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बुधवार, दिसंबर 16, 2020

बाबू जी मायाराम सुरजन, पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी और प्रो. कमला प्रसाद: जिनसे मिलना मेरे जीवन के लिए महत्वपूर्ण रहा | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | संस्मरण

 

Dr (Miss) Sharad Singh

बाबू जी मायाराम सुरजन, पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी और प्रो. कमला प्रसाद: जिनसे मिलना मेरे जीवन के लिए महत्वपूर्ण रहा


 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


सन् 1988 में पूर्णतया सागर में निवासरत होने से पूर्व सन् 1983 मैं व्यक्तिगत काम से पन्ना से सागर विश्वविद्यालय आई थी। वहां अर्थशास्त्र विभाग के सामने अचानक डाॅ. कमला प्रसाद जी से मुलाक़ात हो गई। इससे पहले मैं उनसे पन्ना में प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन में मिल चुकी थी। उन दिनों जैसे कि हर युवा कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ा होता था, मैं भी थी। सोवियत कम्युनिज़्म और भारतीय कम्युनिज़्म पर मेरी उनसे लम्बी-चौड़ी वार्ता भी हुई थी। ज़ाहिर है कि वे भी मुझे भूले नहीं थे। मुझे देखते ही वे बोल उठे,‘‘अरे, शरद सिंह तुम यहां कहां? तुमसे तो मैं पन्ना में मिला था।’’

Pro. Kamla Prasad

मैंने उनका अभिवादन किया और अपने आने का कारण बताया। 

‘‘कोई मदद करूं?’’ उन्होंने पूछा। 

मैंने कहा ‘‘नहीं’’। 

तो बोले, ‘‘अगर समय हो तो चलो फिर मैं तुम्हें एक विशेष व्यक्ति से मिलवाता हूं। मैं उन्हीं के पास जा रहा हूं।’’ डाॅ. कमला प्रसाद जी बोले।

‘‘ठीक है।’’ मैंने कहा 

...और मैं और मेरी दीदी वर्षा सिंह उनके साथ कार में सवार हो कर चल पड़े। मुझे अच्छी तरह याद है कि वह सफ़ेद रंग की एम्बेस्डर कार थी। किसकी थी, यह पता नहीं। कम से कम कमला प्रसाद जी की नहीं थी। यूनीवर्सिटी की पहाड़ी से उतर कर बसस्टेंड, परकोटा होते हुए, शहर की किसी गली से गुज़रते हुए एक घर के सामने रुके। उस समय मुझे सागर के मोहल्लों का नाम भी ठीक से पता नहीं था और न ही नगरीय क्षेत्र के अंदरुनी हिस्सों की जानकारी थी।

हम कार से उतरे। सीढ़ियां चढ़ कर उनके पास पहुंचे जिनसे मिलने गए थे। एक बुजुर्ग व्यक्ति सामने थे। कमला प्रसाद जी ने उनका परिचय कराते हुए कहा,‘‘ये ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी हैं। जानती हो इनके बारे में?’’

‘‘हो, मां सागर के संदर्भ में हमेशा इनका जिक्र करती हैं।’’ मैं कहा और मैंने तथा दीदी ने आगे बढ़ उनके पैर छुए।

‘‘नहीं, नहीं! बेटियां पिता के पैर नहीं छूतीं। सदा सफलता प्राप्त करो।’’ ये उद्गार थे ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी के। 

‘‘मैं आपको दादा कह कर संबोधित कर सकती हूं?’’ मैंने पूछ लिया।

‘‘अवश्य!’’ उन्होंने मुस्कुरा कर कहा।

Pt. Jwala Prasad Jyotishi

फिर कमला प्रसाद जी और ज्वाला प्रसाद जी बातों में मशगूल हो गए। ज्वाला प्रसाद जी बीच-बीच में हम दोनों बहनों से भी कुछ न कुछ बात कर लिया करते। इसी दौरान पोहा और चाय का नाश्ता आया। ज्वाला प्रसाद जी ने पानी भरे गिलास में रखी अपनी बत्तीसी (डेंचर) निकाल कर मुंह में लगाया। इससे पहले मैंने कभी किसी को डेंचर लगाते अपनी आंखों से नहीं देखा था। अज़ीब-सी अनुभूति हुई। शयद मेरी मनोदशा ज्योतिषी दादा भांप गए। वे हंस कर बोले,‘‘मेरे ये दांत नकली हैं, इसलिए मैं इन्हें लगा कर भी अहिंसक ही हूं।’’

उनके इस कथन से उनके विनोदी स्वभाव का भी मुझे परिचय मिला। मुझे सहज होने में भी सहायता मिली। हम सभी ने पोहा खाया और चाय पी। कुछ देर और चर्चा के बाद हम लोग वहां से विदा हुए। विदा लेते समय ज्योतिषी दादा ने हम दोनों बहनों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था,‘‘जब भी सागर आओ, जरूर मिलना और अपनी माता जी डाॅ विद्यावती ‘मालविका’ को भी मेरा नमस्कार कहना।’’

चर्चा के दौरान ही पता चला था कि ज्योतिषी दादा मेरी मां को ही नहीं अपितु मेरे नाना संत श्यामचरण सिंह को भी जानते थे। मेरे नाना जी भी गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। ज्योतिषी दादा से पहली बार मिल कर ऐसा नहीं लगा था कि उनसे हम लोग पहली बार मिल रहे हैं। मुझे यही लगा था कि मेरे स्वर्गीय नाना जी एक बार फिर सजीव मेरे सामने बैठे हुए हैं। यदि उन दिनों दूरभाष या मोबाईल हमारी पहुंच में होता तो मैं अकसर उनसे बात करती रहती। लेकिन वे चिट्ठी-पत्री के दिन थे। मैंने एक-दो बार उन्हें पत्र लिखा जिसका तत्परता से उन्होंने जवाब भी दिया किन्तु फिर जीवन के उतार-चढ़ाव में पत्राचार छूट गया। 

उस दिन ज्योतिषी दादा से मिलने के बाद कमला प्रसाद जी ने हमें सरकारी बसस्टेंड पहुंचा दिया था जहां से हमें पन्ना के लिए बस पकड़नी थी। उन दिनों बसस्टेंड अपनी पुरानी जगह पर था और सागर झील भी बहुत बड़ी थी।

मैं अपनी पढ़ाई-लिखाई में रम गई। उन्हीं दिनों मुझे पत्रकारिता का भूत भी सवार हो गया और पढ़ाई के साथ जबलपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘‘नवीन दुनिया’’ और ‘‘ज्ञानयुग प्रभात’’ के लिए स्वतंत्र पत्रकार के रूप में रिपोर्टिंग करने लगी। दमोह से प्रकाशित होने वाले ‘‘साप्ताहिक दमोह संदेश’’ के लिए कार्डधारी रिपोर्टर का भी काम किया। ‘जनसत्ता’ और ‘रविवार’ के लिए भी रिपोर्टिंग की। तब मुझे नहीं पता पता था कि एक दिन मैं किताबें लिखूंगी और दिल्ली से पहली पुस्तक प्रकाशन की भूमिका के साक्षी बनेंगे ज्योतिषी दादा। हां, उस समय तक यह अवश्य तय होने लगा था कि मां की संवानिवृत्ति के बाद हम लोग सागर में बस जाएंगे। स्कूल शिक्षा विभाग का संभागीय कार्यालय सागर में होने के कारण तथा परीक्षा काॅपी जांचने के लिए मां को पन्ना से सागर आना-जाना पड़ता था। यहां सुश्री लक्ष्मी ताम्रकार जो महारानी लक्ष्मीबाई शा.उ.मा. विद्यालय में पीटीआई थीं, उनकी अच्छी सहेली बन गई थीं। मां को सागर बहुत पसंद आ गया था, उस पर ताम्रकार आंटी ने भी उन्हें प्रोत्साहित किया और हम सन् 1988 में सागर में आ बसे। सागर आने के बाद कभी मां के साथ तो कभी दीदी के साथ मैं ज्योतिषी दादा से मिलने गई। 

सन् 1990 में, माह तो मुझे याद नहीं है लेकिन बारिश के दिन थे। रायपुर से मायाराम सुरजन जी का पत्र मिला कि वे सागर आने वाले हैं और विश्वविद्यालय के गेस्टहाउस में ठहरेंगे। दरअसल, सन् 1988 में स्थानीय मुकेश प्रिंटिंग प्रेस से मैंने अपनी पहली पुस्तक छपवाई थी। इसे छपवाने की प्रेरणा दी थी त्रिलोचन शास्त्री जी ने। यह नवगीत संग्रह था। नाम था-‘‘आंसू बूंद चुए’’। काव्य जगत ने तो मेरे पहले नवगीत संग्रह का स्वागत किया लेकिन पुस्तक की बिक्री को ले कर मेरा अनुभव आंसू बहाने वाला ही रहा। इसी दौरान मैं साक्षरता मिशन से जुड़ी और मेरी कहानियां मिशन की पत्रिका में प्रकाशित हुई। मेरे मन में विचार आया कि काश! मेरी वे कहानियां पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो जातीं। डाॅ राजमती दिवाकर जी ने मुझे सलाह दी कि शिवकुमार श्रीवास्तव जी का कई प्रकाशकों से परिचय है अतः मैं उनसे बात कर के देखूं। मैंने शिवकुमार श्रीवास्तव जी से चर्चा की। उन्होंने मुझसे पांडुलिपि मांगी। मैंने उन्हें दे दी। लगभग डेढ़ साल व्यतीत हो गए लेकिन शिवकुमार भाई साहब ने पांडुलिपियों के बारे में कोई चर्चा ही नहीं की। मुझे स्पष्टवादिता हमेशा अच्छी लगती है। यदि आप से कोई काम नहीं हो सकता है तो आप स्पष्ट मना कर दें। किंतु राजनीति में दखल रखने वाले शिवकुमार भाई साहब के लिए शायद कठिन रहा होगा कि वे स्पष्ट मना कर दें। 

Mayaram Surajan Babu Ji

उन्हीं दिनों ‘‘देशबंधु’’ समाचारपत्र ने प्रकाशन संस्थान आरम्भ किया था जिसके तहत वे पुस्तकें प्रकाशित करने वाले थे। मैंने मायाराम सुरजन जी को पत्र लिखा कि मैं अपनी साक्षरता विषयक कहानियों का संग्रह प्रकाशित करना चाहती हूं। उसी तारतम्य में उन्होंने मुझे पत्र लिख कर अपने सागर आने के कार्यक्रम के बारे में सूचित किया था।

उन दिनों हम लोग नरसिंहपुर रोड स्थित मध्यप्रदेश विद्युत मंडल की आवासीय काॅलोनी में रहते थे। वहां से मकरोनिया चौराहा काफी दूर था और उस ओर ऑटो भी नहीं मिल पाती थी। हमारे पास दूरभाष का कोई साधन नहीं था। अतः गेस्टहाउस पहुंचने से पूर्व हम लोग (मैं और वर्षा दीदी) सुरजन दादा से बात भी नहीं कर सके। उन्होंने सुबह दस बजे तक गेस्टहाउस में मिलने का समय चिट्ठी में लिखा था। साधन के अभाव में हमें वहां पहुंचने में तनिक देर हो गई। वहां पहुंच कर पता चला कि बाबू जी (मायाराम सुरजन जी) अभी-अभी ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी से मिलने उनके घर के लिए निकल गए हैं। पल भर को हताशा तो हुई किंतु फिर हमने तत्काल गेस्टहाउस से निकल कर ऑटो की और ज्योतिषी दादा के घर जा पहुंचे। बाबू जी भी वहां मिल गए। 

‘‘अरे, तुम लोगों की प्रतीक्षा करते-करते मैं निकल आया।’’ बाबू जी ने कहा। फिर उन्होंने बताया कि साक्षरता विषय किताबें प्रकाशित करना अभी देशबंधु प्रकाशन की योजना में शामिल नहीं है लेकिन वे दिल्ली के किसी प्रकाशक से इस बारे में बात कर सकते हैं। अंधा क्या चाहे, दो आंखे। मैं खुश हो गई उनकी बात सुन कर। लेकिन उन्होंने जब पांडुलिपि मांगी तो मैंने उन्हें सारा किस्सा सुना दिया कि लगभग डेढ़-दो साल से मेरी पांडुलिपियां शिवकुमार भाई साहब के पास रखी हैं।

‘‘शिवकुमार से वापस ले लो। वह नहीं छपाएगा।’’ ज्योतिषी दादा ने मेरी बात सुनते ही कहा। बाबू जी ने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए मुझे सलाह दी कि मैं शिवकुमार भाई साहब से अपनी पांडुलिपियां वापस ले कर डाक द्वारा उनके पास रायपुर भेज दूं। 

‘‘मुझसे पूछा होता तो मैं पहले ही कहता कि शिवकुमार को पांडुलिपियां मत दो।’’ ज्योतिषी दादा ने पुनः मुझसे कहा। मुझे उस समय यह पछतावा हुआ कि मैंने ज्योतिषी दादा से इस बारे में पहले ही सलाह क्यों नहीं ली। 

दूसरे ही दिन मैंने शिवकुमार श्रीवास्तव भाई साहब से अपनी पांडुलिपियां वापस मांग ली। उन्होंने ने भी इस भाव से वापस कीं मानों उन्हें मेरे द्वारा वापस मांगे जाने की ही प्रतीक्षा थी। लेकिन जैसे कहा जाता है न कि हर अवरोध के बाद एक नया रास्ता खुलता है। इस बार अवरोधक नहीं, मार्गदर्शक मुझे मिले थे। ज्योतिषी दादा ने मेरी कहानियों को पढ़ा था। उन्हें वे पसंद आई थीं। अतः उन्होंने भी मायाराम सुरजन बाबू जी के निर्णय का समर्थन किया था। वे उन लोगों में से नहीं थे कि मुंह के सामने तारफ़ करें और पीठ पीछे कटाई करें। वे सभी का भला चाहने और सभी का भला करने वाले व्यक्ति थे। यह मैं अपने अनुभव के आधार पर दावे से कह सकती हूं। आज ऐसे लोगों की अनुपस्थिति बहुत खटकती है। सामाजिक वातावरण में गिरावट की एक वजह यह भी है कि आज  ज्योतिषी दादा जैसे सरल स्वभाव, युवाओं के पथप्रदर्शक एवं परोपकारी व्यक्तियों की कमी हो चली है। 

बहरहाल, मैंने अपनी पांडुलिपियां सुरजन दादा के पास भेज दीं। कुछ समय बाद सीधे दिल्ली से सामयिक प्रकाशन के मालिक जगदीश भारद्वाज जी का पत्र मेरे पास आया जिसमें उन्होंने मेरी साक्षरता विषयक कहानियों की किताबें छापना स्वीकृति दी थी। दरअसल मायाराम सुरजन बाबू जी ने मेरी पांडुलिपियां जगदीश भारद्वाज जी के पास दिल्ली भेज दी थीं। सन् 1993 में एक साथ दो किताबें प्रकाशित हुईं- ‘‘बधाई की चिट्ठी’’ और ‘‘बेटी-बेटा एक समान’’। उस समय मैंने दो ही लोगों को सबसे पहले अपनी किताबें दिखाई थीं। सबसे पहले ज्योतिषी दादा को और उसके बाद कपिल बैसाखिया जी को जिन्होंने मित्रवत सदा मेरा भला चाहा।

Badhi Ki Chitthi - Dr Sharad Singh


अच्छे लोगों के हाथों अच्छे भविष्य की नींव रखी जाती है, यह कहावत मेरे जीवन में चरितार्थ होती मैंने स्वयं अनुभव की है। उस समय मुझे पता नहीं था कि एक दिन सामयिक प्रकाशन मेरी ‘‘सिग्नेचर उपन्यासों’’ का प्रकाशक बनेगा। या वाणी प्रकाशन, साहित्य अकादमी, नेशनलबुक ट्रस्ट आदि से मेरी पुस्तकें प्रकाशित होंगी।

Beti Beta Ek Saman -  Dr Sharad Singh

 मायाराम सुरजन बाबू जी ने जो मार्ग प्रशस्त किया मानो उसका शिलान्यास स्वयं ज्योतिषी दादा ने किया था। बड़ों का आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाता है। मैं वे दोनों किताबें ले कर ज्योतिषी दादा के पास गई। उन दिनों वे अस्वस्थ चल रहे थे। किन्तु मेरी किताबें देख कर वे बहुत खुश हुए। उस समय उन्होंने मुझे जो आशीर्वाद दिया वह मेरे लिए पथ प्रदर्शक की तरह है। उन्होंने कहा था-‘‘अब इस यात्रा को जारी रखना और पीछे मुड़ कर कभी मत देखना।’’

दादा ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी, मायाराम सुरजन बाबू जी और कमला प्रसाद जी भले ही हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उन तीनों का आर्शीवाद सदा अपने साथ महसूस करती हूं जिससे मुझे हमेशा आत्मिक संबल मिलता है। 

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गुरुवार, फ़रवरी 13, 2020

देशबन्धु के साठ साल-27- ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की लेखमाला की सत्ताइसवीं कड़ी....


देशबन्धु के साठ साल-27
- ललित सुरजन

आप यदि दिन के समय किसी अखबार के दफ्तर में जाएं तो आपको वहां अमूमन शांतिमय वातावरण मिलेगा। लेकिन शाम छह बजे के बाद से जो गहमागहमी शुरू होती है तो सुबह लगभग पांच बजे तक बनी रहती है। संपादन कक्ष से लेकर कंपोजिंग कक्ष तक, फिर मशीन रूम से लेकर अखबार की पार्सलें रवाना करने तक सब लोग दौड़ते-भागते नजर आते हैं। साठ साल पहले यह भागदौड़ आज की बनिस्बत दुगनी-तिगनी थी। नई तकनीकी के प्रयोग से पूर्वापेक्षा काम
Lalit Surjan
करना आसान जो हुआ है। इन दिनों देशबन्धु में जो छपाई मशीन है, उस पर एक बार में सोलह पेज एक साथ छप सकते हैं तथा उसकी गति एक घंटे में तीस हजार कॉपियां छापने की है। देश-विदेश के अनेक अखबारों में इससे भी अधिक क्षमता की मशीनों पर काम होता है। कई जगह तो ऐसी मशीनें भी हैं जो छपाई के बाद अखबार की पार्सल भी स्वचालित प्रक्रिया से बांध सकती हैं। मैं आपको उस दौर में ले जाना चाहता हूं जब फ्लैट बैड सिलिंडर मशीन पर मात्र एक हजार प्रति घंटा की गति से एक बार में सिर्फ दो पेज छापे जा सकते थे। याने आगे-पीछे चार पेज की एक हजार प्रतियां मुद्रित करने के लिए दो घंटे लगते थे। हमने कुछ समय तक वैसी ही एक और मशीन समानांतर स्थापित की ताकि इधर तरफ दो पृष्ठ मुद्रित हो जाने के बाद दूसरी तरफ के दो पेज लगभग साथ-साथ छापे जा सकें और समय की बचत हो।

गौर कीजिए कि आपके घर जो भी अखबार आता है, वह चौथाई मुड़े (क्वार्टर फोल्ड) आकार में आता है। शुरूआती दौर में अखबार की पूरी शीट को बीच से मोड़ना, फिर उसे आधा मोड़ना एक समयसाध्य और श्रमसाध्य कार्य था। अगर काम समय पर पूरा होना हो तो उसके लिए चपलता का गुण आवश्यक था। यह जिम्मेदारी फोल्डिंग विभाग के सहयोगियों पर होती थी। दो-दो करके चार पेज छपे, उन्हें लगातार मशीन की दूसरी ओर से उतार कर जमीन पर रखते जाओ, 22'' गुणा 33'' पूर्ण आकार के दो पन्नों की थप्पियां बनाओ, उन पर बीच में अंगूठे से सलवट बनाकर मोड़ो, एक-एक कर अलग करो, फिर एक बार बीच से मोड़ो और पेज के आधे आकार में लाओ। कहां, कितनी कॉपियों की पार्सल जाना है, उस हिसाब से अलग-अलग पार्सल बनाओ, उसे मोटे ब्राउन पेपर या न्यूजप्रिंट में पैक करो, ऊपर से सुतली या मोटे-मजबूत धागे (ट्वाइन) से बांध कर सुरक्षित करो और उसके ऊपर गंतव्य का लेबल चिपकाओ। इसके बाद स्टेशन और बस स्टैंड की ओर भागो।

इतना सब विवरण देने की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन पढ़कर आपने जान लिया होगा कि आप तक अखबार पहुंचाने में पत्र के फोल्डिंग विभाग की कितनी अहम भूमिका होती है। प्रेस के अन्य विभागों में दिनपाली और रातपाली में अदला-बदली कर काम करने की सुविधा होती है, लेकिन फोल्डिंग में तो सारा काम रातपाली में ही होता है। एक बंधी-बंधाई यंत्रवत् किंतु अनिवार्य ड्यूटी। इसी विभाग से संबंधित एक मजदार प्रसंग उसी शुरूआती दौर का है। एक रात 2-3 बजे बाबूजी आकस्मिक निरीक्षण के लिए प्रेस पहुंचे। सब सहकर्मी अपने काम में जुटे थे, लेकिन एक व्यक्ति चारों तरफ से बेखबर सो रहा था। बाबूजी आए हैं जान हड़बड़ा कर उठा या उठाया गया। बाबूजी नाराज हुए। काम के समय सो रहे हो। तुम्हारी छुट्टी। दिन में आकर हिसाब कर लेना। क्या नाम है तुम्हारा? साहब, नाम मत पूछिए। बाबूजी का पारा और चढ़ा। तुमसे नाम पूछ रहे हैं, नाम बताओ। धीमे स्वर में जो जवाब आया तो उसे सुनकर गुस्सा खत्म। बाबूजी के ओठों पर मुस्कुराहट आई। तुम नालायक हो। नाम मायाराम और ऐसी लापरवाही। ठीक है, काम करो, लेकिन आइंदा ऐसी गलती नहीं होना चाहिए।

जिस जगह सौ-दो सौ लोग काम करते हों, वहां ऐसे खट्टे-मीठे प्रसंग घटित होना अस्वाभाविक नहीं है। एक प्रसंग 1964 का है। रमनलाल सादानी प्रसार प्रबंधक थे। फोल्डिंग विभाग का प्रबंध उनके ही जिम्मे थे। बूढ़ापारा की भव्य सादानी बिल्डिंग उनके पिताजी रायसाहब नंदलाल सादानी ने बनवाई थी। उसी नाम पर सादानी चौक कहलाया। एक शाम एक सुंदर युवती रमन भैया (उन्हें मेरा यही संबोधन था) से मिलने आई। मुझे उनका परिचय दिया गया- ये सूसन हैं। अखबार के बंडल पर जो लेबल चिपकाते हैं, उन्हें इनसे लिखवाते हैं। तीस रुपए महीना देते हैं। इनकी सहायता हो जाती है। मैंने सुन लिया और मान लिया। कुछ दिन बाद देखा कि लेबल तो रमन भैया की लिखावट में हैं। पूछा भेद खुला कि देवीजी उनकी प्रेमिका हैं। किसी स्कूल में शिक्षिका हैं। मैंने उन्हें दिया जाने वाला मानदेय बंद करवा दिया। लेकिन बात यहां खत्म नहीं होती। रमन भैया ने कुछ साल बाद उनसे विधिवत विवाह किया और संतानों को अपना नाम दिया। रमन सादानी इकलौते पुत्र थे, बिंदास तबियत के थे, होशियार किंतु लापरवाह। जो भी हो, समय आने पर उन्होंने नैतिक दृढ़ता का परिचय दिया, यह बात मुझे अच्छी लगी। हमारे साथ संभवत: 1971-72 तक उन्होंने काम किया।

प्रसार विभाग से ही जुड़ा एक और रोचक प्रसंग ध्यान आ रहा है। यह मानी हुई बात है कि हर अखबार अपनी प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के उपक्रम करता है। इसमें अभिकर्ता या न्यूजपेपर एजेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आखिरकार, ग्राहक के दरवाजे तक वह स्वयं या उसका हॉकर ही जाता है। मुझे याद है कि 1967 में प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा दिल्ली में आयोजित प्रबंधन कार्यशाला में जब मैं भाग ले रहा था, तब दिल्ली की सेंट्रल न्यूज एजेंसी के प्रमुख कर्त्ताधर्ता श्री पुरी ने एक सत्र में हमें प्रसार संख्या में वृद्धि करने के गुर सिखाए थे। खैर, मैं जिस प्रसंग की चर्चा कर रहा हूं, वह इसके पहले का है। हमें ऐसा कुछ अनुमान हुआ कि रायपुर के कुछ अभिकर्त्तागण देशबन्धु की बिक्री बढ़ाने में खास दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। यह 1965 की बात है। उस समय होलाराम बुधवानी नामक एक सज्जन ने हमारी एजेंसी ली और प्रसार वृद्धि के बारे में तमाम वायदे किए। आवश्यक धरोहर निधि या कि एडवांस डिपॉजिट भी उन्होंने जमा की। उनमें व्यापार बुद्धि तो थी, लेकिन अखबार की एजेंसी चलाने के लिए जिस जीतोड़ मेहनत की आवश्यकता होती है, वह उनमें नहीं थी। असफल होकर उन्होंने कुछ ही माह में एजेंसी छोड़ दी।

बुधवानीजी करीब एक साल बाद फिर प्रेस आए। उनके चेहरे पर सफलता की चमक थी। कहां थे आप इतने दिन? कभी दिखाई तक नहीं दिए! पता चला कि वे इस बीच मॉरीशस हो आए। वहां उन्होंने व्यापार की संभावनाएं तलाशीं और शीघ्र ही भारत से समुद्री मार्ग से बड़े-बड़े ड्रमों में भरकर गंगाजल मॉरीशस को निर्यात करने लगे। वे गंगाजल कहां से भरते हैं, यह गुप्त जानकारी भी उन्होंने हम लोगों के साथ साझा की। गंगा मैया की कृपा से उनका व्यापार चल निकला। देशबन्धु की एजेंसी में जो घाटा हुआ था, उसकी भरपाई तो जल्दी ही हो गई थी।

इसी सिलसिले में पाठकों को अपने एक अभिनव प्रयोग की जानकारी देना उचित होगा। प्रेस में मेरे हमउम्र जितने साथी थे, सबने मिलकर स्कूल में पढ़ने वाले अपने छोटे भाईयों को जोड़ा। अनुज न्यूज एजेंसी नाम से एजेंसी बनाई। मेरे छोटे भाई दीपक, वरिष्ठ साथी शरद जैन के छोटे भाई अनिल और इस तरह लगभग एक दर्जन किशोरों की टीम तैयार हो गई। इन्होंने घर-घर जाकर ग्राहक बनाए। जिनके घर जाते वे परिचय जानकर प्रसन्न हो जाते। खुशी-खुशी ग्राहक बनते। इस तरह 1973-74 मेंं प्रसार संख्या में लगभग एक हजार प्रतियों का इजाफा हुआ जो उस वक्त के लिहाज से बड़ी उपलब्धि थी।
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#देशबन्धु में 23 जनवरी 2020 को प्रकाशित
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प्रस्तुति : डॉ शरद सिंह

रविवार, फ़रवरी 09, 2020

देशबन्धु के साठ साल- 26- ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की लेखमाला की छब्बीसवीं कड़ी....


देशबन्धु के साठ साल- 26
- ललित सुरजन
Lalit Surjan
आज से साठ साल पूर्व के उस समय की कल्पना कीजिए जब स्मार्टफोन नहीं था, वाट्स अप नहीं था; पी. सी., लैपटॉप, टैबलेट नहीं थे; इंटरनेट नहीं था; डाकघर तो काफी थे, लेकिन तारघरों की संख्या उतनी नहीं थी (अब तो तारघर बंद ही हो गए हैं); और टेलीफोन भी एक दुर्लभ सेवा थी। अब तनिक विचार करिए कि उस समय के अखबार, समाचारों का संकलन किस विधि से करते थे! देश-विदेश की खबरें देने के लिए एकमात्र समाचार एजेंसी थी-प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया याने पीटीआई। अखबार के संपादकीय कक्ष में एक कोने में पीटीआई का टेलीप्रिंटर लगा होता था, जो सुबह नौ बजे चालू होता था और रात बारह-एक बजे तक उस पर समाचार आते रहते थे। जब कोई खास खबर हो तो प्रिंटर पर सामान्य टिक-टिक के अलावा तेज आवाज में घंटी बजने लगती थी। पीटीआई पर संवाद प्रेषण की भाषा अंग्रेजी होती थी, इसलिए संपादकों को अंग्रेजी ज्ञान होना लगभग एक अनिवार्य शर्त थी। उसके बिना समाचार का अनुवाद कैसे होता? जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी, उनका जीवन प्रांतीय समाचार डेस्क पर ही बीत जाता था। अपवाद स्वरूप ऐसे पत्रकार भी होते थे, जो अपने सामान्य ज्ञान और सहजबुद्धि के बलबूते कामचलाऊ अनुवाद कर लेते थे।

पीटीआई की सेवा भी सहज उपलब्ध नहीं थी। हमारे अखबार का जब प्रकाशन शुरू हुआ तो तकनीकी कारणों से प्रिंटर लगते-लगते छह माह बीत गए। इस दौरान आकाशवाणी से समाचार लेना ही एकमात्र उपाय था। 1963 में जब बाबूजी ने जबलपुर समाचार का प्रकाशन हाथ में लिया, तब भी यही मुश्किल पेश आई। हम लोग तब सुबह-दोपहर-शाम आकाशवाणी पर समाचार सुनते और द्रुत गति से उसे लिखते जाते। देवकीनंदन पांडेय, विनोद कश्यप, इंदु वाही आदि उस दौर के सुपरिचित समाचार वाचक थे। हममें से जिनके कान अंग्रेजी सुनने के अभ्यस्त थे, वे अंग्रेजी की बुलेटिन भी सुन लेते थे। इन दिनों संघ परिवार ने भी हिंदुस्तान समाचार नामक एक समाचार एजेंसी प्रारंभ की, लेकिन उसके समाचार डाक से ही भेजे जाते थे। पीटीआई के मुकाबले एक नई सेवा यूएनआई (यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया) के नाम से 1968-69 में प्रारंभ हुई। वरिष्ठ पत्रकार जीडी मीरचंदानी इसके महाप्रबंधक व मुख्य संपादक थे। उनके आग्रह पर हमने शायद 1972 या 73 में पीटीआई बंद कर यूएनआई की सेवाएं ले लीं। रायपुर में हम अकेले ग्राहक थे तो उन्होंने अलग से दफ्तर नहीं खोला। नहरपारा के प्रेस में प्रिंटर लगा दिया गया। दिल्ली से एक युवा तकनीशियन सुधीर डोगरा को यूएनआई ने रायपुर भेज दिया, ताकि मशीन का रख-रखाव होता रहे। हंसमुख, मिलनसार और काम में मुस्तैद सुधीर कुछ ही समय में हमारे परिवार के सदस्य जैसे बन गए और वह आत्मीयता आज तक कायम है।

यह तो बात हुई देश-विदेश की खबरों की। प्रकाशन स्थल अर्थात रायपुर के समाचार लाने के लिए नगर संवाददाताओं की टीम होना ही थी। मुझे अगर ठीक याद आता है तो ''द स्टेट्समैन'' व ''हितवाद'' के संवाददाता मेघनाद बोधनकर के सिवाय किसी अन्य रिपोर्टर के पास स्कूटर या बाइक नहीं थी। हम सब साइकिल पर चलते थे। शारीरिक श्रम करने का अभ्यास था। भागते-दौड़ते काम करना दैनंदिन जीवन का अंग था। फिर शहर आज जैसा फैला हुआ भी नहीं था। पश्चिम में साइंस कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज; दक्षिण में टिकरापारा; उत्तर में फाफाडीह रेलवे क्रासिंग; और पूर्व में कृषि महाविद्यालय। रेलवे स्टेशन बहुत दूर नहीं था, बस स्टैंड शहर के बीचोंबीच था; आयुक्त, जिलाधीश, पुलिस अधीक्षक कार्यालय; अस्पताल, सर्किट हाउस, जनसंपर्क विभाग, सब पास-पास ही थे। कहीं से खबर मिलने की संभावना बनी तो साइकिल उठाई और दस-पंद्रह मिनट में वहां पहुंच गए। उन दिनों भी प्रेस विज्ञप्तियां आती थीं, लेकिन वे अधिकतर सूचनात्मक होती थीं। आज की तरह रेडीमेड खबरें छापने का चलन नहीं था।

रायपुर के बाहर के केंद्रों से अखबार के दफ्तर तक समाचार पहुंचाना अपेक्षाकृत समयसाध्य और कष्टसाध्य था। जशपुर हो या अंबिकापुर, जगदलपुर हो या कवर्धा, अमूमन समाचार डाक से ही भेजे जाते थे। उन दिनों डाकघर में तीन दिन में तीन बार डाक छंटाई और वितरण की व्यवस्था थी। संवाददाताओं के भेजे हुए लिफाफे काफी कुछ तो अगले दिन मिल जाते थे, लेकिन बरसात के समय इसमें विलंब हो जाना स्वाभाविक था। फिर भी आज की खबर कल भेजी, परसों मिलीं, नरसों छपी-इस तरह एक खबर के छपने में तीन दिन लग जाना सामान्य बात थी। बहुत आवश्यक, तत्काल छपने लायक समाचार हुआ तो संवाददाता टेलीफोन का सहारा लेते थे, या तार भेजते थे। किंतु सब जगह न तो फोन थे और न तार की व्यवस्था। एक और विकल्प था- रेलवे स्टेशन अथवा बस स्टैंड पर रायपुर जा रहे किसी परिचित को खोजकर उसके हाथ में लिफाफा थमा देना- भैया, प्रेस तक पहुंचा देना। परिचित जन सहयोग देने में कोताही नहीं करते थे। फिर एक नई तरकीब निकाली, रायपुर बस स्टैंड पर हमने अपना मेल बॉक्स लगा दिया; ड्राइवर, कंडक्टर या परिचित यात्री रायपुर उतरकर उसमें खबरों का लिफाफा डाल देते। नियत समय पर कोई प्रेसकर्मी ऐसी डाक लेकर आ जाता।

उन दिनों देशबन्धु सहित सभी अखबारों में एक और प्रथा थी। अखबार के शीर्षक सहित संवादपत्र और साथ में अपना पता लिखे, डाकटिकिट लगे लिफाफे छापकर संवाददाताओं को देते थे। संवाददाता माह-दो माह में रायपुर आते तो संवादपत्र व लिफाफों का बंडल लेकर वापिस लौटते या फिर खबर आती कि स्टॉक समाप्त हो गया है, तब पेपर की पार्सल में उन्हें नया स्टॉक भेजा जाता था। संपादकीय कक्ष में हम लोग समाचार बनाने के लिए या तो न्यूजप्रिंट काटकर बनाए गए लगभग ए-4 आकार के पन्नों का या फिर अमेरिकी, सोवियत अथवा ब्रिटिश सूचना कार्यालय से आए लेखों के पृष्ठभाग का इस्तेमाल करते थे। सोवियत सूचना केंद्र से सामग्री चिकने कागज पर आती थी, जो हमारी पहली पसंद होती थी। कुछ साथी तो बच्चों के उपयोग के लिए रफ कॉपी बनाने भी ये कागज घर ले जाते थे।

एक तरफ संवाद संकलन की यह तस्वीर थी तो दूसरी तरफ मुद्रित समाचार पत्र को जगह-जगह तक पहुंचाना कम दिलचस्प नहीं था। लगभग सभी अखबार रेल या बस से गंतव्य तक भेजे जाते थे। रायपुर से रात 10 बजे हावड़ा एक्सप्रेस से रायगढ़ की पार्सल रवाना की जाती। उसी के भीतर घरघोड़ा, धर्मजयगढ़, पत्थलगांव, कुनकुरी, जशपुर तथा सीतापुर, अंबिकापुर की छोटी पार्सलें रखी जाती थीं। यह रायगढ़ के एजेंट की जवाबदेही थी कि तीन बजे स्टेशन पहुंचकर पार्सल उतरवाएं, उसमें से आगे पार्सल निकालें और चार बजे सीधे रेलवे स्टेशन से ही जशपुर और अंबिकापुर जाने वाली बसों में उन्हें चढ़ाएं। सुनने में आसान, लेकिन व्यवहार में कठिन। कभी प्रेस से ही पार्सल स्टेशन पहुंचाने में देर हो गई, कभी ट्रेन लेट हो गई, कभी एजेंट रायगढ़ स्टेशन समय पर नहीं पहुंचा। सब कुछ समय से चला तो आज रात दस बजे रवाना की गई पार्सल अगले दिन अपरान्ह तीन बजे जशपुर पहुंचेगी। वहां पेपर वितरित करते-करते शाम हो जाएगी। अगर किसी भी बिंदु पर विलंब हुआ, मान लीजिए रास्ते में बस ही बिगड़ गई, तो पेपर फिर एक दिन बाद ही बंटेगा। हम रेलवे से भेजे जाने वाली पार्सलों का एक मुद्रित फार्म रखते थे- जिसमें गंतव्य और वजन का उल्लेख करना होता था। एक कॉपी रेलवे के पार्सल ऑफिस को, एक अपने रिकॉर्ड में।

इसी तरह अनेक स्थानों पर बस से पार्सलें भेजी जातीं। यहां भी एजेंट को नियत समय पर बस स्टैंड आना होता था। दुर्ग, राजनादगांव, जगदलपुर, कांकेर की पार्सलों के भीतर आसपास के छोटे केंद्रों की पार्सलें आगे भेजने की जिम्मेदारी उन पर होती थी। देर-अबेर होती ही थी। हमें एक प्रतिस्पर्द्धी समाचार पत्र से हमेशा सतर्क रहना पड़ता था। उन्हें मौका मिलता तो रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से वे हमारी पार्सल चोरी करवा लेते थे। संभवत: 1970 में सबसे पहले हमने सड़क मार्ग से भेजी जाने वाली पार्सलों के लिए राजनादगांव मार्ग पर बस के बजाय टैक्सी की व्यवस्था की। यह टैक्सी कांग्रेस के दो युवा कार्यकर्ताओं ने साझीदारी में खरीदी थी। वे दोनों आज प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। कभी ड्राइवर नहीं आया तो दफ्तर से फोन पर सूचना मिलने पर मैं या मेरे अनुज दिनेश अपनी कार से महोबाबाजार, टाटीबंद, कुम्हारी, चरौदा, भिलाई-3, भिलाई, सुपेला, सेक्टर- 4, दुर्ग, सोमनी में पार्सल उतारते हुए राजनादगांव तक जाते थे।
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#देशबंधु में 16 जनवरी 2020 को प्रकाशित
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प्रस्तुति : डॉ शरद सिंह

देशबन्धु के साठ साल-25 - ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की लेखमाला की  पच्चीसवीं कड़ी....


देशबन्धु के साठ साल-25
 - ललित सुरजन
Lalit Surjan
आप इतना तो जानते हैं कि अखबार छापने के लिए न्यूजप्रिंट या कि अखबारी कागज का इस्तेमाल होता है। आपको इसके आगे शायद यह जानने में भी दिलचस्पी हो कि हम यह बुनियादी कच्चा माल कहां से और कैसे हासिल करते हैं। एक समय था जब देश के समाचारपत्र उद्योग की आवश्यकता का शत-प्रतिशत न्यूजप्रिंट सुदूर कनाडा से आयात किया जाता है। साठ के दशक के अंत-अंत में स्वीडन, फिनलैंड, नार्वे, सोवियत संघ से भी अखबारी कागज आने लगा। गौर कीजिए कि ये सारे देश उत्तरी गोलार्द्ध में हैं। हिमप्रदेशों में ऊंचाई पर पाए जाने वाले गगनचुंबी वृक्षों की लुगदी से ही न्यूजप्रिंट का उत्पादन किया जाता था। भारत में हजारों मील दूर से न्यूजप्रिंट लाने के रास्ते में कुछ व्यवहारिक अड़चने थीं। सबसे बड़ी दिक्कत विदेशी मुद्रा की थी। हमारे देश में आजादी मिलने के बाद से कई दशक तक निर्यात से कोई खास आय नहीं थी और जो भी विदेशी मुद्रा भंडार था, उसका उपयोग खाद्यान्न, पेट्रोल, आयुध सामग्री आदि विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्राथमिकता के आधार पर करना होता था। समाचारपत्रों को न्यूजप्रिंट मिल सके, इस दिशा में भी सरकार का रुख सकारात्मक था, लेकिन उसके लिए कुछ बंदिशें लागू थीं।

हमें न्यूजप्रिट आयात करने के लिए केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय में आयात-निर्यात महानिदेशक के कार्यालय से वास्तविक उपभोक्ता (एक्चुअल यूजर या ए.यू) लाइसेंस हासिल करना होता था। भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक (आर.एन.आई.) अखबार की प्रसार संख्या प्रमाणित करते थे, उसी आधार पर ए.यू. लाइसेंस जारी होता था। यह लाइसेंस हम बंबई (अब मुंबई) में किसी आयात-निर्यात एजेंट (क्लीयरिंग एंड फॉरवर्डिंग फर्म)को दे देते थे। वे हमारी ओर से कनाडा या किसी अन्य देश को न्यूजप्रिट उत्पादक कंपनी को ऑर्डर देते, उसके लिए बैंक से विदेशी मुद्रा भुगतान की व्यवस्था करते, जहाज आ जाने पर माल उतारने और मालगाड़ी में चढ़ाकर हम तक भेजने का सारा प्रबंध करते थे। इसके लिए हम उन्हें एक निर्धारित कमीशन देते थे। अब देखिए कि फैक्टरी से कागज रवाना होते समय उसकी जितनी कीमत होती थी, लगभग उतनी ही राशि समुद्री जहाज के भाड़े में लग जाती थी। उसके बाद कमीशन और उस पर रेलभाड़ा। कुल मिलाकर पाठकों तक अखबार पहुंचाना सस्ता सौदा नहीं था। वह आज भी नहीं है।

बहरहाल, कनाडा से चलकर रायपुर तक न्यूजप्रिट आने की लंबी प्रक्रिया में कई बार अप्रत्याशित परेशानियां सामने आ जाती थीं। एक बार ऐसा हुआ कि बंबई डॉकयार्ड (बंदरगाह) से चली वैगन लगभग बीस दिन बाद भी रायपुर नहीं पहुंची। यहां हमारे गोदाम में रखा स्टॉक खत्म होते जा रहा था। तब हमने पहले तो भिलाई के पास चरौदा मार्शलिंग यार्ड में पता किया कि हमारी वैगन वाली मालगाड़ी कहीं वहां आकर तो नहीं खड़ी है। फिर बाबूजी ने राजू दा को वैगन खोज मिशन पर रवाना किया। नागपुर में पता किया तो वहां वैगन पहुंची ही नहीं थी। दा वहां से भुसावल गए। पता चला कि भुसावल के यार्ड में''सिक लाइन'' पर किसी कारण से वैगन कई दिन से खड़ी हुई है। वहां से वैगन को निकलवाया, रायपुर की तरफ आ रही किसी मालगाड़ी में उसे जोड़ा, और खुद गार्ड के डिब्बे में साथ बैठकर आए। दूसरे-तीसरे दिन ले-देकर वैगन रायपुर पहुंची। उस दिन अगर वैगन न आती तो अगले दिन अखबार छप नहीं सकता था, क्योंकि गोदाम में कागज बचा ही नहीं था।

एक बार और कुछ ऐसी ही स्थिति बनी, जब कलकत्ता से रवाना हुई वैगन राउरकेला के पास बंड़ामुंडा यार्ड में अकारण कुछ दिन रोक दी गई। खैर, बंबई में हमारे दो क्लीयरिंग एजेंटों से संबंध बन गए थे। एक थी इंडियन गुड्स सप्लाइंग कं., जिसके मालिक दो शाह बंधु थे। दूसरे थे- अब्दुल्ला भाई फिदाअली एंड कंपनी। इन दोनों ने लंबे अरसे तक हमारे लिए न्यूजप्रिंट आयात का काम किया। दूसरी फर्म के फिदाहुसैन सेठ ने तो वक्त-बेवक्त हमारी और भी मदद की। जैसे मोनोटाइप मशीनें खरीदने के लिए बैंक में मार्जिन मनी जमा करना थी। उनसे रकम उधार ली कि न्यूजप्रिंट की अगली खेप के बिल में इसे जोड़ लेना। 1986 में जब बाबूजी बंबई में अस्थिरोग विशेषज्ञ डॉ. ए.बी. बावड़ेकर के अस्पताल में बारह दिन भर्ती थे तो उनका बिल चुकाने की प्रत्याशा में मैं इन्हीं दोनों एजेंसियों में गया और उनसे रुपए लेकर आया। यह एक मार्मिक प्रसंग है कि डॉ. बावड़ेकर ने पहली बार का परिचय होने के बावजूद बाबूजी के इलाज की फीस और अन्य खर्चे लेने से इंकार कर दिया। उनका ''विद कांप्लीमेंट्स'' (शुभकामनाओं सहित) का मात्र पांच हजार रुपए का बिल आज भी मेरे कागजातों में सुरक्षित रखा है।

बहरहाल, पं. नेहरू के कार्यकाल में ही भारत में न्यूजप्रिंट उत्पादन की योजना पर काम प्रारंभ हो गया था। बिड़ला घराने को अमलाई पेपर कारखाने का लाइसेंस इस शर्त पर दिया गया था कि वे पचास प्रतिशत न्यूजप्रिंट और पचास प्रतिशत व्हाइट पेपर या दूसरा कागज बनाएंगे। उन्होंने किसी तरकीब से इस शर्त को निरस्त कर शत-प्रतिशत व्हाइट पेपर बनाने की अनुमति हासिल कर ली। इस कारखाने में मध्यप्रदेश के जंगलों में प्रचुरता से होने वाले बांस की लुगदी से कागज का उत्पादन होना था। लगभग इसी समय बुरहानपुर के पास नेपानगर में सार्वजनिक उपक्रम के रूप में न्यूजप्रिंट कारखाने की स्थापना की गई। नेपा में बांस की लुगदी से बने कागज में वह गुणवत्ता नहीं थी, जो आयातित न्यूजप्रिंट में थी। कनाडा का कागज सफेद झक्क होता था, आसानी से फटता नहीं था, और वजन में भी अपेक्षाकृत हल्का था। इसलिए अधिकतर अखबार नेपा से कागज खरीदने से कतराते थे। लेकिन विदेशी मुद्रा की पर्याप्त उपलब्धता न होने के कारण कुछ मात्रा में तो कागज लेना ही पड़ता था।
रुपए के अवमूल्यन व विदेशी मुद्रा के गहराते संकट के कारण भी समाचारपत्र संस्थान नेपा की ओर प्रवृत्त हुए। नेपा ने अपने उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ाने के प्रयत्न भी जारी रखे। एक समय तो यह स्थिति आई कि नेपानगर में कारखाने के बाहर ट्रकों की कई-कई दिनों तक कतारें लगने लगीं। आपूर्ति कम, मांग अधिक। इसी बीच भारत सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र में तमिलनाडु पेपर मिल्स, मैसूर पेपर मिल्स एवं केरल में हिंदुस्तान पेपर मिल्स की स्थापना की। इनमें विदेशों से आयातित लुगदी से कागज बनाने के संयंत्र लगाए गए। बंबई, कलकत्ता या नेपा के मुकाबले इन सुदूर स्थानों से न्यूजप्रिंट खरीदना महंगा पड़ता था, लेकिन देश में अखबारों की संख्या बढ़ रही थी, पेजों की संख्या बढ़ रही थी और प्रसार संख्या भी बढ़ रही थी; तब जहां से, जैसे भी, जिस दाम पर भी, कागज मिले खरीदना ही था। जिन अखबार मालिकों के अपने दूसरे व्यवसाय थे, उन्हें कोई अड़चन नहीं थी। लेकिन मुश्किल देशबन्धु जैसे पत्रों के सामने थी, जिनके पास आय के अन्य स्रोत नहीं थे।

समाचारपत्र उद्योग पर पूंजीपतियों का वर्चस्व स्थापित होने की यह एक तरह से शुरुआत थी। यदि हम अपनी जगह पर टिके रह सके तो इसकी एक वजह थी कि विगत दो-ढाई दशकों में पुराने न्यूजप्रिंट को रिसाइकिल करने की प्रविधि विकसित हो जाने से न्यूजप्रिंट के अनेक नए कारखाने खुल गए हैं। अब न्यूजप्रिंट अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध हो जाता है। यद्यपि आयातित न्यूजप्रिंट अथवा नेपानगर की गुणवत्ता उसमें नहीं है। आप जब इनामी योजनाओं के लालच में अखबार के ग्राहक बनते हैं, तब याद रखिए कि पूरी कीमत देकर अखबार खरीदने की आपको अनिच्छा भी कहीं न कहीं निष्पक्ष, निर्भीक पत्रकारिता का मार्ग अवरुद्ध करती है।
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#देशबंधु में 09 जनवरी 2020 को प्रकाशित
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प्रस्तुति : डॉ शरद सिंह

रविवार, फ़रवरी 02, 2020

देशबन्धु के साठ साल- 24- ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की लेखमाला की  चौबीसवीं कड़ी....


देशबन्धु के साठ साल- 24
- ललित सुरजन

Lalit Surjan
आज नए साल का दूसरा दिन है। अपने तमाम पाठकों को शुभकामनाएं देते हुए मेरा ध्यान फिर उन सारे व्यक्तियों की ओर जाता है, जिनके सद्भाव और सहयोग के बल पर देशबन्धु की यात्रा जारी है। पिछली किश्तों में और ऐसे कुछ शुभचिंतकों से आपका परिचय हो चुका है, लेकिन यह एक लंबी सूची है जिसे मैं अपनी गति से पूरी करने की कोशिश में लगा हूं। आज सबसे पहले देशपांडे चाचा का नाम स्मृति पटल पर दस्तक दे रहा है।
एम.एन. देशपांडे वर्धा के वाणिज्य महाविद्यालय में बाबूजी से एक साल आगे थे। हम जब रायपुर आए, लगभग उसी समय वे भी इस प्रदेश के पहले चार्टर्ड एकाउंटेंट (सी.ए.) के रूप में अपना कार्यालय खोलने यहां आ गए थे। एक व्यापारिक उपक्रम होने के कारण अखबार को अपने लेखा प्रमाणित करने के लिए सी.ए. की आवश्यकता होना ही थी। विशेषकर इसलिए भी कि समाचारपत्रों की प्रसार संख्या प्रमाणित करने वाली संस्था एबीसी (ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन) की सदस्यता के लिए भी एक आंतरिक लेखा परीक्षक (इंटरनल ऑडीटर) नियुक्त करना अनिवार्य शर्त थी। एबीसी द्वारा प्रसार संख्या प्रमाणित होने पर राष्ट्रीय स्तर पर विज्ञापन मिलना सहज हो जाता था। उस प्रक्रिया की बारीकियां जानने में पाठकों को शायद दिलचस्पी न होगी। हमने काफी बाद में एबीसी की सदस्यता क्यों त्याग दी, वह किस्सा अवश्य कभी लिखूंगा।

बहरहाल, पुराने मध्यप्रदेश (सीपी एंड बरार) की प्रतिष्ठित ऑडिट फर्म के.के. मानकेश्वर एंड कंपनी की शाखा स्थापित करने उसके भागीदार देशपांडेजी रायपुर आए थे। उनकी फर्म को न सिर्फ देशबन्धु, बल्कि अन्य पत्रों ने भी ऑडिट का काम सौंपा। देशपांडे चाचा और बाबूजी दोनों राजनैतिक विचार से विपरीत ध्रुव पर थे, लेकिन इसका कोई प्रभाव न तो व्यवसायिक संबंधों पर पड़ा और न पारिवारिक मैत्री पर। चाचा भी पुस्तक व्यसनी थे तथा दोनों मित्रों के बीच पुस्तकों का विनिमय व उन पर जीवंत चर्चाएं होती थीं, जिनमें यदा-कदा भाग लेने का अवसर मुझे भी मिला। देशपांडेजी का बाबूजी पर पूरा विश्वास था और हमारे यहां से जो लेखा तैयार होता था, उसे सरसरी निगाह से देखकर ही वे उसे पास कर देते थे। एबीसी की ओर से हर तीन साल में आंतरिक लेखापाल द्वारा जारी प्रमाण पत्र का पुनर्परीक्षण करवाने का नियम था। उसमें भी कभी देशपांडेजी द्वारा प्रमाणित लेखा में त्रुटि नहीं पाई गई। वर्तमान समय में जब ऐसा परस्पर विश्वास और स्नेह दुर्लभ हो चुका है, इस मित्रता को रेखांकित किया जाना किसी दृष्टि से प्रासंगिक हो सकता है। मुझे प्रसन्नता है कि चाचा के सुयोग्य सुपुत्र किशोर देशपांडे ने अपनी संस्था की प्रामाणिकता और अपने संबंधों की ऊष्मा को बरकरार रखा है।

मैंने पिछली किश्तों में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का उल्लेख किया है। एक समय एन.एस.एस. राव रायपुर शाखा में मुख्य प्रबंधक नियुक्त होकर आए। आगे चलकर वे बैंक के सर्वोच्च पद महाप्रबंधक तक पहुंचे। एक दिन बाबूजी रायपुर में नहीं थे। बैंक खाता उनके ही हस्ताक्षर से चलता था। हमें किसी को चेक जारी करना था, लेकिन बाबूजी के दस्तखत बिना काम कैसे चले? मैं बैंक गया। राव साहब को समस्या बताई। उन्होंने मुझसे चेक पर दस्तखत करने कहा, उसे अपने दस्तखत और सील से प्रमाणित किया। बाबूजी लौटकर आए तो उन्हें उलाहना देते हुए सलाह दी- ललित काम संभालने लगा है। उसे आप हस्ताक्षर करने का अधिकार क्यों नहीं देते। यह तो एक छोटा प्रसंग है, लेकिन देशबन्धु के वित्तीय प्रबंधन में राव साहब की सलाह और सहयोग आगे भी बहुत काम आए। सेंट्रल बैंक में जी.डी. मनचंदा, एच.एल. बजाज, बृजगोपाल व्यास, एस.एस. पंड्या, एम. रहमान, श्रीधर उन्हेलकर, जयकिशन भट्टर 'भगतजी', जी.पी. शुक्ला आदि अनेक अधिकारियों ने हमारी नेकनीयत पर विश्वास कायम रखा और समय-समय पर हमारे मददगार सिद्ध हुए। इन सबके बारे में लिखूं तो एक अलग पुस्तक बन जाए।

यूं तो सेंट्रल बैंक ही हमारा मुख्य बैंक था, लेकिन बीच-बीच में आवश्यकता पड़ने पर अन्य बैंकों के साथ भी हमने संबंध बनाए। इनमें इलाहाबाद बैंक से जुड़ा एक प्रसंग खासा दिलचस्प है। हमने मालवीय रोड स्थित शाखा में खाता तो खोल लिया था, किंतु लेन-देन कुछ विशेष नहीं था। उन दिनों नहरपारा स्थित प्रेस से शाम के समय बाबूजी पैदल नगर भ्रमण करते हुए घर पहुंचते थे। एक शाम शाखा प्रबंधक गणेश प्रसाद लाल ने बैंक की बाल्कनी से बाबूजी को पैदल जाते हुए देखा। साथ में खड़े गोडाऊन कीपर राजेंद्र तिवारी से उन्होंने कहा- अखबार के मालिक हैं, लेकिन इतनी सादगी का जीवन है! वे बाबूजी से बहुत प्रभावित हुए और अपने अधिकार क्षेत्र में रहकर हमारी जितनी सहायता कर सकते थे, उतनी की। उनके बाद शब्दस्वरूप श्रीवास्तव मैनेजर बनकर आए तो उन्होंने भी देशबन्धु को सहयोग देने में कोई कमी नहीं की। नेशनल हेराल्ड से जो छपाई मशीन हमने खरीदी थी, उसके लिए ऋण श्रीवास्तवजी के प्रयत्नों से ही मिला। इन प्रसंगों में नोट करने लायक बात यही है कि आज से चालीस-पचास साल पहले बैंक और ग्राहकों के रिश्ते किस तरह से बनते और निभते थे। वर्तमान में जब बैकों की डूबत रकम सारे कागज-पत्तर दुरुस्त होने के बावजूद अरबों-खरबों में पहुंच गई है, तब क्या ये उदाहरण कहीं दिशा संकेतक का काम कर सकते हैं?

व्यवसायिक बैंक ही नहीं, देसी बैंकर्स और गैर-औपचारिक तौर पर लेन-देन करने में भी हमें तरह-तरह के अनुभव हासिल हुए। रायपुर के जवाहर बाजार में देसी बैंकर्स के अनेक प्रतिष्ठान थे, जहां अमूमन नब्बे दिन की दर्शनी हुंडी पर ब्याज का कारोबार चलता था। इनके साथ लेन-देन में सामान्यत: कोई मुरव्वत या छूट की गुंजाइश नहीं होती थी। लेकिन लखमीचंद परमानंद फर्म के वरिष्ठ पार्टनर परमानंद भाई छाबड़िया एक अपवाद थे। वे बाबूजी के प्रति गहरा सम्मान भाव रखते थे और हमें आवश्यकता पड़ने पर यथासंभव सहयोग करते थे। 1994 में बाबूजी के निधन के बाद के बेहद कठिन दिनों में उन्होंने सीमा से परे जाकर हमारी जो मदद की, उसे मैं नहीं भुला सकता। उन्होंने अपना निजी कारोबार काफी समेट लिया था लेकिन वे अपनी गारंटी पर दूसरे महाजनों से हमें ऋण दिलवा देते थे।
परमानंद भाई मुझसे कहते भी थे- आपके बाबूजी जैसे सज्जन मैंने और नहीं देखे। सन् 2000 में जब मैंने आजीवन ग्राहक योजना पुन: प्रारंभ की तो वे मुझे अपने तमाम परिचितों के यहां ले गए और उन्हें ग्राहक बनवा दिया। उनके उपकारी स्वभाव के कारण किसी ने भी मना नहीं किया। उसी बीच मैं बीमार पड़ा तो एक दिन वे थोक फल मार्केट से चुनिंदा फलों का पिटारा लेकर दूसरी मंजिल चढ़कर मेरे घर आ गए। ऐसे उम्दा फल रायपुर में हमने न पहले और न बाद में कभी चखे। दुर्भाग्यवश कुछ वर्ष पूर्व उनकी असमय मृत्यु हो गई और मुझे एक सच्चे शुभचिंतक के साथ से वंचित होना पड़ा।

आज की कड़ी बृजगोपाल व्यास से जुड़े दो छोटे-छोटे प्रसंगों के जिक्र के साथ समाप्त होगी। श्री व्यास बूढ़ापारा में हमारे पड़ोसी थे। उनके अनुज प्रख्यात भजनगायक रविशंकर मेरे सहपाठी थे। इसलिए व्यासजी को मैं भैया का संबोधन देता था। वे सेंट्रल बैंक में मैनेजर थे। एक दिन ऐसा हुआ कि मैं एक शवयात्रा में शरीक होने के बाद सीधा बैंक पहुंचा। वह मेरे जीवन में शवयात्रा का पहला अनुभव था। मन विचलित था। व्यासजी ने ओवरड्राफ्ट देने से मना कर दिया तो उसी मनोदशा में उन्हीं के सामने चेक फाड़कर प्रेस आ गया। लेकिन आज का काम कैसे होगा, यह चिंता बनी हुई थी। इतने में स्वयं व्यासजी का फोन आ गया- तुम्हारा काम कर रहा हूं। नया चेक लेकर आओ। फिर डांट पड़ी- तुम क्या समझते हो; मुझे भी ऊपर जवाब देना पड़ता है; ''नैस्टी लैटर'' आते हैं। खैर, काम बन गया। एक शाम बैंक बंद होने के समय तक मैं उनके साथ बैठा था। उनके कक्ष में एक पांच फीट ऊंची दीवार का पार्टीशन कर दूसरी ओर रिकॉर्ड रूम था। चलने का समय हुआ तो व्यासजी ने पार्टीशन वाले दरवाजे पर ताला लगाया। मैंने विस्मय से पूछा- ताला क्यों? आपकी टेबल पर चढ़कर कोई भी पार्टीशन फांदकर उस ओर जा सकता है। उनका सारगर्भित उत्तर था- ''ताला साहूकार के लिए होता है, चोर के लिए नहीं।''
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#देशबंधु में 02 जनवरी 2020 को प्रकाशित
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प्रस्तुति : डॉ शरद सिंह

गुरुवार, जनवरी 30, 2020

देशबन्धु के साठ साल-23- ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की लेखमाला की  तेईसवीं कड़ी....


देशबन्धु के साठ साल-23
- ललित सुरजन

Lalit Surjan
आनंद भाटे रौबीले व्यक्तित्व के धनी थे। ऊंची पूरी कद-काठी। छह फुट से ऊपर के रहे होंगे। शुभ्र खादी का कुरता-पायजामा उन पर फबता था। प्रेस बूढ़ापारा में था तो उन्होंने भी पास में ही कहीं किराए पर घर ले लिया था। सड़क पर निकलते तो बारहां लोग उन्हें राजनीति के मशहूर शुक्ल बंधुओं का ही भाई समझने की गलती कर बैठते थे। भाटेजी पहले जबलपुर में बाबूजी के पास थे। फिर यहां-वहां घूमते-घामते शायद 1965 में रायपुर आ गए थे। हिंदी और अंग्रेजी पर उनका समान अधिकार था। उनकी दोनों में टाइपिंग भी बढ़िया थी। पत्र लेखन की कला थी। इन्हीं गुणों के कारण बाबूजी ने उन्हें विज्ञापन प्रबंधक नियुक्त किया था। यदा-कदा वे बंबई व्यवसायिक दौरे पर भी जाते थे। बस, उनके जीवन में एक कमी थी कि वे नितांत अकेले थे। बाबूजी से कुछ ही बरस छोटे रहे होंगे, लेकिन विवाह नहीं किया था। रायपुर आए तो एक भोजनालय में मासिक ग्राहकी का अग्रिम शुल्क देकर सदस्य बन गए। फिर ऐसा हुआ कि अगले माह भोजनालय ने उनकी सदस्यता का नवीनीकरण करने से हाथ जोड़ लिए। तू नहीं और सही की तर्ज पर वे माह-दर-माह भोजनालय बदलते रहे। दरअसल, बात यह थी कि भाटेजी को क्षुधा तृप्ति के लिए जिस मात्रा में भोजन की आवश्यकता थी, वह तीन-चार ग्राहकों के बराबर होती थी। अग्रिम राशि ले ली तो एक माह सेवा करना मजबूरी थी, लेकिन उसके आगे नहीं। साल-डेढ़ साल बाद भाटेजी ने विवाह कर लिया और नागपुर से नवविवाहिता को साथ लेकर आ गए। उसके आगे न जाने क्या हुआ कि एक के बाद एक दोनों रायपुर छोड़कर चले गए। हमें बाद में उनकी कोई खोज-खबर नहीं मिली। देशबन्धु के साठ साल के इतिहास का यह एक व्यक्तिपरक लेकिन रोचक अध्याय है।

आज कुछ ऐसी ही हल्के-फुल्के प्रसंग ध्यान आ रहे हैं। एक किस्सा राजनादगांव का है। यह साठ के दशक की बात है जब प्रदेश में रायपुर ही एकमात्र प्रकाशन केंद्र था और यहां से चार दैनिक समाचारपत्र प्रकाशित होते थे। स्वाभाविक है कि प्रदेश में अखबार जहां तक पहुंचते हों, वहां हर पत्र का अपना एक संवाददाता हो। इन दूरस्थ केंद्रों में पत्रकारों के बीच समाचार संकलन के लिए होड़ हो, स्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा हो, यह भी स्वाभाविक अपेक्षा होती थी। लेकिन प्रदेश की संस्कारधानी के रूप में ख्यातिप्राप्त राजनादगांव इस मामले में एक अपवाद था। देशबन्धु (तब नई दुनिया रायपुर) में रानूलाल झाबक, नवभारत में मातादीन अग्रवाल, महाकौशल में दुलीचंद बरड़िया व युगधर्म में रामेश्वर जोशी क्रमश: कार्यरत थे। ये सभी मृदुभाषी, मिलनसार, व्यवहारकुशल सज्जन थे। खैर, यह मेरी ड्यूटी का अंग था कि सभी अखबारों का नितदिन तुलनात्मक अध्ययन करूं। इस प्रक्रिया में मैंने गौर किया कि राजनादगांव के समाचार चारों पत्रों में हू-ब-हू छपते हैं। मैंने झाबकजी से पूछा तो पता चला कि चारों मित्र एक साथ बैठकर समाचार तैयार करते हैं। लेखन का काम शायद जोशीजी सम्हालते थे। बाकी तीनों के अपने छोटे-बड़े व्यापार भी थे। एक ने लिखा, अन्य ने अपनी लिखावट में प्रतिलिपि तैयार की और लिफाफा रायपुर भेज दिया। मुझे मजबूरन आदर्श मैत्री संबंध को तोड़ने के अपराध का भागी बनना पड़ा। हमने नए संवाददाता की नियुक्ति की लेकिन अन्य पत्रों में यह सिलसिला कुछ और वर्षों तक चलता रहा। आज पचपन साल बाद हम फिर शायद उसी दौर में लौट आए हैं; बल्कि जो रिवाज़ सिर्फ एक केंद्र तक सीमित था, वह चारों तरफ फैल गया है। यह आज का व्यापक चलन है कि गांव में कोई एक पत्रकार, या शायद कंप्यूटर केंद्र का हिंदी ऑपरेटर ही सारी खबरें तैयार करता है और उसे अपने डेस्क टॉप से सभी पत्रों को भेज देता है। उसमें कई दफे हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो जाती है। मूलत: जो संवाददाता समाचार बनाता है, वह एक दिन या एक समाचार के लिए सभी पत्रों का संवाददाता बन जाता है।

बहरहाल, पाठक जानते हैं कि समाचारपत्रों को अनेक तरह के दबावों का सामना करना पड़ता है और इसके उद्गम भी अनेक हैं। उन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष चर्चा इस लेखमाला में बीच-बीच में होती रही है। आपके अखबार पर दबाव बनाने का एक दिलचस्प प्रसंग सत्तर के दशक में आया। उन दिनों छत्तीसगढ़ में सड़क परिवहन में कुछ कंपनियों का लगभग एकाधिकार था। अखबार के पार्सल दूर-दराज के गांवों तक बसों से ही भेजे जाते थे। इन बसों के परिचालन में बहुत सी धांधलियों की शिकायतें आती थीं- समय पर न चलना, कहीं भी रोक देना, टिकिट न देना, पैसे न लौटाना, ठसाठस सवारी भर लेना आदि। इस बारे में समाचार छपने से नाराज एक कंपनी मालिक ने बाबूजी को फोन-किया- आपका राजिम का संवाददाता ठीक नहीं है। उसे बदल दीजिए। मैं दूसरा बेहतर आदमी आपको देता हूं। बाबूजी ने जवाब दिया- मैं जिस दिन आपकी बस का ड्राइवर बदलने की सिफारिश करूं, उसी दिन आप मुझे, संवाददाता बदलने की सलाह दीजिए। उन्हें इस उत्तर की अपेक्षा नहीं थी। उनका बस चलता तो शायद पेपर के पार्सल ले जाना ही बंद कर देते लेकिन वह दौर अपेक्षाकृत सहिष्णुता का था। आज की तरह अखबारों की भरमार नहीं थी। यह भी जानते थे कि देशबन्धु को झुकाना संभव नहीं है।

इसी से कुछ-कुछ मिलता-जुलता एक और प्रसंग संभवत् 1971 के आम चुनावों के समय घटित हुआ। संपादकीय विभाग में सारंगढ़ के आसपास किसी स्थान के एक श्री वाजपेयी कार्यरत थे। कविहृदय थे। हिंदी बहुत अच्छी थी। समाचारों की समझ भी वैसी ही थी। वे एक दिन लंबे अवकाश का आवेदन लेकर आए। इतनी लंबी छुट्टी किसलिए? मुझे अपने इलाके में चुनाव प्रचार के लिए जाना है। भैया का आदेश है कि छुट्टी लेकर आ जाऊं। बहुत काम करना है। मैंने अवकाश स्वीकृत नहीं किया। चुनाव का समय है। दफ्तर में ही इतना काम है। आपके जैसे कुशल साथी को छुट्टी दूंगा तो काम कैसे चलेगा? वे मन मसोस कर चले गए। दो दिन बाद भैया याने केंद्रीय राजनीति में प्रभाव रखने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता का फोन आया- अरे भाई ललित! वाजपेयीजी की जरूरत है। तुम उन्हें छुट्टी दे दो। यह तो संभव नहीं है। हमारे ऊपर ही इस वक्त काम का अतिरिक्त बोझ है। फिर वैसे भी हमारी घोषित नीति है कि हमारे पत्रकार किसी राजनैतिक दल का सदस्य नहीं बन सकते। बात यहीं खत्म हो गई। श्री वाजपेयी बिना अवकाश स्वीकृत हुए चले गए। चुनाव समाप्त होने के बाद लौटे तो उनके लिए जगह खाली नहीं थी। फिर वे कहां गए, मालूम नहीं।

आज का अध्याय मैं एक बहुत मनोरंजक किस्सा बयान करके समाप्त करना चाहूंगा। यह घटना जबलपुर कार्यालय की है। साल 1962। एक सज्जन बाबूजी से मिलने आए। परिचय दिया- मैं कविताएं लिखता हूं। आपको सुनाना चाहता हूं। भाई, यह मेरे काम करने का समय है। इस वक्त कविता नहीं सुन सकता। किसी दिन गोष्ठी में आऊंगा तो सुन लूंगा। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कुरते की जेब से एक मोटा लिफाफा निकाला। इसे देख लीजिए। मेरे स्वलिखित गीत हैं। एकदम ताज़ा लिखे हैं। इनको पढ़ने का भी समय नहीं है। आप संपादकीय विभाग में हीरालाल जी गुप्त से मिल लीजिए। वे भी कवि हैं। आप उनको अपनी कविताएं दे दीजिए। छपने योग्य समझेंगे तो अवश्य छपेंगी। कवि महोदय ने इतना सुनकर भी न तो धैर्य खोया और न हिम्मत हारी। कुरते की दूसरी पॉकेट से एक पुड़ा निकाला। यह तो स्वीकार कीजिए। यह क्या है? जी, अपनी चौक पर पान की दूकान है। आपके लिए अपने हाथ से बनाकर लाया हूं। इतना सुनना था कि बाबूजी का पारा चढ़ गया। तुम कविता छपाने के लिए मुझे पान की रिश्वत देने आए हो। बाबूजी के तेवर देखकर कविजी की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। वे चुपचाप बाहर आए और अपना रास्ता पकड़ा।
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#देशबंधु में 26 दिसंबर 2019 को प्रकाशित
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प्रस्तुति : डॉ शरद सिंह

देशबन्धु के साठ साल-22 - ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की लेखमाला की  बाईसवीं कड़ी....


देशबन्धु के साठ साल-22
- ललित सुरजन
Lalit Surjan
कवि गुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने शांतिनिकेतन में आए युवा अध्यापक बलराज साहनी को अंग्रेजी में लिखना छोड़कर मातृभाषा में लिखने की सलाह दी थी। उन्होंने कहा था- जब मैं मूलत: बांग्ला में लिख कर नाम कमा सका हूं तो तुम भी पंजाबी में क्यों नहीं लिख सकते? इस प्रसंग का उल्लेख करना आज की चर्चा में प्रासंगिक है।
देशबन्धु मेें 1969 में छत्तीसगढ़ी भाषा में स्तंभ लेखन प्रारंभ हो गया था। इस स्तंभ को सर्वप्रथम लिखने वाले थे- टिकेंद्रनाथ टिकरिहा। टिकरिहाजी वर्धा के गोविंदराम सेक्सरिया वाणिज्य महाविद्यालय में बाबूजी से जूनियर थे। इन लोगों ने मिलकर वर्धा हिंदी विद्यार्थी साहित्य समिति का गठन किया था और ''प्रदीप'' नाम से एक हस्तलिखित पत्रिका निकाली थी। 1941-42 में प्रकाशित इस पत्रिका के दो अंक आज भी देशबन्धु लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं। मायाराम सुरजन संपादक थे। उनके साथ दो सह संपादक थे- सुखचैन बांसल व टिकेंद्रनाथ टिकरिहा।  हमारे पास जो प्रतियां हैं, उनमें ये तीनों नाम लिखे हैं और ये बाबूजी की हस्तलिपि में हैं। मेरा अनुमान है कि बांसलजी और टिकरिहाजी संपादन में सहयोग के अलावा हस्तलिखित प्रतियां भी तैयार करते होंगे! आगे चलकर श्री बांसल उसी जी.एस. कॉलेज की जबलपुर शाखा में वाणिज्य के प्राध्यापक और शायद प्राचार्य भी बने।  टिकरिहाजी भी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने घर रायपुर लौट आए होंगे।
मैं फिर अनुमान लगाता हूं कि रायपुर में अखबार स्थापित करने के समय बाबूजी और टिकरिहाजी के संपर्क दुबारा बने होंगे। यह संयोग था कि 1968-69 में ही मेरे आत्मीय मित्र, प्रसिद्ध रंगकर्मी व दुर्गा म.वि. में समाजशास्त्र के प्राध्यापक (स्व.) प्रदीप भट्टाचार्य ''बिल्लू'' ने अपने एक छात्र भूपेंद्र को मेरे पास संपादकीय विभाग में काम सीखने भेजा।  तभी मुझे मालूम पड़ा कि भूपेंद्र बाबूजी के छात्रजीवन के मित्र टिकरिहाजी के पुत्र हैं। बहरहाल, संपर्कों के इस नवीनीकरण का यह लाभ हुआ कि टिकेंद्रनाथ टिकरिहा की पत्रकारिता के प्रति रुचि फिर से जाग्रत हुई और उन्होंने हमारे लिए साप्ताहिक कॉलम लिखना शुरू कर दिया। मुझे फिलहाल याद नहीं आ रहा कि कॉलम का शीर्षक क्या था और उन्होंने स्वयं अपने लिए क्या छद्मनाम चुना था। जो भी हो, यह एक हिंदी समाचारपत्र में जनपदीय भाषा को प्रतिष्ठित करने का संभवत: पहला उपक्रम था। तब के मध्यप्रदेश के किसी भी अन्य अखबार में निमाड़ी, बघेली या बुंदेली में ऐसा कोई नियमित स्तंभ नहीं था और न शायद किसी अन्य प्रांत में किसी अन्य जनपदीय भाषा में। यह पहल छत्तीसगढ़ी भाषा में हुई और कहा जा सकता है कि इस तरह एक रिकॉर्ड बन गया।
टिकरिहाजी ने शायद अगले चार-पांच साल तक इस स्तंभ को जारी रखा। इस बीच परमानंद वर्मा हमारे संपादकीय विभाग में आए और किसी समय उन पर कॉलम को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई। परमानंद ने ''डहरचलती'' शीर्षक व ''डहरचला'' छद्मनाम से शायद बीस-पच्चीस साल तक छत्तीसगढ़ी का यह कॉलम लिखा। मैं अपनी स्मृति से ही ये सारे विवरण दे रहा हूं। (अफसोस कि अखबार की पुरानी फाइलें देखकर सही-सही समय लिखना संभव नहीं हो पा रहा है)।  ''डहरचलती'' देशबन्धु का एक अत्यन्त लोकप्रिय कॉलम तो था ही, साथ-साथ स्तंभ लेखक के लिए भी कई दृष्टियों से लाभकारी सिद्ध हुआ। कालांतर में उनकी छत्तीसगढ़ी रचनाओं की अनेक पुस्तकें पाठकों के सामने आईं जो इस कॉलम के अंतर्गत प्रकाशित हो चुकी थीं। हमने छत्तीसगढ़ी भाषा का सम्मान करने के अपने प्रकल्प को एक साप्ताहिक स्तंभ तक ही सीमित न रख यथासमय उसे विस्तार देने की योजना पर भी काम किया।
1 नवंबर 2000 को जब छत्तीसगढ़ एक पृथक राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, लगभग उसी समय हमारे मन में एक विचार उठा कि देशबन्धु के संपादकीय पृष्ठ पर अग्रलेख के अलावा देश-दुनिया के मुद्दों पर एक संपादकीय छत्तीसगढ़ी में भी लिखा जाना चाहिए। इस दिशा में प्रयत्न हुआ, लेकिन यह प्रयोग अधिक दूर तक नहीं चल पाया। इसी दौरान देशबन्धु ने छत्तीसगढ़ी को राजभाषा घोषित करने व संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भी एक हस्ताक्षर अभियान चलाया। इस मुहिम में लगभग एक लाख हस्ताक्षर इकट्ठे हुए जो हमने भारत के राष्ट्रपति को प्रेषित कर दिए। यहां कहना होगा कि इस मुहिम को वैसी सफलता नहीं मिली, जिसकी अपेक्षा हमने की थी। हस्ताक्षर संकलन के लिए शायद एक सघन अभियान की दरकार थी, जो किसी राजनैतिक दल के लिए ही मुमकिन था।
इसी दरमियान हमारे शुभेच्छु और रायपुर के भूतपूर्व लोकसभा सदस्य केयूर भूषण ने एक नया सुझाव सामने रखा, जिसे लागू करने में हमने देरी नहीं की। यह सुझाव था कि नए राज्य में एक साप्ताहिक कॉलम के बजाय हफ्ते में एक पूरा पेज छत्तीसगढ़ी भाषा को समर्पित करना चाहिए। इसे तुरंत स्वीकार कर लिया गया। पन्ने का ''मड़ई'' नामकरण भी उन्होंने ही किया। मैं चाहता था कि स्वयं केयूर जी ही ''मड़ई'' का संपादन करें, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उनकी अहर्निश व्यस्तता के चलते यह संभव नहीं था सो शुरूआती दौर में परमानंद ने इसका संपादन भी किया। वे जब देशबन्धु से चले गए तो सुधा वर्मा ने यह दायित्व सम्हाल लिया। पिछले कई वर्षों से सुधा ही ''मड़ई'' का संपादन कर रही हैं। उसने भी इस तरह से एक नया रिकार्ड बना लिया है। इस साप्ताहिक फीचर के माध्यम से छत्तीसगढ़ी के अनेक लेखकों को अपनी रचनाशील प्रतिभा का परिचय देने का अवसर मिला है।
''मड़ई''  के नियमित प्रकाशन से मुझे प्रसन्नता तो है, लेकिन पूरी तरह संतोष नहीं है। हिंदी अखबार में छत्तीसगढ़ी को स्थान देने का निर्णय आकस्मिक और भावनात्मक नहीं, नीतिपरक और विचारात्मक था। हमारा मानना रहा है कि जनपदीय/ क्षेत्रीय/ आंचलिक/प्रादेशिक लघु भाषाओं का उन्नयन समाज के सर्वांगीण जनतांत्रिक विकास में सहयोगी होता है। इसलिए मुझे लगता है कि छत्तीसगढ़ी में लेखन का दायरा सिर्फ कविता-कहानी-व्यंग्य लेखन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसमें भी यदि नवोन्मेष न हो, किसी हद तक थोथा गौरव गान हो, वर्तमान की सच्चाईयों का वर्णन न हो तो ऐसा लेखन किस काम का?
एक कमी जो हिंदी में हमेशा महसूस की जाती है, वह अधिक बड़े रूप में छत्तीसगढ़ी में भी है। राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास, भूगोल, विज्ञान इत्यादि तमाम विषयों में हमारी प्रादेशिक भाषा में लिखने की कोई पहल अब तक नहीं हुई है। इस कमी को दूर करने पर ही छत्तीसगढ़ी का एक समृद्ध भाषा के रूप में विकास हो सकेगा। मुझे कभी-कभी यह शंका भी होती है कि छत्तीसगढ़ी के नाम पर एक ऐसी जमात बन गई है जो अपने संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए भाषा के चतुर्मुखी विकास को रोक रही है। शायद हो कि हमारे वर्तमान नीति नियामकों का ध्यान इस ओर जाए!
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#देशबंधु में 19 दिसंबर 2019 को प्रकाशित
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प्रस्तुति : डॉ शरद सिंह

गुरुवार, जनवरी 23, 2020

देशबन्धु के साठ साल- 21- ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की लेखमाला की  इक्कीसवीं कड़ी....


देशबन्धु के साठ साल- 21
- ललित सुरजन

   
Lalit Surjan
देशबन्धु के स्थापना वर्ष 1959 से लेकर 1979 तक प्रेस का संचालन पहले एक, फिर दूसरे किराए के भवन से संचालित होता रहा। 1977 में जब ऑफसेट प्रिंटिंग मशीन लगाने पर विचार हुआ तो साथ-साथ अपना प्रेस भवन होने की बात भी उठी। हमारे लिए यह एक महत्वाकांक्षी योजना थी। मशीन और भवन के लिए आवश्यक पूंजी का प्रबंध कैसे होगा? इस चिंता का समाधान करने में अनेक स्रोतों से मदद मिली। बैंकों से उन दिनों अखबारों को पूंजीगत ऋण नहीं दिया जाता था। बैंकों का एक तरह से अघोषित नियम था कि प्रेस, पुलिस, प्लीडर और पॉलिटीशियन- इन चार ''पी'' को क़र्ज़ न दिया जाए। डर होता था कि इनसे रकम वसूली करना टेढ़ी खीर साबित होगा। ऐसे समय म.प्र. वित्त निगम के रायपुर स्थित क्षेत्रीय प्रबंधक विश्वनाथ गर्ग सामने आए। आज 92 वर्ष की आयु में गर्ग भाई साहब का बाहर निकलना बंद हो गया है, लेकिन जब तक शरीर ने साथ दिया, वे पैदल ही नगर भ्रमण करते थे। बड़े पद पर होकर भी उन्होंने कार क्या, स्कूटर भी नहीं खरीदा। वे ऐसे वित्त प्रबंधक थे, जो कजर्दारों से कमीशन लेने के बजाय उन्हें स्वयं चाय पिलाते थे और दोपहर के भोजन का समय हो गया हो तो घर पर साथ भोजन के लिए ले जाते थे। उनका घर और दफ्तर एक ही जगह था। उन्होंने हमसे न सिर्फ ऋण प्रस्ताव बनवाया, बल्कि उसे स्वीकार कराने इंदौर मुख्यालय तक खुद गए। ऋण स्वीकृति में इंदौर में जो परेशानियां आईं, उनका विस्तृत विवरण बाबूजी ने आत्मकथा में किया है।

यह जिम्मेदारी मेरे ऊपर गर्ग साहब ने डाली कि मैं ऋण प्रस्ताव बनाऊं। मैं तीन-चार दिन बाद अपनी अकल से जैसा बना, प्रस्ताव लेकर गया तो उसे उन्होंने खारिज कर दिया। समझाया- सरकार में यह देखा जाता है कि फाइल कितनी मोटी है, यह नहीं कि सामने वाली की मंशा क्या है। उनके सुझाव के अनुसार मैंने दुबारा प्रस्ताव बनाया, जिसे देखकर वे खुश हुए। हमें मशीन व भवन के लिए त्रेपन लाख रुपए चाहिए, जिसमें लगभग पच्चीस प्रतिशत याने तेरह लाख की व्यवस्था हमें अपने स्रोतों से करनी थी। यह एक नई समस्या थी। हमारे पास तो तेरह हजार भी नहीं थे। यहां पर हमारे बैंक- सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने मदद की। बैंक ने तेरह लाख रुपए का ब्रिज लोन याने अस्थायी ऋण देना मंजूर कर लिया, गो कि इसके लिए भी बाबूजी को बंबई मुख्यालय तक दौड़ लगाना पड़ी। शर्त ये थी कि एक साल के भीतर हम यह रकम लौटा देंगे। भवन बनने में एक साल तो लगेगा ही, मशीन उसके बाद ही आएगी, नए कलेवर में अखबार छपेगा, आमदनी बढ़ेगी, तब कर्ज पटाया जाएगा; ऐसे में बैंक की शर्त पर अमल कैसे होगा, यह एक नया सवाल खड़ा हो गया। इस मोड़ पर हमने जो प्रयोग किया, वह पत्र जगत में व छत्तीसगढ़ के जनसाधारण में तो चर्चा का विषय बना ही, स्वयं हमें हैरत हुई कि यह कैसा कारनामा हो गया!

इंग्लैंड के प्रसिद्ध पत्रकार क्लाड मॉरिस की आत्मकथा ''आई बॉट अ न्यूजपेपर'' (मैंने एक अखबार खरीदा) 1962 में प्रकाशित हुई थी। बाबूजी उसकी एक प्रति ले आए थे और मैंने भी तभी उस पुस्तक को पढ़ लिया था। मॉरिस ने वेल्स प्रांत के कस्बे में बंद होने की कगार पर खड़ा एक अखबार खरीदा और पाठकों व स्थानीय समाज के सहयोग से उसे वापिस प्रतिष्ठित किया। बाबूजी की तो प्रारंभ से ही यही सोच रही कि अखबार जनसाधारण के लिए जनता के सहयोग से ही चल सकता है। इस सोच को आजमाने का वक्त अब आ गया था। वरिष्ठ साथियों की बैठक में धीरज भैया ने सुझाव रखा कि हम दो हजार पाठकों को चिह्नित कर उनसे छह सौ रुपए की राशि स्थायी सदस्यता के नाम पर देने का आग्रह करें। उस समय छह सौ रुपए का सालाना ब्याज लगभग साठ-पैंसठ रुपए होता था और अखबार की एक प्रति का सालाना बिल भी लगभग इतनी ही राशि का बनता था। याने स्थायी सदस्य बन जाने से पाठक को नुकसान नहीं होगा। बाबूजी ने प्रस्ताव में संशोधन किया कि एक हजार रुपए लेना चाहिए। अखबार के मूल्य में आगे वृद्धि होगी ही, उसकी भरपाई के लिए इतना कुशन रखना चाहिए। और जो स्नेही पाठक छह सौ देगा, वह एक हजार भी दे सकेगा। यह बात सबको जंच गई। ''आजीवन ग्राहक योजना'' पर काम शुरू हो गया।

मुझे जहां तक याद पड़ता है- तब तक धार्मिक पत्रिका ''कल्याण'' ही शायद एकमात्र पत्रिका थी, जिसकी आजीवन सदस्यता उपलब्ध थी। संभव है कि कुछेक जातीय समाजों के मुखपत्रों में भी इस तरह की योजना रही हो! लेकिन एक दैनिक समाचारपत्र के लिए यह एक नई और किसी हद तक चौंकाने वाली पहल थी। इस पर तब ''टाइम्स ऑफ इंडिया'' में भी रिपोर्ट छपी। बहरहाल, प्रेस में लगभग हर वह सदस्य जिसके थोड़े-बहुत सामाजिक संपर्क थे, इस मुहिम को सफल बनाने में जुट गया। स्वाभाविक ही शुरूआत रायपुर से की, लेकिन अभियान पूरे प्रदेश में चला। जिला प्रतिनिधियों और संवाददाताओं ने भी कोई कसर बाकी नहीं रखी। बाबूजी ने डोंगरगढ़ से लेकर रायगढ़ तक और बस्तर से लेकर सरगुजा तक जितना संभव हो सका दौरा किया। बाकी हम सब भी अपनी-अपनी संपर्क क्षमता की परीक्षा दे रहे थे। इस दौरान बहुत अच्छे अनुभव हुए। देशबन्धु को सहयोग देने में शायद ही किसी ने मना किया हो, बल्कि कई मित्रों ने आगे बढ़-चढ़कर सहायता की। कोई-कोई संभावित ग्राहक मजाक में पूछ बैठता था- आजीवन किसके लिए? हम भी हँसकर जवाब देते- अखबार चलते बीस साल हो गए हैं और आपके साथ हमारा जीवन भी लंबा चलने वाला है।

मैंने इस अभियान के दौरान प्रदेश के दूरदराज केंद्रों तक की यात्राएं कई-कई बार कीं जिनमें जिला प्रतिनिधियों ने बराबरी से साथ दिया। धीरज भैया, बलवीर खनूजा, भरत अग्रवाल, हरिकिशन शर्मा, ज्ञान अवस्थी, जसराज जैन आदि का यहां स्मरण हो आना स्वाभाविक है। रायपुर में तो सारे साथी थे ही। प्रतिष्ठित समाजसेवी व्यवसायी रामावतार अग्रवाल का विशेष उल्लेख करना चाहूंगा। उन्होंने एक दिन फोन किया- चलो घूमकर आते हैं। वे अभनपुर और नयापारा राजिम में अपने परिचित बंधुओं के यहां ले गए और आठ-दस ग्राहक बनवा दिए। एक रात मैं जगदलपुर से चार दिन बाद लौटा ही था कि फोन आया- कल सुबह चलना है। थका तो था, लेकिन मुहिम को कैसे छोड़ता? अगले दिन रामावतार भैया के साथ मैं खरोरा गया और वहां भी कुछ ग्राहक बन गए। मेरे बचपन के मित्र महेश पांडे पहले अंबिकापुर, फिर राजनांदगांव में पदस्थ थे। उनके मधुर संपर्कों का लाभ मिला। अंबिकापुर से एक दिन पत्थलगांव होकर जशपुर नगर गया। रात को लौटने में काफी देर हो गई थी। सीतापुर के पास एक झरने पर आधी रात पानी पीने आए बाघ के दर्शन भी हो गए। कह सकते हैं कि वह मेरे हिस्से का बोनस था।

इस तरह प्रतिदिन जो धनराशि एकत्र होती, उसे सीधे बैंक में जमा करते जाते थे। बैंक ने जो भरोसा किया था, वह गलत सिद्ध नहीं हुआ। यथासमय काम चलाने लायक भवन निर्माण हो गया, दिल्ली से बंधु मशीनरी कं. से ऑफसेट मशीन भी आ गई। दिलचस्प संयोग यह है कि अपने समय के गणमान्य पत्रकार देशबन्धु गुप्ता के पुत्रों ने ही ऑफसेट मशीन का कारखाना डाला था। प्रारंभ में जो सहयोग राशि एक हजार निर्धारित की थी, उसे कुछ वर्ष बाद बढ़ाकर दो हजार किया। उसमें भी पाठकों का भरपूर सहयोग मिला। अधिकतर पुराने सदस्यों ने भी एक हजार की अतिरिक्त राशि खुशी-खुशी दे दी। सन् 2000 के आसपास आर्थिक संकट आने पर योजना को पुनर्जीवित किया और पांच हजार रुपए की सहयोग राशि तय की। तीसरे चरण में भी देशबन्धु के चाहने वालों ने निराश नहीं किया और कुछ मित्रों ने तो स्वयं रुचि लेकर अपने परिचितों को प्रेरित किया कि वे देशबन्धु की विकास यात्रा में सहभागी बनें। कुल मिलाकर यह एक हर तरह से लाभदायी अनुभव था। मुझे इस बात की प्रसन्नता तथा उससे बढ़कर संतोष है कि पाठकों के एक बड़े वर्ग ने देशबन्धु को एक विश्वसनीय समाचारपत्र माना और इसीलिए पत्र की प्रगति में योगदान करना उन्होंने उचित समझा। अपने इन सभी पाठकों व सहयोगियों का जो ऋण हम पर है, उसकी कीमत भला कौन आंक सकता है?
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#देशबंधु में 12 दिसम्बर 2019 को प्रकाशित
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प्रस्तुति : डॉ शरद सिंह

रविवार, जनवरी 19, 2020

देशबन्धु के साठ साल-20- ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की लेखमाला की  बीसवीं कड़ी....
देशबन्धु के साठ साल-20
- ललित सुरजन
समाचारपत्र जगत पर प्रारंभ से ही पुरुषों का वर्चस्व रहा है। अन्य अनेक व्यवसायों की भांति पत्रकारिता को महिलाओं के लिए निषिद्ध या अनुपयुक्त क्षेत्र माना जाता था। अखबार का स्वामित्व, संचालन, प्रबंधन, संपादन इन सभी विभागों की बागडोर पुरुषों के हाथ में ही हुआ करती थी। यह प्रवृत्ति भारत की नहीं, बल्कि समूची दुनिया में थी। किन्तु आश्चर्यजनक रूप से स्वाधीनता पूर्व भारत में कम से कम ऐसे तीन उदाहरण मिलते हैं, जहां स्त्रियों ने किसी पत्रिका का प्रकाशन-संपादन किया हो। हेमंत कुमारी चौधरी (रतलाम) ने 1888 में ''सुगृहिणी'' व सुभद्राकुमारी चौहान (जबलपुर) ने 1947 में ''नारी'' शीर्षक पत्रिका प्रारंभ की जबकि महादेवी वर्मा इलाहाबाद से प्रकाशित चांद के संपादक मंडल में थीं। आज़ादी मिलने के बाद इस परिपाटी को निभाने के लिहाज से मुझे एक ही नाम याद आता है- मनमोहिनी का, जिन्होंने अपने पति प्रकाश जैन के साथ बराबरी से चलते हुए अजमेर से प्रतिष्ठित पत्रिका ''लहर'' का संपादन किया। विदेशों के बारे में मुझे बहुत जानकारी नहीं है, लेकिन एक महत्वपूर्ण अपवाद के रूप में कैथरीन ग्राहम का नाम है जिन्होंने पति फिलिप की मृत्यु के बाद वाशिंगटन पोस्ट का कारोबार सम्हाला था और जिनके निर्देशन में अखबार ने वाटरगेट कांड का खुलासा किया था। मेरे ध्यान में एक-दो नाम और भी हैं, लेकिन उनका प्रभाव उतना व्यापक नहीं था।

भारत में भी इसी तरह पारिवारिक घटनाचक्र के चलते अखबार का कामकाज अपने हाथों लेने वाली कुछ महिलाएं हुई हैं। हिंदुस्तान टाइम्स में शोभना भरतिया, महाराष्ट्र हेराल्ड (पुणे) में नलिनी गेरा और पुणे के ही मराठी पत्र सकाल में क्लॉड लीला परुलेकर- इन तीनों को ही अपने-अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने का अवसर मिला। संचालन से हटकर संपादन की बात की जाए तो सबसे पहले प्रभा दत्त का नाम याद आता है, जिन्होंने 1964 में हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादकीय विभाग में काम करना शुरू किया था। सामान्यत: उन्हें देश की पहली महिला पत्रकार माना जाता है। आज तो खैर, क्या अखबार और क्या टीवी चैनल, सब में स्त्री पत्रकारों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। उनका वीमेंस प्रेस कोर ऑफ इंडिया नामक एक पृथक संगठन बन चुका है जिसका दिल्ली में एक सुव्यवस्थित दफ्तर भी चलता है। इसके साथ-साथ मीडिया संस्थानों के प्रबंध विभाग में महिला कर्मियों की नियुक्ति आम बात हो गई है। इतनी सब जानकारी और कहीं लिखने का प्रसंग आए या न आए, यह सोचकर यहां लिख दी है। यह पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए संदर्भ सामग्री के रूप में काम आ सकती है।
Lalit Surjan

इस पृष्ठभूमि में मुझे यह बताने में खुशी है कि देशबन्धु अविभाजित मध्यप्रदेश का संभवत् पहला अखबार था, जब 1970 में उसी समय कॉलेज से पढ़ाई पूरी कर निकली उषा घोष हमारे व्यवस्था विभाग में काम करने आईं और लगभग तेरह साल तक अपनी सेवाएं इस संस्थान को दीं। मुझे जितना याद पड़ता है, भोपाल, ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर के किसी भी पत्र में कोई महिला तब तक नियुक्त नहीं थी। मेरे सहयोगी रमेश शर्मा के माध्यम से उषा आईं थीं और उनको नियुक्ति देने में मुझे सोच-विचार करने की आवश्यकता नहीं पड़ी थी। जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, हमारा दफ्तर इस तरह की संकीर्णता से सदैव मुक्त रहा है। उषा घोष का आना रायपुर के पत्र जगत के लिए एक नई घटना थी, किंतु समय बदल रहा था। संपादकीय और व्यवस्था दोनों विभागों में धीरे-धीरे कर सभी अखबारों में महिलाओं का आगमन प्रारंभ हुआ और कहीं एकाध अपवाद छोड़कर इन सबने जिस भी पत्र में सेवाएं कीं, अपनी मेहनत, और काम के प्रति लगन से सहयोगियों की प्रशंसा अर्जित की। यहां कुछ सहकर्मियों का उल्लेख करना उचित होगा।

साठ के दशक में ''धर्मयुग'' में मास्को से हेमलता आंजनेयलु के संस्मरण छपते थे। तब पता नहीं था कि उनका पैतृक घर रायपुर में है। संभवत: आकाशवाणी से सेवानिवृत्ति के बाद वे घर वापिस लौटीं और देशबन्धु से जुड़ गईं। 1990 में भोपाल संस्करण प्रारंभ हुआ तो उन्हें फीचर संपादक बनाकर वहां भेजा गया। वीरा चतुर्वेदी एक लोकप्रिय अध्यापिका और कहानी लेखिका थीं। हिंदी-अंग्रेजी पर उनका समान अधिकार था। वे भी रिटायर होने के बाद हमारे संपादकीय विभाग में आ गईं। उनके पढ़ाए अनेक छात्र प्रदेश की राजनीति और पत्रकारिता- इन दोनों क्षेत्रों में ख्यातिप्राप्त हैं। वीराजी ने बड़ी मेहनत से इंदर मलहोत्रा द्वारा लिखित इंदिरा गांधी की जीवनी का रोचक अनुवाद किया था। इंदरजी ने उसे धारावाहिक छापने की अनुमति भी दे दी थी, लेकिन प्रकाशक विदेशी मुद्रा में प्रकाशन अधिकार फीस चाहता था। उन दिनों यह एक असंभव सा काम था, सो हमारे हाथ निराशा ही लगी। मनोरमा शुक्ला से हमारे पारिवारिक संबंध हैं। घर-परिवार के दायित्वों से कुछ अवकाश मिला तो फीचर संपादक का गुरुतर दायित्व सम्हाल लिया। वे सुबह आठ बजे प्रेस आ जाती थीं और शाम चार बजे तक लगातार अपने काम में जुटी रहती थीं। उनके कार्यकाल में अवकाश अंक में खूब निखार आया। इन तीनों विदुषियों की अपनी प्रौढ़ावस्था में भी ऊर्जा और काम के प्रति लगन देखते बनती थी। प्रभा टांक कई भाषाओं की ज्ञाता थीं- गुजराती, अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला, मराठी आदि। उन्होंने देशबन्धु लाइब्रेरी को व्यवस्थित रूप दिया, कई युवाओं को इस काम में प्रशिक्षित किया, कुछ स्थायी स्तंभों का काम भी सम्हाला। इन सबका अमूल्य योगदान देशबन्धु की प्रतिष्ठा वृद्धि में सहायक हुआ।

शिवानी झा ने अपने कैरियर का प्रारंभ ही देशबन्धु से किया था। उसने संपादकीय विभाग की हर डेस्क पर समान दक्षता के साथ काम किया। अदालत की रिपोर्टिंग करने गई तो किसी बात पर खफ़ा एक जज साहब ने उसकी गिरफ्तारी का आदेश निकाल दिया। तत्कालीन डीआईजी आरएलएस यादव और सीएसपी रुस्तम सिंह की हिकमत से मामला सुलझा। जज ने प्रकरण वापस ले लिया। प्रेस के पास जवाहरनगर मोहल्ले में एक बालक के अपहरण और चतुराई से अपहरणकर्ताओं के चंगुल से भाग निकलने की खबर मिली तो शिवानी रिपोर्टिंग करने गईं। आकर बताया- बालक की कहानी मनगढ़ंत है। मैंने उसी तरह समाचार बनाने की अनुमति दे दी। अगली सुबह मोहल्ले के लोग देशबन्धु से बेहद नाराज हुए, लेकिन शाम होते-होते पुलिस ने हमारी रिपोर्ट की पुष्टि कर दी। विशेष बात यह कि शिवानी को काम सीखते हुए कुछ हफ्ते ही हुए थे। उसने भारत अन्तरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में भी कई साल तक देशबन्धु के लिए रिपोर्टिंग की। शिवानी झा और आभा कोठारी, ऐसी दो युवा पत्रकार थीं, जिन्हें किसी भी पृष्ठ का काम सौंप दो, उसे अच्छे से करेंगी। उन दिनों प्रथम पृष्ठ के लिए रात्रि पाली में शायद ही महिलाएं कहीं काम करती थीं। इन दोनों ने बिना किसी संकोच के यह ड्यूटी भी पूरी की।

इन सबसे अलग और विशेष रूप से उल्लेखनीय गाथा सरिता धुरंधर की है। सरिता की कुछ माह पहले ही कैंसर से जूझते हुए पैंतालीस वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई। सरिता ने बीस साल से कुछ अधिक समय तक देशबन्धु के संपादकीय विभाग में सेवाएं दीं। घर-परिवार की विषम परिस्थितियों के चलते हुए सरिता को इस कम उम्र में भी बहुत संघर्ष करना पड़ा। शिक्षक पिता की मृत्यु के बाद परिवार को सम्हालने की जिम्मेदारी उस पर ही थी।परिजनों की चिंता में सरिता ने कभी अपने स्वास्थ्य की परवाह नहीं की। अगर संयोगवश उसके पारिवारिक चिकित्सक डॉ. जवाहर अग्रवाल ने अपनी अनुभवी दृष्टि से अनुमान न लगाया होता तो उसे भान भी नहीं होता कि कैंसर उसकी जीवनशक्ति को क्षीण किए जा रहा था। बीमारी का पता चलने के बाद भी सरिता ने करीब चार साल तक काम किया। हर कीमोथैरिपी के अगले दिन ही, लाख मना करने के बावजूद वह ड्यूटी पर आ जाती। मेरे बाद मेरी माँ और अन्य लोगों का क्या होगा, उसे इसी बात की फिक्र लगी रहती थी। सरिता धुरंधर उन बिरले लोगों में थी, जिनके लिए अपना काम सर्वोपरि होता है। उसने कभी भी किसी काम के लिए मना नहीं किया, बल्कि सहज भाव से हर ड्यूटी निभाई। सरिता का इस तरह असमय चले जाना पूरे देशबन्धु परिवार के लिए शोक का विषय बन गया। बहरहाल, इस कड़ी में अभी कुछ और नाम बाकी हैं, जिन पर यथासमय चर्चा होगी।
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#देशबंधु में 05 दिसम्बर 2019 को प्रकाशित
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प्रस्तुति : डॉ. शरद सिंह