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बुधवार, अप्रैल 18, 2012

भिखारी (लघुकथा)

-डॉ. शरद सिंह


वह भिखारिन थी। जवान और सुन्दर भिखारिन। 
वह एक कार के पहुँची और उसने कार के भीतर बैठे आदमी से गिड़गिड़ाते हुए कहा- "दो दिन से इस पापी पेट में अन्न का एक भी दाना नहीं पड़ा है....कुछ दे दो बाबूजी !...भगवान तुम्हारा भला करेगा, बाबूजी ! "
भिखारिन की बात सुन कर कार में बैठे हुए आदमी ने एक भरपूर नज़र भिखारिन के शरीर पर डाली और ललचाए हुए स्वर में बोला-" ...और बदले में तुम मुझे क्या दोगी ?"
यह सुनते ही भिखारिन ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा- "धत् तेरे की ! मैं भी किस भिखारी से भीख माँगने लगी ?"
......और उस आदमी ने झेंप कर अपनी कार आगे बढ़ा ली।