शुक्रवार, नवंबर 26, 2010

महिला साक्षरता (लघुकथा )

- डॉ. शरद सिंह     

साक्षरता केन्द्र में गुरू जी ने महिलाओं को पढ़ाना प्रारम्भ किया। आज जो पाठ वे पढ़ाने जा रहे थे उसका शीर्षक था-‘महिलाओं के अधिकार’।
     पढ़ाते-पढ़ाते गुरू जी ने देखा कि पढ़ने वाली महिलाओं के बीच माथे तक घूंघट काढ़े उनकी बीवी भी बैठी है। उसे देखते ही गुरू जी झल्ला पड़े और उन्होंने अपनी बीवी को डपटते हुए कहा-‘क्यों री! तू यहां क्या कर रही है? यहां तेरा क्या काम है? तू अगर यहां बैठी रहेगी तो वहां घर पर बच्चों को कौन सम्हालेगा? गाय-गोरू को कौन चारा-पानी देगा? कौन खाना पकाएगा? जा, भाग यहां से!’
      गुरू जी के क्रोध से डर कर उनकी बीवी चुपचाप वहां से उठ कर चली गई और गुरू जी ने अपने केन्द्र की साप्ताहिक रिपोर्ट में लिखा-‘इस सप्ताह का साक्षरता कार्यक्रम शतप्रतिशत सम्पन्न हुआ।’

8 टिप्‍पणियां:

  1. यही विसंगति है हमारे समाज की ...बाहर उपदेश और घर में क्लेश

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  2. धन्यवाद संगीता स्वरुप जी!विचारों की सहमति बड़ा सम्बल प्रदान करती है और कुछ कर गुज़रने का हौसला देती है।

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  3. कहानी तल्ख़ वास्तविकता – को सहज ढ़ंग से बेपर्द करती है।

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  4. धन्यवाद मनोज कुमार जी!आपका स्वागत है।

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  5. वाह। सार्थक और स्वाभाविक सी लघुकथा के लिए धन्वाद।

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  6. यह बात समाज के हर कोने में है। हम जो कहते उसे बहुत कम अमल करते हैं।

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