समकालीन कथा यात्रा - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Journey Of Contemporary Hindi Story By Dr (Miss) SHARAD SINGH
शनिवार, मार्च 22, 2025
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह के उपन्यास "कस्बाई सिमोन" की समीक्षा प्रोफेसर एस वी एस एस नारायण राजू द्वारा यूट्यूब पर
सोमवार, जनवरी 03, 2022
शिखण्डी | उपन्यास | शरद सिंह | समीक्षा | आजकल पत्रिका
शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2021
टीवी चैनल आज तक के बुक कैफे में मेरे उपन्यास शिखण्डी पर चर्चा - डॉ शरद सिंह
प्रिय ब्लॉगर साथियों,
देश के चर्चित टीवी चैनल 'आजतक' के साहित्यिक कार्यक्रम BookCafe 'साहित्य तक' में 'आजतक' के साहित्यमर्मज्ञ, समीक्षक जयप्रकाश पाण्डेय जी ने बहुचर्चित पांच क़िताबों में मेरे उपन्यास 'शिखण्डी' पर भी विस्तृत चर्चा की है। इस पूरी प्रस्तुति को आप यू ट्यूब की इस लिंक पर देख सकते हैं -
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मंगलवार, जनवरी 19, 2021
दैनिक जागरण, नईदुनिया के सप्तरंग परिशिष्ट में मेरे उपन्यास ‘‘शिखण्डी’’ की वरिष्ठ समीक्षक राजेन्द्र राव जी द्वारा की गई समीक्षा - डाॅ शरद सिंह
दिनांक 18.01.2021 को दैनिक जागरण, नईदुनिया के सप्तरंग परिशिष्ट में मेरे उपन्यास ‘‘शिखण्डी’’ की वरिष्ठ समीक्षक राजेन्द्र राव जी द्वारा की गई समीक्षा प्रकाशित हुई है।
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ब्लाॅग पाठकों की पठन-सुविधा हेतु प्रकाशित समीक्षा लेख जस का तस मैं यहां टेक्स्ट रूप में प्रस्तुत कर रही हूं-
"डाॅ. शरद सिंह हिंदी के उन विरल कथाकारों में हैं, जो लेखन पूर्व शोध में संलग्न होते हैं। यह कृति विरल कथासागर महाभारत से एक अनोखे चरित्र के जीवन और संघर्ष को पर्त-दर-पर्त उद्घाटित करती है, एमदम नए नज़रिए और नए अंदाज़ से।
काशी नरेश की ज्येष्ठ पुत्री अंबा और उसकी दो बहनों का अपहरण भीष्म द्वारा बलपूर्वक किए जाने के और कुरु वंश के राजकुमारों से विवाह किए जाने को सहन न करने और प्रतिकार करने के बाद वह निस्संग और निरुपाय हो कर भी अपने साथ हुए अन्याय का प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा करती है और इसके लिए उसे किस तरह तीन जन्म और स्त्री-पुरुष दोनों के चोले धारण करने पड़ते हैं, इसका उद्देश्यपूर्ण और रोचक चित्रण इस उपन्यास में हुआ है। अंत होते-होते इसका वैचारिक पक्ष सघन स्त्रीविमर्श के रूप में सामने आता है जो पाठक को सहज ही स्वीकार्य हो सकता है। यूं तो शिखंडी की कथा युग-युग से सुनी जाती रही है परंतु इसे मानवीय और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से कहा जाना एक अभिनव प्रयोग है।"
- राजेन्द्र राव
दैनिक जागरण (सप्तरंग), नईदुनिया (सतरंग) साहित्यिक पुनर्नवा, 18.01.2021
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हार्दिक धन्यवाद आदरणीय राजेन्द्र राव जी 🌹🙏🌹
हार्दिक धन्यवाद नईदुनिया 🌹🙏🌹
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| Shikhandi Novel of Dr (Miss) Sharad Singh |
सोमवार, दिसंबर 07, 2020
डॉ शरद सिंह ने 'पिछले पन्ने की औरतें' उपन्यास में.... | बुंदेली महिला कथाकार और लोक संस्कृति | डॉ. अवधेश चंसौलिया
शुक्रवार, सितंबर 25, 2020
पिछले पन्ने की औरतें | उपन्यास | लेखिका डॉ शरद सिंह | पुनर्पाठ | डॉ वर्षा सिंह
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| Pichhale Panne Ki Auraten - Novel of Sharad Singh |
सागर: साहित्य एवं चिंतन
पुनर्पाठ: ‘पिछले पन्ने की औरतें’ उपन्यास
-डॉ. वर्षा सिंह
Email- drvarshasingh1@gmail.com
इस बार पुनर्पाठ में मैं जिस उपन्यास की चर्चा करने जा रही हूं उसका नाम है ’’पिछले पन्ने की औरतें‘‘। इस उपन्यास की लेखिका है डॉ. शरद सिंह। यह उपन्यास मुझे हर बार प्रभावित करता है इसलिए नहीं कि यह मेरी छोटी बहन शरद के द्वारा लिखा गया है बल्कि इसलिए कि इसे हिंदी साहित्य का बेस्ट सेलर उपन्यास और हिंदी साहित्य का टर्निंग प्वाइंट माना गया है। इसे बार-बार पढ़ने की ललक इसलिए भी जागती है कि इसमें एक अछूते विषय को बहुत ही प्रभावी ढंग से उठाया गया है। जी हां, इस उपन्यास में हाशिए में जी रही उन महिलाओं के जीवन की गाथा उनकी सभी विडंबनाओं के साथ सामने रखी गई है, जिन्हें हम बेड़नी के नाम से जानते हैं। समग्र हिन्दी साहित्य में स्त्रीविमर्श एवं आधुनिक हिन्दी कथा लेखन के क्षेत्र में सागर नगर की डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह का योगदान अतिमहत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने पहले उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ से हिन्दी साहित्य जगत में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराई। ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ उपन्यास का प्रथम संस्करण सन् 2005 में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद अब तक इस उपन्यास के हार्ड बाऊंड और पेपर बैक सहित अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। यह न केवल पाठकों में बल्कि शोधार्थियों में भी बहुत लोकप्रिय है। देश के अनेक विश्वविद्यालयों में इस उपन्यास पर शोध कार्य किया जा चुका है और वर्तमान में भी अनेक विद्यार्थी इस उपन्यास पर शोध कार्य कर रहे हैं।
हिन्दी साहित्य में ’’पिछले पन्ने की औरतें‘‘ ऐसा प्रथम उपन्यास है जिसका कथानक बेड़नियों के जीवन को आाधार बना कर प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास की शैली भी हिन्दी साहित्य के लिए नई है। यह उपन्यास अतीत और वर्तमान की कड़ियों को बड़ी ही कलात्मकता से जोड़ते हुए इसे पढ़ने वाले को वहां पहुंचा देता है जहां बेड़नियों के रूप में औरतें आज भी अपने पैरों में घंघरू बांधने के लिए विवश हैं। यह उपन्यास ‘‘रहस्यमयी श्यामा’’ से लेखिका की मुलाकात से आरम्भ होता है। कहने को तो यह मामूली सी घटना है कि लेखिका को सागर से भोपाल की बस-यात्रा के दौरान एक महिला सहयात्री मिलती है। लेकिन कथानक का श्रीगणेश ठीक वहीं से हो जाता है जब लेखिका को बातचीत में पता चलता है उस स्त्री का नाम श्यामा है और वह एक बेड़नी है। श्यामा राई नृत्य करती है और नृत्य करके अपने परिजन का पेट पालती है। यहीं से आरम्भ होती है एक जिज्ञासु यात्रा। इसके बाद लेखिका बेड़िया समाज के इतिहास और पारिवारिक संरचना पर अपनी शोधात्मक दृष्टि डालती है। वह स्वयं उन गांवों में जाती है जहां बेड़नियां रहती हैं। उनसे बात करती है, उनके जीवन को टटोलती है और उनके साथ, उनके घर पर रह कर उनके जीवन की बारीकियों को समझने का प्रयास करती है। यह एक बहुत बड़ा क़दम था। वाचिक और लिखित स्रोतों और ज़मीनी कार्यों के बीच तालमेल बिठाती हुई लेखिका शरद सिंह उपन्यास की अंतर्कथा के रूप में लिखती हैं गोदई की नचनारी बालाबाई की मर्मांतक कथा। जब एक गर्भवती बेड़नी को भी देह-पिपासु पुरुषों ने भावी मंा नहीं अपितु मात्र स्त्रीदेह के रूप में ही देखा। यह कथा मन को विचलित कर देती है। उपन्यास आगे बढ़ता है चंदाबाई, फुलवा के जीवन से होता हुआ रसूबाई के जीवन तक जा पहुंचता है। स्त्री को मात्र देह मानने वालों के द्वारा स्त्री के सम्मान और स्वाभिमान पर चोट पहुंचाने, उन पर अत्याचार करने वालों की दुर्दांत कुचेष्टाएं झेलती ये स्त्रियां। जिनके बारे में शरद सिंह कहती हैं कि ये वे औरतें हैं जिन्हें समाज अपनी खुशियों को बढ़ाने के लिए अपने पारिवारिक उत्सवों में नाचने के लिए तो बुलाता है लेकिन इन्हें अपने परिवार में शामिल करने से हिचकता है। वह इनकी खुशियों से कतई सरोकार नहीं रखना चाहता है।
परमानंद श्रीवास्तव जैसे समीक्षकों ने उनके इस उपन्यास को हिन्दी उपन्यास शैली का ‘‘टर्निंग प्वाइंट’’ कहा है। यह हिन्दी में रिपोर्ताजिक शैली का ऐसा पहला मौलिक उपन्यास है जिसमें आंकड़ों और इतिहास के संतुलित समावेश के माध्यम से कल्पना की अपेक्षा यथार्थ को अधिक स्थान दिया गया है। यही कारण है कि यह उपन्यास हिन्दी के ‘‘फिक्शन उपन्यासों’’ के बीच न केवल अपनी अलग पहचान बनाता है अपितु शैलीगत एक नया मार्ग भी प्रशस्त करता है। शरद सिंह जहां एक ओर नए कथानकों को अपने उपन्यासों एवं कहानियों का विषय बनाती हैं वहीं उनके कथा साहित्य में धारदार स्त्रीविमर्श दिखाई देता है।
‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ शरद सिंह द्वारा लिखित उनका पहला शोधपरक उपन्यास है जिसमें सामाजिक स्तरों में दबी-कुचली और पिछले पन्नों में दर्ज कर भुला दी गईं औरतों को मुखपृष्ठ पर लाने का सफल प्रयास किया है। तीन भागों और सत्ताईस उपभागों में लिखे गए उपन्यास के स्त्री पात्र महत्वपूर्ण हैं। किसी स्त्री की वेदना एवं पीडा को रिर्पोताज शैली में लेखन करना लेखिका की कुशलता का परिचायक है। विभिन्न औरतों से होकर संपूर्ण भारतीय औरतों के अस्तित्व, अधिकार पर लेखिका ने प्रकाश डाला है। ’पिछले पन्ने की औरतें’ उपन्यास में शरदसिंह ने समाज की आन्तरिक और बाह्य परतों को खोलने का प्रयास किया वे समाज के कुरूप सत्य को बड़े ही बोल्ड ढंग से प्रस्तुत करती हैं उनकी लेखकीय क्षमता की विशेषता है कि वे जीवन और समाज के अनछुए विषयों को उठाती हैं।
जब भी मैं इस उपन्यास को पढ़ती हूं तो मुझे सुप्रसि़द्ध समीक्षक स्व. परमानंद श्रीवास्तव का वह समीक्षा-लेख याद आने लगता है जो उन्होंने ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ के बारे में लिखा था - “ रोमांस की मिथकीयता के लिए कोई भी कथा छलांग लगा सकती है। शरद सिंह का उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ बेड़िया समाज की देह व्यापार करने वाली औरतों की यातना भरी दास्तान है। शरद सिंह की प्रतिभा ‘तीली-तीली आग’ कहानी संग्रह से खुली। स्त्री विमर्श में उनका हस्तक्षेप और प्रामाणिक अनुभव अनुसंधान के आधार पर है। शरद सिंह वर्जना मुक्त हो कर इस अंधेरी दुनिया में धंसती हैं। उन्हें पता है कि स्त्री देह के संपर्क में हर कोई फायदे में रहना चाहता है। शरद सिंह ने ईश्वरचंद विद्यासागर, ज्योतिबाफुले आदि के स्त्री जागरण को समझते हुए इस नरककुंड से सीधा साक्षात किया है। शरद सिंह को दुख है कि जब देश में स्त्री उद्धार के आंदोलन चल रहे थे तब बेड़िया जाति की नचनारी, पतुरिया-जैसी स्त्रियों की मुक्ति का सवाल क्यों नहीं उठा? नैतिकता के दावेदार कहां थे? विडम्बना यह कि जो पुरुष इन बेड़िया औरतों को रखैल बना कर रखते, उन्हीं के घर के उत्सवों में इन्हें नाचने जाना पड़ता था।......शरद सिंह का बीहड़ क्षेत्रों में प्रवेश ही इतना महत्वपूर्ण है कि एक बार ही नहीं, कई-कई बार इस कृति को पढ़ना जरूरी जान पड़ेगा। अंत में शरद सिंह के शब्द हैं- ‘लेकिन गुड्डी के निश्चय को देख कर मुझे लगा कि नचनारी, रसूबाई, चम्पा, फुलवा और श्यामा जैसी स्त्रियों ने जिस आशा की लौ को अपने मन में संजोया था, वह अभी बुझी नहीं है.....।’ शरद सिंह ने जैसे एक.सर्वेक्षण के आधार पर बेड़नियों के देहव्यापार का कच्चा चिट्ठा लिख दिया है। तथ्य कल्पना पर हावी है। शरद सिंह की बोल्डनेस राही मासूम रजा जैसी है। या मृदुला गर्ग जैसी। या लवलीन जैसी। पर शरद सिंह एक और अकेली हैं। फिलहाल उनका कोई प्रतिद्वन्द्वी कथाक्षेत्र में नहीं है। ‘पिछले पन्ने की औरतें’’ उपन्यास लिखित से अधिक वाचिक (ओरल) इतिहास पर आधारित है। इस बेलाग कथा पर शील-अश्लील का आरोप संभव नहीं है। अश्लील दिखता हुआ ज्यादा नैतिक दिख सकता है। भद्रलोक की कुरूपताएं छिपी नहीं रह गई हैं। शरद सिंह के उपन्यास को एक लम्बे समय-प्रबंध की तरह पढ़ना होगा जिसके साथ संदर्भ और टिप्पणियों की जानकारी जरूरी होगी। पर कथा-रस से वंचित नहीं है यह कृति ‘पिछले पन्ने की औरतें’’। जब दलित विमर्श और स्त्री विमर्श केन्द्र में हैं, संसद में स्त्री सीटों के आरक्षण पर जोर दिया जा रहा हो पर पुरुष वर्चस्व के पास टालने के हजार बहाने हों- यह उपन्यास एक नए तरह की प्रासंगिकता अर्जित करेगा।”
निःसंदेह यह उपन्यास तब तक प्रासंगिक रहेगा जब तक औरतें समाज के पिछले पन्नों में क़ैद रखी जाएंगी। और अंत में मैं दे रही हूं बार-बार पढ़े जाने योग्य इस उपन्यास के आरम्भिक पन्ने में लिखी शरद सिंह की ही वे काव्य पंक्तियां जो एक नए स्त्रीविमर्श के पक्ष में आवाज़ उठाती हैं-
छिपी रहती है
हर औरत के भीतर
एक और औरत
लेकिन
लोग अक्सर
देखते हैं
सिर्फ बाहर की औरत।
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( दैनिक, आचरण दि.19.09.2020)
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सोमवार, अगस्त 24, 2020
उपन्यास "शिखंडी : स्त्री देह से परे" की समीक्षा "दैनिक हिन्दुस्तान" में - डॉ शरद सिंह
मंगलवार, जुलाई 28, 2020
एक पुनर्पाठ आलेख कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘समय सरगम’ का ... संवेदनाओं का आकलन वाया ‘समय सरगम’ - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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| Samay Sargam - Krishna Sobati |
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| Krishna Sobati |
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| Dr (Miss) Sharad Singh |
शनिवार, दिसंबर 28, 2019
शिखंडी ... स्त्री देह से परे ( उपन्यास) - लेखिका डॉ. शरद सिंह
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| Shikhandi ... Stri Deh Se Pare - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh - The story of the struggle of a woman who plays a decisive role in the war of Mahabharata. |
" शिखंडी ... स्त्री देह से परे " ( उपन्यास )
" एक स्त्री के संघर्ष की वह कथा जो जन्म जन्मांतर तक चलती हुई महाभारत के युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाती है। " - डॉ. शरद सिंह
सोमवार, दिसंबर 10, 2018
सागर पाठक मंच में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ शरद सिंह ने 'नींद क्यों रात भर नहीं आती' उपन्यास की विशेषताओं पर प्रकाश डाला
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| Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
दिनांक 09.12.2018 को साहित्य अकादेमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद भोपाल के स्थानीय उपक्रम सागर पाठक मंच के तत्वाधान में उपन्यासकार सूर्यनाथ सिंह के उपन्यास "नींद क्यों रात भर नहीं आती" पर चर्चा-गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में मैंने उपन्यास की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। मैंने कहा कि-‘‘ पारम्परिक किस्सागोई की उम्दा मिसाल है सूर्यनाथ का उपन्यास। एक कहानी में एक से अधिक कहानियों का जुड़ते जाना किस्सागोई शैली की खूबी है। जब इस शैली का प्रयोग उपन्यास में किया जाता है तो जोखिम बढ़ जाते हैं। सूर्यनाथ सिंह ने अपने उपन्यास 'नींद क्यों रात भर नहीं आती' में इस जोखिम को उठाते हुए किस्सागोई शैली का बेहतरीन प्रयोग किया है। यही इस उपन्यास की विशेषता भी है। लेखक की अन्वेषक दृष्टि से प्रस्तुत कहानियों ने उपन्यास की समसामायिकता को जिस ढंग से उभारा है, वह उल्लेखनीय है। उपन्यास लेखन में नए प्रयोग उपन्यास की महत्ता को बढ़ा देते हैं।’’
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| Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Varsha Singh as a Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Varsha Singh as a Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Varsha Singh as Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Varsha Singh as Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Sharad Singh as Chief Guest and Dr Varsha Singh as Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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| Dr Sharad Singh as Chief Guest at Sagar Pathak Manch on the Novel of Suryanath Singh - 09.12.2018 |
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