सोमवार, जनवरी 03, 2022

शिखण्डी | उपन्यास | शरद सिंह | समीक्षा | आजकल पत्रिका

मित्रो, मेरे उपन्यास "शिखण्डी" की समीक्षा प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार की लोकप्रिय पत्रिका "आजकल" के जनवरी 2022 अंक में प्रकाशित हुई है
आभारी हूं समीक्षक प्रदीप कुमार जी की🙏हार्दिक धन्यवाद आजकल🌷हार्दिक धन्यवाद सामयिक प्रकाशन 🌷

गुरुवार, दिसंबर 09, 2021

मेरी सुखद स्मृति | मैं और मेरी मां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

( Dr Miss Sharad Singh and Mother Dr Vidyawati "Malavika" )
📌 फोटो में मैं डॉ शरद सिंह और मेरी मां डॉ विद्यावती "मालविका" 

मेरी सुखद स्मृति 
मेरी मां डॉक्टर विद्यावती "मालविका" बहुत जिज्ञासु थीं। वे हमेशा कुछ न कुछ नया जानने के लिए उत्सुक रहती थीं। वे रोज़ सुबह बहुत ध्यान से अख़बार पढ़तीं थीं। ...आज अख़बार में मुझे एक मॉल का विज्ञापन देखकर याद आया कि एक दिन शहर में स्थित विशाल मॉल का विज्ञापन अख़बार में देखकर मां ने उसके संबंध में जिज्ञासा प्रकट की। उन्होंने मॉल दिखाने को नहीं कहा किंतु मैं और वर्षा दीदी समझ गईं कि वे मॉल देखना चाहती हैं। मॉल की व्यवस्था के बारे में जानना चाहती हैं। उस समय उनकी आयु 90 वर्ष हो चली थी फिर भी वे बहुत सक्रिय रहती थीं। हम दोनों बहनों ने उन्हें विशाल मॉल ले जाने का निर्णय लिया और हम उन्हें वहां ले गए। वह कुछ सीढ़ियां भी हैं इसलिए वहां के कर्मचारियों ने तत्काल मदद की और मां को मॉल के अंदर ले गए। उन्हें भी खुशी हो रही थी कि एक इतनी वृद्ध महिला उनका माल देखने के लिए आई हैं। फिर हम लिफ्ट से उन्हें हर मंज़िल पर ले गए। वे बहुत खुश हुईं। मॉल की व्यवस्था उनके लिए नई थी। इससे पूर्व उन्होंने कोई मॉल नहीं देखा था। वे मॉल पद्धति से बहुत खुश हुई।  वे बुज़ुर्ग  होकर भी नई व्यवस्थाओं की पक्षधर थीं। उन व्यवस्थाओं की जो लोगों के लिए आरामदायक हो, सुविधाजनक हो। उस दिन वे मॉल देखकर बहुत खुश हुई और हम दोनों बहनें इस बात से प्रसन्न थीं कि उन्हें माल घुमा सके और उनकी जिज्ञासा शांत कर सके। आज यह संतोष भरी स्मृति मेरी अमूल्य संपत्ति है।
मै आपको बहुत प्यार करती हूं मां ❤️
आपको बहुत याद करती हूं 💕

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सोमवार, दिसंबर 06, 2021

एक ज़रूरी कहानी | 3 | यूकेलिप्टस और दूब | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

एक ज़रूरी कहानी | 3 | यूकेलिप्टस और दूब | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

एक ज़रूरी कहानी... 3
यूकेलिप्टस ने इतरा कर दूब से कहा, "देखो मैं आसमान छू सकता हूं, पर तुम नहीं। तुम्हारा जीवन बेकार है।"
दूब दुखी हो गई। तभी एक औरत आई उसने दूब का कुछ हिस्सा तोड़ कर अपनी पूजा की थाली में रख लिया। तब दूब ने यूकेलिप्टस से कहा,"मेरा जीवन बेकार नहीं है, पूजा की थाली में मैं रखी जाती हूं, तुम नहीं।" यूकेलिप्टस अपना-सा मुंह लेकर रह गया।
👩छोटा होना अयोग्यता नहीं है। है न!
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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रविवार, दिसंबर 05, 2021

एक ज़रूरी कहानी | 2 | झींगुर और वह | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

एक ज़रूरी कहानी... 2
झींगुर और वह 
डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक झींगुर घर में शोर कर रहा था जिससे वह आदमी परेशान हो गया। उसने झींगुर को पकड़ कर बाहर फेंक दिया। दूसरे दिन वह बहुत अकेला महसूस कर रहा था। घर में भी सन्नाटा पसरा हुआ था। ऐसे में उसे उस झींगुर की याद आने लगी। मगर उसे तो वह रात को ही बाहर फेंक चुका था। वह उदास हो गया। तभी उसे खिड़की पर झींगुर की आवाज़ सुनाई दी।आवाज़ सुनकर वह इतना ख़ुश हो गया जैसे बरसों पहले बिछड़ा कोई मिल गया हो। उसने खिड़की खोल कर झींगुर को अंदर आने दिया।
👩कमज़ोर और अनुपयोगी लगने वाला भी महत्वपूर्ण होता है, उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। है न!
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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शुक्रवार, दिसंबर 03, 2021

एक ज़रूरी कहानी | 1 | चींटा और पौधा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

एक ज़रूरी कहानी...1
चींटा और पौधा 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक चींटे के पर निकल आए तो वह पौधे का मज़ाक उड़ाने लगा कि  तुम तो कहीं जा भी नहीं सकते हो और मुझे देखो मैं कहीं भी उड़ कर जा सकता हूं। पौधा बेचारा चुपचाप रह गया। तभी बारिश आई तेज़ हवा चलने लगी और देखते- देखते चींटे के पर पानी से भीग कर टूट गए और घायल चींटा भी बह गया जबकि पौधा और हरा भरा दिखाई देने लगा।
👩किसी की स्थिति का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए। है न!
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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गुरुवार, अगस्त 12, 2021

बेताल, मैंड्रेक और फ्लेश गॉर्डन कभी भुलाए नहीं जा सकते - डॉ (सुश्री) शरद सिंह



बेताल, मैंड्रेक और फ्लेश गॉर्डन कभी भुलाए नहीं जा सकते
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रिय ब्लॉग साथियों, 
आज  बचपन की कुछ यादें ताज़ा की जाएं... आप में से जिसने भी इंद्रजाल कॉमिक्स सिरीज़ के बेताल (Phantom) मैंड्रेक (Mandrake) और फ्लेश गॉर्डन (Flash Gordon) के कॉमिक्स पढ़े होंगे, वे समझ सकते हैं कि उन कॉमिक्स ने हमें मनोरंजन के साथ ज्ञान भी दिया। मैंने तो बहुत पढ़े थे ये कॉमिक्स। आज भी गूगल पर पुराने अंक मिल जाते हैं।
फैंटम और मेंड्रेक को रचा था ली फाक ने जबकि फ्लेश गॉर्डन को एलेक्स रेमंड और डॉन मूर ने।
...जिन्होंने बेताल यानी फैंटम के कॉमिक्स पढ़े वे अपराध की दुनिया और अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक मसलों, तानाशाह की हुकूमत, आफ्रीकी देशों की समस्याओं के बारे में बखूबी समझ सकते हैं। याद हैं न आफ्रिका के घने जंगल के बीच रहने वाले फैंटम, यूनीसेफ के लिए काम करने वाली नर्स डायना पामर,  फैंटम का आफ्रीकी कबीलियाई साथी गुर्रन, फैंटम का घोड़ा हीरो (तूफान) और भेड़िया डॉग डेविल। 
     ... जिन्होंने मैंड्रेक को पढ़ा, वे इस बात को समझ सकते हैं कि पश्चिमी और अफ्रीकी देश मिलकर आपराधिक वातावरण को किस तरह रोक सकते हैं और जरूरत पड़ने पर अपराध रोकने में जादू का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। आपको याद है न मैंड्रेक, लोथार, नारडा की टीम जो ज़नाडू नामक विला में रहते थे।
     ...और जिन्होंने फ्लेश गॉर्डन पढ़ा है उनके लिए आज अंतरिक्ष में बस्तियां बसाई जाने की बात कोई नई नहीं है। वे तो फ्लेश गॉर्डन के कॉमिक्स के जरिए पहले ही अंतरिक्ष बस्तियों की सैर कर चुके हैं। एस्ट्रोनॉट फ्लेश गॉर्डन, एस्ट्रोनॉट डेल ऑर्डेन और उनका रशियन साइंटिस्ट साथी हैंस ज़ारकोव।
      ... यानी इन कॉमिक्स के जरिए हमने बचपन में जिस दुनिया को जाना, समझा और जिसकी कल्पना की, उनमें से बहुत कुछ आज साकार होता भी दिख रहा है ...और कुछ के लिए लगता है कि काश! आज भी फैंटम, मैंड्रेक, फ्लेश गॉर्डन जैसी शख्स़ियत हो तो दुनिया और भी खूबसूरत बन सकती है।

✍️🎩🐎✈️🚀🛰️🎄
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रविवार, मई 30, 2021

शिखंडी | उपन्यास | डॉ शरद सिह | दैनिक प्रजातंत्र में प्रकाशित उपन्यास अंश

इंदौर से प्रकाशित दैनिक प्रजातंत्र  में आज 30.05.2021 को मेरे उपन्यास "शिखंडी" का अंश प्रकाशित हुआ है आपसे साझा कर रही हूं ....
हार्दिक धन्यवाद दैनिक #प्रजातंत्र🙏