शनिवार, अक्टूबर 07, 2023

कहानी | तुम मुक्तकेशी क्यों नहीं बनी, रूपाली? | डॅा.(सुश्री) शरद सिंह | पहला अंतरा में प्रकाशित

कहानी  
   
तुम मुक्तकेशी क्यों नहीं बनी, रूपाली?

 - डॅा.(सुश्री) शरद सिंह


‘‘तुमने आज का अख़बार पढ़ा?’’ सुलभा ने हांफते हुए मुझसे पूछा। 
वह अपने दाएं हाथ से अख़बार लहराती दौड़ी चली आ रही थी। आवेग के कारण उसके शब्द लड़खड़ा रहे थे। 
‘‘शांत हो जाओ! रिलेक्स! बैठ जाओ। पानी लाती हूं तुम्हारे लिए।’’ कहती हुई मैंने उसे हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए सोफे पर बिठाया। वह बैठी भी तो इस मुद्रा में मानो सोफे में स्प्रिंग लगी हो और वह अभी उछल पड़ेगी। मैंने मेज पर रखे जग से गिलास में पानी ढाला और गिलास उसे पकड़ा दिया।
वह गट्गट् कर के एक सांस में पूरा गिलास खाली कर गई। अपने दुपट्टे के छोर से अपना मुंह पोंछते हुए अख़बार मेरी आंखों के आगे लहरा दिया। मेरा ध्यान गया कि अभी तक अख़बार उसके दाएं हाथ की उंगलियों में ही फंसा हुआ था। 
‘‘तुमने पढ़ा?’’ सुलभा ने एक बार फिर मुझसे प्रश्न किया।
‘‘हां, पढ़ा। विश्वास करना कठिन है।’’ मैंने कहा।
‘‘हां, यार देखो, जलन होती थी उससे कि उसे कितना अच्छा गुड लुकिंग, हैंडसम पति मिला है। श्रेयांश के पापा से लाख गुना चार्मिंग।’’ सुलभा ने अपना दिल खोल दिया।
‘‘क्या कह रही हो!’’ मैंने टोंका।
‘‘अब तुमसे क्या छिपाना? मैंने तो उससे एक बार मज़ाक में कह भी दिया था कि यदि हसबैंड की एक्सचेंज आॅफर की कोई स्कीम होती तो मैं तुम्हारे हस्बैंड से अपना वाला एक्सचेंज कर लेती। और जानती हो उसने तब क्या जवाब दिया था?’’ सुलभा ने मुझे पूछा।
‘‘उसने फटकार लगाई होगी तुम्हें।’’ मैंने फीकी-सी हंसी हंसते हुए कहा। 
‘‘नहीं उसने कहा था- मैं भी!’’ सुलभा ने बताया। उसकी बात सुन कर मैं चौंक गई।
‘‘चल क्या रहा था उसके साथ? तुम्हारी बात तो समझ में आती है कि तुम कुछ भी कह डालती हो लेकिन वो क्यों राजी थी अपना हस्बैंड बदलने को? क्या उस समय से ही कुछ गलत चल रहा था?’’ मैंने कहा।
‘‘हां यार, ये तो मैंने सोचा ही नहीं। क्योंकि उस समय भी बात आई-गई हो गई थी। ऐसा कुछ होने वाला था भी नहीं। वह तो बस यूं ही कह दिया था मैंने। हंा, इससे मैं इंनकार नहीं करूंगी कि उसके हस्बैंड पर मुझे उस समय से ही क्रश था जब मैंने सगाई के समय उसे पहली बार देखा था। उस समय तो श्रेयांश भी नहीं हुआ था और श्रेयांश के पापा भी उतने फैटी नहीं थे जितने कि अब हो गए हैं। मैं तो कहती हूं कि सुबह उठ कर एक्सरसाईज़ किया करें, जिम जाएं, मगर वे हैं कि मेरी एक नहीं सुनते। जबकि उसके हस्बैंड को देखो अभी भी स्मार्ट है, डैशिंग है।’’ सुलभा आदतन बहकती हुई बोली।
‘‘ऐसी स्मार्टनेस भी किस काम की सुल्लू, जो किसी की जान ले ले। मुझे तो इतनी घृणा हो रही है उससे, कि अगर अभी वह मेरे सामने आ जाए तो मैं मार-मार के उसकी चमड़ी उधेड़ दूं। आखिर कोई कैसे इतना नृशंस हो सकता है?’’ मैं अपने घृणा के भावों को छिपा नहीं पा रही थी। वैसे छिपाना भी नहीं चाहती थी। मैं इतनी महान या साधु प्रवृत्ति की नहीं हूं कि पाप से घृणा करूं और पापी से नहीं। मुझे दोनों से बराबर की घृणा होती है।
‘‘हां, आज तो मुझे भी उसके हस्बैंड से घृणा हो रही है। बल्कि मेरी तांे यह सोच कर रूह कांप रही है कि मेरा एक डिमोन, एक नरपिशाच पर क्रश था। मुझे तो यह सोच कर भी झुरझुरी हो रही है कि यदि वो मेरा हस्बैंड होता तो....।’’ सुलभा की आगे की बात उसकी हलक में अटक कर रह गई। 
किसी भी औरत के लिए यह भयानक दुःस्वप्न हो सकता है कि उसका पति एक नृशंस हत्यारा निकले। 
‘‘यार कोई किसी पर इतना शक़ कैसे कर सकता है?’’ सुलभा बोली। उसका स्वर अभी भी स्थिर नहीं हुआ था।
‘‘शक़ की कोई सीमा नहीं होती है सुल्लू! वह तो अमरबेल की तरह होती है। जिस रिश्ते पर चढ़ी, उसका सारा रस चूस कर उसे मार डालती है। क्या तुम्हें डेसडिमोना याद नहीं है? काॅलेज में तो तुम ओथेलो और इयागो पर कितना गुस्सा करती थीं। मानो वे दोनों शेक्सपीयर के नाटक के पात्र न हो, बल्कि जीते-जागते वास्तविक व्यक्ति हो। वह भी तो पत्नी के चरित्र पर संदेह की ही कहानी थी। क्या हुआ था अंत उस कहानी का, याद है न?’’ मैंने सुलभा से पूछा।
‘‘हां याद है! मगर तब मैं सोचती थी कि यह योरोप में ही संभव है, हमारी संस्कृति में ऐसा नहीं हो सकता है।’’ सुलभा ने निराशा भरे स्वर में कहा। फिर विचित्र ढंग से मेरी ओर देखती हुई पूछ बैठी,‘‘यदि किसी दिन श्रेयांस के पापा को मुझे पर शक़ हो गया तो?’’
‘‘क्या बकवास कर रही हो! अव्वल तो श्रेयांस के पापा ऐसे हैं नहीं और फिर सुल्लू, हर मर्द एक जैसा नहीं होता है। वो तो कितनी केयर करते हैं तुम्हारी! उल्टे तुम्हीं कभी-कभी उन्हें डांट दिया करती हो। और फिर तुम्हारा किसी और से तो अफेयर भी नहीं है, तो फिर डर क्यों रही हो?’’ मैंने सुलभा को प्यार से समझाया। 
‘‘फिर भी! शक़ होने के लिए किसी से अफेयर होना जरूरी तो नहीं है!’’ सुलभा ने बड़े मार्के की बात बोली। 
‘‘सही कहती हो, सुल्लू! यदि कभी तुम्हारी ज़िन्दगी में ऐसा समय आए तो तुम अपने हस्बैंड से दो-टूक बात करना। यदि फिर भी उसे तुम पर विश्वास न हो तो तत्काल उसे छोड़ देना। यदि उसने भी समय रहते निर्णय लिया होता तो उस दरिंदे को यह मौका नहीं मिलता।’’ मैंने सुलभा को समझाया। 
‘‘क्या ये सब कुछ इतना आसान होगा?’’ सुलभा के स्वर में हिचक थी।
‘‘या तो आसान बनाओ या फिर दरिंदे के हत्थे चढ़ जाओ!’’ मैंने सुलभा से कहा।
‘‘नहीं! यह कैसे माना जा सकता है कि हर कोई इस हद तक जा सकता है?’’ सुलभा डर भी रही थी और मानने का साहस भी नहीं जुटा पा रही थी।
‘‘यह भी कैसे मान लिया जाए कि कोई इस हद तक नहीं जाएगा? ऐसे एक्सपेरीमेंट से क्या लाभ जिसका रिजल्ट अपनी जान दे कर पता चले।’’ मैंने सुलभा से कहा। 
संशय और घबराहट सुलभा के चेहरे से टपक रही थी। वह स्वयं को आश्वस्त नहीं कर पा रही थी। यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी, क्योंकि आज अख़बार में जिसकी ख़बर छपी है वह हमारी सगी सहेली थी। हम काॅलेज में साथ-साथ घूमा करती थीं। हमारी तिकड़ी मशहूर थी। फिर समय के साथ जीवन में परिवर्तन आते गए। सुलभा का विवाह हों गया। मुझे एकाकी जीवन मिला और वह यानी रूपाली को तनिक देर से लेकिन सुलभा के शब्दों में ‘‘गुड लुकिंग और डेशिंग’’ हस्बैंड मिला। मैं और सुलभा इसी शहर में रहती रहीं, लेकिन रूपाली का हस्बैंड एक मुंबई में एक मल्टी नेशनल कंपनी में सीईओ था। अतः उसे मुंबई में बसना पड़ा। शादी के बाद वह यहां एक-दो बार ही आई। जब आई भी तो इतने कम समय के लिए कि रिश्तेदारों में ही घूमते हुए उसका समय निकल गया, हम दोनों से संक्षिप्त भेंट हुई। हां, शुरू-शुरू में फोन पर हमारी बात होती रही, फिर वह भी धीरे-धीरे कम हो गई। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। हर कोई अपनी जिन्दगी में रम जाता है। हमें क्या पता था कि उसकी ज़िन्दगी जो ऊपर से शांत और ‘कूल’ दिखाई पड़ रही है, उसके भीतर ज्वालामुखी का लावा धधक रहा है। उस लावे के छींटों से रूपाली हर दिन तिल-तिल कर जल रही थी, पर ‘उफ!’ भी नहीं कर रही थी। ऐसा क्यों किया रूपाली ने? हम दोनों में से किसी से भी साझा करती अपने दर्द को, हम कोई न कोई रास्ता निकाल लेते। उसे यूं अकेली नहीं छोड़ते।
‘‘क्या सोच रही हो?’’ सुलभा ने मुझे टोंका।
‘‘कुछ नहीं! बस, संस्कृत की एक कहानी याद आ गई जो कभी ‘कथासरित्सागर’ में पढ़ी थी। तुम कह रही हो न कि हमारी संस्कृति में ऐसा नहीं हो सकता था। तो सुनो, तुम्हें वह कहानी सुनाती हूं। मुक्तकेशी की कहानी है यह।’’ मैंले सुलभा से कहा।
‘‘हां, यार! सुना ही दो, कुछ ध्यान तो बंटे। बार-बार उसका चेहरा आंखों के आगे आ जाता है। घबराहट होने लगती है।’’ सुलभा अपने शरीर को ढीला छोड़ती हुई सोफे पर अधलेटी हो गई।
‘‘सुनो, पुराने समय की बात है काशी में एक सुंदर युवती थी जिसका नाम था मुक्तकेशी। वह सुंदर ही नहीं अपितु सुशील और आज्ञाकारी भी थी। उसके घने लंबे बाल अत्यंत सुंदर थे जिन्हें वह सादा खोल कर रखती थी, इसीलिए उसका नाम मुक्तकेशी पड़ गया था। उसके बचपन का नामकरण वाला नाम सभी भूल चुके थे। वह मुक्तकेशी ही कहलाती थी। उसके पिता ने सोचा कि अपनी पुत्री के लिए ऐसा वर चुनूं जो देखने में तो अच्छा हो ही साथ में सीधा हो और मेरी बेटी का पूरा ध्यान रखे। हर पिता यही आकांक्षा रखता है। पिता ने कौशांबी नरेश की राजसभा में काम करने वाले वज्रसार को अपनी बेटी मुक्तकेशी के लिए वर के रूप में चुना। मुक्तकेशी को जब पता चला तो वह भी अपने भावी जीवन के सुखद स्वप्न बुनने लगी। दोनों की कुंडलियां मिलवाई गईं। गुणों का मिलान सटीक बैठा। शुभमुहूर्त पर व्रज़सार और मुक्तकेशी का विवाह हो गया। मुक्तकेशी अपने पति के घर कौशांबी आ गई। यूं तो वह अपने पति के मित्रों के सामने नहीं निकलती थी किन्तु एकाध बार ऐसा अवसर आया कि उसे सामने आना पड़ा। कुछ मित्र ऐसे थे जो मुक्तकेशी को देखते ही वज्रसार के प्रति ईष्र्या से भर उठे। उन्हें लगा कि वज्रसार को इतनी सुंदर पत्नी नहीं मिलनी चाहिए थी।
वज्रसार के तथाकथित मित्र उसे उल्टी-सीधी पट्टी पढ़ाने लगे। उनका कहना था किे यदि पत्नी सुंदर हो सके उसे कभी कहीं अकेली नहीं जाने देना चाहिए। कोई भी उसकी सुंदरता की प्रशंसा कर के उसे मूर्ख बना सकता है। कभी वे ये कहते कि कुछ सुंदर स्त्रियां बहुत चतुर होती हैं। ऊपर से भोली होने का नाटक करती है जबकि भीतर से वे छल-कपट और कामवासना से भरी होती हैं। यानी कुल मिला कर वज्रसार के मित्र उसके मन में मुक्तकेशी के विरुद्ध संदेह के बीज रोपते रहते थे। उन्हें पूरा विश्वास था कि एक न एक दिन कोई न कोई बीज अंकुरित अवश्य होगा और वज्रसार एक मूर्ख की भांति अपने ही हाथों अपनी गृहस्थी को आग लगा देगा।
वज्रसार धीरे-धीरे शंकालु होता जा रहा था। वह मुक्तकेशी को कहीं अकेली नहीं जाने देता था। मुक्तकेशी अपने पति के इस व्यवहार से यही समझती थी कि उसका पति उसे बहुत प्रेम करता है इसलिए उसे पल भर को भी कहीं अकेली नहीं जाने देना चाहता है। वह अपनी इस सोच पर प्रसन्न होती और इतराने लगती। 
कुछ समय बाद मुक्तकेशी के पिता और भाई किसी काम से कौशांबी आए। उन्होंने वज्रसार से कहा कि विवाह के बाद मुक्तकेशी अपने मायके नहीं आई है, वहां सभी उससे मिलने को आतुर हैं अतः कुछ दिन के लिए वह मुक्तकेशी को उन लोगों के साथ मायके जाने दे। वज्रसार अपने श्वसुर और साले को मना तो कर नहीं सकता था, अतः उसने उनसे यह कहा कि ‘‘मुक्तकेशी के बिना यहां काम नहीं चल सकेगा अतः वह स्वयं मुक्तकेशी के साथ चलेगा। इससे लौटने पर किसी को पहुंचाने नहीं आना पड़ेगा, वह मुक्तकेशी को अपने साथ वापस ले आएगा।’’ मुक्तकेशी के पिता और भाई को भला इसमें क्या आपत्ति हो सकती थी? वे तो यह सोच कर खुश हो गए कि उन्हें अपने दामाद की सेवा करने का अवसर मिलेगा। 
वज्रसार कुछ दिन अपनी ससुराल में रहा। फिर उसकी छुट्टियां समाप्त हो गईं और उसके लौटने का समय आ गया। उसने मुक्तकेशी को साथ वापस चलने को कहा। लेकिन मुक्तकेशी की मां ने अनुनय-विनय किया कि उनकी बेटी को कुछ दिन और अपने मायके में रहने दे। विवश हो कर वज्रसार को अकेले वापस लौटना पड़ा। उसके लौटते ही उसके मित्रों को मानो अच्छा मौका मिल गया। वे रात-दिन यही कान भरने लगे कि ‘‘विवाह के बाद तो पत्नी को अपने पति का घर प्रिय होता है, मगर तुम्हारी पत्नी ने अपने मायके में रुकने का हठ किया। इसका सीधा अर्थ है कि वहां उसका कोई पुराना प्रेमी है जिसके साथ वह प्रेमालाप करना चाहती है, तभी तो वह तुम्हारे साथ नहीं आई।’’
यह सुन कर वज्रसार से नहीं रहा गया और वह चार दिन में ही अपनी ससुराल जा पहुंचा। उसे इस तरह अचानक आया देख कर सभी यह सोच कर प्रसन्न हो उठे कि मुक्तकेशी को कितना प्रेम करने वाला पति मिला है जो चार दिन भी अकेले नहीं रह सका। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मुक्तकेशी को वज्रसार के साथ विदा कर दिया। 
वज्रसार जब मुक्तकेशी को ले कर लौट रहा था तो उसने बीच घने जंगल में बैलगाड़ी रोकी और मुक्तकेशी को उसके केशों से पकड़कर घसीटता हुआ एक पेड़ के पास ले गया। उसने मुक्तकेशी का उत्तरीय खींचा और उसी से उसे पेड़ से बांध दिया। फिर क्रोध में भर कर उसके कपड़े फाड़ते हुए पूछने लगा कि -‘‘बता तूने अपने किस पुराने प्रेमी के साथ प्रेमालाप किया? इसीलिए तू रुकी थी न अपने मायके? माता-पिता तो बहाना मात्र थे, है न?’’
अपने पति के इस अप्रत्याशित व्यवहार से स्तब्ध मुक्तकेशी को कोई उत्तर नहीं सूझा। वह तो समझ ही नहीं पा रही थी कि उससे इतना प्रेम करने वाले पति को यह अचानक क्या हुआ?
‘‘क्यों पुराने प्रेमी से प्रेमालाप करते समय लाज नहीं आई और अब बताने में लाज आ रही है? मैं सब समझता हूं तेरी चतुराई!’’ वज्रसार पर तो मानों उन्माद सवार था।
‘‘ये आप क्या कह रहे हैं? आपसे ये सब किसने कहा?’’ मुक्तकेशी ने अपनी स्तब्धता से बाहर आते हुए वज्रसार से पूछा।
‘‘किसी को कहने की क्या आवश्यकता? मैं और मेरे सारे मित्र जानते हैं कि तू अपने मायके में क्यों रुकी थी।’’ वज्रसार मुक्तकेशी के पुनः कपड़े फाड़ते हुए बोला, ‘‘मेरे मित्र ठीक कहते हैं कि तेरी जैसी रूपवती पत्नी के होने से तो अच्छा है कि कोई पत्नी ही न रहे। आज मैं तुझे जीवित नहीं छोडूंगा।
वज्रसार ने मुक्तकेशी पर झपटते हुए उसके पूरे कपड़े तार-तार कर दिए। किन्तु तभी मुक्तकेशी को नग्नावस्था में देख कर उसके मन में कामभवना जाग उठी। वज्रसार ने सोचा कि जब इसे मारना ही है तो पहले तनिक आनन्द उठा लिया जाए फिर मारा जाए। मुक्तकेशी पति की भावना ताड़ गई। उसने वज्रसार से कहा कि ‘‘ठीक है यदि तुम मुझे मारना चाहते हो तो मार दो, लेकिन मरने से पहले मैं तुम्हारे साथ उन्मुक्त भाव से सहवास करना चाहती हूं।’’
यह सुन कर वज्रसार और वासनामय हो उठा। उसने तत्काल मुक्तकेशी के बंधन को खोल दिया। मुक्तकेशी ने भी अवसर पाते ही अपने उसी उत्तरीय से जिससे उसे पेड़ में बांधा गया था, वज्रसार को उसी पेड़ से बांध दिया। फिर वह गर्जना करती हुई बोली-‘‘अरे मूर्ख पुरुष! तेरा नाम वज्रसार नहीं बल्कि वज्रमूर्ख होना चाहिए था। तूने अपने कपटी मित्रों की बातों में आ कर मुझे चरित्रहीन मान लिया, कम से कम एक बार तो ढंग से जांच-पड़ताल कर लेता। मुझसे खुल कर पूछ लेता। तू तो संदेह में अंधा हो गया और तुझे अपनी पत्नी की सच्चरित्रता ही दिखना बंद हो गई।’’
मुक्तकेशी की बात सुन कर वज्रसार को मानो होश आ गया कि वह कितनी बड़ी गलती कर बैठा है। वह मुक्तकेशी से क्षमा मांगने लगा।
‘‘मुझसे बहुत बड़ी त्रुटि हो गई मुक्तकेशी! मुझे क्षमा कर दो और एक और अवसर दे दो! अब मैं पुनः कभी तुम पर शंका नहीं करूंगा।’’ वज्रसार गिड़गिड़ाने लगा।
‘‘नहीं वज्रसार! तुम मुझे अपनी पत्नी बनने योग्य नहीं मान रहे थे, सच तो ये है कि तुम मेरे पति रहने योग्य नहीं हो। जो व्यक्ति दूसरों की बातों में आ कर अपनी पत्नी की हत्या करने पर उतारू हो जाए, उस पति को दूसरा क्या आधा अवसर भी नहीं दिया जा सकता है। सो, मैं आज से न तो तुम्हारी पत्नी हूं और न तुम मेरे पति।’’ इतना कह कर मुक्तकेशी वहां से वापस अपने मायके लौट गई।
मायके में मुक्तकेशी ने जब पूरा हाल कह सुनाया तो उसके माता-पिता और भाई-बहनों ने भी उसके निर्णय को स्वागत किया। मुक्तकेशी ने शेष जीवन एक ब्रह्मचारिणी के रूप में व्यतीत करने का निश्चय किया। वहीं दूसरी ओर वज्रसार जब लौट कर अपने मित्रों के पास पहुंचा तो सबने उसकी बहुत खिल्ली उड़ाई कि वह कैसे मूर्ख बन गया। इस घटना का प्रभाव यह हुआ कि वज्रसार का दूसरा विवाह भी नहीं हो सका। जिसे भी उस घटना को पता चलता वह अपनी बेटी के साथ वज्रसार का विवाह करने से मना कर देता। वज्रसार का शेष जीवन पश्चाताप में व्यतीत हुआ। 
‘‘तो ये थी कहानी मुक्तकेशी की, सुल्लू!’’ कहानी समाप्त करते हुए मैंने सुलभा से कहा।
कुछ पल ख़ामोश रहने के बाद सुलभा बोली,‘‘रूपाली को भी मुक्तकेशी बनना चाहिए था। कभी तो शुरुआत हुई होगी संदेह भरी कटुता की। उसे चुपचाप नहीं सहना चाहिए था।’’
‘‘हां, सुल्लू! आज सुबह जब से मैंने यह रोंगटे खड़े कर देने वाली ख़बर पढ़ी है कि उसके पति ने उसे मार कर उसके टुकड़े-टुकड़े कर यहां-वहां कूड़ादान में फेंक दिया था, मुझे जितना गुस्सा उस हैवान पर आ रहा है उतना ही रूपाली की सहनशक्ति पर भी गुस्सा आ रहा है। ऐसी भी सहनशक्ति किस काम की जो जानलेवा साबित हो? यदि शीशे में दरार पड़ जाए तो वह एक न एक दिन टूट कर किसी न किसी को चुभता ही है। ऐसे शीशे को समय रहते ही अपने से दूर कर देना चाहिए।’’ मैंने सुलभा से कहा।
सुलभा कुछ नहीं बोली। इससे आगे मेरे पास भी कुछ नहीं था कहने, सुनने को। बस, एक समाचार का एक शीर्षक बुरी तरह चुभ रहा था कि रूपाली को उसके शंकालु पति ने नृशंतापूर्वक मार डाला। वह शीर्षक खंज़र बन का हम दोनों के दिलों में भी उतर चुका था। लहू की रिसती अदृश्य बूंदों के साथ अनेक ‘काश!’ थे, जिनके होने का अब कोई अर्थ नहीं था। एक मुक्तकेशी साहस नहीं दिखा पाई थी और हैवान जीत गया था। यह सोच-सोच कर हम दोनों इतनी निःशब्द हो गईं कि सीलिंग फैन के ब्लेड्स के द्वारा हवा को काटने की आवाज़ भी किसी तूफान या अंधड़ की आवाज़ के समान लग रही थी। फिर भी हमारे मन के किसी कोने से एक प्रश्न आंतरिक चींख बन कर शोर कर रहा था कि ‘तुम मुक्तकेशी क्यों नहीं बनीं, रूपाली? काश! तुम बन सकी होतीं!’   
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बुधवार, अप्रैल 12, 2023

कहानी | प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए |डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | पहला अंतरा

कहानी
प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

उसकी उम्र यही कोई अट्ठारह-उन्नीस साल की रही होगी। अपनी सहेलियों के साथ बैठी हंस रही थी, खिलखिला रही थी। एकदम मस्तमौला जीव दिख रही थी। हाथ-हिला कर बात करना और बीच-बीच में अपनी कुर्सी से उठ-उठ पड़ना मेरे सहित वहां मौजूद सभी का ध्यान खींच रहा था। इसका अनुभव मुझे तब हुआ जब मेरे पास वाली मेज पर बैठी महिला ने कुढ़ कर कहा,‘‘ओवहर स्मार्ट बन रही है।’’
‘‘सही है, आज कल के बच्चों को होश ही नहीं रहता है कि उनके आस-पास भी कोई मौजूद है या फिर वे किसी पब्लिक प्लेस में हैं।’’ उस महिला के साथ वाली महिला ने टिप्पणी की। वे दोनों परस्पर रिश्तेदार थीं या वे भी सहेलियां थीं, पता नहीं। अनुमान लगाना कठिन था। पल भर को मेरा ध्यान उस लड़की से भटक कर उन महिलाओं पर अटक गया। दोनों को देख कर कोई भी बता सकता था कि उनका बहुत सारा समय ब्यूटीपार्लर में व्यतीत होता होता होगा। दोनों ने चाईनीज़ फूड मंगा रखा था और दोनों ही कांटे के सहारे बड़े सलीके से उसे खा रही थी। विशेषणयुक्त मुहावरे में कहूं तो - ‘‘इन फुल एटीकेट’’। वे अपना यह सलीका किसे दिखा रही थीं? शायद परस्पर एक-दूसरे को, अन्यथा वहां मौजूद सबका ध्यान उन लड़कियों की ओर था। जिनके लिए दो युवा लड़कों ने वहां से जाते-जाते टिप्पणी की थी-‘‘ये तितलियां’’। 
एक ज़ोरदार उन्मुक्त हंसी का स्वर गूंजा और मेरा ध्यान एक बार फिर उन तितलियों यानी उन लड़कियों की ओर चला गया। कितनी खुश, कितनी उन्मुक्त, कितनी जीवंत। ऊर्जा से भरपूर। 
मेरे भीतर से एक आवाज़ उठी कि तुम भी इस दौर से गुज़री हो। और मैंने अपने भीतर की आवाज़ को स्वीकार कर लिया। स्कूल के दिनों में तो नहीं लेकिन काॅलेज के दिनों में मैं भी इन्हीं लड़कियों की तरह चंचल हुआ करती थी। यद्यपि अब और तब में बहुत अंतर था। मेरे छोटे से शहर के छोटे से काॅलेज में एक अदद कैण्टीन हुआ करती थी। जहां लड़कों का जमावड़ा रहता था। हम लड़कियों के लिए वहां जाना प्रतिबंधित था। मजे की बात यह कि यह प्रतिबंध न तो काॅलेज प्रशासन ने लगाया था और न किसी  व्यक्ति ने। यह प्रतिबंध अपनी परंपरागत कस्बाई मानसिकता के चलते स्वयं लड़कियों लगा रखा था। मैं शुरू से को-एजुकेशन में पढ़ी थी इसलिए लड़के मेरे लिए अजूबा नहीं थे। मुझे कुछ अजूबा लगता था तो लड़कियों की ऐसी अनावश्यक झिझक। अरे, अगर हम लड़कियां कैण्टीन में पहुंच जातीं तो लड़के हमें खा थोड़े ही जाते। 
हां, एक ख़ूबसूरत डिप्लोमेसी जरूर चलती थी मेरे साथ की लड़कियों की। उनमें से कुछ ऐसी थीं जिनकी कनखियां और संकेत अपने पसंद के लड़कों की ओर सक्रिय रहते थे। हम लोगों का पांच लड़कियांे का अघोषित ग्रुप था। मुझे छोड़ कर दो लड़कियों के चोरी-छिपे वाले ब्वायफ्रेंड थे और बाकी दो के उजागर ब्वायफ्रेंड। मेरा कोई उस तरह का ब्वायफ्रेंड नहीं था। जिस लड़के से मुझे कोई बात करना होती तो मैं सीधे-सीधे कर लेती। कोई दुराव-छिपाव नहीं। जबकि उजागर वाली लड़कियां बारी-बारी से अपने मित्रों से कैण्टीन से हम सभी के लिए चाय मंगवा लिया करती थीं। एक संकेत प्रस्थानित होता और पांच मिनट में कैण्टीन वाला छोकरा हाथ में चाय के गिलासों का झाला पकड़े हुए आ खड़ा होता और इशारा करते हुए कहता,‘‘भैया ने भिजवाई है चाय!’’
छोकरे से चाय का गिलास लेने के बाद वे लड़कियां आपस में एक-दूसरे को छेड़तीं कि ‘‘भैया ने या सैंया ने?’’ और जिसके ‘‘सैंया’’ ने चाय भिजवाई होती वह इतरा कर कैण्टीन के बाहर अपनी मित्रमण्डली के साथ खड़े अपने ‘‘सैंया’’ की ओर देख कर मुस्कान फेंकती। वह ‘‘सैंया’’ छात्र भी झेंपता, मुस्कुराता और तन कर खड़ा हो जाता। यह सब देखना मुझे विचित्र अनुभूति से भर देता। मैं लड़कों से सहज रूप से बात करने की आदी थी। मैंने अपने बचपन में भी अपनी काॅलोनी के लड़कों के साथ गिल्ली-डंडा ओर कंचे खेले थे। मात्र दो वर्ष छोड़ दिया जाए तो कच्ची पहली से मेरी काॅलेज में प्रथम वर्ष में पहुंचने तक सहशिक्षा में ही पढ़ाई हुई थी। वहीं मेरे साथ की उन चारो लड़कियों की पूरी शिक्षा बालिका विद्यालय में हुई थी अतः उन्हें वास्तविक प्रतिबंधित क्षेत्र में चोरी-छिपे प्रवेश का सुखद अनुभव हो रहा था और वे इस अनुभव को लेने में कोताही भी नहीं बरतती थीं। उनमें से दो के तो बड़े सपने भी नहीं थे। वे आगे चल कर शादी कर अपना घर-संसार बसाने की अदम्य अभिलाषा रखती थीं। कैरियर जैसी बात उनके लिए बेमानी थी। 
समय एक छलांग में कितनी परिवर्तन नाप लेता है यह सोचना वामन अवतार की पौराणिक कथा के बारे में सोचने के समान है। बौना रूप धर कर तीन पग में तीन लोक नापने जैसा। पहले टीवी फिर कम्प्यूटर फिर अबाध इंटरनेट। दुनिया चंद सालों में ही बदल गई। जो विषय चर्चा में भी निषिद्ध थे, वे मोबाईल के आयाताकर पर्दे पर सजीव देखे जा सकते हैं। मेरी पीढ़ी और वर्तमान युवापीढ़ी में जैविक रूप से कोई अधिक दूरी नहीं है लेकिन वैचारिक रूप से क्रांतिकारी दूरी है। आज मेरे सामने जो तितलियों जैसी लड़कियां खिलखिला रही थीं, उन्हें जीवन का दीर्घ अनुभव नहीं है लेकिन वे सजग हैं अपने कैरियर को ले कर। 
‘‘मैं तो प्लस टू कर के अपनी आंटी के पास सिएटल चली जाऊंगी। यहां रह कर लाईफ स्प्वाईल करने से क्या फायदा।’’ एक लड़की ने चहकते हुए कहा था।
‘‘हां री! तू लकी है कि तेरी आंटी एब्राॅड में हैं, लेकिन देखना मैं भी किसी मल्टीनेशनल कंपनी को ज्वाइन कर के तेरे पास आ जाऊंगी।’’ सबसे ज्यादा चहकने वाली उस लड़की ने कहा था। 
उनकी बातें सुन कर मैं सोच में पड़ गई थी कि कितने बड़े-बड़े सपने हैं इसके पास, एकदम स्पष्ट और नपेतुले। शायद मेरे कल शाम का अनुभव इन्हें एक ‘टैबू’’ जैसा लगे। मेरे पुराने शहर से ये शहर बड़ा है। यहां परिवर्तन की लहर महानगरों के बराबर तो नहीं लेकिन उसके पीछे-पीछे दौड़ रही है। आज नेटिंग, चैटिंग, बैटिंग आदि सब कुछ होता है यहां। ये लड़कियां दुस्साहसी हैं। ये दुनिया के जिन ख़तरों को जानती हैं, उनमें भी कूद पड़ने को तत्पर हैं। अगर ये मेरे कल शाम की दास्तान सुन लें तो मेरी प्रतिक्रिया पर और भी बड़ा वाला ठहाका मार कर हंस पड़ेंगी। लेकिन मैं क्या करूं, मैं हूं ही ऐसी। संबंधों को हल्के में लेना मुझे आता ही नहीं है। या तो मैं डूब कर नाता जोड़ती हूं, अन्यथा बच कर निकल जाना पसंद करती हूं। 
कल शाम मेरे लिए एक दुर्घटना के समान थी। मन के कोने-कोने तक बहुत देर स्तब्धता छाई रही। ऊपर से भले ही मैंने मुस्कुरा कर स्वयं को सहज बनाए रखने का प्रयास किया किन्तु अंदर से सहजता के सारे धागे चटक कर टूट गए थे। 
हुआ यूं कि मेरे एक परिचित जो पेशे से अधिवक्ता हैं। मेरे घर आए। कुछ देर यहां-वहां की बातें होती रहीं।
‘‘आजकल आपकी समाजसेवा कैसी चल रही है?’’ उन्होंने पूछा था।
‘‘ठीक है। बढ़िया। अब स्वयं को और व्यस्त रखने लगी हूं ताकि मन लगा रहे। खाली रहती हूं तो घबराहट होने लगती है।’’ मैंने बताया।
‘‘हां, स्वयं को व्यस्त रखना आपके लिए जरूरी है।’’ उन्होंने मेरी बात पर हामी भरी थी।
‘‘आप अपना कोई एनजियो क्यों नहीं शुरू करतीं?’’ उन्होंने पूछा था।
‘‘क्या लाभ? मेरा लक्ष्य लोगों की मदद करना है, अब चाहे अपना एनजियो बना कर करूं या दूसरों के साथ मिल कर।’’ मैंने उत्तर दिया था।
‘‘ठीक है।’’ उन्होंने कहा था। 
इस संक्षिप्त वार्तालाप के बाद वे अप्रत्याशित ढंग से बोल उठे,‘‘नित्या जी, मैं आपका आलिंगन करना चाहता हूं।’’
एक पल को तो मुझे समझ ही नहीं आया कि जो मैंने सुना है वह सही है या गलत? 
‘‘आज आप बहुत सुंदर दिख रही हैं। इसीलिए मैं अपनी भावना प्रकट किए बिना नहीं रह पा रहा हूं। प्लीज़, मेरे क़रीब आइए।’’ उन्होंने मेरी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किया बिना किसी बंदूक की गोली की तरह अगला वाक्य दाग़ दिया। 
‘‘यह संभव नहीं है। मैं आपको इस दृष्टि से नहीं देखती हूं।’’ मुझे दो-टूक कहना ही पड़ा। इसके बाद वे तनिक संयत हुए। 
‘‘मेरे विचार से अब आपको जाना चाहिए।’’ मैंने तनिक और कठोरता बरती।
उन्होंने मेरी ‘‘न’’ को ‘‘न!’’ ही माना और चले गए। किन्तु हम स्त्रियों की छठीं इन्द्रिय सजग रहती है। मैंने भांप लिया कि उन्होंने ऊपरी तौर पर खुद पर काबू पाया है, आंतरिक नहीं।
उनके जाने के बाद वे सारे प्रश्न मेरे मस्तिष्क से खेलने लगे जो उसी समय मुझे उनसे पूछने चाहिए थे। लेकिन उस समय मैंने बात को बढ़ाना उचित नहीं समझा था। मैं उनसे पूछना चाहती थी कि हमारा तो वर्षों पुराना परिचय है, लेकिन इससे पहले मैं कभी सुंदर नहीं लगी क्या? या फिर आज इसलिए सुंदर लग रही हूं कि मां के जाने के बाद नितांत अकेली रह गई हूं और साथ की ललक इस एक वाक्य से मुझे पिघला देगी? 
उन्होंने न कभी पूछा कि कोई, किसी तरह की आवश्यकता तो नहीं है? न मेरे दुख की घड़ी में मेरे आंसू पोंछने का समय निकाला। आज मेरे अकेलेपन में मैं उन्हें सुंदर दिखाई देने लगी। इतनी सुंदर कि आलिंगन योग्य। वाह! बहुत खूब!!
इस घटना ने रात भर मेरे मन को छीला। भोर भी अनमनी व्यतीत हुई। भोजन पकाने तक का मन नहीं हुआ। एक विरक्ति। एक विछिन्नता। एक व्याकुलता। मानो एक शीशा गिर कर टूट गया था और उसकी किरचें रह-रह कर चुभ रही थीं। प्रेम को व्यक्त करना कितना कठिन होता है, जबकि वासना को व्यक्त करना सरल। एक जुमला उछाला और मान लिया कि काम बन जाएगा। वह भी एक ऐसा व्यक्ति जो मेरी दृष्टि में प्रबुद्ध श्रेणी का था। लेकिन संभवतः बुद्धि, प्रबुद्धि और चरित्र तीनो अलग-अलग होते हैं। कल शाम से मैं यही मानने पर विवश हो गई हूं। 
घर में मन नहीं लग रहा था। बैंक की पासबुक निकाली और उसकी एंट्री अपडेट कराने निकल पड़ी। घर से निकलने का एकदम फिसड्डी बहाना। खैर, बैंक में जा कर ताज़ा एंट्री भी ले ली। अब क्या करूं? समझ में नहीं आ रहा था। तभी अनुभव हुआ कि थोड़ी भूख लग रही है। मैं अकेली ही रेस्तरां की ओर बढ़ ली। आमतौर पर मैं अकेली वहां बैठ कर नहीं खाती हूं। जब कभी आवश्यकता होती है तो पैक करवा कर घर ले आती हूं और फिर घर में अपने सोफे पर पांव पसार कर टीवी पर टकटकी लगा कर खाती हूं। लेकिन उस समय मैं भीड़ में रहना चाह रही थी। अकेली तो बिलकुल भी नहीं। बस, इस तरह इस रेस्तरां आ पहुंची और घंटे भर से कुछ न कुछ चुगती हुई उन लड़कियों को देखती हुई बैठी हूं।
वह प्रश्न मेरे मन में फिर कुलबुलाया कि यदि मेरी जगह ये ब्राउनी तितली होती तो क्या करती? जी हां, वह जो उन लड़कियों में सबसे अधिक चुलबुली और उत्साही लड़की थी उसने भूरे रंग का टाॅप पहना हुआ था, इसीलिए मैंने उसका नाम ‘‘ब्राउनी तितली’’ रख दिया। 
यदि मैं ब्राउनी तितली को अपने पास बुला कर अपने साथ घटी घटना के बारे में उससे बात करूं तो? उस लड़की से चर्चा करने का विचार आना ही इस बात का सबूत था कि ख़याली घोड़ों के नथुनों में कोई लगाम नहीं होती है। मैंने स्वयं को लानत भेजी। लेकिन मन था कि बार-बार इसी एक प्रश्न पर आ ठहरता था। मेरी जगह यदि यह ब्राउनी तितली होती तो इसकी क्या प्रतिक्रिया होती? क्या यह सहज रह पाती? या आलिंगनबद्ध हो जाती? या कोई अप्रत्याशित तीखी प्रतिक्रिया से सामने वाले के होश उड़ा देती? ये तीन प्रश्न या तीन उत्तर, वस्तुनिष्ठ की भांति थे, जिनमें से किसी एक पर टिक करना कठिन था। 
‘‘देखो, मुझे अंकल ने क्या दिया?’’ ब्राउनी के साथ वाली एक अन्य तितली अपने गले में पड़ी चेन दिखाती हुई बोली। 
‘‘हाऊ ब्यूटीफुल। डायमण्ड है इसमें?’’ एक ने पूछा।
‘‘अरे नहीं! डायमण्ड पहन कर मुझे अपना गला कटवाना है क्या? जब मैं अपनी कार में चलने लगूंगी तब डायमण्ड पहनूंगी। स्कूटी में गोल्ड, डायमण्ड ये सब सेफ थोड़े ही है।’’ उसने बड़े सयानेपन से कहा।
‘‘यस! शर्मा आंटी को देखो न, वे माॅर्निंगवाक पर गई थीं कि किसी ने उनके गले से उनकी सोने की चेन खींच ली। चेन तो हल्की थी, बहुत कीमती नहीं थी लेकिन चेन खींचे जाने से उनकी गरदन पर गहरे स्क्रैचेस आ गए थे।’’ ब्राउनी तितली ने कहा। मुझे वह बुहत समझदार लग रही थी। मुझे लग रहा था कि वह बहुत तेजी से दुनिया को समझती जा रही है। मगर मेरी जैसी परिस्थिति में आ कर वह क्या करती?
ढाक के तीन पात! मन घूम फिर कर उसी प्रश्न पर जा पहुंचा। माना कि युवा पीढ़ी के लिए दैहिक संबंध कोई ‘‘टैबू’’ नहीं है लेकिन जहां इच्छा का कोई सिरा ही न हो, वहां क्या आज का युवा कोई ‘डील’ कर सकता है?
‘डील’, हां यह एक व्यावसायिक शब्द है लेकिन आजकल प्रेम संबंधों में भी यह समाहित हो गया है। इसे नया भाषा विन्यास कहें या संबंधों के प्रति लाभ-हानि वाला दृष्टिकोण। जैसे पिछले दिनों मेरी एक साथी किसी पुरुष की चर्चा करती हुई कह रही थी कि वह तो बेहतरीन ‘‘हस्बैंड मटेरियल’’ है। जब हस्बैंड और वाईफ भी मटेरियल की दृष्टि से आंके जाएं तो फिर डील तो बहुत छोटा शब्द है इसके सामने। खैर, यह ब्राउनी तितली कैसे डील करती मेरे मसले को? 
‘‘तेरे अंकल भी ग़ज़ब की चीज़ हैं। काश! मेरे भी कोई ऐसे अंकल होते।’’ आह सी भरती हुई एक तितली की आवाज मेरे कानों से टकराई और मुझे अहसास हुआ कि मैं अपनी सोच में डूब गई और ये तितलियां उस कथित डायमण्ड के इर्दगिर्द ही घूम रहीं हैं। 
‘‘अरे यार, वो मेरे अंकल हैं!’’ उस चेन वाली लड़की ने खीझते हुए कहा।
‘‘हंा, यार छोड़ इसके अंकल को! तू ऐसा कर कि गिनीपिग सर के साथ डेट कर ले। कोई तो अच्छी गिफ्ट मिल ही जाएगी।’’ ब्राउनी तितली ने खिलखिलाते हुए कहा।
‘‘व्हाट रबिश! अगर गिनीपिग सर को पता चल गया तो वे तेरा फालूदा बना देंगे।’’ चेन के लिए आहें भरने वाली लड़की ने कहा।
‘‘हाय बना ही दें न!’’ चेन वाली लड़की बोल उठी।
‘‘तू सच्ची बहुत बड़ी बेशरम है!’’ चेन के लिए आहें भरने वाली लड़की ने हंस कर कहा।
‘‘यार लाईफ में गिफ्ट इंप्वार्टेंट नहीं है, इश्क़ इंप्वार्टेंट है। मैं तो गिनीपिग सर की ओर देखूं भी न। ऐसे हैंडसम लाखों पड़े हैं।’’ ब्राउनी तितली ने कहा। उसकी बात सुन कर मेरे कान खड़े हो गए। 
मगर एक कठिनाई यह थी कि मुझे वहां बैठे बहुत देर हो गई थी। अकेली बैठी-बैठी और कितनी देर स्नेक्स चुगती? तीन कप काफी भी पी चुकी थी। रेस्तरां वाला लड़का भी सोचता होगा कि कहां की भुक्खड़ आ बैठी है। यद्यपि उसका मालिक तो खुश ही होगा क्योंकि मैं बैठी-बैठी उसका बिल बढ़ा रही थी।
दूसरी कठिनाई यह थी कि तीन कप काफी और एक गिलास पानी पी चुकने के बाद वाशरूम की तलब सताने लगी थी। जबकि मैं उन तितलियों की बातों से चूकना नहीं चाहती थी और उठ कर आने-जाने के चक्कर में अपने प्रति उनका ध्यान भी नहीं खींचना चाहती थी। वे मेरी उपस्थिति से लगभग बेखबर थीं। यद्यपि मुझे पता नहीं था कि मेरी उपस्थिति का भान होने पर उनके वार्तालाप पर कोई असर पड़ेगा या नहीं?
तीसरी कठिनाई यह थी कि अब मुझे वहां बैठी रहना स्वतः ही अटपटा लगने लगा था। मेरी बाजू वाली मेज की वे दोनों महिलाएं काफी पहले जा चुकी थीं। उनके बाद उस मेज पर एक जोड़ा आया था। वह भी अब जा चुका था। मैंने ब्राउनी तितली के ‘‘गिफ्ट’’ और ‘‘इश्क़’’ के कथन को ही उसका सूत्र वाक्य मान लिया और बैरे को बिल लाने का संकेत कर दिया।
बैरा तो मानो मेरे संकेत की ही प्रतीक्षा कर रहा था। दो मिनट में बिल ले कर उपस्थित हो गया। मैंने बिल चुकाया और वहां से विदा होते समय एक गहरी दृष्टि उन तितलियों की ओर डाली। वे सब अपने-आप में डूबी हुई थीं। स्पष्ट था कि उन्हें मेरे होने या जाने से कोई अंतर नहीं पड़ रहा था। यह महसूस कर मुझे तसल्ली हुई।
अब मेरा मन भी हल्का हो चुका था। मानो मैंने अपना उत्तर पा लिया था। मैं जान गई थी कि मेरी जगह अगर वो ब्राउनी तितली होती तो उसकी भी प्रतिक्रिया मेरी तरह होती। उन तितलियों के लिए दैहिक संबंध कोई गंभीर विषय भले ही न हो लेकिन विवशता पूर्ण संबंध और इच्छापूर्ण संबंध में अंतर करना उन्हें भी आता है। लेकिन वे मेरे बुद्धिजीवी परिचित गए भूल गए कि ‘‘ प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए। राजा प्रजा जो ही रुचे, सीस दे हि ले जाए।।’’
मेरे मन की फांस अब एक कोने में सरक गई थी। वह निकल तो कभी सकती नहीं लेकिन हर समय टीसेगी तो नहीं, यही बहुत है। क्योंकि जो कुछ भी वह था वह प्रेम तो कदापि नहीं था। प्रेम उथला नहीं, गहरा होता है, बहुत गहरा। सात सागरों से भी गहरा। काश! सब लोग यह समझ पाते!
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मंगलवार, मार्च 28, 2023

कहानी | मौना, अब तुम कहां जाओगी? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | ' साहित्य संस्कार ' पत्रिका में प्रकाशित

विवाह के नाम पर ओडीशा (उड़ीसा) से खरीद कर बुंदेलखंड लाई गई युवती .... क्या होगा उसका भविष्य?  पढ़िए मेरी कहानी "मौना, अब तुम कहां जाओगी?" 
     यह प्रकाशित हुई है जबलपुर अर्थात संस्कारधानी से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका "साहित्य संस्कार" के महिला कथाकार अंक  में। जिसके यशस्वी संपादक हैं श्री सुरेंद्र सिंह पंवार।
हार्दिक धन्यवाद Surendra Singh Pawar ji 🙏

यूं तो पूरा अंक पठनीय है किंतु यहां पढ़िए मेरी कहानी... 😊🙏🌷
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कहानी
मौना, अब तुम कहां जाओगी?                      
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

मौना अपने ससुराल पहुंची। 
द्वार पर उसका किसी ने स्वागत नहीं किया। एक औरत से परिचय कराया गया। नाम बताया गया लक्ष्मी। मौना ने नाम रट लिया। आसान था। परिचित-सा। अलबत्ता, लक्ष्मी की एक भी बात मौना के पल्ले नहीं पड़ी। भाषायी समस्या थी। लक्ष्मी बुन्देली मिश्रित हिन्दी भाषी थी और मौना ओडिया भाषी। 
मौना को पहली रात में ही अनुभव हो गया कि उसका ब्याह भले ही रामप्रसाद के साथ किया गया है लेकिन उसके जेठ दुर्गाप्रसाद का भी उस पर उतना ही अधिकार है। यह क्या हो रहा है उसके साथ? मौना हतप्रभ थी। किससे कहे अपना दुख? उस घर में नौकर के नाम पर वही थी और सेविका के नाम पर भी वही। लक्ष्मी एक भी काम को हाथ नहीं लगाती। 
मौना के साथ जो कुछ होता जा रहा था उसे ठीक-ठीक समझ पाना उसके बूते के बाहर था। मौना के पिता शिबोम के साथ मोल-भाव करने के बाद सौदा तय हुआ दो हज़ार दो सौ पच्चीस रुपए और इस वादे में कि उसकी तीसरी बेटी के लिए भी ऐसा ही कोई ‘रिश्ता’ वे लोग ढूंढ देंगे। रामप्रसाद ने शिबोन के परिवार और आस-पास की झुग्गीवालों के सामने मौना की मांग में सिंदूर भरा। इस ‘रस्म’ के लिए मौना को लाल रंग की साड़ी दी गई थी पहनने के लिए ताकि वह ‘दुल्हन’ दिखे। शादी के बाद शिबोम और उसके परिचय वालों को देसी दारू और मछली के सस्ते पकौड़ों की दावत दी गई। शिबोम सीना फैलाए घूमता रहा और मौना ब्याह की प्रसन्नता को अपने दिल में समेटे अपरिचित ‘देश’ की ओर चल पड़ी, रेलगाड़ी में बैठ कर। वह अपने दूल्हे को देखती और मन ही मन खिल उठती। उसकी दोनों बड़ी बहनों के दूल्हे ऐसे नहीं थे। वे उम्र में बहुत बड़े थे बहनों से। 
‘हमारे यहां दुल्हन का नाम बदल दिया जाता है। हम तुम्हें मौना कह कर बुलाया करेंगे।’ दुर्गाप्रसाद ने मौना को शादी से पहले ही जता दिया था। मौना समझ नहीं सकी थी। उसे हिन्दी नहीं आती थी, बुन्देली मिश्रित हिन्दी तो बिलकुल भी नहीं। शिबोन ने बेटी को दुर्गाप्रसाद की बात को अपनी भाषा में अनुवाद कर के बताया था। 
क्या फ़र्क़ पड़ता है? मौना ने सोचा था। दो समय के भात से बढ़ कर नाम नहीं होता। वे कुछ भी पुकारें, कम से कम भात तो देंगे! न जाने कितने दिन और कितनी रातें मौना और उसके परिवार को पानी पी कर काटनी पड़ जाती हैं। जिस दिन मंा-बाप को काम नहीं मिलता, उसे काम नहीं मिलता, उसकी बहन को काम नहीं मिलता, उस दिन फांके के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगता। 
मौना के विवाह पर उसकी मंा रोई थी, फिर खुश हुई थी यह सोच कर कि चलो, एक और बेटी को इस नरक से छुटकारा मिलेगा....और परिवार को कुछ दिनों के लिए भरपेट अन्न। 
मौना के मायके से ससुराल तक का रास्ता बहुत लम्बा था। एक रेल से दूसरी रेल और भीड़ का सैलाब। भीड़ तो मौना ने भी देख रखी थी किन्तु रेल पर चढ़ने का यह उसका पहला अवसर था। 

ससुराल आकर शीघ्र ही मौना ने जान लिया कि वह ब्याह कर पत्नी बना कर नहीं अपितु नौकरानी और देहपिपासा शांत करने के साधन के रूप में लाई गई है। जिस पेट भर अन्न का सपना देखती वह यहां आई थी, उस अन्न में भी कटौती बढ़ती चली गई।  
बूढ़ी सास भी मौना को ही कोसती।

नर्क-सा जीवन जीती मौना रोती, सिसकती और दुआ करती कि कम से कम एक बार तो उसके मां-बाप उससे मिलने आ जाएं। पर, कैसे आएंगे? क्या उन्हें पता है रास्ता? वे भी तो कभी रेल पर नहीं चढ़े? 
एक दिन लक्ष्मी पर मानो वज्रपात हो गया। मौना को चक्कर आया। वह पानी का कलसा लिए हुए धड़ाम से गिरी। लक्ष्मी ने तो समझा कि मौना ‘टें बोल गई’, उसने चैन की सांस लेते हुए सोचा कि चलो, बला टली। किन्तु बला टली नहीं, सास ने मौना के शरीर को टटोला और प्रसन्न हो कर घोषणा की कि मौना पेट से है। सास की वाणी सुनते ही पथरा गई लक्ष्मी। कुछ देर बाद उसने स्वयं को सम्हाला और अपने आने वाले कल के बारे में सोचने लगी। अंततः उसने दुर्गाप्रसाद से दोटूक बात करने का निश्चय किया। 
‘जनने तो दो उसे, बेच आऊंगा उसे भिंड, मुरैना में कहीं...बेफालतू चिन्ता मत कर!’ दुर्गाप्रसाद ने आश्वस्त किया।
‘और जो तुमने ऐसा नहीं किया तो मैं कुए में कूद कर जान दे दूंगी।’ लक्ष्मी ने चेतावनी दी।
‘ऐसी नौबत नहीं आएगी! भरोसा रख मुझ पर।’ दुर्गाप्रसाद ने भरोसा दिलाया।

मौना को जब पता चला कि वह गर्भवती है तो वह सोच में पड़ गई कि अब उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा? उसे और उसके बच्चे को अच्छे से रखेंगे ये लोग या उसके बच्चे को भी उसी की भांति नौकर बना कर रखा जाएगा? और जो बच्ची हुई तो? मौना घरवालों की बोली कुछ-कुछ समझने लगी थी। अब वह अपने कान खड़े रखती, एक चैकन्नी मां की तरह। एक अच्छी बात यह थी कि उसे अब भरपेट भोजन दिया जाने लगा था। इतना तो वह समझ गई थी कि उसके पेट में मौजूद गर्भ के कारण उसे भरपेट भोजन दिया जा रहा है। लेकिन प्रसव के बाद? इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं था। 
यदि वह प्रसव के पहले ही इस घर से कहीं भाग जाए तो?
लेकिन कहंा? उसे तो ठीक से पता भी नहीं है कि वह है कहां? उसके अपने माता-पिता का घर किस शहर में, कितनी दूर और कहां हैं? वहां तक कैसे पहुंचेगी? रेल की लम्बी यात्रा के बाद एक बस में सवार हो कर वह इस गांव तक आई थी। वह पढ़ी-लिखी नहीं थी और उस पर उसे अपनी बोली-भाषा के अलावा कुछ आता नहीं था। कैसे और कहां चली जाए वह? हिन्दी भी टूटी-फूटी समझ पाती है। इसी उधेड़बुन में मौना के दिन-रात कटते। 
 
एक दिन मौना को दो अपरिचित आदमियों के सामने खड़ा किया गया। वे विचित्रा नेत्रों से उसे घूरते रहे। गर्भ धारण करने और भरपेट भोजन करने के कारण चेहरे पर आई लुनाई ने मौना के स्त्राीत्व में चार चांद लगा रखा था। सांवला चेहरा चमक उठा था। देह भर आई थी।  कुछ देर वे दोनों मौना को घूरते रहे फिर मौना को दूसरे कमरे में भेज दिया गया। पता नहीं क्यों मौना का मन सशंकित हो उठा। ये लोग कौन हैं? लक्ष्मी से पूछे? या फिर सास से?
आखिर उसने साहस बटोर कर लक्ष्मी से पूछा।
‘जब वे दोनों तुझे ले जाएंगे खरीद कर तक खुद ही पता चल जाएगा....फिर ऐश करना...’ लक्ष्मी ने भद्दे ढंग से उत्तर दिया था। ‘खरीदना’ और ‘बेचना’ जैसे शब्दों के अर्थ मौना जानती थी। इतने अरसे में उसे हिन्दी के कई शब्द समझ में आने लगे थे।
‘और तेरा बच्चा यहां मेरे पास।’ कुटिलतापूर्वक मुस्कुराते हुए, अपनी गोद की ओर इशारा करते हुए लक्ष्मी बोली।
मौना हतप्रभ रह गई। पहले माता-पिता, भाई-बहन छूटे और अब उसका बच्चा भी उससे छुड़ा लिया जाएगा? 
नहीं! उसे यहां से भागना ही होगा, हर कीमत पर। मौना ने सोचा। कहां जाएगी? कहीं भी। उसकी कोख में अब उसका अपना बच्चा है। वह अपने बच्चे को नहीं छोड़ेगी। कभी नहीं।

जैसे-जैसे दिन व्यतीत होने लगे, मौना की छटपटाहट बढ़ने लगी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस नरक से कैसे भागे? अंततः उसने उस दाई का सहारा लेने का निश्चय किया जो उसका गर्भ जांचने दो-तीन बार आ चुकी थी। मौना ने पेट दर्द के बहाने दाई को बुलवाया और जांच के दौरान एकांत पाते ही दाई के पैर पकड़ लिए। मौना का भाग्य अच्छा था कि बूढ़ी दाई का मन पसीज गया। या फिर इससे बड़ा कारण यह था कि बूढ़ी दाई को गंाव में चल रहे इस धंघे का पता था। या फिर कोई और कारण था तो वह स्वयं ही जानती होगी।
बूढ़ी दाई ने ही तय किया कि जिस दिन गांव के मंदिर में भंडारा होगा उस दिन मौका मिलते ही वह मौना को बस पकड़वा देगी। बूढ़ी माई अपनी बात की पक्की निकली। भंडारे वाले दिन परिवार के सभी लोग मुफ़्त का भोजन करने मंदिर गए। बाहर से घर की सांकल लगा गए थे। मगर बूढ़ी दाई ने ऐन बस छूटने के समय सांकल खोली और मौना की मुट्ठी में बीस रुपए का नोट थमाते हुए उसे बस में घुसा दिया। बस चल पड़ी और मौना थर-थर कांपती रही।
कंडेक्टर आया।
‘कहां जाना है?’ उसने मौना से पूछा और पैसे के लिए अपना हाथ बढ़ाया।
‘सागर....’ मौना ने अटकते हुए कहा।
मौना ने घबरा कर बीस का नोट उसे थमा दिया।
‘खुल्ले देता हूं अभी!’ कहते हुए कंडक्टर और आगे बढ़ा। मौना को समझ में नहीं आया कि टिकट के पन्द्रह रुपए की थी या बीस की? बस से उतरने के पहले कंडेक्टर ने उसे पांच रुपए लौटा दिए थे। यह पांच रुपए ही उसकी कुल सम्पत्ति थे। उसने सहेज कर अपनी साड़ी के पल्लू में बंाध लिया।
सागर में बस अड्डे पर उसने ‘रेल’, ‘रेल’ कह कर पूछना शुरु किया। कुछ ने सिर झटक कर अनसुना कर दिया। कुछ ने बताया। फिर किसी तरह रास्ता पूछती-पूछती रेलवे-स्टेशन पहुंच गई। किस रेल में उसे चढ़ना है? कहां जाना है? उसे पता नहीं था। बहुत देर तक वह प्लेटफार्म पर डोलती रही। गला सूखने लगा तो पांनी की टंकी के पास पहुंच कर गला तर किया। 
प्लेटफार्म पर लाइटें जल गई थीं। चहल-पहल बढ़ गई थी कि फिर एक रेल आई। 
भीड़ का एक रेला उसमें से उतरा और दूसरा चढ़ने लगा। मौना भी धक्का-मुक्की करती हुई जा चढ़ी। उस समय उसके मन में बस दो ही इच्छाएं बलवती थीं कि एक तो इस भीड़ की धक्का-मुक्की में उसका गर्भ सुरक्षित रहे और दूसरी कि वह यहां से बहुत दूर चली जाए। 
रेल के डब्बे के फर्श पर बैठते ही मौना की अंाखों में आंसू छलछला गए। बाबू कैसे होंगे? उसे याद करते होंगे? उसने अपने पिता के बारे में सोचा। मंा कैसी होगी? वह याद करती होगी? क्या अभी वे रुपए बचे होंगे जो उसके ब्याह में उसके मां-बाप को दिए गए थे? दोनों बड़ी बहनों के ब्याह में मिले रुपयों से मंा ने तीन माह घर चलाया था। 
....और कला? क्या वह भी अब तक ब्याह दी गई होगी? मौना को अपनी तीसरी बड़ी बहन की याद आई। ‘ब्याह?’ इसी तरह का ब्याह? जैसा उसका खुद का हुआ? उस गंाव में....कौन जाने उस गंाव में मौना की झुग्गी-बस्ती की और लड़कियां भी रही हों? कौन जाने मौना की दोनों बड़ी बहनें भी उसी गंाव के किन्हीं घरों में.....धक् से रह गया मौना का दिल।  मौना को पता नहीं था कि उस गांव में पांच औरतें और थीं मौना के ‘देश’ की। उन्हें भी मौना की तरह घर से बाहर निकलने की मनाही थी। उन्हें आपस में मिलने देने का तो प्रश्न ही नहीं था। वे एकाकी, आश्रित और लाचार अनुभव करती रहें, यही उनके पतिनुमा मालिकों के लिए बेहतर था। यूं भी कौन सोच सकता था कि बुन्देलखण्ड के पिछड़े हुए गंाव में ओडीसा से लड़कियां ब्याह कर लाई जाने लगीं हैं। क्यों कि वहां लड़कियां कम हैं, क्यों कि लाचार ओडिया लड़कियों के रूप में एक ऐसी नौकरानी मिल जाती है जो न काम छोड़ कर भाग सकती है और न अंाखें दिखा सकती है। सौदा लाभ ही लाभ का।
मौना देर तक रोती रही और उसके आस-पास बैठे लोग नाक-भौंह सिकोड़ कर उसे देखते रहे...लेकिन मौना ने तय कर लिया था कि वह अपने मां-बाप के घर पहुंच पाए या न पहुंच पाए लेकिन वह हरहाल में जिएगी और अपने बच्चे को भी जन्म देगी, पालेगी। कुछ भी हो वह ज़िन्दगी से हार नहीं मानेगी। यह उसके भीतर की मंा का साहस था जो अंगड़ाइयां लेने लगा था क्यों कि उसके भीतर की औरत भले ही हार मान लेती लेकिन उसके भीतर की मां कभी हार नहीं मानेगी। 
उसे याद आने लगा वो गीत जो उसकी मंा अकसर गाया करती थी-
छो..छोको भूंजी लोक पतर तुड़ले लागसी भोक
छो..छोको भूंजी लोक ...... 
 (अर्थात् हम लोग गरीब भुंजिया आदिवासी, पत्ता तोड़ते हुए भूख लगती है। )
 उस समय उसे भूख नहीं लगी थी लेकिन उसे ध्यान आया कि कहीं उसके गर्भ का शिशु भूखा न हो? एक अबोध मां अपने सहज ज्ञान से अपने गर्भस्थ शिशु की आवश्यकताएं भांपने लगी। भले ही उसका घबराया मन उससे पूछ रहा था-‘मौना, अब तुम कहां जाओगी?’ किन्तु मौना के भीतर की मां ने उस प्रश्न को अनसुना करते हुए अपने गर्भस्थ शिशु की आवाज़ पहले सुनी और उसने दो रुपए का केला खरीदा और खा लिया। 
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शुक्रवार, नवंबर 04, 2022

कहानी | सोचा तो होता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | "जनसत्ता" दीपावली विशेषांक 2022 में प्रकाशित

देश के प्रतिष्ठित समाचारपत्र "जनसत्ता" के वार्षिक अंक "दीपावली 2022" में अपनी कहानी "सोचा तो होता" को प्रकाशित देख कर जो प्रसन्नता हो रही है, उसे आप सब से साझा कर रही हूं। 
   🌷हार्दिक धन्यवाद एवं हार्दिक आभार  Mukesh Bhardwaj जी तथा Surya Nath Singh जी 🙏
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कहानी
सोचा तो होता
  - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

‘‘क्या जरूरत थी झगड़ा करने की? है!‘‘ आरती पुकारते हुए बोली उसके मन में दबी हुई चिंगारी अचानक भड़क उठी। उसे लगने लगा कि वह कृष्णा को मार- मार कर अधमरा कर दे। इस मुए ने ऐसा लांछन लगवाया है कि पिछली जिंदगी के सारे बही खाते एक बार फिर खोल कर रख दिए गए।
आज दोपहर से आरती का मन खराब हो चला था और इसका जिम्मेदार था उसका अपना बेटा कृष्णा। आरती को यूं भी आए दिन सत्रह तरह की बातें सुननी पड़ती हैं। आरती ने ब्याह के बाद जिस दिन, जिस घड़ी इस घर में पांव रखा था उसी दिन से बल्कि उससे भी पहले से उसके साथ कई ताने जुड़ गए थे। ब्याह पक्का होने के साथ ही उसे यह जता दिया गया था की आरती जैसी लड़की को अपने घर की बहू बनाने जा रहे उसके सास-ससुर देवतुल्य उदार हैं। वरना कोई भी उसे अपने घर की बहू बनाना स्वीकार न करेगा। सारे गांव समाज के साथ साथ आरती की मां और मामा भी आरती के ससुराल पक्ष के कृतज्ञ थे जिन्होंने उनके कलंकित घर की लड़की को बहू के रूप में स्वीकार किया था।
‘‘संभल के रहियो, लल्ली! कहीं यह भी अपने बाप जैसी निकली तो समझो हो गया कल्याण तुम्हारे कुल-खानदान का!‘‘ आरती की मुंह दिखाई की रस्म के समय किसी औरत ने लल्ली यानी आरती की सास को सचेत करते हुए कहा था। इस चेतावनी का स्वर इतना ऊंचा था की कम से कम आरती तो साफ-साफ सुन ही ले। कलेजा कट कर रह गया था आरती का। लेकिन वह कर ही क्या सकती थी? यह सब तो उसके भाग्य में उसके पिता ने ही लिख दिया था। वह सिर झुकाए अपने पैरों के मेहंदी रची अंगूठों को इस प्रकार आंखें गड़ाए देखती रह गई थी, जैसे दोनों अंगूठों की मेहंदी में कोई अंतर तलाश रही हो। या फिर, अंगूठे से धरती को कुरेदते हुए इतना गहरा गड्ढा कर लेना चाहती हो कि उसमें समा सके। आसान नहीं होता है सरेआम कोई लांछन सुनना और सहना। घूंघट के भीतर आरती की काजल रची आंखें आंसुओं से भर गई थीं। वह रोना नहीं चाहती थी लेकिन रोना तो उसके भाग्य में लिखा जा चुका था, कम से कम वह तो यही मानती थी।
‘‘नहीं री, भुजना की मां! यह सब घर के माहौल की बात होती है। हमारे यहां सब ठीक रहेगा।‘‘ आरती की सास ने उस औरत अर्थात भुजना की मां को ढाढस बंधा ते हुए कहा।
‘‘बुरा मत मानियो लल्ली, मगर वो कहते हैं न कि ऐसी चीजें इंसान के खून में रहती है जैसा बाप वैसे बच्चे। आखिर ये भी है तो कीरत की ही बेटी।‘‘ भुजना की मां तो मानो आरती को नीचा दिखाने की कसम खाकर आई थी। गोया आरती से उसकी कोई जाती दुश्मनी थी। आरती भुजना की मां से पूछना चाह रही थी कि तुम्हारी मुझ से क्या दुश्मनी है? क्यों मेरे पीछे पड़ी हो? यह तो ठीक था कि आरती की सास आरती का पक्ष ले रही थी भले ही अहसान जताने की मुद्रा में।
‘‘यह बात बेटों पर जाती है, बेटियों पर नहीं! बेटी तो पैदा ही होती हैं दूसरे के घर के लिए.... और फिर ऐसे घर की बेटियों का कोई उद्धार न करें तो क्या होगा इन बेचारियों का? आखिर इसमें इनका क्या दोष? यह क्यों भुगते अपने बाप के कुकर्मों को? आरती की सास ने भुजना की मां को जवाब देते हुए अपने बड़प्पन को भी बड़ी सरलता से स्थापित कर लिया।
आरती के भीतर उमड़ता घुमड़ता क्रोध और विवशता का दबाव इस तरह एकाकार हो गया की आंखों से आंसू बह निकले। घूंघट की ओट में आंसू बहाती रही।
‘‘अरे भौजी तो रो रही हैं!‘‘ पास बैठी एक बालिका का ध्यान आरती के आंसुओं की ओर गया और वह बोल उठी।
‘‘पीहर की याद आ रही होगी।‘‘ एक अन्य स्वर सुनाई पड़ा।
वैसे यह अनुमान गलत था। आरती अपने पीहर को याद भी नहीं करना चाहती थी। करें भी क्यों? उसे अपने पीहर से जीवन भर का कलंक ही तो मिला है, कोई खजाना तो नहीं मिला। मां और भाइयों ने भी झेला है उस कलंक को और झेल भी रहे हैं। काश! बापू ने ऐसा न किया होता।


मुंह दिखाई की रस्म का एक-एक पल एक एक युग के समान बीता था। उसी समय से आरती के मन में एक अनजाना डर बैठ गया था कि जाने अब क्या होगा? उसके इस भय नहीं उसे अपने ससुराल में कभी सिर उठाकर जीने नहीं दिया। आरती सिर उठाती भी तो किसके भरोसे? पहली रात को ही उसके पति ने उससे यही बोला था कि तुम तो हमारा सिर नहीं फोड़ोगी न!
अपने पति से यह सुनकर आरती फफक कर रो पड़ी थी।
‘‘अरे? हम तो मजाक़ कर रहे थे। तुम तो रोने लगीं।‘‘ आरती के पति ने उसे बहलाते हुए कहा था। लेकिन आरती के मन में चुभी फांस चुभी ही रह गई थी। यह भी कोई मजाक है? उसका पति उससे मजाक न करता, बदले में उसे कानी, कुबड़ी, बदसूरत, काली-कलूटी - कुछ भी कह लेता। वह हंसकर सुन लेती। मगर ऐसा मजाक, जैसे कोई हंसिए से दिल चीर कर रख दे।
   

आरती भरसक प्रयास करती कि उसे किसी भी बात पर गुस्सा न आए, मगर वह भी इंसान है, कभी गुस्सा आ ही जाता है। एक बार उसे अपने छोटे देवर पर किसी बात पर गुस्सा आ गया था। गुस्से में आकर आरती ने अपने छोटे देवर की बांह पकड़ कर उसे झकझोर दिया था। उसका छोटा देवर उस समय 10 बरस का था। छोटे देवर ने बुक्का फाड़ कर रोते हुए चिल्लाना शुरू कर दिया था, ‘‘अम्मा! बचाओ ! भौजी हमें मारे डाल रही हैं।‘‘
‘‘हाय रे! क्या हुआ? क्या हुआ रे छुटके?‘‘ आरती की सास बदहवास सी दौड़ी चली आई थी मानो आरती छोटे देवर को सचमुच मार डालेगी। बात जरा- सी थी, लेकिन देखते ही देखते तिल का ताड़ बन गई।
‘‘मेरी ही मति मारी गई थी जो मैं एक हत्यारे की बेटी को बहू बना के लाई।‘‘ आरती की सास ने विलापना और कोसना शुरू कर दिया और अपने माथे पर हाथ मारते हुए बोली, अब तो जन्म भर यही डर बना रहेगा कि यह कहीं किसी रोज हम में से किसी को निपटा न दे।
आरती रोती रही, बस रोती! कर भी क्या सकती थी वह रोने के सिवा। उसके भीतर का लावा आंसू बनकर ही निकलता था। खारा-खारा, लावे से कहीं ठंडा। किसी को भी भस्म नहीं कर सकता था। भीतर से खौलती और बाहर से रोती आरती अपने दुर्भाग्य के साथ जी रही थी कि आज उसके बेटे कृष्णा ने उसके घावों को बहुत गहरे कुरेद डाला।

‘‘तूने ऐसा क्यों किया रे कृष्णा?‘‘ आरती ने कृष्णा की दोनों बाहें पकड़कर उसे हिलाते हुए पूछा।
‘‘तो और क्या करता? उसने मुन्नी को छेड़ा था।‘‘ कृष्णा ने पलट कर जवाब दिया,‘‘ कोई मेरी बहन को छेड़े और मैं मुंह बाए देखता रहूं, मुझसे यह ना होगा।‘‘
कृष्णा का जवाब सुनकर सन्न रह गई आरती। क्या कृष्णा अपने नाना पर गया है? क्या भुजना की अम्मा ने सही कहा था कि यह सब इंसान के खून में रहता है? क्या उसके पिता का खून उसके शरीर से होता हुआ कृष्णा तक जा पहुंचा? आरती की पकड़ ढीली पड़ गई। कृष्णा आरती की पकड़ से छूटते ही घर से बाहर निकल गया। इधर आरती की आत्मा त्राहि-त्राहि कर उठी। यूं उसे पता है कि अगर उसकी परिस्थितियां सामान्य होतीं तो कृष्णा की इस हरकत पर उसे गर्व होता। केवल वही नहीं, अपितु दूसरे लोग भी कृष्णा की प्रशंसा करते हुए कहते कि भाई हो तो ऐसा जो अपनी बहन के साथ छेड़छाड़ किए जाने को सहन नहीं कर सका और चार-पांच लफंगे लड़कों से अकेले ही जूझ पड़ा।
कृष्णा ने किसी और घर में जन्म लिया होता तो भी उसके इस साहस की तारीफ होती, लेकिन कृष्णा ने तो आरती की कोख से जन्म लिया है और आरती उस पिता की बेटी है जो हत्या के अपराध में आजन्म कारावास की सज़ा काट चुका है। इसलिए कृष्णा को उसके साहस पर बधाई कोई नहीं देगा बल्कि सभी यही कहेंगे कि कृष्णा की रगों में उसके नाना का खून दौड़ रहा है। एक हत्यारे का खून।
आरती की इच्छा होने लगी कि वह उसी समय अपने पिता के पास जाए और उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया? क्या उसे एक पल को भी अपने बच्चों का ख्याल नहीं आया?
वैसे आरती को सब कुछ पता है। उसे पता है कि उसके पिता ने फुग्गन की हत्या क्यों की थी। फिर भी उसे क्षोभ है अपने पिता के कृत्य पर। इसलिए नहीं कि उसके पिता ने अपराध किया बल्कि इसलिए कि उसके पिता के इस कर्म की सज़ा उसे भी भुगतनी पड़ रही है।
बुरा समय शायद वहीं से शुरू हुआ जब से आरती के बापू कीरत और फुग्गन में दोस्ती आरंभ हुई। कहने को दोस्ती थी किंतु इसके पीछे सच्चाई कुछ और ही थी। आरती की मां सुखबाई को फुग्गन फूटी आंखों नहीं सुहाता था। उसने कीरत को इस बारे में चेताया भी था। यूं तो फुग्गन की नीयत पर कीरत को भी शंका थी। फिर भी कीरत अनदेखी करता रहा आखिर फुग्गन रसूख वाला आदमी था। किरत फुग्गन को आसानी से नहीं टाल सकता था। इसलिए उसने फुग्गन को टोंकने के बजाय अपनी बीवी सुखबाई को सचेत कर रखा था कि वह फुग्गन के सामने न निकला करें। सुखबाई को कौन- सी अटकी थी कि वह फुग्गन के सामने आती। वह तो स्वयं फुग्गन से डरी-डरी रहती थी। उसे केवल अपनी ही नहीं बल्कि अपनी दोनों बेटियों आरती और भारती की अस्मत की भी चिंता थी। हैवान आदमी का क्या भरोसा ऐसे आदमी औरतजात की उम्र नहीं देखते।
अवसर मिलते ही फुग्गन छिछोरे हंसीँमजाक करने से नहीं चूकता। कहने को रिश्ता देवर भाभी का बना रखा था। उसने टालने का लाख प्रयास करने पर भी वह दिन आ ही गया जब फुग्गन का सगर फोड़ने की नौबत आ गई। हुआ यह कि कीरत की अनुपस्थिति में आ टपका फुग्गन। पहले आंगन में बिछी चारपाई पर पसर गया। फिर उसने सुखबाई को आवाज देकर उससे पीने को एक गिलास पानी मांगा। उस समय घर पर न तो दद्दा थे और न बच्चे। दद्दा रिश्तेदारी में गए हुए थे और बच्चे बाहर कहीं खेल में मस्त थे। अब सुखबाई पानी के लिए मना कर नहीं सकती थी अतः झक मारकर सुखबाई को ही पानी लेकर फुग्गन के सामने आना पड़ा। उसने पानी का गिलास पकड़ने के बदले, सुखबाई की बांह पकड़ ली। उसने सुखबाई की अस्मत लूटने की कोशिश की। सुखबाई की चींख-पुकार के कारण फुग्गन अपने इरादे में सफल तो नहीं हो पाया, लेकिन सुखबाई दहशत से देर तक थर-थर कांपती रही। उसकी आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। अपमान और भय का मिलाजुला प्रभाव सुखबाई को गार रहा था।
जब कीरत घर आया तो सुखबाई उसे रोती हुई मिली। सुखबाई की हालत देखकर कीरत आपे से बाहर हो क्या और उसी समय चल पड़ा फुग्गन को खोजने। सुखबाई ने उसे रोकने का प्रयास किया था लेकिन वह प्रयास आग में घी का काम कर गया था।
सुखबाई को बाद में खुद कीरत ने बताया था कि फुग्गन को देखते ही उसका खून खौल उठा। उसने आव देखा न ताव और पास में पड़ी कुल्हाड़ी उठाकर फुग्गन के सिर पर दे मारी। उस क्षण उसने सोचा भी नहीं था कि उसके हाथों एक हत्या होने जा रही है। उसने तो यह भी नहीं देखा था कि कुल्हाड़ी की धार किधर है?  संयोगवश कुल्हाड़ी की धार उल्टी थी, मगर उसकी कुल्हाड़ी का वार पड़ते है फुग्गन धराशयी हो गया था। उसने तत्काल दम तोड़ दिया था। यद्यपि कीरत को बहुत देर बाद थाने में पता चला था कि फुग्गन ने उसी समय दम तोड़ दिया था। सुखबाई को इस घटना का पता उस समय चला, जब गांव का ही एक आदमी दौड़ा- दौड़ा आया और उसने हांफते-हांफते बताया था कि कीरत पुलिस चौकी में है क्योंकि उसने फुग्गन को मार डाला है। यह सुनकर सन्न रह गई थी सुखबाई। हे भगवान ! यह क्या कर डाला कीरत ने। वह एक बार फिर थरथर कांपने लगी थी।
कीरत का मुकदमा बना उधार के लेनदेन के कारण हुई हत्या का। फुग्गन के परिवार वालों के वकील ने कहा कि पीड़ित ने फुग्गन से बड़ी रकम उधार ली थी। जब फुग्गन ने वह रकम वापस मांगी तो कीरत ने उसकी हत्या कर दी। कीरत ने भी सुखबाई वाले मामले को दबा रहने दिया। आखिर जोरू की इज्ज़त घर की इज्ज़त होती है। लोग तो यही मान बैठेंगे कि सुखबाई अपनी इज्जत नहीं बचाई बचा पाई। इससे बेटे-बेटियों का भविष्य भी चौपट हो जाएगा । ना कोई बहू देगा ना कोई बेटी लेगा। फिर भी उंगली उठाने वालों की कहीं कोई कमी होती है भला? तब कीरत  को कहां पता था की वह लाख प्रयत्न कर ले लेकिन उंगली उठाने वालों की उंगलियां वह नहीं रोक सकेगा। आजन्म कारावास की सज़ा भी उसके किए के परिणाम को बदल नहीं सकेगी। यह बात उसके छोटे बेटे सूरत की शादी के समय और भी स्पष्ट हो गई थी।
यह सारी बातें आरती को उसकी मां सुखबाई ने उस दिन स्वयं बताई थी, जिस दिन आरती पहली बार रोती हुई स्कूल से घर आई थी और चिल्लाने लगी थी कि ‘‘हमें नहीं जाना स्कूल। वहां सब लोग हमारी हंसी उड़ाते हैं। सब हमें हत्यारे की बिटिया कहते हैं, ऐसा क्यों किया बापू ने?’’
तब मां ने उसे उसके बापू की सच्चाई बताई थी किंतु आरती उस समय न तो समझ सकती थी और न समझ सकी। उसका स्कूल जाना अवश्य छूट गया। आरती स्कूल जाए या न जाए किसी को इस बात की चिंता नहीं थी। चिंता थी तो आरती के ब्याह की। नाते-रिश्तेदार भी यही सोचते थे कि ऐसे घर की लड़की को कोई अपनाएगा नही?
गांव में तो ऐसी घटनाएं आए दिन होती रहती हैं। शौच के लिए घर से बाहर निकली औरतों की अस्मत लूट ली जाती है या फिर सूने घर में घुस कर औरतों की देह को रौंदा जाता है। बात-बात पर हंसिए-दरांते और कुल्हाड़ियां चल जाती हैं। ज़रा-ज़रा सी बात पर लोग अपना विवेक खो बैठते हैं। हर घटना का सार-समाचार होता है-‘‘आपसी रंजिश के चलते फलां ने फलां को मारा।’’ इसके पीछे का सच भला कौन टटोलता है? कोई नहीं! गांववाले भी नहीं!
कीरत सरकार की कृपा से सज़ा पूरी होने से पहले ही ज़ेल से छूट गया था, मगर उसके छोटे बेटे सूरत ने अड़ियल रवैया अपनाते हुए स्पष्ट शब्दों में कह दिया था कि उसके होने वाले ससुर नहीं चाहते हैं कि उसके बापू विवाह के समय घर पर रहें। इसलिए बेहतर है कि वे तीरथ पर चले जाएं।सूरत के बड़े भाई मूरत की घरवाली यानी सूरत की भौजी ने भी इसका समर्थन किया था। आरती भी अपने भाई और भौजी के पक्ष में जा खड़ी हुई थी।कीरत को जब इस बात का पता चला तो वह खून के आंसू रो दिया। उसने अपने बच्चों की इच्छााओं का ध्यान रखते हुए अपने दिल पर पत्थर रख लिया और तय किया कि वह तीरथ यात्रा पर चला जाएगा। सुखबाई भी अब अकेली क्या करती? कीरत को उसके बहू-बेटों ओर बेटी ने नई सज़ा सुना दी थी लेकिन इस बार सुखबाई इस नई सज़ा में अपने पति का साथ देने सुखबाई भी हो ली। दोनों ने अपनी गठरी-मोठरी बांध ली।
‘‘अम्मा तुम क्यों जा रही हो? तुम्हारे यहां होने से किसी को परेशानी नहीं है।’’ आरती ने झिझकते हुए सुखबाई से कहा थां। मूरत ने भी आरती की बात का समर्थन किया था। मगर सुखबाई नहीं मानी। आरती के मन में उस समय चोर आ बैठा था। वह चाहती थी कि अम्मा न जाएं। जाना है तो बापू ही जाएं। सबको बापू के रहने से परेशानी है, अम्मा के रहने से नहीं। मगर सुखबाई तो न जाने किस मिट्टी की बनी थी।
‘'मैंने और तुम्हारे बापू ने अलग-अलग रह कर बहुत सज़ा काट ली। अब जरा साथ-साथ रह कर भी सज़ा काट लें।’’ बड़ा चुभता उत्तर दिया था सुखबाई ने।
अम्मा का उत्तर सुन कर आरती के मन में कड़वाहट भर गई थी। बापू के लिए ऐसा ही दर्द का तो बापू को हत्या करनेे से क्यों नहीं रोका था?
सुखबाई और कीरत तीर्थ यात्रा पर चले गए। सूरत का विवाह धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। आरती अपनी ससुराल लौट आई। आरती ने अपने भाई की शादी में जी भर कर ढोलक बजाई थी। कृष्णा अपने मामा की बारात में खूब नाचा था। मुन्नी भी साथ गई थी। उसने भी ढोलक पर गाने गाए थे अपने मामा की शादी पर।
यूं तो मुन्नी साधारण नैन-नैक्श की थी लेकिन आवारा लड़कों को इससे क्या? उनके लिए तो मुन्नी का लड़की होना ही पर्याप्त था।
ज़रूर छेड़ा होगा उन लड़कों ने मुन्नी को, वरना कृष्णा उनसे यूं झगड़ा नहीं करता। आरती इतना सोच कर ही सकपका गई। उसे अपनी वह बात याद आ गई जो उसने अपनी मां को ताना मारते हुए कही थी-‘‘अच्छा!! हमारे पीछे तो कोई नहीं आता है, तुम्हारे पीछे फुग्गन क्यों पड़ा था?’’ बेटी आरती ने अपनी सच्चरित्रता को स्थापित करते हुए सुखबाई के चरित्र पर कीचड़ उछाल दिय था।
अब क्या यही बात वह अपनी बेटी मुन्नी से कह सकती है? उसी पल आरती को अपनी मां की परिस्थिति, पिता के क्रोध की सीमा और उनके द्वारा किए गए अपराध का औचित्य खुल कर सामने आ गया। दोष तो उसके बापू कीरत का भी नहीं था, यह बात आज उसकी समझ में आई। मगर अब हो भी क्या सकता था, उसकी अम्मा और बापू तो एक और सज़ा भुगतने घर से जा चुके थे। जबकि आरती और उसका बेटा एक अलग तरह की सज़ा काट रहे थे, जिसके मूल में एक ही बात थी कि -‘‘कृष्णा भी अपने नाना की तरह किसी दिन किसी की हत्या न कर दे।’’
‘‘हे भगवान, कृष्णा ऐसी गलती मत करना। मैं जीवन भर हर महीने पांच रुपए का प्रसाद चढ़ाऊंगी, देवी मैया! तुम कृष्णा की रक्षा करना!’’ आरती बाहों में सिर दे कर सुबकने लगी।
कौन जानता था कि भावावेश में उठाया गया एक कदम इतने निर्दोष लोगों को जीवन भर कोई न कोई सज़ा भुगतने को विवश कर देगा।
आरती का मन चीत्कार कर उठा, ये सज़ा ओर कब तक भुगतनी पड़ेगी? वह आज भी अपने बापू को झकझोर कर कहना चाहती है कि कम से कम एक बार सोचा तो होता।
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#जनसत्ता 
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#DrMissSharadSingh #story 
#कहानी #हिन्दीकहानी #सोचातोहोता

शुक्रवार, अगस्त 05, 2022

लघुकथा | नारीशक्ति जिंदाबाद | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | युवाप्रवर्तक


पढ़िए मेरी लघुकथा और बताइए कि क्या सचमुच नारी सशक्तिकरण यही है? 👇🤔

हार्दिक धन्यवाद #युवाप्रवर्तक 🙏
https://yuvapravartak.com/67334/
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लघु कथा
नारीशक्ति जिंदाबाद !
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
           गांव के इकलौते चौराहे पर पंडाल लगा हुआ था।  पंडाल के नीचे एक ओर घूंघट वाली महिलाएं बैठी हुई थी और दूसरी ओर पुरुष वर्ग। सजे-संवरे मंच से सरपंचपति भैयाजी महिला सशक्तिकरण पर जोर-शोर से भाषण दे रहे थे।
     सरपंचपति भैयाजी का भाषण समाप्त हुआ तो उनके बाजू में बैठे बीडीओ ने उनसे पूछा,"भाभी जी क्यों नहीं आई?"
     "उनका यहां क्या काम? वे यहां आ जातीं तो वहां घर पर चूल्हा-चौका कौन सम्हालता?" बत्तीसी दिखाते हुए सरपंचपति ने बीडीओ से कहा।
      "मगर सरपंच तो वे हैं।" बीडीओ ने हिम्मत करके कहा।
      " लेकिन पति तो हम हैं।" बेशर्म हंसी हंसते हुए सरपंचपति भैयाजी ने कहा।
      उसी समय कुछ समर्थक नारे लगाने लगे-
"भैया जी जिंदाबाद!"
"नारी शक्ति जिंदाबाद!"
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सागर (म.प्र.)

#लघुकथा #डॉसुश्रीशरदसिंह #नारीशक्ति #स्त्रीसशक्तिकरण #सरपंच #सरपंचपति

गुरुवार, जून 23, 2022

कहानी | चल चकवा वा देस को, जहां रैन नहिं होय | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पहला अंतरा पत्रिका

साहित्यिक पत्रिका "पहला अंतरा" के अप्रैल-जून 2022 अंक में मेरी कहानी "चल चकवा वा देस को, जहां रैन नहिं होय" प्रकाशित हुई है।
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कहानी

चल चकवा वा देस को, जहां रैन नहिं होय
 
- डॅा. (सुश्री) शरद सिंह

पल भर में समय कैसे मुंह फेरता है, यह सुखबाई से बेहतर भला कौन समझ सकता है ? लगने को तो यूं लगता है मानो कल की ही बात हो, मगर गिनती करने बैठो तो पूरे बारह बरस गुज़र चुके हैं, तब से अब तक। वह बूढ़ा साधू जो पीपल के पेड़ के नीचे बैठ कर सुबह से कबिरहा गाया करता है, उसका स्वर भी अब थक चला है। वह भूल जाता है गाते-गाते और न जाने क्या बड़बड़ाने लगता है। कीरत को लगता है कि सुखबाई सब कुछ भूल गई है। कीरत शायद समझता नहीं कि सुखबाई को उस मनहूस घड़ी का एक-एक क्षण अच्छी तरह से याद है । वह तो बारह बरस की एक-एक घड़ी को भी नहीं भूली है। कबिरहा साधू की जिस आवाज़ पर उसने ब्याह कर आने के बाद ध्यान नही नहीं दिया था, कीरत के जाने के बाद सुखबाई ने कितने ध्यान से सुना है उसके एक-एक शब्द को यह वही जानती है। 
कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय 
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय......
 
कैसे हुलस के सोचा करती थी वो कि जिस दिन कीरत घर लौट कर आएगा उस दिन वो देवी मैया के मंदिर में जा कर प्रसाद चढ़ाएगी। कीरत के मन का खाना पकाएगी और अपने हाथों से उसे खिलाएगी। कीरत से विछोह के पूरे बारह बरस वह बारह पलों में मिटा देगी। वे दिन एक बार फिर लौट आएंगे जो मूरत, सूरत और दोनों बेटियों के पैदा होने के समय से भी पहले थे।
सुखबाई को पहला झटका उस दिन लगा था, जिस दिन कीरत पहली बार जेल से घर आया था । दद्दा के क्रिया-कर्म के लिए कीरत को पेरोल पर छोड़ गया था। 
‘दद्दा, कहंा चले गए तुम! हाय रे !’ कीरत का यह बिलखना सुन कर सुखबाई को याद आया था कि उसने भी इसी तरह विलापा था, मन ही मन सही कि ‘हाय दद्दा! तुम उस दिन यहंा क्यों नहीं थे!’
काश ! उस दिन दद्दा रिश्तेदारी में दूसरे गांव न गए होते तो शायद वो अनहोनी होने से बच गई रहती। सुखबाई तो दद्दा की अनुपस्थिति के बारे में कोई टिप्पणी नहीं कर पाई थी लेकिन खूब कोसा था दद्दा ने, सुखबाई को। सुखबाई की ननद ने तो सुखबाई को ‘डायन’ तक की उपाधि दे डाली थी, जो उसके भाई को खा गई थी। सबने अपने-अपने ढंग से अपने मन की भड़ास निकाली थी लेकिन उस समय किसी ने भी ये नहीं सोचा कि अब सुखबाई का जीवन कैसे कटेगा? एक तो चार बच्चों की जिम्मेदारी और उस पर भरी जवानी। यह जवानी ही तो उसकी दुश्मन बन गई थी। 
जिस दिन फुग्गन ने उसे पहली बार बिना घूंघट के देखा था, बस तभी से उसकी लार टपकने लगी थी। औरत को मर्द की नीयत पहचानते देर नहीं लगती है, यह बात और है कि किसी मजबूरी के चलते वह सब कुछ अनदेखा कर दे। सुखबाई ने भी पहले-पहल अनदेखा ही किया। कीरत ने उसे बताया था कि फुग्गन रसूख वाला व्यक्ति है और जब-तब कीरत की मदद कर दिया करता है, पैसों के मामले में भी और धाक जमाने के मामले में भी। सुखबाई नहीं चाहती थी कि उसकी वज़ह से कीरत और फुग्गन के बीच  कोई खाई पड़े। सुखबाई की इस सोच को स्वीकृति समझ कर फुग्गन ने अपनी क्रियाशीलता बढ़ा दी। वह हर दूसरे-तीसरे दिन घर आने लगा । कभी एक गिलास पानी का बहाना तो कभी चाय का बहाना, तो कभी नन्हीं भारती को उसकी गोद से अपनी गोद में लेने का बहाना, बस, वह सुखबाई को छूने का कोई न कोई बहाना खोज निकालता। सुखबाई को बड़ी घबराहट होती।  अवसर मिलते ही फुग्गन छिछोरे हंसी-माज़ाक करने से नहीं चूकता। कहने को रिश्ता देवर-भाभी का बना रखा था उसने। इस रिश्ते की आड़ में अपने सौ गुनाह तो उसने माफ़ करवा ही लिए थे। बस, एक सौ एकवें की देर थी।
टालने का लाख प्रयास करने पर भी वह दिन आ ही गया जब फुग्गन एक सौ एकवां गुनाह कर ही बैठा और उसके सिर फोड़ने की नौबत आ खड़ी हुई। हुआ ये कि कीरत की अनुपस्थिति में फुग्गन घर आ टपका ।
‘सुनो जी, मुझे ये फुग्गन के रंग-ढंग कुछ ठीक नहीं लगते हैं।’ आखिरकार एक दिन सुखबाई ने कीरत से कह ही दिया। उसे लगा कि अगर वह कीरत से नहीं कहेगी तो फुग्गन का हौसला तो बढ़ेगा ही, कीरत भी किसी दिन उसे ही दोषी ठहराएगा। मर्द की ज़ात औरत में पहले दोष देखती है, मर्द में बाद में।
‘हूं, लगता तो मुझे भी है! सुनो, तुम उसके सामने न आया करो, चाय-पानी ले कर भी नहीं! मुझे आवाज़ दे दिया करो, मैं रसोई में आ कर ले लिया करुंगा!’ सोच-विचार कर कीरत ने रास्ता सुझाया ।
‘उसका घर पे आना नहीं रोक सकते? मना कर दो न उसको !’ सुखबाई बोली ।
‘बुरा मान जाएगा वो। रसूखवालों का बैर और प्यार दोनों बराबर होते हैं, गले मिलो तो चाटेंगे, और झगड़ा करो तो बोटियंा काटेंगे ! ऐसे ही चलने दो अभी तो, फिर देखते हैं कि आगे क्या होता है.... तुम सामने नहीं पड़ोगी तो चार दिन में ही किसी और दरवाज़े में झांकने लगेगा वो ।’
कीरत की बात सुखबाई को समझ में आ गई, और यह भी कि फुग्गन से आसानी से पीछा छूटने वाला नहीं है। 
सुखबाई को अपने साथ-साथ अपनी दोनों बेटियों के लिए भी डर सताने लगा। भारती, यद्यपि गोद में थी और आरती घुटनों के बल रेंगती थी, मगर पापी फुग्गन का क्या भरोसा? एक बार उसके मायके के गंाव में एक ढोंगी आया था, दो माह उस गंाव में रहा था, मगर उस दौरान उसने तीन-चार बरस की तीन-तीन बच्चियों की ज़िन्दगी बरबाद कर डाली थी। वो तो गनीमत है कि उसका भेद खुल गया और गंाव वालों ने उसे मार-मार कर अधमरा कर डाला, नहीं तो और पता नहीं कितनी बच्चियों की ज़िन्दगी बरबाद करता । पुलिसवालों ने भी उस अधमरे ढोंगी को खूब जुतियाया था मगर उससे उन बच्चियों का जीवन पहले जैसा तो नहीं हो सकता था। वे अपने माथे पर एक दाग़ ले कर बड़ी होंगी, फिर कौन करेगा उनसे शादी, कैसे बसेगा उनका घर ?
सुखबाई ने फुग्गन के सामने निकलना बंद कर दिया। फुग्गन के आने की आहट पा कर वो घर में ऐसे दुबक जाती जैसे बाज़ के डर से गौरैया दुबक जाती है। फुग्गन से भी यह परिवर्तन छिपा नहीं रह सका ।
‘का बात है, भौजी आजकल दिखती नहीं हैं! नाराज़ हैं का हमसे? कौनऊ  गुस्ताख़ी हो गई है का हमसे?’ फुग्गन निर्लज्ज की भांति कीरत से पूछने लगता ।
‘अरे नहीं, ऐसे ही कुछ काम में लगी है !’ कीरत टालते हुए उत्तर देता, और फिर ऊंचे स्वर में सुखबाई को आवाज़ देता, ‘देखो, तुम्हारे देवर आए हैं, चाय बन जाए तो पुकार लइयो, तब तक मूरत से पानी तो भेजवा देओ !’ 
यही सिलसिला चलता रहा, जब तक कि फुग्गन ने कीरत की पीठ पीछे घर में पांव नहीं रखा । वह दिन, वह घड़ी सुखबाई कभी भूल नहीं सकी। दद्दा रिश्तेदारी में गए हुए थे, मूरत और सूरत बाहर खेल रहे थे, आरती खाट पर और मालती झूले में सो रही थी, कीरत भी घर पर नहीं था । उस दिन फुग्गन ने दरवाज़े की कुण्डी भी नहीं खटकाई, उसे पता था कि कीरत घर पर नहीं है । लगभग सूने घर में अकेली सुखबाई, फुग्गन के लिए इससे अच्छा अवसर और भला क्या हो सकता था ? सुखबाई को आहट तो मिली थी, मगर कुण्डी खटकाने की आवाज़ के अभाव में उसने समझा कि बच्चे होंगे। जब तक सुखबाई कुछ समझ पाती, तब तक फुग्गन ने पीछे से उसे दबोच लिया। इस अप्रत्याशित आक्रमण से हड़बड़ा कर सुखबाई ऐसी छटपटाई कि पहली पकड़ के बाद ही फुग्गन के बंधन से छूट खड़ी हुई। फुग्गन ने फिर प्रयास किया । सुखबाई बिल्ली के पंजे के समान अपनी उंगलियों से फुग्गन पर प्रहार करने लगी । कुछ देर की छीना-झपटी के बाद सुखबाई को समझ में आ गया कि फुग्गन उस पर भारी है, सुखबाई ने चींखना-चिल्लना शुरू कर दिया । जाने उसकी चींख में दम नहीं थी या घर के आस-पास कोई था ही नहीं, उसकी चींख सुन कल कोई नहीं आया। यद्यपि, फुग्गन डर गया कि कहीं कोई आ न जाए, वह भाग खड़ा हुआ। 
फुग्गन के जाते ही सुखबाई धम्म से वहीं ज़मीन पर गई । अस्मत तो उसने बचा ली थी मगर अब साहस जवाब दे गया था। फटे कपड़ों में, अपने घुटनों में सिर दिए, बैठी-बैठी वह अंासू बहाती रही। दद्दा से पहले कीरत आया, काश ! दद्दा पहले आए होते । कीरत ने सुखबाई की दशा देखी तो वह सकते में आ गया, क्या हुआ ? ये लो क्यों रही है ? कहीं दद्दा को तो कुछ नहीं हो गया ?
‘क्या हुआ सुक्खू ? तू रो क्यों रही है ? बता न क्या हुआ ?’ कीरत ने घबरा कर सुखबाई को कंधे से पकड़ कर झकझोर दिया, तभी उसे अहसास हुआ कि सुखबाई के कपड़े फटे हुए हैं ।
‘कौन आया था ?’ दूसरा प्रश्न यही था कीरत का ।
सुखबाई के हलक से आवाज़ नहीं निकल पाई लेकिन कीरत समझ गया और दनदनाता हुआ चल दिया फुग्गन के पास। 

कीरत को जेल की सज़ा होने के बाद कई रातें सुखबाई ने रो-रो कर काटीं । उसके आगे की कई लातें करवट बदल-बदल कर काटीं । उसका कोमल मन इस बात को ले कर और अधिक द्रवित हो उठता कि जेल में कीरत की रातें कितनी कठिनाई से कट रही होंगी । कभी-कभी सुखबाई को स्वयं पल क्रोध आता कि वह उस दिन अपने-आप पर नियंत्रण रख पाई होती तो कीरत को जेल न जाना पड़ता । सचमुच  ये सब उसी के कारण तो हुआ, सुखबाई का मन टीसता रहता । सुखबाई की उस दिन बड़ी विचित्र मनोदशा थी जिस दिन कीरत को पहली बार पेरोल पर घर आना था। चचिया देवर कीरत को लेने गया था । अंागन में दद्दा का शव रखा हुआ था । नाते-रिश्तेदार जुड़ गए थे । सभी को कीरत की प्रतीक्षा थी । दद्दा की चिता को आग, कीरत को ही देनी थी । पूरे घर में रोना-पीटना मचा हुआ था । सुखबाई की ननद खबर पाते ही अपनी ससुराल से दौड़ी चली आई थी । नंदेऊ भी साथ आया था, और बड़ा लड़का भी । ननद बुक्का फाड़ कर और छाती पीट-पीट कल रो रही थी । माना कि बाप के मरने का दुख बेटी को होना ही था, मगर उसके रोने में दुख कम और प्रदर्शन अधिक था । वह ऐसे संवेदनशील समय  में भी सुखबाई को कोसना नहीं भूली । उसने गरियाते हुए कहा था, ‘‘जे ससुरी हमाई भौजी नई, डायन है, डायन! पैले भैया को जेल भेजवा दओ, औ अब दद्दा को खा गई । अब जुड़ा गई छाती ? अब मिलहे छुट्टा ऐश करबे के लाने .....’’
क्या कहती सुखबाई ? खून का घूंट पी कर रह गई थी । जी में तो आया कि साफ़-साफ़  कह दे कि उसने नहीं कहा था कीरत को कि वो फुग्गन का सिर फोड़ दे, उसकी जान ले ले । लेकिन सुखबाई जानती थी कि कोई लाभ नहीं है मुंह खोलने से। सब उसे ही कोसेंगे, जलील करेंगे । जब से कीरत जेल गया था तब से उसे धिक्कार और प्रताड़ना के अलावा मिला ही क्या था । गंाव, रिश्तेदारी में सब उसे हत्यारे की बीवी कहते हैं, कभी प्रत्यक्ष में तो कभी परोक्ष में । वह मूंड़ औंधाए ज़िन्दगी काट रही है, और करे भी तो क्या? आवेश पल भर का और सज़ा ज़िन्दगी भर की।
सोना, सज्जन, साधुजन, टूटि जुरै सौ बार
दुर्जन कुंभ-कुम्हार के, एकै धका दरार......

कीरत ने घर में पंाव रखा तो सुखबाई का कलेजा मुंह को आ गया । पहले से आधा शरीर रह गया था कीरत का । चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुई थी जिसके कारण उसे देख कर ऐसा लग रहा था मानो वह जेल से नहीं बल्कि किसी लम्बी बीमारी के बाद अस्पताल से छूट कर आ रहा हो । घर का माहौल ऐसा था कि सुखबाई और कीरत की आपस में नज़र भी न मिल पाई । कीरत ने जैसे ही दद्दा के शव को देखा तो बिलखता हुआ शव से लिपट गया । 
‘दद्दा, कहंा चले गए तुम, हाय रेे !’ विलाप कर उठा था कीरत ।
सुखबाई से कीरत का बिलखना देखा नहीं गया । उसने कीरत को कभी रोते हुए भी नहीं देखा था। कीरत का विलाप सुन कर सुखबाई को चक्कर आ गया और वह गश खा कल गिर गई । जब उसे होश आया तो उसने खुद को औरतों के बीच एक कमरे में पाया । होश आते ही उसके मन में जो पहली बात कौंधी वह थी कि कीरत कहंा गया ? वह हड़बड़ा कर उठी और अंागन की और लपकी । एक औरत ने उसे थाम लिया और धीरज बंधाने लगी । 
‘दद्दा कहंा गए?’ उसने कीरत को न पूछ कर दद्दा के बारे में पूछा । यह उसका सहज संकोच  था, कोई सोचा-समझा प्रश्न नहीं था । 
‘ठठरी उठ गई, बिन्ना ! अब दद्दा कभऊं न आहें !’ एक बूढ़ी औरत ने कहा । दद्दा की अर्थी ले जाई जा चुकी थी । कीरत भी साथ में चला गया था । आग भी तो उसी को देना था, वह भला कैसे रुकता?
कीरत को पेरोल पर तीन दिन के लिए छोड़ा गया था। दद्दा की तेरहवीं के लिए आ पाएगा या नहीं , यह निश्चित नहीं था । सुखबाई के मन में बस एक ही चाह कुलबुला रही थी कि कम से कम दो पल के लिए ही सही कीरत उसके पास आ जाए । वह कीरत को जी भर कर देख ले। मगर उसे भय था कि उसकी ये चाह पूरी नहीं हो पाएगी । शोक वाला घर था। रिश्तेदारों की भरमार थी। दुख का वातावरण था। कीरत को ढाढस बंधाने वालों का तंाता लगा हुआ था। वैसे सच्चाई तो ये थी कि ढाढस बंधाने से कहीं अधिक उत्सुकता थी कीरत के रूप में सज़ा काट रहे हत्यारे को निकट से देखने की।
रात को सुखबाई अपने कमरे में आ गई थी । बच्चे सो चुके थे । सुखबाई ठंडी दीवार से पीठ सटा कर ,घुटने पर सिर रख कर बैठ गई थी । उसके मन में कीरत का चेहरा उमड़-घुमड़ रहा था । बैठे-बैठे, सोचते-सोचते जाने कब नींद लग गई । जब किसी ने अपने मज़बूत पंजे में उसकी बंाह दबोची तब वह अचकचा कर जाग गई । सामने कीरत था । अपने सामने कीरत को पा कर उसे खुश होना चाहिए था किन्तु पहली बार उसके मन में सिहरन दौड़ गई । उसे लगा मानो उसके सामने कीरत न हो बल्कि कोई अपरिचित चेहरा हो, मर चुके फुग्गन का या फिर उसे मारने वारे हत्यारे कीरत का । उस क्षण पहली बार सुखबाई के मस्तिष्क में यह विचार आया था कि कीरत एक इंसान की हत्या कर चुका है । वह हत्यारा है । वह किसी की भी हत्या कर सकता है । इससे आगे उसे सोचने का समय ही नहीं मिल था । कीरत ने उसे सोचने का अवसर ही नहीं दिया । फिर भी सुखबाई उसे समय वहंा हो कर भी नहीं थी । उसके  मानस पटल पर वे दृश्य घूमने लगे थे जो कीरत के कारावास के लिए उत्तरदायी थे।
ग़रीबी थी मगर वह समय ऐसा बुरा नहीं था। बुरा समय शायद वहीं से शुरू हुआ जब से कीरत और फुग्गन में दोस्ती आरम्भ हुई। सुखबाई की हालत देख कर कीरत आपे से बाहर हो गया और उसी समय चल पड़ा फुग्गन को खोजने। सुखबाई ने उसे रोकने का प्रयास किया था लेकिन वह प्रयास आग में घी का काम कल गया । 
सुखबाई को बाद में खुद कीरत ने बताया था कि जब वह फुग्गन को ढूंढते पहुंचा तो फुग्गन अपने एक लंगोटिया के यहंा बैठ कर दारूखोरी कल रहा था। कीरत ने फुग्गन को देखा तो उसका खून खौल उठा । उसने आव देखा न ताव और पास में पड़ी कुल्हाड़ी उठा कल फुग्गन के सिर पर दे मारी । उस क्षण उसने सोचा भी नहीं था कि उसके हाथों एक हत्या होने जा रही है । उसने तो यह भी नहीं देखा था कि कुल्हाड़ी की धार किधर है। संयोगवश कुल्हाड़ी उल्टी थी मगर उल्टी कुल्हाड़ी का वार पड़ते ही फुग्गन धराशयी हो गया । उसने तत्काल दम तोड़ दिया । यद्यपि, कीरत को बहुत देर बाद थाने में पता चला था कि फुग्गन ने उसी समय दम तोड़ दिया था। सुखबाई को इस घटना का पता उस समय चल जब गंाव का ही एक आदमी दौड़ा-दौड़ा आया और उसने हंाफते-हंाफते बताया कि कीरत पुलिस चैकी में है क्योंकि उसने फुग्गन को मार डाला है। यह सुन कर सिहर गई थी सुखबाई। हे भगवान! ये क्या कर डाला कीरत ने! वह एक बार फिर थरथर कंापने लगी थी । 
कीरत का मुकद्दमा बना उधार के लेन-देन के कारण हुई हत्या का। फुग्गन के पुलिवालवालों के वकील ने कहा कि कीरत ने फुग्गन ने बड़ी रकम उधार ली थी। जब फुग्गन ने वह रकम वापस मंागी तो कीरत ने उसकी हत्या कर दी । फुग्गन के रिश्तेदार नहीं चाहते थे कि फुग्गन की मौत के बाद उसकी बदचलनी खुलेआम चर्चा का विषय बने, इससे उनकी साहूकारी-साख को धक्का लगता। कीरत ने भी सुखबाई वाले मामले को दबा रहने दिया। आखिर जोरू की इज्जत घर की इज्जत होती है। लोग तो यही मान बैठेंगे कि सुखबाई अपनी इज्जत नहीं बचा पाई । इससे बेटे-बेटियों का भविष्य  भी चैपट हो जाएगा । न कोई बहू देगा और न कोई बेटी लेगा । कीरत ने अदालत में सज़ा सुनाए जाने से पहले ज़ेल में सुखबाई को समझाया था कि फुग्गन ने तुम्हारे साथ क्या किया, इस पल पर्दा पड़े रहने देना । मन न होते हुए भी सुखबाई ने कीरत की बात मान ली थी और अपना मुंह बंद रखा था । फिर भी उंगली उठाने वालों की कहीं कोई कमी होती है भला ? लोगों ने यहंा कह डाल कि कीरत ने कर्ज न चुकाना पड़े इसके लिए फुग्गन से सुखबाई का सौदा भी करना चाहा था मगर फुग्गन न माना और बात बिगड़ गई । 
सुखबाई सब कुछ चुपचाप झेलती-सहती रही । इसके अलवा उसके पास और कोई चारा भी न था । कीरत के जेल चले जाने से दद्दा टूट गए । वे बीमार रहने लगे। दद्दा ने सुखबाई से बोलना बंद कर दिया था । जो भी बात कहनी होती वे बच्चों के माध्यम से कहते । दद्दा भी सुखबाई को उस अपराध की सज़ा दे रहे थे जो उसने किया ही नहीं था। मगर दद्दा की दृष्टि में सुखबाई का औरत होना ही सबसे बड़ा अपराध था। किसी मेल-मुलाकात करने वाले के घर आने पर वे सुखबाई को सुना-सुना कर कहते, ‘मरद के लिए जोरू सबसे बड़ी अभिशाप होती है, जारू न होए तो मरद को कोई कष्ट न होए...जारू खुद तो हरियाती है पर मरद को सुखा-सुखा कर ठूंठ कर देती है.... ।’
दद्दा की जले-कटे उद्गार सुन कर सुखबाई का जी करता कि वह भी तमक कर पूछे कि तुम्हारी जोरू न होती तो कीरत कहंा से पैदा होता? और, जो मैं न होती तो तुम्हारे वंश का नामलेवा कहंा से आता ? मगर वह चुप रहती, यह सोच कर कि इस बूढ़े बाप ने जवान बेटे को ज़िन्दगी भर के लिए जेल जाते देखा है, कहीं, किसी पर तो भड़ास निकालेगा ही। फिर भी, इस तनाव भले वातारण में सुखबाई के भीतर की औरत तिल-तिल कर के मर रही थी, भावनाओं के स्रोत सूखते जा रहे थे और जीवन बस, जीने के लिए जीना पड़ रहा था।
यही गनीमत थी कि सुखबाई के एक भाई ने उसका साथ दिया और बीच-बीच  में आ कर देख-भाल करने लगा । इसलिए स्थिति दयनीय होने से बच गई । धीरे-धीरे समय व्यतीत होता गया और बच्चे बड़े होते गए। लेकिन जेल से पहले पेरोल पर घर आए कीरत की छवि सुखबाई को इतनी अपरिचित लगी कि उसका मन तय ही नहीं कर पाया कि वह किस तरह अपना पत्नीधर्म निभाए। कीरत झुंझला उठा था उसकी उत्साहहीनता पर। जबकि सुखबाई ये सोच  कर हतप्रभ थी कि शाम को दद्दा की चिता फूंक कर आए कीरत का मन कैसे हो रहा है कुछ भी करने का ? माना कि कीरत को दो दिन बाद वापस जेल लौट जाना था मगर शाम को ही तो दद्दा की...। 
वे कुल तीन रातें बड़े कष्ट से बीती थीं । कुछ भी तो अच्छा नहीं लग रहा था सुखबाई को । शरीर भी साथ नहीं दे रहा था, सब कुछ पत्थर हो चुका था। सारा उत्साह, सारी ललक और उत्तेजना चूल्हे की उस राख की तरह ठंडी पड़ चुकी थी जिसमें अंगारे का एक नन्हा-सा टुकड़ा भी शेष न बचा हो, एकदम ठंडी राख।
यही हाल रहा, जब-जब कीरत परोल पर घर आया। मूरत के विवाह के समय  कीरत ने अवसर पाते ही सुखबाई को ढेर सारा उलाहना दे डाला था।
‘मेरे जेल जाते ही मेरी तरफ से मन फेर लिया न, सुक्खू ! तुम औरतजात ऐसी ही होती हो, तुम्हें तो रोज-रोज मिलने वाल मरद चाहिए, है न !’ कीरत ने जले-भुने स्वर में कहा था।
‘राम-राम! कैसी बातें करते हो, लाज नहीं आती ? जब से तुम जेल में जा के बैठे, मेरा तो मन ही मर गया है। अब तो जी ही नहीं करता है।’ अकुला कर बोली थी सुखबाई।
‘मुझे देख कर भी ? अपने पास पा कर भी ?’ तनिक नरम पड़ा था कीरत।
‘हंा!’ स्वीकार करते ही सुखबाई ने इतना और जोड़ दिया था, ’मगर तुम जो चाहो करो, मुझे मना नहीं है।’
वह कहना तो यह चाहती थी कि तुम आते हो तो किसी साहूकार की तरह अपना अधिकार वसूलते हो और फिर महीनों के लिए अकेली छोड़ कर चले जाते हो। भूख-प्यास तो तुम्हारे जाने के बाद भी लगती है, कैसे जीती हूं मैं, ये भी तो सोचो ! 
उसके बाद न तो कीरत ने उससे कुछ कहा, सुना और न सुखबाई ने। बड़े हो चले बच्चे सुखबाई को उपेक्षा का शिकार बनाने लगे। उन्हें भी लगने लगा कि जीवन की इस गड़बड़ में अगर बाप दोषी है तो मंा भी दोषी है, सज़ा उसे भी मिलनी चाहिए थी।
‘इससे तो अच्छा था कि तुम भी जेल जा बैठतीं, कम से कम कहने को तो रहता कि हम अनाथ है....’ किसी बात पर भड़क कर सूरत ने उसे ताना मारा था । 
‘हमारे पीछे तो कोई नहीं आता है, तुम्हारे पीछे फुग्गन क्यों पड़ा था....’ बेटी आरती ने अपनी सच्चरित्रता तो स्थापित करते हुए सुखबाई पल कीचड़ उछाल दिया।

जेल से छूटे उसे दो सप्ताह हो चले हैं मगर इन कुल चैहद दिनों में उसके और सुखबाई के संबंधों में वह जीवन्तता नहीं आ सकी, जैसी कि उसके जेल जाने से पहले हुआ करती थी । शायद उम्र बढ़ चली है? नहीं, सुखबाई को कीरत के निकट जाने में भी हिचक होती। यदि पत्नी धर्म निभाना उसकी विवशता न होती तो वह कीरत से कह ही देती कि चलो हम दोनों भाई-बहन की तरह रहें। हमारे बीच पति-पत्नी जैसा कुछ भी न रहे । मगर यह कह पाना संभव नहीं था । जबकि उतना ही दरूह था अपने भीतर पहले जैसी कल-कल करती नदी को ढूंढ पाना । पहली रात, दूसरी रात, तीसरी रात...बस, कीरत के  धैर्य का बंाध टूट गया। उसने सुखबाई से कह ही दिया-‘ऐसा लगता है कि तुम बदल गई हो ! मुझसे घिन आती है तुम्हें ?’
‘नहीं तो ?’ सुखबाई ने सिर झुका कर कहा ।
‘तो फिर ?’कीरत ने पूछा ।
‘फिर क्या ?’ नासमझ की तरह बोली थी सुखबाई ।
‘तुम हमसे दूर-दूर काहे भागती हो?’ झुंझला कर बोला था कीरत,‘तुम यही सोचती हो न कि एक हत्यारे के साथ कैसे रहा जाए?’
‘नहीं-नहीं, कैसी बातें करते हो ?....वो तो अब मन नहीं करता...बहुत साल गुज़र गए न !...अब हम नाती-पोते वाले हो चुके हैं...बहू बातें बनाएगी...पराए घर की लड़की है....’ सुखबाई ने झिझकते हुए कहा था। सुखबाई का कथन कुछ प्रतिशत सच था ल्ेकिन उससे बड़ा सच  था कि अब सुखबाई को संसर्ग में रुचि  ही नहीं रह गई थी। संसर्ग के मामले में बारह बरस का लगभग बैरागी जीवन बिताने के बाद तन-मन की सूखी बेल भला कैसे हरिया पाती। 
सुखबाई की बात सुन कल कीरत को बड़ी ठेस पहुंची थी । उसके ल्एि तो मानो उसके घर का समय  बारह साल से जहंा के तहंा ठहरा हुआ था, मगर नहीं, सुखबाई ने उसे याद दिला दिया कि समय  बहुत दूर निकल चुका है । बीती हुई उम्र लौट कर नहीं आएगी । स्रोत सूख चुके हैं, मौसम हमेशा के लिए बदल चुका है, अब नदी-ताल फिर कभी नहीं भरेंगे । संकेत में ही सही ल्ेकिन सुखबाई ने जता दिया था कि अब तो शेष जीवन सूखा और बंजर ही झेलना है । उफ ! यह सज़ा भी उसके हिस्से में लिखी हुई थी, कीरत फफक-फफक कर रोता रहा था ।
‘तुमने हमें जेल में ही क्यों नहीं बताया कि हम बुढ़ा गए हैं ...हम अपनी रिहाई ठुकरा देते और कह देते कि हमें जेल में ही रहना है!’ कलपते हुए बोल उठा था कीरत ।
सुखबाई उसका रोना देख कल रूंआसी हो उठी थी। सज़ा वह भी तो भोग रही थी। 
एक-दूसरे के प्रति पछतावे और सहानुभूति के बाद भी संबंधों में ठंडक बनी रही । 
सुखबाई ने एक बात और भी ध्यान दी थी कि जेल से लौटने के बाद कीरत बड़ी-बड़ी बातें करने लगा था, कुछ-कुछ संतो-महात्माओं जैसी। वैसे कीरत ने बताया था कि कीरत को ये ज्ञान रामसिंह लोधी ने दिया था । रामसिंह लोधी कीरत के समान जेल में सज़ा काट रहा था। सब उसे लोधी दादा कह कर पुकारते थे । वह ऐसे ही ज्ञान-ध्यान की बातें करता था । जबकि लोधी दादा को पता था कि वह खुद कभी जेल से आज़ाद नहीं हो पाएगा। उसे कोई बीमारी लग चुकी थी। कौन-सी बीमारी ? यह कोई नहीं जानता था। वह एक मामूली तबके का अपराधी था, कीरत के समान । वह न तो राजनीति से जुड़ा हुआ था और न किसी बड़े अपराधी दल से । उसकी खैर-ख़बर लेने वाला कोई नहीं था। उसे तो ऐड़ियंा रगड़ते हुए जेल में ही दम तोड़ना था । कीरत उसके लिए चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था । वह खुद ही लाचार था ।
क्या नहीं सहा कीरत ने जेल में ? उसने सिपाहियों की गालियंा सुनी, बिना बात के उनसे लात-जूते खाए, दादा-टाईप कैदियों के लिए गुलाम जैसे काम किए । यहंा तक कि उसने उनकी देह पिपासा शंात करने के लिए औरत की भूमिका भी निभाई। अपने पौरूष के विरूद्ध जब उसने पहली बार यह पीड़ा झेली तो उसके मन ने उससे देर तक पूछा था कि क्या यह सज़ा भी उसके आजन्म कारावास की सज़ा में शामिल है? सज़ा का काग़ज़ लिखते समय क्या इसे भी जज साहब ने उसके नाम दर्ज़ कर दिया था ? क्या उसे फुग्गन का सिर उल्टी कुल्हाड़ी से फोड़ते समय इस बात का अहसास था कि जेल में उसे क्या-क्या भुगतना होगा? कदापि नहीं! लेकिन अगर उसे इन सब सज़ाओं का ज़रा-सा भी अहसास होता तो क्या वो फुग्गन का सिर नहीं फोड़ता? ज़रूर फोड़ता। इस तरह की ढेरों बातें करता, बताता रहता कीरत । सुखबाई उसकी भोगी हुई कठिनाइयों को महसूस करने का प्रयत्न करती और सिहर-सिहर जाती ।
कीरत और सुखबाई के भाग्य में एक सज़ा और ल्खिी हुई थी जिसका उन्हें अनुमान भी नहीं था । यह सज़ा सुनाई उनके अपने बेटे सूरत ने ।
‘अम्मा, बापू से कह दइयो के वे कहूं चले जाएं। काए से के हमाए ससुर साब ने मूरत के लाने एक लड़की देखी है ...और हमाए ससुर साब जे नई चाहत हैं के ब्याओ की बेला में बापू इते रहें ।’ सूरत ने दो टूक शब्दों में सुखबाई से कह दिया था ।
‘पर बेटा....’
‘नई अम्मा, तुम कछु न बोले ! हमाए खयाल से भी जेई ठीक रैहे । अखीर बापू हत्या के जुर्म में जेल काट के आए हैं।’ सूरत ने कहा और सुखबाई को कुछ बोलने का अवसर दिए बिना ही वहंा से चला गया। 
सुखबाई ही जानती थी कि सूरत उसे किस मुसीबत में फंसा गया है । आखिर जिस इंसान ने उसकी अस्मत का मान रखने के लिए हत्या की और बारह बरस की लम्बी अवधि जेल में तिल-तिल कर काटी उससे कैसे कह दे वह कि तुम फिर कहीं चले जाओ क्योंकि तुम्हारे बेटे का ब्याह होने वाला है । क्या कहे ? कैसे कहे ? उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया अतः उसने दो-तीन दिन चुप रह कर व्यतीत कर दिए । इधर सूरत ने देखा तो वह सुखबाई पर बिगड़ उठा । उसने साफ-साफ कह दिया कि वह अपने हत्यारे बाप के लिए अपने निर्दोष भाई की ज़िन्दगी बरबाद नहीं कर सकता है । इस पर सुखबाई ने वादा किया कि वह कीरत से इस बारे में बात करेगी। 
‘सूरत कह रहा था कि उसके ससुर ने मूरत के लिए लड़की देखी है....’
‘अरे वाह ! ये तो अच्छी बात है ।’ कीरत ने खुश हो कर कहा ।
‘मगर...लड़की वाले ब्याह में हिचक रहे हैं ....’
‘क्यों ?’
‘वे सोचते हैं कि तुम अब घर में ही रहोगे तो...’ इसके आगे सुखबाई ने बात अधूरी छोड़ दी। पूरा कहने को कुछ था भी नहीं। बिना कहे भी कीरत बात समझ गया। लड़की वाले भला उस घर में अपनी बेटी को भेजने में हिचकेंगे ही जहंा एक हत्यारा रह रहा हो ।
कुछ देर चुप रहा कीरत। सुखबाई भी चुप रही। वह कीरत के उत्तर की प्रतीक्षा करती रही। कीरत ने अप्रत्याशित-सा प्रश्न किया-‘कितने दिनों के लिए जाना होगा मुझे ?’
‘तुम्हें ?’ सुखबाई हिचकिचाई ।
‘हंा, शादी वाले घर में औरतों के लिए ज्यादा काम रहता है । तुम्हारा यहीं रहना ठीक होगा ! ’ कीरत ने कहा ।
 ‘नहीं, मेरा भी यहां कोई काम नहीं है। मैं तुम्हें अकेले नहीं जाने दूंगी । मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी ।’ सुखबाई ने आग्रह किया । उसका ये आग्रह दिखावा नहीं था । वह कीरत का साथ देना चाहती थी। बंजर हो चुकी धरती भले ही फिर न हरियाएगी लेकिन एक-दूसरे के साथ की नमी तो उन्हें भिगोए रखेगी। 
 आवेश में घटी एक घटना कितनी दूर तक अपना असर छोड़ती है, इसका प्रमाण सुखबाई और कीरत की ज़िदगी के इस मोड़ पर साफ़-साफ़ देखा जा सकता था। सुखबाई और कीरत अपना-अपना सामान बांधने लगे। सामान भी क्या था, चार जोड़ी कपड़े और उनकी अपनी धार्मिक आस्था से जुड़ी कुछ वस्तुएं। कबिरहा साधू के बोल सुखबाई के होठों पर तैर गए और वह सामान बांधती हुई गुनगुनाने लगी।
सांझ पड़े दिन बीतबै, चकवी दीन्ही रोय
चल चकवा वा देस को, जहां रैन नहिं होय .....
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