समकालीन कथा यात्रा - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Journey Of Contemporary Hindi Story By Dr (Miss) SHARAD SINGH
शुक्रवार, अगस्त 18, 2017
रविवार, अगस्त 13, 2017
रविवार, सितंबर 25, 2016
विमर्श रास्ता है तो विवाद रुकावट
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| Dr (Miss) Sharad Singh |
‘‘सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के जुलाई-सितम्बर 2016 अंक में मेरा संपादकीय ...
("सामयिक
सरस्वती", संपादक Mahesh Bhardwaj, कार्यकारी संपादक Sharad Singh) जुलाई-सितम्बर 2016 अंक )
विमर्श रास्ता है तो विवाद रुकावट
- शरद सिंह
वर्षा ऋतु का आगमन... चिलचिलाती धूप के बाद एक सुखद अनुभव...किसी वृद्ध के चेहरे-सी गहरी झुर्रियों वाली सूखी हुई धरती पर रौनक लौटाती बूंदें... रेत से धूसर हो चले परिदृश्य पर हरियल अंकुराते सपने। हर बार की तरह इस बार भी पावस ने सूखे के द्वार पर दस्तक दी कि लो, मैं आ गया। उन राज्यों में राहत की लहर दौड़ गई जहां किसान आकाश की ओर टकटकी बांधे देख रहे थे।
पावस... हां, पावस में ही होती है ‘‘पावस व्याख्यानमाला’’। 23-24 जुलाई 2016 को हिन्दी भवन, भोपाल में आयोजित दो दिवसीय 23वीं पावस व्याख्यानमाला में ‘‘समकालीन उपन्यासों में थर्ड जेंडर की सामाजिक उपस्थिति’’ विषय पर मैंने अपना व्याख्यान देते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘इस मंच से थर्ड जेंडर विमर्श को आरम्भ किए जाने की मैं घोषणा करती हूं।’’ वहां उपस्थित बुद्धिजीवियों ने मेरी इस घोषणा का स्वागत किया। मेरी इस बात का भी कि थर्ड जेंडर को सामाजिक समानता के अधिकार दिलाने में साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और आवश्यकता है ऐसे साहित्य पर एक स्वतंत्रा विमर्श की। ...और मैंने अनुभव किया कि सभी उत्सुक हैं इस नए विमर्श के आगाज़ के लिए। मैंने अपनी बात के तर्क में थर्ड जेंडर से जुड़ी जमीनी सच्चाइयों के साथ ही हिन्दी के उन उपन्यासों पर विस्तार से चर्चा की जो थर्ड जेंडर पर आधारित हैं। इस विषय पर मेरी एक पुस्तक भी आने वाली है। वैसे सच कहूं तो हिन्दी साहित्य में थर्ड जेंडर पर अलग से विमर्श की आवश्यकता का अनुभव मुझे तब हुआ जब मैंने वरिष्ठ कथाकार चित्रा मुद्गल का उपन्यास ‘‘पोस्ट बॉक्स 203 नाला सोपारा’’ पढ़ा। इस उपन्यास की कथा अपने आप में अद्भुत है और मन की गहराइयों तक उतर जाने में सक्षम है क्यों कि यह उपन्यास समाज में थर्ड जेंडर की दशा को नहीं वरन् थर्ड जेंडर की ओर से उसकी स्वयं की मनोदशा का बारीकी से विश्लेषण करता है।
विमर्श और विवाद दोनों ही ‘वि’ से शुरू होते हैं लेकिन एक विचारों को नया रास्ता देता है तो दूसरा विचारों की राह में रुकावट बन जाता है, यदि वह विवाद साहित्यिक चोरी का हो या घोस्ट राईटिंग के रहस्य के उद्घाटन का। ‘पल्प फिक्शन’ के क्षेत्रा में घोस्ट राईटिंग आम बात रही है। मोटे, धूसर काग़ज़ पर छपने वाले पॉकेटबुक उपन्यासों की दुनिया में घोस्ट राईटर्स की कोई कमी नहीं है। कोई नाम लेखक के तौर पर ‘ब्रांड’ बन जाने पर उस छद्म नाम पर विभिन्न लेखकों से उपन्यास लिखवाए जाते रहे हैं। आमतौर पर घोस्ट राईटर पैसों की तंगी से निपटने के लिए मजबूरी में यह रास्ता अपनाते हैं। इसीलिए जब कोई विवशता न हो और फिर भी घोस्ट राईटिंग की जाए, वह भी किसी वास्तविक नाम के लिए तो मामले को समझना ज़रा मुश्क़िल हो जाता है। अनेक बार ऐसे विवाद सामने आ चुके हैं जिनमें कभी किसी लेखिका पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगा तो कभी किसी लेखक ने दूसरे साहित्यकार के लिए सृजन का दावा किया। ताज़ा विवाद ‘जोशी बनाम जोशी’ का है। जिसमें प्रभु जोशी ने भालचन्द्र जोशी के लेखन पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए खुलासा किया है कि वे भालचन्द्र जोशी की कहानियों को विस्तार दिया करते थे। सभी आरोपां को नकारते हुए भालचन्द्र जोशी ने इसे ‘हताश और कुंठित व्यक्ति की मनःस्थिति’ करार दिया है। पत्रिका के इस अंक में इस विवाद के दोनों पक्षों को उन्हीं के शब्दों में पाठकों के सामने यथावत् रखा जा रहा है। ‘सामयिक सरस्वती’ के प्रबुद्ध पाठक सत्य का आकलन कर ही लेंगे।
मानव चरित्रा और मानव मन को समझ पाना सबके बस की बात नहीं होती। समाज विज्ञान और मानविकी पर अधिकारपूर्वक व्याख्यान देने वाले विद्वान तथा वर्तमान में महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र वर्तमान शिक्षा पद्धति को ले कर चिन्तित हैं। उनका कहना है कि ‘‘दुर्भाग्यवश आज की शिक्षापद्धति की आधारभूमि बर्तानवी औपनिवेशिक शासन की उस नीति में थी, जिसका उद्देश्य शासकों और शासितों के बीच बिचौलिए पैदा करना था। इसके लिए पश्चिमी शिक्षा की अंग्रेजी माध्यम से नींव डाली गयी।’’ उनकी चिन्ता स्वाभाविक है। शिक्षा से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों और उनके उत्तरों के साथ ‘रचना, आलोचना और साक्षात्कार’ में इस बार प्रो. गिरीश्वर मिश्र हैं .... उनसे महत्वपूर्ण बातचीत की है अशोक मिश्र ने और उनके कृतित्व पर आलोचनात्मक टिप्पणी की है बलराम शुक्ल ने।
आलोचकों की प्रथम पंक्ति में जिनका नाम आता है उनमें से एक हैं नामवर सिंह। हिन्दी साहित्य में नामवर सिंह होने का अर्थ क्या है? इस पर बड़ी सजगता से कलम चलाई है सदानंद शाही ने।
हमेशा की तरह इस अंक में भी कहानियां, कविताएं, लेख और पुस्तक समीक्षा। लेकिन हर एक के तेवर अलग, हर एक की ज़मीन अलग। शशिकला त्रिपाठी का लेख ‘साम्प्रदायिकता और हिन्दी फिल्में’ एक दिलचस्प दिशा देता है हिन्दी फिल्मों के बारे में विचार करने को। हॉलीवुड की फिल्मों से हमारी हिन्दी फिल्मों, विशेषरूप से कामर्शियल फिल्मों में एक सबसे बड़ा अन्तर है गानों का। हिन्दी फिल्मों में गायक और गाने फिल्मों को जनमानस की स्मृतियों से जोड़े रखने में सेतु का काम करते हैं। ‘कभी तनहाइयों में हमारी याद आएगी...’ जिस आवाज़ में यह मशहूर गाना गाया गया था वो आवाज़ मुबारक़ बेगम की थी जिन्हें पिछले दिनों हमने खो दिया। किसी समय लाखों दिलों पर राज करने वाली पार्श्व गायिका मुबारक बेगम का लंबी बीमारी के बाद मुंबई में जोगेश्वरी स्थित घर में निधन हो गया। वह 80 साल की थीं। मुबारक बेगम ने 1950 से 1970 के बीच कई फिल्मों में गाने गाए। मुबारक़ बेगम भले ही ज़मीदोज़ हो गईं लेकिन उनकी आवाज़ हमेशा हवाओं में तैरती रहेगी।
विगत दिनों हमने कई कला और साहित्य के कई दिग्गजों को खोया। कालजयी कृति ‘हज़ार चौरासी की मां’ की लेखिका महाश्वेता देवी का देहावसान साहित्यजगत को स्तब्ध कर गया। जनजातीय समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हीं के शब्दों में ‘‘एक लम्बे अरसे से मेरे भीतर जनजातीय समाज के लिए पीड़ा की जो ज्वाला धधक रही है, वह मेरी चिता के साथ ही शांत होगी।’’ उनके उपन्यास गहन शोध पर आधारित हैं। 1956 में प्रकाशित अपने पहले उपन्यास ‘झांसीर रानी’ की तथ्यात्मक सामग्री जुटाने के लिए उन्होंने सन् 1857 की जनक्रांति से संबद्ध क्षेत्रों झांसी, जबलपुर, ग्वालियर, ललितपुर, कालपी आदि की यात्रा की थी। वे अपने विशिष्ट लेखन के लिए सदा स्मरणीय रहेंगी।
जिस रास्ते से भी जाऊं/ मारा जाता हूं / मैंने सीधा रास्ता लिया/ मारा गया/ मैंने लम्बा रास्ता लिया/ मारा गया.... ये पंक्तियां हैं नीलाभ अश्क़ की, जिन्हें हमने खो दिया है। प्रसिद्ध साहित्यकार उपेंद्रनाथ अश्क के पुत्रा एवं जाने माने कवि, पत्राकार, नाटककार, अनुवादक, आलोचक और जुझारू साथी नीलाभ अश्क। उन्होंने अरूंधति राय की पुस्तक ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ का अनुवाद ‘मामूली चीजों का देवता’ शीर्षक से किया था। शेक्सपीयर, ब्रेख्त और लोर्का के कई नाटकों का काव्यात्मक अनुवाद और लेर्मोन्तोव के उपन्यास का अनुवाद भी किया। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की त्रौमासिक पत्रिका ‘नटरंग’ के संपादक रहे। वे ‘नीलाभ का मोर्चा’ नाम का ब्लॉग भी लिखते थे।
एक और महत्वपूर्ण कवि, अनुवादक, अध्यापक एवं पत्राकार को हमने खोया ... वे है वीरेन्द्र डंगवाल। उनके काव्य-सृजन की विशेषता थी उन्मुक्तता के साथ बौद्धिकता और लोकत्व के गुण। पहाड़ की प्रतिध्वनियों से भरीपूरी अभिव्यक्ति ने काव्यप्रेमियों को उनकी ओर सहज आकर्षित किया। वीरेन डंगवाल ने पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव होलुब, तदेऊश रोजेविच और नाजिम हिकमत की कविताओं के अनुवाद भी किए।
कलम और तूलिका भावनाओं को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम हैं। जो संवाद एक कविता या कहानी कर सकती है वही संवाद एक पेंटिंग भी करती है। शब्दों से रंग और रंगों से शब्द ध्वनित होना ही कला और साहित्य को परस्पर जोड़ता है। कलम के धनी अशोक वाजपेयी और तूलिका के धनी सैयद हैदर रज़ा की मित्राता अभिन्न रही। भारत के तीन सर्वोच्च सम्मान पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री से सम्मानित विश्वविख्यात चित्राकार सैयद हैदर रज़ा का निधन कलाजगत के लिए एक अपूर्णीर्य क्षति है।
रिश्ता चाहे संगीत का हो, चित्राकला का हो या फिर साहित्य का, अपनों का बिछड़ना सदा पीड़ादायक होता है। यह चिरविछोड़ उस सत्य का भी पाठ पढ़ाता है कि जीवन नश्वर है, ज़िंदगी की शाम कभी भी हो सकती है तो फिर परस्पर लडाई, झगड़ा, विवाद, वैमनस्य क्यों?
खोने से पहले पा लेना ही जीवन की थाती रह जाता है वरना बचता है एक खालीपन ही तो। ... और अंत में इसी सत्य का अनुमोदन करती मेरी यह कविता-
सुना तो बहुत था
धूप की चादर में लिपटे हुए ख़्वाब
कभी पूरे नहीं होते
अब ये जाना
तुमको खो कर
कि लोग सच कहते थे।
----------
https://issuu.com/samyiksamiksha/docs/samayik_saraswati_july-september_20
https://www.slideshare.net/samyiksamiksha/samayik-saraswati-july-september-2016
- शरद सिंह
वर्षा ऋतु का आगमन... चिलचिलाती धूप के बाद एक सुखद अनुभव...किसी वृद्ध के चेहरे-सी गहरी झुर्रियों वाली सूखी हुई धरती पर रौनक लौटाती बूंदें... रेत से धूसर हो चले परिदृश्य पर हरियल अंकुराते सपने। हर बार की तरह इस बार भी पावस ने सूखे के द्वार पर दस्तक दी कि लो, मैं आ गया। उन राज्यों में राहत की लहर दौड़ गई जहां किसान आकाश की ओर टकटकी बांधे देख रहे थे।
पावस... हां, पावस में ही होती है ‘‘पावस व्याख्यानमाला’’। 23-24 जुलाई 2016 को हिन्दी भवन, भोपाल में आयोजित दो दिवसीय 23वीं पावस व्याख्यानमाला में ‘‘समकालीन उपन्यासों में थर्ड जेंडर की सामाजिक उपस्थिति’’ विषय पर मैंने अपना व्याख्यान देते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘इस मंच से थर्ड जेंडर विमर्श को आरम्भ किए जाने की मैं घोषणा करती हूं।’’ वहां उपस्थित बुद्धिजीवियों ने मेरी इस घोषणा का स्वागत किया। मेरी इस बात का भी कि थर्ड जेंडर को सामाजिक समानता के अधिकार दिलाने में साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और आवश्यकता है ऐसे साहित्य पर एक स्वतंत्रा विमर्श की। ...और मैंने अनुभव किया कि सभी उत्सुक हैं इस नए विमर्श के आगाज़ के लिए। मैंने अपनी बात के तर्क में थर्ड जेंडर से जुड़ी जमीनी सच्चाइयों के साथ ही हिन्दी के उन उपन्यासों पर विस्तार से चर्चा की जो थर्ड जेंडर पर आधारित हैं। इस विषय पर मेरी एक पुस्तक भी आने वाली है। वैसे सच कहूं तो हिन्दी साहित्य में थर्ड जेंडर पर अलग से विमर्श की आवश्यकता का अनुभव मुझे तब हुआ जब मैंने वरिष्ठ कथाकार चित्रा मुद्गल का उपन्यास ‘‘पोस्ट बॉक्स 203 नाला सोपारा’’ पढ़ा। इस उपन्यास की कथा अपने आप में अद्भुत है और मन की गहराइयों तक उतर जाने में सक्षम है क्यों कि यह उपन्यास समाज में थर्ड जेंडर की दशा को नहीं वरन् थर्ड जेंडर की ओर से उसकी स्वयं की मनोदशा का बारीकी से विश्लेषण करता है।
विमर्श और विवाद दोनों ही ‘वि’ से शुरू होते हैं लेकिन एक विचारों को नया रास्ता देता है तो दूसरा विचारों की राह में रुकावट बन जाता है, यदि वह विवाद साहित्यिक चोरी का हो या घोस्ट राईटिंग के रहस्य के उद्घाटन का। ‘पल्प फिक्शन’ के क्षेत्रा में घोस्ट राईटिंग आम बात रही है। मोटे, धूसर काग़ज़ पर छपने वाले पॉकेटबुक उपन्यासों की दुनिया में घोस्ट राईटर्स की कोई कमी नहीं है। कोई नाम लेखक के तौर पर ‘ब्रांड’ बन जाने पर उस छद्म नाम पर विभिन्न लेखकों से उपन्यास लिखवाए जाते रहे हैं। आमतौर पर घोस्ट राईटर पैसों की तंगी से निपटने के लिए मजबूरी में यह रास्ता अपनाते हैं। इसीलिए जब कोई विवशता न हो और फिर भी घोस्ट राईटिंग की जाए, वह भी किसी वास्तविक नाम के लिए तो मामले को समझना ज़रा मुश्क़िल हो जाता है। अनेक बार ऐसे विवाद सामने आ चुके हैं जिनमें कभी किसी लेखिका पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगा तो कभी किसी लेखक ने दूसरे साहित्यकार के लिए सृजन का दावा किया। ताज़ा विवाद ‘जोशी बनाम जोशी’ का है। जिसमें प्रभु जोशी ने भालचन्द्र जोशी के लेखन पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए खुलासा किया है कि वे भालचन्द्र जोशी की कहानियों को विस्तार दिया करते थे। सभी आरोपां को नकारते हुए भालचन्द्र जोशी ने इसे ‘हताश और कुंठित व्यक्ति की मनःस्थिति’ करार दिया है। पत्रिका के इस अंक में इस विवाद के दोनों पक्षों को उन्हीं के शब्दों में पाठकों के सामने यथावत् रखा जा रहा है। ‘सामयिक सरस्वती’ के प्रबुद्ध पाठक सत्य का आकलन कर ही लेंगे।
मानव चरित्रा और मानव मन को समझ पाना सबके बस की बात नहीं होती। समाज विज्ञान और मानविकी पर अधिकारपूर्वक व्याख्यान देने वाले विद्वान तथा वर्तमान में महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र वर्तमान शिक्षा पद्धति को ले कर चिन्तित हैं। उनका कहना है कि ‘‘दुर्भाग्यवश आज की शिक्षापद्धति की आधारभूमि बर्तानवी औपनिवेशिक शासन की उस नीति में थी, जिसका उद्देश्य शासकों और शासितों के बीच बिचौलिए पैदा करना था। इसके लिए पश्चिमी शिक्षा की अंग्रेजी माध्यम से नींव डाली गयी।’’ उनकी चिन्ता स्वाभाविक है। शिक्षा से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों और उनके उत्तरों के साथ ‘रचना, आलोचना और साक्षात्कार’ में इस बार प्रो. गिरीश्वर मिश्र हैं .... उनसे महत्वपूर्ण बातचीत की है अशोक मिश्र ने और उनके कृतित्व पर आलोचनात्मक टिप्पणी की है बलराम शुक्ल ने।
आलोचकों की प्रथम पंक्ति में जिनका नाम आता है उनमें से एक हैं नामवर सिंह। हिन्दी साहित्य में नामवर सिंह होने का अर्थ क्या है? इस पर बड़ी सजगता से कलम चलाई है सदानंद शाही ने।
हमेशा की तरह इस अंक में भी कहानियां, कविताएं, लेख और पुस्तक समीक्षा। लेकिन हर एक के तेवर अलग, हर एक की ज़मीन अलग। शशिकला त्रिपाठी का लेख ‘साम्प्रदायिकता और हिन्दी फिल्में’ एक दिलचस्प दिशा देता है हिन्दी फिल्मों के बारे में विचार करने को। हॉलीवुड की फिल्मों से हमारी हिन्दी फिल्मों, विशेषरूप से कामर्शियल फिल्मों में एक सबसे बड़ा अन्तर है गानों का। हिन्दी फिल्मों में गायक और गाने फिल्मों को जनमानस की स्मृतियों से जोड़े रखने में सेतु का काम करते हैं। ‘कभी तनहाइयों में हमारी याद आएगी...’ जिस आवाज़ में यह मशहूर गाना गाया गया था वो आवाज़ मुबारक़ बेगम की थी जिन्हें पिछले दिनों हमने खो दिया। किसी समय लाखों दिलों पर राज करने वाली पार्श्व गायिका मुबारक बेगम का लंबी बीमारी के बाद मुंबई में जोगेश्वरी स्थित घर में निधन हो गया। वह 80 साल की थीं। मुबारक बेगम ने 1950 से 1970 के बीच कई फिल्मों में गाने गाए। मुबारक़ बेगम भले ही ज़मीदोज़ हो गईं लेकिन उनकी आवाज़ हमेशा हवाओं में तैरती रहेगी।
विगत दिनों हमने कई कला और साहित्य के कई दिग्गजों को खोया। कालजयी कृति ‘हज़ार चौरासी की मां’ की लेखिका महाश्वेता देवी का देहावसान साहित्यजगत को स्तब्ध कर गया। जनजातीय समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हीं के शब्दों में ‘‘एक लम्बे अरसे से मेरे भीतर जनजातीय समाज के लिए पीड़ा की जो ज्वाला धधक रही है, वह मेरी चिता के साथ ही शांत होगी।’’ उनके उपन्यास गहन शोध पर आधारित हैं। 1956 में प्रकाशित अपने पहले उपन्यास ‘झांसीर रानी’ की तथ्यात्मक सामग्री जुटाने के लिए उन्होंने सन् 1857 की जनक्रांति से संबद्ध क्षेत्रों झांसी, जबलपुर, ग्वालियर, ललितपुर, कालपी आदि की यात्रा की थी। वे अपने विशिष्ट लेखन के लिए सदा स्मरणीय रहेंगी।
जिस रास्ते से भी जाऊं/ मारा जाता हूं / मैंने सीधा रास्ता लिया/ मारा गया/ मैंने लम्बा रास्ता लिया/ मारा गया.... ये पंक्तियां हैं नीलाभ अश्क़ की, जिन्हें हमने खो दिया है। प्रसिद्ध साहित्यकार उपेंद्रनाथ अश्क के पुत्रा एवं जाने माने कवि, पत्राकार, नाटककार, अनुवादक, आलोचक और जुझारू साथी नीलाभ अश्क। उन्होंने अरूंधति राय की पुस्तक ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ का अनुवाद ‘मामूली चीजों का देवता’ शीर्षक से किया था। शेक्सपीयर, ब्रेख्त और लोर्का के कई नाटकों का काव्यात्मक अनुवाद और लेर्मोन्तोव के उपन्यास का अनुवाद भी किया। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की त्रौमासिक पत्रिका ‘नटरंग’ के संपादक रहे। वे ‘नीलाभ का मोर्चा’ नाम का ब्लॉग भी लिखते थे।
एक और महत्वपूर्ण कवि, अनुवादक, अध्यापक एवं पत्राकार को हमने खोया ... वे है वीरेन्द्र डंगवाल। उनके काव्य-सृजन की विशेषता थी उन्मुक्तता के साथ बौद्धिकता और लोकत्व के गुण। पहाड़ की प्रतिध्वनियों से भरीपूरी अभिव्यक्ति ने काव्यप्रेमियों को उनकी ओर सहज आकर्षित किया। वीरेन डंगवाल ने पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव होलुब, तदेऊश रोजेविच और नाजिम हिकमत की कविताओं के अनुवाद भी किए।
कलम और तूलिका भावनाओं को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम हैं। जो संवाद एक कविता या कहानी कर सकती है वही संवाद एक पेंटिंग भी करती है। शब्दों से रंग और रंगों से शब्द ध्वनित होना ही कला और साहित्य को परस्पर जोड़ता है। कलम के धनी अशोक वाजपेयी और तूलिका के धनी सैयद हैदर रज़ा की मित्राता अभिन्न रही। भारत के तीन सर्वोच्च सम्मान पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री से सम्मानित विश्वविख्यात चित्राकार सैयद हैदर रज़ा का निधन कलाजगत के लिए एक अपूर्णीर्य क्षति है।
रिश्ता चाहे संगीत का हो, चित्राकला का हो या फिर साहित्य का, अपनों का बिछड़ना सदा पीड़ादायक होता है। यह चिरविछोड़ उस सत्य का भी पाठ पढ़ाता है कि जीवन नश्वर है, ज़िंदगी की शाम कभी भी हो सकती है तो फिर परस्पर लडाई, झगड़ा, विवाद, वैमनस्य क्यों?
खोने से पहले पा लेना ही जीवन की थाती रह जाता है वरना बचता है एक खालीपन ही तो। ... और अंत में इसी सत्य का अनुमोदन करती मेरी यह कविता-
सुना तो बहुत था
धूप की चादर में लिपटे हुए ख़्वाब
कभी पूरे नहीं होते
अब ये जाना
तुमको खो कर
कि लोग सच कहते थे।
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https://issuu.com/samyiksamiksha/docs/samayik_saraswati_july-september_20
https://www.slideshare.net/samyiksamiksha/samayik-saraswati-july-september-2016
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| Samayik Saraswati, July-September 2016 - Editorial (1) |
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| Samayik Saraswati, July-September 2016 - Editorial (2) |
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| Samayik Saraswati, July-September 2016 |
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| Samayik Saraswati, July-September 2016 - Cover |
शुक्रवार, सितंबर 09, 2016
मेरे पसंदीदा लेखक .... लियो टालस्टाय और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ...
लियो टालस्टाय और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र.... दोनों मेरे पसंदीदा लेखक ...जिनकी किताबें मेरे लिए प्रेरक रही हैं.....
आज उनका जन्मदिवस है.....
LEO TOLSTOY and Bharatendu Harishchandra .... My Favorite Writers ...Whose books are my ideal...
Today they were born ....
आज उनका जन्मदिवस है.....
LEO TOLSTOY and Bharatendu Harishchandra .... My Favorite Writers ...Whose books are my ideal...
Today they were born ....
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| Leo Tolstoy and Bharatendu Harishchandra |
शुक्रवार, सितंबर 02, 2016
मेरी पहली ‘डेब्यू स्टोरी’ ‘फेमिना’ (हिन्दी) सितम्बर 2016 में ....
प्रिय
मित्रो, ‘फेमिना’ (हिन्दी) के सितम्बर 2016 अंक में मेरे वक्तव्य के साथ
मेरी ‘प्रथम प्रकाशित कहानी’ प्रकाशित की गई है। अपनी पहली कहानी को ‘फेमिना’
में प्रकाशित देख कर बहुत-सी यादें ताज़ा हो गईं। आप भी पढ़िए मेरी पहली
‘डेब्यू स्टोरी’ ‘‘गीला अंधेरा’....
एक सुखद अनुभूति के लिए हार्दिक धन्यवाद ‘‘फेमिना’’!
'Femina' magazine has published my "first published story" with my statement in September 2016 issue. Really it is special experience for me. So, I want to share with all of you.
Thank you "Femina" to give me a special experience !!!
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| Femina, September 2016 - Story of Dr (Miss) Sharad Singh |
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| Femina, September 2016 - Story of Dr (Miss) Sharad Singh |
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| Femina, September 2016 - Story of Dr (Miss) Sharad Singh |
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| Femina, September 2016 - Cover Page |
बुधवार, अगस्त 31, 2016
मुक्तिबोध ! तुम्हें बोध था मुक्ति के द्वार का - शरद सिंह
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| Dr (Miss) Sharad Singh |
‘‘सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के मुक्तिबोध विशेषांक में मेरा संपादकीय ...
(सामयिक सरस्वती, संपादक Mahesh Bhardwaj, कार्यकारी संपादक Sharad Singh) का अप्रैल-जून 2016 अंक गजानन माधव मुक्तिबोध पर केंद्रित विशेषांक )
मुक्तिबोध ! तुम्हें बोध था मुक्ति के द्वार का
- शरद सिंह
गजानन माधव मुक्तिबोध का शताब्दी वर्ष इसी वर्ष अर्थात् 2016 के नवंबर माह में आरम्भ हो जाएगा। शताब्दी वर्ष आरम्भ होते ही मुक्तिबोध की रचनाशीलता और सृजन पर चर्चा-परिचर्चा, संगोष्ठियों तथा आकलन का दौर भी आरम्भ हो जाएगा। इस कोलाहल से पहले ‘सामयिक सरस्वती’ का यह अंक ‘मुक्तिबोध विशेषांक’ के रूप में रखने का उद्देश्य मात्रा यही है कि मुक्तिबोध के तमाम सृजन को आत्मसात करते हुए शताब्दी वर्ष तक पहुंचा जाए... ताकि हम उन्हें भली-भांति जान, समझ लें जिनका शताब्दी वर्ष मनाने जा रहे हैं।
वस्तुतः मुक्तिबोध के विचारों को समझना सरल नहीं हैं। उनके शब्द सरल प्रतीत हो सकते हैं किन्तु उन शब्दों की गहराई उस तल तक ले जाती है जहां वाद-विवाद से परे मानवधर्म सम्वाद करता मिलता है। मुक्तिबोध का काव्य छायावादी शैली से आरम्भ हो कर यथार्थवाद की ओर अग्रसर हुआ। वे अपनी कविताओं में कबीर की तरह मुखर दिखाई देते हैं। ‘खतरे उठाने ही होंगे’ में समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है। यदि मुक्तिबोध के समग्र साहित्य का पुनर्मूल्यांकन किया जाए तो हम पाएंगे कि आज जिन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रश्नों के उत्तर हम ढूंढ रहे हैं, उन अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर हैं मुक्तिबोध के साहित्य में। समय की नब्ज़ को थामने और धड़कनें गिनने की क्षमता अपने समकालीन साहित्यकारों की अपेक्षा मुक्तिबोध में कहीं अधिक थी। यह भी उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध अपने साहित्य को ले कर अपने जीवनकाल में उतने लोकप्रिय नहीं हुए जितने कि मरणोपरांत।
सन् 1980 में जबलपुर में राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक संघ का महाअधिवेशन हुआ। अनेक लेखक उसमें उपस्थित हुए। उस समय मध्यप्रदेश के शिक्षा एवं संस्कृति सचिव अशोक वाजपेयी थे तथा मुख्यमंत्राी थे अर्जुन सिंह। अर्जुन सिंह ने उस सम्मेलन में लेखकों का स्वागत करने के लिए आने की इच्छा जताई। लेखकों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। शिव कुमार मिश्र नाराज़ हो कर गुजरात लौट गए और विश्वंभर उपाध्याय ने भी विरोध किया। सम्मेलन की अध्यक्षता हरिशंकर परसाई ने की, उद्घाटन केदारनाथ अग्रवाल ने किया तथा संचालन ज्ञानरंजन एवं कमला प्रसाद ने किया। बहरहाल, इसी सम्मेलन में यह प्रस्ताव रखा गया कि किसी विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ की स्थापना की जाए। इसके लगभग महीने भर बाद मुख्यमंत्राी की ओर से घोषणा कर दी गई कि सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ की स्थापना की जाएगी। पीठ की जिम्मेदारी सौंपी गई हरिशंकर परसाई को। हरिशंकर परसाई इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार नहीं थे किन्तु उनके मित्रों ने उन पर दबाव बनाया और तब उन्हें मुक्तिबोध पीठ का दायित्व स्वीकार करना ही पड़ा।
त्रिलोचन शास्त्राी ने दो बार मुक्तिबोध पीठ का कार्यभार सम्हाला। अपने पहले कार्यकाल में वे अत्यंत सक्रिय रहे किन्तु दूसरे कार्यकाल तक वे अपनी अद्र्धांगिनी को खो चुके थे जिसके कारण भीतर ही भीतर उन्हें अवसाद घेरने लगा था। इसीलिए दूसरा कार्यकाल, पहले कार्यकाल की अपेक्षा शिथिल रहा। इस पीठ का दायित्व नरेश सक्सेना तथा श्याम सुंदर दुबे ने भी सम्हाला।
मुक्तिबोध तारसप्तक के पहले कवि थे। उन्होंने अपने जीवन को सक्रियता से जिया तथा साहित्य सृजन के प्रति समर्पित रहे किन्तु विडम्बना यह कि उनकी कविताओं का पहला संकलन ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ उनकी मृत्यु के बाद ही प्रकाशित हुआ। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ का दूसरा संस्करण भी उनकी मृत्यु के दो महीने बाद प्रकाशित हुआ। मुक्तिबोध की कविताओं में भावनाओं की एक अलग ही आंच रही। इस आंच की तपिश को महसूस करते हुए वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने टिप्पणी की थी कि ‘‘अपनी आलोचनात्मक क्षमता के द्वारा मुक्तिबोध ने प्रमाणित कर दिया कि कोई भी चीज तभी स्पष्ट होती है जब कम-से-कम एक ईमानदार व्यक्ति मौजूद हो।’’
मुक्तिबोध को कविताओं के लिए अधिक ख्याति मिली किन्तु उनकी कहानियां भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। मुक्तिबोध की कहानियों में कथानकों की विविधता और कथन की तीक्ष्णता को देखते हुए इस बात की कसक रह जाती है कि यदि वे और कहानियां लिख पाए होते तो हिन्दी कथा साहित्य को समृद्ध करने में उनकी एक अलग पहचान होती। जहां तक मुक्तिबोध की विचारधारा का प्रश्न है तो कुछ विद्वानों ने मुक्तिबोध को माक्र्सवादी और समाजवादी विचारों से प्रभावित कहा, तो कुछ ने उन्हें अस्तित्ववाद से प्रभावित ठहराया। डाॅ. रामविलास शर्मा ने भी उन्हें अस्तित्ववाद से प्रभावित बताते हुए उनकी कविताओं को खारिज किया। लेकिन प्रत्येक वाद-विवाद के सार में मुक्तिबोध मानववादी मूल्यों पर खड़े दिखाई दिए।
एक लेखिका एवं एक पाठिका दोनों ही दृष्टि से मैंने जब मुक्तिबोध की कहानियों को पढ़ा तो मैंने अनुभव किया कि मुक्तिबोध कविताओं में भले ही वामपंथी अथवा अस्तित्ववादी दिखाई दें किन्तु कहानियों में वे विशुद्ध मानवतावादी और स्वस्थ सामाजिक मूल्यों से परिपूर्ण विचारों की पैरवी करते दिखाई देते हैं, और यही तथ्य उनकी मूल्यवत्ता को सौ गुना बढ़ा देता है। मुक्तिबोध की कहानियों से हो कर गुजरने के बाद मुक्तिबोध के कथा संसार के मानवतावादी मूल्यों को सहज ही अनुभव किया जा सकता है।
आजकल उच्चशिक्षा केन्द्रों में राजनीति का जो रूप देखने को मिल रहा है उसके तारतम्य में याद आती है मुक्तिबोध की कहानी ‘ब्रह्मराक्षस’ जिसमें उन्होंने भारतीय शिक्षा परम्परा को अपने अनूठे ढंग से रेखांकित किया है। यह एक अभिशप्त गुरु की कथा है। एक ऐसे गुरु की कथा जो अपने प्रत्येक शिष्य में उस योग्य शिष्य की तलाश करता है जो उसकी समस्त विद्या को ग्रहण कर ले। अंततः उसे एक ऐसा शिष्य मिल ही जाता है जो उसकी समस्त आज्ञाओं का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करता है। गुरु का अपना एक भेद था किन्तु समस्या यह थी कि वह केवल निष्णात शिष्य से ही अपना भेद साझा कर सकता था। जब उसका परम आज्ञाकारी शिष्य शिक्षा में निष्णात हो गया तब उसने अपने शिष्य के सामने अपना भेद खोलते हुए बताया कि वह शापित ब्रह्मराक्षस है और अब वह अपने सबसे योग्य शिष्य अर्थात् उसे अपना गुरुपद सौंप कर मुक्त हो रहा है। वह अपने शिष्य से कहता है-‘‘मैंने अज्ञान से तुम्हारी मुक्ति की। तुमने मेरा ज्ञान प्राप्त कर मेरी आत्मा को मुक्ति दिला दी। ज्ञान का पाया हुआ उत्तरदायित्व मैंने पूरा किया। अब मेरा यह उत्तरदायित्व तुम पर आ गया है। जब तक मेरा दिया तुम किसी और को न दोगे तब तक तुम्हारी मुक्ति नहीं।’’
मुक्तिबोध न तो साम्यवादी विचारधारा के थे और न पूंजीवादी विचारधारा के, वे मूलरूप में मानवतावादी थे, मात्रा मानवतावादी। मुक्तिबोध एक उच्चकोटि के कवि ही नहीं वरन् एक कुशल कहानीकार भी थे जिन्होंने अपनी प्रत्येक कहानी में जीवन की सार्थकता के लिए मानववाद की पैरवी की। चाहे ‘ब्रह्मराक्षस’ हो या ‘दीमक और पक्षी’, चाहे ‘काठ का सपना’ हो या ‘क्लाॅड ईथरली’ या फिर ‘प्रश्न’- मुक्तिबोध संबंधों की ईमानदारी, स्त्राी-पुरुष पारस्परिक संवेगों के महत्व, समाज और व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध को प्राथमिकता देते हैं। वे अपनी कहानियों में जहां एक ओर स्वाद रूपी दीमक के लिए अपने पंख बेचने वाले पक्षी की नीतिकथा को अंतर्निहित करते हैं तो वहीं, संत बने रहने के लिए अपनी जननेंद्रीय को चाकू से काट देने वाले एबीलार्ड का भी स्मरण कराते हैं। मुक्तिबोध अपनी कहानियों में साम्यवादी विचारों के अंधानुकरण पर चोट करते दिखाई पड़ते हैं। वे ‘क्लाॅड ईथरली’ में खुल कर लिखते हैं-‘‘क्या हमने इंडोनेशियाई या चीनी या अफ्रीकी साहित्य से प्रेरणा ली है या लुमुंबा के काव्य से? छिः छिः ! वह जानवरों का, चैपायों का साहित्य है! और रूस का? अरे! यह तो स्वार्थ की बात है! इसका राज और ही है। रूस से हम मदद चाहते हैं, लेकिन डरते भी हैं।’’
मुक्तिबोध ने ‘जनता का साहित्य क्या है?’, इस विषय पर ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में लिखा है कि- ‘‘साहित्य का संबंध आपकी भूख-प्यास से है, मानसिक और सामाजिक। किसी भी प्रकार का आदर्शात्मक साहित्य जनता से असबंद्ध नहीं है। दरअसल जनता का साहित्य का अर्थ, जनता को तुरंत ही समझ में आने वाले साहित्य से हरगिज नहीं। ऐसा होता तो किस्सा, तोता-मैना और नौटंकी ही साहित्य के प्रधान रूप होते।कृतो फिर जनता का साहित्य का अर्थ क्या है। इसका अर्थ है ऐसा साहित्य जो जनता के जीवन मूल्यों को, जनता के जीवन आदर्शों को प्रतिस्थापित करता हो, उसे अपने मुक्तिपथ पर अग्रसर करता हो। इस मुक्तिपथ का अर्थ राजनीतिक मुक्ति से लेकर अज्ञान से मुक्ति तक है।’’ इस दृष्टि से देखा जाए तो मुक्तिबोध की कहानियों का आकलन उनके ‘वामपंथी प्रेरित होने’ के विचार से हट कर, किसी भी ध्रुवीय वादविशेष को आधार न मानते हुए मानवतावादी कहानीकार होने के रूप में किए जाने पर ये कहानियां अपेक्षाकृत अधिक बड़े फलक की कहानियां सिद्ध होती हैं।
‘सामयिक सरस्वती’ के इस अंक में मुक्तिबोध के कवि, लेखक, आलोचक, कहानीकार एवं पत्राकार पक्ष का परिचय तो मिलेगा ही साथ ही उनके जीवन से जुड़े रोचक संस्मरणों से गुज़रने का भी अवसर मिलेगा। इस विशेषांक के अतिथि संपादक हैं युवा साहित्यकार एवं समीक्षक दिनेश कुमार।
मुझे विश्वास है कि यह अंक ‘सामयिक सरस्वती’ के सुधी पाठकों को पसंद आएगा।
और अंत में मुक्तिबोध के सृजन के प्रति समर्पित मेरी एक कविता ....
मुक्तिबोध !
तुम्हें बोध था
मुक्ति के द्वार का
तभी तो ‘अंधेरे में’ तुमने
उजाले के रख दिए कुछ बिन्दु
टिमटिमाते हुए
फिर जुगनुओं की खेप
उपजा दी स्याही से, कागज़ पर
ताकि अंधेरे में रह कर भी
हम पा सकें उजाले की
असीमित संभावनाएं
और जी सकें अपने यथार्थ को।
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Also can read on this Link ...
https://issuu.com/samyiksamiksha/docs/samayik_saraswati_april_june_2016
- शरद सिंह
गजानन माधव मुक्तिबोध का शताब्दी वर्ष इसी वर्ष अर्थात् 2016 के नवंबर माह में आरम्भ हो जाएगा। शताब्दी वर्ष आरम्भ होते ही मुक्तिबोध की रचनाशीलता और सृजन पर चर्चा-परिचर्चा, संगोष्ठियों तथा आकलन का दौर भी आरम्भ हो जाएगा। इस कोलाहल से पहले ‘सामयिक सरस्वती’ का यह अंक ‘मुक्तिबोध विशेषांक’ के रूप में रखने का उद्देश्य मात्रा यही है कि मुक्तिबोध के तमाम सृजन को आत्मसात करते हुए शताब्दी वर्ष तक पहुंचा जाए... ताकि हम उन्हें भली-भांति जान, समझ लें जिनका शताब्दी वर्ष मनाने जा रहे हैं।
वस्तुतः मुक्तिबोध के विचारों को समझना सरल नहीं हैं। उनके शब्द सरल प्रतीत हो सकते हैं किन्तु उन शब्दों की गहराई उस तल तक ले जाती है जहां वाद-विवाद से परे मानवधर्म सम्वाद करता मिलता है। मुक्तिबोध का काव्य छायावादी शैली से आरम्भ हो कर यथार्थवाद की ओर अग्रसर हुआ। वे अपनी कविताओं में कबीर की तरह मुखर दिखाई देते हैं। ‘खतरे उठाने ही होंगे’ में समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है। यदि मुक्तिबोध के समग्र साहित्य का पुनर्मूल्यांकन किया जाए तो हम पाएंगे कि आज जिन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रश्नों के उत्तर हम ढूंढ रहे हैं, उन अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर हैं मुक्तिबोध के साहित्य में। समय की नब्ज़ को थामने और धड़कनें गिनने की क्षमता अपने समकालीन साहित्यकारों की अपेक्षा मुक्तिबोध में कहीं अधिक थी। यह भी उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध अपने साहित्य को ले कर अपने जीवनकाल में उतने लोकप्रिय नहीं हुए जितने कि मरणोपरांत।
सन् 1980 में जबलपुर में राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक संघ का महाअधिवेशन हुआ। अनेक लेखक उसमें उपस्थित हुए। उस समय मध्यप्रदेश के शिक्षा एवं संस्कृति सचिव अशोक वाजपेयी थे तथा मुख्यमंत्राी थे अर्जुन सिंह। अर्जुन सिंह ने उस सम्मेलन में लेखकों का स्वागत करने के लिए आने की इच्छा जताई। लेखकों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। शिव कुमार मिश्र नाराज़ हो कर गुजरात लौट गए और विश्वंभर उपाध्याय ने भी विरोध किया। सम्मेलन की अध्यक्षता हरिशंकर परसाई ने की, उद्घाटन केदारनाथ अग्रवाल ने किया तथा संचालन ज्ञानरंजन एवं कमला प्रसाद ने किया। बहरहाल, इसी सम्मेलन में यह प्रस्ताव रखा गया कि किसी विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ की स्थापना की जाए। इसके लगभग महीने भर बाद मुख्यमंत्राी की ओर से घोषणा कर दी गई कि सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ की स्थापना की जाएगी। पीठ की जिम्मेदारी सौंपी गई हरिशंकर परसाई को। हरिशंकर परसाई इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार नहीं थे किन्तु उनके मित्रों ने उन पर दबाव बनाया और तब उन्हें मुक्तिबोध पीठ का दायित्व स्वीकार करना ही पड़ा।
त्रिलोचन शास्त्राी ने दो बार मुक्तिबोध पीठ का कार्यभार सम्हाला। अपने पहले कार्यकाल में वे अत्यंत सक्रिय रहे किन्तु दूसरे कार्यकाल तक वे अपनी अद्र्धांगिनी को खो चुके थे जिसके कारण भीतर ही भीतर उन्हें अवसाद घेरने लगा था। इसीलिए दूसरा कार्यकाल, पहले कार्यकाल की अपेक्षा शिथिल रहा। इस पीठ का दायित्व नरेश सक्सेना तथा श्याम सुंदर दुबे ने भी सम्हाला।
मुक्तिबोध तारसप्तक के पहले कवि थे। उन्होंने अपने जीवन को सक्रियता से जिया तथा साहित्य सृजन के प्रति समर्पित रहे किन्तु विडम्बना यह कि उनकी कविताओं का पहला संकलन ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ उनकी मृत्यु के बाद ही प्रकाशित हुआ। ‘एक साहित्यिक की डायरी’ का दूसरा संस्करण भी उनकी मृत्यु के दो महीने बाद प्रकाशित हुआ। मुक्तिबोध की कविताओं में भावनाओं की एक अलग ही आंच रही। इस आंच की तपिश को महसूस करते हुए वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने टिप्पणी की थी कि ‘‘अपनी आलोचनात्मक क्षमता के द्वारा मुक्तिबोध ने प्रमाणित कर दिया कि कोई भी चीज तभी स्पष्ट होती है जब कम-से-कम एक ईमानदार व्यक्ति मौजूद हो।’’
मुक्तिबोध को कविताओं के लिए अधिक ख्याति मिली किन्तु उनकी कहानियां भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। मुक्तिबोध की कहानियों में कथानकों की विविधता और कथन की तीक्ष्णता को देखते हुए इस बात की कसक रह जाती है कि यदि वे और कहानियां लिख पाए होते तो हिन्दी कथा साहित्य को समृद्ध करने में उनकी एक अलग पहचान होती। जहां तक मुक्तिबोध की विचारधारा का प्रश्न है तो कुछ विद्वानों ने मुक्तिबोध को माक्र्सवादी और समाजवादी विचारों से प्रभावित कहा, तो कुछ ने उन्हें अस्तित्ववाद से प्रभावित ठहराया। डाॅ. रामविलास शर्मा ने भी उन्हें अस्तित्ववाद से प्रभावित बताते हुए उनकी कविताओं को खारिज किया। लेकिन प्रत्येक वाद-विवाद के सार में मुक्तिबोध मानववादी मूल्यों पर खड़े दिखाई दिए।
एक लेखिका एवं एक पाठिका दोनों ही दृष्टि से मैंने जब मुक्तिबोध की कहानियों को पढ़ा तो मैंने अनुभव किया कि मुक्तिबोध कविताओं में भले ही वामपंथी अथवा अस्तित्ववादी दिखाई दें किन्तु कहानियों में वे विशुद्ध मानवतावादी और स्वस्थ सामाजिक मूल्यों से परिपूर्ण विचारों की पैरवी करते दिखाई देते हैं, और यही तथ्य उनकी मूल्यवत्ता को सौ गुना बढ़ा देता है। मुक्तिबोध की कहानियों से हो कर गुजरने के बाद मुक्तिबोध के कथा संसार के मानवतावादी मूल्यों को सहज ही अनुभव किया जा सकता है।
आजकल उच्चशिक्षा केन्द्रों में राजनीति का जो रूप देखने को मिल रहा है उसके तारतम्य में याद आती है मुक्तिबोध की कहानी ‘ब्रह्मराक्षस’ जिसमें उन्होंने भारतीय शिक्षा परम्परा को अपने अनूठे ढंग से रेखांकित किया है। यह एक अभिशप्त गुरु की कथा है। एक ऐसे गुरु की कथा जो अपने प्रत्येक शिष्य में उस योग्य शिष्य की तलाश करता है जो उसकी समस्त विद्या को ग्रहण कर ले। अंततः उसे एक ऐसा शिष्य मिल ही जाता है जो उसकी समस्त आज्ञाओं का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करता है। गुरु का अपना एक भेद था किन्तु समस्या यह थी कि वह केवल निष्णात शिष्य से ही अपना भेद साझा कर सकता था। जब उसका परम आज्ञाकारी शिष्य शिक्षा में निष्णात हो गया तब उसने अपने शिष्य के सामने अपना भेद खोलते हुए बताया कि वह शापित ब्रह्मराक्षस है और अब वह अपने सबसे योग्य शिष्य अर्थात् उसे अपना गुरुपद सौंप कर मुक्त हो रहा है। वह अपने शिष्य से कहता है-‘‘मैंने अज्ञान से तुम्हारी मुक्ति की। तुमने मेरा ज्ञान प्राप्त कर मेरी आत्मा को मुक्ति दिला दी। ज्ञान का पाया हुआ उत्तरदायित्व मैंने पूरा किया। अब मेरा यह उत्तरदायित्व तुम पर आ गया है। जब तक मेरा दिया तुम किसी और को न दोगे तब तक तुम्हारी मुक्ति नहीं।’’
मुक्तिबोध न तो साम्यवादी विचारधारा के थे और न पूंजीवादी विचारधारा के, वे मूलरूप में मानवतावादी थे, मात्रा मानवतावादी। मुक्तिबोध एक उच्चकोटि के कवि ही नहीं वरन् एक कुशल कहानीकार भी थे जिन्होंने अपनी प्रत्येक कहानी में जीवन की सार्थकता के लिए मानववाद की पैरवी की। चाहे ‘ब्रह्मराक्षस’ हो या ‘दीमक और पक्षी’, चाहे ‘काठ का सपना’ हो या ‘क्लाॅड ईथरली’ या फिर ‘प्रश्न’- मुक्तिबोध संबंधों की ईमानदारी, स्त्राी-पुरुष पारस्परिक संवेगों के महत्व, समाज और व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध को प्राथमिकता देते हैं। वे अपनी कहानियों में जहां एक ओर स्वाद रूपी दीमक के लिए अपने पंख बेचने वाले पक्षी की नीतिकथा को अंतर्निहित करते हैं तो वहीं, संत बने रहने के लिए अपनी जननेंद्रीय को चाकू से काट देने वाले एबीलार्ड का भी स्मरण कराते हैं। मुक्तिबोध अपनी कहानियों में साम्यवादी विचारों के अंधानुकरण पर चोट करते दिखाई पड़ते हैं। वे ‘क्लाॅड ईथरली’ में खुल कर लिखते हैं-‘‘क्या हमने इंडोनेशियाई या चीनी या अफ्रीकी साहित्य से प्रेरणा ली है या लुमुंबा के काव्य से? छिः छिः ! वह जानवरों का, चैपायों का साहित्य है! और रूस का? अरे! यह तो स्वार्थ की बात है! इसका राज और ही है। रूस से हम मदद चाहते हैं, लेकिन डरते भी हैं।’’
मुक्तिबोध ने ‘जनता का साहित्य क्या है?’, इस विषय पर ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में लिखा है कि- ‘‘साहित्य का संबंध आपकी भूख-प्यास से है, मानसिक और सामाजिक। किसी भी प्रकार का आदर्शात्मक साहित्य जनता से असबंद्ध नहीं है। दरअसल जनता का साहित्य का अर्थ, जनता को तुरंत ही समझ में आने वाले साहित्य से हरगिज नहीं। ऐसा होता तो किस्सा, तोता-मैना और नौटंकी ही साहित्य के प्रधान रूप होते।कृतो फिर जनता का साहित्य का अर्थ क्या है। इसका अर्थ है ऐसा साहित्य जो जनता के जीवन मूल्यों को, जनता के जीवन आदर्शों को प्रतिस्थापित करता हो, उसे अपने मुक्तिपथ पर अग्रसर करता हो। इस मुक्तिपथ का अर्थ राजनीतिक मुक्ति से लेकर अज्ञान से मुक्ति तक है।’’ इस दृष्टि से देखा जाए तो मुक्तिबोध की कहानियों का आकलन उनके ‘वामपंथी प्रेरित होने’ के विचार से हट कर, किसी भी ध्रुवीय वादविशेष को आधार न मानते हुए मानवतावादी कहानीकार होने के रूप में किए जाने पर ये कहानियां अपेक्षाकृत अधिक बड़े फलक की कहानियां सिद्ध होती हैं।
‘सामयिक सरस्वती’ के इस अंक में मुक्तिबोध के कवि, लेखक, आलोचक, कहानीकार एवं पत्राकार पक्ष का परिचय तो मिलेगा ही साथ ही उनके जीवन से जुड़े रोचक संस्मरणों से गुज़रने का भी अवसर मिलेगा। इस विशेषांक के अतिथि संपादक हैं युवा साहित्यकार एवं समीक्षक दिनेश कुमार।
मुझे विश्वास है कि यह अंक ‘सामयिक सरस्वती’ के सुधी पाठकों को पसंद आएगा।
और अंत में मुक्तिबोध के सृजन के प्रति समर्पित मेरी एक कविता ....
मुक्तिबोध !
तुम्हें बोध था
मुक्ति के द्वार का
तभी तो ‘अंधेरे में’ तुमने
उजाले के रख दिए कुछ बिन्दु
टिमटिमाते हुए
फिर जुगनुओं की खेप
उपजा दी स्याही से, कागज़ पर
ताकि अंधेरे में रह कर भी
हम पा सकें उजाले की
असीमित संभावनाएं
और जी सकें अपने यथार्थ को।
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https://issuu.com/samyiksamiksha/docs/samayik_saraswati_april_june_2016
https://www.slideshare.net/samyiksamiksha/samayik-saraswati-april-june-2016
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| Samayik Saraswati April-June 2016 - Editorial (1) |
![]() |
| Samayik Saraswati April-June 2016 - Editorial (2) |
![]() |
| Samayik Saraswati April-June 2016 - Cover |
शुक्रवार, मई 27, 2016
मनोरमा_ईयर_बुक 2016 में मेरी तीन पुस्तकें ...
Dayal Upadhyay are mentioned as notable books of 2015.
Hearty gratitude to "Manorama Year Book" and Pradeep Kumar .....
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