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गुरुवार, दिसंबर 05, 2019

देशबन्धु के साठ साल-7- ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय ब्लाॅग मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की टिप्पणी सहित लेखमाला की  सातवीं कड़ी....

Lalit Surjan
देशबन्धु के साठ साल-7
- ललित सुरजन
कुछ ज्ञान-कुछ विज्ञान देशबन्धु का एक लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ था। इसकी परिकल्पना प्रो. वी.जी. वैद्य ने की थी। नामकरण भी उन्होंने ही किया था। प्रो. वैद्य रायपुर के शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय (अब एनआईटी) में रसायनशास्त्र के प्राध्यापक थे। आम अध्यापकों के विपरीत उनकी लिखने-पढ़ने में दिलचस्पी थी; वे कैंपस के बाहर की हलचलों में भी दिलचस्पी रखते थे; और खाली समय में भी व्यस्त रहने के कारण निकाल लेते थे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने रविशंकर वि.वि. में छात्रों के लिए फोटोग्राफी की निशुल्क कक्षाएं संचालित कीं। कुछ साल बाद वे पुणे चले गए तो वहां तर्कर्तार्थ लक्ष्मण शास्त्री जोशी की मराठी विश्वकोष परियोजना से जुड़ गए। उन्होंने प्रसिद्ध वैज्ञानिक जयंत नार्लीकर व लेखक लक्ष्मणराव लोंढे की अनेक मराठी विज्ञान कथाओं का हिंदी अनुवाद देशबन्धु के लिए किया। फिर स्वयं भी हिंदी में विज्ञान कथाएं लिखने लगे, जिसका पुस्तक रूप में प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया। प्रसंगवश, वैद्य साहब के भाई एम.जी. वैद्य भोपाल में प्रतिष्ठित पत्रकार थे, भाभी श्रीमती शकुंतला वैद्य रूसी भाषी की कक्षाएं संचालित करती थीं और इंदौर के सीपीआई नेता अनंत लागू उनकी पत्नी के भाई थे।

सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ. रमेशचंद्र महरोत्रा का चलते-चलते उल्लेख पिछले अध्याय में हुआ है। एक ओर अपने विषय के अधिकारी विद्वान; दूसरी ओर अद्भुत सादगी। वे साधारण सा कुर्ता-पाजामा पहनते थे और साईकिल पर चलते थे। उन्हें अपने पांडित्य पर लेशमात्र भी गर्व नहीं था और धन-दौलत का मोह उन्होंने कभी नहीं पाला। एक बार कार खरीद ली तो वह भी इकलौती संतान बेटी संज्ञा को दे दी। घर-गिरस्ती उन्होंने भाभी श्रीमती उमा महरोत्रा के जिम्मे छोड़ रखी थी, जो इप्टा से जुड़ी रहीं और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में भी उत्साहपूर्वक भाग लेती रहीं। इस दम्पति ने समाज हित में अनेक काम किए और एक के बाद दोनों की पार्थिव देहें रायपुर मेडिकल कॉलेज को दान कर दी गईं। महरोत्राजी व्यंग्य कविताएं भी लिखते थे, जो मुझे कभी पसंद नहीं आईं। वे अपने ''दो शब्द कॉलम में कोई दो शब्द उठाकर उसकी सविस्तार व्याख्या करते थे। यह स्तंभ अनेक वर्षों तक चला। हिंदी भाषा के प्रति प्रेम व रुचि जागृत करने की यह एक अनूठी पहल थी।

समय-समय पर देश की अनेक मूर्धन्य हस्तियों ने देशबन्धु में कॉलम लिखे। इनमें इंद्रकुमार गुजराल, विजय मर्चेंट, जयंत नार्लीकर, के.एफ. रुस्तमजी, अरुण गांधी के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं। गुजराल साहब का आशीर्वाद और स्नेह हमें अंत तक मिलता रहा। 7 अप्रैल 2008 को देशबन्धु के दिल्ली संस्करण के उद्घाटन पर वे ही मुख्य अतिथि थे। उन्होंने अपने विशाल पुस्तक संग्रह का एक भाग देशबन्धु लाइब्रेरी को भेंट भी किया। वे सामान्यत: अन्तरराष्ट्रीय राजनीति पर अंग्रेजी में लिखते थे, जिसका अनुवाद हमें करना होता था। उपरोक्त सभी महानुभावों के साथ भी यही बात थी। मई-जून 2003 में मुझे डाक से एक मोटा लिफाफा मिला। भीतर एक लेख के साथ साइरस रुस्तमजी का लिखा एक पत्र था- ''मैं के.एफ. रुस्तमजी का पुत्र हूं। वे आपके अखबार के लिए लिखते थे। उनके कागजात में उनका यह आखिरी लेख मिला है, जिसे वे समय रहते आपको भेज नहीं पाए। संभव हो तो इसका उपयोग कर लीजिए। अंग्रेजो में लिखे पत्र का भाव यही था। महात्मा गांधी के पौत्र अरुण गांधी उन दिनों भारत में ही पत्रकारिता कर रहे थे और उन्होंने भी अपने लेख छापने के लिए सरलता से हामी भर दी थी। अरुण अब अमेरिका में रहते हैं। पिछले साल उनकी पुस्तक आई है- द गिफ्ट ऑफ एंगर। यह पुस्तक बापू के साथ बीते समय में हासिल अनुभवों पर आधारित है। इसमें बापू के जीवन दर्शन की सरल-सुबोध व्याख्या की गई है।

हमारे लेखकों की सूची में एक उल्लेखनीय नाम प्रो. एस.डी. मिश्र का है। वे रायपुर के शासकीय विज्ञान म.वि. में गणित के प्राध्यापक थे और 1964 में तबादले पर अन्यत्र चले गए थे। लेकिन एक गुणी अध्यापक के रूप में उनकी चर्चा उनके पूर्व छात्रों के बीच अक्सर होती थी। प्रो. मिश्र ने 92-93 साल की उम्र में अपने संस्मरण लिपिबद्ध करना प्रारंभ किया। यह अपने आप में अचरज की बात थी। उनके सुपुत्र डॉ. परिवेश मिश्र ने जब ये संस्मरण मुझे दिखाए तो मैं चकित रह गया। ऐसी सुंदर भाषा, ऐसे रोचक विवरण! गुजरे समय और स्थानों को उन्होंने जीवंत कर दिया। हमने दो बार में उनके संस्मरण 26-26 किश्तों में छापे। पहले ''ग्राउंड जीरो से उठी यादें; फिर बेमेतरा से बैरन बाज़ार तक। मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि हिंदी में ऐसे संस्मरण लिखने वाले लेखक बिरले ही होंगे। रायपुर, नागपुर, भोपाल, दमोह इत्यादि अनेक स्थानों पर, यहां तक कि विदेशों में बसे उनके छात्र इन संस्मरणों को खोज-खोज कर पढ़ते। हमसे संपर्क कर उनका पता-फोन नंबर लेते और उनसे बात करते। संस्मरण लिपिबद्ध करने के कुछ समय पहले ही उनकी जीवन संगिनी का निधन हुआ था। लेकिन संस्मरण पढ़ने के बाद उनके छात्रों-मित्रों-परिचितों ने जब उनसे संपर्क किया तो उनका अकेलापन कुछ हद तक दूर हुआ।

डॉ. जयंत नार्लीकर रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर तीन दिन के लिए रायपुर आ रहे थे। इंग्लैंड से लौटने के बाद उन्होंने विज्ञान के लोकव्यापीकरण को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। मैं उनका तब से प्रशंसक था जब वे 1960 के दशक में कैंब्रिज में फ्रेड हॉयल के साथ खगोलशास्त्र पर शोध कर रहे थे और अन्तरराष्ट्रीय ख्याति हासिल कर चुके थे। उनका रायपुर आना हमारे लिए एक बड़ी खबर थी। हमने नार्लीकरजी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक पूरे पेज की विशेष सामग्री प्रकाशित की और तीनों दिन उनके व्याख्यानों को प्रमुखता के साथ छापा। इसी समय लगे हाथ उनके अंग्रेजो लेखों को अनुवाद कर छापने की अनुमति भी मांग ली, जो सहर्ष मिल गई। महान क्रिकेट खिलाड़ी विजय मर्चेंट ने तो अंतरर्देशीय पत्र पर उनके लेख छापने की अनुमति प्रदान की थी। इन सबके लेख नई-नई जानकारियों से भरे होते थे; पाठकों का ज्ञान उनसे बढ़ता था और अखबार की प्रतिष्ठा में भी वृद्धि होती थी। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि इनमें से किसी ने भी हमसे न पारिश्रमिक की अपेक्षा की और न मांग की।

जयंत नार्लीकर के प्रथम रायपुर आगमन पर हमने जैसी विशेष सामग्री प्रकाशित की थी, बिलकुल उसी तरह हमने विश्वविख्यात सितारवादक रविशंकर का भी अभिनंदन किया। इस तरह विभिन्न अवसरों पर विशेष परिशिष्ट प्रकाशित करने की एक परंपरा ही देशबन्धु में स्थापित हो गई। याद आता है सितंबर 1979 में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम भारत दौरे पर आई थी। तब हमने कुछ सप्ताह पूर्व ही ऑफसेट मशीन पर छपाई प्रारंभ की थी। बहुमुखी प्रतिभासंपन्न लेखक-कवि-बैंक अधिकारी ओम भारती उन दिनों रायपुर में पदस्थ थे।ओम की क्रिकेट में भी खासी दिलचस्पी थी। उन्होंने क्रिकेट पर टैब्लाइड आकार में बत्तीस पेज के एक विशेषांक की योजना प्रस्तावित की। भारत में क्रिकेट की जैसी लोकप्रियता है, उसे देखते हुए कहना न होगा कि देशबन्धु का यह क्रिकेट विशेषांक अत्यन्त लोकप्रिय हुआ और हमें अंक दुबारा छापना पड़ा। इस अंक की बहुत सारी प्रतियां लेकर ओम नागपुर भी गए, जहां एक मैच होना था। वहां वीसीए स्टेडियम में देशबन्धु की धूम मच गई। उसी दौर में हमने शतरंज पर एक साप्ताहिक स्तंभ शुरू किया। किसी हिंदी दैनिक में यह शायद अपनी तरह का पहला कॉलम था! इसे मुजाहिद खान तैयार करते थे, जो शायद रायपुर तहसील कार्यालय में कार्यरत थे। छत्तीसगढ़ में शतरंज का खेल लोकप्रिय हो चला था, जिसे आगे बढ़ाने में देशबन्धु ने भी एक छोटी सी भूमिका निभाई।
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देशबंधु में 22 अगस्त 2019 को प्रकाशित
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(प्रस्तुति: डाॅ शरद सिंह)

रविवार, दिसंबर 01, 2019

देशबन्धु के साठ साल-6 - ललित सुरजन

Dr Sharad Singh
प्रिय ब्लाॅग मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की टिप्पणी सहित लेखमाला की  छठवीं कड़ी....

देशबन्धु के साठ साल-6
- ललित सुरजन
Lalit Surjan
देशबन्धु ने समाचार जगत में विगत साठ वर्षों के दौरान जो साख कायम की है, उसकी बुनियाद में देशबन्धु की संपादकीय नीति के दो तत्व प्रमुख हैं। एक तो पत्र ने प्रारंभ से अब तक एक सुस्पष्ट, संयमपूर्ण और अविरल वैचारिक दृष्टि का पालन किया है। दूसरे- अखबार अपनी संपादकीय प्रयोगधर्मिता के लिए अक्सर चर्चित रहा है। इसके तीन मुख्य घटक हैं। एक-स्थायी स्तंभ और फीचर। दो- विकासपरक रिपोर्टिंग। तीन- ग्रामीण पत्रकारिता। स्थायी स्तंभों की चर्चा करते हुए सबसे पहले हरिशंकर परसाई का नाम आता है। मैं नोट करना चाहूंगा कि 3 दिसंबर 1959 को बाबूजी ने जबलपुर से 'नई दुनिया का तीसरा संस्करण प्रारंभ किया था। कालांतर में नए प्रबंधन के तहत उसका नाम बदलकर 'नवीन दुनिया कर दिया गया। उसकी कहानी आगे आएगी। परसाईजी ने बाबूजी के कहने पर 1960 में ''सुनो भाई साधो शीर्षक से साप्ताहिक कॉलम लिखना प्रारंभ किया, जो इंदौर, रायपुर और जबलपुर में अनेक वर्षों तक एक साथ छपता रहा।

जबलपुर में ही जब 1963 की रामनवमी पर बाबूजी और उनके समानधर्मा मित्रों ने मिलकर सांध्य दैनिक ''जबलपुर समाचार का प्रकाशन शुरू किया तो परसाईजी उसमें ''सबका मुजरा लेय शीर्षक से नया स्तंभ लिखने लगे। काफी आगे जाकर जब परसाईजी का अस्वस्थता के कारण बाहर आना-जाना अत्यन्त सीमित हो गया, तब हमारे आग्रह पर उन्होंने ''पूछिए परसाई से शीर्षक से एक और नया कॉलम लिखना स्वीकार किया। इस कॉलम को उन्होंने देखते ही देखते लोकशिक्षण के एक जबरदस्त माध्यम में परिणत कर दिया। इसमें वे पाठकों के आए सैकड़ों पत्रों में से हर सप्ताह कुछ चुनिंदा और गंभीर प्रश्नों के सारगर्भित लेकिन चुटीले उत्तर देते थे। 1983 में प्रारंभ यह कॉलम 1994 तक जारी रहा। कुछ समय पूर्व एक वृहदाकार ग्रंथ के रूप में कॉलम का संकलन छपा, लेकिन किसी अज्ञात कारण से पुस्तक का शीर्षक बदलकर ''पूछो परसाई से रख दिया गया!

मुझे यह उल्लेख करते हुए खुशी होती है कि परसाईजी की लगभग अस्सी प्रतिशत या उससे भी अधिक रचनाएं देशबन्धु में ही प्रकाशित हुई हैं। ऐसा नहीं कि वे सिर्फ कॉलम या व्यंग्य लेखन ही करते थे। समसामयिक घटनाचक्र पर उनकी पैनी नजर रहती थी और वे महत्वपूर्ण ताजा घटनाओं पर वक्तव्य या टिप्पणी जारी करते थे, जो देशबन्धु में ही प्रथम पृष्ठ पर छपती थी। परसाईजी तर्कप्रवीण थे और उनकी स्मरणशक्ति अद्भुत थी। उनके सामने पुस्तक या पत्रिका का कोई पन्ना खोलकर रख दीजिए। वे एक नजर डालेंगे और पूरी इबारत को हृदयंगम कर लेंगे। अपनी इस ''एलीफैंटाइन मेमोरी याने गज-स्मृति से वे हम लोगों को चमत्कृत कर देते थे। समसामयिक मुद्दों पर वे जो तात्कालिक प्रतिक्रिया व्यक्त करते थे, वह भी लोकशिक्षण का ही अंग था। पाठकों की अपनी समझ उनसे साफ होती थी। जो लोग उन्हें सिर्फ व्यंग्यकार मानते हैं, वे उनके व्यक्तित्व के इस गंभीर पहलू की अनदेखी कर देते हैं।

यह एक उम्दा संयोग था कि परसाईजी और बाबूजी दोनों ने 1983 में एक साथ अपने स्थायी कॉलम प्रारंभ किए। बाबूजी ने ''दरअसल शीर्षक से सामयिक विषयों पर लेख लिखे। एक तरह से दोनों अभिन्न मित्रों के कॉलम एक दूसरे के विचारों को प्रतिबिंबित करते थे। बाबूजी के अखबारी लेखन की शुरूआत वैसे 1941-42 में हो चुकी थी, जब विद्यार्थी जीवन में उन्होंने वर्धा से हस्तलिखित पत्रिका ''प्रदीप की स्थापना की थी। बाद के सालों में एक के बाद एक कई अखबारों की स्थापना व उनके संपादन-संचालन की दौड़धूप में उनका नियमित लेखन बाधित हो गया था। लेकिन बीच-बीच में समय निकालकर जब वे लिखते तो उसमें उनकी गहरी समझ और अंतर्दृष्टि का परिचय मिलता। एक तरफ निरालाजी के निधन पर ''महाकवि का महाप्रयाण" ; दूसरी ओर रुपए के अवमूल्यन, वीवी गिरि के चुनाव; तीसरी ओर किसान ग्राम दुलारपाली पर फीचर आदि उनकी सर्वांगीण संपादकीय दृष्टि के उदाहरण हैं। नेहरूजी के निधन पर रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता का जो त्वरित अनुवाद बाबूजी ने किया, मेरी राय में वह सर्वोत्तम अनुवाद है।

अपने स्तंभकारों की चर्चा करते हुए मैं राजनांदगांव के अग्रज साथी रमेश याज्ञिक का स्मरण करता हूं। रमेश भाई की हिंदी में हल्का सा गुजराती पुट था, लेकिन उनकी लेखन शैली अत्यन्त रोचक और बांध लेने वाली थी। उन्होंने टीजेएस जॉर्ज की लिखी वीके कृष्णमेनन की जीवनी का अनुवाद देशबन्धु के लिए किया था। हमारा एक प्रयोग उन दिनों बहुचर्चित और बहुप्रशंसित हुआ जब रमेश भाई ने गुजराती लेखक अश्विन भट्ट के रोमांचक उपन्यास ''आशका मांडल का अनुवाद किया और वह लगातार छब्बीस साप्ताहिक किश्तों में प्रकाशित हुआ। ऐेसे एक-दो अनुवाद उन्होंने और भी किए। उनके साप्ताहिक स्तंभ ''यात्री के पत्र को भी पाठकों से भरपूर सराहना मिली। वे उन दिनों अपने व्यापार के सिलसिले में लगातार दूर-दूर की यात्राएं कर रहे थे और उन अनुभवों के आधार पर किस्सागोई की शैली में भारतीय समाज की जीवंत और प्रामाणिक छवि उकेर रहे थे। रमेश भाई ने एक कथाकार के रूप में भी पर्याप्त ख्याति अर्जित की। प्रसंगवश बता दूं कि देशबन्धु में पहिला धारावाहिक उपन्यास 1965-66 में छपा था जो डॉ. सत्यभामा आडिल ने लिखा था। हृदयेश, मनहर चौहान आदि के उपन्यास भी हमने धारावाहिक प्रकाशित किए।

एक ओर जहां रायपुर व छत्तीसगढ़ में अनेक लेखक नियमित कॉलम के द्वारा देशबन्धु से जुड़े, वहीं जबलपुर में प्रकांड विद्वान प्रो. हनुमान वर्मा ने ''टिटबिट की डायरी शीर्षक कॉलम लिखा, कहानीकार-व्यंग्यकार सुबोध कुमार श्रीवास्तव ने भी व्यंग्य का कॉलम हाथ में लिया; उधर सतना में समाजवादी नेता जगदीश जोशी के अलावा लेखक कमलाप्रसाद, देवीशरण ग्रामीण, बाबूलाल दहिया, सेवाराम त्रिपाठी के साप्ताहिक स्तंभ भी अनेक वर्षों तक प्रकाशित होते रहे। छत्तीसगढ़ में रमाकांत श्रीवास्तव, बसन्त दीवान, रवि श्रीवास्तव, कृष्णा रंजन आदि मित्रों ने नियमित कॉलम लिखे। पुरुषोत्तम अनासक्त व परदेसीराम वर्मा के उपन्यास भी धारावाहिक छपे। डॉ. रमेशचंद्र महरोत्रा ने अनेक वर्षों तक ''दो शब्द स्तंभ निरंतर लिखा, जो पांच खंडों में दिल्ली से प्रकाशित हुआ। नागपुर के डॉ. विनय वाईकर व रायपुर के प्रो. खलीकुर्रहमान ने महाकवि गालिब के साथ-साथ उर्दू शायरी की श्रेष्ठता से पाठकों को परिचित कराया। मैंने अभी अपने संपादकीय सहयोगियों के लिखे स्तंभों का जिक्र नहीं किया है, और न देश के अनेक मूर्धन्य विद्वान स्तंभकारों का। कहानी अभी अधूरी है।
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#देशबंधु में 08 अगस्त 2019 को प्रकाशित
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( प्रस्तुति: डाॅ शरद सिंह)

बुधवार, नवंबर 27, 2019

देशबन्धु के साठ साल-4 - ललित सुरजन

Dr Sharad Singh
प्रिय ब्लाॅग मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है।

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की टिप्पणी सहित लेखमाला की  चौथी कड़ी....
Lalit Surjan

देशबन्धु के साठ साल-4
- ललित सुरजन

'प्रिंटर्स डेविल' याने छापाखाने का शैतान अखबार जगत में और पुस्तकों की दुनिया में भी एक प्रचलित मुहावरा रहा है। छपी हुई सामग्री में कोई शब्द या अक्षर इधर का उधर हो जाए, फलत: अर्थ का अनर्थ होने की नौबत आ जाए तो उसे किसी अदृश्य शक्ति याने शैतान की कारगुजारी बता कर बच जाओ। वास्तविकता में यह अक्सर कंपोजिंग की गलती होती है। बाज दफे समाचार-लेखक भी हड़बड़ी में कुछ गलत लिख जाता है और कंपोजाटर सतर्क न हो तो वैसा ही गलत छप भी जाता है। एक बेहतरीन कंपोजिटर को परिश्रमी और सजग होने के साथ-साथ भाषा का भी पर्याप्त ज्ञान होना आवश्यक होता है। मैंने अब तक ऐसी दो ही पत्रिकाएं देखीं, जिनमें कभी न तो तथ्यों की गलती देखने मिली और न वर्तनी या व्याकरण की। एक- अमेरिका से प्रकाशित ''नेशनल ज्योग्राफिक'' और दूसरी इंग्लैंड की ''द इकानॉमिस्ट''। बाकी तो हम गलतियां करते चलते हैं और समझदारी हो तो इसके लिए पाठकों से माफी भी मांग लेते हैं। आप समझ रहे होंगे कि एक अच्छा अखबार निकालने की शर्त है कि उसमें गलतियां न हों और यह बड़ी हद तक कंपोजिंग विभाग में कुशल सहयोगी होने पर निर्भर करता है।

मैं देशबन्धु के कंपोजिंग विभाग के साथियों को याद करता हूं तो सबसे पहले 'राय साहब' का ध्यान आता है। सिर्फ बाबूजी ही उन्हें जीतनारायण नाम से संबोधित करते थे। जौनपुर (उप्र) के राय साहब शायद 1956 में भोपाल में बाबूजी से जुड़ गए थे। वे ऊंची कद-काठी के स्वामी थे। मैं उन दिनों अपनी बुआ के पास पहले नागपुर, फिर ग्वालियर में पढ़ रहा था, इसलिए मैंने उन्हें रायपुर आने पर ही पहली बार देखा। वे कंपोजाग से पदोन्नत होकर फोरमैन बन चुके थे। आगे चलकर वे हैड फोरमैन भी बने। बढ़ती आयु में जब नेत्र ज्योति शिथिल होने लगी तो उनके प्रभावी व्यक्तित्व के अनुकूल दूसरे काम सौंप दिए गए। उन्हें गुजरे लंबा समय बीत गया है, लेकिन चाची और उनके बच्चों के साथ आज भी संपर्क बना हुआ है। फोरमैन के जिम्मे संपादकीय विभाग से समाचार आदि लेना, उसे कंपोजिटरों के बीच बांटना, कंपोज हो गई सामग्री के प्रूफ निकालना, सुधार करना, और इस लंबी प्रक्रिया में समय की पाबंदी व अनुशासन बनाए रखना आदि काम होते थे। उन शुरुआती दिनों में चार पेज के अखबार में भी कोई अठारह-बीस कंपोजिटर, उन पर दो या तीन फोरमैन और सबके ऊपर हैड फोरमैन होता था। राय साहब के साथ इलाहाबाद से आए रामप्रसाद यादव, जबलपुर के दुलीसिंह, जगन्नाथ प्रसाद पांडे आदि थे। ये सभी अपने फन के माहिर थे।

समय आगे बढ़ने के साथ इनका स्थान लेने के लिए एक नई पीढ़ी सामने आ गई। 1970 के दशक में एक समय ऐसी स्थिति बनी कि अखबार निकलने में प्राय: रोज ही देरी होने लगी। जो हैड फोरमैन थे, वे विभाग को सम्हाल नहीं पा रहे थे। तब मैंने एक प्रयोग किया। तीन युवा फोरमैन क्रमश: लीलूराम साहू, मोहम्मद सलाम हाशिमी और रणजीत यादव को एक-एक माह के लिए हैड फोरमैन का प्रभार इस वायदे के साथ सौंपा कि जिसका काम सबसे अधिक संतोषजनक होगा, उसे विभाग का मुखिया बना दिया जाएगा। उन तीनों साथियों में अपनी बेहतर काबिलियत का परिचय लीलूराम ने दिया। वे हैड फोरमैन नियुक्त किए गए और रिटायरमेंट तक इस पद पर बने रहे। मेरे हमउम्र लीलूराम का कद नाटा था, लेकिन वे अपने दायित्व को भलीभांति समझते थे, उनमें नेतृत्व क्षमता भरपूर थी, और वे नई चीजें सीखने में भी दिलचस्पी रखते थे। अपने इन गुणों और साथ में विनम्र स्वभाव के कारण वे प्रेस में हम सभी के प्रिय थे। नए दौर में कंपोजिंग विभाग में उन्नत तकनीकी का आगमन हुआ तो उसे समझने और उपयोग करने में भी लीलूराम ने देरी नहीं की।

हैड कंपोजिंग याने छापे के अक्षर हाथ से जोड़ने की विधि पुरानी पड़ चुकी थी। उन दिनों लाईनोटाइप और मोनोटाइप ऐसी दो यांत्रिक प्रणालियां प्रचलन में थीं। पहली में एक-एक लाइन मशीन से ढलकर निकलती थी। एक गलती हो जाए तो पूरी लाइन बदलो। दूसरी में एक-एक अक्षर की पृथक ढलाई होती थी। हमने मोनोटाइप मशीनें खरीदना तय किया। छत्तीसगढ़ में देशबन्धु पहला अखबार था, जहां ये मशीनें आईं। स्वाभाविक ही यहां उनका कोई जानकार नहीं था। हम इलाहाबाद से रामनिवास सिंह और जगदीश नारायण श्रीवास्तव को लेकर आए। सिंह साहब मशीन ऑपरेटर थे, याने की-बोर्ड पर कंपोजिंग करते थे।

जगदीश उससे जुड़ी मशीन पर सात सौ डिग्री तापमान पर खौलते सीसे से अक्षरों की ढलाई करते थे। रामनिवास सिंह बुजुर्ग थे। खादी के शुभ्र धवल वस्त्र पहनते थे। उनकी भाषा बेहद अच्छी थी। संपादकों की गलतियां सुधार देते थे। जगदीश भी अपने काम में कुशल, और मृदुभाषी व्यक्ति थे। एक लंबे अरसे बाद जब मोनो तकनीक भी पुरानी पड़ गई, मशीनें बेच दी गईं, तब भी जगदीश एक तरह से प्रेस परिसर के सुपरवाइजर बनकर जीवन पर्यन्त हमारे साथ बने रहे। उनके बेटे आज भी किसी न किसी रूप में प्रेस से जुड़े हुए हैं।

इधर मोनो मशीन खरीदने की प्रक्रिया प्रारंभ की, इलाहाबाद से कुशल कर्मियों को बुलाया; दूसरी ओर यह भी तय किया कि वर्तमान स्टाफ को भी इन मशीनों पर काम सिखाया जाए। कलकत्ता में मोनोटाइप कंपनी तकनीकी प्रशिक्षण देने के लिए एक स्कूल चलाती थी। लीलूराम, फेरहाराम साहू और हेमलाल धीवर को इस स्कूल में शायद तीन माह का प्रशिक्षण लेने भेजा गया। इन तीनों साथियों ने पूरे मनोयोग के साथ काम सीखा और अपने प्रशिक्षकों से सराहना हासिल की। मोनोटाइप स्कूल के प्राचार्य ने तीनों को श्रेष्ठ प्रशिक्षार्थी होने के प्रमाणपत्र दिए और एक अलग पत्र भेजकर हेमलाल की विशेष प्रशंसा की कि उनके जैसा कुशाग्र प्रशिक्षार्थी पहले कभी नहीं आया। लगभग एक साल बाद रायपुर नवभारत में मोनोटाइप मशीन आई तो उनके प्रबंधन के अनुरोध पर लीलूराम को वहां दूसरी शिफ्ट में काम करने भेजा कि उनके लोगों को काम सिखा दें। हमने तो सहयोग की भावना से भेजा था, लेकिन नवभारत में उन्हें बेहतर सुविधाओं का लाभ देकर वहीं रोक लेने की पेशकश कर दी। लीलूराम उनके ऑफर को ठुकराकर वापिस लौट आए।

समय के साथ एक बार फिर तकनीकी में बदलाव आया। मोनोटाइप मशीनों का स्थान वेरीटाइपर मशीनों ने ले लिया। अब तक हॉट मैटल प्रोसेस याने गर्म धातु से ढलाई होती थी। उसकी जगह कंप्यूटर आधारित प्रक्रिया आ गई जो कुछ-कुछ फोटोग्राफी से मिलती-जुलती थी। इसमें एक फिल्म के निगेटिव पर शब्द और पृष्ठ का संयोजन होकर उसके पॉजीटिव से ऑफसेट मशीन पर छपाई होती थी। लीलूराम और हेमलाल ने इस प्रविधि को समझने-सीखने में कोई देरी नहीं की।

उन्होंने अपने अन्य साथियों को भी काम सिखाया। मेरे प्रिय साथी लीलू कंपोजिंग प्रक्रिया के इस तीसरे चरण में भी विभाग प्रमुख का दायित्व कुशलतापूर्वक सम्हालते रहे। जब चौथे चरण में डेस्कटॉप कंप्यूटर का युग आया, तब तक वे शायद रिटायरमेंट की आयु में पहुंच चुके थे। इस नई तकनीक के साथ वे मेल नहीं बैठा सके। उन्हें कोई दूसरा दायित्व भी सौंपा किंतु वह उनके मन-माफिक नहीं था। वे रिटायर होकर चले गए। काफी समय से उनसे मुलाकात नहीं हुई है। हेमलाल डेस्कटॉप पर भी कुछ बरसों तक काम करते हुए हमारे साथ बने रहे। अभी कुछ दिन पहले ही उनके देहांत की सूचना मुझे मिली। कंपोजिंग विभाग की यह कहानी अभी अधूरी है।
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देशबंधु में 18 जुलाई 2019 को प्रकाशित
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( प्रस्तुति: डाॅ शरद सिंह)