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शनिवार, मार्च 22, 2025

डॉ. (सुश्री) शरद सिंह के उपन्यास "कस्बाई सिमोन" की समीक्षा प्रोफेसर एस वी एस एस नारायण राजू द्वारा यूट्यूब पर

तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष प्रो. एस.वी.एस.एस. नारायण राजू जी ने मेरे उपन्यास "कस्बाई सिमोन" की बहुत सुंदर साहित्यिक सटीक एवं निष्पक्ष समीक्षा की है। आप भी इसे youtube पर सुनिए ....

🙏 Thank you so much Prof. S V S S Narayana Raju ji🔸
Really thanks a lot for your literary,  accurate and neutral review 🙏😊

🚩Professor and Head of the Hindi Department at Tamil Nadu Central University, Prof. S.V.S.S. Narayana Raju ji has given a very beautiful, literary, accurate and unbiased review of my novel "Kasbaai Simone"🔹
 
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गुरुवार, मार्च 10, 2022

कहानी | क्या तुम पर वसंत आएगा, इला ? | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह



प्रिय ब्लॉग साथियों, "साहित्य संस्कार" त्रैमासिक (जनवरी-मार्च 22 अंक) में संपादक सुरेंद्र सिंह पवॉर जी ने मेरी एक कहानी प्रकाशित की है जिसे यहां शेयर कर रही हूं।  
सुरेंद्र सिंह पवॉर जी का हार्दिक धन्यवाद🙏
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कहानी
क्या तुम पर वसंत आएगा, इला ?
 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
              कामदेव! क्यों सचमुच ऐसी ही गोलमटोल काया और छोटे-छोटे पंखों वाला होता है, कितना नुकीला है इसका बाण! इला ने हथेली पर रखे हुए डेढ़-दो इंच  के कामदेव की ओर देखते हुए सोचा । क्रिस्टल के इस पारदर्शी कामदेव के आरपार भी देखा जा सकता है। इला ने कामदेव के बारे में इससे पहले कभी इस प्रकार से नहीं सोचा था।
यह कामदेव कितना ही प्यारा और सुंदर क्यों न हो लेकिन उदय को यह कामदेव उपहार के रूप में इला को नहीं देना चाहिए था । आखिर किसी अविवाहिता को ऐसा उपहार नहीं दिया जाना चाहिए, वह भी किसी सहकर्मी द्वारा । वह इसे वापस कर देगी। इला ने सोचा। 
‘इला, मेरी कमीज़ कहां है ? ज़रा देखना तो !’ भाई की आवाज़ सुन कर इला हड़बड़ा गई। उसके मन के चोर ने उससे कहा, जल्दी छिपा इस कामदेव को, कहीं भैया ने देख लिया तो? ‘तुम्हारी भाभी जाने कब सीखेगी सामान को सही जगह पर रखना, उफ ! ’... और भैया सचमुच इला के कमरे के दरवाज़े तक आ गए । इला ने कामदेव को झट से अपने ब्लाउज़  में छिपा लिया । 
‘आप नहाने जाइए,मैं शर्ट निकाल देती हूं ।’ इला उठ खड़ी हुई । यद्यपि कामदेव का नुकीला बाण उसके वक्ष में चुभ रहा था ।
भैया का हो-हल्ला मचाना इला के लिए कोई नई बात नहीं है । बिला नागा प्रतिदिन सवेरे से यही चींख-पुकार मची रहती है । भाभी लड़कियों के स्कूल में पढ़ाती हैं । उनकी सुबह की शिफ्ट में ड्यूटी रहती है । वैसे सच तो ये है कि भाभी ने जानबूझ कर सुबह की शिफ्ट में अपनी ड्यूटी लगवा रखी है । इससे घर के कामों से बचत रहती है । भैया इतने लापरवाह हैं कि वे अपने सामान भी स्वयं नहीं सम्हाल पाते हैं । लिहाज़ा, घर सम्हालने से ले कर भैया के समान सम्हालने तक की जिम्मेदारी इला पर रहती है । इला को अपनी इस जिम्मेदारी पर कोई आपत्ति भी नहीं है । वह अब तक में जान चुकी है कि दुनिया में हर तरह के लोग रहते हैं । भैया और भाभी भी ऐसे ही दो अलग-अलग प्रकार के व्यक्तित्व हैं । 
‘या रब्बा ! तू कैसे सब मैनेज कर लेती है ? भैया-भाभी की गृहस्थी भी सम्हालती है और दफ़्तर भी समय पर पहुंच  जाती है ... कमाल करती है तू तो !’ सबरजीत कौर अकसर इला से कहा करती है । विशेष रूप से उस दिन जिस दिन सबरजीत कौर को दफ़्तर पहुंच ने में देर हो जाती है । सबरजीत कौर को अकसर देर हो जाया करती है । वह अपने पति, बच्चों और सास-ससुर के असहयोग का रोना रोती रहती है ।
‘काश ! तेरे जैसी ननद मुझे मिली होती तो मैं तो उसकी लाख बलाएं लेती ! ’ प्रवीणा शर्मा को इला की भाभी से ईर्ष्या होती और वह अपनी इस ईर्ष्या को सहज भाव से इला के आगे व्यक्त भी कर दिया करती।
‘तुझे क्या अपनी गृहस्थी नहीं बसानी है इला?’ लेकिन साथ में वे इला से यह भी पूछती रहतीं ।
‘क्या करूंगी अलग से गृहस्थी बसा कर? भैया-भाभी की गृहस्थी भी तो मेरी ही गृहस्थी है ।’ इला शांत भाव से उत्तर देती ।
‘हां ! अब इस उम्र में तो यही सोच  कर संतोष करना होगा ।’ इला से चिढ़ने वाली कांता सक्सेना मुंह बिचका कर कहती। कांता सक्सेना की टिप्पणी सुन कर बुरा नहीं लगता इला को। आखिर  शराबी  पति  की व्यथित पत्नी की टिप्पणी का क्या बुरा मानना? यूं भी इला के मन में कभी अपनी निजी गृहस्थी बसाने का विचार दृढ़तापूवर्क नहीं आया। जब वह किसी के विवाह समारोह में जाती तो उसे लगता कि अगर उसकी शादी होती तो वह भी इस दुल्हन की तरह सजाई जाती .... लेकिन विवाह समारोह से वापस घर आते तक उसे भैया-भाभी की गृहस्थी ही याद रह जाती।
भैया-भाभी की गृहस्थी की ज़िम्मेदारी किसी ने उस पर थोपी नहीं थी वरन् इला ने स्वत: ही ओढ़ ली थी। अब कोई जिम्मेदारी ओढ़ना ही चाहे तो दूसरा क्यों मना करेगा ? भाभी ने कभी मना नहीं किया । संभवत: उन्होंने कई बार मन ही मन प्रार्थना भी की हो कि इला के मन में शादी करने का विचार न आए । इला चली जाएगी तो उनकी बसी-बसाई गृहस्थी की चूलें हिल जाएंगी । वे तो इस घर में आते ही आदी हो गई थीं इला की मदद की । इला को भी लगता है कि उसकी भाभी उसकी मदद की बैसाखियों के बिना एक क़दम भी नहीं चल सकती हैं ।
भाभी तो भाभी-भैया को भी इला के सहारे की ज़बर्दस्त आदत पड़ी हुई है। भैया इला से चार साल बड़े हैं लेकिन इला ने छुटपन में जब से ‘घर-घर’ खेलना शुरू किया बस, तभी से भैया इला पर निर्भर होते चले गए । जब किसी व्यक्ति के नाज़-नखरे उठाने के लिए मां के साथ-साथ बहन भी तत्पर हो तो परनिर्भरता का दुगुर्ण भैया में आना ही था । कई बार ऐसा लगता गोया इला छोटी नहीं अपितु बड़ी बहन हो। भैया ने इला की शादी के बारे में कभी गंभीरता से विचार नहीं किया। पहले भैया पढ़ते रहे फिर नौकरी पाने की भाग-दौड़ में जुट गए। नौकरी मिलते ही भैया की शादी कर दी गई । इला के बारे में कोई सोच पाता इसके पहले मां का स्वगर्वास हो गया। मां के जाने के बाद भैया इला में ही मां की छवि देखने लगे और रिश्तेदारों ने इस विचार से इला की शादी की चर्चा खुल कर नहीं छेड़ी कि कहीं उन्हें ही सारी जिम्मेदारी वहन न करनी पड़ जाए। आखिर लड़की की शादी कोई हंसी-खेल नहीं होती है, दान-दहेज में भी हाथ बंटाना होता है !
अपनी इस स्थिति के लिए भला किसे दोष दे इला? इला को दोष देना आता ही नहीं है। वह खुश है अपनी परिस्थितियों के साथ।
जाने क्यों उदय को इला का अकेलापन नहीं भाता है। वह अपने साथ के द्वारा  इला के इस अकेलेपन को भर देना चाहता है। जब से उदय  स्थानान्तरित हो कर इला के दफ्तर में आया है, तभी से वह इला के व्यक्तित्व से प्रभावित हो गया । इला उदय के बारे में अधिक नहीं जानती है और न उसने कभी जानना चाहा किन्तु उदय ने थोड़े ही समय में इला के बारे में लगभग सब कुछ जान लिया । इला को इस बात का अहसास तब हुआ जब एक दिन उदय  ने इला के पास रखी कुर्सी पर बैठते हुए कहा - ‘इला जी, आपके बारे में अगर आपके भैया-भाभी ने नहीं सोचा तो आपको चाहिए कि आप स्वयं अपने बारे में सोचें।’
‘मैं समझी नहीं आपका आशय?’ इला सचमुच  नहीं समझ पाई थी कि उदय क्या करना चाहता है। उसे अनुमान नहीं था कि उदय उसके बारे में दिन-रात सोचता रहता है । 
‘मेरा मतलब यही है कि आपको घर बसाने के बारे में स्वयं विचार करना चाहिए। आप आत्मनिर्भर हैं और ऐसा कर सकती हैं।’ उदय  ने कहा था और मौन रह गई थी इला ।
अब कल शाम को दफ़्तर से निकलते समय  उदय  ने उसे छोटा-सा पैकेट पकड़ाते हुए कहा था, ‘यह आपके लिए! वसंत के आगमन पर! प्लीज़ मना मत करिएगा।’ 
घर आ कर इला ने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर के धड़कते दिल पर काबू पाते हुए उस पैकेट को खोल कर देखा। क्रिस्टल का बना हुआ एक नन्हा-सा कामदेव था पैकेट में । भौंचक रह गई थी इला । प्रथम दृष्टि में उसे उदय की ये हरकत बुरी लगी....बहुत बुरी। किन्तु रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे उसने उदय  के बारे में गंभीरता से सोचा तो उसे लगा कि उदय  को क्षमा किया जा सकता है। लेकिन क्या उसके संकेत को स्वीकार किया जा सकता है जो संकेत उसने क्रिस्टल  के कामदेव दे कर किया है ? वह तय  नहीं कर पाई । रात को नहीं, सवेरे भी नहीं।
इला ने घर के काम जल्दी-जल्दी निपटाए और तैयार हो कर दफ़्तर के लिए निकल पड़ी । दफ़्तर से एक चौराहे पहले ही उदय  मिल गया जो इला की प्रतीक्षा कर रहा था । 
‘इला रूको !’ उदय  ने इला को रूकने का संकेत करते हुए आवाज़ दी । इला ने अपनी मोपेड रोक दी । 
‘आप यहां क्या कर रहे है ?’ इला ने उदय  से पूछा । 
‘तुम्हारी प्रतीक्षा ! मैं जानना चाहता हूं कि तुम्हारा क्या जवाब है?’ उदय ने उतावले होते हुए पूछा।
‘जवाब?’ इला ने अनजान बनते हुए कहा ।
‘हां, क्या जवाब है तुम्हारा?’ उदय अधीर हो उठा ।
‘ज़वाब? मैं इतनी जल्दी जवाब नहीं दे सकती।’
‘मगर क्यों?’
‘मैंने कहा न, यह कठिन है मेरे लिए।’
‘इसमें कठिनाई क्या है? तुम बालिग हो, सेल्फडिपेंड हो। अपने जीवन का निर्णय तुम खुद कर सकती हो।’
‘मुझे पता है इला ने कहा मुझे पता है कि मेरे भैया या भाभी मेरे निर्णय का विरोध नहीं करेंगे लेकिन मैं जल्दबाज़ी में निर्णय नहीं ले सकती हूं।’
‘ज़ल्दबाजी इस पर गौर किया कभी कि तुम कितने वसंत अकेली गुज़ार चुकी हो।’
‘हां मुझे पता है और यही मेरी सबसे बड़ी दिक्कत है कि अब मैं एक पल में कोई निर्णय नहीं कर सकती हूं।’
‘मैं तो समझ नहीं पा रहा हूं कि तुम क्या कहना चाहती हो?’
‘तो समझने की कोशिश करो दरअसल, उम्र के जिस पड़ाव में हम हैं वहां किशोरों वाले उपहार मन गुदगुदा तो सकते हैं किन्तु ठोस निर्णय नहीं करने में मदद नहीं कर सकते हैं। इस उम्र में जीवन का हर निर्णय  ठोस निर्णय  होता है और वह किसी मेज पर आमने-सामने बैठ कर, गंभीरतापूवर्क चर्चा कर के ही लिया जा सकता है। समझ रहे हैं न आप!’ इला ने पूरी गंभीरता के साथ कहा।
उदय को इला से ऐसे उत्तर की आशा नहीं थी। वह अवाक् रह गया । उसने तो दो ही प्रतिक्रियाओं की आशा की थी कि या तो इला नाराज़ हो जाएगी और उसे बुरा-भला कहेगी या फिर हंस कर उसके  भुजबंध को स्वीकार कर लेगी।
दफ़्तर पहुंचते-पहुंचते इला को लगने लगा कि कहीं उसने उदय के साथ आवश्यकता से अधिक कठोरता तो नहीं बरत दी? यदि इला के पर वसंत नहीं आया तो इसमें उदय का क्या दोष? अपने-आप पर झुंझलाती हुई इला को लगा कि अगर वह इसी प्रकार सोच-विचार करती हुई अपनी कुर्सी पर बैठी रहेगी तो दूसरे लोग उससे तरह-तरह के सवाल करने लगेंगे। वह कुर्सी से उठ कर प्रसाधन-कक्ष की ओर चल पड़ी।
प्रसाधन-कक्ष में पहुंचते ही इला का दर्पण में खुद से आमना-सामना हो गया। उसे ऐसा लगा जैसे उसका प्रतिबिम्ब उससे पूछ रहा हो, ‘तुम पर वसंत क्यों नहीं आया, इला ज़रा सोचो ! वसंत तो किसी भी इंसान पर कभी भी आ जाता है फिर तुम पर क्यों नहीं ...?’ 
पसीना-पसीना हो उठी, इला। उसे अपना प्रतिबिम्ब अपरिचित लगने लगा ...संभवत: प्रतिबिम्ब पर वसंत पूरी तरह आ चुका था जबकि इला के मन में पतझर के सूखे पत्ते बुहार कर बाहर फेंके जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। क्या यह निर्णय इतना आसान था इला के लिए कि वह अपने पतझर हो चले मन के सूखे पत्तों को बुहार कर बाहर फेंक दे या फिर वसंत के प्रेमासिक्त वासंती रंग को ओढ़ ले? निर्णय करना इला के लिए बहुत कठिन था। वर्षों का एकाकी अनुभव उसे किसी बंधन में बंधने की अनुमति इतनी आसानी से तो नहीं देने वाला था लेकिन क्या आतुर उदय उसके उत्तर की प्रतीक्षा करेगा? या़, वह कहीं और निकल पड़ेगा वसंत की तलाश में। इला ने एक फिर दर्पण में स्वयं की छवि देखी और स्वयं से प्रश्न  किया, ‘तुम पर वसंत क्यों नही आया, इला?’
मानो उसका प्रतिबिम्ब बोल उठा कि ‘एक समझदारी भरे ठहराव ने तुम्हारा रास्ता जो रोक रखा है, इला। तुम अब दिल से नहीं दिमाग़ से सोचने की आदी जो हो चुकी है।’ ...और उसे अपने प्रतिबिम्ब से अपना उत्तर मिल गया। उसने चैन की सांस ली और वह प्रसाधन-कक्ष से बाहर निकल गई। एकदम सहज हो कर। अब उदय का धैर्य ही तय करेगा कि इला पर वसंत आएगा या नहीं।
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सोमवार, जनवरी 18, 2021

बैठकी | कहानी | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

 

Baithaki, Story of Dr. (Miss) Sharad Singh

कहानी

             बैठकी

              - डॅा. (सुश्री) शरद सिंह


उसका नाम था सुखिया। ठीक उसी तरह जैसे अंधे का नाम नैनसुख। इसीलिए सुखिया और दुख-कष्टों का मानो सहेलियों जैसा नाता रहा। सुखिया की जल्दी शादी कर दी गई और शादी के बाद पांच-छः सालों में सुखिया की गोद में एक के बाद एक पांच बच्चे आ गए। सेहत गिर गई, स्तनों में दूध उतरना बंद हो गया। बच्चे ज़्यादा और आमदनी अनिश्चित। अब, बच्चों की भूख मार-पीट से तो दबाई नहीं जा सकती। इसीलिए सुखिया ने अपनी पड़ोसन की मदद से बीड़ी बनाने का काम जुटा लिया। पांच बच्चों के बीच बैठ कर बीड़ी बनाना कोई हंसी-खेल तो था नहीं। एक को भूख लगती तो दूसरा टट्टी-पेशाब जाने के लिए निकर उतरवाने आ खड़ा होता। एक बेटी वहीं बाजू में बैठ कर जुंए मारने लगती और दूसरी उसकी की पीठ पर धौल जमा कर उसे झगड़े के लिए उकसाने लगती। सुखिया गोद वाली बेटी को झूलने में डाल कर पास ही बैठ जाती मगर जब झूलने वाली बेटी झूलने में पड़ी-पड़ी पेशाब कर देती तो सुखिया को बीड़ी-पत्ते और तंबाकू का सूपा तत्काल हटाना पड़ता। वरना पत्ते या तंबाकू खराब हो सकते थे।

 

इतनी सारी मुसीबतों से जूझती हुई सुखिया बीड़ी बना कर जब ठेकेदार के पास ले जाती तो वह उनमें दर्जनों नुख़्स निकाल कर पैसे काट लेता। झुंझलाई हुई सुखिया घर लौटती तो अपनी संतानों पर बरस पड़ती। आखिर उसकी खीझ और क्रोध कहीं तो निकलता ही। 

 

यूं तो सुखिया अपनी ज़िन्दगी से तंग आ गई थी लेकिन उसका हौसला अभी टूटा नहीं था। उसने सोचा कि ऐसे तो ज़िन्दगी कटने से रही, कुछ और करना ही होगा। अपनी उसी पड़ोसन से सलाह-मशविरा करने के बाद सुखिया को यह विचार पसन्द आया कि साप्ताहिक बाज़ार में जा कर सब्ज़ी बेेची जाए। सुखिया ने अपने पति से कहा कि वह सवेरे सायकिल से सब्ज़ी-मंडी जा कर सब्ज़ी ले आया करे लेकिन पति को इस काम में अपनी इज़्जत कम होती लगी। एक ठेकेदार के यहां चौकीदारी का काम करने वाले पति को यह मंज़ूर नहीं हुआ। अतः सुखिया ने स्वयं सब्जी-मंडी जाने का निर्णय लिया। 


साप्ताहिक-हाट की सुबह सुखिया सब्ज़ी-मंडी जा पहुंची। सब्ज़ियों से भरे हुए बोरे और उन्हें खरीदने के लिए चल रही मारा-मारी को देख कर सुखिया घबरा गई। फिर साहस करके वह भी कूद पड़ी भाव-ताव के मैदान में। पन्द्रह मिनट में उसने वे सब्ज़ियां खरीद लीं जिन्हें वह हाट में बेच सकती थी। अब समस्या थी सब्ज़ियों को घर ले जाने की। हाट तो दोपहर से लगती थी। चिन्ता में डूबी सुखिया सोच ही रही थी कि उसे किसी ने टोका।


वह राजू था, मुहल्ले का लड़का। राजू के पूछने पर सुखिया ने उसे बताया कि वह सब्ज़ी खरीदने आई थी। सब्जी तो उसने खरीद ली लेकिन अब उन्हें घर ले जाने की दिक्कत है। ऑटो-रिक्शा वाले ज़्यादा पैसे मांग रहे हैं और टेम्पो-स्टेंड दूर है ।


इस पर राजू मुस्कुरा कर बोला-‘बस, इतनी-सी बात? चलो, मैं ले चलता हूं तुम्हारी सब्ज़ियां। मोपेड है मेरे पास। चलो तुम भी पीछे बैठ जाओ।’ 


सुखिया सकुचा कर बोली- ‘नहीं-नहीं, तुम सब्जियां भर ले जाओ, मैं टेम्पो से आ जाऊंगी।’ 


तब राजू ने झिड़की भरे स्वर में कहा-‘टेम्पो में पैसे खर्च करोगी? इत्ते पैसे हो गए?’ 


इस पर सुखिया मना न कर सकी। वह डरती-सहमती राजू की मोपेड की पिछली सीट पर बैठ गई। वह जीवन में पहली बार किसी मोपेड पर सवार हुई थी। अच्छा लगा उसे। उसने सोचा कि सब्ज़ियां बेच-बेच कर जब चार पैसे हो जाएंगे उसके पास तो वह भी अपने पति के लिए मोपेड खरीदेगी। 


घर पहुंचते ही राजू ने मुसकुराते हुए सुखिया से एक कप चाय की मांग कर दी। राजू का यूं हंस कर चाय मांगना सुखिया को अच्छा तो नहीं लगा लेकिन यह सोच कर तसल्ली भी हुई कि वह पहली बार बाज़ार में सब्जी ले कर बैठने जा रही है, वहां कोई जान-परिचय वाला होना जरूरी है। 


दोपहर हुई। राजू आ धमका। राजू ने एक अनुभवी की तरह सलाह दी कि हाट तक उसकी मोपेड पर ही चली चले वरना उसे सब्जियां ले जाने में परेशानी होगी। सलाह मानने के अलावा और चारा ही क्या था। सुखिया राजू की मोपेड में बैठ कर हाट जा पहुंची। 


राजू ने बाज़ार में अपनी दुकान सजाते हुए कहा- ‘मेरे साथ ही बैठ जाओ, भौजी! नहीं तो अलग से बैठकी देनी पड़ेगी।’ 


‘बैठकी’ सुखिया के लिए यह शब्द नया था। फिर राजू ने उसे बताया कि हाट में सामान बेचने के लिए बैठने की जगह पाने के लिए जो फीस देनी पड़ती है उसी को ‘बैठकी’ कहते हैं।


‘कितने पैसे लगते हैं ?’ सुखिया ने चिन्तित हो कर पूछा।


‘आठ, दस, पन्द्रह... ये तो वसूली वाले तय करते हैं। खैर, तुम चिन्ता मत करो, तुम तो मेरे साथ बैठो। मैं कह दूंगा कि तुम मेरे घर की हो.... घरवाली जैसी !’ राजू बेशर्मी से हंस कर बोला।


‘क्या?’ सुखिया चौंक कर बोली।


‘मैं तो मज़ाक कर रहा था। वैसे, मेरे घर की हो तुम, ये तो कहना ही पड़ेगा।’ राजू पूर्ववत् हंस कर बोला। 


मन मसोस कर रह गई सुखिया। ज़रूरत भी क्या-क्या दिन दिखा देती है। थोड़ी देर में बैठकी वसूलने वाले आए। राजू ने उसे अपने घर की बता कर उसकी बैठकी के पैसे बचवा दिए। इसके बाद तीन-चार घंटे हाट की गहमागहमी में डूबे रहे दोनों।


शाम ढले सुखिया को हाट से वापस घर पहुंचाते समय सुखिया ने दस रुपए का नोट राजू को थमाते हुए कहा- ‘ये रख लो, बैठकी के पैसे।’


‘ग़ज़ब करती हो भौजी, तुमसे रुपए लूंगा बैठकी के?’ कहते हुए राजू ने दस का नोट वापस सुखिया की मुट्ठी में दबा दिया। इस प्रक्रिया में उसने अपने दोनों हाथों से सुखिया की मुट्ठी पकड़ी और अपने सीने से लगा लिया। सुखिया कंाप कर रह गई। संकेत स्पष्ट था। अनपढ़ ही सही लेकिन सुखिया थी तो औरत ही। राजू के जाने के बाद भी सुखिया के शरीर से कंपकपी गई नहीं। वह हताशा से भर कर ज़मीन पर बैठ गई।

  

वह सोचने लगी। बैठकी तो देनी ही होगी उसे, अब बाज़ार-वसूली वालों की बैठकी दे या राजू की ‘बैठकी’? राजू को ‘बैठकी’ नहीं देगी तो वह उसकी मदद नहीं करेगा लेकिन राजू की ‘बैठकी’ की वसूली का कोई अंत होगा क्या? वसूली वालों की बैठकी तो दस-पन्द्रह रुपयों पर जा कर ठहर ही जाएगी मगर राजू? वह परिवार का सुख बनाने के लिए घर से निकली है या सुख मिटाने के लिए? 


सुखिया सोच-विचार कर ही रही थी कि उसकी चौथी बेटी आ कर उसके कंधों से चिपट गई। बेटी का स्पर्श पाते ही सुखिया को ख़याल आया कि यदि वह राजू का प्रस्ताव मानती है तो उसकी इन बेटियों का भविष्य क्या होगा? क्या माहौल मिलेगा इन्हें? राजू जैसे लोगों इनके आसपास मंडराएंगे....।


‘नहीं ! नहीं चाहिए मुझे राजू का सहयोग।’ बेटी के लाड़ भरे स्पर्श ने ही सुखिया को निर्णय पर पहुंचा ही दिया। उसने तय कर लिया कि अगले हाट में वह वसूली वालों को ही बैठकी देगी। भले ही उसे मंडी से सिर पर सब्जी ढोनी पड़े, भले ही उसे हाट तक सब्जी ढोनी पड़े, भले ही उसे हाट में बैठने को अच्छी जगह न मिले। बस, एक पल का निर्णय पूरी ज़िन्दगी को स्वर्ग या नर्क बना सकता है और वह निर्णय सुखिया ने ले लिया था। निर्णय लेते ही सुखिया का दिल हल्का हो गया और वह अपनी बेटी को गोद में बिठा कर दुलारने लगी।

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शुक्रवार, जनवरी 08, 2021

पुराने कपड़े | कहानी | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

Purane Kapade, Story of  Dr. (Miss) Sharad Singh
कहानी

पुराने कपड़े

 -   डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

 सागर से कानपुर जाते समय रास्ते में एक ढाबे पर गाड़ी रोकी गई। गाड़ी हम सबने मिल कर किराए पर ली हुई थी अतः हम अपनी मर्ज़ी के मालिक थे। जहाँ चाहे वहाँ रुक कर दानापानी का जुगाड़ कर सकते थे। सागर में झाँसी के बीच हम रुके थे। झाँसी में भी हम रुके थे। इसके बाद इरादा तो यही था कि अब अपनी मंज़िल अर्थात कानपुर पहुँच कर ही गाड़ी से उतरेंगे। किंतु हम अपने निश्चय पर अडिग न रह सके। किसी को लघुशंका की आवश्यकता महसूस होने लगी तो किसी को प्यास लगने लगी और स्वयं मेरा शरीर बैठेबैठे जाम होने लगा था।

हमारी गाड़ी का ड्राइवर भी मस्तमौला जीव था। वह हर बात के लिए तैयार रहता था। चलते रहना हो तो उसे कोई आपत्ति नहीं थी और यदि ठहरना हो तो उसे कोई परेशानी नहीं थी। खानेपीने के मामले में भी वह सहमति से भरा हुआ था। कोई नानुकुर नहीं। कुल मिला कर यात्रा मज़े में चल रही थी कि हम एक ढाबे में जा उतरे।

जाती हुई ठंड की कुहरे भरी सुबह, वैसे सुबह क्या थी, यही कोई दस बज रहे थे। उस हल्के कुहरे में गाड़ियों की आवाजाही से उड़ने वाली धूल की पर्त एक अजीब धुँधलका रच रही थी। इस धुँधलके में सूरज की किरणें भी कमज़ोर और शीतखाई हुई प्रतीत हो रही थीं।

भाई साहब गाड़ी से उतरते ही लघुशंका के लिए एक ओर चले गए। भाभी अपनी शॉल सम्हालती हुई मोल्डेड कुर्सी पर जा बैठीं। ड्राइवर ढाबे के तंदूरीचूल्हे के मुहाने पर जा खड़ा हुआ। वह चूल्हे की आँच में अपने हाथ सेंकने लगा। उसे हाथ सेंकता देख कर मेरी भी तीव्र इच्छा हुई कि मैं भी उसकी तरह चूल्हे के मुहाने पर जा खड़ी होऊँ लेकिन मैं जानती थी कि यह भाई साहब को कतई पसंद नहीं आएगा और मैं ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती थी जिससे इस सफ़र में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो। मैं भी सिहरती, ठिठुरती ऊँगलियों को आपस में रगड़ कर ग़रम करने का असफल प्रयास करती हुई भाभी की बगल वाली कुर्सी पर जा बैठी। कुर्सी भी अच्छीखासी ठंडी थी।

'कुर्सी बहुत ठंडी है।' कुर्सी पर बैठते ही मेरे ठहात मुँह से निकला।
'बैठ जाओ, बैठने से गरमा जाएगी।' भाभी बोली।

'कुर्सी तो गरमा जाएगी लेकिन मैं ठंडी हो जाऊँगी।' मैंने फीकी हँसी हँसते हुए कहा। भाभी ने भी मेरी हँसी में साथ देना चाहा लेकिन भाई साहब को अपनी ओर आते देख कर चुप रह गई। भाई साहब भी चूल्हे की ओर बढ़ लिए। तब तक ढाबे पर काम करने वाले लड़के ने चाय के गिलास हमारे सामने वाली मेज पर रख दी। यद्यपि उस समय तक हम दोनों से किसी ने नहीं पूछा था कि हमें चाय पीनी है या नहीं? शायद बड़प्पन के रंग में रंगे हुए पुरुष अपनी इच्छा को दूसरे की इच्छा साबित करके अपना अधिकार जताना पसंद करते हैं। भाई साहब ने खुद ही मान लिया कि ठंड के कारण हमें चाय पीने की इच्छा हो रही होगी। कुछ भी मान लेना कितना आसान होता, बजाए सच जानने के।

चाय का गिलास अभी मैंने अपने होठों से लगाया ही था कि वातावरण 'काँयकाँय' की हृदयभेदी ध्वनि से भर गया। मैंने चौंक कर उस ओर देखा जिधर से वह आवाज आई थी। एक छोटा, नन्हासा पिल्ला चूल्हे के बुझे हुए मुहाने से 'काँयकाँय' करता हुआ निकल रहा था। उस पिल्ले ने मुहाने से बाहर निकलने का प्रयास किया और फिर लड़खड़ाता हुआ वापस मुहाने में घुस गया। मुहाने के भीतर से भी उसकी दर्दनाक आवाज पंचम सुर में सुनाई दे रही थी। एकबारगी ऐसा लगता था मानो चूल्हा ही रो रहा हो। पल दो पल बाद वह पिल्ला पुनः बाहर आ गया। इतने में लगभग उसी का हमउम्र पिल्ला भी किसी मेज के नीचे से निकल कर उसके पास जा पहुँचा। अब वे दोनों पिल्ले हमारे कौतूहल का केंद्र बन गए। रोने वाला पिल्ला दूसरे पिल्ले से सट जाना चाहता था जिससे हम समझ गए कि वह ठंड लगने के कारण रो रहा है। लेकिन दूसरा पिल्ला शरारती किस्म का था। वह उस रोने वाले पिल्ले की टाँगपूँछ खींचने लगा तथा उसे और सताने लगा। घबरा कर वह रोने वाला पिल्ला वापस चूल्हे के मुहाने में घुस गया। दूसरे पिल्ले ने चूल्हे के भीतर घुस कर उसे बाहर निकालने का प्रयास किया लेकिन वह सफल न हो सका। वह रोने वाला पिल्ला न तो मुहाने से बाहर आया और न उसने रोना बंद किया।

अब मुझे उसके रुदनस्वर से झुँझलाहट होने लगी थी। हम वहाँ कुछ देर और ठहरने वाले थे। कारण कि भाई साहब ने ढाबे वाले को आलू के पराठे बनाने का आदेश दे दिया था। हमसे इस बार भी पूछा नहीं था। मुझे खीझ होने लगी थी उनके इस बड़प्पन के थोथे प्रदर्शन से। अचानक मुझे लगा कि जब चूल्हे के एक मुहाने पर लकड़ियाँ धधक रही हैं तो उसकी आँच और गरमाहट दूसरे मुहाने पर भी पहुँच रही होगी फिर वह पिल्ला रोए क्यों जा रहा है? वहाँ तो उसे ठंड नहीं लगनी चाहिए। बहरहाल, उस पिल्ले के रोने का कारण जानना संभव नहीं था। वह चूल्हे की गुनगुनी राख में दब कर भी रो रहा था। उसकी उस दशा को देख कर मेरे मन में अचानक एक प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि क्या दादी की गोरसी (अंगारे रखने का मिट्टी का बरतन) की राख में दबे हुए अंगारे भी क्या कभीकभार इसी तरह रोते होंगे? माना कि अंगारे निर्जीव होते हैं लेकिन उनमें बसी हुई आग उनके जीवित होने का भ्रम उत्पन्न करती रहती है। ठीक दादी की तरह।

हम दादी को ही लेने तो जा रहे थे। दो दिन पहले ही छोटे भइया ने चिट्ठी लिख कर जता दिया था कि वे अब दादी को अपने पास रखना नहीं चाहते हैं। ऐसे में एक मात्र विकल्प यही था कि दादी भाई साहब के पास आ कर रहने लगें। भाई साहब ये चाहते तो नहीं थे लेकिन दादी को लाना उनकी विवशता बन गई थी। क्या दादी भी छोटे भइया के घर से विस्थापित होने के दुख में इस पिल्ले की भाँति रोती होंगी? नहीं दादी इंसान हैं और इंसान अपने अधिकतर दुख चुपचाप पीता रहता है, वह खुल कर रो भी नहीं पाता है। मेरी आँखों के आगे दादी का झुर्रियों भरा चेहरा तैर गया।

छोटे भइया के घर पहुँच कर मेरी क्या भूमिका रहनी है, इसका मुझे पता नहीं था? बस, भाई साहब ने कहा कि सुमन तुम्हें भी चलना है कानपुर और मैं उनके साथ हो ली। वैसे मुझे लग रहा था कि मुझे अपने साथ ले कर चलने के पीछे भाई साहब का उद्देश्य सिर्फ इतना था कि मेरी उपस्थिति में छोटे भइया या उनकी बीवी अधिक बहसबाज़ी नहीं करेंगे। कारण कि मैं उनकी सगी बहन नहीं हूँ, दूर के रिश्ते की बहन हूँ। रिश्तों के समीकरण भी कितने विचित्र होते हैं। स्वार्थ के लिए दूर के रिश्ते निकट में बदल जाते हैं और निकट के रिश्ते दूर होते चले जाते हैं। दादी इन दोनों भाइयों की सगी दादी है लेकिन दोनों बोझ मानते हैं उन्हें और एक अनचाही, पुराने कपड़ों की गठरी की तरह अपनी पीठ से उतार कर दूसरे की पीठ पर लादने की फिराक में रहते हैं। क्या दादी ने अपनी जवानी में अपने बुढ़ापे के बारे में कभी ऐसा सोचा होगा? नहीं, कोई नहीं सोचता है। सोच भी कैसे सकता है कि उनके अपने रक्त-संबंधी एक दिन उन्हें पुराने कपड़ों की गठरी समझने लगेंगे।

पुराने कपड़ों से छुटकारा पाना कितना सुखद होता है अगर उनके बदले स्टील का कोई सस्तासा बर्तन, प्लास्टिक का सामान या ऐसा ही कोई फालतू सामान मिल जाए। जाने कितने लोग अपने कान खड़े किए रहते हैं बर्तन या सामान के बदले रद्दी कपड़े लेने वालों की आवाज की प्रतीक्षा में।

अब तो वृद्धाश्रम का भी अच्छाखासा चलन बढ़ गया है, एक दिन भाई साहब किसी से चर्चा कर रहे थे। शायद भाई साहब के मन के किसी कोने में यह बात उमड़तीघुमड़ती होगी कि दादी जैसी रद्दी कपड़ों की गठरी को वृद्धाश्रम में सौंप कर जीवन का दायित्वहीन पल हासिल किया जा सकता है। मगर, भाई साहब का दुर्भाग्य कि सागर अभी इतना प्रगतिवान शहर नहीं बना है जहाँ वे दादी को वृद्धाश्रम के हवाले कर के चैन से रह सकें। मोहल्ले, पड़ोस, परिचित सब के सब टोकेंगे। अच्छीखासी भद्द उड़ेगी। अतः दादी को अपने साथ ही रखना होगा, हर हाल में। यह विवशता उनके हर हावभाव में परिलक्षित हो रही थी। शायद यही कारण था कि वे बातबात में चिड़चिड़ा रहे थे। बारबार असहज हो उठते थे। ऐसा माना जाता है कि घर की बहुएँ अपने घर में वृद्धाओं को पसंद नहीं करती हैं। वे उन्हें स्वतंत्रता में बाधा मानती हैं। क्या भाभी भी ऐसा मानती हैं?

  'भाभी, अब तो दादी आपके साथ ही रहेंगी। आपको परेशानी होगी न?' मैंने भाभी से पूछ ही लिया।

'उनके रहने से परेशानी कैसी, सुमन? घर में कोई बड़ाबूढ़ा रहे तो अच्छा ही लगता है।' भाभी ने उत्तर दिया।

'लेकिन छोटी भाभी तो ऐसा नहीं मानती हैं, तभी तो वे दादी को अपने साथ नहीं रखना चाह रही है।' मैंने कहा।

'छोटी को जो मानना हो माने, मैं तो ऐसा नहीं मानती हूँ।' भाभी बोलीं।

'और भाई साहब?' मैंने पूछा।

'उनकी वे जानें। वे चाहे दुत्कारें चाहे प्यार करें, उनका सब चलेगा। जो मैं कुछ कहूँगी तो चार बातें होने लगेंगी।' भाभी ने उसाँस भरते हुए कहा।
'ओह, तो ये बात है, भाभी के मन में दादी के लिए प्यार नहीं बल्कि चार बातों का डर है जो भाभी को मौन रखे हुए है। वैसे उनकी बात अपनी जगह ठीक भी है, जब दादी के सगे पोते को उनकी ललक नहीं है तो पराए घर से आई पोतोहू कहाँ से जगाएगी ललक।'

अपने मन में उमड़तेघुमड़ते विचारों से जूझते हुए मैंने कब पराठा खा लिया, मुझे पता ही नहीं चला। पराठे के स्वाद का अहसास भी नहीं हुआ। बस, इसी तरह आगे का रास्ता भी तय हो गया। ढाबे से कानपुर तक के रास्ते के बीच जिस चीज ने मेरा ध्यान आकर्षित किया वह था, सड़क के दोनों किनारों में लगे पेड़ और पेड़ों के साथ नहरनुमा जमीन में सहेजा गया पानी।

'ये पेड़ तो हमेशा पानी में डूबे रहते हैं, इससे इनकी जड़ों को नुकसान नहीं पहुँचता?' मैंने भाई साहब से पूछा।

'नहीं, इस पानी के कारण ही तो इन पेड़ों में आम की अच्छी फसल आती है।' उत्तर ड्राइवर ने दिया।

ड्राइवर का उत्तर सुन कर मेरा ध्यान गया कि वे पेड़ आम के थे। पेड़ों के परे सड़क के दोनों ओर हरियाले खेत बिछे हुए थे। सारा दृश्य अत्यंत सुरम्य था। मगर हम तीनों के मन का उद्वेलन उस दृश्य को आत्मसात करने में आड़े आ रहा था।

शाम से कुछ पहले हमने कानपुर के औद्योगिक क्षेत्र में प्रवेश किया। कारखानों के घनीभूत प्रदूषण ने हमारा ऐसा स्वागत किया कि मुझे उबकाई आने लगी और भाभी को खाँसी के ठसके लगने लगे। मैंने गाड़ी से बाहर झाँक कर देखा। सड़क पर गुजरते लोगों या दूकान पर सामान ख़रीदतेबेचते लोगों के लिए सबकुछ सामान्य था। पापी पेट कितनी आसानी से समझौता करवा देता है हर परिस्थिति से, यह मुझे दिखाई दे रहा था। आम आदमी में पर्यावरण के प्रति चेतना की बात करना तो अपने देश में महज नारेबाजी जैसा लगता है। हमारी संवेदनाएँ हमारे स्वार्थ के इर्दगिर्द रहती है। हम अपने घर का कूड़ाकचरा दूसरे के घर के दरवाज़े पर फेंक कर अपनी सफ़ाई की आदत पर नाज कर लेते हैं। फिर कूड़ा फेंकतेफेंकते इंसानों को भी फेंकने लगते हैं, इस चौखट से उस चौखट। छोटे भइया यही तो करने जा रहे हैं। पहले भाई साहब एक बार यह कर चुके हैं।

छोटे भइया के घर पहुँचते ही दादी ने मुझे अपने गले से लगा लिया। मेरा मन भर आया। उनकी कमज़ोर कलाइयों में स्नेह की अपरिमित ऊर्जा प्रवाहित हो रही थी। इस ऊर्जा को कैसे महसूस नहीं कर पाते हैं ये लोग? मुझे आश्चर्य हुआ। दादी ने भाई साहब और भाभी को भी अपने गले से लगाया। 'जुगजुग जीयो' का आशीर्वाद दिया। शायद, यह मेरा भ्रम था कि मुझे उनका यह अंदाज फ़कीराना लगा जो दे उसका भला, जो न दे उसका भी भला, फ़कीरों और बुजुर्गों में शायद कोई अंतर नहीं रह जाता है। अंतर होता भी है, होगा तो सिर्फ इतना कि फ़कीर अपनी चिंता छोड़ कर इस फ़ानी दुनिया के लिए दुआ करते हैं और बुजुर्ग अपनी चिंता छोड़ कर अपने वंशजों के लिए दुआ करते हैं। दुआएँ सिर्फ दुसरों के लिए, अपने लिए एक भी नहीं।

रात्रि भोजन के बाद बैठक जमीं।

'दादी के सारे कपड़े मैंने इस सूटकेस में रख दिए हैं और उनकी थाली, लोटा वगैरह इस डलिया में है।' छोटी भाभी ने चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा।
'थाली, लोटा क्या करना है? क्या दादी को खिलाने के लिए मेरे में घर में बरतन नहीं है?' भाई साहब ने भृकुटी तानते हुए व्यंग्य से कहा।

'आप के पास तो सब कुछ है भाई साहब, बस, इसीलिए तो दादी को आपके साथ भेज रहे हैं।' अबकी बार छोटे भइया ने मुँह खोला।
'हाँहाँ, क्यों नहीं, मेरे घर तो रुपयों का पेड़ लगा हुआ है।' भाई साहब अपनी तल्खी छुपा नहीं पा रहे थे।

'मेरे लिए रुपये क्या करने हैं बेटा, मुझे तो बस, एक जून एक रोटी दे दिया करना तो भी मेरा काम चल जाएगा। अब बचे ही कितने दिन हैं,' दादी ने हस्तक्षेप करते हुए कहा। उनकी आवाज में कुछ ऐसा भाव था, मानो उन्हें अपने जीवित रहने पर लज्जा आ रही हो। दादी की निरीह स्थिति ने मुझे बौखलाहट से भर दिया।

'दादी को मैं अपने साथ रख लूँ तो?' मैं बोल पड़ी।
दोनों भाई चौंके। भाभियाँ भी। दूसरे ही पल उनके चेहरों पर आपत्ति के भाव तिर गए।

'कुछ दिनों के लिए।' मैंने तत्काल इतना और जोड़ दिया।
'देखेंगे।' भाई साहब बोले।

'दादी मेरे साथ कभी नहीं रही हैं, उन्हें अच्छा लगेगा, और मुझे भी।' मैंने एक तर्क और सामने रख दिया।

'ठीक है, अगर तुम यही चाहती हो तो...' भाई साहब ने अनमने स्वर में कहा लेकिन उनके उसी स्वर में कहीं बोझ हटने की खुशी का भाव भी झलक रहा था। अब, इस समय उन्हें अपने पुरुषत्वपूर्ण बड़प्पन की भी कोई चिंता नहीं थी।

'सोच लो सुमन, दादी को रखना आसान नहीं है। मैं ही जानती हूँ कि कैसे मैंने सम्हाला है इन्हें।' छोटी भाभी को मेरा प्रस्ताव पसंद नहीं आया था। आता भी कैसे? वे तो अपनी पीठ का बोझ उतार कर भाई साहब और भाभी की पीठ पर लाद कर खुश होना चाहती थीं। मेरे प्रस्ताव ने उनकी उस संभावित खुशी को छीन लिया था। लेकिन मुझे न तो उनके दुखसुख की चिंता थी और न भाई साहब की। मुझे चिंता थी तो सिर्फ दादी के अस्तित्व की। मैं उन्हें पुराने, रद्दी कपड़ों की गठरी की तरह उपेक्षित नहीं रहने देना चाह रही थी, चाहे मुझे कोई भी कठिनाई क्यों न झेलनी पड़े।

दादी को लेकर हम लोग सागर लौट आए। जैसी कि मुझे आशा थी, भाई साहब ने गाड़ी की दिशा पहले मेरे घर की ओर मोड़ दी। उन्होंने मुझे और दादी को सामान सहित उतारा और फिर चैन की साँस लेते हुए अपने घर चले गए। सहमीसिकुड़ी दादी मेरे घर की बैठक में रखे सोफे के एक कोने में बैठ गईं।

'बोलो दादी, क्या खाओगी?' मैंने दादी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा। मेरे पूछते ही मैंने महसूस किया कि दादी का हाथ काँपा और फिर उन्होंने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया। कई दिनों, महीनों और शायद वर्षों की घुटन उनकी मुरझाई पलकों के नीचे से बह निकली।

'अब आप कहीं नहीं जाओगी, दादी, हमेशा यहीं रहोगी, मेरे पास।' मैंने अपने मन का रहस्य खोलते हुए कह डाला। दादी ने एक बार फिर मुझे अपने सीने से लगा लिया। वह पुराने कपड़ों की गठरी मानो सलमेसितारे टंके नयेताज़ा कपड़ों में बदल गई। मुझे अपना घर अच्छाअच्छा सा 

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शनिवार, सितंबर 01, 2018

थर्ड ज़ेंडर विमर्श और प्रमुख हिन्दियेत्तर कृतियां - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh, Author
थर्ड ज़ेंडर विमर्श और प्रमुख हिन्दियेत्तर कृतियां

- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

  अमेरिकी कवि शरेन रफेल ने सन् 2017 में एक कविता लिखी थी जिसमें उन्होंने अपनी उस व्याकुलता को व्यक्त किया था जिसमें वे एक थर्ड ज़ेडर मनुष्य होने के परिप्रेक्ष्य में अपना व्यक्तित्व पहचानना और जानना चाहते हैं। वे अपनी कविता के माध्यम से समाज से प्रश्न करते हैं कि मैं कौन हूं मुझे बताओ, मैं तुम्हें सुन रहा हूं पूरे ध्यान से। पूरी कविता का अनुवाद इस प्रकार है-
मैं सुनूंगा
मैं वास्तव में तुम्हें सुनूंगा;
लेकिन इसके जवाब में मेरी मदद करो
- (मुझे बताओ) क्या मैं इंसान हूं?
क्या मुझे बहुत जटिल होना चाहिए?
लेकिन हम एक ही भाषा साझा करते हैं
और एक ही दुनिया,
तो मैं भी (समाज की) पैचवर्क-रजाई का हिस्सा क्यों नहीं हूं?

मैं अलग-थलग हूं, कभी-कभी, हमेशा;
मैं एक कलाकार बन सकता हूं, आपको पता है
या शायद एक महान चिकित्सक
या शायद एक आत्मापूर्ण गायक।
लेकिन मैं एक हिस्सा नहीं होने से थक गया हूं -
एकजुट दुनिया का एक हिस्सा।

क्या हम एक ही सूर्य का उगना नहीं देखते हैं?
सूरज मेरे लिए क्यों नहीं उगता है?
मैं एक कदम पीछे हट कर सोचता हूं
मैं इंसान कैसे नहीं हो सकता?

हम उसी हवा को सांस लेने के लिए साझा करते हैं,
लेकिन यह मुझे मारती है,
हां, यह हवा मुझे मार देती है।
जब मैं चकित हूं,
अपनी तुच्छता से,
इतनी बदतरता के साथ,
एक घृणित दृष्टि जो मुझे जीने नहीं देती है।

जब मुझे लगातार याद दिलाया जाता है
तो मेरी दुनिया अलग हो जाती है
मुझे दो की दुनिया में रहने के लिए नहीं बनाया जाना चाहिए क्योंकि मैं तीसरा हूं।

मुझे एक टैग के बंधन और गंदगी के खिताब से मुक्त होने दो
मुझे इस दुनिया का हिस्सा बनने दो जो दो में बंटी है
जब मैं खुद को देखूं तो मुझे शर्मिंदा मत होने दो,
मुझे भी बनने दो दुनिया के लिंग का हिस्सा।
मुझे इस दुनिया में मुक्त होने दो।
 
जहां से स्त्री और पुरुष की लैंगिक पहचान समाप्त होती है वहीं से आरम्भ होती है तीसरे लिंग की पहचान जिसे आम बोलचाल में ‘थर्ड जेंडर’ कहा जाता रहा है। यही ‘थर्ड जेंडर’ द्विशब्द आज उस मानव समुदाय की पहचान बन गया है जो न स्त्रा है, न पुरुष। फिर भी इसमें निहित हैं दोनों लिंगों के गुण। वह पौरुषेय भी है और स्त्रैण भी। दोनों का थोड़ा-थोड़ा अंश, एक अलग जैविक वैशिष्ट्य। किन्तु कठिनाई उनके जैविक विशेषताओं की नहीं है, कठिनाई है सामाजिक संरचना की। जो मनुष्य ने रची और ‘शक्तिशाली उत्तरजीविता को प्राप्त करता है’ वाले सिद्धांत पर चलते हुए समाज में तीनों में से एक लिंग की प्रधानता निर्धारित कर ली। समाज बना पुरुष प्रधान। लैंगिक पूर्णता होते हुए भी समाज में स्त्रा को मिला दोयम दर्ज़ा। ऐसे में तृतीय लिंगी भला कहां स्थान पाते? उनकी पहचान मानो एक ‘सोशल टैबू’ बनती गई।
सन् 2011 में कवि मोसेस समांदार ने ‘द थर्ड जेंडर’ शीर्षक कविता में इस बात का उलाहना दिया था कि जिसने स्त्रा और पुरुष को बनाया उसी ने तृतीय लिंगियों को भी बनाया, तो फिर यह भेद-भाव और विचित्र-प्राणी समझा जाना क्यों? मोसेस ने जो कविता लिखी वह इस प्रकार है -
मैं एक विचित्र आग्रह करता हूं
चरित्र से परे जीवन
जैसे सल्फरिक एसिड के डिब्बे
एक शांत तीसरा लिंग बाहर निकलता है
उसे कहा जाता है चेक्स (chex)
महिला, पुरुष और चेक्स
चेक्स विचित्रा है
अनंत क्षमता का एक प्राणी या (व्यक्ति)
पुरुष नहीं
स्त्रा नहीं
बस, होना चाहिए सही
देवता की तरह नहीं
लेकिन तीसरा लिंग
भ्रम या दोनों का मिश्रण नहीं है
लेकिन उत्तम लिंग?
यह तीसरा लिंग कौन बनाता है?
मानव तो नहीं।
 

भारत के पौराणिक युग में जो तृतीय लिंगी नृत्य, गान और संगीत के कौशल से परिपूर्ण हो कर देवताओं के सेवकों के रूप में देखे जाते थे, जिनका उल्लेख संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। मध्यएशियाई आक्रमणकारियों के आगमन के साथ ही उन्हें काम सौंपा गया स्त्रियों के उस समूह की पहरेदारी का जो हरम या रनिवास में रखी जाती थीं। वे जिस एक पुरुष की विवाहिता होती थीं वह सर्वशक्तिमान शासक होते हुए भी इस भय से ग्रस्त रहता था कि उसके हरम में रहने वाली स्त्रियां किसी अन्य पुरुष से लैंगिक संबंध न स्थापित कर लें। भय इतना अधिक कि कहीं वे पहरेदारों के आकर्षण में न आ जाएं। इस संदर्भ में सबसे निरापद थे तृतीय लिंगी। वे हरम या रनिवास में रहने वाली स्त्रियों की यौनिक सीमा के पहरेदार बना दिए गए क्योंकि उनसे उन स्त्रियों के मालिक को किसी भी प्रकार का भय नहीं था।
पुराण-काल के बाद महाभारत काल में भी तृतीय लिंगियों का जीवन  शास्त्रीय नृत्य-गान से जुड़ा रहा, साथ ही युद्ध में भी निर्णायक भूमिका में उन्हें देखा जा सकता है। ‘महाभारत’ की दो कथाओं में इनका विवरण मिलता है। एक कथा है पांडुपुत्र अर्जुन के बृहन्नला बनने की और दूसरी कथा शिखण्डी की है। कथा के अनुसार अर्जुन को सशरीर स्वर्ग में भ्रमण करने का अधिकार था। समस्त विद्याओं में पारंगत होने के बाद अर्जुन को इन्द्र ने अपने दरबार में आमंत्रित किया। उसके स्वागत में उर्वशी का नृत्य रखा गया।
Apsara Urvashi
अप्सरा उर्वशी का नृत्य देख कर अर्जुन मुक्तकंठ से प्रशंसा करने लगा। उर्वशी को अर्जुन का इस प्रकार प्रशंसा करना अच्छा लगा और वह अर्जुन पर मुग्ध हो गई। उर्वशी ने एकांत में मिल कर अर्जुन के समक्ष अभिसार का प्रस्ताव रखा। इस पर अर्जुन ने उर्वशी का प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा कि आप मेरी माता तुल्य हैं क्यों कि आप मेरे पूर्वज पुरुरवा की अर्द्धांगिनी रही हैं और भरतकुल की जननी हैं। मैं आपके साथ अभिसार की बात सोच भी नहीं सकता हूं। अर्जुन की बात सुन कर उर्वशी को अपमान का अनुभव हुआ और उसने अर्जुन को धिक्कारते हुए कहा कि तुम मुझे अभी माता तुल्य कह रहे हो और थोड़ी देर पहले मेरा कामुक नृत्य देख कर मेरी प्रशंसा कर रहे, क्या तुम अपनी माता कुंती को मेरी तरह दरबार में नृत्य करते देख सकते हो? क्या मेरे नृत्य की तरह उनके नृत्य की भी प्रशंसा कर सकते हो? अर्जुन निरुत्तर रह गया। तब उर्वशी ने उसे शाप दिया कि तुम्हें  पुरुष होते हुए भी एक वर्ष तक स्त्री का भी जीवन जीना पड़ेगा, वह भी एक नर्त्तकी बन कर, अर्थात् तुम्हें तृतीय लिंगी मनुष्य का जीवन जीना पड़ेगा। उर्वशी का शाप सच हुआ और अर्जुन को अज्ञातवास के अंतिम वर्ष राजा विराट के महल में बृहन्नला के रूप में रहना पड़ा। यह जैविक बदलाव नहीं था, एक छद्मावरण था किन्तु इस छद्मावरण के साथ एक ऐसे तृतीय लिंगी का जीवन जीना पड़ा जो नृत्य-गान में निपुण था। थर्ड जेंडर का यह कैमोफ्लॉग (छद्मावरण) था जो आज पेट भरने की विवशता के साथ जुड़ गया है। महानगरों में कई पुरुष तृतीय लिंगी का चोला धारण कर के तृतीय लिंगी बन कर पैसा उगाहते हैं।
 
Shikhandi
‘महाभारत’ में दूसरी कथा है शिखण्डी की। इसमें कोई कैमोफ्लॉग नहीं है। अम्बा काशीराज की पुत्रा थी। उसकी दो और बहनें थी जिनका नाम अम्बिका और अम्बालिका था। हस्तिनापुर के संरक्षक भीष्म ने अपने भाई एवं हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर आसीन राजा विचित्रवीर्य के लिए काशीराज की तीनों पुत्रियों का हरण कर लिया। उन तीनों को वे हस्तिनापुर ले गए। अंबा ने भीष्म को बताया कि वह तो किसी और से प्रेम करती है अतः उनके भाई से विवाह नहीं कर सकती है। तब भीष्म ने अम्बा को उसके प्रेमी के पास पहुंचा दिया। किन्तु प्रेमी ने हरण की जा चुकी अंबा को तिरस्कृत कर ठुकरा दिया। अम्बा ने अपने जीवन के साथ हो रहे इस खिलवाड़ के लिए भीष्म को दोषी माना और उनसे विवाह करने का आग्रह किया। आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा से बंधे होने के कारण भीष्म द्वारा विवाह करने से मना कर दिया गया। सब ओर से ठुकराई गई अंबा ने प्रतिज्ञा की कि वह एक दिन भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी। इसके लिए उसने घोर तपस्या की। उसका जन्म पुनः एक राजा की पुत्रा के रूप में हुआ। पूर्वजन्म की स्मृतियों के कारण अंबा ने पुनः अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए तपस्या आरंभ कर दी। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उसकी मनोकामना पूर्ण होने का वरदान दिया तब अंबा ने शिखंडी के रूप में एक तृतीय लिंगी बनकर महाराज द्रुपद के घर जन्म लिया और महाभारत के युद्ध के दौरान भीष्म पितामह की मृत्यु का कारण बनी।
इन दोनों कथाओं का उल्लेख यहां इसलिए समीचीन है क्योंकि इनसे महाभारत काल अर्थात् प्राचीन भारत में तृतीय लिंगियों के महत्व का पता चलता है। भारतीय इतिहास के मध्यकाल में भले ही तृतीय लिंगियों को हरम का पहरेदार बना दिया गया लेकिन मलिक काफूर जैसे तृतीय लिंगी ने अनेक महत्वपूर्ण युद्ध लड़े और भारत में खिलजी वंश को सुदृढ़ता प्रदान की।
 
The Perfect Servant
थर्ड जेंडर के सामाजिक अस्तित्व की प्राचीन समाज में जगह के प्रश्न पर एक और किताब उल्लेखनीय है। सन् 2003 में यूनीवर्सिटी ऑफ शिकागो प्रेस से एक पुस्तक प्रकाशित हुई- ‘द परफेक्ट सर्वेंट : इनुक्स एन्ड द सोशल कंस्ट्रक्शन ऑफ जेंडर इन बाईज़ेन्टियम’। इसे लिखा था कैथरीन एम. रिंगरोज ने। इस पुस्तक में ईसा पूर्व सातवीं शताब्दी में बाईज़ेन्टियम साम्रज्य के आधीन यूनानियों द्वारा बसाए गए थ्रेस शहर में रहने वाले हिजड़ा सेवकों के बारे में विस्तृत विवरण मिलता है। तत्कालीन बाईज़ेन्टियम समाज में थर्ड जेंडर की पहचान एक उत्तम सेवक के रूप में थी। ठीक वैसे ही जैसे भारत में मध्यकाल में उन्हें उत्तम सेवक माना गया। एंथ्रोपोलॉजिकल आधार पर ऐतिहासिक अध्ययन के दृष्श्टिकोण से यह पुस्तक महत्वपूर्ण  मानी गई।
लेकिन समय के साथ तृतीय लिंगी मानो सामाजिक षडयंत्र के शिकार हो गए। उन्हें हाशिए पर पहुंचा दिया गया। उनकी आशीषें या दुआएं तो महत्वपूर्ण रहीं लेकिन उनका अस्तित्व संकुचित घेरे में बांध दिया गया।  ताली बजा-बजा कर नाचने वाले और दुआएं देने वाले विचित्रा मनुष्यों के रूप में उन्हें देखा जाने लगा। समाज के इस रवैये से सकुचा कर वे भी अपने-आप में सिमटने लगे। योरोप और अमेरिका में तृतीय लिंगी अपेक्षाकृत जल्दी सम्हल गए। उन्होंने अपनी बौद्धिक और कौशल क्षमता को पहचाना, प्रदर्शित किया और समाज में अपनी जगह बना ली। योरोप या अमेरिका का कोई भी तृतीय लिंगी तालियां बजाते हुए घर-घर नहीं भटकता है। वह फैशन इंडस्ट्री में अपनी महत्वपूर्ण जगह बना चुका है।
भारत में तृतीय लिंगियों यानी थर्ड जेंडर का संघर्ष अभी आरम्भ ही हुआ  है।         
इतिहास गवाह है कि पुरुषों ने अपना वर्चस्व स्थापित करते हुए स्त्रियों को दोयम दर्जे पर रख दिया। वहीं स्त्रियों ने भी अपने संघर्ष का नया इतिहास रचते हुए साबित किया कि वे पुरुषों से किभी तरह से कम नहीं हैं। स्त्रियों के इस संघर्ष में स्वयं पुरुषों के बुद्धिजीवी हिस्से ने उनका साथ दिया। अब बारी है समाज के उस तबके की जिसने सदियों से अपनी परिस्थिति को अपनी नियति मान कर स्वीकार कर रखा है। उनके भीतर जैविक (बायोलॉजिकल) झिझक है। वे जानते हैं कि वे न तो स्त्री हैं और न पुरुष।
 
Neither Man Nor Woman - The Hijras of India
सन् 1990 में सेरेना नंदा की पुस्तक प्रकाशित हुई जिसका नाम था ‘नाईदर मैन नॉर वुमेन : द हिजराज ऑफ इंडिया’। इसे प्रकाशित किया था बेलामांट, केलीफोर्निया के वड्सवर्थ पब्लिशिंग हाउस ने। यह भारत के  थर्ड जेंडर के जीवन पर एक मोनोग्राफिक पुस्तक थी। इस पुस्तक के लिए सेरेना नंदा को सन् 1990 में ही ‘रुथ बेनेडिक्ट प्राईज़’ से सम्मानित किया गया। थर्ड जेंडर के जीवन के अध्ययन का विस्तार करने के उददेश्य से सन् 1998 में कैनगेग लर्निंग ने इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित किया।  लेखिका सेरेना नंदा सिटी यूनीवर्सिटी न्यूयार्क में एंथ्रोपोलॉजी की प्रोफेसर इमेरट्स रह चुकी हैं। इसीलिए उन्होंने एंथ्रोपोलॅाजिकल दृष्टिकोण से थर्ड जेंडर के जीवन का अध्ययन प्रस्तुत किया। सेरेना नंदा ने अपनी पुस्तक में लिखा कि -‘भारतीय समाज में हिजड़ा की पारंपरिक भूमिका एक बच्चे के जन्म के आसपास विवाह और समारोहों में गायन और नृत्य करना है। वे महिलाओं के रूप में कपड़े पहनते हैं। माना जाता है कि उनके पास  नपुंसकता और बांझपन को दूर करने वाली विशेष शक्तियां होती हैं। जो हिन्दू धर्म से आते हैं वे देवी बहुचरा की पूजा करते हैं, लेकिन जो मुस्लिम पृष्ठभूमि से आते हैं और खुद को मुस्लिम मानते हैं, वे मुस्लिम रीतियों का पालन करते हैं। सेरेना नंदा की पुस्तक में हिजड़ों की संस्कृति, धर्म और जैविक स्थिति पर पृष्ठभूमि के बाद उनके जीवन की बारिकियों से परिचित कराया गया है। सेरेना मानती हैं कि हिजड़ा की एक सांस्कृतिक तुलना देखी जा सकती है जिसमें मूल उत्तरी अमेरिका के बेरडैच और आधुनिक पश्चिमी समाजों के ट्रांससेक्सुअल शामिल हैं।
 
The Invisibles
सन् 1996 में ‘द इनविजिबल : द टेल ऑफ द इनुक्स ऑफ इंडिया’ प्रकाशित हुई जिसे सन् 1998 में विंजेट पब्लिशर ने प्रकाशित किया। इसे लिखा था जिया जाफरी ने। न्यूयार्क में जन्मी जिया जाफरी का बचपन दिल्ली में गुजरा। उन्होंने बर्नार्ड कॉलेज न्यूयार्क से अंग्रेजी भाषा का अध्ययन करने के बाद कोलम्बिया विश्वविद्यालय से फिक्शन राईटिंग में स्नातक की उपाधि पाई। उनके अनेक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित हुईं।  ‘द इनविजिबल : द टेल ऑफ द इनुक्स ऑफ इंडिया’ में जिया जाफरी ने  अनिता नाम की एक थर्ड जेंडर (हर्माफ्रोटिड/ द्विलिंगी) के जीवन को पिरोया है जिसे उसके माता-पिता थर्डजेंडर समुदाय को सौंप देते हैं। जहां से उसकी त्रासद कथा आरम्भ होती है। थर्ड जेंडर समुदाय पर आपराधिक तत्वों के दबाव की खोजी प्रस्तुति को आलोचक ही नहीं वरन लेखक समुदाय से भी भरपूर सराहना मिली। रिसजार्ड कापुंस्की ने पुस्तक के बारे में कहा-‘यह एक शानदार यात्रा है। जाफरी ने इस आकर्षक किन्तु अत्यंत नाजुक विषय पर मानवीय संवेदनाओं के साथ कलम चलाई है।’
‘संवेदनात्मक रूप से लिखा गया, अच्छे से व्यक्त किया गया और न्यायसंगत दृष्टिकोण रखा गया।’ यह टिप्पणी थी ‘न्यूयार्क टाइम्स की पुस्तक समीक्षा में।
अमेरिकी लेखक हिल्टन एल्स ने जिया जाफरी की इस पुस्तक को ‘दिलचस्प और इससे पहले कभी नहीं लिखी गई पुस्तक कहा।’ अमेरिका की ही लेखिका सिग्रिड नुनेज़ ने इसे ‘इतिहास, एंथ्रोपोलॉजी, यात्राओं, संस्मरणों के एक गुलदस्ते जैसी दिलचस्प पुस्तक’ कहा।
‘द इनविजिबल : द टेल ऑफ द इनुक्स ऑफ इंडिया’ भारत के उस समुदाय की कथा है जो समाज में रहते हुए भी समाज के परिदृश्य में नहीं हैं। निरा उपेक्षित हैं। मानो उनका होना या न होना समाज के लिए कोई अर्थ ही न रखता हो। सन् 1996 से पहले लगभग यही स्थिति थी भारत में थर्ड जेंडर की।
सन् 2000 में चंडीगढ़ के डॉ. सतीश कुमार शर्मा की पुस्तक प्रकाशित हुई- ‘हिजराज़ : द लेबल्ड डेविएंट’। ज्ञान प्रकाशन हाउस से प्रकाशित इस किताब में समाज में थर्ड जेंडर की दैवीय प्रतिस्थापना को विश्लेषित किया गया। इसने थर्ड जेंडर के संगठित अस्तित्व को समझने में मदद की।
The truth about me
सन् 2010 में तमिल भाषी ए. रेवती की आत्मकथात्मक पुस्तक आई -  ‘द ट्रुथ एबाउट मी’। अंग्रेजी अनुवाद किया था वी. गीता ने। इस किताब  को मदुरै स्थित ‘द अमेरिकन कॉलेज‘ के थर्ड जेंडर साहित्य के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। अपने जीवन की कहानी कहने में रेवती ने हत्प्रभ कर देने वाला साहस दिखाया। रेवती ने ‘गलत शरीर में होने’ के अपने गहरे संघर्ष को उजागर किया जो उसे बचपन से पीड़ित करता था। खुद को सच मानने के लिए, अपने परिवार और समुदाय द्वारा निरंतर हिंसा से बचने के लिए रेवती अपना गांव छोड़ कर हिजड़ों के घर में जगह पाने के लिए दिल्ली चली गई। उसकी ज़िंदगी एक महिला बनने और प्यार खोजने के लिए खतरनाक शारीरिक और भावनात्मक यात्रा की अविश्वसनीय श्रृंखला बन गई। ‘द ट्रुथ एबाउट मी’ एक थर्ड जेंडर की साहसी आत्मकथा है जिसने अपने घर के अंदर और बाहर गरिमा का जीवन खोजने के लिए उपहास, उत्पीड़न और हिंसा का डट कर विरोध किया। रेवती ने अपनी इस आत्मकथात्मक पुस्तक में अपने कटु अनुभवों को साझा करते हुए एक घटना का उललेख किया है कि- ‘उस भीड़ में पुरुषों ने हमारे कंधों पर, हमारी पीठ पर हाथ लगाना शुरू कर दिया। कुछ ने हमारी छातियों को पकड़ने का प्रयास किया। - मूल या डुप्लिकेट?- उन्होंने चिल्ला कर पूछा। ऐसे क्षणों में मुझे निराशा महसूस हुई और आश्चर्य हुआ कि क्या हमारे लिए गरिमा के साथ जीने और सभ्य जीवन जीने का कोई तरीका नहीं है?’
  
Myself Mona Ahmed
सन् 2001 में प्रकाशित ‘माई सेल्फ मोना अहमद’। दयानिता सिंह द्वारा लिखी गई यह किताब फोटोबुक, जीवनी, आत्मकथा और कथा का मिश्रण है। आरम्भ में यह एक फोटोजर्नलिस्ट प्रोजेक्ट था जिसने दयानिता को मोना अहमद से परिचित कराया। लेकिन मोना अहमद के द्वारा इस तरह के एक प्रोजेक्ट का विषय बनने से मना कर दिया गया था। लेकिन तब तक दयानिता भी मोना अहमद के जीवन को सबके सामने लाने का निश्चय कर चुकी थीं। उन्होंने एक फोटोग्राफिक बायोग्राफी लिखने का मन बनाया और इस बारे में मोना अहमद से चर्चा की। अंततः मोना अहमद भी मान गईं और उन्होंने दयानिता को पूरा-पूरा सहयोग दिया।  उन्होंने अपनी पुस्तक में पुस्तक फोटोग्राफ और साहित्य को एक साथ प्रस्तुत किया, एक सुंदर किन्तु गंभीर कोलाज़ की तरह।
दयानिता सिंह ने लिखा है कि ‘वह न तो यहां और न ही वहां, न नर और न ही महिला होने की कहानी बताना चाहती थी, और आखिरकार, न तो एक नपुंसक और न ही मेरी जैसे कोई। वह हमेशा मुझसे पूछती, ‘मुझे बताओ मैं क्या हूं?’
जैसा कि अमेरिकी थर्ड जेंडर रचनाकार डेज़ी ब्रॉन्क्स ने अपनी कविता ‘फेमीलियर वेज़ल’ में लिखा -
मैं भूल गया यह मेरा शरीर है
मैं अपनी छाती और मुस्कान देखता हूं
मेरी बांह
ये मेरे ही हैं
कभी-कभी गिनने की कोश्षिश करता हूं
मैं अपने पेट की तरफ देखता हूं
और लंबे समय तक
सोचने का प्रयास नहीं करता
लेकिन आश्चर्यचकित हो जाता हूं कि
मेरे पैर भूल गए हैं कि वे मेरे हैं
.............
मैं भूल जाता हूं कि मेरे हाथ कहां हैं
सब कुछ भूलने पर भी
मुझे मिलता है अपने शरीर पर
एक-एक अक्षर लिखा हुआ
यह शरीर
पात्रा है मेरा, मेरा पेट और मेरी छाती
मुझे दिखाई देती है असमानता।

तुम मुझे देखो, और उस लड़के को देखो ष्
वह एक टी-शर्ट के साथ मुस्कुरा रहा है
उसकी बांह पर निशान देखना कठिन नहीं है
जिन निशानों को आप नहीं देख पाते हैं,
वह जीवन का निशान जो मैं शायद ही
अपने लिए जोड़ सकता हूं।

डेज़ी ब्रॉन्क्स के ‘शायद’ के इस भय को दृढता से परे धकेलते हुए मुद्रित सामग्री ने एक विश्वास का वातावरण और एक संभावना को जन्म दिया। यह मुखर रूप से तब हुआ जब प्रसिद्ध फोटोग्राफर दयानिता सिंह ने मोना अहमद के जीवन की  साहसिक सहानुभूतियों को छायाचित्रों के साथ जिस प्रमाणिकता से प्रस्तुत किया उसने उनकी पुस्तक को एक बहुत ही संवेदनशील दस्तावेज़ बना दिया। भारत में कितना कठिन है थर्ड जेंडर का जीवन इसे महसूस किया जा सकता है मोना अहमद के इस बायोग्राफिक एल्बम को देख कर जिसमें जीवनानुभव हैं, तस्वीरें हैं और जिसमें वेदना-संवेदना का अथाह सागर हहराता दिखाई पड़ता है। मोना अहमद से अपनी भेंट के बारे में दयानिता सिंह ने लिखा है कि ‘हम दोनों पहली बार 1989 में मिले, जब मैं लंदन के ‘द टाइम्स’ के लिए शूटिंग असाइनमेंट पर थी।’ अपनी पुस्तक के परिचय में असाइनमेंट की बात करते हुए दयानिता कहती हैं कि मेरे लिए एक फोटोजर्नलिस्ट के रूप में खुद को साबित करने का यह एक अवसर था। मैं अपना सबसे बेहतरीन काम कर के देना चाहती थी, यह दिखाने के लिए कि मैं अपने पुरुष वर्चस्व वाले पेशे में लड़कों से कम नहीं हूं। वेश्यावृत्ति, बालश्रम, दहेज की मौत और बाल विवाह की कहानी से आगे बढ़ कर थर्ड जेंडर पर एक स्टोरी तैयार करना चाहती थी। मोना अहमद से मिलना मेरे लिए अपने लक्ष्य तक पहुंचने जैसा था।’
अपनी पहली भेंट के बारे में दयानिता बताती हैं कि ‘अपने असाइनमेंट के तहत मैं दिल्ली की संकरी गलियों से गुज़रती हुई अकबर दूधवाले की गली में पहुंची। वहां मैंने अपने समय की प्रसिद्ध थर्ड जेंडर सोना और चमन के घर की जानकारी ली। भारत और पाकिस्तान के विभाजन के समय सोना पाकिस्तान चली गई थी जबकि चमन भारत में ही रही। मुझे पता चला कि तुर्कमान दरवाज़े के निकट चमन की शिष्या मोना अहमद रहती है। मैं मोना अहमद के घर पहुचीं। दरवाज़े की घंटी बजाई। दरवाज़ा खुला तो मैं देख कर चकित रह गई कि आभूषणों से सजा हुआ एक आकर्षक व्यक्तित्व मेरे सामने था। उसने गर्मजोशी से कहा- मेरे घर में आपका स्वागत है।’
यद्यपि जैसा दयानिता ने सोचा था ठीक वैसा नहीं हुआ। जब मोना को पता चला कि यह परियोजना ‘द टाइम्स’ के लिए थी, तो वह चिंतित हो उठी और पूछा कि फिल्म उसके पास वापस आ जाएगी न? ब्रिटेन में मोना के रिश्तेदार थे, जिन्हें नहीं पता था कि मोना थर्ड जेंडर है। दयानिता ने फिल्म मोना को दे दी और मोना अहमद ने तुरंत इसे कूड़ेदान में फेंक दिया। इससे दयानिता का असाईनमेंट खटाई में पड़ गया लेकिन इससे मोना और दयानिता के बीच एक विश्वास भरी मित्राता का आरम्भ अवश्य हो गया। इस मित्राता ने दयानिता के लिए थर्ड जेंडर की दुनिया के वे द्वार खोल दिए जिनके पीछे अथाह गोपन था। मोना ने अपनी पालित बेटी आयशा के जन्मदिन समारोह में दयानिता को आमंत्रित किया। दयानिता लिखती हैं कि ‘जब भी मैं दिल्ली से गुजरती हूं, तो मैं तुर्कमैन गेट की ओर घूमती हूं और मोना के कमरे में घंटों बिताती हूं।“
फिर एक ऐसा कठिन समय आया जब आयशा मोना से दूर चली गई। मोना को उसके समुदाय से अलग-थलग कर दिया गया और उसने एक कब्रिस्तान में पनाह ली। मोना ने अपने पूर्वजों की कब्रों के पास घर बनाया। यह सब कुछ उसके लिए असहनीय था लेकिन वह हारना नहीं चाहती थी। मोना के घर के पास एक पुराना स्वीमिंगपूल था। उस स्वीमिंगपूल में मोना ने अचार बनाने की एक फैक्ट्री खोली। अपने उत्पाद को नाम दिया ‘अहमद पिकल’। इस फैक्ट्री में गरीब मुस्लिम महिलाओं को रोजगार मिला।
अपनी पुस्तक ‘माई सेल्फ मोना अहमद’ में दयानिता ने जो तस्वीरें संजोई हैं वे मोना के जीवन के विभिन्न पक्षों को बखूबी दर्शाती हैं। मोना ने दयानिता को अनुमति दे दी कि वह थर्ड जेंडर की भावुक एवं खुरदरी दुनिया से सबको परिचित करा सकें। समाज थर्ड जेंडर को अपमानजनक ढंग से पुकारता है। उसे स्वयं से दूर रखने का प्रयास करता है।
मोना अहमद के मन में हमेशा यह प्रश्न उमड़ता-घुमड़ता रहा है कि -‘मैं कौन हूं?’ दयानिता सिंह की इस पुस्तक में मोना के विभिन्न छायाचित्रों  के साथ ही मोना द्वारा लिखे गए कई पत्रा शामिल हैं। जिनमें से एक में, वह दुखी हो कर लिखती है कि- ‘मैं लगातार सोचती हूं, भगवान ने मुझे हिजड़ा क्यों बनाया? एक मां के 4 बच्चे हैं, सिर्फ एक हिजड़ा क्यों है? बेशक, यह भगवान की देन है, लेकिन केवल एक लड़के को क्यों लगता है कि वह एक औरत की तरह कपड़े पहने? यह क्या है, मुझे समझ में नहीं आता है। कोई भी इस सवाल को समझा नहीं सकता है। एक हिजड़े के पास शरीर पुरुष का होता है, लेकिन आत्मा स्त्रा की होती है। ऐसा क्यों होता है?’
मोना अहमद धनी पीड़ा के साथ लिखती हैं कि-‘अगर भगवान मेरे सामने आए, तो मैं उससे पूछूंगी कि तुमने मुझे ऐसा क्यों बनाया? अगर तुम मुझे तीसरे सेक्स के रूप में पैदा करना चाहते थे तो तुमने मुझे जन्म क्यों दिया? और यदि तुमने मुझे तीसरा सेक्स बनाया है, तो तुमने मेरे लिए समाज में सम्मान क्यों नहीं सुनिश्चित किया?’
समाज में सम्मान पाना यह एक बहुत ही बुनियादी मुद्दा है। जो समाज का अभिन्न अंग हो, समाज उसे अपने से काट कर अलग रखे तो यह विडम्बना नहीं तो और क्या है?
 
Me Hijra Me Laxmi
सन् 2012 में एक असाधारण आत्मकथा मराठी में प्रकाशित हुई जिसका नाम था-‘मी हिजड़ा, मी लक्ष्मी’। यह थर्ड जेंडर लक्ष्मी त्रिपाठी की आत्मकथा है। लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी का जन्म सन् 1979 में थाणे, महाराष्ट्र में हुआ था। उन्होंने मुम्बई के मिठीबाई कॉलेज से बी.कॉम किया। लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी अनेकानेक सामाजिक संस्थाओं से सम्बद्ध होने के साथ-साथ कैंसर पीड़ित व एच.आई.वी. के लिए भी कार्यरत हैं। हिजड़ों व महिलाओं की समस्याओं को भी उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है। विश्व के अनेक देशों में उन्होंने भारतीय थर्ड जेंडर समाज का प्रतिनिधित्व भी किया है। अनेकानेक पुरस्कार व सम्मान से सम्मानित लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी थर्ड जेंडर समाज की शिक्षा और अधिकारों के लिए पूर्णतः समर्पित हैं। वे एक टीवी कलाकार, भरतनाट्यम नृत्यांगना और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी जानी जाती हैं। वे एक थर्ड जेंडर हैं जो थर्ड जेंडर समाज के हित के लिए कार्य करती हैं। लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी टीवी शो ‘बिगबॉस सीजन-5’ की प्रतिभागी भी रह चुकी हैं। टीवी शो ‘सच का सामना’, ‘दस का दम’ और ‘राज पिछले जनम का’ में भी देखी जा चुकी हैं।
अपने समुदाय के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाली आकर्षक व्यक्तित्व की धनी लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को अपने हिजड़ा होने पर गर्व है। वे इसे अभिशाप नहीं मानती हैं। उनकी आत्मकथा के अंग्रेजी अनुवाद ‘मी हिजड़ा, मी लक्ष्मी’ का विमोचन नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में किया गया था। लक्ष्मी के अनुसार उन्होंने कभी लिखने के बारे में नहीं सोचा था। लक्ष्मी के अनुसार - ‘मैं दो साल तक लगातार असमंजस में रही और उसके बाद इसे लिखने के लिए तैयार हूं। मैं हमेशा सोचती थी कि यह किताब कभी नहीं लिखी जा सकती।’ उनकी पुस्तक मराठी और गुजराती में पहले ही प्रकाशित हो चुकी है। सन् 2015 में उनकी यह आत्मकथा हिन्दी में ’मैं हिजड़ा, मैं लक्ष्मी’ के नाम से प्रकाशित हुई।
लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी पहली थर्ड जेंडर हैं जो संयुक्त राष्ट्र संघ में एशिया-प्रशांत क्षेत्रा का प्रतिनिधित्व करती हैं और टोरंटो में विश्व एड्स सम्मेलन जैसे अनेक मंचों पर अपने समुदाय और भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। वह इस समुदाय के समर्थन और विकास के लिए ‘अस्तित्व’ नाम का संगठन चलाती हैं।
लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की आत्मकथा ने हिन्दी-पट्टी को चौंकाया। देखा जाए तो हिन्दी साहित्य में विमर्श के लिए एक विस्तृत आधार दे दिया।
 
A Gift of Goddess Lakshmi
सन् 2017 में मनोबी बंदोपाध्याय और झिमली मुखर्जी पांडेय द्वारा लिखी ‘ए गिफ्ट ऑफ गॉडेस लक्ष्मी’ प्रकाशित हुई। यह भी अपनी पहचान को परिभाषित करने और उपलब्धि के नए मानकों को निर्धारित करने के लिए एक ट्रांसजेंडर की असाधारण और साहसी कथा कही जा सकती है। सारांशतः कहा जाए तो जब एक लड़का बांदोपाध्याय परिवार में पैदा हुआ था, तो सभी खुश हुए। उसका नाम रखा गया आसन। आसन का जन्म दो लड़कियों के बाद हुआ था। यद्यपि, कुछ समय बाद लड़के ने अपने शरीर में अपर्याप्त जैसा कुछ महसूस करना शुरू कर दिया और अपनी पहचान पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। वह लडका हो कर भी स्वयं को लड़की जैसा अनुभव करता था। यह उसके लिए ही नहीं वरन उसके परिवार के लिए भी विचित्रा स्थिति को जन्म दे रहा था।
भाग्य के इस क्रूर मजाक को परिवार ने स्वीकार करने से इंकार कर दिया। लेकिन आसन पहले से ही मनोबी बनने की अपनी यात्रा शुरू कर चुका था। ईमानदारी और गहरी समझ के साथ, मनोबी एक पुरुष से एक महिला में अपने परिवर्तन स्वीकार करता गया। तमाम विरोधों, उपहासों और हतोत्साह करने वाले प्रयासों के बाद भी मनोबी ने थर्ड जेंडर की अपनी प्रकृति को स्त्री और पुरुष प्रकृति के बराबर सिद्ध करने का संघर्ष जारी रखा। उसने उच्चशिक्षा प्राप्त की और लड़कियों के कॉलेज में प्राचार्य के पद पर आसीन हो कर सिद्ध कर दिया कि थर्ड जेंडर मात्रा ताली बजा-बजा कर नाचने वाले उपेक्षित मनुष्य नहीं अपितु बुद्धिजीवी होते हैं। उन्हें आवश्यकता है तो सामाजिक सहयोग, विश्वास और अपनत्व की।
Third Gender Discourse
हिन्दियेत्तर के साथ ही 21वीं सदी के आरम्भिक दशक से अब तक हिन्दी में एंथ्रोपोलॉजिकल पुस्तकों के साथ ही कुछ आत्मकथाएं, कुछ जीवनियां और कुछ उपन्यास आए। कविताएं और कहानियां भी आईं। पाठकों ने सभी की ओर उत्सुकता एवं जिज्ञासा से देखा। स्पष्ट था कि वे थर्ड जेंडर की दुनिया को जानने, समझने को आतुर हैं, कुछ झिझक के साथ। यह झिझक भी दूर हो जाएगी एक दिन जब स्त्री, पुरुष और थर्ड जेंडर लेखक अपनी लेखनी से थर्ड जेंडर की गोपन दुनिया के हर दरवाजे, हर खिड़कियां खोल देंगे। एक दिन यह हो कर रहेगा क्योंकि थर्ड जेंडर विमर्श अब साहित्य के रास्ते चल पड़ा है जहां वह वैचारिक प्रतिबद्धता का अभिन्न अंग बन जाएगा।
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Reference:
1.     The Perfect Servant: Eunuchs and the Social Construction of Gender in Byzantium 1st Edition  by Kathryn M. Ringrose
2.     The Invisibles: A Tale of the Eunuchs of India by Zia Jaffrey
3.     Me Hijra, Me Laxmi by Laxmi Narayan Tripathi
4.     A Gift of Goddess Lakshmi by Manobi Bandopadhyay (Author), Jhimli Mukherjee Pandey (Author)
5.     The Truth about Me by A. Revathi (Author), V. Geetha (Translator)
6.     Hijras: the Labelled Deviants By S K Sharma
7.     Neither Man Nor Woman: The Hijras of India by Serena Nanda