किसी पब्लिक प्लेस में हैं।’’ उस महिला के साथ वाली महिला ने टिप्पणी की। वे दोनों परस्पर रिश्तेदार थीं या वे भी सहेलियां थीं, पता नहीं। अनुमान लगाना कठिन था। पल भर को मेरा ध्यान उस लड़की से भटक कर उन महिलाओं पर अटक गया। दोनों को देख कर कोई भी बता सकता था कि उनका बहुत सारा समय ब्यूटीपार्लर में व्यतीत होता होता होगा। दोनों ने चाईनीज़ फूड मंगा रखा था और दोनों ही कांटे के सहारे बड़े सलीके से उसे खा रही थी। विशेषणयुक्त मुहावरे में कहूं तो - ‘‘इन फुल एटीकेट’’। वे अपना यह सलीका किसे दिखा रही थीं? शायद परस्पर एक-दूसरे को, अन्यथा वहां मौजूद सबका ध्यान उन लड़कियों की ओर था। जिनके लिए दो युवा लड़कों ने वहां से जाते-जाते टिप्पणी की थी-‘‘ये तितलियां’’। 
एक ज़ोरदार उन्मुक्त हंसी का स्वर गूंजा और मेरा ध्यान एक बार फिर उन तितलियों यानी उन लड़कियों की ओर चला गया। कितनी खुश, कितनी उन्मुक्त, कितनी जीवंत। ऊर्जा से भरपूर। 
मेरे भीतर से एक आवाज़ उठी कि तुम भी इस दौर से गुज़री हो। और मैंने अपने भीतर की आवाज़ को स्वीकार कर लिया। स्कूल के दिनों में तो नहीं लेकिन काॅलेज के दिनों में मैं भी इन्हीं लड़कियों की तरह चंचल हुआ करती थी। यद्यपि अब और तब में बहुत अंतर था। मेरे छोटे से शहर के छोटे से काॅलेज में एक अदद कैण्टीन हुआ करती थी। जहां लड़कों का जमावड़ा रहता था। हम लड़कियों के लिए वहां जाना प्रतिबंधित था। मजे की बात यह कि यह प्रतिबंध न तो काॅलेज प्रशासन ने लगाया था और न किसी  व्यक्ति ने। यह प्रतिबंध अपनी परंपरागत कस्बाई मानसिकता के चलते स्वयं लड़कियों लगा रखा था। मैं शुरू से को-एजुकेशन में पढ़ी थी इसलिए लड़के मेरे लिए अजूबा नहीं थे। मुझे कुछ अजूबा लगता था तो लड़कियों की ऐसी अनावश्यक झिझक। अरे, अगर हम लड़कियां कैण्टीन में पहुंच जातीं तो लड़के हमें खा थोड़े ही जाते। 
हां, एक ख़ूबसूरत डिप्लोमेसी जरूर चलती थी मेरे साथ की लड़कियों की। उनमें से कुछ ऐसी थीं जिनकी कनखियां और संकेत अपने पसंद के लड़कों की ओर सक्रिय रहते थे। हम लोगों का पांच लड़कियांे का अघोषित ग्रुप था। मुझे छोड़ कर दो लड़कियों के चोरी-छिपे वाले ब्वायफ्रेंड थे और बाकी दो के उजागर ब्वायफ्रेंड। मेरा कोई उस तरह का ब्वायफ्रेंड नहीं था। जिस लड़के से मुझे कोई बात करना होती तो मैं सीधे-सीधे कर लेती। कोई दुराव-छिपाव नहीं। जबकि उजागर वाली लड़कियां बारी-बारी से अपने मित्रों से कैण्टीन से हम सभी के लिए चाय मंगवा लिया करती थीं। एक संकेत प्रस्थानित होता और पांच मिनट में कैण्टीन वाला छोकरा हाथ में चाय के गिलासों का झाला पकड़े हुए आ खड़ा होता और इशारा करते हुए कहता,‘‘भैया ने भिजवाई है चाय!’’
छोकरे से चाय का गिलास लेने के बाद वे लड़कियां आपस में एक-दूसरे को छेड़तीं कि ‘‘भैया ने या सैंया ने?’’ और जिसके ‘‘सैंया’’ ने चाय भिजवाई होती वह इतरा कर कैण्टीन के बाहर अपनी मित्रमण्डली के साथ खड़े अपने ‘‘सैंया’’ की ओर देख कर मुस्कान फेंकती। वह ‘‘सैंया’’ छात्र भी झेंपता, मुस्कुराता और तन कर खड़ा हो जाता। यह सब देखना मुझे विचित्र अनुभूति से भर देता। मैं लड़कों से सहज रूप से बात करने की आदी थी। मैंने अपने बचपन में भी अपनी काॅलोनी के लड़कों के साथ गिल्ली-डंडा ओर कंचे खेले थे। मात्र दो वर्ष छोड़ दिया जाए तो कच्ची पहली से मेरी काॅलेज में प्रथम वर्ष में पहुंचने तक सहशिक्षा में ही पढ़ाई हुई थी। वहीं मेरे साथ की उन चारो लड़कियों की पूरी शिक्षा बालिका विद्यालय में हुई थी अतः उन्हें वास्तविक प्रतिबंधित क्षेत्र में चोरी-छिपे प्रवेश का सुखद अनुभव हो रहा था और वे इस अनुभव को लेने में कोताही भी नहीं बरतती थीं। उनमें से दो के तो बड़े सपने भी नहीं थे। वे आगे चल कर शादी कर अपना घर-संसार बसाने की अदम्य अभिलाषा रखती थीं। कैरियर जैसी बात उनके लिए बेमानी थी। 
समय एक छलांग में कितनी परिवर्तन नाप लेता है यह सोचना वामन अवतार की पौराणिक कथा के बारे में सोचने के समान है। बौना रूप धर कर तीन पग में तीन लोक नापने जैसा। पहले टीवी फिर कम्प्यूटर फिर अबाध इंटरनेट। दुनिया चंद सालों में ही बदल गई। जो विषय चर्चा में भी निषिद्ध थे, वे मोबाईल के आयाताकर पर्दे पर सजीव देखे जा सकते हैं। मेरी पीढ़ी और वर्तमान युवापीढ़ी में जैविक रूप से कोई अधिक दूरी नहीं है लेकिन वैचारिक रूप से क्रांतिकारी दूरी है। आज मेरे सामने जो तितलियों जैसी लड़कियां खिलखिला रही थीं, उन्हें जीवन का दीर्घ अनुभव नहीं है लेकिन वे सजग हैं अपने कैरियर को ले कर। 
‘‘मैं तो प्लस टू कर के अपनी आंटी के पास सिएटल चली जाऊंगी। यहां रह कर लाईफ स्प्वाईल करने से क्या फायदा।’’ एक लड़की ने चहकते हुए कहा था।
‘‘हां री! तू लकी है कि तेरी आंटी एब्राॅड में हैं, लेकिन देखना मैं भी किसी मल्टीनेशनल कंपनी को ज्वाइन कर के तेरे पास आ जाऊंगी।’’ सबसे ज्यादा चहकने वाली उस लड़की ने कहा था। 
उनकी बातें सुन कर मैं सोच में पड़ गई थी कि कितने बड़े-बड़े सपने हैं इसके पास, एकदम स्पष्ट और नपेतुले। शायद मेरे कल शाम का अनुभव इन्हें एक ‘टैबू’’ जैसा लगे। मेरे पुराने शहर से ये शहर बड़ा है। यहां परिवर्तन की लहर महानगरों के बराबर तो नहीं लेकिन उसके पीछे-पीछे दौड़ रही है। आज नेटिंग, चैटिंग, बैटिंग आदि सब कुछ होता है यहां। ये लड़कियां दुस्साहसी हैं। ये दुनिया के जिन ख़तरों को जानती हैं, उनमें भी कूद पड़ने को तत्पर हैं। अगर ये मेरे कल शाम की दास्तान सुन लें तो मेरी प्रतिक्रिया पर और भी बड़ा वाला ठहाका मार कर हंस पड़ेंगी। लेकिन मैं क्या करूं, मैं हूं ही ऐसी। संबंधों को हल्के में लेना मुझे आता ही नहीं है। या तो मैं डूब कर नाता जोड़ती हूं, अन्यथा बच कर निकल जाना पसंद करती हूं। 
कल शाम मेरे लिए एक दुर्घटना के समान थी। मन के कोने-कोने तक बहुत देर स्तब्धता छाई रही। ऊपर से भले ही मैंने मुस्कुरा कर स्वयं को सहज बनाए रखने का प्रयास किया किन्तु अंदर से सहजता के सारे धागे चटक कर टूट गए थे। 
हुआ यूं कि मेरे एक परिचित जो पेशे से अधिवक्ता हैं। मेरे घर आए। कुछ देर यहां-वहां की बातें होती रहीं।
‘‘आजकल आपकी समाजसेवा कैसी चल रही है?’’ उन्होंने पूछा था।
‘‘ठीक है। बढ़िया। अब स्वयं को और व्यस्त रखने लगी हूं ताकि मन लगा रहे। खाली रहती हूं तो घबराहट होने लगती है।’’ मैंने बताया।
‘‘हां, स्वयं को व्यस्त रखना आपके लिए जरूरी है।’’ उन्होंने मेरी बात पर हामी भरी थी।
‘‘आप अपना कोई एनजियो क्यों नहीं शुरू करतीं?’’ उन्होंने पूछा था।
‘‘क्या लाभ? मेरा लक्ष्य लोगों की मदद करना है, अब चाहे अपना एनजियो बना कर करूं या दूसरों के साथ मिल कर।’’ मैंने उत्तर दिया था।
‘‘ठीक है।’’ उन्होंने कहा था। 
इस संक्षिप्त वार्तालाप के बाद वे अप्रत्याशित ढंग से बोल उठे,‘‘नित्या जी, मैं आपका आलिंगन करना चाहता हूं।’’
एक पल को तो मुझे समझ ही नहीं आया कि जो मैंने सुना है वह सही है या गलत? 
‘‘आज आप बहुत सुंदर दिख रही हैं। इसीलिए मैं अपनी भावना प्रकट किए बिना नहीं रह पा रहा हूं। प्लीज़, मेरे क़रीब आइए।’’ उन्होंने मेरी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किया बिना किसी बंदूक की गोली की तरह अगला वाक्य दाग़ दिया। 
‘‘यह संभव नहीं है। मैं आपको इस दृष्टि से नहीं देखती हूं।’’ मुझे दो-टूक कहना ही पड़ा। इसके बाद वे तनिक संयत हुए। 
‘‘मेरे विचार से अब आपको जाना चाहिए।’’ मैंने तनिक और कठोरता बरती।
उन्होंने मेरी ‘‘न’’ को ‘‘न!’’ ही माना और चले गए। किन्तु हम स्त्रियों की छठीं इन्द्रिय सजग रहती है। मैंने भांप लिया कि उन्होंने ऊपरी तौर पर खुद पर काबू पाया है, आंतरिक नहीं।
उनके जाने के बाद वे सारे प्रश्न मेरे मस्तिष्क से खेलने लगे जो उसी समय मुझे उनसे पूछने चाहिए थे। लेकिन उस समय मैंने बात को बढ़ाना उचित नहीं समझा था। मैं उनसे पूछना चाहती थी कि हमारा तो वर्षों पुराना परिचय है, लेकिन इससे पहले मैं कभी सुंदर नहीं लगी क्या? या फिर आज इसलिए सुंदर लग रही हूं कि मां के जाने के बाद नितांत अकेली रह गई हूं और साथ की ललक इस एक वाक्य से मुझे पिघला देगी? 
उन्होंने न कभी पूछा कि कोई, किसी तरह की आवश्यकता तो नहीं है? न मेरे दुख की घड़ी में मेरे आंसू पोंछने का समय निकाला। आज मेरे अकेलेपन में मैं उन्हें सुंदर दिखाई देने लगी। इतनी सुंदर कि आलिंगन योग्य। वाह! बहुत खूब!!
इस घटना ने रात भर मेरे मन को छीला। भोर भी अनमनी व्यतीत हुई। भोजन पकाने तक का मन नहीं हुआ। एक विरक्ति। एक विछिन्नता। एक व्याकुलता। मानो एक शीशा गिर कर टूट गया था और उसकी किरचें रह-रह कर चुभ रही थीं। प्रेम को व्यक्त करना कितना कठिन होता है, जबकि वासना को व्यक्त करना सरल। एक जुमला उछाला और मान लिया कि काम बन जाएगा। वह भी एक ऐसा व्यक्ति जो मेरी दृष्टि में प्रबुद्ध श्रेणी का था। लेकिन संभवतः बुद्धि, प्रबुद्धि और चरित्र तीनो अलग-अलग होते हैं। कल शाम से मैं यही मानने पर विवश हो गई हूं। 
घर में मन नहीं लग रहा था। बैंक की पासबुक निकाली और उसकी एंट्री अपडेट कराने निकल पड़ी। घर से निकलने का एकदम फिसड्डी बहाना। खैर, बैंक में जा कर ताज़ा एंट्री भी ले ली। अब क्या करूं? समझ में नहीं आ रहा था। तभी अनुभव हुआ कि थोड़ी भूख लग रही है। मैं अकेली ही रेस्तरां की ओर बढ़ ली। आमतौर पर मैं अकेली वहां बैठ कर नहीं खाती हूं। जब कभी आवश्यकता होती है तो पैक करवा कर घर ले आती हूं और फिर घर में अपने सोफे पर पांव पसार कर टीवी पर टकटकी लगा कर खाती हूं। लेकिन उस समय मैं भीड़ में रहना चाह रही थी। अकेली तो बिलकुल भी नहीं। बस, इस तरह इस रेस्तरां आ पहुंची और घंटे भर से कुछ न कुछ चुगती हुई उन लड़कियों को देखती हुई बैठी हूं।
वह प्रश्न मेरे मन में फिर कुलबुलाया कि यदि मेरी जगह ये ब्राउनी तितली होती तो क्या करती? जी हां, वह जो उन लड़कियों में सबसे अधिक चुलबुली और उत्साही लड़की थी उसने भूरे रंग का टाॅप पहना हुआ था, इसीलिए मैंने उसका नाम ‘‘ब्राउनी तितली’’ रख दिया। 
यदि मैं ब्राउनी तितली को अपने पास बुला कर अपने साथ घटी घटना के बारे में उससे बात करूं तो? उस लड़की से चर्चा करने का विचार आना ही इस बात का सबूत था कि ख़याली घोड़ों के नथुनों में कोई लगाम नहीं होती है। मैंने स्वयं को लानत भेजी। लेकिन मन था कि बार-बार इसी एक प्रश्न पर आ ठहरता था। मेरी जगह यदि यह ब्राउनी तितली होती तो इसकी क्या प्रतिक्रिया होती? क्या यह सहज रह पाती? या आलिंगनबद्ध हो जाती? या कोई अप्रत्याशित तीखी प्रतिक्रिया से सामने वाले के होश उड़ा देती? ये तीन प्रश्न या तीन उत्तर, वस्तुनिष्ठ की भांति थे, जिनमें से किसी एक पर टिक करना कठिन था। 
‘‘देखो, मुझे अंकल ने क्या दिया?’’ ब्राउनी के साथ वाली एक अन्य तितली अपने गले में पड़ी चेन दिखाती हुई बोली। 
‘‘हाऊ ब्यूटीफुल। डायमण्ड है इसमें?’’ एक ने पूछा।
‘‘अरे नहीं! डायमण्ड पहन कर मुझे अपना गला कटवाना है क्या? जब मैं अपनी कार में चलने लगूंगी तब डायमण्ड पहनूंगी। स्कूटी में गोल्ड, डायमण्ड ये सब सेफ थोड़े ही है।’’ उसने बड़े सयानेपन से कहा।
‘‘यस! शर्मा आंटी को देखो न, वे माॅर्निंगवाक पर गई थीं कि किसी ने उनके गले से उनकी सोने की चेन खींच ली। चेन तो हल्की थी, बहुत कीमती नहीं थी लेकिन चेन खींचे जाने से उनकी गरदन पर गहरे स्क्रैचेस आ गए थे।’’ ब्राउनी तितली ने कहा। मुझे वह बुहत समझदार लग रही थी। मुझे लग रहा था कि वह बहुत तेजी से दुनिया को समझती जा रही है। मगर मेरी जैसी परिस्थिति में आ कर वह क्या करती?
ढाक के तीन पात! मन घूम फिर कर उसी प्रश्न पर जा पहुंचा। माना कि युवा पीढ़ी के लिए दैहिक संबंध कोई ‘‘टैबू’’ नहीं है लेकिन जहां इच्छा का कोई सिरा ही न हो, वहां क्या आज का युवा कोई ‘डील’ कर सकता है?
‘डील’, हां यह एक व्यावसायिक शब्द है लेकिन आजकल प्रेम संबंधों में भी यह समाहित हो गया है। इसे नया भाषा विन्यास कहें या संबंधों के प्रति लाभ-हानि वाला दृष्टिकोण। जैसे पिछले दिनों मेरी एक साथी किसी पुरुष की चर्चा करती हुई कह रही थी कि वह तो बेहतरीन ‘‘हस्बैंड मटेरियल’’ है। जब हस्बैंड और वाईफ भी मटेरियल की दृष्टि से आंके जाएं तो फिर डील तो बहुत छोटा शब्द है इसके सामने। खैर, यह ब्राउनी तितली कैसे डील करती मेरे मसले को? 
‘‘तेरे अंकल भी ग़ज़ब की चीज़ हैं। काश! मेरे भी कोई ऐसे अंकल होते।’’ आह सी भरती हुई एक तितली की आवाज मेरे कानों से टकराई और मुझे अहसास हुआ कि मैं अपनी सोच में डूब गई और ये तितलियां उस कथित डायमण्ड के इर्दगिर्द ही घूम रहीं हैं। 
‘‘अरे यार, वो मेरे अंकल हैं!’’ उस चेन वाली लड़की ने खीझते हुए कहा।
‘‘हंा, यार छोड़ इसके अंकल को! तू ऐसा कर कि गिनीपिग सर के साथ डेट कर ले। कोई तो अच्छी गिफ्ट मिल ही जाएगी।’’ ब्राउनी तितली ने खिलखिलाते हुए कहा।
‘‘व्हाट रबिश! अगर गिनीपिग सर को पता चल गया तो वे तेरा फालूदा बना देंगे।’’ चेन के लिए आहें भरने वाली लड़की ने कहा।
‘‘हाय बना ही दें न!’’ चेन वाली लड़की बोल उठी।
‘‘तू सच्ची बहुत बड़ी बेशरम है!’’ चेन के लिए आहें भरने वाली लड़की ने हंस कर कहा।
‘‘यार लाईफ में गिफ्ट इंप्वार्टेंट नहीं है, इश्क़ इंप्वार्टेंट है। मैं तो गिनीपिग सर की ओर देखूं भी न। ऐसे हैंडसम लाखों पड़े हैं।’’ ब्राउनी तितली ने कहा। उसकी बात सुन कर मेरे कान खड़े हो गए। 
मगर एक कठिनाई यह थी कि मुझे वहां बैठे बहुत देर हो गई थी। अकेली बैठी-बैठी और कितनी देर स्नेक्स चुगती? तीन कप काफी भी पी चुकी थी। रेस्तरां वाला लड़का भी सोचता होगा कि कहां की भुक्खड़ आ बैठी है। यद्यपि उसका मालिक तो खुश ही होगा क्योंकि मैं बैठी-बैठी उसका बिल बढ़ा रही थी।
दूसरी कठिनाई यह थी कि तीन कप काफी और एक गिलास पानी पी चुकने के बाद वाशरूम की तलब सताने लगी थी। जबकि मैं उन तितलियों की बातों से चूकना नहीं चाहती थी और उठ कर आने-जाने के चक्कर में अपने प्रति उनका ध्यान भी नहीं खींचना चाहती थी। वे मेरी उपस्थिति से लगभग बेखबर थीं। यद्यपि मुझे पता नहीं था कि मेरी उपस्थिति का भान होने पर उनके वार्तालाप पर कोई असर पड़ेगा या नहीं?
तीसरी कठिनाई यह थी कि अब मुझे वहां बैठी रहना स्वतः ही अटपटा लगने लगा था। मेरी बाजू वाली मेज की वे दोनों महिलाएं काफी पहले जा चुकी थीं। उनके बाद उस मेज पर एक जोड़ा आया था। वह भी अब जा चुका था। मैंने ब्राउनी तितली के ‘‘गिफ्ट’’ और ‘‘इश्क़’’ के कथन को ही उसका सूत्र वाक्य मान लिया और बैरे को बिल लाने का संकेत कर दिया।
बैरा तो मानो मेरे संकेत की ही प्रतीक्षा कर रहा था। दो मिनट में बिल ले कर उपस्थित हो गया। मैंने बिल चुकाया और वहां से विदा होते समय एक गहरी दृष्टि उन तितलियों की ओर डाली। वे सब अपने-आप में डूबी हुई थीं। स्पष्ट था कि उन्हें मेरे होने या जाने से कोई अंतर नहीं पड़ रहा था। यह महसूस कर मुझे तसल्ली हुई।
अब मेरा मन भी हल्का हो चुका था। मानो मैंने अपना उत्तर पा लिया था। मैं जान गई थी कि मेरी जगह अगर वो ब्राउनी तितली होती तो उसकी भी प्रतिक्रिया मेरी तरह होती। उन तितलियों के लिए दैहिक संबंध कोई गंभीर विषय भले ही न हो लेकिन विवशता पूर्ण संबंध और इच्छापूर्ण संबंध में अंतर करना उन्हें भी आता है। लेकिन वे मेरे बुद्धिजीवी परिचित गए भूल गए कि ‘‘ प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए। राजा प्रजा जो ही रुचे, सीस दे हि ले जाए।।’’
मेरे मन की फांस अब एक कोने में सरक गई थी। वह निकल तो कभी सकती नहीं लेकिन हर समय टीसेगी तो नहीं, यही बहुत है। क्योंकि जो कुछ भी वह था वह प्रेम तो कदापि नहीं था। प्रेम उथला नहीं, गहरा होता है, बहुत गहरा। सात सागरों से भी गहरा। काश! सब लोग यह समझ पाते!
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