मंगलवार, दिसंबर 03, 2013

स्लेव मार्केट

 कहानी
- डॅा. शरद सिंह

(मेरी कहानी ‘स्लेव मार्केट’ ‘गवर्नेंस नाउ’ पत्रिका, 1-15 सितम्बर 2013 में प्रकाशित हुई थी...आप भी इसे पढ़े.....)

आज सुबह से उसका मन खिन्न था। इसीलिए उसने अपने नाश्ते में फेरबदल कर लिया। गोया नाश्ता बदल लेने से हालात बदल जाएंगे। वह जानती थी कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है फिर भी उसने तयशुदा नाश्ता करने के बजाए दो किलोमीटर अधिक दूर जा कर दूसरा नाश्ता करने की ठानी।
‘वन मोमोज़ प्लीज़ !’ रेस्तरां में पहुंच कर उसने बैरे को आदेश दिया ही था कि उसके कानों से एक आवाज़ टकराई।
‘नो-नो! नाॅट वन...टू मोमोज़...प्लीज़...!’
नमिता ने देखा कि उसकी मेज से लगभग सट कर आयुषी खड़ी थी। आयुषी को देख कर नमिता का मूड और खराब हो गया। यह यहां भी चली आई...मगर क्यों? कैसे? मेरा पीछा कर रही थी क्या?
‘हाई! गुडमाॅर्निंग आयुषी! यहां कैसे? आज इडली-सांभर को डिच कर दिया?’ मन ही मन कुढ़ती हुई नमिता ने पूछा। आयुषी रोज़ सुबह के नाश्ते में इडली-सांभर ही खाना पसंद करती है। वह भी इस फंडे के साथ कि जब तक यहां हो तक तक इडली-सांभर का आनंद ले लो हो सकता है यहां से निकलने पर छोटे-कुल्छे पर जि़न्दा रहना पड़े।
‘नहीं, ऐसा तो नहीं! इडली-सांभर खा चुकी हूं....एक्चुअली, वही खा कर निकल रही थी कि तू दिखाई दी...पैदल-पैदल इधर आती हुई...मुझे आश्चर्य हुआ तो तुझे फाॅलो करने लगी....बस्स! मगर सोचती हूं कि एकाध मोमोज़ भी खा लूं फिर आज ही दोपहर बाद चैन्नई के लिए निकलना है....यू नो, तैयारी तो पूरी हो गई है फिर भी फ्रेन्ड्स से मिलते-मिलाते लंच तो छूट ही जाएगा।’ आयुषी ने इत्मीनान से बैठते हुए कहा।
‘यू लकी...’ नमिता के मुंह से निकला और फिर उसने अपने दांतों तले अपनी जीभ दबा ली। उफ! ये क्या कह बैठी वह। अब आयुषी को लगेगा कि नमिता बुरी तरह हताश है। नमिता स्वयं को कोसने लगी।
‘डोंटवरी नमि! आई श्योर दैट नेक्स्ट टाईम इज़ योर! मुझे भी दुख है तुम्हारे लिए....हम दोनों एक साथ चलते तो कितना मज़ा आता, है न!.... बट, मुझे विश्वास है कि अगला सिलेक्शन तुम क्लियर कर लोगी!’ आयुषी ने वही सब कहा जिसका डर था नमिता को। उसका मन बुझ-सा गया।
‘इट्स ओके, आयुषी!’ नमिता ने स्वयं को सम्हालते हुए कहा। तभी बैरा मोमोज़ ले आया। इस रेस्तारां के ए.सी. चैम्बर में सर्विंग सुविधा दी जाती थी। वरना ए.सी. चैम्बर के बाहर सेल्फ-सर्विस थी। निःसंदेह, यह सुविधा सेल्फ-सर्विस की अपेक्षा मंहगी थी और इसका आनन्द ‘डेट’ पर रहने वाले युवा ही ‘अफोर्ड’ करते थे, शेष नहीं। 
       

बैंगलोर शहर मंहगा भी है और सस्ता भी। थोड़ा-सा कष्ट उठा कर बचत कर लो तो सस्ता है वरना मंहगाई के एक से एक आयाम भी आसानी से देखे जा सकते हैं। नमिता, आयुषी और उसके दोस्त अकसर बचत पर ही चलते थे। लेकिन आज नमिता को बचत का विचार नहीं आ रहा था और न आयुषी को। भले ही दोनों के अपने-अपने अलग कारण थे। आयुषी ने स्वर्णिम भविष्य की ओर क़दम उठा दिया था जब कि नमिता तो उस मनःस्थिति में थी कि जिसमें कोई भी युवा हताशा से भर कर किसी भी तरह का ग़लत क़दम उठा सकता है। एक अच्छे कैरियर का उसका सपना कल देर शाम को ही टूटा था जब उसने रिजल्ट-वाॅल पर टंाकी गई सूची में अपना नाम नहीं मिला। वह स्तब्ध रह गई थी। उसे विश्वास नहीं हुआ था कि उसके साथ ऐसा भी हो सकता है। उसका साक्षात्कार, उसकी प्रस्तुति...सब कुछ तो ठीक थे...फिर क्या हुआ?
नमिता भाग कर रिसोर्स आॅफीसर के पास पहुंची थी। 

‘सर! मेरा नाम लिस्ट में क्यों नहीं?’ उसने हांफते हुए पूछा था।
‘योर नेम प्लीज़!’ रिसोर्स आॅफीसर ने सपाट चेहरे के साथ पूछा था।
‘नमिता! नमिता सिंह बुन्देला!’
‘मिस बुन्देला.....ओ या ा ा ह! आपका नाम लिस्ट में नहीं है। आपका सिलेक्शन नहीं हुआ है।’ परिणाम-सूची देखते हुए रिसोर्स आॅफीसर ने अपने चेहरे की भांति सपाट स्वर में उत्तर दिया।
‘बट् सर! हाऊ इट इज़ पाॅसिबल....!’
‘एवरीथिंग इज़ पाॅसिबल इफ यू हेवन्ट परफार्म बैटर! ...यस, आप बैटर ट्वेन्टी फाईव में नहीं आ सकीं।’
‘बट....’
‘यू मे गो नाऊ!’ रिसोर्स आॅफीसर ने घूरते हुए कड़े स्वर में कहा।

सब कुछ ख़त्म! नमिता ने रिसोर्स आॅफीसर के कमरे से बाहर आते हुए सोचा था। जैसे ही यह ख़बर घर पहुंचेगी वैसे ही कोहराम मच जाएगा। मां का सपना टूट जाएगा। पापा को सदमा पहुंचेगा। हंा, मंा चाहती थीं कि नमिता अपना कोर्स समाप्त करते ही किसी अच्छी कम्पनी में अच्छे पैकेज़ पर नौकरी पा जाए जिससे तत्काल उसे अच्छा रिश्ता मिल जाए ....और वे अपनी बहन की बेटी के मुक़ाबले उसे बेहतर साबित कर सकें। पिछले साल उनकी बहन की बेटी का नोएडा में एक मल्टीनेशनल कम्पनी में चुनाव हुआ था जिसके कारण उनकी बहन ने बहुत अकड़ दिखाई थी।
पिता भी यही चाहते हैं कि नमिता ने जब बैंगलोर जा कर पढ़ने में इतना पैसा खर्च किया है तो वहां से वह किसी बडे़ पैकेज़ में ही जाए ताकि वे शान से अपनी बेटी की उपलब्धि का प्रचार-प्रसार कर सकें। आखिर समाज-परिवार में इससे उनका रुतबा बढ़ेगा और मल्टीनेशनल कम्पनी में हाई-पैकेज़ में काम करने वाली उनकी बेटी के लिए बेहतर रिश्तों की बाढ़ आ जाएगी। 
                    

नमिता रात भर यही सोचती रही कि अपने मां-पापा से रिजल्ट कैसे छिपाया जाए और सेमेस्टर दोहराने के पीछे कौन-सा कारण बताया जाए। रात भर नींद नहीं आई उसे। डर था कि उसकी बेस्ट फ्रेंड आयुषी ही उसका भेद न खोल दे। उसका चयन हो गया था। वह नहीं भी बताएगी तो उसके पेरेन्ट्स ढिंढोरा पीटने से बाज़ नहीं आएंगे कि ‘बुन्देला साहब की बेटी नमिता रह गई और हमारी आयुषी को पैकेज़ मिल गया।’

‘क्या सोच रही हो? मोमोज़ ठंडा हुआ जा रहा है! खाना नहीं है क्या?’ आयुषी ने नमिता को टोका जो पिछली शाम और रात की बातों को याद कर के परेशान हो उठी थी।
‘सोच रही हूं कि मां-पापा को पता चलेगा तो वे क्या रिएक्ट करेंगे?’
‘हूं! है तो बात सोचने की!....वैल, तू कह देना कि यह कम्पनी तुझे सूट नहीं कर रही थी...सो, तूने अपना परफार्मेंस जानबूझ कर बिगाड़ा...वे कनविन्स हो जाएंगे।’ आयुषी ने एक तार्किक बहाना सुझाया। नमिता को भी यह बहाना ठीक लगा। आखिर कोई तो सफ़ाई देनी ही पड़ेगी उसे, तो यही सही।
‘तू ठीक कहती है....यही कहूंगी मैं!’ नमिता ने आयुषी का बहाना खुले मन से स्वीकार कर लिया।
‘गुड गर्ल! जल्दी खाओ, फिर मेरे साथ चलो, मुझे अभी कई लोगो से मिलना है।’ आयुषी ने कहा।
‘साॅरी आयुषी, मैं तेरे साथ नहीं चलुंगी! मैं अकेली रहना चाहती हूं!’
‘लेकिन.....’
‘आयुषी, जानती है...कल जब मैं जाॅब-फेयर की लम्बी कतार में खड़ी थी तो मुझे ‘स्प्रिंग ब्वायज़’ मूवी याद आ रही थी। जैसे उस मूवी में अनाथ बच्चे अपने-आप को बेहतर साबित करने की कोशिश करते है और हरेक बच्चा सोचता है कि गोद लेने वाले उसके परफार्मेंस से प्रभावित हों और उसे ही गोद ले लें।.....क्या हम भी वैसे ही नहीं हैं? नहीं, शायद हम उन अनाथ बच्चों जैसे नहीं बल्कि उन स्लाव्स.....उन मध्ययुगीन गुलामों जैसे हैं जो परिस्थितिवश गुलाम-बाज़ार में जा पहुंचते थे और इसी उम्मींद में खड़े रहते थे कि हमें एक अच्छा मालिक मिल जाए....जो हमसे भले ही मनचाही मेहनत खरीद ले मगर बदले में हमें इतना पैसा दे दे कि हम अपने परिवार और समाज केा जता सकें कि गुलामी कितनी अच्छी, कितनी सुखद चीज़ है।’ नमिता ने अपने मन की बात आयुषी के सामने उंडेल दी।
‘माई गाॅश! ये सब तुम क्या सोच रही हो?’ चैंक गई आयुषी। वह बोली, ‘हम गुलाम नहीं हैं, हम मर्जी से जाॅब चुन रहे हैं। फिर दोष किसी और को क्यों?’

    

‘हंह! हमारी मर्जी? व्हाट ए फुलिश थॅाट....हम सोच ही कहां रहे हैं....हम तो एक बहाव में बह रहे हैं...कैरियर, पैकेज़, मल्टीनेशनल कम्पनी....यही तो माहौल है....हम इस माहौल के गुलाम है। यू नो आयुषी! शायद तूने कभी पढ़ा हो कि लार्ड मैकाले ने एक शिक्षानीति बनाई थी जिसे देश में ‘बाबू बनाने की नीति’ कहा गया और इस नीति को ले कर लार्ड मैकाले को हमेशा कटघरे में खड़ा किया गया.....आज तो कोई ऐसी नीति नहीं है जो हमें एक ही दिशा में जाने को मजबूर करे, फिर भी हम एक ही दिशा में जा रहे हें न....बिलकुल भेड़ों के समान...’
‘लार्ड मैकाले? ये सब तू क्या बके जा रही है....आर यू ओके?’ आयुषी ने चिन्तित होते हुए पूछा। वह नमिता की बातें सुन कर अब घबराने लगी थी।
‘आई एम फाईन! यस! एब्सोल्यूटली फाईन....बट वी आर स्लाव....इट इस एक ट्रुथ...ब्लैक ट्रुथ!’ नमिता अपनी ही रौ में बोलती चली गई।
‘नो! यू आर नाॅट ओके! तू मेरे साथ चल! मन बहल जाएगा।’ बैरे का बिल चुकाती हुई आयुषी उठ खड़ी हुई।
‘नहीं, मैं तेरे साथ कहीं नहीं जाऊंगी। तू जा और इन्ज्वाय कर! तू तसल्ली रख, मैं ठीक हूं। एकदम ठीक!’ नमिता ने शांत स्वर में आयुषी से कहा। अब वह अपने मन को हल्का पा रही थी। इन्हीं बातों ने उसके मन को दबा रखा था। ये बातें मन से बाहर निकल आईं तो मन पर से बोझ भी हट गया। कम से कम अगले जाॅब-फेयर तक।
‘तू जा, मैं बिलकुल ठीक हूं!’ नमिता ने एक बार फिर आयुषी को आश्वस्त किया।
‘पक्का!’
‘एकदम पक्का! मैं ठीक हूं और ठीक ही रहूंगी....और अगले स्लाव-मार्केट...आई मीन जाॅब-फेयर में खड़ी होने से पहले तुझसे जरूरी टिप्स ले लूंगी। प्राॅमिस!....अब तू जा वरना तुझे देर हो जाएगी!’ नमिता ने उठ कर आयुषी को गले लगाते हुए कहा।
असमंजस में डूबी आयुषी को देर होने का विचार आया और वह हड़बड़ा कर नमिता से विदा ले कर रेस्तरां के बाहर लगभग दौड़ पड़ी। रेस्तरां से बाहर निकलते समय नमिता ‘स्लाव-मार्केट’ के अपने विचार पर मुस्कुरा दी।  उसके इस विचार ने ही तो उसे उन अंधेरों से बाहर निकाल लिया था जिन अंधेरों के कारण कल की असफलता के बाद उसके मन में घातक विचार उठ रहे थे। एक बार तो यह भी विचार आया था कि वह अपने छात्रावास की छत से छलांग लगा दे। मां-पापा को सच बताने से तो यही बेहतर लगा था उसे। फिर दूसरे ही पल विचार आया था कि  सच तो फिर भी मां-पापा के सामने आ ही जाएगा। टाल दिया था उसने आत्महत्या का विचार। ठीक ही रहा नहीं तो न तो सुबह होती, न ही आयुषी मिलती और न उसे इतना अच्छा बहाना सुझाती।
नमिता अपने मन को तैयार करने लगी कि जब उसके पापा उससे पूछेंगे कि आयुषी का चुनाव हुआ मगर तेरा क्यों नहीं? तो यही कहूंगी कि पापा! वह मालिक मुझे पसन्द नहीं आया था!
नमिता एक बार फिर यह सोच कर मुस्कुरा दी कि शायद आज के समय में ऐसे ही मुस्कुराया जा सकता है।  
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4 टिप्‍पणियां:

  1. वर्तमान का वास्तव दर्शन। उच्च विद्याविभुषित युवा वर्ग एक अच्छी नौकरी की तलाश में अपने गुलामी के दर्द को महसूस कर रहा है। आज भी कई छोटे-बडे शहरों में मजदूरी करवाने के लिए किराए पर मजदूर दो-चार दिन के लिए मिल जाते है। 'कामगार चौक', 'मजदूर चौक' जैसे कई बाजार है। अब शिक्षितों का 'स्लेव मार्केट'। ऊपर से हम किताना भी मन को बहाला-फुसला दे, दुनिया को मुर्ख बनाएं पर अपना अंतकरण हम गुलाम बाजार में खडे हैं बता देता है।

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  2. आपने अपने अमूल्य विचारों से अवगत कराया....आभारी हूं.....

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