बुधवार, अप्रैल 18, 2012

भिखारी (लघुकथा)

-डॉ. शरद सिंह


वह भिखारिन थी। जवान और सुन्दर भिखारिन। 
वह एक कार के पहुँची और उसने कार के भीतर बैठे आदमी से गिड़गिड़ाते हुए कहा- "दो दिन से इस पापी पेट में अन्न का एक भी दाना नहीं पड़ा है....कुछ दे दो बाबूजी !...भगवान तुम्हारा भला करेगा, बाबूजी ! "
भिखारिन की बात सुन कर कार में बैठे हुए आदमी ने एक भरपूर नज़र भिखारिन के शरीर पर डाली और ललचाए हुए स्वर में बोला-" ...और बदले में तुम मुझे क्या दोगी ?"
यह सुनते ही भिखारिन ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा- "धत् तेरे की ! मैं भी किस भिखारी से भीख माँगने लगी ?"
......और उस आदमी ने झेंप कर अपनी कार आगे बढ़ा ली।











































































































13 टिप्‍पणियां:

  1. भिखारिन का अच्छा जवाब ...और पुरुष मानसिकता को कहती अच्छी लघु कथा

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  2. सच में, भिखारियों से क्यों भीख लेना..

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  3. कई धनाढ्य महिलाओं और लड़कियों को इस तरह भीख देने की बातें सुनी है....
    वो बहुत अमीर है सलाम इस भिखारिन को....
    और सलाम आपकी इस नयी-नवेली सोच को

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  4. बहुत करारा जवाब......इस जवाब से मैं भी मोहित हो हो गया हूँ उस भिखारन पर....अमीरों की मित्रता भली होती है ना....!!

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  5. उसका भीख माँगना मन को उद्विग्न करता है,युवती है कर्मण्य क्यों नहीं है, दूसरों की दया पर क्यों निर्भर है !

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  6. पुरुष मानसिकता दर्शाती अच्छी लघु कथा.

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  7. पुरुस सदियों से ऐसा ही है ...कोई विस्मय कीई बात नहीं है ...हाँ अब औरत जरूर बदल रही है
    तभी तो करार जबाब मिला

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  8. कम शब्दों में गहरा सन्देश...एक अच्छी लघु कथा...प्रतिभा जी की बात भी सही है...

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  9. इस लघु कथा के माध्यम से आर्थिक विकास के साथ साथ समाज में तेजी से फैल रही रही गन्दी मानसिकता पर करारा व्यंग

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  10. छोटी सी घटना बहुत कुछ कह जाती है. करारा व्यंग आज की गिरती बीमार होती मानसिकता पर.

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