बुधवार, मार्च 30, 2011

हिन्दी का लोकप्रिय उपेक्षित साहित्य उर्फ लुगदी साहित्य

 - डॉ. शरद सिंह

        रेल्वे व्हीलर्स और बस स्टेन्ड्स की दूकानों से ले कर फुटपाथों तक राज करने वाली हिन्दी साहित्य की इन पुस्तकों को समीक्षकों द्वारा कभी गंभीर समीक्षा के दायरे में नहीं रखा गया। मोटे, दरदरे, भूरे-पीले से सफेद काग़ज़ पर छपने वाला यह साहित्य उपन्यासों के रूप में पाठकों के दिल-दिमाग़ पर छाया रहता था। कहा जाता है कि माता-पिता द्वारा रोके जाने पर भी स्कूल, कॉलेज के विद्यार्थी अपनी पाठ्य पुस्तकों में छिपा कर इन्हें पढ़ते थे। दूसरी ओर इनमें से कई लेखक ऐसे थे जिनके उपन्यास स्वयं माता-पिता की पहली पसन्द होते थे। अस्सी के दशक तक पूरे उठान के साथ ऐसे उपन्यासों की उपस्थिति रही है। वर्तमान में पठन में रुचि कम होने का प्रभाव इस तरह के उपन्यासों पर भी पड़ा है। यह साहित्य लुगदी साहित्य के नाम से जाना जाता था। जिसे अंग्रेजी में पल्प फिक्शन कहा जाता है। आज भी ऐसे उपन्यास चलन में हैं पर अपेक्षाकृत बहुत कम।
       इस प्रकार के साहित्य को लुगदी साहित्य इसलिए कहा गया क्योंकि ये रचनाएं जिस कागज पर छपा करती थीं, वह कागज अखबारी कचरे और किताबों के कबाड़ की लुगदी बनाकर दोबारा तैयार किया जाता था अर्थात रीसाइकल्ड पेपर के रूप में।
लुगदी साहित्य अर्थात् ऐसा कथा साहित्य या गल्प जो बाज़ार में बिक्री के पैमाने पर तो लोकप्रिय रहा किंतु जिसका साहित्यिक मूल्य बहुत कम आंका जाता रहा।
लुगदी साहित्य के दौर में हिन्दी के जो लेखक सामने आए उनमें प्रमुख थे- दत्त भारती, प्रेमशंकर बाजपेयी, कुशवाहा कांत, राजवंश, रानू आदि... लेकिन इनमें सबसे प्रसिद्ध थे- गुलशन नंदा।
     गुलशन नंदा हिन्दी में लुगदी साहित्य के सबसे ज़्यादा बिकने वाले लेखक रहे।  वे  60 से लेकर 80 के दशक तक, की दर्जनों सिल्वर जुबिली, गोल्डन जुबिली फिल्मों के लेखक थे। हिन्दी साहित्यकारों के बीच एक उपेक्षत नाम और उस दौर की युवा पीढ़ी के लिए आराध्य एवं आदर्श लेखक गुलशन नंदा के अनेक बहुचर्चित उपन्यास थे-  जलती चट्टान, नीलकंठ, घाट का पत्थर, गेलार्ड, झील के उस पार, पालेखां आदि।
         ‘झील के उस पार वह उपन्यास था जिसका हिन्दी पुस्तक प्रकाशन के इतिहास में शायद ही इससे पहले इतना जबर्दस्त प्रोमोशन हुआ हो। देश भर के अखबारों, पत्रिकाओं, रेडियो पर प्रचार के अलावा होटल, पान की दुकान से लेकर सिनेमाघरों तक प्रचार किया गया। प्रचार में इस बात का भी खुलासा किया गया कि पहली बार हिन्दी में किसी पुस्तक का पहला एडीशन ही पांच लाख कापी का छापा गया है।
       गुलशन नंदा के अनेक उपन्यासों पर फिल्में बनीं और बॉक्स ऑफिस पर हिट रहीं जैसे- सावन की घटा, जोशीला, जुगनू, झील के उस पार, नया जमाना, अजनबी, कटी पतंग, नीलकमल, शर्मीली, नज़राना, दाग़, खिलौना आदि।
      बुक स्टॉल्स पर गंभीर साहित्य की तुलना में इब्ने सफी, कुशवाहा कांत, गुलशन नंदा, रानू, राजवंश, वेदप्रकाश कम्बोज, कर्नल रंजीत, सुरेंद्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा जैसे लुगदी साहित्यकार ज्यादा बिकते रहे। इन रचनाकारों के उपन्यासों को बस, ट्रेन की यात्रा के दौरान बहुत पढ़ा जाता था।
प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने एक बार कहा था कि रेल यात्राओं का एक बड़ा फायदा उनकी जिंदगी में यह रहा है कि इसी दौरान उन्होंने कई अहम किताबें पढ़ लीं। रेल यात्रियों के मनोरंजन में किताबों की जो भूमिका रही है, उसमें एक बड़ा हाथ एएच ह्वीलर बुक कंपनी और सर्वोदय पुस्तक भंडार जैसे स्टॉल का भी रहा।
               
दूसरी दृष्टि से देखा जाए तो जिस लुगदी साहित्य ने पाठकों में पढ़ने का रुझान पैदा किया तथा जिस लुगदी साहित्य ने पाठकों को गंभीर अर्थात् समीक्षकों एवं आलोचकों द्वारा जांचे-परखे गए साहित्य की ओर प्रेरित किया उस लुगदी साहित्य को कभी भी समीक्षकों एवं आलोचकों ने नहीं स्वीकारा। इसके विपरीत उसे तुच्छ़, हेय और घटिया साहित्य माना गया। हिन्दी साहित्य के किसी भी मानक साहित्यकार की पुस्तकों की तुलना में लुगदी कागज पर छपने वाले वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यास लाखों की संख्या में छपते रहे हैं। कम मूल्य में अधिक पृष्ठों वाली यह रोचक पुस्तकें पाठकों को सहज आकर्षित करती थीं। 

        ओमप्रकाश शर्मा के उपन्यासों ने भी पाठकों को वर्षों तक अपने आकर्षण में बांधे रखा। एस सी बेदी के उपन्यास समाज में घटित होने वाले अपराधों का सुन्दर विश्लेषण करते थे। इनमें अपराध के दुष्परिणामों की भी व्याख्या विस्तृत रूप से की जाती थी।
          ये उपन्यास आर्थिक दृष्टि से पाठकों के लिए ‘बटुआ फ्रेण्डली’ होते थे। ये किराए पर उपलब्ध रहते थे, आधे और चौथाई मूल्य में भी खरीदे-बेचे जाते थे।
                लुगदी साहित्य को हिन्दी साहित्य से अलग अथवा उपेक्षित रखा जाता रहा जबकि इस साहित्य की भी सदा अपनी विशिष्ट उपादेयता रही है और इस विशिष्ट उपादेयता को भुलाया नहीं किया जा सकता है।

शनिवार, मार्च 12, 2011

Dear Friend JAPAN, In the time of disaster we are with you Dr (Miss) Sharad Singh



  प्रिय जापानी साथियों,      

इस आपदा के समय में 
 हम  आपके साथ हैं.
  
 In the time of disaster 
 we are with you.


  
災害時に私たちはあなたにしている。

                                  
- Dr (Miss)Sharad Singh
    12.03.2011, India 


गुरुवार, फ़रवरी 10, 2011

पुस्तक समीक्षा


‘समीक्षा’ अक्टूबर-दिसम्बर 2010
समीक्षक- डॉ. शरद सिंह


राज्यसत्ता और संस्कृति के अंतर्सम्बंधों पर सहज ही सबका ध्यान केन्द्रित रहता है किन्तु रचना, प्रकाशन और समीक्षा के अंतर्सम्बंध पर दृष्टिपात करने का अवसर कम ही आता है। या तो रचना और प्रकाशन या फिर रचना और समीक्षा के पारस्परिक संबंधों पर ही विचार-विमर्श सिमट कर रह जाता है।  यह एक शाश्वत सत्य है कि समीक्षा विधा रचनाकार की रचना प्रक्रिया को दिशा प्रदान करती है। इस विधा पर प्रायः भेद-भाव या प्रयोजित होने का आरोप भी लगता रहा है। ऐसी स्थिति में एक ऐसी पत्रिका का महत्व बढ़ जाता है जो समीक्षा विधा पर ही केन्द्रित हो। ‘आलोचना’ और ‘समीक्षा’ पत्रिकाएं मूल रूप से समीक्षा पर केन्द्रित पत्रिकाएं हैं। ‘समीक्षा’ की प्रकाशन-यात्रा सन् 1967 में पटना से आरम्भ हुई और दिल्ली स्थानान्तरित होने के बाद भी सतत् जारी रही। इस पत्रिका की यात्रा में एक सुनहरा मोड़ तब आया जब यह सामयिक प्रकाशन, दिल्ली के प्रबंधन से जुड़ गई। यह जुड़ाव इसलिए महत्वपूर्ण है कि जुड़ाव के बाद निकले पहले अंक से ही ‘समीक्षा’ के रूप-रंग में परिवर्तन आने लगा। इसका श्रेय सामयिक प्रकाशन के आधारस्तम्भ और युवा प्रबंधक महेश भारद्वाज की समसामयिक दृष्टिकोण को दिया जाना चाहिए। दूसरा पक्ष यह भी है कि इसके युवा संपादक सत्यकाम और महेश भारद्वाज के बीच प्रकाशकीय समझ का एक अच्छा तालमेल है जिसका प्रमाण ‘समीक्षा’ के वे अंक हैं जो निरंतर चित्ताकर्षक एवं संग्रहणीय रूप में सामने आते गए।......शेषांश ‘पुस्तक समीक्षा’ के पन्ने पर पढ़ने के लिए यहां  क्लिक करें ...

शनिवार, जनवरी 22, 2011

हिन्दी महिला कथालेखन और देहमुक्ति






-डॉ. शरद सिंह

‘स्त्री’ और ‘मुक्ति’ ये दोनों शब्द सदियों से परस्पर एक-दूसरे का पूरक बनने के लिए छटपटाते रहे हैं किन्तु ऐसे अनेक कारण हैं जिन्होंने इस पूरकता की राह में सदैव रोड़े अटकाए। स्त्री के संदर्भ में मुक्ति का विषय कठिन भी है और सरल भी। सैद्धांतिक रूप में यह सदैव सरल जान पड़ा है किन्तु प्रायोगिक रूप में अत्यंत कठिन। किसी हद तक प्रतिबन्धित। हिन्दी कथालेखन के आरम्भिक समय में पुरुष वर्चस्व साफ़-साफ़ दिखाई पड़ता है। एक कारण यह भी था कि हिन्दी कहानियों में स्त्री का वही स्वरूप उभर कर आया जो पुरुष-प्रधान समाज में पुरुषों द्वारा सोचा, समझा और रचा जाता है। इसीलिए उस दौर की कहानियों के स्त्री-पात्र अतिवादी आदर्श की चादर ओढ़ कर खड़े दिखाई देते हैं। अब यह तर्क देना भी उचित प्रतीत नहीं होता है कि उस समय के समाज और आज के समाज में ज़मीन-आसमान का अन्तर था। स्त्री के प्रति समाजिक सोच न कल बदली थी और न पूरी तरह से आज बदली है। आज भी स्त्री को ‘वस्तु’ और ‘भोग्या’ मानने वालों की कमी नहीं है। मैत्रेयी पुष्पा की ‘अल्मा कबूतरी’ या शरद सिंह की (मेरी स्वयं की) ‘पिछले पन्ने की औरतें’ आज की औरते हैं जो मुक्ति के लिए छटपटा रही हैं और उनकी मुक्ति देहमुक्ति से अलग नहीं हैं। क्योंकि स्त्रिायों का प्रथम बंधन देह से प्रारम्भ होता है। इसीलिए कहानियों में भी देहमुक्ति का विषय बनना स्वाभविक है। किन्तु दुर्भाग्यवश कई बार  हिन्दी कथासंसार में लेखिकाओं के संदर्भ में देहमुक्ति को उनके लेखन की ‘बोल्डनेस’ ठहरा दिया जाता है जिससे विषय की गंभीरता की सरासर अवहेलना हो जाती है।

प्रश्न यह उठता है कि स्त्री की देहमुक्ति का क्या आशय है और हिन्दी महिला कथालेखन में देहमुक्ति का क्या स्वरूप है, क्या हिन्दी में लेखिकाओं द्वारा जो दैहिक संदर्भ प्रस्तुत किए जा रहे हैं वे अनुपयोगी हैं, क्या वे अपरिष्कृत हैं, क्या वे अनावश्यक हैं, क्या इस प्रकार के संदर्भों से बच कर उन विषयों पर विस्तृत दृष्टि डाली जा सकती है जिनके जन्म में देह आधारभूत तत्व है, या फिर ऐसे विषयों को अछूता छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि ऐसे विषयों पर लेखन से कुछ परम्परागत मानक टूटते हैं, ये बहुत सारे प्रश्न हैं जो महिला कथालेखन की चर्चा आते ही सुगबुगाने लगते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए समाज और जीवनचर्या की उस तह तक जाना होगा जहां स्त्री का वास्तविक स्वरूप विद्यमान है। इसे जानने के लिए कुछ बिन्दु चुने जा सकते हैं -
1-समाज में स्त्री का अस्तित्व
2-कथा लेखिकाओं का स्त्रियों की स्थितियों एवं समस्याओं के प्रति दृष्टिकोण
3- देहमुक्ति का वास्तविक अर्थ
4- देहमुक्ति द्वारा स्त्री स्वातंत्र्य की संभावना
5- महिला कथालेखन में देहमुक्ति का स्वरूप
उपर्युक्त बिन्दुओं पर पर विस्तृत चर्चा, मनन और चिन्तन करके ही देहमुक्ति के सच को जाना, समझा और परखा जा सकता है।
भारतीय समाज में स्त्री का स्थान शेष दुनिया की भांति दोयम दर्जे का तो है ही किन्तु पारिवारिक संबंधों के आधार पर वह तृतीय और चतुर्थ स्थान पर भी खड़ी दिखाई देती है। अधिकांश धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताएं और परम्पराएं स्त्रियों के कारण जीवित हैं। स्त्री अपने पति की लम्बी आयु के लिए करवां चौथ का व्रत रखती है, पुत्र के लिए ‘छठ’ की श्रमसाध्य पूजा करती है और स्त्री के ये दोनों रूप महिमामंडित हो कर सामने आते हैं। परिवार में स्त्री अपने दायित्व का पालन करती हुई परिवार के सभी सदस्यों के भेजन कर लेने के बाद भोजन करती है जिसमें कई बार उसे आधापेट भोजन करके रह जाना पड़ता है। यदि घर में अनाज के दो दाने हैं तो वे घर के पुरुष के हिस्से में जाते हैं, स्त्री के नहीं। यह कल्पना भी उचित नहीं ठहराई जाती है कि उन दो दानों में से एक पर स्त्री अपना हक़ जताए और कहे कि ‘मैं भी इंसान हूं, मुझे भी ज़िन्दा रहना है।’
           कथालेखन के क्षेत्र में मौजूद स्त्रियों अपने परिवेश के प्रति संवेदनशील हैं तो यह स्वाभविक भी है। ये स्त्रियां अन्य स्त्रियों की स्थिति-परिस्थिति और पीड़ा को समझने में सक्षम हैं। वे स्त्री के अस्तित्व के प्रति चिन्तित हैं, वे स्त्री के अधिकारों के प्रति सचेत हैं और वे स्त्री को अपने समग्र रूप में अपनी कहानियों में प्रस्तुत करना चाहती हैं। इस समग्र रूप का एक महत्वपूर्ण भाग है देहमुक्ति।
देहमुक्ति का वास्तविक अर्थ है ‘वस्तु’ और ‘भोग्या’ के चोले से बाहर आना। स्त्री द्वारा अपनी इच्छाओं, अपने स्वप्नो, अपनी लालसाओं, अपने अधिकारों, अपनी परिस्थितियों, अपने बंधनों और अपनी संभावनाओं के बारे में खुल कर चर्चा करना ही स्त्री मुक्ति है।
             देहमुक्ति द्वारा स्त्री स्वातंत्रय की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि यह स्वच्छंद यौनाचार से परे दैहिक सम्प्रभुता का विषय है। इसके द्वारा स्त्री एक कथालेखिका अनेक स्त्रियों की समस्याओं, कुण्ठाओं एवं विसंगतियों को मुखर कर सकती है और पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की स्थिति को रेखांकित कर सशक्त बनने की राह सुझा सकती है। यह सशक्तिकरण किसी खोखले नारे की भांति नहीं वरन् एक ठोस क़दम है।
महिला कथालेखन में देहमुक्ति का स्वरूप अपने विविध आयामों के साथ सामने आता रहता है। कभी आक्रामक, कभी कोमलता से, तो कभी दृढ़ आग्रह के साथ। ‘चित्तकोबरा’ (मृदुला गर्ग), ’ऐ लड़की’ (कृष्णा सोबती), ‘चाक’(मैत्रोयी पुष्पा), ‘पिछले पन्ने की औरतें’ (शरद सिंह), ‘कलिकथा वाया बाईपास‘(अलका सारावगी) आदि ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे गुज़र कर महिला कथालेखन में देहमुक्ति के स्वरूप को भली-भांति जाना एवं समझा जा सकता है।
सारांशतः महिला कथालेखन में देहमुक्ति स्त्री के अपने होने के प्रति सचेत होने अवधारणा के रूप में देखा जाना चाहिए न कि यौन-स्वच्छंदता के रूप में। जीवनमूल्यों में परिवर्तन होने के साथ-साथ अभिव्यक्ति को विस्तार मिलना स्वाभाविक है। जो विषय कल तक खुली चर्चा के लिए प्रतिबंधित थे आज उन पर खुल कर बहसें होती हैं। चूंकि साहित्य जीवनमूल्यों से प्रतिबिम्बित होता है अतः खुलापन आना ही है। साहित्य में वही होता है जो समाज में मौजूद होता हैं।  फिर दूसरा तथ्य यह भी है कि स्त्रियों से जुड़े कथानकों से मनो-दैहिक वर्णन और विश्लेषण को अलग कर के स्त्रियों की पीड़ा और संवेदना का सम्पूर्ण विवरण प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है।