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गुरुवार, जनवरी 30, 2025

डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "प्रेम वाया एल. डी. आर." सुष्मिता सिंह के स्वर में | Dr (Ms) Sharad Singh story - Prem Via L.D.R. - in the voice of Sushmita Singh

लोकप्रिय साहित्यिक Youtube Channel "आज सुनिए कहानी" में  सुष्मिता सिंह जी के मधुर स्वर में  सुनिए   मेरी कहानी 
        👇"प्रेम वाया एल. डी. आर." 👇
      सुष्मिता जी की आवाज का जादू आपको कहानी के कथानक, घटनाओं और दृश्यों से इस तरह जोड़ देगा कि आप सब कुछ अपनी आंखों के सामने घटित होता हुआ महसूस करेंगे...
 Dr (Ms) Sharad Singh story - Prem Via L.D.R. - in the voice of Sushmita Singh
    इतनी बेहतरीन प्रस्तुति के लिए हार्दिक धन्यवाद प्रिय सुष्मिता सिंह जी 🌹🙏🌹

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डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "पुराने कपड़े" सुष्मिता सिंह के स्वर में | Dr (Ms) Sharad Singh story - Purane Kapade - in the voice of Sushmita Singh

लोकप्रिय साहित्यिक Youtube Channel "आज सुनिए कहानी" में सुष्मिता सिंह जी के मधुर स्वर में सुनिए मेरी कहानी "पुराने कपड़े" ..
👇
      सुष्मिता जी की आवाज का जादू आपको कहानी के कथानक, घटनाओं और दृश्यों से इस तरह जोड़ देगा कि आप सब कुछ अपनी आंखों के सामने घटित होता हुआ महसूस करेंगे...
    इतनी बेहतरीन प्रस्तुति के लिए हार्दिक धन्यवाद प्रिय सुष्मिता सिंह जी 🌹🙏🌹
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शुक्रवार, सितंबर 02, 2016

मेरी पहली ‘डेब्यू स्टोरी’ ‘फेमिना’ (हिन्दी) सितम्बर 2016 में ....

प्रिय मित्रो, ‘फेमिना’ (हिन्दी) के सितम्बर 2016 अंक में मेरे वक्तव्य के साथ मेरी ‘प्रथम प्रकाशित कहानी’ प्रकाशित की गई है। अपनी पहली कहानी को ‘फेमिना’ में प्रकाशित देख कर बहुत-सी यादें ताज़ा हो गईं। आप भी पढ़िए मेरी पहली ‘डेब्यू स्टोरी’ ‘‘गीला अंधेरा’....
एक सुखद अनुभूति के लिए हार्दिक धन्यवाद ‘‘फेमिना’’! 
 
Dear Friends,
'Femina' magazine has published my "first published story" with my statement in September 2016 issue. Really it is special experience for me. So, I want to share with all of you.
Thank you "Femina" to give me a special experience !!!
Femina, September 2016 - Story of Dr (Miss) Sharad Singh

Femina, September 2016 - Story of Dr (Miss) Sharad Singh

Femina, September 2016 - Story of Dr (Miss) Sharad Singh
Femina, September 2016 - Cover Page

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2016

कहानी ‘‘पछतावा’’ .... डॉ. शरद सिंह



कहानी


पछतावा


- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह



ग्राम रजाखेड़ी, रेलवे फाटक नम्बर... क्या फ़र्क़ पड़ता है रेलवे फाटक नम्बर से? नम्बर कोई भी हो, रहना तो उसे वहीं था। वह पैदा वहीं हुआ था। उसका घर जो वहीं था। वैसे फ़र्क़ तो इस बात से भी नहीं पड़ता था कि उसका घर ग्राम रजाखेड़ी में था। वही ग्राम रजाखेड़ी जो कभी प्रदेश की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत हुआ करती थी। फिर भी अगर वह ग्राम रजाखेड़ी में न रह कर शनीचरी पुलिस चौकी के पास रहता या फिर शुक्रवारी की घटिया पर, तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। जगह बदल जाने से उसकी फि़तरत बदलने वाली नहीं थी। उसने जो कुछ जाना, समझा और सीखा था, अपने पिता और बड़े भाइयों से सीखा था। उसके पिता ने बड़े लाड़-प्यार से उसका नाम रखा था एकलव्य। नामकरण करते समय उसके पिता को भी इस बात का अहसास नहीं था कि एक दिन उसका एकलव्य अपने नाम को सार्थक करते हुए अपने पिता को ही गुरु द्रोणाचार्य बना लेगा। जहां तक बड़े भाइयों का प्रश्न था तो एकलव्य के तीनों बड़े भाई उसे जोश दिला-दिला कर अपने जैसे बनाने का बीड़ा उठाए घूमते। एक मां ही थी जो नहीं चाहती थी कि उसका सबसे छोटा, सबसे प्यारा-सा दिखने वाला बेटा एकलव्य अपने भाइयों के पदचिन्हों पर चले अथवा अपने पिता का अनुकरण करे।

एकलव्य और उसके भाइयों के नाम सरकारी स्कूल में लिखवाए गए थे। लेकिन स्कूल और पढ़ाई से उनका छत्तीस का आंकड़ा था। तीनों बड़े भाई फेल-पास होते हुए जैसे-तैसे आठवीं की परीक्षा तक पहुंचे... और फिर वहीं फुलस्टॉप लगा कर बैठ गए। आठवीं कक्षा पार न करने की मानों उन तीनों ने क़सम खा रखी थी।

मां सरकारी स्कूल में भृत्य थी, भले ही उसकी नौकरी कच्ची थी लेकिन चार पैसे मिलते तो थे। मंा का काम था स्कूल में बच्चों के लिए पीने का पानी भरना और प्राचार्या जी के कमरे की साफ़-सफ़ाई करना। यूं तो नल आने पर टंकी में पानी भरना पड़ता था, लेकिन नल कब आएगा, यह निश्चत नहीं रहता। कभी सुबह आता तो कभी शाम को तो कभी दोपहर को। मां चाहती थी कि उसके तीनों बड़े बेटों में से कोई एकाध तो पढ़-लिख कर भृत्य बनने लायक हो जाए। कम से कम एकलव्य के लिए घर में एकाध अच्छा उदाहरण तो बने, लेकिन मां के सोचने या चाहने से सब कुछ होना होता तो उसके घर के दिन न फिर जाते? फिर भी एकलव्य ने मां की इच्छा का मान रखा और आठवीं कक्षा की परीक्षा पास कर ली। वह कैसे पास हो गया, यह उसे भी नहीं पता। जैसे किसी अपराधी को संदेह का लाभ मिल जाता है, वैसे ही एकलव्य को अपनी खराब रायटिंग का लाभ मिल गया होगा। परीक्षक को शायद ढंग से समझ में ही नहीं आया होगा कि एकलव्य ने उत्तर-पुस्तिका में लिखा क्या है। या फिर कोई और तुक्का लग गया हो। बहरहाल, एकलव्य आठवीं उत्तीर्ण कर के नवीं कक्षा में जा पहुंचा। जिस दिन उसने नवीं में दाखिला लिया, उसी दिन उसने अपने पिता को यह साबित कर देना चाहा कि वह सिर्फ़ नाम का ही नहीं बल्कि काम से भी एकलव्य है और उसके पिता उसके लिए गुरु द्रोणाचार्य से कम नहीं हैं। यह बात अलग है कि एकलव्य को महाभारतकी कथा के एकलव्य और द्रोणाचार्य के बारे में पता ही नहीं था। उसके पिता को भी इस कथा के बारे में कितना पता था, पता नहीं। हो सकता है कि पिता ने यह नाम कहीं सुना हो, उन्हें पसंद आ गया हो और उन्होंने अपने बेटे का नाम यही रख दिया। या शायद पंडित जी ने सुझाया हो, नामकरण संस्कार के समय।

जो भी हो, एकलव्य ने उधर नौवीं कक्षा में अपना नाम लिखाया और छुट्टी होने पर स्कूल से भाग कर सीधे अपने पिता के पास पहुंचा, जो उस समय अपने कुछ मित्रों के साथ ताश-पत्ती खेलने में व्यस्त थे। अब सब के सामने एकलव्य अपने पिता को वह नहीं दे सकता था जो गुरुदक्षिणा के रूप में उनके लिए ले कर आया था। उसने पिता को संकेत कर के अलग बुलाया। पिता ने जैसे ही उससे पूछा- क्या है? क्या काम है? एकलव्य ने अपनी ढीली-ढाली पेंट की ज़ेब से स्टील की चमचमाती हुई नल की टांेटी निकाली और अपने पिता के हाथ में थमा  दी।

हैं? ये क्या है?’’ पिता स्टील की ठंडक को महसूस करते हुए चौंक कर बोले।

कैसी है?’ एकलव्य ने उत्साह भरे स्वर में पूछा।

है तो अच्छी, पर मिली कहां से?’ पिता ने पूछा।

स्कूल से लाया हूं।एकलव्य ने उत्साहित हो कर बताया।

वाह बेटा! शाबाश!!पिता ने खुशी से एकलव्य की पीठ ठोंकते हुए कहा,‘तू तो अपने भाइयों से भी आगे निकल गया।

यही तो सुनना चाहता था एकलव्य।

कितने में बिकेगी?’ एकलव्य ने जिज्ञासा से भर कर पूछा। वह अपने पिता से शाबाशी के चंद और शब्द सुनना चाहता था।

नई है, दो सौ नहीं तो सौ रुपए में तो बिक ही जाएगी। अच्छा, अब तू घर जा, मैं बाद में आऊंगा।पिता को ध्यान आया कि उनका खेल अभी ख़त्म नहीं हुआ है और उनके दोस्त उनकी प्रतीक्षा में रुके बैठे हैं। पिता ने यह नहीं कहा कि एकलव्य ने स्कूल से नल की टोंटी चुरा कर ग़लत किया है, उल्टे वे उसे शाबाशी दे कर प्रोत्साहित करते रहे। जैसे कि अपने अन्य तीन बेटों को शाबाशी दिया करते हैं।

घर लौटते समय एकलव्य को याद आ रहा था कि कैसे उसके बड़े भाई सार्वजनिक जगहों से नल की टोंटियां, लोहे की जाली, पाईपें आदि उखाड़ लाया करते और उसके पिता उनकी पीठ ठोंका करते। यह सब देख कर एकलव्य को भी लगता कि वह भी कोई ऐसा काम करे जिससे उसके पिता उसकी पीठ ठोंके, उसकी तारीफ़ करें। इसीलिए अपने स्कूल में नल की चमचमाती  टोंटी देख कर उससे रहा नहीं गया। वह टोंटी उसे शाबाशी पाने की ट्रॉफी के समान लगी और उसने घर से पेंच-पाना ला कर टोंटी उखाड़ी और अपनी जेब के हवाले कर ली। ऐसा करते किसी ने नहीं देखा उसे। यह चतुराई उसने अपने भाइयों से ही तो सीखी थी। दूकानों से खाने-पीने के सामान तो उसने बहुत चुराए थे, लेकिन यह उसकी खुद की नज़र में एक बड़ा हाथ था। अपने पिता को बता कर उनसे शाबाशी हासिल करने वाला बड़ा हाथ।

एकलव्य खुश होता हुआ अपने घर पहुंचा। मगर वहां का नज़ारा देख कर उसके होश उड़ गए। घर में कोहराम मचा हुआ था। मंा बिस्तर पर पड़ी कराह रही थी और दो बड़े भाई घबराए हुए एक कोने में खड़े थे। तीसरे का कहीं पता नहीं था। मोहल्ले-पड़ोस की औरतें मां के बिस्तर को घेर कर खड़ी हुई थीं।

अम्मा को क्या हुआ, चाची?’ घबराए हुए एकलव्य ने एक औरत से पूछा।

होना क्या है? तेरी मां को कमर में गहरी चोट आई है। दवा तो दिलवा दी गई है लेकिन सत्यानाश हो उसे चोट्टे का जिसने स्कूल को भी नहीं छोड़ा।वह औरत गुस्से से भर कर बोली।

उस औरत की अजीब सी बातें सुन कर एकलव्य ख़ामोश हो गया। उसकी समझ में कुछ नहीं आया। वह उल्टे पांव अपने पिता की ओर भागा। एकलव्य को उसके पिता बीच रास्ते में ही मिल गए। किसी ने उन्हें मां को चोट लगने की सूचना दे दी थी। वे भी घबराए हुए थे।

घर पहुंचते ही एकलव्य के पिता ने भी वही प्रश्न किया-क्या हुआ इसे? कैसे चोट लगी?’

एकलव्य के भी कान खड़े हो गए। वह भी जानना चाहता था कि उसकी मां को चोट लगी कैसे? कहीं किसी ने उन्हें मारा-पीटा तो नहीं?

पिता के पूछने पर मां ने खुद कराहते हुए बताया कि स्कूल में दोपहर को जैसे ही नल में पानी आया वह जल्दी-जल्दी पानी भरने लगी। टंकी की एक टोटी कोई चुरा ले गया था, जिससे पानी वहां बह कर फैल रहा था। कल तक छोटी लगी हुई थी जिससे उसका ध्यान टोंटी गायब होने पर गया ही नहीं और न ही वहां बहते हुए पानी पर ध्यान गया। जैसे ही एकलव्य की मां का पैर फर्श पर फैले हुए उस पानी पर पड़ा, उसका पैर फिसल गया और वह पीठ के बल धड़ाम से गिरी। वह तो गनीमत था कि उसका सिर दीवार से नहीं टकराया नहीं तो कोई अनहोनी भी हो सकती थी। 

मां की बात सुन कर एकलव्य का कलेजा धक्क से रह गया। उसने अपने पिता की ओर देखा। ठीक उसी समय पिता ने भी एकलव्य की ओर देखा। दोनों की नज़रें पल भर को आपस में मिलीं और दोनों घबरा गए। पिता का हाथ अपने कुर्ते की ज़ेब की ओर चला गया। जहां स्टील की चमकती, सुंदर टोंटी अभी भी रखी हुई थी। वे एकलव्य से कहना चाह रहे थे कि -बेटा, अब ऐसा काम कभी मत करना।

जबकि एकलव्य मन ही मन क़सम खा चुका था कि वह अब ऐसा काम कभी नहीं करेगा।  लेकिन इसके साथ ही उसे अपने पिता से यह शिक़ायत भी थी कि उन्होंने उसे ऐसा करने पर डांटा क्यों नहीं? अगर वे उसके भाइयों को भी चोरी करने पर शाबाशी देने के बजाए डांट देते तो वह भी आज ऐसा ग़लत काम नहीं करता।

उधर मां दर्द से कराह रही थी और इधर पिता-पुत्रा पछतावे के सागर में डूबते जा रहे थे।               

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डॉ. शरद सिंह की कहानी ‘‘पछतावा’’

इस कहानी का प्रसारण दिनांक 05.02 2016 को आकाशवाणी के सागर केन्द्र से किया गया ....
            




मंगलवार, दिसंबर 03, 2013

स्लेव मार्केट

 कहानी
- डॅा. शरद सिंह

(मेरी कहानी ‘स्लेव मार्केट’ ‘गवर्नेंस नाउ’ पत्रिका, 1-15 सितम्बर 2013 में प्रकाशित हुई थी...आप भी इसे पढ़े.....)

आज सुबह से उसका मन खिन्न था। इसीलिए उसने अपने नाश्ते में फेरबदल कर लिया। गोया नाश्ता बदल लेने से हालात बदल जाएंगे। वह जानती थी कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है फिर भी उसने तयशुदा नाश्ता करने के बजाए दो किलोमीटर अधिक दूर जा कर दूसरा नाश्ता करने की ठानी।
‘वन मोमोज़ प्लीज़ !’ रेस्तरां में पहुंच कर उसने बैरे को आदेश दिया ही था कि उसके कानों से एक आवाज़ टकराई।
‘नो-नो! नाॅट वन...टू मोमोज़...प्लीज़...!’
नमिता ने देखा कि उसकी मेज से लगभग सट कर आयुषी खड़ी थी। आयुषी को देख कर नमिता का मूड और खराब हो गया। यह यहां भी चली आई...मगर क्यों? कैसे? मेरा पीछा कर रही थी क्या?
‘हाई! गुडमाॅर्निंग आयुषी! यहां कैसे? आज इडली-सांभर को डिच कर दिया?’ मन ही मन कुढ़ती हुई नमिता ने पूछा। आयुषी रोज़ सुबह के नाश्ते में इडली-सांभर ही खाना पसंद करती है। वह भी इस फंडे के साथ कि जब तक यहां हो तक तक इडली-सांभर का आनंद ले लो हो सकता है यहां से निकलने पर छोटे-कुल्छे पर जि़न्दा रहना पड़े।
‘नहीं, ऐसा तो नहीं! इडली-सांभर खा चुकी हूं....एक्चुअली, वही खा कर निकल रही थी कि तू दिखाई दी...पैदल-पैदल इधर आती हुई...मुझे आश्चर्य हुआ तो तुझे फाॅलो करने लगी....बस्स! मगर सोचती हूं कि एकाध मोमोज़ भी खा लूं फिर आज ही दोपहर बाद चैन्नई के लिए निकलना है....यू नो, तैयारी तो पूरी हो गई है फिर भी फ्रेन्ड्स से मिलते-मिलाते लंच तो छूट ही जाएगा।’ आयुषी ने इत्मीनान से बैठते हुए कहा।
‘यू लकी...’ नमिता के मुंह से निकला और फिर उसने अपने दांतों तले अपनी जीभ दबा ली। उफ! ये क्या कह बैठी वह। अब आयुषी को लगेगा कि नमिता बुरी तरह हताश है। नमिता स्वयं को कोसने लगी।
‘डोंटवरी नमि! आई श्योर दैट नेक्स्ट टाईम इज़ योर! मुझे भी दुख है तुम्हारे लिए....हम दोनों एक साथ चलते तो कितना मज़ा आता, है न!.... बट, मुझे विश्वास है कि अगला सिलेक्शन तुम क्लियर कर लोगी!’ आयुषी ने वही सब कहा जिसका डर था नमिता को। उसका मन बुझ-सा गया।
‘इट्स ओके, आयुषी!’ नमिता ने स्वयं को सम्हालते हुए कहा। तभी बैरा मोमोज़ ले आया। इस रेस्तारां के ए.सी. चैम्बर में सर्विंग सुविधा दी जाती थी। वरना ए.सी. चैम्बर के बाहर सेल्फ-सर्विस थी। निःसंदेह, यह सुविधा सेल्फ-सर्विस की अपेक्षा मंहगी थी और इसका आनन्द ‘डेट’ पर रहने वाले युवा ही ‘अफोर्ड’ करते थे, शेष नहीं। 
       

बैंगलोर शहर मंहगा भी है और सस्ता भी। थोड़ा-सा कष्ट उठा कर बचत कर लो तो सस्ता है वरना मंहगाई के एक से एक आयाम भी आसानी से देखे जा सकते हैं। नमिता, आयुषी और उसके दोस्त अकसर बचत पर ही चलते थे। लेकिन आज नमिता को बचत का विचार नहीं आ रहा था और न आयुषी को। भले ही दोनों के अपने-अपने अलग कारण थे। आयुषी ने स्वर्णिम भविष्य की ओर क़दम उठा दिया था जब कि नमिता तो उस मनःस्थिति में थी कि जिसमें कोई भी युवा हताशा से भर कर किसी भी तरह का ग़लत क़दम उठा सकता है। एक अच्छे कैरियर का उसका सपना कल देर शाम को ही टूटा था जब उसने रिजल्ट-वाॅल पर टंाकी गई सूची में अपना नाम नहीं मिला। वह स्तब्ध रह गई थी। उसे विश्वास नहीं हुआ था कि उसके साथ ऐसा भी हो सकता है। उसका साक्षात्कार, उसकी प्रस्तुति...सब कुछ तो ठीक थे...फिर क्या हुआ?
नमिता भाग कर रिसोर्स आॅफीसर के पास पहुंची थी। 

‘सर! मेरा नाम लिस्ट में क्यों नहीं?’ उसने हांफते हुए पूछा था।
‘योर नेम प्लीज़!’ रिसोर्स आॅफीसर ने सपाट चेहरे के साथ पूछा था।
‘नमिता! नमिता सिंह बुन्देला!’
‘मिस बुन्देला.....ओ या ा ा ह! आपका नाम लिस्ट में नहीं है। आपका सिलेक्शन नहीं हुआ है।’ परिणाम-सूची देखते हुए रिसोर्स आॅफीसर ने अपने चेहरे की भांति सपाट स्वर में उत्तर दिया।
‘बट् सर! हाऊ इट इज़ पाॅसिबल....!’
‘एवरीथिंग इज़ पाॅसिबल इफ यू हेवन्ट परफार्म बैटर! ...यस, आप बैटर ट्वेन्टी फाईव में नहीं आ सकीं।’
‘बट....’
‘यू मे गो नाऊ!’ रिसोर्स आॅफीसर ने घूरते हुए कड़े स्वर में कहा।

सब कुछ ख़त्म! नमिता ने रिसोर्स आॅफीसर के कमरे से बाहर आते हुए सोचा था। जैसे ही यह ख़बर घर पहुंचेगी वैसे ही कोहराम मच जाएगा। मां का सपना टूट जाएगा। पापा को सदमा पहुंचेगा। हंा, मंा चाहती थीं कि नमिता अपना कोर्स समाप्त करते ही किसी अच्छी कम्पनी में अच्छे पैकेज़ पर नौकरी पा जाए जिससे तत्काल उसे अच्छा रिश्ता मिल जाए ....और वे अपनी बहन की बेटी के मुक़ाबले उसे बेहतर साबित कर सकें। पिछले साल उनकी बहन की बेटी का नोएडा में एक मल्टीनेशनल कम्पनी में चुनाव हुआ था जिसके कारण उनकी बहन ने बहुत अकड़ दिखाई थी।
पिता भी यही चाहते हैं कि नमिता ने जब बैंगलोर जा कर पढ़ने में इतना पैसा खर्च किया है तो वहां से वह किसी बडे़ पैकेज़ में ही जाए ताकि वे शान से अपनी बेटी की उपलब्धि का प्रचार-प्रसार कर सकें। आखिर समाज-परिवार में इससे उनका रुतबा बढ़ेगा और मल्टीनेशनल कम्पनी में हाई-पैकेज़ में काम करने वाली उनकी बेटी के लिए बेहतर रिश्तों की बाढ़ आ जाएगी। 
                    

नमिता रात भर यही सोचती रही कि अपने मां-पापा से रिजल्ट कैसे छिपाया जाए और सेमेस्टर दोहराने के पीछे कौन-सा कारण बताया जाए। रात भर नींद नहीं आई उसे। डर था कि उसकी बेस्ट फ्रेंड आयुषी ही उसका भेद न खोल दे। उसका चयन हो गया था। वह नहीं भी बताएगी तो उसके पेरेन्ट्स ढिंढोरा पीटने से बाज़ नहीं आएंगे कि ‘बुन्देला साहब की बेटी नमिता रह गई और हमारी आयुषी को पैकेज़ मिल गया।’

‘क्या सोच रही हो? मोमोज़ ठंडा हुआ जा रहा है! खाना नहीं है क्या?’ आयुषी ने नमिता को टोका जो पिछली शाम और रात की बातों को याद कर के परेशान हो उठी थी।
‘सोच रही हूं कि मां-पापा को पता चलेगा तो वे क्या रिएक्ट करेंगे?’
‘हूं! है तो बात सोचने की!....वैल, तू कह देना कि यह कम्पनी तुझे सूट नहीं कर रही थी...सो, तूने अपना परफार्मेंस जानबूझ कर बिगाड़ा...वे कनविन्स हो जाएंगे।’ आयुषी ने एक तार्किक बहाना सुझाया। नमिता को भी यह बहाना ठीक लगा। आखिर कोई तो सफ़ाई देनी ही पड़ेगी उसे, तो यही सही।
‘तू ठीक कहती है....यही कहूंगी मैं!’ नमिता ने आयुषी का बहाना खुले मन से स्वीकार कर लिया।
‘गुड गर्ल! जल्दी खाओ, फिर मेरे साथ चलो, मुझे अभी कई लोगो से मिलना है।’ आयुषी ने कहा।
‘साॅरी आयुषी, मैं तेरे साथ नहीं चलुंगी! मैं अकेली रहना चाहती हूं!’
‘लेकिन.....’
‘आयुषी, जानती है...कल जब मैं जाॅब-फेयर की लम्बी कतार में खड़ी थी तो मुझे ‘स्प्रिंग ब्वायज़’ मूवी याद आ रही थी। जैसे उस मूवी में अनाथ बच्चे अपने-आप को बेहतर साबित करने की कोशिश करते है और हरेक बच्चा सोचता है कि गोद लेने वाले उसके परफार्मेंस से प्रभावित हों और उसे ही गोद ले लें।.....क्या हम भी वैसे ही नहीं हैं? नहीं, शायद हम उन अनाथ बच्चों जैसे नहीं बल्कि उन स्लाव्स.....उन मध्ययुगीन गुलामों जैसे हैं जो परिस्थितिवश गुलाम-बाज़ार में जा पहुंचते थे और इसी उम्मींद में खड़े रहते थे कि हमें एक अच्छा मालिक मिल जाए....जो हमसे भले ही मनचाही मेहनत खरीद ले मगर बदले में हमें इतना पैसा दे दे कि हम अपने परिवार और समाज केा जता सकें कि गुलामी कितनी अच्छी, कितनी सुखद चीज़ है।’ नमिता ने अपने मन की बात आयुषी के सामने उंडेल दी।
‘माई गाॅश! ये सब तुम क्या सोच रही हो?’ चैंक गई आयुषी। वह बोली, ‘हम गुलाम नहीं हैं, हम मर्जी से जाॅब चुन रहे हैं। फिर दोष किसी और को क्यों?’

    

‘हंह! हमारी मर्जी? व्हाट ए फुलिश थॅाट....हम सोच ही कहां रहे हैं....हम तो एक बहाव में बह रहे हैं...कैरियर, पैकेज़, मल्टीनेशनल कम्पनी....यही तो माहौल है....हम इस माहौल के गुलाम है। यू नो आयुषी! शायद तूने कभी पढ़ा हो कि लार्ड मैकाले ने एक शिक्षानीति बनाई थी जिसे देश में ‘बाबू बनाने की नीति’ कहा गया और इस नीति को ले कर लार्ड मैकाले को हमेशा कटघरे में खड़ा किया गया.....आज तो कोई ऐसी नीति नहीं है जो हमें एक ही दिशा में जाने को मजबूर करे, फिर भी हम एक ही दिशा में जा रहे हें न....बिलकुल भेड़ों के समान...’
‘लार्ड मैकाले? ये सब तू क्या बके जा रही है....आर यू ओके?’ आयुषी ने चिन्तित होते हुए पूछा। वह नमिता की बातें सुन कर अब घबराने लगी थी।
‘आई एम फाईन! यस! एब्सोल्यूटली फाईन....बट वी आर स्लाव....इट इस एक ट्रुथ...ब्लैक ट्रुथ!’ नमिता अपनी ही रौ में बोलती चली गई।
‘नो! यू आर नाॅट ओके! तू मेरे साथ चल! मन बहल जाएगा।’ बैरे का बिल चुकाती हुई आयुषी उठ खड़ी हुई।
‘नहीं, मैं तेरे साथ कहीं नहीं जाऊंगी। तू जा और इन्ज्वाय कर! तू तसल्ली रख, मैं ठीक हूं। एकदम ठीक!’ नमिता ने शांत स्वर में आयुषी से कहा। अब वह अपने मन को हल्का पा रही थी। इन्हीं बातों ने उसके मन को दबा रखा था। ये बातें मन से बाहर निकल आईं तो मन पर से बोझ भी हट गया। कम से कम अगले जाॅब-फेयर तक।
‘तू जा, मैं बिलकुल ठीक हूं!’ नमिता ने एक बार फिर आयुषी को आश्वस्त किया।
‘पक्का!’
‘एकदम पक्का! मैं ठीक हूं और ठीक ही रहूंगी....और अगले स्लाव-मार्केट...आई मीन जाॅब-फेयर में खड़ी होने से पहले तुझसे जरूरी टिप्स ले लूंगी। प्राॅमिस!....अब तू जा वरना तुझे देर हो जाएगी!’ नमिता ने उठ कर आयुषी को गले लगाते हुए कहा।
असमंजस में डूबी आयुषी को देर होने का विचार आया और वह हड़बड़ा कर नमिता से विदा ले कर रेस्तरां के बाहर लगभग दौड़ पड़ी। रेस्तरां से बाहर निकलते समय नमिता ‘स्लाव-मार्केट’ के अपने विचार पर मुस्कुरा दी।  उसके इस विचार ने ही तो उसे उन अंधेरों से बाहर निकाल लिया था जिन अंधेरों के कारण कल की असफलता के बाद उसके मन में घातक विचार उठ रहे थे। एक बार तो यह भी विचार आया था कि वह अपने छात्रावास की छत से छलांग लगा दे। मां-पापा को सच बताने से तो यही बेहतर लगा था उसे। फिर दूसरे ही पल विचार आया था कि  सच तो फिर भी मां-पापा के सामने आ ही जाएगा। टाल दिया था उसने आत्महत्या का विचार। ठीक ही रहा नहीं तो न तो सुबह होती, न ही आयुषी मिलती और न उसे इतना अच्छा बहाना सुझाती।
नमिता अपने मन को तैयार करने लगी कि जब उसके पापा उससे पूछेंगे कि आयुषी का चुनाव हुआ मगर तेरा क्यों नहीं? तो यही कहूंगी कि पापा! वह मालिक मुझे पसन्द नहीं आया था!
नमिता एक बार फिर यह सोच कर मुस्कुरा दी कि शायद आज के समय में ऐसे ही मुस्कुराया जा सकता है।  
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शनिवार, मई 04, 2013

एक और सजा (कहानी) ...

लोकप्रिय वेब पत्रिका ‘शब्दांकन ’ में मेरी कहानी "एक और सजा ..." प्रकाशित हुई है जिसके लिए मैं भरत तिवारी जी की आभारी हूं।
मेरी यह कहानी आप सभी के लिए ....इसे पूरा पनेे लिए
ृपया ‘शब्दांकन ’ के इस लिंक पर क्लिक करें....  

डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की ये कहानी "एक और सजा ..." कत्तई साधारण नहीं है, उन्होंने जिस तरह से गाँव के परिवेश में, आम इंसानों को पात्र बनाकर इस कहानी को लिखा है वो जल्दी पढने को नहीं मिलता
पात्रों के आपसी संवाद बहुत कुछ कहते हैं… सुखबाई का ये सोचना “औरत को मर्द की नीयत पहचानते देर नहीं लगती है, यह बात और है कि किसी मजबूरी के चलते वह सब कुछ अनदेखा कर दे।“ क्या कुछ नहीं बयां करता ?
या फिर फुग्गन के लिए ये कि “कहने को रिश्ता देवर-भाभी का बना रखा था उसने। इस रिश्ते की आड़ में अपने सौ गुनाह तो उसने माफ़ करवा ही लिए थे। बस, एक सौ एकवें की देर थी। टालने का लाख प्रयास करने पर भी वह दिन आ ही गया जब फुग्गन एक सौ एकवां गुनाह कर ही बैठा”
बहरहाल मैं आलोचक नहीं हूँ, ऊपर लिखी बातें एक पाठक के रूप में महसूस करीं सो आपसे साझा कर दीं, और बहुत से क्षण है जो आपको बीच-बीच में सोचने पर मजबूर करते रहेंगे ...
एक बात और कि कहानी का शीर्षक “एक और सजा...” कितना उचित शीर्षक है, ये आप कहानी पूरी पढ़ने के बाद ज़रूर कहेंगे
आपका
भरत
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कहानी - एक और सजा ... डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
www.shabdankan.com/2013/05/sharad-singh.html

 
 
एम. ए.(प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व) स्वर्ण पदक प्राप्त , एम. ए. (मध्यकालीन भारतीय इतिहास), पीएच. डी. (खजुराहो की मूर्तिकला का सौंदर्यात्मक अध्ययन) शिक्षित, सागर (मध्य प्रदेश) में रहने वाली विदुषी डॅा. (सुश्री) शरद सिंह का जन्म पन्ना में हुआ है.

उनकी प्रकाशित कृतियों मे शामिल है -  Shabdankan kahani story Sushri Sharad Singh  कहानी शब्दांकनउपन्यास - 'पिछले पन्ने की औरतें', कहानी संग्रह- 'बाबा फ़रीद अब नहीं आते', 'तीली-तीली आग', साक्षरता विषयक- दस कहानी संग्रह, मध्य प्रदेश की आदिवासी जनजातियों के जीवन पर दस पुस्तकें, शोध ग्रंथ- खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व, न्यायालयिक विज्ञान की नयी चुनौतियाँ, महामति प्राणनाथ: एक युगांतरकारी व्यक्तित्व। रेडियो नाटक संग्रह- 'आधी दुनिया पूरी धूप'। दो कविता संग्रह तथा अन्य कृतियाँ।

इसके अलावा उन्होंने कहानियों का पंजाबी, बुंदेली, उर्दू, गुजराती, उड़िया एवं मलयालम भाषाओं में अनुवाद भी करा है, साथ ही रेडियो, टेलीविजन एवं यूनीसेफ के लिए विभिन्न विषयों पर धारावाहिक एवं पटकथा लेखन। शैक्षणिक विषयों पर फ़िल्म हेतु पटकथा लेखन एवं फ़िल्म-संपादन।

उनको मिले पुरस्कार एवं सम्मानों में गृह मंत्रालय भारत सरकार का 'राष्ट्रीय गोवंद वल्लभ पंत पुरस्कार' पुस्तक 'न्यायालयिक विज्ञान की नयी चुनौतियों पर', श्रीमंत सेठ भगवानदास जैन स्मृति पुरस्कार एवं 'दाजी सम्मान' - साहित्य सेवा हेतु, कस्तुरीदेवी चतुर्वेदी स्मृति लोकभाषा सम्मान, अंबिका प्रसाद दिव्य रजत अलंकरण तथा 'लीडिंग लेडी ऑफ मध्यप्रदेश' सम्मान आदि शामिल हैं।
मध्य प्रदेश लेखक संघ एवं जिला पुरातत्व संघ की सदस्य डॅा. (सुश्री) शरद सिंह स्वतंत्र लेखन एवं दलित, शोषित स्त्रियों के पक्ष में कार्य से जुड़ी हैं।

सम्पर्क:
पता: एम- 111, शान्ति विहार, रजाखेड़ी, सागर (म.प्र.)
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एक और सजा... - डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

 
 
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Shabdankan kahani story Sushri Sharad Singh  कहानी शब्दांकन     ये तुमने अच्छा किया बड़ी ठकुराइन कि फुग्गन को खूंटे से बांध दिया...अब कम से कम छुट्टे सांड़-सा तो नहीं घूमेगा।’ नववधू के रूप में जगतरानी का गृहप्रवेश कराते समय एक ठसकेदार औरत ने जगतरानी की सास से ये बात कही थी।
    ‘छुट्टे सांड़-सा’ जगतरानी चौंकी थी। वैसे उसे कुछ-कुछ भनक तो अपने मायके में विवाह के पूर्व ही लग गई थी कि उसका होने वाला पति फुग्गन सिंह दिलफेंक है।
    ‘अरे, ठाकुरों का बेटा दो-चार जगह मुंह न मारे तो वो ठाकुर का बेटा कैसे हुआ?’ फुग्गन का रिश्ता ले कर आई चाची जी ने अपनी हथेली पर खैनी मलते हुए कहा था,‘खासा बांका-सजीला है। फिलिम का हीरो-सा दिखता है। हमारी जगत और फुग्गन की जोड़ी राम-सीता जैसी खूब जमेगी।
    उस समय किसी को भी इस बात का अंदेशा नहीं था कि फुग्गन राम निकलेगा या रावण।
    विवाह धूम-धाम से हुआ। अपनी हैसियत के अनुसार भरपूर दान-दहेज दिया जगतरानी के पिता ने। विवाह की धूम ऐसी कि चार गाँव तक जगतरानी के विवाह की चर्चा गूंजती रही। किन्तु जगतरानी को ससुराल में क़दम रखते ही पता चल गया था कि उसका पति फुग्गन अव्वल दर्जे का लम्पट इंसान है। मगर विवाह हो जाने के बाद इस जानकारी का कोई महत्व नहीं था। फुग्गन जैसा भी था, उसका पति बन चुका था और जीवन भर उसके साथ निर्वाह करना ही जगतरानी की नियति थी।
    ‘तू तो बड़ी ठंडी-सी है...ज़रा लटके-झटके तो दिखा...चल ये ले...गिलास में डाल कर मुझे पिला।’ फुग्गन ने सुहागरात को ही भविष्य की सारी रूपरेखा दिखा दी थी जगतरानी को।
    ‘मैं ठकुराइन हूं...ये सब करना है तो कहीं और जाओ!’ भड़क कर कहा था जगतरानी ने। वह भी दबने को तैयार नहीं हुई। यद्यपि उसे लगा था कि उसका पति इस पलट उत्तर पर उसे मारेगा-पीटेगा। लेकिन हुआ इसके उलट। फुग्गन डर गया। उसे लगा कि यदि जगतरानी ने उसकी बात सबको बता दी तो अम्मा और पिताजी तो डांटेंगे ही, बड़े दाऊ तो शायद गोली से ही उड़ा दें।
    ‘मैं तो मज़ाक कर रहा था....आप तो बुरा मान गईं।’ ‘तुम’ से ‘आप’ पर आते हुए फुग्गन ने जगतरानी के आगे हथियार डाल दिए। लेकिन उसी रात यह भी सिद्ध हो गया कि फुग्गन और जगतरानी का वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहेगा।
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Shabdankan kahani story Sushri Sharad Singh  कहानी शब्दांकन     समय व्यतीत होने के साथ जगतरानी दो बेटों की माँ बनी लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि उसने दाम्पत्य सुख पाया हो। एक कत्र्तव्य की भांति वह संबंध को निभाती रही और फुगग्न भी। अन्तर था तो बस इतना कि जगतरानी के पास फुग्गन का और कोई विकल्प नहीं था जबकि फुग्गन के पास जगतरानी के विकल्प ही विकल्प थे। पैसेवाले पुरुषों के लिए विकल्प के सभी रास्ते खुले रहते हैं। फुग्गन इस सच्चाई को जानता था इसीलिए उसे जगतरानी को घर और कुल-खानदान की शोभा बनाए रखने में कोई कठिनाई महसूस नहीं होती थी। उसे जिस तरह की शारीरिक भूख थी, उसके लिए पैसा फेंक-तमाशा देख वाला मंत्र उसे आता था। विवाह के पहले से ही वह तो इस रास्ते पर चल रहा था। विवाह के बाद तो और भी कोई कठिनाई नहीं थी क्योंकि अम्मा, पिताजी और बड़े दाऊ को ठाकुर कुल की बहू और खानदान का नाम आगे बढ़ाने वाले पोते मिल गए थे। ऊपर से देखने में फुग्गन सिंह का परिवार सबसे सुखी परिवार था। धन, धान्य, संतान आदि सभी कुछ तो था।
    भीतर की सच्चाई कुछ और थी। फुग्गन सिंह के परिवार में सबसे दुखी और असंतुष्ट कोई थी तो जगतरानी। कहने को घर की छोटी मालकिन किन्तु दो बेटों के पैदा होने के बाद से फुग्गन सिंह ने उसे हाथ लगाना भी छोड़ दिया था। बाहर से भर पेट खा कर आने वाले को घर का भोजन भला कहां रुचता?
    जगतरानी सारे व्रत, उपवास रखती। वट-सावित्री और करवाचैथ का निर्जला व्रत भी रखती।
    ‘देखना अगले सात जनम भी फुग्गन ही तुझे पति के रूप में मिलेगा!’ जगतरानी की सास गद्गद् हो कर कहती।
    सात जनम ! हुंह! जगतरानी का वश चलता तो उल्टे सात फेरे लेकर फुग्गन के वैवाहिक बंधन से आजाद हो जाती। मगर सब कुछ सोचने से थोड़े ही मिल जाता है? वह जानती थी कि अगले सात जन्म में फुग्गन मिले या न मिले किन्तु इस जन्म में तो उसी के साथ निभाना पड़ेगा।
    फुग्गन सिंह के किस्से जगतरानी के कानों तक जा ही पहुंचते। कल तक फलां से उसके संबंध बने हुए थे और आजकल फलां से संबंध चल रहे हैं। जगतरानी को पता रहता था कि फुग्गन सिंह देर रात तक कहां-कहां मुंह मारते रहते हैं। फिर भी वह अनभिज्ञ होने का नाटक करती। मुंहलगी नौकरानी और अधिक कृपा पाने की लालच में फुग्गन की जासूसी करती और जगतरानी को बताती रहती। जगतरानी यूं तो ध्यान से सुनती किन्तु प्रत्यक्षतः यही जताती कि उसे ऐसी किसी जानकारी में तनिक भी रुचि नहीं है। नौकारानी भी जानती थी कि मालकिन को रुचि है लेकिन अरुचि होने का दिखावा करती है। यह सूचना का एक ऐसा आदान-प्रदान था जो पूरी उत्सुकता के साथ लिया-दिया जाता किन्तु निस्पृह होने का नाटक करते हुए।
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    सब कुछ हमेशा की तरह चल रहा था कि उस दिन नौकरानी बदहवास-सी भागी आई और हांफती हुई बोली, ‘छोटी ठकुराइन! ग़ज़ब हो गओ! .....रामधई ग़ज़ब हो गओ, छोटी ठकुराइन!’
    ‘क्या हुआ कुसुमा?’ जगतरानी चैंकी थी। इससे पहले उसने अपनी मुंहलगी नौकरानी कुसुमा को इस तरह बदहवास नहीं देखा था। जगतरानी का मन घबरा उठा।
    ‘ठीक नई भओ...छोटी ठकुराइन...ठीक नई भओ....’ कुसुमा हिचकियां लेने लगी। उसका गला रुंधने लगा। वह नाटक कर रही थी या सचमुच रो पड़ी थी, कहना कठिन था।
    ‘कुछ बोल भी, क्या हुआ?’ जगतरानी खीझ उठी थी। उसी समय उसकी सास दहाड़े मार कर रोती हुई उसके कमरे में आई।
    ‘तेरे तो भाग फूट गए, बिन्ना!’ सास ने प्रलाप करते हुए कहा। तब तक घर की और औरतें भी जगतरानी के कमरे में इकट्ठी होने लगीं। जगतरानी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है? क्या बड़े ठाकुर लुढ़क गए? नहीं, ऐसा होता तो अम्मा जी मेरे भाग फूटने की बात क्यों कहतीं?
    ‘हमाए मोड़ा को जीने खाओ है हम ऊकी जान ले लेबी!’ अम्मा अपने माथे पर हाथ मारती हुई फर्श पर बैठ गईं। तब जगतरानी को समझ में आया कि बड़े ठाकुर को नहीं बल्कि उसके पति फुग्गन को कुछ हो गया है।
    ‘क्या हुआ उन्हें?....अम्मा! क्या हुआ उन्हें...?’ जगतरानी हड़बड़ा कर पूछने लगी। उसका गला सूख गया। घबराहट के मारे माथे पर पसीना चुहचुहा गया। उसका रक्तचाप गड़बड़ाने लगा।
    ‘तुमाओ सुहाग नहीं रहो बिन्ना!’ अम्मा विलाप करती हुई बोलीं।
    यह सुन कर जगतरानी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। क्या ऐसा भी हो सकता है? अभी पांच-छः घंटे पहले तक तो फुग्गन सिंह घर पर थे और अब...अब इस दुनिया में नहीं हैं? ये कैसे हो सकता है?
    यह एक ऐसा सच था जिसे स्वीकार कर पाने में जगतरानी को कई घंटे लगे।
    पता चला कि गांव के ही किसी आदमी ने उसे कुल्हाड़ी मार दी जिससे घटनास्थल पर ही उसकी मौत हो गई। फुग्गन को मारने के बाद वह आदमी खुद ही थाने में पहुंचा और उसने बताया कि वह फुग्गन सिंह को घायल कर के आ रहा है। शायद उसे तब तक पता नहीं था कि उसके एक वार ने फुग्गन सिंह का जीवन समाप्त कर दिया है। उस आदमी ने फुग्गन को क्यों मारा? जगतरानी जानना चाहती थी। उसे यही बताया गया कि जिस आदमी ने फुग्गन सिंह को मारा है उसका नाम कीरत है। कीरत ने फुग्गन से कर्ज लिया था। जब फुग्गन ने कर्ज की रकम वापस मांगी तो कीरत देने से मुकर गया। फुग्गन ने पैसे वसूल लेने की धमकी दी तो तैश में आ कर कीरत ने फुग्गन के सिर पर कुल्हाड़ी दे मारी।
    यही पुलिस डायरी में लिखा गया। यही कीरत ने स्वीकार किया और आजन्म कारावास की सज़ा का भागीदार बना। लेकिन यह कहानी जगतरानी को हजम नहीं हुई। उसे लगता था कि मामला सिर्फ़ पैसे का नहीं हो सकता है। उसका मन कहता था कि इस पूरे मामले में किसी औरत की उपस्थिति अवश्य होगी। वह जानती थी कि फुग्गन सिंह सूदखोर से कहीं अधिक औरतखोर था।
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    ‘कुसुमा!’
    ‘जी छोटी ठकुराइन!’
    ‘तुम्हारे छोटे ठाकुर क्यों मारे गए?’ उसने एक दिन कुसुमा से पूछ ही लिया। वह जानती थी कि कुसुमा को सच पता होगा।
    ‘वो रकम की लेन-देन....’
    ‘सच बताओ कुसुमा...ये झूठा किस्सा मुझे नहीं सुनना है।’ जगतरानी ने स्पष्ट शब्दों में कहा।
    ‘....’
    ‘बोलो!’
    ‘ठकुराइन अगर किसी को पता चल गया कि मैंने आपको बताया तो....’
    ‘तुम कहना क्या चाहती हो?’ जगतरानी की भृकुटी तन गई। कल तक जो कुसुमा उसके पति के किस्से उसे जानबूझ कर सुनाया करती थी, वही कुसुमा आज डरने का नाटक कर रही है? यानी सचमुच मामला कुछ और है।
    ‘देखो कुसुमा, सच्चाई तो मुझे पता चल ही जाएगी लेकिन तुम मुझे बताओगी तो मैं समझ जाऊंगी कि तुम आज भी मेरी वफ़ादार हो।’ जगतरानी ने जानबूझ कर रूखे ढंग से कहा।
    ‘आप नाराज़ मत हो छोटी ठकुराइन! मैं बताती हूं।’ कुसुमा ने वह सारी घटना कह सुनाई जो उसने सुखबाई से खोद-खोद कर जान ली थी।
    स्तब्ध रह गई जगतरानी। कोई पति अपनी पत्नी की इज्जत के लिए इस हद तक जा सकता है? वह भी एक ग़रीब पति? कहावत तो ये है कि ग़रीब की लुगाई, सबकी भौजाई.....कीरत ने अपनी पत्नी के लिए एक रसूखवाले की जान ले ली! क्या सचमुच यही हुआ है?
    जगतरानी को फुग्गन सिंह के रूप में जो पति मिला था उसकी तुलना में कीरत का चरित्र जगतरानी को कपोल कल्पित किस्से जैसा लगा। वह कीरत से मिलने को, उसे देखने को उत्सुक हो उठी। भले ही उसे पता था कि कीरत से मिल पाना किसी भी तरह संभव नहीं है। एक तो वह आजन्म कारावास भुगत रहा है और दूसरा वह उसके पति का हत्यारा है।
    सुखबाई कैसी दिखती है? बहुत सुन्दर होगी। तभी तो फुग्गन सिंह ने उसकी अस्मत पर डाका डालने की कोशिश की और उसका पति भी उस पर जान छिड़कता होगा। तभी तो वह फुग्गन की बदनीयती को सहन नहीं कर सका।
    कैसे मिले वह सुखबाई से? जगतरानी सुखबाई की एक झलक पाने को उत्सुक हो उठी। कुसुमा से कहे? मगर वह क्या सोचेगी? कुसुमा को कहीं यह न लगे कि मैं अपने पति के मरने पर खुश हूं। नहीं मैं इस मामले में कुसुमा की मदद नहीं ले सकती हूं। ईश्वर ने चाहा तो एक न एक दिन सुखबाई और कीरत दोनों को देख लूंगी। जगतरानी ने अपने आपको समझाया और सब कुछ समय पर छोड़ दिया।
    दूसरी ओर सुखबाई अपने ही दुख में डूबती-उतराती जीवन की धारा में बही जा रही थी।
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    पल भर में समय किस तरह मुंह फेरता है, यह सुखबाई से बेहतर भला कौन समझ सकता है ? लगने को तो यूं लगता है मानो कल की ही बात हो, मगर गिनती करने बैठो तो पूरे बारह बरस गुज़र चुके हैं तब से अब तक। कीरत को लगता है कि सुखबाई सब कुछ भूल गई है। वह क्या जाने की कि सुखबाई को उस मनहूस घड़ी का एक-एक क्षण अच्छी तरह से याद है । वह तो बारह बरस की एक-एक घड़ी को भी नहीं भूली है । कैसे हुलस के सोचा करती थी वो कि जिस दिन कीरत घर लौट कर आएगा उस दिन वो देवी मैया के मंदिर में जा कर प्रसाद चढ़ाएगी। कीरत के मन का खाना पकाएगी और अपने हाथों से उसे खिलाएगी। कीरत से विछोह के पूरे बारह बरस वह बारह पलों में मिटा देगी। वे दिन एक बार फिर लौट आएंगे जो मूरत, सूरत और दोनों बेटियों के पैदा होने के समय से भी पहले थे।
    सुखबाई को पहला झटका उस दिन लगा था, जिस दिन कीरत पहली बार जेल से घर आया था । दद्दा के क्रिया-कर्म के लिए कीरत को पेरोल पर छोड़ गया था।
    ‘दद्दा, कहाँ चले गए तुम! हाय रे !’ कीरत का यह बिलखना सुन कर सुखबाई को याद आया था कि उसने भी इसी तरह विलापा था, मन ही मन सही कि ‘हाय दद्दा! तुम उस दिन यहाँ क्यों नहीं थे!’
    काश ! उस दिन दद्दा रिश्तेदारी में दूसरे गांव न गए होते तो शायद वो अनहोनी होने से बच गई रहती। सुखबाई तो दद्दा की अनुपस्थिति के बारे में कोई टिप्पणी नहीं कर पाई थी लेकिन खूब कोसा था दद्दा ने, सुखबाई को। सुखबाई की ननद ने तो सुखबाई को ‘डायन’ तक की उपाधि दे डाली थी, जो उसके भाई को खा गई थी। सबने अपने-अपने ढंग से अपने मन की भड़ास निकाली थी लेकिन उस समय किसी ने भी ये नहीं सोचा कि अब सुखबाई का जीवन कैसे कटेगा? एक तो चार बच्चों की जिम्मेदारी और उस पर भरी जवानी। यह जवानी ही तो उसकी दुश्मन बन गई थी।
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Shabdankan kahani story Sushri Sharad Singh  कहानी शब्दांकन   जिस दिन फुग्गन ने उसे पहली बार बिना घूंघट के देखा था, बस तभी से उसकी लार टपकने लगी थी। औरत को मर्द की नीयत पहचानते देर नहीं लगती है, यह बात और है कि किसी मजबूरी के चलते वह सब कुछ अनदेखा कर दे। सुखबाई ने भी पहले-पहल अनदेखा ही किया। कीरत ने उसे बताया था कि फुग्गन रसूख वाला व्यक्ति है और जब-तब कीरत की मदद कर दिया करता है, पैसों के मामले में भी और धाक जमाने के मामले में भी। सुखबाई नहीं चाहती थी कि उसकी वज़ह से कीरत और फुग्गन के बीच कोई खाई पड़े। सुखबाई की इस सोच को स्वीकृति समझ कर फुग्गन ने अपनी क्रियाशीलता बढ़ा दी। वह हर दूसरे-तीसरे दिन घर आने लगा । कभी एक गिलास पानी का बहाना तो कभी चाय का बहाना, तो कभी नन्हीं भारती को उसकी गोद से अपनी गोद में लेने का बहाना, बस, वह सुखबाई को छूने का कोई न कोई बहाना खोज निकालता। सुखबाई को बड़ी घबराहट होती। अवसर मिलते ही फुग्गन छिछोरे हंसी-माज़ाक करने से नहीं चूकता। कहने को रिश्ता देवर-भाभी का बना रखा था उसने। इस रिश्ते की आड़ में अपने सौ गुनाह तो उसने माफ़ करवा ही लिए थे। बस, एक सौ एकवें की देर थी।
    टालने का लाख प्रयास करने पर भी वह दिन आ ही गया जब फुग्गन एक सौ एकवां गुनाह कर ही बैठा और उसके सिर फोड़ने की नौबत आ खड़ी हुई। हुआ ये कि कीरत की अनुपस्थिति में फुग्गन घर आ टपका ।
    ‘सुनो जी, मुझे ये फुग्गन के रंग-ढंग कुछ ठीक नहीं लगते हैं।’ आखिरकार एक दिन सुखबाई ने कीरत से कह ही दिया। उसे लगा कि अगर वह कीरत से नहीं कहेगी तो फुग्गन का हौसला तो बढ़ेगा ही, कीरत भी किसी दिन उसे ही दोषी ठहराएगा। मर्द की ज़ात औरत में पहले दोष देखती है, मर्द में बाद में।
    ‘हूं, लगता तो मुझे भी है! सुनो, तुम उसके सामने न आया करो, चाय-पानी ले कर भी नहीं! मुझे आवाज़ दे दिया करो, मैं रसोई में आ कर ले लिया करुंगा!’ सोच-विचार कर कीरत ने रास्ता सुझाया ।
Shabdankan kahani story Sushri Sharad Singh  कहानी शब्दांकन     ‘उसका घर पे आना नहीं रोक सकते? मना कर दो न उसको !’ सुखबाई बोली ।
    ‘बुरा मान जाएगा वो। रसूखवालों का बैर और प्यार दोनों बराबर होते हैं, गले मिलो तो चाटेंगे, और झगड़ा करो तो बोटियाँ काटेंगे ! ऐसे ही चलने दो अभी तो, फिर देखते हैं कि आगे क्या होता है.... तुम सामने नहीं पड़ोगी तो चार दिन में ही किसी और दरवाज़े में झांकने लगेगा वो ।’
    कीरत की बात सुखबाई को समझ में आ गई, और यह भी कि फुग्गन से आसानी से पीछा छूटने वाला नहीं है।
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शनिवार, अप्रैल 06, 2013

लव एट फोर्टी प्लस



‘हंस’ पत्रिका के अप्रैल 2013 अंक में  मेरी  कहानी ‘लव एट फोर्टी प्लस’ प्रकाशित हुई है...


- डॉ. शरद सिंह



‘‘.........राजीव चला गया. सूनेपन ने मुझे घेर लिया. या यूं कहूं कि बुरी तरह जकड़ लिया. समझ में नहीं आता था कि क्या करूं? कैसे अपना मन बहलाऊं? राजीव के जाने से बहुत पहले....बल्कि शादी के बाद राजीव के साथ गृहस्थी संवारने के दौर में ही मैंने आईने में अपने शरीर को देखना-परखना छोड़ दिया था। इसकी आवश्यकता मुझे अनुभव ही नहीं हुई. मेरे पति को मेरी देह से कोई शिक़ायत नहीं थी फिर भला मैं उसे क्यों देखती. ...’’
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