गुरुवार, जनवरी 30, 2025

डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "प्रेम वाया एल. डी. आर." सुष्मिता सिंह के स्वर में | Dr (Ms) Sharad Singh story - Prem Via L.D.R. - in the voice of Sushmita Singh

लोकप्रिय साहित्यिक Youtube Channel "आज सुनिए कहानी" में  सुष्मिता सिंह जी के मधुर स्वर में  सुनिए   मेरी कहानी 
        👇"प्रेम वाया एल. डी. आर." 👇
      सुष्मिता जी की आवाज का जादू आपको कहानी के कथानक, घटनाओं और दृश्यों से इस तरह जोड़ देगा कि आप सब कुछ अपनी आंखों के सामने घटित होता हुआ महसूस करेंगे...
 Dr (Ms) Sharad Singh story - Prem Via L.D.R. - in the voice of Sushmita Singh
    इतनी बेहतरीन प्रस्तुति के लिए हार्दिक धन्यवाद प्रिय सुष्मिता सिंह जी 🌹🙏🌹

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डॉ (सुश्री) शरद सिंह की कहानी "पुराने कपड़े" सुष्मिता सिंह के स्वर में | Dr (Ms) Sharad Singh story - Purane Kapade - in the voice of Sushmita Singh

लोकप्रिय साहित्यिक Youtube Channel "आज सुनिए कहानी" में सुष्मिता सिंह जी के मधुर स्वर में सुनिए मेरी कहानी "पुराने कपड़े" ..
👇
      सुष्मिता जी की आवाज का जादू आपको कहानी के कथानक, घटनाओं और दृश्यों से इस तरह जोड़ देगा कि आप सब कुछ अपनी आंखों के सामने घटित होता हुआ महसूस करेंगे...
    इतनी बेहतरीन प्रस्तुति के लिए हार्दिक धन्यवाद प्रिय सुष्मिता सिंह जी 🌹🙏🌹
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शनिवार, जनवरी 18, 2025

कहानी | गुड्डी, टिकली और हंगर वार | डॅा.(सुश्री) शरद सिंह | "नई धारा" में प्रकाशित


“नई धारा” (फरवरी-मार्च 2025) में प्रकाशित कहानी

गुड्डी, टिकली और  हंगर वार

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह


आज सुबह अचानक तारा का फोन आया। तारा यानी तारा शुक्ला बच्चों की काउंसलर है और एक एनजीओ के लिए काम करती है। वह मेरी सहेली तो नहीं लेकिन बहुत अच्छी परिचित है। 

         इन दोनों ठंड ने अपने आने की दस्तक देती है इसलिए सुबह कुछ अलसाई हुई सी लगती है। नल में पानी आने से पहले एक कप चाय और पानी भरने से खाना बनाने के काम से निवृत होने के बाद एक कप चाय और जरूरी हो जाती है। उसे पर अखबार पढ़ते समय पलकें भारी होने लगती है। मानो अखबार की ख़बरें न हों बल्कि नींद की दवा का डोज़ हो। एक अजीब उनींदापन। सुस्ती का आलम। 

         जब तारा का फोन आया तो उस समय मैं उनींदेंपन के दौर से गुज़र रही थी। तारा के फोन में न केवल मुझे जागृत अवस्था में लाया बल्कि उसकी आवाज़ ने मुझे झकझोर दिया। उसके स्वर में एक अज़ीब-सी उत्तेजना थी। उसने मुझे कहा- "श्वेता, जल्दी आओ! तुम जिस तरह का केस जानना चाहती थीं, उससे भी ज्यादा सनसनीखेज़ केस आज हमारे यहां आया है। बस दो-तीन घंटे का समय है इसलिए जितनी जल्दी हो सके आ जाओ!"

    "दो-तीन घंटे का समय मैं कुछ समझी नही। वैसे केस क्या है?" मैंने उसे जानना चाहा। वाकई मुझे समझ में नहीं आया था कि वह क्या कह रही है? कौन सा केस? कैसा केस? और यदि कोई केस है तो उसमें दो-तीन घंटे का समय ही क्यों है?

    "बातों में समय ख़राब मत करो, जितनी जल्दी हो सके आ जाओ।" तारा ने फिर उतावलेपन से कहा। लगभग डांटते हुए।

     "ओके! ओके! आ रही हूं ! कहां पहुंचना है।" मैंने उससे पूछा।

    "बाल सुधार गृह।" कहते हुए उसने तत्काल फोन बंद कर दिया। उसे डर लगा होगा कि कहीं मैं कोई और बात न पूछने लग जाऊं और घर से निकलने में देर कर दूं। 

      यूं भी बाल सुधार गृह मेरे घर से लगभग 14-15 किलोमीटर दूर है यानी शहर के दूसरे छोर पर। भले ही मुझे अपनी स्कूटी से जाना था  लेकिन वहां तक पहुंचने में समय तो लगता ही। फिर रास्ते का ट्रैफिक भी काफी समय ले लेता है।

    मैंने तत्काल कपड़े बदले। ट्राउजर और कुर्ता पहना। मोबाइल ट्राउजर की एक जेब में खोंसा। दूसरी ज़ेब में एक रूमाल रखा। स्कूटी की चाबी उठाई। बाहर निकल कर घर के दरवाजे पर ताला डाला और स्कूटी लेकर निकल पड़ी। बाल सुधार गृह के लिए। 

     यूं तो मेरा मानना है कि गाड़ी चलाते समय इधर-उधर की कोई भी बात सोचना नहीं चाहिए, सिर्फ ड्राइविंग पर कंसंट्रेशन रखना चाहिए। फिर चाहे वह टू व्हीलर हो या फोर व्हीलर। लेकिन इस समय मेरे दिमाग में न जाने कितनी बातें घूम रही थीं। तारा किस तरह के केस की बात कर रही थी? कौन-सा कैसे होगा? मैंने तो उससे कई विषयों पर चर्चा कर रखी है। मैंने भी बाल मनोविज्ञान और अपराध मनोविज्ञान दोनों पढ़ा है लेकिन फिर भी मैं उसे बिंदु को ठीक-ठाक जानना चाहती थी जिस बिन्दु से कोई बच्चा अपराध की ओर मुड़ जाता है। विशेष रूप से जब वह स्वयं अपराध में प्रविष्ट होता है, किसी के जबरदस्ती अपराधी बनने पर नहीं। आखिर बच्चों में तो इतनी समझ होती नहीं है कि वह कोई प्लानिंग करें या गहराई से सोचें और फिर किसी से बदला लेने की योजना बनाकर अपराध करें। लेकिन शायद किसी-किसी बच्चे में इस तरह की प्रवृत्ति होती हो। मैं इस गहराई को जानना चाहती थी कि ऐसी प्रवृत्ति जन्मजात होती है या परिस्थिति वश जन्म ले लेती है? और यह जानना मेरे लिए तभी संभव था जब मैं किसी विशेष बाल अपराधी से मिलूं और उससे बातचीत करूं उसके बारे में जानूं। यहां के सुधार गृह में यूं तो कई बच्चे हैं किंतु इस तरह के नहीं है जिन्होंने कोई बहुत बड़ा अपराध किया हो यानी हत्या की हो अथवा हत्या की कोशिश की हो। तो क्या इस तरह का कोई कैसे आया है? यह सोचते ही पल भर को मेरे शरीर में रोमांच की एक लहर दौड़ गई। यदि यह सच है तो कैसा होगा वह बाल अपराधी? किसी बच्चे को हत्या जैसे अपराध से जोड़कर देखना ही बड़ा अजीब लगता है।

      पीछे से आ रही एक गाड़ी के हॉर्न ने मुझे चौंकाया। मैं सोच-विचार में डूबी हुई सड़क के लगभग बीच में जा पहुंची थी और निश्चित रूप से मेरे पीछे आ रही गाड़ी का चालक झल्ला कर हॉर्न पर हॉर्न बजाने लगा था। गलती उसकी नहीं, गलती सरासर मेरी थी। मैंने तत्काल अपनी स्कूटी को साइड में किया और बाजू से हो कर गुजरते उस चालक की ओर देखकर "सॉरी" बोला। उसने मुझे देखकर बुरा-सा मुंह बनाया। यह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। यदि उसने बुदबुदाते हुए मुझे गाली भी दी हो तो कोई आश्चर्य नहीं है। मैंने उसकी प्रतिक्रिया पर बुरा नहीं माना बल्कि स्वयं को चेताया की बस, अब होश-हवास में स्कूटी चलानी है और सही-सलामत, वन-पीस बाल सुधार गृह तक पहुंचना है। 

       वहां से लगभग 12 मिनट बाद में मैं बाल सुधार गृह के दरवाजे पर जा पहुंची। अभी मैं स्कूटी स्टैंड ही कर रही थी कि तारा तेजी से बाहर आई। वह किसी खिड़की से शायद मेरा रास्ता ही देख रही थी। 

     "जल्दी आओ! जल्दी चलो अंदर!" तारा हड़बड़ाती हुई बोली।

     "ठीक है, ठीक है, अब आ तो गई हूं। बताओ तो आखिर मामला क्या है?" मैंने तारा को शांत करते हुए कहा।

   " दरअसल बात ये है कि उसे यहां से होकर जबलपुर ले जा रहे हैं। यह लोग बस दो-तीन घंटे के लिए यहां रुके हैं। यह लोग पहले तो नहीं मान रहे थे लेकिन मैंने इन्हें जैसे-तैसे तैसे मान लिया है। तुम जल्दी से मिल लो और जो भी पूछना हूं जल्दी-जल्दी पूछ लेना। हालांकि वह कितना बात करेगी यह मुझे आईडिया नहीं है। बड़ी चुपचुप-सी है वो।" तारा ने कहा।

   "करेगी यानी कोई लड़की है। कोई बच्ची?" मैं चौंक कर पूछा।

   "यस, शी इज़ ओनली 9 ईयर ओल्ड। बट शी इज़ ब्रूटल मर्डरर।" तारा ने एक सांस में मुझे बताया।

    "9 ईयर ओल्ड ब्रूटल मर्डरर?" मैंने तारा की बात को दोहराया मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि इतनी छोटी बच्ची एक जघन्य हत्यारी हो सकती है? तारा पल भर को ठिठकी। उसने मुझे एक सांस में, चंद पंक्तियों में उस लड़की के अपराध के बारे में बताया। मुझे विश्वास नहीं हुआ उसकी बात सुन कर। 

    "आओ, इस कमरे में है वो।" तारा ने मुझे बताया और फिर तुरंत बोली, " लेकिन ठहरो! पहले इंस्पेक्टर से तुम्हें मिलवा दूं जो उसके साथ आई है।"

    तारा ने उस लेडी इंस्पेक्टर से मेरा परिचय कराया। वह बहुत मिलनसारिता से मिली। 27-28 साल से अधिक आयु नहीं रही होगी उसकी। गेंहुआ रंग। तीखे नयननक्श। एकदम चुस्त-दुरुस्त। उसके स्वर में भी मधुरता थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि उसने अपनी रिस्क पर मुझे उस लड़की से मिलने की अनुमति दे दी थी।

   "जब ऐसे छोटे बच्चे अपराध की दुनिया में मिलते हैं तो मुझे भी बहुत आश्चर्य होता है।" वह इंस्पेक्टर बोली।

    “जी ! यही तो मैं जानना चाहती हूं कि वह कौन सा पल होता है जो उन्हें अपराध करने को इतनी गहराई से प्रेरित करता है कि वे स्वयं को रोक नहीं पाते हैं।" मैंने उसे महिला इंस्पेक्टर से कहा।

    "ठीक है आप उससे बात कर लीजिए अभी तो हमें कुछ देर यहां रुकना है।" उस इंस्पेक्टर ने मुझे औपचारिक अनुमति दे दी। हालांकि यह एक फेवर था कि बिना कोर्ट के परमिशन के, बिना किसी लिखा-पढ़ी के मुझे उस लड़की से मिलने दिया जा रहा था। शायद यह मानवता के आधार पर था। वैसे इसकी जिम्मेदारी एनजीओ के जरिए तारा ने अपने ऊपर ले ली थी। तारा जानती थी कि मेरी इस मुलाक़ात से किसी पर आंच नहीं आएगी। हो सकता है कि उसे लड़की के मानस पर इससे कोई सकारात्मक असर पड़े।

     मैंने उस कमरे में कदम रखा जहां वह छोटी-सी लड़की कुर्सी पर एक मेज के पीछे बैठी थी। उसकी कद-काठी बिल्कुल मामूली थी। मेरी आहट पाकर उसने सिर उठाकर मेरी ओर देखा। बेहद मासूम चेहरा जैसाकि एक 9 साल की बच्ची का होना चाहिए। 

     यह बच्ची भला एक जघन्य हत्या कैसे कर सकती है? यह सोचते हुए मैंने उसकी आंखों में देखा। हल्का भूरा रंग लिए हुए उसकी काली आंखें भावहीन थीं। मुझे देखकर उन आंखों में न तो कोई कौतूहल जागा और न कोई झिझक। मानो उन आंखों के लिए मेरा वहां कोई अस्तित्व था ही नहीं। यह बात मुझे ज़रा अज़ीब लगी। उसकी आंखों की यह भावहीनता उसे एक आम लड़की से अलग कर रही थी। 

     लड़की का रंग साफ़ था। दुबली थी। इकहरे शरीर की। बालों की चोटी गुंथी थी, जिसके छोर पर रबरबैंड लगा था। उसकी छोटी अधिक लंबी नहीं थी फिर भी उसने अपनी गर्दन की एक ओर से उसे आगे कर रखा था। 

    "तुम्हारा नाम क्या है?" मैंने उसके सामने वाली कुर्सी में बैठते हुए उससे कोमलता भरे स्वर में पूछा।

   "गुड्डी।" उसने पहली बार में ही तुरंत उत्तर दे दिया। उसके स्वर में भी उसकी आंखों जैसा सपाटपन था। गोया मेरे आमद के साथ ही वह समझ गई थी कि अब उससे उसका नाम पूछा जाएगा। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अब तक उससे थाने से लेकर कोर्ट तक और कोर्ट से लेकर सुधार गृह तक कई लोगों द्वारा कई बार सबसे पहलेउसका नाम पूछा जा चुका होगा। 

    "बड़ा प्यारा नाम है।" मैंने उसके प्रति अपनी आत्मीयता स्थापित करने का एक छोटा-सा प्रयास किया। मेरे इस प्रयास पर भी उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

     "ये लोग बता रहे हैं कि तुमने किसी को जान से मार दिया था। क्या ये सच है?" मैंने उससे पूछा।

    उसने अपना सिर हिला कर हामी भरी। मुंह से कुछ नहीं बोला। 

    "किसको मारा था?" मैंने पूछा।

    "टिकली को।" स्वर में वही सपाटपन।

    "कौन थी टिकली?" मैंने पूछा।

    "मुझे रोज मार पड़वाती थी। कमीनी।" पल भर को उसकी आंखों में एक चमक कौंधी। क्रूरता भरी चमक। पर दूसरे ही पल वही भावहीनता। 

    उसके मुंह से गाली का शब्द सुनकर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ।  निचली बस्तियों में पलने वाले बच्चे बात-बात पर गालियां देने के आदी होते हैं। वे उन गालियों का अर्थ नहीं जानते, नहीं समझते, इसलिए मां-बहन की गालियां देने से भी हिचकते नहीं हैं। मैंने ऐसे बच्चों को क़रीब से देखा है। उनके परिवेश को गहराई से समझा है। इसमें उनका कोई दोष नहीं होता। वे जो अपने माता-पिता या बड़े भाई-बहन से सुनते हैं, वही सब बिना सोचे-समझे दोहराने लगते हैं। 

    "टिकली तुम्हें क्यों मार पड़वाती थी? क्या तुम दोनों के बीच कोई झगड़ा था? क्या तुम लोग साथ-साथ रहती थीं?" मैं गुड्डी से पूछा।

     वह चुप रही। उसने कोई उत्तर नहीं दिया। 

     "तुम कहां रहती थीं? क्या टिकली तुम्हारी बहन थी?" मैं गुड्डी से पूछा।

     "वह कुतिया मेरी बहन नहीं थी।" गुड्डी के स्वर में टिकली के लिए असीम घृणा थी। उसके इस जवाब से मुझे लगा कि अब मैंने सही दरवाजे पर दस्तक दी है। गुड्डी अब कुछ खुलकर बात करेगी।

     "तो फिर कौन थी टिकली? तुम्हारे साथ क्यों रहती थी?" मैं फिर पूछा।

     गुड्डी फिर चुप रही। वह अपनी दाएं हाथ की तर्जनी से मेज की सतह खुरचने लगी। यह देखकर मैं समझ गई कि वह इस उधेड़बुन में है कि वह कुछ बोले या न बोले।

     "देखो गुड्डी जब मैं तुम्हारी उम्र की थी तब मुझे भी बहुत गुस्सा आता था। मैं उस समय स्कूल जाया करती थी। मेरे साथ एक लड़की पढ़ती थी जो मेरी चीज चुरा लिया करती थी। मुझे उस पर शक तो पहले से ही था लेकिन एक दिन मैंने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया। वह मेरे बस्ते से मेरी पेंसिल चुरा रही थी। यह देखकर मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने उसकी चोटी पकड़ कर उसे जमीन पर गिरा दिया। शायद मैं उसे खूब पीटती लेकिन तब तक टीचर आ गईं और उन्होंने मुझे रोक लिया। सही में, जब आपकी कोई चीज कोई चुराता है तो बहुत बुरा लगता है। बहुत गुस्सा आता है। हम ऐसे लोगों से मारपीट भी कर लेते हैं लेकिन किसी को जान से मार देना बहुत बड़ी बात होती है। क्या तुमने सचमुच टिकली को जान से मार दिया या ये लोग झूठ बोल रहे हैं?" मैंने एक झूठा- मूठा किस्सा सुनाते हुए गुड्डी से उसके दिल की बात निकलवानी चाही।

     तीर निशाने पर लगा।

    "उस कुतिया ने मेरा जीना हराम कर दिया था। जब तक वह नहीं आई थी तब तक नाथू दादा मुझे सबसे ज्यादा चाहते थे।  मेरी तारीफ करते थे। वह मुझे भरपेट भोजन देते थे। लेकिन जब से गिट्ठे भाई उस कुतिया टिकली को लेकर आए तब से मुझे खाना भी कम दिया जाने लगा।" गुड्डी बताने लगी। मैंने देखा उसकी निर्भाव आंखें क्रोध से जलने लगी थीं।  

    "यह नाथू दादा कौन थे?" मैंने पूछा। 

    "अड्डे के मालिक हम सब नाथू दादा के अड्डे पर ही रहते थे।" गुड्डी ने बताया।

    "कैसा अड्डा? तुम्हारे मां-बाप भी तुम्हारे साथ रहते थे?" मैं गुड्डी से पूछा।

    "मैं नहीं जानती अपने मां-बाप को। सब बताते थे कि जब मैं दो बरस की थी तो नाथू दादा के अड्डे पर आ गई थी। कैसे पहुंची मुझे नहीं पता। नाथू दादा ने और गिट्ठे भाई ने मुझे टिरेनिंग दी।" गड्डी ने बताया।

    "काहे की ट्रेनिंग?" मैंने पूछा। यद्यपि गुड्डी के कमरे में मुझे भेजने से पहले बहुत संक्षेप में तारा ने मुझे उसके बारे में थोड़ी जानकारी देती थी लेकिन मैं गुड्डी के मुंह से ही सब कुछ सुनना चाहती थी।

     "भीख मांगने की। हम सब लोगों को रोज कम-से-कम 100 रुपये कमाने पड़ते थे। जो 100 रुपए या उससे ज्यादा भीख लाता उस बच्चे को भरपेट खाना दिया जाता। मैं भी सौ, सवा सौ, डेढ़ सौ रुपए तक रोज कमा लेती थी। नाथू दादा मुझे बहुत खुश रहते थे। मुझे भरपेट खाना देते थे। मेरी तारीफ भी करते थे और दूसरे बच्चों से कहते थे की एक गुड्डी को देखो जो रोज 100 रुपए से ज्यादा कमा लेती है और एक तुम लोग हो निकम्मे के निकम्मे। तुम लोगों को तो हाथ-पैर तोड़कर सड़क के किनारे बिठा दिया जाना चाहिए। तब तुम ज्यादा कमा सकोगे।" गुड्डी ने बताया।

     "बाप रे! नाथू दादा ऐसा कहते थे?" मैं जरा डरने का अभिनय किया।

    "हां, उन्होंने तो एक लड़के का हाथ तोड़ भी दिया था।" गुड्डी ज़रा शान से बताया।

   "लेकिन क्यों? क्यों तोड़ दिया था हाथ?" मैंने पूछा।

   "उस भोंदू से भीख मांगते बनती ही नहीं थी। नाथू दादा के कहने पर मैंने भी उसे सिखाया लेकिन उसकी बुद्धि में कुछ आया ही नहीं। मुश्किल से 10-15 रुपए कमा पाता था। नाथू दादा उसको डांटे हुए कहते भी थे कि कहां से ये कचरा आ गया है? इसे तो कोई कबाड़ी भी नहीं खरीदेगा। इसे तो मार के किसी नाले में फेंक देना चाहिए। नाथू दादा उसे मार देते लेकिन गिट्ठे भाई ने उन्हें सलाह दी कि इसका एक हाथ तोड़ दो तब लोग इस पर दया करेंगे और इसे ज्यादा भीख मिलेगी। और फिर भी नहीं मिलेगी तो इसकी आंखें फोड़ देंगे। तब नाथू दादा ने उसका एक हाथ तोड़ दिया था। वो बहुत रोया था। बहुत चिल्लाया था। हम लोग खूब हंसे थे।" उस पुराने दृश्य को याद करके गुड्डी के चेहरे पर पल भर के लिए मुस्कराहट तैर गई। जबकि वह सब सुनकर मेरा मन कांप उठा। लोग इतने क्रूर कैसे हो जाते हैं? गुड्डी या उसके जैसे और बच्चे ऐसा दृश्य देखकर कैसे हंस सकते हैं? यह तो अमानवीय है।

    ये गुड्डी, ये भी तो उन्हीं में से एक है। तभी तो अपने साथ के एक बच्चे के हाथ तोड़े जाने की घटना को मजे लेकर, मुस्कुरा कर बता रही है। 

    "फिर उस लड़के को ज्यादा भीख मिलने लगी?" मैंने पूछा। लेकिन इसके साथ ही मुझे लगा कि मैं शायद अपने रास्ते से भटक रही हूं मुझे उसे लड़के के बारे में नहीं बल्कि गुड्डी के बारे में जानना है और मेरे पास उससे बात करने का समय कम है।

    "हां पहले से तो ज्यादा कमाने लगा था लेकिन मेरे जित्ता नहीं। मैं बताऊं मैं कैसे मांगती थी?" यह कहते हुए गुड्डी ने मेरे आगे हाथ फैला-फैला कर,  मेरी बाहों को पकड़-पकड़ कर मुझे पैसे मांगने शुरू कर दिए। मैं उसका अभिनय देखकर चकित रह गई। कुछ पल पहले तक जो लड़की चट्टान की तरह खामोश दिखाई दे रही थी, उसने अचानक अपना रंग बदल लिया था। वह उस समय एक बहुत ही ज़रूरतमंद लड़की लग रही थी। ऐसी लड़की जिसने चार दिन से अन्न का दाना भी न चखा हो। वह बार-बार अपने पेट पर हाथ फेर रही थी और खाना मांग रही थी।

     "अरे वाह! गज़ब! तुम तो वाकई कमाल की लड़की हो!!" मैंने उससे वही कहा जो वह सुनना चाहती थी। 

    " नाथू दादा भी मुझसे यही कहते थे। मैं कमाल की लड़की हूं न!" गुड्डी ने फिर शान से कहा।

    "लेकिन फिर टिकली कहां से आ गई?" मैं गुड्डी से पूछा।

    "गिट्ठे भाई पता नहीं कहां से उसे उठा लाए थे। उसके भी हाथ-पैर तोड़कर, आंखें फोड़ कर,  किसी नुक्कड़ पर बिठा दिया जाना चाहिए था।" गुड्डी के स्वर में एक अजीब क्रूरता की झलक मुझे पहली बार मिली। नौ बरस की छोटी-सी बच्ची और इतनी गहरी क्रूरता के भाव? मुझे यह महसूस करके विश्वास नहीं हो रहा था। मन सिहर उठा। मैंने एक से एक जिद्दी बच्चे देखे हैं लेकिन गुड्डी के समान क्रूर नहीं।

     "कितनी बड़ी थी टिकली? तुमसे छोटी थी यह तुमसे बड़ी?" मैं गुड्डी से पूछा। 

      मैंने जानबूझकर टिकली का नाम लिया क्योंकि मैं समझ गई थी की टिकली का नाम सुनना गुड्डी को अप्रिय था। टिकली का नाम सुनकर उसका क्रोध जाग उठता था। वह क्रोध ही तो मुझे जगाना था ताकि गुड्डी उस अवस्था को बयां कर सके जिसमें उसने टिकली को जान से मार दिया था। 

     "मेरे बराबर थी, लेकिन मेरी जित्ती लंबी नहीं। नकचपटू थी। शकल की न सूरत की। नाथू दादा कहते थे कि इसको तो बेचने से भी ज्यादा पैसे नहीं मिलेंगे।" गुड्डी ने बताया। वह अपना कद ऊंचा बता रही थी जबकि वह औसत ऊंचाई की लड़की थी। शायद उसे अपने कद में अपने वर्चस्व का बोध था। 

    "तो टिकली से तुम्हारा झगड़ा क्यों हुआ?" मैंने पूछा। 

     "वो मेरी जगह लेना चाहती थी, मैं क्या उससे झगड़ती भी नहीं? मैंने उसको कई बार समझाया कि तू 100 रुपए से ऊपर मत कमाना। अगर ज्यादा मिल भी जाए तो मुझे दे देना। लेकिन वो मानती ही नहीं थी। मेरे ही चौराहे पर झपटती रहती और मुझे ज्यादा पा जाती। नाथू दादा भी उसकी तारीफ करने लगे थे। उसे पूरी थाली खाना दिया जाता। अब आप ही बताओ कि मेरे चौराहे पर अगर वो ज्यादा कमाती  तो मुझे ज्यादा कहां से मिलता?" गुड्डी ने मुझसे पूछा।

      "तुम सही कह रही हो। तुमने इस बारे में नाथू दादा से बात नहीं की?" मैंने उसकी बात का समर्थन करते हुए उससे पूछा। गुड्डी की बातों से इतना तुम्हें समझ गई थी कि टिकली घर से उठा कर वहां नहीं लाई गई थी बल्कि किसी और अड्डे से लाई गई थी, वरना आते ही वह गुड्डी को टक्कर कैसे देने लगती? एक अड्डे से दूसरे अड्डे बेंची-खरीदी गई थी वह टिकली नाम की बच्ची। 

      "मैं बोली थी लेकिन नाथू दादा की तो वह सगी हो गई थी। नाथू दादा मेरा मजाक उड़ाने लगे थे कि गुड्डी तो अब बुड्ढी हो गई। यह सुनकर मेरा खून खौल जाता। मेरा बस चलता तो उसी समय मैं उस कुतिया को काट कर रख देती।" एक बार फिर क्रोध की वही चमक गुड्डी की आंखों में तैर गई।

     "तो इसीलिए तुमने उसे मार डाला?" मैं गुड्डी से पूछा।

    "वह मेरा कहना मान लेती तो मैं उसे नहीं मारती। वह ज्यादा भीख कमा कर नाथू दादा की आंखों में चढ़ गई थी। उसे भरपेट भोजन दिया जाता और मेरी थाली से भोजन कम किया जाने लगा। एक टाइम तो ऐसा आया कि मुझे आधा पेट भोजन दिया जाने लगा।" गुड्डी ने बताया। 

    "अरे, ऐसा क्यों?" मैं आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा।

     "वहां ऐसा ही था। जो 100 रुपए या उससे ज्यादा काम कर लाता उसे पूरी थाली मिलती। जो 100 रुपए से जितना कम कमाता उसे उतना ही कम खाना दिया जाता।" गुड्डी ने निर्भाव स्वर में कहा। यह उसके लिए कोई विशेष बात नहीं थी। मुझे लगा कि यह तो ग्लेडिएटर्स के जमाने की लड़ाई है। जिंदा रहने की लड़ाई भूख की लड़ाई। जो सशक्त है वह जिंदा रहे वह खाना पाएगा और जो कमजोर है वह पराजित होकर मर जाएगा और वह भी भूखे पेट। या फिर यह एक ‘हंगर वार’ भी कहा जा सकता है। भूख की एक ऐसी लड़ाई जो अमूमन अपने देश के हर चौराहे पर रोज़ लड़ी जाती है। चील-झपट्टा मारते हुए भिखारी बच्चे, जिन्हें हम देखकर झुंझलाते हैं खीझते हैं और फिर कुछ सिक्के उन्हें थमा कर सोचते हैं कि हमने बहुत बड़ी दयानतदारी दिखा दी। मैं समझ नहीं पाती हूं कि हमारे तेजी से प्रगति कर रहे शहरों के चौराहों पर भिखारी बच्चे क्यों हैं? सब उन्हें देखते हैं लेकिन उनके लिए कोई सही कदम नहीं उठाता है। चंद एनजीओ सब कुछ नहीं कर सकते हैं। फिर उनमें भी तो असली और नकली मौजूद हैं। असली कुछ काम करते हैं और नकली दिखावा करते हैं। इसीलिए हालात जहां के तहां हैं। 

     "और मान लो किसी दिन कोई कमा कर नहीं ला पाता तो क्या उसे खाना ही नहीं दिया जाता था?" मैं गुड्डी से पूछा।

     "और क्या!  उस टिकली के कारण मेरे साथ भी ये हुआ। कई बार मुझे रात को भूखा रखा गया। बरसात आई तो परेशानी और बढ़ गई । बरसात के कारण चौराहे पर लोग कम देर रुकते और जो रुकते उनसे टिकली पैसे झटक लेती। मुझे पैसे नहीं मिल पाते। तब नाथू दादा मुझे भूखा रखते। उनका तो यही नियम था कि जो जितना काम के लेगा उसको उतना खाना दिया जाएगा। कम से कम 50 रुपए रोज कमाना जरुरी था। टिकली के कारण मुझे 50 रुपए भी नहीं मिल पा रहे थे। तभी मैं सोच लिया था कि इस टिकली को अपने रास्ते से हटा के रहूंगी।" फिर वही क्रूर भाव गुड्डी के मासूम चेहरे पर कौंध गए। उसे पाल गुड्डी अपनी आयु से बहुत अधिक बड़ी लगी। किसी घाघ अपराधी की भांति।

     "जिस दिन तुमने उसे मारा, उस दिन क्या तुम्हारा उससे झगड़ा हुआ था?" मैंने गुड्डी से पूछा। 

    "नहीं उस दिन नहीं उससे पहले।"

    "कितने पहले?"

    "कई दिन पहले।"

     "क्यों?"

     "एक तो मेरा चौराहा उसने हड़प लिया था और मुझे बुड्ढी-बुड्ढी कहकर चिढ़ाने लगी थी। उसने तो मुझे यह भी कहा था कि वो मेरे हाथ-पैर तुड़वा देगी और अड्डे से बाहर फेंकवा देगी।" गुड्डी ने मुंह बनाते हुए कहा।

     "क्या वह सही में ऐसा कर पाती?" मैंने पूछा।

     "हां ! वो नाथू दादा से कहती तो नाथू दादा मेरे हाथ पैर तोड़ देते और मुझे अड्डे से बाहर फेंक देते। नाथू दादा उसी की सुनने लगे थे। गिट्ठे भाई भी टिकली-टिकली करते रहते थे। उन्हें इसी बात की शान थी कि वह इतनी अच्छी भीखमंगन लेकर आए हैं।" गुड्डी ने कहा उसके स्वर में रोष झलक रहा था। उसकी बातें सुनकर मुझे लग रहा था कि मैं किसी और ही दुनिया की बात सुन रही हूं। क्या इस धरती पर, अपने देश में, अपने शहरों में सही में ऐसा हो रहा है? यक़ीन करना कठिन हो रहा था। यह सच अविश्वसनीय था और बेहद कड़वा भी।

      "लेकिन कम कमाने के कारण उस लड़के का भी तो हाथ तोड़ा गया था। और तुम लोग उसे रोता-चींखता देखकर हंसे थे।" मैं गुड्डी को याद दिलाया।

     "वह तो भोंदू था भोंदू। चार रुपए भी नहीं कमा पाता था।" गुड्डी सामान्य भाव से बोली। जैसे उस लड़के का हाथ तोड़ा जाना कोई उसके लिए विशेष घटना नहीं थी। गोया, वह लड़का हाथ तोड़ा जाना ‘डिज़र्व’ करता था। उफ़! यह मानवीय भावनाओं का कितना विकृत रूप है।

     "लेकिन टिकली के आ जाने से तुम भी तो उस लड़के की तरह भोंदू साबित होने लगी थीं।" मैंने गुड्डी की मनोदशा को भांपते हुए सीधे उसके मन पर चोट की।

     "मैं भोंदू नहीं थी।" गुड्डी ने अचानक भड़क कर कहा और मैंने देखा कि उसने क्रोध से भरकर अपनी तर्जनी के नाख़ून से मेज पर एक लकीर-सी खींच दी । जैसे किसी चाकू से मेज की धरातल पर स्क्रैच कर दिया गया हो। उसकी यह जुनूनी ताक़त देखकर मैं इस स्तब्ध रह गई।

     "लेकिन वहां सबको तो यही लगता रहा होगा कि तुम भोंदू हो गई हो।" मैंने उसे और उकसाया।

     "हां लगता था न! मुझे कई-कई दिन तक के भूखा रखा जाने लगा था। सब मुझ पर हंसते। सब मेरा मज़ाक उड़ाते।और वह कुतिया टिकली मुझे चिढ़ाती थी। इसीलिए तो उस दिन मैंने उसे ठिकाने लगा दिया।" किसी पेशेवर अपराधी की तरह गुड्डी ने कुटिलतापूर्वक कहा।

     स्पष्ट था कि "कुतिया", “रास्ते से हटाना", "ठिकाने लगाना" जैसे शब्द गुड्डी ने अपने अड्डे पर ही सीखे होंगे, जहां नाथू दादा और गिट्ठे भाई बात-बात पर गालियां देते रहे होंगे और मार डालने की बातें करते रहे होंगे। गुड्डी तो जब दो बरस की अबोध आयु में उस अड्डे पर लाई गई होगी तब उसके दिमाग का काग़ज़ बिल्कुल कोरा रहा होगा। उस अड्डे पर उसके दिमाग के काग़ज़ पर जो कुछ लिखा गया वहीं उसकी जुबान पर चढ़ता गया। उसे यह शिक्षा भी वही मिली होगी कि जो तुम्हें पसंद नहीं है, उसे मौत के घाट उतार दो।

      "तुमने कैसे मारा टिकली को?" मैं गुड्डी से पूछा। इस बारे में तारा मुझे विस्तार से नहीं बता पाई थी बस, उसने इतना ही बताया था कि इस लड़की ने अपनी हम उम्र लड़की की हत्या कर दी थी, वह भी बहुत वीभत्स तरीके से।

      "तुमने कैसे मारा था उसे?" मैंने अपना प्रश्न दोहराया।

      "उस दिन भी वह चौराहे पर दौड़-दौड़ कर मेरी भीख हड़प रही थी। मुझे लगा कि यदि यह इसी तरह मेरी भीख हड़पती रही तो मुझे फिर भूखा रहना पड़ेगा। तब मैंने उसे उल्लू बनाया। मैंने उससे कहा कि एक औरत ने मुझे मिठाई दी है। चल, तुझको भी खिलाती हूं। पहले तो उसे शक हुआ लेकिन मैंने अपनी फ्रॉक में लपेटा हुआ पत्थर ऊपर से दिखा दिया। उसे लगा कि वह मिठाई है और वह लालच में पड़ गई। लालची कुतिया। मैं उसे चौराहे से दूर नाले के पास ले गई। वहां मैंने उसे जमीन पर पटक कर खूब मारा। इस पर वह भी मेरे बाल नोंचने लगी। तो मुझे जोर से गुस्सा आ गया और मैंने एक पत्थर उठाकर उसके सिर पर पटक दिया। मैं तब तक उसका सिर कुचलती रही जब तक वह नागिन मर नहीं गई। मेरी फ्रॉक गीली हो गई थी उसके गंदे खून से। लेकिन मैंने उसे मार डाला।" यह कहते हुए गुड्डी के चेहरे पर विजय के भाव चमकने लगे। निश्चित रूप से उसके मानस में वह दृश्य जाग उठा होगा क्योंकि विजय के साथ एक तृप्ति का भाव भी उसके चेहरे पर झलक रहा था। कहीं कोई पछतावा नहीं। कोई अफ़सोस नहीं। मानो, जो उसने किया वह सही किया।

      “फिर?” मैंने पूछा।

      “किसी ने हमें देख लिया था। इसलिए वहां भीड़ लग गई। फिर पुलिस आई और पुलिस ने मुझे पकड़ लिया।” गुड्डी ने बेझिझक बताया।

       "तुम्हें टिकुली को मारते हुए डर नहीं लगा था?" मैंने उससे पूछा।

      "काहे का डर?" उसने उल्टे आश्चर्य प्रकट करते हुए मुझसे पूछा।

      "यही कि पुलिस तुम्हें पकड़ लेगी और जेल भेज देगी।" मैंने कहा। 

      "उस समय इतना कौन सोचता? मैंने तो कभी जेल देखी भी नहीं थी। और अच्छा है पुलिस ने मुझे पकड़ लिया अब भरपेट खाना तो मिलता है। लेकिन पुलिस ने मुझे जेल में नहीं रखा है।" गुड्डी ने इस ढंग से कहा जैसे उसे जेल न देख पाने का मलाल हो। मुझे उससे इस उत्तर की आशा नहीं थी। ज़़िदा रहने के लिए खाना ज़रूरी है लेकिन खाने के लिए किसी से उसकी ज़िंदगी छीन लेना क्या यह भी ज़रूरी हो सकता है?

     "तुम्हें नहीं लगता कि यदि तुम टिकली को नहीं मारतीं तो आज वह ज़िदा होती।" मैं गुड्डी से पूछा।

     "मैं उसे नहीं मारती तो वह मुझे मार देती।" गुड्डी ने निर्णायक स्वर में कहा। 

     "तो अब तो तुम्हें भरपेट खाना मिलता है। अब तो तुम्हें पहले जैसा गुस्सा नहीं आता होगा? अब तो तुम किसी को नहीं मरोगी न?" मैं गुड्डी से पूछा।

      "गाय से उसकी रोटी छीनो तो वह भी सींग मारती है। कुत्ते से उसकी हड्डी छीनों तो वह भी काटने लगता है। वह मुझसे मेरी रोटी छीन रही थी, तो मैंने उससे उसकी ज़िंदगी छीन ली। हिसाब बराबर।" उसने अपने दोनों हाथ झाड़ते हुए कहा।

      तभी सुधार गृह का चपरासी हम दोनों के लिए कुल्हड़ चाय लेकर आ गया। गुड्डी ने लगभग झपटते हुए चाय का कुल्हड़ उठाया और गरमा-गरम चाय सुड़क-सुड़क कर पीने लगी। मैंने देखा की भूख और सलीके का आपस में कोई रिश्ता नहीं रह जाता है। उसे पता था कि यहां उसकी चाय उससे कोई छीनने वाला नहीं है लेकिन झटपट सब कुछ हलक से नीचे उतार लेने की आदत गुड्डी में रच-बस गई थी। 

         गुड्डी वर्चस्व का महत्व भी जानती थी। क्या बाल सुधार गृह में वह इस वर्चस्व के मोह से बाहर निकल सकेगी? या अपने विरुद्ध सर उठाने वाले का सिर कुचल देने का अपराध फिर से करेगी? इन चुनौतियों से काउंसलर्स को निपटाना पड़ेगा। वही प्रशस्त कर सकते हैं गुड्डी के जीवन का सही रास्ता। 

     मेरी चाय खत्म होने से पहले इंस्पेक्टर और तारा कमरे में आ गईं। 

    "हो गई बात?" तारा ने मुझसे पूछा।

    "हां, हो गई।" कहते हुए मैंने गुड्डी के चेहरे की ओर देखा। उसका चेहरा फिर वैसा ही निर्भाव था जैसे कमरे में प्रवेश करते समय मैंने पाया था।

     "आपको क्या लगता है, ये लड़की कभी सुधरेगी?" उस महिला इंस्पेक्टर ने मुझसे धीमें स्वर में पूछा।

     "अभी कुछ भी कह पाना कठिन है। इसके मन में वह अपराध अभी ग्लोरिफाइड है। जब तक इसे यह अहसास नहीं होगा कि इसने जो किया वह ग़लत था, तब तक गलती दोहराए जाने की संभावना अधिक है।" गुड्डी के बारे में मुझे जो लगा वह मैंने उस इंस्पेक्टर को बताया।

     "बिल्कुल ठीक! यही मेरा भी ख्याल है। आपने सही पहचाना इसे। ऐसे बच्चों को तो सुधार गृह के बजाय जेल में होना चाहिए। वह भी बड़ों की जेल में। समाचारों में देखिए न, इसी की उम्र के लड़के बलात्कार तक करने लगे हैं। जब अपराध बड़ों के जैसा हों तो सजा भी बड़ों जैसी ही मिलनी चाहिए। मुझे तो यही लगता है।" इंस्पेक्टर ने अपनी राय प्रकट की। मैं भी इंस्पेक्टर की बातों से सहमत थी लेकिन मैंने कोई टिप्पणी नहीं की। यह मामला इतना आसान नहीं था। अभी तो गुड्डी सिर्फ 9 साल की है। अभी तो पूरे 9 बरस बाकी है उसके बालिग होने में। हो सकता है तब तक वह वे सारी बातें समझने लग, जो उसे समझना चाहिए। 

       "अच्छा लगा आपसे मिलकर।" कहते हुए इंस्पेक्टर ने अपना दायां हाथ मेरी ओर बढ़ाया। मैंने भी उससे हाथ मिलाया।

      "अभी निकल रही हैं?" मैंने इंस्पेक्टर से पूछा।

    "जी! फिर कभी यहां आई तो आपसे जरूर मिलूंगी।" उसने मुझसे कहा।

    " जी अवश्य! मुझे भी आपसे मिलकर खुशी होगी।" मैं इंस्पेक्टर से कहा। इसी के साथ मेरे मन में यह विचार कौंधा कि क्या गुड्डी से फिर कभी भेंट होगी? 

     हम सभी कमरे से बाहर निकल आए। इंस्पेक्टर की गाड़ी तैयार खड़ी थी। उसके साथ चल रहे सिपाही भी गाड़ी पर सवार हो चुके थे। गुड्डी और इंस्पेक्टर के गाड़ी में सवार होते ही ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी। 

      गाड़ी अभी थोड़ा आगे बढ़ी ही थी कि अप्रत्याशित रूप से गुड्डी ने खिड़की से बाहर हाथ निकाल कर मेरी ओर हिलाया। जबकि वह एक सिपाही के बाजू में बैठी थी। खिड़की से परे। मैंने भी जवाब में उसकी ओर देखकर अपना हाथ हिला दिया। बस, वही उसकी आखिरी झलक थी, इसके बाद गाड़ी तेजी से आगे बढ़ गई। 

        मैं भारी मन से वही खड़ी रही। ऐसा लग रहा था जैसे कोई परिचित अभी विदा हुआ हो। लेकिन यदि कोई मुझसे पूछे कि क्या गुड्डी को तुम अपने साथ रखना चाहेगी तो मेरा ईमानदार उत्तर होगा “नहीं!” क्योंकि शायद गुड्डी को अपने साथ रखते हुए मुझे भी इस बात की शंका बनी रहेगी कि न जाने कब गुड्डी के भीतर की अपराधिक भावना जाग उठे। यदि एक छोटी बच्ची को अपने साथ की लड़की को कुचल- कुचल कर मारते समय हाथ नहीं कांपे तो यह चिंता का विषय है। दरअसल,  उसे मनोचिकित्सा की जरूरत है। उसे इस एहसास की जरूरत है कि उसने जो किया ग़लत किया। उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था। भले ही लड़ाई भूख की थी लेकिन पेट भरने का रास्ता किसी की मौत से होकर नहीं गुज़रना चाहिए था।

      "मिल गई तुझे स्टोरी? मुझे तो बस यह बता कि यह लड़की जन्मजात क्रिमिनल है या परिस्थितिवश? मैंने तो जब सुना कि उसने अपनी साथी लड़की को किस तरह मारा, तो मेरे तो रोंगटे खड़े हो गए। इतनी छोटी बच्ची और उसने इतना बड़ा अपराध किया वह भी सोच समझकर यह कैसे कर डाला उसने?" तारा ने मुझसे पूछा।

      "कैसी स्टोरी? इतनी छोटी बच्ची और इतना बड़ा अपराध! इस बचपन में वह बड़ों जैसी मानसिकता के साथ जी रही है। उसका भविष्य क्या होगा, यह सोचकर ही मुझे अजीब लग रहा है। वह जन्म से अपराधी मानसिकता की नहीं है लेकिन अपराध की भावना ने उसके मन में जन्म ले लिया है। उसने न कभी परिवार जाना, न रिश्ते, न कभी कोई आत्मीय संबंध। उसने यदि कुछ जाना तो सिर्फ भूख को। भूख इंसान को क्या से क्या बना देती है?" मैंने तारा से कहा।

       हम दोनों बहुत देर तक गुड्डी के बारे में बातें करती रहीं। फिर मैंने तारा से विदा ली और वापस अपने घर की ओर चल पड़ी।

     बाल सुधार गृह जाते समय मैंने तय किया था कि मैं अब एकाग्रता से स्कूटी चलाऊंगी। लेकिन लौटते समय मुझे वह प्रयोगात्मक कहानी याद आने लगी जो मैंने मनोविज्ञान के अंतर्गत पढ़ी थी। उसे कहानी में कुछ शिशुओं को चुना गया और उनमें से कुछ को ज्ञानवान शिक्षकों के साथ रखा गया तथा कुछ को बुरी आदतों वाले चोर बदमाशों के साथ रखा गया। थोड़े बड़े होने पर देखा गया कि उन बच्चों में उसी तरह की आदतें विकसित हुईं जिस तरह के माहौल में उन्हें रखा गया था। शिक्षकों के साथ रहने वाले बच्चे अच्छी भाषा बोलने लगे थे जबकि चोर- बदमाशों के साथ रहने वाले बच्चे गाली गलौंच करने लगे थे। सचमुच बच्चों की जीवन की दिशा उनके माहौल पर निर्भर करती है। यह सब सोचते-सोचते कब चौराहा आ गया मुझे पता ही नहीं चला। 

      चौराहे पर रेड सिग्नल था। मुझे स्कूटी रोकनी पड़ी। वहां गाड़ियां रुकते ही भीख मांगने वाले बच्चों का एक दल तेजी से झपटा। यह दृश्य मेरे लिए कोई नया नहीं था। जब भी मैं उस चौराहे से गुज़रती हूं तो उन भीख मांगने वाले बच्चों को देखती हूं। लेकिन आज मेरा दृष्टिकोण बदल गया था मैं उन बच्चों के चेहरे को पढ़ना चाह रही थी कि कहीं उनमें भी कोई गुड्डी या  कोई टिकली तो नहीं है? कल के अखबार में इनमें से किसी की खबर पढ़ने को तो नहीं मिलेगी? 

      अब उस चौराहे पर मैं सिर्फ़ चार रास्ते मिलते हुए नहीं देख रही थी, रंग बदलती ट्रैफिक लाई् बल्कि मैं देख रही थी उसे अदृश्य युद्ध को जो उस चौराहे पर कुछ नन्हे बच्चों के द्वारा लड़ा जा रहा था। भूख का युद्ध। इस युद्ध में किसी दिन रक्तपात भी हो सकता है, क्या यह जानते हैं उनकी हथेली पर सिक्का रखने वाले? नहीं, भूख का युद्ध लड़ने वाले भी ख़ुद नहीं जानते। सिग्नल लाल से हरे में बदल गया। मैंने अपनी स्कूटी आगे बढ़ा दी।  लेकिन मेरा मन उसी चौराहे पर चस्पा होकर रह गया था। मुझे मालूम है कि कई दिन तक मेरे सपनों में गुड्डी, टिकली और वह हाथ टूटा लड़का दिखाई देते रहेंगे और मेरे चेतन और अवचेतन में मुझे बेचैन करते रहेंगे। 

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शनिवार, जनवरी 11, 2025

कहानी | प्रेम वाया एल. डी. आर. | डॅा.(सुश्री) शरद सिंह | पहला अंतरा में प्रकाशित

"पहला अन्तरा" अक्टूबर-दिसंबर 2024 में प्रकाशित :

कहानी
   प्रेम वाया एल. डी. आर.  
       - डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

  ‘‘सुरू! देख यदि तुझे कोई पसंद है तो पहले बता दे। तेरे लिए कई जगह से रिश्ते आ रहे हैं। यदि तुझे ऑब्जेक्शन न हो तो हम तेरे लिए लड़का पसंद करें।’’ मां ने सुरू यानी सुरेखा से दो-टूक शब्दों में पूछा। यह अच्छी बात थी कि मां ने एक न्यू जेनरेशन माॅम की तरह सुरेखा से खुल कर उसकी इच्छा पूछी। जबकि खुद सुरेखा की मां को यह अवसर नहीं दिया गया था। वह तो ऊपर वाले की कृपा से सुरेखा की मां को खुले विचारों वाला, सुलझा हुआ पति मिला। इसीलिए यह संभव हो सका कि सुरेखा की मां ने सुरेखा के पिता के सामने यह प्रश्न सुरेखा से पूछ लिया।
‘‘हां बेटी बोलो! अगर तुम्हारी कोई च्वाइस हो तो हम उसका रिस्पेक्ट करेंगे। बस, थोड़ी जांच-पड़ताल जरूर करेंगे। पेरेंट्स होने के नाते। लेकिन अपनी मर्जी तुम पर थोपेंगे नहीं। आई स्वेयर!’’ सुरेखा के पिता ने अपनी पत्नी के प्रश्न का समर्थन करते हुए कहा।
‘‘थैंक्यू ममा! थैंक यू पाॅप! मैं आप लोगों को बताने ही वाली थी कि मुझे एक लड़के पर क्रश है।’’ कह कर सुरेखा चुप हो गई।
‘‘सिर्फ़ क्रश? लव नहीं?’’ मां ने मुस्कुरा कर पूछा।
‘‘आई थिंक आई हैव फालेन लव विथ हिम!’’ सुरेखा ने कुछ सोचते हुए कहा।
‘‘यू थिंक? नाॅट श्योर?’’ अब पिता ने चिंतित होते हुए पूछा।
‘‘याह! बिकाज़ वी आर लिविंग इन एल.डी. आर.।’’ सुरेखा ने सधे हुए स्वर में उत्तर दिया।
‘‘व्हाट मीन एल.डी. आर.?’’ मां और पिता दोनों एक साथ पूछ बैठे।
‘‘लिव इन?’’ फिर मां ने सशंकित स्वर में पूछा।
‘‘लिव इन! माॅम आप ये क्या कह रही हैं? मैं पूरे समय अपने कमरे में अकेली बंद रहती हूं। क्या आपने किसी बंदे को मेरे रूम में आते देखा है कभी?’’ सुरेखा खिलखिला कर हंस पड़ी।
मां झेंप गई। बेटी सही कह रही थी। वह अकेली अपने कमरे बैठी रहती है अपनी कंपनी की ड्यूटी बजाती हुई। क्या पूछ बैठी वह भी! मां ने मन ही मन अपने माथे को ठोंका।
‘‘ओके! लड़का कहां का है? अपने ही शहर का है?’’ पिता ने एल.डी. आर. का फुल फार्म पूछने का रिस्क नहीं लिया। क्या पता उसे भी बेटी के सामने अपने अज्ञान पर लज्जित होना पड़े।
‘‘भावनगर का है।’’ सुरेखा ने बताया।
‘‘यानी गुजरात?’’ पिता ने कहा।
‘‘जी, अभी तक तो भावनगर गुजरात में ही है।’’ सुरेखा ने चुटकी ली। वह नए जेनरेशन की बेटी थी, मांता-पिता से झिझकने का तो सवाल ही नहीं था। मौका पाते ही अटैक!
‘‘तुम्हारे साथ पढ़ता था? या तुम्हारी कंपनी में है?’’ पिता ने सावधानीपूर्वक पूछा।
‘‘दोनों गलत! बट नाऊ आई एम बिज़ी! बाकी बातें बाद में करूंगी।’’ सुरेखा ने माता-पिता से कहा और बैठक से उठ कर अपने कमरे की ओर बढ़ ली। फिर सहसा पलट कर बोली,‘‘मेरे लिए फिलहाल लड़का मत ढूंढिए। यदि मुझे कोई सही बंदा नहीं मिला तो एट लास्ट मैं आप लोगों को बता दूंगी।’’
सुरेखा मुस्कुराती हुई अपने कमरे में चली गई। उसके पीछे उसके कमरे का दरवाज़ा डोर-क्लोज़र के द्वारा अपने-आप बंद हो गया। बंद दरवाज़े पर बड़ा-सा पोस्टर लगा था -‘‘डोंट ट्राई इंटर माई रूम! इट वुड बी ए क्राईम!’’ (मेरे कमरे में प्रवेश करने का प्रयास मत करना! यह अपराध होगा!) साथ में एक घूंसे की तस्वीर थी।
घर में तीन प्राणी रह रहे थे। सुरेखा, उसकी मां और पिता। सुरेखा का बड़ा भाई चार साल पहले बैंकाक चला गया था। आज भी वहीं है। लौट कर आने का उसका इरादा भी नहीं है। घर में काम करने वाली नौकरानी इतनी अंग्रेजी समझती नहीं है, हां, वह घूंसा जरूर समझ जाती होगी। तो यह लिखित चेतावनी स्पष्ट है कि माता-पिता के लिए ही है कि वे अपनी सीमाओं का ध्यान रखें और उसका उल्लंघन करने के बारे में सोचे भी नहीं।    
वैसे इस कहानी का शीर्षक पढ़ कर इस भ्रम में मत पड़ जाइएगा कि यह कोई पारंपरिक प्रेम का किस्सा है। वैसे प्रेम पारंपरिक हो सकता है किन्तु प्रेम का तरीका पारंपरिक हो, यह आवश्यक तो नहीं।
जब प्रेम की हवाएं चलती हैं तो उसमें कभी रातरानी की सुंगध भर जाती है तो कभी महुए की मदकता। कभी आम्रमंजरी झूमने लगती है तो कभी माॅर्निंग ग्लोरी की घंटेनुमा फूलों वाली बेलें डोलने लगती हैं। यह बात और है कि प्रेम आजकल बागीचों ने नहीं बल्कि मोबाईल या टेबलेट या फिर लैपटाॅप के स्क्रीन से गुरू होता है। वह भी किसी एप्प के जरिए। चाहे वह चेहरे वाली किताब का एप्प हो या क्या हुआ एप्प या फिर ग्राम-छटाक वाला एप्प। उस पर अगर कहीं रील वाला एप्प हुआ तो प्रेम नाचता-गाता, थिरकता या फिर प्रैंक करता हुआ आता है। है न, विचित्र बात? नहीं! ये सारी बातें भी अब पुरानी हो चली हैं। अब प्रेमी जोड़े का एक प्राणी बैंगलुरु में होता है तो दूसरा गुरुग्राम में। एक चेन्नई में तो दूसरा लद्दाख में। एक दिल्ली में तो दूसरा वाशिंगटन में। लो कर लो प्यार!
मगर प्यार तो प्यार है जैसे सुरेखा और कार्तिक को हो गया। बुंदेलखंड के ठाकुर साहब की बेटी और भावनगर के पटेल साहब के छोकरे कार्तिक के बीच प्यार। अब आप सोचेंगे कि दोनों एक साथ पढ़ते रहे होंगे। सहपाठियों में प्रेम होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं था। उस छोटे से वायुयान में उड़ने सेे पहले वे दोनों एक दूसरे से मिले ही नहीं थे। भले ही वह उड़ान उनकी साथ-साथ पहली उड़ान थी, भले ही उससे पहले उन्होंने एक-दूसरे को साक्षात नहीं देखा था, परस्पर स्पर्श की बात तो बहुत दूर की है। लेकिन दोनों उस उड़ान से पहले ही एक-दूसरे के प्रेम में तन-मन से सिर से ऊपर तक डूब चुके थे, फिर भी अपने प्रेम को ले कर आश्वस्त नहीं थे।
अपने एक साझा मित्र के सौजन्य से दोनों ने एक पापुलर एप्प पर एक-दूसरे की तस्वीर देखी और बस फ़िदा हो गए एक-दूसरे पर। प्रथम दृष्टि में प्रेम ज़रिए सोशल मीडिया एप्प। जिस दिन से दोनों को यह अनुभव हुआ कि वे दोनों एक-दूसरे के लिए बने हैं बस, उसी दिन से दोनों का समय सोशल मीडिया के थ्रू एक-दूसरे के हवाले हो गया। यह भी एक तरह का फ़ोमो ही था। फ़ोमो यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट। यानी कहीं कुछ छूट न जाए। दोनों एक दूसरे की हर पोस्ट को लाईक करते। उस पर कमेंट करते। बड़ी मेहनत से ढूंढ-खोज कर सटीक इमोजीज़ लगाते। ऐसा करते हुए दोनों का दिल तेजी से धड़कता। आंखों की पुतलियां फैल जातीं। होंठों पर मुस्कुराहट गहराने लगती। दोनों की पीठ अपने कमरे के बंद दावाज़े की ओर होती। यूं भी बिना थापा दिए किसी को कमरे में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। फिर भी यदि कहीं कोई भूले से अचानक प्रवेश कर जाए तो उनके चेहरे की भाव-भंगिमा न देख सके। फिर एक अदृश्य उंगली विंडो टैब पर हमेशा रहती। ताकि आपातकाल में एक्टिव विंडो को गिरा कर किसी इनेक्टिव विंडो को जगा दिए जाए। जैसे कार्यालयों में ड्यूटी टाईम में अपने कम्प्यूटर पर ताश के पत्तों का गेम खेलने वाले अकसर करते हैं। बाॅस अगर सिर पर आ कर खड़ा हो जाए तो वह यही पाएगा कि बेचारा बंदा कितने मनोयोग से डाटा अपडेट कर रहा है।
सुरेखा और कार्तिक के कमरों में भी यदि किसी का आपात प्रवेश होता तो वह यही पाता कि वे अपने लैपटाॅप पर कितनी तन्मयता से अपनी-अपनी ऑनलाईन ड्यूटी कर रहे हैं। वर्क फ्राम होम के ढेर सारे लाभों में से एक बहुत बड़ा लाभ यह भी है। अपना कमरा, अपना लैपटाप, अपनी दुनिया। चाहें आप ऑन लाईन गेमिंग करें या ऑन लाईन लविंग, सब कुछ पूरी पर्देदारी के साथ, निश्चिंत हो कर। दरअसल इश्क़ परवान चढ़ने के तरीके ढूंढ ही लेता है, उसके लिए किसी को अतिरिक्त श्रम करने की या माथा खपाने की आवश्यकता नहीं होती है।
सुरेखा से कहीं अधिक ‘‘मोस्ट एलिजिबल बैचलर’’ कार्तिक था। धनाढ्य व्यवसायी परिवार का दैदिप्यमान नक्षत्र। सारे बड़े ग्रहों से ले कर क्षुद्र ग्रह तक अपनी-अपनी सुपुत्री के लिए उसके लिए परिक्रमा करना शुरू कर चुके थे। मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर काम करने वाला। एक बड़े पैकेज का कमाऊ पूत। हर माता-पिता को उसके साथ अपनी बेटी का भविष्य सुरक्षित और सुखद दिखाई दे रहा था। कार्तिक के परेशान माता-पिता पचहत्तर प्रतिशत प्रगतिशील थे। उन्होंने चंद लड़कियां की तस्वीरें बटोर लीं और फिर वही प्रश्न कार्तिक से किया जो उधर सुरेखा से किया गया था।
‘‘हूं कहूं छूं, कार्तिक तेरे को कोई छोकरी पसंद है क्या? टेल मी!’’ कार्तिक की मां ने उसकी प्लेट में सैंडविंच रखते हुए पूछा। उनकी भाषा भी गुजराती हिंदी और अंग्रेजी की सेंडविच थी।
नाश्ते का समय अर्थात् पटेल परिवार में पारिवारिक बातें करने का सही समय। क्योंकि उसके बाद कार्तिक अपने कमरे में बंद हो जाता है। उसकी छोटी बहन चारुल इंस्टीट्यूट चली जाती। कार्तिक के पिता अपनी कंपनी के आफिस चले जाते थे और मां अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाती थी जिसमें शाॅपिंग से ले कर किटी पार्टी तक शामिल थी। रात को थके-मांदे मन से कोई बातें करने के मूड में नहीं रहता था। उनका दोपहर का भोजन कभी साथ नहीं होता था। सभी अपनी-अपनी सुविधानुसार दोपहर का भोजन करते थे। कार्तिक तो प्रायः अपनी थाली अपने कमरे में ही ले जाता था। उसके कमरे के बंद दरवाज़े के बाहर उसी तरह की लगभग चेतावनी वाला पोस्टर लगा था, जैसा कि सुरेखा के कमरे के दरवाज़े के बाहर। सैंकड़ों मील की दूरी, पर पोस्टर एक-सा, विचार एक से, जिसका सार था-‘‘हमारे जीवन में ताक-झांक मत करो! यह अपराध है।’’
वस्तुतः आयु के हर पड़ाव पर अपराध के अर्थ बदलते रहते हैं। बचपन में चाॅकलेट चुराने वाले के लिए चेतावनी होती है, अर्द्ध युवावस्था में कौतूहल पर रोक लगाने वालों के लिए चेतावनी होती है और पूर्ण युवावस्था निजता के मौलिक अधिकार की ताल ठोंक कर घोषणा कर देती है। समझदार माता-पिता अपने बेटे या बेटी के इस अधिकार का सम्मान कर के घर में शांति बनाए रखते हैं। वहीं, चंद अविवेकी माता-पिता इस अधिकार को नकार कर घर में गंभीर कलह को दावत दे देते हैं। कार्तिक के माता-पिता प्रथम श्रेणी के थे। उन्होंने तब तक कार्तिक की निजता को निजी रहने दिया जब तक कि उन पर लड़की वालों का दबाव नहीं पड़ने लगा।
‘‘हां बेटा, शुं तमने कोई छोकरी गमे छे?’’ पिता ने भी मां का ही प्रश्न दोहराया कि क्या तुम्हें कोई लड़की पसंद है?
‘‘हां कदाच! आई थिंक सो!’’ कार्तिक ने उत्तर दिया।
‘‘थिंक ऑर श्योर?’’ वही प्रश्न किया कार्तिक के पिता ने। सुरेखा के पिता वाला प्रश्न। मसला वही, पिता का उत्तरदायित्व वही, सो प्रश्न भी वही रहना ही था। फिर यह प्रश्न दुनिया की चाहे जिस भाषा, जिस समुदाय या जिस देश में किया जाता।
‘‘आई एम श्योर, बट नाॅट श्योर टू।’’ कार्तिक ने उलझन भरे स्वर में कहा।
‘‘क्या मतलब? तुम श्योर भी हो और नहीं भी? ये क्या बात हुई?’’ पिता का सिर चकरा गया।
‘‘आई लाईक हर! आई लव हर! बट अभी हम एल.डी. आर. में हैं। हम एक बार मिल लें फिर मैं बता सकूंगा कि मैं श्योर हूं कि नहीं।’’ कार्तिक ने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया।
मगर अफ़सोस कि बात अभी भी माता-पिता के लिए स्पष्ट नहीं हुई थी।
‘‘आ एल.डी. आर. शुं छे?’’ मां ने पूछ ही लिया।
मां की बात सुन कर कार्तिक की छोटी बहन चारुल मुंह दबा कर हंसने लगी।
‘‘छोड़ो भी मां! बाद में बात करेंगे। वैसे अभी आप लोग लड़की देखने के चक्कर में मत पड़ो।’’ कहते हुए कार्तिक ने एक हाथ से अपना बचा हुआ सेंडविच उठाया और दूसरे हाथ से काॅफी का मग उठा कर अपने कमरे में जा समाया। माता-पिता और पुत्र की दुनियाएं फिर अलग-अलग हो गईं। निजता के अधिकार का पोस्टर दरवाजे पर दबंगई से मुंह चिढ़ा रहा था।
‘‘तू क्यों हंस रही है? ये एल.डी. आर. क्या है? तुझे पता है तो तू ही बता दे, वरना चुपचाप अपना नाश्ता खतम कर।’’ कार्तिक की मां ने बेटी चारुल को डांट लगाई।
‘‘अरे, मां यू आर वेल एजुकेटेड पर इतना नहीं समझतीं? एल.डी. आर. मतलब लांड डिस्टेंस रिलेशन। और भाई का सीक्रेट बताऊं? उनकी लांग डिस्टेंस रिलेशन गर्ल मध्यप्रदेश की है।’’ चारुल ने शान से बताया।
‘‘उसकी क्लासमेट थी?’’ मां ने पूछा।
‘‘नहीं!’’चारुल ने इनकार में सिर हिलाया।
‘‘कंपनी फैलो होगी!’’ पिता ने विश्वासपूर्वक कहा।
‘‘नहीं!’’ चारुल फिर मुस्कुराई।
‘‘यहां कोई केबीसी का क्विज नहीं चल रहा है। सो, जो जानती है वह पूरी बात बता।’’ मां ने फिर चारुल को झिड़का।
‘‘मां, मैं ज्यादा नहीं जानती। बस, इतना जानती हूं कि वे दोनों सोशल मीडिया पर मिले और उनमें अफेयर हो गया।’’ कहती हुई चारुल भी उठ खड़ी हुई। उसका नाश्ता समाप्त हो गया था।
बेटी के जाने के बाद पीछे छूट गए चिंतित मां-बाप।
कुछ देर दोनों ने आपस में सलाह-मशविरा किया फिर कार्तिक के कमरे का दरवाजा थपथपाया।
‘‘क्या है?’’ कार्तिक ने दरवाजा खोलते हुए पूछा।
‘‘बेटा हम लोग सोचते हैं कि तू एक बार उस लड़की से मिल ले। ताकि तू श्योर हो सके।’’ पिता ने कार्तिक से कहा।
‘‘हां, मैं भी यही सोच रहा था। मैं सुरेखा से प्लान कर के आप लोगों को बताता हूं।’’ कहते हुए कार्तिक ने फिर दरवाजा बंद कर लिया।
‘‘सुरेखा’’- कार्तिक के माता-पिता को पहली बार लड़की का नाम पता चला।

दूसरे दिन सुबह नाश्ते के समय कार्तिक ने बताया कि उसने और सुरेखा ने तय किया है कि वे लोग वीकेंड पर दो दिन के लिए पटाया जाएंगे।
‘‘पटाया यानी थाईलैंड?’’ माता-पिता दोनों चौंके।
‘‘क्या वो पटाया में रहती है?’’ मां ने पूछा।
‘‘नहीं, उसका भाई वहां बैंकाक में रहता है। लेकिन हम लोग उसके पास नहीं जाएंगे। हमने अपनी पटाया की ट्रिप ऑनलाइन बुक कर ली है। होटल में रुकेंगे।’’ कार्तिक ने बेझिझक बताया।
पर माता-पिता ने बेटे की बातें झिझक के साथ सुनी।
‘‘उसके पेरेंट्स मान गए? एक अनजान लड़के के साथ दूसरे देश जाने देने के लिए?’’ मां ने आश्चर्य भरे स्वर में का।
‘‘सो व्हाट मां? आमा नुकसान शूं छे? हम एक-दूसरे को खा थोड़े ही जाएंगे? मिलेंगे, एक-दूसरे को जानेंगे। ठीक लगा तो रिलेशन आगे बढ़ाएंगे, नहीं तो अपने-अपने रास्ते! और रही अनजान होने की बात, तो हम लोग डेढ़ साल से एल.डी. आर. में हैं। और मां जब मैं जर्मनी गया था ट्रेनिंग में तो यहां से मेरे साथ दो-तीन लड़के-लड़कियां गई थे। उस समय तो आपने ऑब्जेक्शन नहीं किया था। तो हवे शा माटे? अब क्यों?’’ कार्तिक ने धैर्यपूर्वक उत्तर देते हुए पूछा।
‘‘ठीक है, जैसा तुम ठीक समझो।’’ पिता ने हथियार डालते हुए कहा। वैसे भी उनका तो बेटा था। उन्हें कोई आंच आने वाली नहीं थी। एक ठेठ भारतीय पिता की भांति उन्होंने सोचा। अब यदि लड़की के मां-बाप परवाह नहीं कर रहे हैं तो वे क्यों चिंता करें? पिता ने स्वयं को समझाया।

ठीक यही प्रश्नोत्तरी उधर सुरेखा के साथ हुई जब उसने बताया कि वह अपने एल.डी. आर. के साथ दो दिन के लिए पटाया जा रही है। टिकट्स और होटल टूर एजेंसी के द्वारा बुक कराए लिए हैं।
स्पष्ट था कि सुरेखा के माता-पिता स्तब्ध रह गए। उस समय तक तो उन्हें एल.डी. आर. का भी अर्थ पता नहीं चल सका था।
‘‘पहले हमें बताओं के ये सब क्या चल रहा है?’’ सुरेखा की मां भड़क कर बोलीं। उनके धैर्य का बांध अब टूट गया था।
‘‘कुछ नहीं मां, हम लोग अभी लांग डिस्टेंस रिलेशनशिप में हैं लेकिन अब कार्तिक चाहता है कि हम एक बार मिल कर एक-दूसरे को अच्छे से जान लें कि हमारा भविष्य एक-दूसरे के साथ सही रहेगा कि नहीं।’’ सुरेखा ने सहज भाव से बताया।
‘‘तो उसे यहां क्यों नहीं बुला लेती हो? पटाया जाने की क्या जरूरत है?’’ मां ने कहा।
‘‘ओह माॅम! व्हाट काइंड आर यूं? हम लोग पर्सनल स्पेस में एक-दूसरे को अच्छे से समझ सकेंगे। आप समझती क्यों नहीं?’’ सुरेखा ने मां पर झुंझलाते हुए कहा।
‘‘देखो सुरू! वो अनजान लड़का है, फिर वह दूसरा देश है, अनजान जगह....’’ मां ने समझाना चाहा लेकिन मां की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी कि सुरेखा ने उनकी बात काट दी।
‘‘कैसी बातें कर रही हो मां? अभी अगर मेरी पटाया में मेरी जाॅब लगी होती तो तुम ये अनजान-अनजान की रट नहीं लगातीं। कोरोना पेंडेमिक के पहले कंपनी की ओर से मैं दुबई भी तो गई थी। कंपनी के चार लड़के भी साथ गए थे। तुम्हें यह पता था तब भी तुमने यह नहीं कहा था कि अनजान लड़कों के साथ... अब ऐसा क्यों सोच रही हो?’’ सुरेखा की बात तार्किक थी, लेकिन उसमें कड़वाहट थी। सच कड़वा जो होता है।
‘‘वो तू कंपनी की तरफ से गई थी।’’ पिता ने हस्तक्षेप किया।
‘‘ये भी मान लीजिए कि कंपनी की तरफ से जा रही हूं। वैसे भी सारी बुकिंग कार्तिक ने ही कराई है।’’ सुरेखा ने सब कुछ साफ-साफ बता दिया।
‘‘फिर भी सुरू!’’ मां ने टोकना चाहा।
‘‘नो, ममा! आप लोग ग्रांड पेरेंट्स जैसी बात मत करिए। आप लोग अच्छे पेरेंट्स हैं। ट्रस्ट ऑन मी एंड ऑन योर सेल्फ टू।’’ सुरेखा ने कहा।
माता-पिता समझ गए कि बेटी के पास ठोस तर्क हैं, वे उसे डिगा नहीं सकते हैं।
‘‘ठीक है, अपना ध्यान रखना। और कोई जरूरत पड़े तो अपने भाई को काॅल कर लेना।’’ पिता ने सुरेखा की बात मानते हुए यह तसल्ली की कि उनका बेटा यानी सुरेखा का भाई बैंकाक में ही है। जरूरत पड़ने पर फौरन पटाया पहुंच सकता है।
इस तरह एल.डी. आर. वाले सुरेखा और कार्तिक दिल्ली पहुंचे। जहां उन्होंने दिल्ली से बैंकाक वाली फ्लाईट पकड़ी। संयोग यह कि जहाज पर सवार होने के बाद दोनों ने एक-दूसरे को आफ स्क्रीन यानी साक्षात पहली बार देखा। स्पाइस जेट के छोटे से जहाज में हजारों मील की ऊंचाई पर उठते हुए दोनों ने एक-दूसरे के प्रेम की गहराई को नापना शुरू किया। बैंकाक पहुंचते-पहुंचते दोनों ने एक-दूसरे को काफी जान लिया था। बैंकाक से पटाया और पटाया में प्रेम का परीक्षण।
दो दिन कैसे गुज़र गए पता ही नहीं चला।
वापस दिल्ली वाया बैंकाक। फिर एक ने गुजरात का रास्ता पकड़ा तो दूसरे ने मध्यप्रदेश का।
यात्रा की दो लोगों ने लेकिन सांसे थमी रही कई लोगों की।
दोनों अपने-अपने घर सुरक्षित पहुंचे। घर के लोगों ने चैन की सांस ली।
‘‘क्या तय हुआ?’’ दोनों से एक ही प्रश्न पूछा गया।
उत्तर दोनों का एक ही था-‘‘अगली मुलाक़ात तक एल.डी. आर. ही जारी रखेंगे।’’
दोनों के परिवार वाले तय नहीं कर पा रहे थे कि वे उनके इस निर्णय पर प्रसन्न हों या शोक मनाएं। लेकिन कार्तिक और सुरेखा के मन में कोई उलझन नहीं थी। वे खुश थे। शांत थे। अपने-अपने कमरों में बंद थे अपने एल.डी. आर. के साथ।                        
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