गुरुवार, दिसंबर 05, 2019

देशबन्धु के साठ साल-7- ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय ब्लाॅग मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की टिप्पणी सहित लेखमाला की  सातवीं कड़ी....

Lalit Surjan
देशबन्धु के साठ साल-7
- ललित सुरजन
कुछ ज्ञान-कुछ विज्ञान देशबन्धु का एक लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ था। इसकी परिकल्पना प्रो. वी.जी. वैद्य ने की थी। नामकरण भी उन्होंने ही किया था। प्रो. वैद्य रायपुर के शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय (अब एनआईटी) में रसायनशास्त्र के प्राध्यापक थे। आम अध्यापकों के विपरीत उनकी लिखने-पढ़ने में दिलचस्पी थी; वे कैंपस के बाहर की हलचलों में भी दिलचस्पी रखते थे; और खाली समय में भी व्यस्त रहने के कारण निकाल लेते थे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने रविशंकर वि.वि. में छात्रों के लिए फोटोग्राफी की निशुल्क कक्षाएं संचालित कीं। कुछ साल बाद वे पुणे चले गए तो वहां तर्कर्तार्थ लक्ष्मण शास्त्री जोशी की मराठी विश्वकोष परियोजना से जुड़ गए। उन्होंने प्रसिद्ध वैज्ञानिक जयंत नार्लीकर व लेखक लक्ष्मणराव लोंढे की अनेक मराठी विज्ञान कथाओं का हिंदी अनुवाद देशबन्धु के लिए किया। फिर स्वयं भी हिंदी में विज्ञान कथाएं लिखने लगे, जिसका पुस्तक रूप में प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया। प्रसंगवश, वैद्य साहब के भाई एम.जी. वैद्य भोपाल में प्रतिष्ठित पत्रकार थे, भाभी श्रीमती शकुंतला वैद्य रूसी भाषी की कक्षाएं संचालित करती थीं और इंदौर के सीपीआई नेता अनंत लागू उनकी पत्नी के भाई थे।

सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ. रमेशचंद्र महरोत्रा का चलते-चलते उल्लेख पिछले अध्याय में हुआ है। एक ओर अपने विषय के अधिकारी विद्वान; दूसरी ओर अद्भुत सादगी। वे साधारण सा कुर्ता-पाजामा पहनते थे और साईकिल पर चलते थे। उन्हें अपने पांडित्य पर लेशमात्र भी गर्व नहीं था और धन-दौलत का मोह उन्होंने कभी नहीं पाला। एक बार कार खरीद ली तो वह भी इकलौती संतान बेटी संज्ञा को दे दी। घर-गिरस्ती उन्होंने भाभी श्रीमती उमा महरोत्रा के जिम्मे छोड़ रखी थी, जो इप्टा से जुड़ी रहीं और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में भी उत्साहपूर्वक भाग लेती रहीं। इस दम्पति ने समाज हित में अनेक काम किए और एक के बाद दोनों की पार्थिव देहें रायपुर मेडिकल कॉलेज को दान कर दी गईं। महरोत्राजी व्यंग्य कविताएं भी लिखते थे, जो मुझे कभी पसंद नहीं आईं। वे अपने ''दो शब्द कॉलम में कोई दो शब्द उठाकर उसकी सविस्तार व्याख्या करते थे। यह स्तंभ अनेक वर्षों तक चला। हिंदी भाषा के प्रति प्रेम व रुचि जागृत करने की यह एक अनूठी पहल थी।

समय-समय पर देश की अनेक मूर्धन्य हस्तियों ने देशबन्धु में कॉलम लिखे। इनमें इंद्रकुमार गुजराल, विजय मर्चेंट, जयंत नार्लीकर, के.एफ. रुस्तमजी, अरुण गांधी के नाम प्रमुखता से लिए जा सकते हैं। गुजराल साहब का आशीर्वाद और स्नेह हमें अंत तक मिलता रहा। 7 अप्रैल 2008 को देशबन्धु के दिल्ली संस्करण के उद्घाटन पर वे ही मुख्य अतिथि थे। उन्होंने अपने विशाल पुस्तक संग्रह का एक भाग देशबन्धु लाइब्रेरी को भेंट भी किया। वे सामान्यत: अन्तरराष्ट्रीय राजनीति पर अंग्रेजी में लिखते थे, जिसका अनुवाद हमें करना होता था। उपरोक्त सभी महानुभावों के साथ भी यही बात थी। मई-जून 2003 में मुझे डाक से एक मोटा लिफाफा मिला। भीतर एक लेख के साथ साइरस रुस्तमजी का लिखा एक पत्र था- ''मैं के.एफ. रुस्तमजी का पुत्र हूं। वे आपके अखबार के लिए लिखते थे। उनके कागजात में उनका यह आखिरी लेख मिला है, जिसे वे समय रहते आपको भेज नहीं पाए। संभव हो तो इसका उपयोग कर लीजिए। अंग्रेजो में लिखे पत्र का भाव यही था। महात्मा गांधी के पौत्र अरुण गांधी उन दिनों भारत में ही पत्रकारिता कर रहे थे और उन्होंने भी अपने लेख छापने के लिए सरलता से हामी भर दी थी। अरुण अब अमेरिका में रहते हैं। पिछले साल उनकी पुस्तक आई है- द गिफ्ट ऑफ एंगर। यह पुस्तक बापू के साथ बीते समय में हासिल अनुभवों पर आधारित है। इसमें बापू के जीवन दर्शन की सरल-सुबोध व्याख्या की गई है।

हमारे लेखकों की सूची में एक उल्लेखनीय नाम प्रो. एस.डी. मिश्र का है। वे रायपुर के शासकीय विज्ञान म.वि. में गणित के प्राध्यापक थे और 1964 में तबादले पर अन्यत्र चले गए थे। लेकिन एक गुणी अध्यापक के रूप में उनकी चर्चा उनके पूर्व छात्रों के बीच अक्सर होती थी। प्रो. मिश्र ने 92-93 साल की उम्र में अपने संस्मरण लिपिबद्ध करना प्रारंभ किया। यह अपने आप में अचरज की बात थी। उनके सुपुत्र डॉ. परिवेश मिश्र ने जब ये संस्मरण मुझे दिखाए तो मैं चकित रह गया। ऐसी सुंदर भाषा, ऐसे रोचक विवरण! गुजरे समय और स्थानों को उन्होंने जीवंत कर दिया। हमने दो बार में उनके संस्मरण 26-26 किश्तों में छापे। पहले ''ग्राउंड जीरो से उठी यादें; फिर बेमेतरा से बैरन बाज़ार तक। मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि हिंदी में ऐसे संस्मरण लिखने वाले लेखक बिरले ही होंगे। रायपुर, नागपुर, भोपाल, दमोह इत्यादि अनेक स्थानों पर, यहां तक कि विदेशों में बसे उनके छात्र इन संस्मरणों को खोज-खोज कर पढ़ते। हमसे संपर्क कर उनका पता-फोन नंबर लेते और उनसे बात करते। संस्मरण लिपिबद्ध करने के कुछ समय पहले ही उनकी जीवन संगिनी का निधन हुआ था। लेकिन संस्मरण पढ़ने के बाद उनके छात्रों-मित्रों-परिचितों ने जब उनसे संपर्क किया तो उनका अकेलापन कुछ हद तक दूर हुआ।

डॉ. जयंत नार्लीकर रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर तीन दिन के लिए रायपुर आ रहे थे। इंग्लैंड से लौटने के बाद उन्होंने विज्ञान के लोकव्यापीकरण को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। मैं उनका तब से प्रशंसक था जब वे 1960 के दशक में कैंब्रिज में फ्रेड हॉयल के साथ खगोलशास्त्र पर शोध कर रहे थे और अन्तरराष्ट्रीय ख्याति हासिल कर चुके थे। उनका रायपुर आना हमारे लिए एक बड़ी खबर थी। हमने नार्लीकरजी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एक पूरे पेज की विशेष सामग्री प्रकाशित की और तीनों दिन उनके व्याख्यानों को प्रमुखता के साथ छापा। इसी समय लगे हाथ उनके अंग्रेजो लेखों को अनुवाद कर छापने की अनुमति भी मांग ली, जो सहर्ष मिल गई। महान क्रिकेट खिलाड़ी विजय मर्चेंट ने तो अंतरर्देशीय पत्र पर उनके लेख छापने की अनुमति प्रदान की थी। इन सबके लेख नई-नई जानकारियों से भरे होते थे; पाठकों का ज्ञान उनसे बढ़ता था और अखबार की प्रतिष्ठा में भी वृद्धि होती थी। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि इनमें से किसी ने भी हमसे न पारिश्रमिक की अपेक्षा की और न मांग की।

जयंत नार्लीकर के प्रथम रायपुर आगमन पर हमने जैसी विशेष सामग्री प्रकाशित की थी, बिलकुल उसी तरह हमने विश्वविख्यात सितारवादक रविशंकर का भी अभिनंदन किया। इस तरह विभिन्न अवसरों पर विशेष परिशिष्ट प्रकाशित करने की एक परंपरा ही देशबन्धु में स्थापित हो गई। याद आता है सितंबर 1979 में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम भारत दौरे पर आई थी। तब हमने कुछ सप्ताह पूर्व ही ऑफसेट मशीन पर छपाई प्रारंभ की थी। बहुमुखी प्रतिभासंपन्न लेखक-कवि-बैंक अधिकारी ओम भारती उन दिनों रायपुर में पदस्थ थे।ओम की क्रिकेट में भी खासी दिलचस्पी थी। उन्होंने क्रिकेट पर टैब्लाइड आकार में बत्तीस पेज के एक विशेषांक की योजना प्रस्तावित की। भारत में क्रिकेट की जैसी लोकप्रियता है, उसे देखते हुए कहना न होगा कि देशबन्धु का यह क्रिकेट विशेषांक अत्यन्त लोकप्रिय हुआ और हमें अंक दुबारा छापना पड़ा। इस अंक की बहुत सारी प्रतियां लेकर ओम नागपुर भी गए, जहां एक मैच होना था। वहां वीसीए स्टेडियम में देशबन्धु की धूम मच गई। उसी दौर में हमने शतरंज पर एक साप्ताहिक स्तंभ शुरू किया। किसी हिंदी दैनिक में यह शायद अपनी तरह का पहला कॉलम था! इसे मुजाहिद खान तैयार करते थे, जो शायद रायपुर तहसील कार्यालय में कार्यरत थे। छत्तीसगढ़ में शतरंज का खेल लोकप्रिय हो चला था, जिसे आगे बढ़ाने में देशबन्धु ने भी एक छोटी सी भूमिका निभाई।
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देशबंधु में 22 अगस्त 2019 को प्रकाशित
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(प्रस्तुति: डाॅ शरद सिंह)

रविवार, दिसंबर 01, 2019

देशबन्धु के साठ साल-6 - ललित सुरजन

Dr Sharad Singh
प्रिय ब्लाॅग मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की टिप्पणी सहित लेखमाला की  छठवीं कड़ी....

देशबन्धु के साठ साल-6
- ललित सुरजन
Lalit Surjan
देशबन्धु ने समाचार जगत में विगत साठ वर्षों के दौरान जो साख कायम की है, उसकी बुनियाद में देशबन्धु की संपादकीय नीति के दो तत्व प्रमुख हैं। एक तो पत्र ने प्रारंभ से अब तक एक सुस्पष्ट, संयमपूर्ण और अविरल वैचारिक दृष्टि का पालन किया है। दूसरे- अखबार अपनी संपादकीय प्रयोगधर्मिता के लिए अक्सर चर्चित रहा है। इसके तीन मुख्य घटक हैं। एक-स्थायी स्तंभ और फीचर। दो- विकासपरक रिपोर्टिंग। तीन- ग्रामीण पत्रकारिता। स्थायी स्तंभों की चर्चा करते हुए सबसे पहले हरिशंकर परसाई का नाम आता है। मैं नोट करना चाहूंगा कि 3 दिसंबर 1959 को बाबूजी ने जबलपुर से 'नई दुनिया का तीसरा संस्करण प्रारंभ किया था। कालांतर में नए प्रबंधन के तहत उसका नाम बदलकर 'नवीन दुनिया कर दिया गया। उसकी कहानी आगे आएगी। परसाईजी ने बाबूजी के कहने पर 1960 में ''सुनो भाई साधो शीर्षक से साप्ताहिक कॉलम लिखना प्रारंभ किया, जो इंदौर, रायपुर और जबलपुर में अनेक वर्षों तक एक साथ छपता रहा।

जबलपुर में ही जब 1963 की रामनवमी पर बाबूजी और उनके समानधर्मा मित्रों ने मिलकर सांध्य दैनिक ''जबलपुर समाचार का प्रकाशन शुरू किया तो परसाईजी उसमें ''सबका मुजरा लेय शीर्षक से नया स्तंभ लिखने लगे। काफी आगे जाकर जब परसाईजी का अस्वस्थता के कारण बाहर आना-जाना अत्यन्त सीमित हो गया, तब हमारे आग्रह पर उन्होंने ''पूछिए परसाई से शीर्षक से एक और नया कॉलम लिखना स्वीकार किया। इस कॉलम को उन्होंने देखते ही देखते लोकशिक्षण के एक जबरदस्त माध्यम में परिणत कर दिया। इसमें वे पाठकों के आए सैकड़ों पत्रों में से हर सप्ताह कुछ चुनिंदा और गंभीर प्रश्नों के सारगर्भित लेकिन चुटीले उत्तर देते थे। 1983 में प्रारंभ यह कॉलम 1994 तक जारी रहा। कुछ समय पूर्व एक वृहदाकार ग्रंथ के रूप में कॉलम का संकलन छपा, लेकिन किसी अज्ञात कारण से पुस्तक का शीर्षक बदलकर ''पूछो परसाई से रख दिया गया!

मुझे यह उल्लेख करते हुए खुशी होती है कि परसाईजी की लगभग अस्सी प्रतिशत या उससे भी अधिक रचनाएं देशबन्धु में ही प्रकाशित हुई हैं। ऐसा नहीं कि वे सिर्फ कॉलम या व्यंग्य लेखन ही करते थे। समसामयिक घटनाचक्र पर उनकी पैनी नजर रहती थी और वे महत्वपूर्ण ताजा घटनाओं पर वक्तव्य या टिप्पणी जारी करते थे, जो देशबन्धु में ही प्रथम पृष्ठ पर छपती थी। परसाईजी तर्कप्रवीण थे और उनकी स्मरणशक्ति अद्भुत थी। उनके सामने पुस्तक या पत्रिका का कोई पन्ना खोलकर रख दीजिए। वे एक नजर डालेंगे और पूरी इबारत को हृदयंगम कर लेंगे। अपनी इस ''एलीफैंटाइन मेमोरी याने गज-स्मृति से वे हम लोगों को चमत्कृत कर देते थे। समसामयिक मुद्दों पर वे जो तात्कालिक प्रतिक्रिया व्यक्त करते थे, वह भी लोकशिक्षण का ही अंग था। पाठकों की अपनी समझ उनसे साफ होती थी। जो लोग उन्हें सिर्फ व्यंग्यकार मानते हैं, वे उनके व्यक्तित्व के इस गंभीर पहलू की अनदेखी कर देते हैं।

यह एक उम्दा संयोग था कि परसाईजी और बाबूजी दोनों ने 1983 में एक साथ अपने स्थायी कॉलम प्रारंभ किए। बाबूजी ने ''दरअसल शीर्षक से सामयिक विषयों पर लेख लिखे। एक तरह से दोनों अभिन्न मित्रों के कॉलम एक दूसरे के विचारों को प्रतिबिंबित करते थे। बाबूजी के अखबारी लेखन की शुरूआत वैसे 1941-42 में हो चुकी थी, जब विद्यार्थी जीवन में उन्होंने वर्धा से हस्तलिखित पत्रिका ''प्रदीप की स्थापना की थी। बाद के सालों में एक के बाद एक कई अखबारों की स्थापना व उनके संपादन-संचालन की दौड़धूप में उनका नियमित लेखन बाधित हो गया था। लेकिन बीच-बीच में समय निकालकर जब वे लिखते तो उसमें उनकी गहरी समझ और अंतर्दृष्टि का परिचय मिलता। एक तरफ निरालाजी के निधन पर ''महाकवि का महाप्रयाण" ; दूसरी ओर रुपए के अवमूल्यन, वीवी गिरि के चुनाव; तीसरी ओर किसान ग्राम दुलारपाली पर फीचर आदि उनकी सर्वांगीण संपादकीय दृष्टि के उदाहरण हैं। नेहरूजी के निधन पर रॉबर्ट फ्रॉस्ट की कविता का जो त्वरित अनुवाद बाबूजी ने किया, मेरी राय में वह सर्वोत्तम अनुवाद है।

अपने स्तंभकारों की चर्चा करते हुए मैं राजनांदगांव के अग्रज साथी रमेश याज्ञिक का स्मरण करता हूं। रमेश भाई की हिंदी में हल्का सा गुजराती पुट था, लेकिन उनकी लेखन शैली अत्यन्त रोचक और बांध लेने वाली थी। उन्होंने टीजेएस जॉर्ज की लिखी वीके कृष्णमेनन की जीवनी का अनुवाद देशबन्धु के लिए किया था। हमारा एक प्रयोग उन दिनों बहुचर्चित और बहुप्रशंसित हुआ जब रमेश भाई ने गुजराती लेखक अश्विन भट्ट के रोमांचक उपन्यास ''आशका मांडल का अनुवाद किया और वह लगातार छब्बीस साप्ताहिक किश्तों में प्रकाशित हुआ। ऐेसे एक-दो अनुवाद उन्होंने और भी किए। उनके साप्ताहिक स्तंभ ''यात्री के पत्र को भी पाठकों से भरपूर सराहना मिली। वे उन दिनों अपने व्यापार के सिलसिले में लगातार दूर-दूर की यात्राएं कर रहे थे और उन अनुभवों के आधार पर किस्सागोई की शैली में भारतीय समाज की जीवंत और प्रामाणिक छवि उकेर रहे थे। रमेश भाई ने एक कथाकार के रूप में भी पर्याप्त ख्याति अर्जित की। प्रसंगवश बता दूं कि देशबन्धु में पहिला धारावाहिक उपन्यास 1965-66 में छपा था जो डॉ. सत्यभामा आडिल ने लिखा था। हृदयेश, मनहर चौहान आदि के उपन्यास भी हमने धारावाहिक प्रकाशित किए।

एक ओर जहां रायपुर व छत्तीसगढ़ में अनेक लेखक नियमित कॉलम के द्वारा देशबन्धु से जुड़े, वहीं जबलपुर में प्रकांड विद्वान प्रो. हनुमान वर्मा ने ''टिटबिट की डायरी शीर्षक कॉलम लिखा, कहानीकार-व्यंग्यकार सुबोध कुमार श्रीवास्तव ने भी व्यंग्य का कॉलम हाथ में लिया; उधर सतना में समाजवादी नेता जगदीश जोशी के अलावा लेखक कमलाप्रसाद, देवीशरण ग्रामीण, बाबूलाल दहिया, सेवाराम त्रिपाठी के साप्ताहिक स्तंभ भी अनेक वर्षों तक प्रकाशित होते रहे। छत्तीसगढ़ में रमाकांत श्रीवास्तव, बसन्त दीवान, रवि श्रीवास्तव, कृष्णा रंजन आदि मित्रों ने नियमित कॉलम लिखे। पुरुषोत्तम अनासक्त व परदेसीराम वर्मा के उपन्यास भी धारावाहिक छपे। डॉ. रमेशचंद्र महरोत्रा ने अनेक वर्षों तक ''दो शब्द स्तंभ निरंतर लिखा, जो पांच खंडों में दिल्ली से प्रकाशित हुआ। नागपुर के डॉ. विनय वाईकर व रायपुर के प्रो. खलीकुर्रहमान ने महाकवि गालिब के साथ-साथ उर्दू शायरी की श्रेष्ठता से पाठकों को परिचित कराया। मैंने अभी अपने संपादकीय सहयोगियों के लिखे स्तंभों का जिक्र नहीं किया है, और न देश के अनेक मूर्धन्य विद्वान स्तंभकारों का। कहानी अभी अधूरी है।
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#देशबंधु में 08 अगस्त 2019 को प्रकाशित
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( प्रस्तुति: डाॅ शरद सिंह)

गुरुवार, नवंबर 28, 2019

देशबन्धु के साठ साल-5 - ललित सुरजन

Dr Sharad Singh
प्रिय ब्लाॅग मित्रो एवं सुधी पाठकों,

   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।


ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 


प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की टिप्पणी सहित लेखमाला की  पांचवीं कड़ी....


Lalit Surjan
देशबन्धु के साठ साल-5

- ललित सुरजन


बापा! आज फिर जरूरत पड़ गई है। इंग्लैंड से मोनोटाइप मशीन ला रहे हैं। मार्जिन मनी का इंतजाम नहीं है।

- ये क्या मशीन है? क्यों खरीद रहे हो? किस काम आएगी? कितनी कीमत है?

- इस मशीन से कंपोजिंग होगी। एक शिफ्ट में आठ आदमियों के बराबर काम करेगी।

- मतलब तुम सात लोगों को नौकरी से निकाल दोगे?

- नहीं बापा। मशीन पर दो आदमी काम करेंगे। और हम पेज संख्या बढ़ा रहे हैं। निकालेंगे किसी को नहीं, बल्कि अपने लोगों को उस पर ट्रेनिंग देंगे। उनका वेतन बढ़ जाएगा और पेपर भी ज्यादा अच्छा निकलेगा।

- ठीक है। रकम ले जाओ। लेकिन किसी को हटाना मत।

बापा और बाबूजी के बीच यह संवाद मई-जून 1969 में किसी दिन हुआ। मैं श्रोता की हैसियत से उपस्थित था। बापा याने रूड़ाभाई वालजी सावरिया, जिन्हें रायपुर में रूड़ावाल सेठ के नाम से जाना जाता था। वे साहूकार थे और नहरपारा में उनके स्वामित्व की महाकौशल फ्लोर मिल की अरसे से बंद पड़ी इमारत को हमने एक साल पहले ही फ्लैटबैड रोटरी मशीन आने के साथ किराए पर लिया था। यह कोई पचास साल पुरानी, मोटी दीवालों, इमारती लकड़ी के फर्श और टीन की छत वाली तीन मंजिला, तीन हॉल की इमारत थी। इसे किराए पर लेने में कांग्रेस नेता मन्नालाल शुक्ल ने हमारी सहायता की थी। वे नगरपालिका के पूर्व उपाध्यक्ष एवं उस समय विधानसभा सदस्य थे।

मेरे दादाजी की उम्र के बापा एक दिलचस्प व्यक्ति थे। उन्होंने व उनके सुपुत्र कांतिभाई ने गाढ़े वक्तों में कई बार हमें सहायता दी और कभी खाली हाथ नहीं लौटाया। जब ग्यारह वर्ष बाद हम स्वयं के भवन में आए, तब न जाने कितने माहों का किराया बाकी था जो हमने धीरे-धीरे कर चुकाया। बापा थे तो साहूकार, लेकिन उनके संस्कार गांधीवादी थे। नहरपारा की उसी गली में वे स्वयं जहां रहते थे, वह पुरानी शैली का साधारण दिखने वाला मकान था, जिसमें साज-सजावट की आवश्यकता उन्हें कभी महसूस नहीं हुई। एक दिन प्रेस परिसर में एक फियेट कार आकर खड़ी हो गई। तीनेक माह खड़ी रही। हमारे पास तब कार नहीं थी। बाबूजी ने बापा से निवेदन किया कि यह कार हमें मिल जाए। किश्तों में पैसा चुका देंगे। बापा का उत्तर अनपेक्षित था। जिसकी कार है, वह तकलीफ़ में है। ईमानदार आदमी है। जिस दिन हालत सुधरेगी, कर्ज की रकम चुकाकर गाड़ी ले जाएगा। गाड़ी बेचकर उसकी इज्ज़त नहीं उतारूंगा। तकरीबन छह माह बाद वैसा ही हुआ। यह बीते समय की व्यवसायिक नैतिकता का एक उदाहरण है। बापा जैसे लोग शायद तब भी अपवाद ही थे। मोनो मशीन की चर्चा करते-करते यह अवांतर प्रसंग ध्यान आ गया।

इसी सिलसिले में एक और रोचक वाकया घटित हुआ। दुर्ग के ब्यूरो प्रमुख धीरज भैया दफ्तर आए। उनके साथ एक सज्जन और थे। परिचय कराया- ''ये राजनांदगांव के कन्हैयालाल शर्मा हैं। दुर्ग में बैंक ऑफ महाराष्ट्र में अकाउंटेंट हैं। अपने पेपर के मुरीद हैं। मोनो मशीन आयात करने में इनका बैंक अपनी मदद करेगा। शर्माजी ने शाखा स्तर पर सारी औपचारिकताएं रुचि लेकर पूरी करवाई। नागपुर जोनल ऑफिस तक जाकर प्रस्ताव पुणे मुख्यालय अंतिम स्वीकृति हेतु भिजवा दिया। हमारी तवालत बची। इसी बीच बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो गया। बैंकों का सारा कारोबार कुछ समय के लिए एक तरह से स्थगित हो गया। हमारा आवेदन भी ठंडे बस्ते में चला गया। एक बार फिर हमें अप्रत्याशित रूप से मदद मिली। संघ के मराठी मुखपत्र ''तरुण भारत के प्रबंध संचालक भैया साहेब खांडवेकर से बाबूजी का पुराना परिचय था। बाबूजी ने मुझे पत्र देकर उनके पास नागपुर भेजा। भैया साहब ने बैंक के चेयरमैन से बात की और उनसे मिलने मुझे पुणे भेज दिया। मैं चेयरमैन से मिला। उन्होंने पांच-सात मिनट में मुझसे प्रकरण समझा और अधिकारों का प्रयोग करते हुए ऋण प्रस्ताव को तुरंत स्वीकृति दे दी। यथासमय दो मशीनें लंदन से रायपुर आ गईं।

मशीनें आ गईं। उनको चलाने वाले दक्ष सहयोगी भी तैनात हो गए। पुराने लोगों को प्रशिक्षण भी मिल गया। लेकिन मशीन तो मशीन है। नई हो तब भी कभी तो बिगड़ेगी ही और रिपेयरिंग की आवश्यकता भी होगी। मोनोटाइप कंपनी के कलकत्ता (अब कोलकाता) ऑफिस से मैकेनिक बुलाना महंगा पड़ता था, आने-जाने में समय भी लगता था। वक्त पर मैकेनिक न आए तब क्या किया जाए? ऐसे में धीरज भैया ने ही एक और सज्जन को ढूंढ निकाला। भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रेस में श्री अवस्थी नामक सज्जन मोनो मैकेनिक का काम कर लेते थे। हमें जब भी जरूरत पड़े, धीरज भैया रात-बिरात स्कूटर पर बैठाकर उन्हें भिलाई से रायपुर ले आते थे। अवस्थीजी देशबन्धु परिवार के अतिथि सदस्य बन गए। एक समय वह भी आया जब उन्होंने भिलाई में देशबन्धु की एजेंसी ले ली और इस्पात नगरी में अखबार का प्रसार बढ़ाने में भूमिका निभाई। मैं यहां मोनोटाइप मशीन से जुड़े दो अन्य व्यक्तियों का भी उल्लेख करना चाहता हूं।

मोनोटाइप मशीन में अक्षर ढालने के लिए एक मैट्रिक्स (Matrix) या सांचा होता है। पीतल से बने इस सांचे में सारे अक्षर व चिह्न उत्कीर्ण होते हैं, जो सीसे में ढलकर आकार ग्रहण करते हैं। यह सांचा चार-छह माह से अधिक नहीं चलता। अर्थात छठे-छमासे इंग्लैंड से नया सांचा मंगाना पड़ता था, जिसकी कीमत उस समय चालीस हजार रुपए के करीब थी। मेरे कॉलेज जीवन के साथी और पारिवारिक मित्र महेंद्र कोठारी यहां सामने आए। कैमिकल इंजीनियर महेंद्र ने अपने कारखाने में यह सांचा बनाने का प्रयोग किया और काफी हद तक सफल हुए। उनके बनाए सांचे की कीमत पड़ी लगभग ढाई हजार रुपए। यह सांचा तीन माह तक ठीक से चलता था। महेंद्र ने फिर देश में कई हिंदी अखबारों को अपनी बनाई मैट्रिक्स बेची। वैसे इसमें उन्हें कोई खास मुनाफा नहीं हुआ। लेकिन ध्यान आता है कि ''मेक इन इंडिया का प्रयोग आज से पचास साल पहले एक युवा इंजीनियर ने सफलता से कर दिखाया था।

मैंने पहले की एक किश्त में बताया था कि फ्लैटबैड रोटरी मशीन में न्यूज प्रिंट याने अखबारी कागज के पत्ते की बजाय रील या रोल का इस्तेमाल होता था। रायपुर रेलवे स्टेशन पर मुंबई-कोलकाता से वैगन में रोल आते थे। उन्हें वैगन से उतारना, मालधक्के से प्रेस तक लाना मेहनत और सूझबूझ का काम था। बैलगाड़ी में तीन रोल चढ़ाए और उतारे जाते थे। नहरपारा से लगे लोधीपारा के ही भरत नामक युवा मालधक्के पर हमाली करते थे। उनकी एक टीम थी जो हमारे लिए कागज के रोल मालधक्के से प्रेस गोदाम तक लाने में जुटती थी। इसी टीम ने हमारी छपाई मशीनों को भी जब मौका आया ट्रकों से उतार कर मशीन रूम में ले जाने तक का काम बेहद सावधानी व कुशलता के साथ किया। मोनो मशीनों को भी स्थापित करने का काम भरत के ही जिम्मे था। मेरे हमउम्र भरत स्वयं बहुत मेहनती थे। वे टीम को निर्देश देने में भी सक्षम और अपने काम के प्रति बेहद जिम्मेदार थे।

अब तक की कड़ियों को पढ़कर पाठकों ने अनुमान कर लिया होगा कि अखबार को चलाने में कितने सारे जनों की, विविध स्तरों पर प्रत्यक्ष और-परोक्ष भूमिका निभाना होती है।

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#देशबंधु में 01 अगस्त 2019 को प्रकाशित

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बुधवार, नवंबर 27, 2019

देशबन्धु के साठ साल-4 - ललित सुरजन

Dr Sharad Singh
प्रिय ब्लाॅग मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है।

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की टिप्पणी सहित लेखमाला की  चौथी कड़ी....
Lalit Surjan

देशबन्धु के साठ साल-4
- ललित सुरजन

'प्रिंटर्स डेविल' याने छापाखाने का शैतान अखबार जगत में और पुस्तकों की दुनिया में भी एक प्रचलित मुहावरा रहा है। छपी हुई सामग्री में कोई शब्द या अक्षर इधर का उधर हो जाए, फलत: अर्थ का अनर्थ होने की नौबत आ जाए तो उसे किसी अदृश्य शक्ति याने शैतान की कारगुजारी बता कर बच जाओ। वास्तविकता में यह अक्सर कंपोजिंग की गलती होती है। बाज दफे समाचार-लेखक भी हड़बड़ी में कुछ गलत लिख जाता है और कंपोजाटर सतर्क न हो तो वैसा ही गलत छप भी जाता है। एक बेहतरीन कंपोजिटर को परिश्रमी और सजग होने के साथ-साथ भाषा का भी पर्याप्त ज्ञान होना आवश्यक होता है। मैंने अब तक ऐसी दो ही पत्रिकाएं देखीं, जिनमें कभी न तो तथ्यों की गलती देखने मिली और न वर्तनी या व्याकरण की। एक- अमेरिका से प्रकाशित ''नेशनल ज्योग्राफिक'' और दूसरी इंग्लैंड की ''द इकानॉमिस्ट''। बाकी तो हम गलतियां करते चलते हैं और समझदारी हो तो इसके लिए पाठकों से माफी भी मांग लेते हैं। आप समझ रहे होंगे कि एक अच्छा अखबार निकालने की शर्त है कि उसमें गलतियां न हों और यह बड़ी हद तक कंपोजिंग विभाग में कुशल सहयोगी होने पर निर्भर करता है।

मैं देशबन्धु के कंपोजिंग विभाग के साथियों को याद करता हूं तो सबसे पहले 'राय साहब' का ध्यान आता है। सिर्फ बाबूजी ही उन्हें जीतनारायण नाम से संबोधित करते थे। जौनपुर (उप्र) के राय साहब शायद 1956 में भोपाल में बाबूजी से जुड़ गए थे। वे ऊंची कद-काठी के स्वामी थे। मैं उन दिनों अपनी बुआ के पास पहले नागपुर, फिर ग्वालियर में पढ़ रहा था, इसलिए मैंने उन्हें रायपुर आने पर ही पहली बार देखा। वे कंपोजाग से पदोन्नत होकर फोरमैन बन चुके थे। आगे चलकर वे हैड फोरमैन भी बने। बढ़ती आयु में जब नेत्र ज्योति शिथिल होने लगी तो उनके प्रभावी व्यक्तित्व के अनुकूल दूसरे काम सौंप दिए गए। उन्हें गुजरे लंबा समय बीत गया है, लेकिन चाची और उनके बच्चों के साथ आज भी संपर्क बना हुआ है। फोरमैन के जिम्मे संपादकीय विभाग से समाचार आदि लेना, उसे कंपोजिटरों के बीच बांटना, कंपोज हो गई सामग्री के प्रूफ निकालना, सुधार करना, और इस लंबी प्रक्रिया में समय की पाबंदी व अनुशासन बनाए रखना आदि काम होते थे। उन शुरुआती दिनों में चार पेज के अखबार में भी कोई अठारह-बीस कंपोजिटर, उन पर दो या तीन फोरमैन और सबके ऊपर हैड फोरमैन होता था। राय साहब के साथ इलाहाबाद से आए रामप्रसाद यादव, जबलपुर के दुलीसिंह, जगन्नाथ प्रसाद पांडे आदि थे। ये सभी अपने फन के माहिर थे।

समय आगे बढ़ने के साथ इनका स्थान लेने के लिए एक नई पीढ़ी सामने आ गई। 1970 के दशक में एक समय ऐसी स्थिति बनी कि अखबार निकलने में प्राय: रोज ही देरी होने लगी। जो हैड फोरमैन थे, वे विभाग को सम्हाल नहीं पा रहे थे। तब मैंने एक प्रयोग किया। तीन युवा फोरमैन क्रमश: लीलूराम साहू, मोहम्मद सलाम हाशिमी और रणजीत यादव को एक-एक माह के लिए हैड फोरमैन का प्रभार इस वायदे के साथ सौंपा कि जिसका काम सबसे अधिक संतोषजनक होगा, उसे विभाग का मुखिया बना दिया जाएगा। उन तीनों साथियों में अपनी बेहतर काबिलियत का परिचय लीलूराम ने दिया। वे हैड फोरमैन नियुक्त किए गए और रिटायरमेंट तक इस पद पर बने रहे। मेरे हमउम्र लीलूराम का कद नाटा था, लेकिन वे अपने दायित्व को भलीभांति समझते थे, उनमें नेतृत्व क्षमता भरपूर थी, और वे नई चीजें सीखने में भी दिलचस्पी रखते थे। अपने इन गुणों और साथ में विनम्र स्वभाव के कारण वे प्रेस में हम सभी के प्रिय थे। नए दौर में कंपोजिंग विभाग में उन्नत तकनीकी का आगमन हुआ तो उसे समझने और उपयोग करने में भी लीलूराम ने देरी नहीं की।

हैड कंपोजिंग याने छापे के अक्षर हाथ से जोड़ने की विधि पुरानी पड़ चुकी थी। उन दिनों लाईनोटाइप और मोनोटाइप ऐसी दो यांत्रिक प्रणालियां प्रचलन में थीं। पहली में एक-एक लाइन मशीन से ढलकर निकलती थी। एक गलती हो जाए तो पूरी लाइन बदलो। दूसरी में एक-एक अक्षर की पृथक ढलाई होती थी। हमने मोनोटाइप मशीनें खरीदना तय किया। छत्तीसगढ़ में देशबन्धु पहला अखबार था, जहां ये मशीनें आईं। स्वाभाविक ही यहां उनका कोई जानकार नहीं था। हम इलाहाबाद से रामनिवास सिंह और जगदीश नारायण श्रीवास्तव को लेकर आए। सिंह साहब मशीन ऑपरेटर थे, याने की-बोर्ड पर कंपोजिंग करते थे।

जगदीश उससे जुड़ी मशीन पर सात सौ डिग्री तापमान पर खौलते सीसे से अक्षरों की ढलाई करते थे। रामनिवास सिंह बुजुर्ग थे। खादी के शुभ्र धवल वस्त्र पहनते थे। उनकी भाषा बेहद अच्छी थी। संपादकों की गलतियां सुधार देते थे। जगदीश भी अपने काम में कुशल, और मृदुभाषी व्यक्ति थे। एक लंबे अरसे बाद जब मोनो तकनीक भी पुरानी पड़ गई, मशीनें बेच दी गईं, तब भी जगदीश एक तरह से प्रेस परिसर के सुपरवाइजर बनकर जीवन पर्यन्त हमारे साथ बने रहे। उनके बेटे आज भी किसी न किसी रूप में प्रेस से जुड़े हुए हैं।

इधर मोनो मशीन खरीदने की प्रक्रिया प्रारंभ की, इलाहाबाद से कुशल कर्मियों को बुलाया; दूसरी ओर यह भी तय किया कि वर्तमान स्टाफ को भी इन मशीनों पर काम सिखाया जाए। कलकत्ता में मोनोटाइप कंपनी तकनीकी प्रशिक्षण देने के लिए एक स्कूल चलाती थी। लीलूराम, फेरहाराम साहू और हेमलाल धीवर को इस स्कूल में शायद तीन माह का प्रशिक्षण लेने भेजा गया। इन तीनों साथियों ने पूरे मनोयोग के साथ काम सीखा और अपने प्रशिक्षकों से सराहना हासिल की। मोनोटाइप स्कूल के प्राचार्य ने तीनों को श्रेष्ठ प्रशिक्षार्थी होने के प्रमाणपत्र दिए और एक अलग पत्र भेजकर हेमलाल की विशेष प्रशंसा की कि उनके जैसा कुशाग्र प्रशिक्षार्थी पहले कभी नहीं आया। लगभग एक साल बाद रायपुर नवभारत में मोनोटाइप मशीन आई तो उनके प्रबंधन के अनुरोध पर लीलूराम को वहां दूसरी शिफ्ट में काम करने भेजा कि उनके लोगों को काम सिखा दें। हमने तो सहयोग की भावना से भेजा था, लेकिन नवभारत में उन्हें बेहतर सुविधाओं का लाभ देकर वहीं रोक लेने की पेशकश कर दी। लीलूराम उनके ऑफर को ठुकराकर वापिस लौट आए।

समय के साथ एक बार फिर तकनीकी में बदलाव आया। मोनोटाइप मशीनों का स्थान वेरीटाइपर मशीनों ने ले लिया। अब तक हॉट मैटल प्रोसेस याने गर्म धातु से ढलाई होती थी। उसकी जगह कंप्यूटर आधारित प्रक्रिया आ गई जो कुछ-कुछ फोटोग्राफी से मिलती-जुलती थी। इसमें एक फिल्म के निगेटिव पर शब्द और पृष्ठ का संयोजन होकर उसके पॉजीटिव से ऑफसेट मशीन पर छपाई होती थी। लीलूराम और हेमलाल ने इस प्रविधि को समझने-सीखने में कोई देरी नहीं की।

उन्होंने अपने अन्य साथियों को भी काम सिखाया। मेरे प्रिय साथी लीलू कंपोजिंग प्रक्रिया के इस तीसरे चरण में भी विभाग प्रमुख का दायित्व कुशलतापूर्वक सम्हालते रहे। जब चौथे चरण में डेस्कटॉप कंप्यूटर का युग आया, तब तक वे शायद रिटायरमेंट की आयु में पहुंच चुके थे। इस नई तकनीक के साथ वे मेल नहीं बैठा सके। उन्हें कोई दूसरा दायित्व भी सौंपा किंतु वह उनके मन-माफिक नहीं था। वे रिटायर होकर चले गए। काफी समय से उनसे मुलाकात नहीं हुई है। हेमलाल डेस्कटॉप पर भी कुछ बरसों तक काम करते हुए हमारे साथ बने रहे। अभी कुछ दिन पहले ही उनके देहांत की सूचना मुझे मिली। कंपोजिंग विभाग की यह कहानी अभी अधूरी है।
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देशबंधु में 18 जुलाई 2019 को प्रकाशित
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( प्रस्तुति: डाॅ शरद सिंह)

गुरुवार, नवंबर 21, 2019

देशबंधु के साठ साल - 3 - ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय ब्लाॅग मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक ल
गेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है   
     
प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की टिप्पणी सहित लेखमाला की  तीसरी कड़ी.... 

देशबन्धु के साठ साल -3

- ललित सुरजन
 
Lalit Surjan
 आज से साठ साल पहले जिस मशीन पर देशबंधु की छपाई शुरू हुई वह ब्रेमनर मशीनरी कंपनी, लन्दन द्वारा निर्मित थी। 1880, जी हां, 1880-85 के आसपास बनी यह मशीन हमने नौ हजार रुपए में सेकंड हैंड खरीदी थी। इतनी रकम भी उस वक्त के लिहाज से काफी मायने रखती थी। तकनीकी विकास और साधनों की उपलब्धता के अनुसार आगे चलकर हमने समय-समय पर दूसरी उन्नत मशीनें खरीदीं, लेकिन दिलचस्प तथ्य यह है कि एक लंबी अवधि तक छोटेलाल ही मशीनमैन और मशीन विभाग के प्रमुख के रूप में सेवाएं देते रहे। वे जब रिटायर हो गए तब भी देशबन्धु के साथ उनका आत्मीय संबंध बना रहा। दरअसल, छोटेलाल और बाबूसिंह बाबूजी के ऐसे दो साथी थे जिन्होंने हम भाई-बहनों को नहीं, हमारे बच्चों को भी गोद में खिलाया है। फिलहाल मैं छोटेलालजी के साथ श्री जोसेफ, इब्राहीम भाई और मशीन विभाग से जुड़े कुछ अन्य साथियों को याद कर रहा हूं।

1945-50 के बीच बाबूजी नागपुर 'नवभारत में कार्यरत थे। उस दौरान प्रेस में छोटेलाल नामक एक अन्य मशीनमैन थे। सन् 50 में बाबूजी जब पत्र का दूसरा संस्करण स्थापित करने जबलपुर आए तो उपरोक्त छोटेलालजी की अनुशंसा पर उनके हमनाम दामाद हमारे छोटेलालजी साथ में जुड़ गए और सदा के लिए जुड़े रहे। बाबूजी नवभारत का नया संस्करण प्रारंभ करने भोपाल गए तो छोटेलाल भी उनके साथ गए। जब रायपुर से देशबन्धु (तब नई दुनिया रायुपर) निकालना तय हुआ तो छोटेलाल यहां आ गए। बाबूजी ने 1958 के अंत-अंत में अस्पताल के बिस्तर से अपना इस्तीफा नवभारत को भेज दिया था। उपचार के लिए धनाभाव था। छोटेलाल ने नवभारत प्रेस में मैनेजर से जाकर पैसे मांगे। मनाही हो गई तो वे मैनेजर की टेबल पर चढ़कर सीलिंग फैन खोलकर ले आए। उसे बेचकर जो रकम मिली वह बाई (मां को हम यही संबोधन देते थे) के हाथों पर लाकर रख दी। बाबूजी को बाद में जब पता चला तो उन्होंने अपने पूर्व नियोक्ता को पत्र लिखकर इस उद्दंडता के लिए माफी मांगी और रकम वापस भिजवाई।

अपने इन्हीं बुजुर्ग साथी को 1985 के आसपास कभी मुझे मजबूरन रिटायर करना पड़ा। मैं किसी मित्र के घर रात्रिभोज पर गया था। प्रेस से फोन आया- छोटेलालजी शराब पीकर उपद्रव कर रहे हैं। किसी की बात नहीं सुन रहे हैं। मैं भागा-भागा प्रेस आया। डांट-फटकार कर उन्हें घर भिजवाया और अगले दिन सेवामुक्त कर दिया। बाबूजी रायपुर से बाहर थे। लौटकर आए तो मेरी पेशी हुई। ठीक है, तुमने काम से हटा तो दिया है, उनका घर कैसे चलेगा! मेरे तीस-पैंतीस साल के साथी हैं। मैंने आश्वस्त किया कि उसकी व्यवस्था कर दी है। उनके घर हर माह राशन जाएगा और चाची के हाथ में वेतन की राशि। बाबूजी संतुष्ट हुए, लेकिन छोटेलाल जी इस बात से खफ़ा हुए कि उनको मदिरापान के लिए पैसे नहीं मिल पा रहे हैं। खैर, यह व्यवस्था चलती रही। इसमें एक मजेदार बात और हुई। छोटेलाल बीच-बीच में घर आते। मेरी पत्नी को भोजन कराने का आदेश देते। होली-दीवाली उनके और चाची के लिए नए वस्त्रों का प्रबंध भी किया जाता। मैं सामने पड़ जाता तो कहते- मैं बहूरानी से मिलने आया हूं। तुमसे बात नहीं करूंगा।

मैंने जिस मशीन का ऊपर जिक्र किया वह फ्लैटबैड सिलिंडर मशीन थी, जिसमें एक बार में सिर्फ दो पेज छपते थे। एक तरफ से कोरी शीट डालते, दूसरी तरफ से छपा कागज निकलता। जब एक तरफ की छपाई पूरी हो जाती तो उलटी तरफ दो पेज छापे जाते। इसमें छोटेलालजी के साथ दूसरे सिरे पर एक हेल्पर होता था। बाद में ऐसी ही एक और मशीन खरीद ली ताकि समय की बचत हो सके। उस मशीन पर मुझे जहां तक याद है, कंछेदीलाल राठौड़ नियुक्त थे। वे पेपर छापने के अलावा ऊंची आवाज़ लगाकर शहर में पेपर बेचने भी जाते थे। 64-65 के आसपास परमानंद साहू हेल्पर होकर आ गए थे। वे आगे चलकर एक कुशल मशीनमैन बने। 1968 में हमने सेलम (तमिलनाडु) से आदित्यन समूह के ''मलाई मुरुसु अखबार से एक सेकंडहैंड फ्लैडबैड रोटरी मशीन खरीदी। इसमें कागज की शीट के बजाय रील लगती थी और एक साथ चार पेज छपते थे। नागपुर के श्री जोसेफ नामक मशीन मैकेनिक की सेवाएं सेलम से मशीन खोलकर लाने और रायपुर में स्थापित करने के लिए ली गई। यह मशीन अपनी आयु पूरी कर चुकी थी। बार-बार रिपेयरिंग की आवश्यकता पड़ती थी। नागपुर से जोसेफजी इसके लिए आते थे। मैं मोहन नगर, नागपुर में उनके घर भी एक बार गया। छोटेलालजी ने जोसेफजी से जल्दी ही नई तकनीक की समझ हासिल कर ली। वे और परमानंद इसे चलाते रहे।

हमें एक बेहतर मशीन की तलाश थी जो लखनऊ के 'नेशनल हैराल्ड अखबार पहुंचकर पूरी हुई। वहां एक उम्दा फ्लैटबैड रोटरी लगभग नई कंडीशन में खड़ी थी। जनवरी 1971 में बाबूजी ने मुझे और मशीन मैकेनिक इब्राहीम भाई को मशीन लाने लखनऊ भेजा। इब्राहीम सौराष्ट्र में लिंबडी के निवासी थे और एक अच्छे मैकेनिक के रूप में पत्र जगत में उनकी प्रतिष्ठा थी। हम दोनों लखनऊ में एक साथ दस दिन रहे। मशीन खोलकर इब्राहीम भाई को ट्रकों के साथ सड़क मार्ग से रायपुर के लिए रवाना किया और मैं ट्रेन से वापस लौटा। यह नई मशीन बहुत अच्छी थी, लेकिन समय-समय पर रख-रखाव के लिए इब्राहीम अगले कई वर्षों तक रायपुर आते रहे। वे ऐसे मशीन मैकेनिक थे, जो मद्यपान से एकदम दूर थे। कहना न होगा कि छोटेलालजी ने ही बदस्तूर इस मशीन का काम भी संभाला। 'नेशनल हैराल्ड कार्यालय में बीते दस दिनों में जो अनुभव हुए उन्हें मैं अलग से लिख चुका हूं। नए पाठकों की जानकारी के लिए इतना बताना काफी होगा कि लखनऊ का स्टाफ अपने कार्यस्थल को ''नेहरूजी का यतीमखाना कहता था।

छोटेलालजी की कहानी अभी बाकी है। 1974 की जनवरी में छोटेलाल, मैं, मेरी पत्नी माया और हमारी दो नन्हीं-नन्हीं बेटियां रायपुर से सुदूर तिरुनल्लवैल्ली (तमिलनाडु) के लिए रवाना हुए। इस बार भी मशीन लेने ही जाना था, लेकिन उसका गंतव्य भोपाल था, जहां जुलाई 74 में देशबन्धु का तीसरा संस्करण प्रारंभ हुआ। रायपुर से नागपुर तो आराम से पहुंच गए, लेकिन ट्रेनों की भीड़-भाड़ के चलते हमें वहां तीन दिन रुकना पड़ा। पत्रकार अनुज प्रकाश दुबे ने संपर्कों का उपयोग कर किसी तरह हमारा चैन्नई के लिए आरक्षण करवाया। तिरुनल्लवैली में ''दिनमलार" अखबार की एक पुरानी मशीन खरीदना थी। जोसेफ और इब्राहीम के साथ काम करते-करते छोटेलाल इतने प्रवीण हो चुके थे कि मशीन खोलने के लिए बाहर से किसी की सेवाएं लेने की आवश्यकता महसूस नहीं की गई। यात्रा के पांच दिनों के अलावा हमने दिनमलार में दस दिन तक मशीन खोलने का काम किया। सुबह निकलते थे तो लौटते तक शाम छह-सात बज जाते थे। अंतत: खुली मशीन ट्रकों पर लादी गई, छोटेलाल उनके साथ भोपाल के लिए रवाना हुए, रायपुर लौटने के पहले हमने सपरिवार तमिलनाडु दर्शन में कुछ दिन बिताए, जिसकी रोमांचक कहानी मैं कभी बाद में सुनाऊंगा।

सिलिंडर मशीन, फ्लैडबैड रोटरी के बाद अब नई तकनीक की वेब ऑफसेट मशीन का समय था। हमारी पहली ऑफसेट मशीन 1979 में स्थापित हुई। इस पर एक साथ श्वेत-श्याम बारह पेज छापना संभव था। यह मशीन एक घंटे में पच्चीस हजार कॉपी छाप सकती थी। तकनीकी तौर से बंधु ऑफसेट मशीनरी वर्क्स की यह मशीन अब तक की सभी मशीनों से अलग थी, लेकिन अपनी नैसर्गिक क्षमता व प्रतिभा के बल पर छोटेलालजी ने इस मशीन का काम भी सम्हाला। उनकी याद अब भी आ ही जाती है। प्रसंगवश यह संकेत करना शायद उचित होगा कि छोटेलाल सफाई कामगार समुदाय से आते थे। बाद में एक कुशाग्र मशीनमैन राधेलाल आदिवासी थे। इस तरह हमारा मशीन विभाग भारत की बहुलतावादी संस्कृति का ज्वलंत उदाहरण था।

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देशबंधु में 11 जुलाई 2019 को प्रकाशित
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( प्रस्तुति: डाॅ शरद सिंह)

मंगलवार, नवंबर 19, 2019

देशबंधु के साठ साल - 2 - ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय ब्लाॅग मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक ल
गेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है        
प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की टिप्पणी सहित लेखमाला की  दूसरी कड़ी.... 
 
Lalit Surjan

देशबंधु के साठ साल -2
 
- ललित सुरजन
 
छत्तीसगढ़ में आप किसी विषय पर शोध करना चाहते हैं, कोई पुरानी खबर या विज्ञापन आपको देखना है तो बहुत संभव है कि इसके लिए आप देशबन्धु लाइब्रेरी आएं। इस सार्वजनिक ग्र्रंथालय में देशबन्धु के पिछले साठ सालों के दौरान प्रकाशित अंकों की जिल्दों में कहीं आपको अपनी वांछित सामग्री मिल जाएगी। देश-दुनिया के अनेक समाचारपत्रों में विगत अंकों को इस तरह से संरक्षित रखा जाता है। इसलिए यह कोई अनोखी बात नहीं है। लेकिन आपको जानकर अचरज होगा कि जिस व्यक्ति ने देशबन्धु की पुरानी फाइलों को सिलसिलेवार संजोने की प्रणाली विकसित की, वह लगभग निरक्षर था। उसकी पढ़ाई चौथी हिन्दी से आगे नहीं हुई थी; लिखावट बहुत खराब, जिसे शायद मैं अकेला ही पढ़ पाता था; जिसने कभी आजीविका के लिए कुछ समय के लिए पान दूकान खोल ली थी; और जो सदर बाजार के सद्दानी चौक पर खड़े होकर लोगों से शर्त लगाने का शौकीन था कि छप्पर से बारिश की पहली बूंद कितनी देर में नीचे गिरेगी। इस शख्स का नाम था- बालकृष्ण जोशी। उन्हें और उनकी पत्नी झुमरीबाई को हम फूफाजी-बुआजी का आदरसूचक संबोधन देते थे।

बालकृष्ण जोशी बूढ़ापारा में प्रेस के बाजू से गुजरने वाली गोकुलचंद्रमा गली में उस छोर पर दूसरे मकान में रहते थे। 17 अप्रैल 1959 को अखबार चालू हुआ तो दूसरे-तीसरे दिन वे मुहल्लावासियों का डेलीगेशन लेकर बाबूजी से लड़ने आ गए थे। आपकी मशीन की खटखट से हमारी रातों की नींद में बाधा पड़ रही है। बाबूजी ने मुस्कुरा कर उन्हें समझाया- कुछ दिनों बाद यही खटखट आपको लोरी लगने लगेगी। और फिर अखबार का काम चौबीस घंटे चलता है तो आपके घर चोर भी नहीं आएंगे। मुहल्लेवासी संतुष्ट होकर लौट गए। यही जोशीजी लगभग चार साल बाद 1963 में प्रेस से कैसे जुड़े, यह मुझे ध्यान नहीं, लेकिन जब आ गए तो ताउम्र हमारे साथ ही रहे आए। गोकुलचंद्रमा मंदिर में जोशी दंपति का मेरे दादा-दादी से परिचय हुआ होगा। उसी कारण शायद यह मुंहबोला रिश्ता बना होगा। नि:संतान जोशीजी की एक भतीजी कृष्णा उनके पास रहती थीं, वह मेरी छोटी बहिन ममता की हमउम्र सहेली बन गई। जोशीजी पढ़े-लिखे तो नहीं थे, लेकिन व्यवहारबुद्धि उनमें अपार थी। वे अपने ढंग से कुछ चालाक भी थे। अनेक प्रेस कर्मचारी उनसे सूद पर रकम उठाते थे। मुझे मालूम पड़ा तो उन्हें रोका। कर्मचारियों के लिए उनका अपना कल्याण कोष स्थापित किया, जिससे वे कई जगहों से कर्जमुक्त हो सके। जोशीजी ने शिकायत की-आपने मेरी कमाई बंद करवा दी।

खैर, यह जोशीजी की ही सोच थी कि अखबार की दैनंदिन प्रतियों को संभालकर रखा जाए। उन्होंने पिछले तीन-तीन माह के अंकों की फाइलें बनवाना शुरू किया। उन्हें रखने के लिए भारी लकड़ी के बड़े-बड़े रैक बनवाए। पत्र की जो अतिरिक्त प्रतियां रखी जाती थीं, उसकी भी प्रणाली बनाई- आज के अंक की बीस कॉपियां, एक माह बाद सिर्फ दस, एक साल बाद घटाकर पांच। अनावश्यक जगह क्यों घेरी जाए! अगर किसी को पुराने अखबार की प्रति चाहिए तो जितना पुराना अंक, उतना अधिक दाम। अधिकतर जमीन-जायदाद के मुकदमों से संबंधित खबर/विज्ञापन के लिए ही लोग पुराना पेपर लेने आते थे। उनसे मुरव्वत क्यों? आखिर रख-रखाव में हमें भी तो खर्च करना पड़ता है, यह जोशीजी का तर्क था। उन्होंने जो व्यवस्था लागू की, वह आज छप्पन साल बाद भी लगभग वैसी ही चली आ रही है।

जोशीजी पर प्रेस की रद्दी, स्याही के ड्रम आदि के निबटान का जिम्मा भी था। हमारे हितैषी बैंक मैनेजर डागाजी ने जोशीजी को निर्देश दिया- तुम रद्दी बिक्री की रकम से हर माह एक सौ रुपए लाकर मुझे दोगे। उसका एक अलग खाता खोला गया। पांच साल बाद जब घर बनाने के लिए सहकारी समिति में प्लॉट खरीदने का अवसर मिला तो बचत की रकम काम आई। बाबूजी को भी उस दिन तक इसका पता नहीं था। जोशीजी के अनोखे व्यक्तित्व के बारे में लिखने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन एक प्रसंग का जिक्र करना उचित होगा। जोशी दंपति का अपना कोई खास घर खर्च नहीं था। अनेक संपन्न परिवारों में उनकी जजमानी चलती थी। अपने देहांत से कुछ साल पहले उन्होंने एक कन्या शाला में पेयजल व्यवस्था के लिए अपनी मेहनत से जोड़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा लगा दिया। वे एक सहृदय, सदाशयी व्यक्ति थे और उनकी स्मृति जब-तब आ ही जाती है।

एक अन्य सहयोगी रामसखीले दुबे भी अपने ढंग के अनोखे थे। मैं उन्हें महाराज कहता था। गो कि अधिकतर उन्हें लंगड़े पंडित ही कहा जाता था। आज रामसागरपारा के जिस प्रेस भवन से देशबन्धु का कारोबार संचालित होता है, उसके निर्माण में महाराज ने अनथक और अनकथ परिश्रम किया है। हमारे आवासगृह को तामीर करने में भी महाराज ने वैसी ही दौड़-धूप की थी। महाराज रीवां के पास किसी गांव के मूल निवासी थे और अब भी शायद वहीं रहते हैं। मुझे जहां तक याद पड़ता है वे 1961-62 में जबलपुर पे्रस में फोल्डिंग विभाग में काम करने आए थे। सन् 62 के अंत में जबलपुर नई दुनिया से बाबूजी अलग हुए तो महाराज भी हमारे साथ-साथ आ गए। नया अखबार शुरू होने में कुछ माह का समय था तो पाककला में प्रवीण महाराज ने घर की रसोई संभाल ली। अखबार चालू हुआ तो घर-दफ्तर दोनों जगह ड्यूटी करते रहे। पोलियोग्रस्त होने के कारण महाराज का एक पैर छोटा था। लंगड़ाकर चलते थे, लेकिन उनकी फुर्ती देखते बनती थी। वे हमारे ऐसे साथी थे, जिन्होंने कभी किसी काम के लिए मना नहीं किया। भवन निर्माण के समय दिन-दिन भर साइट पर खड़े रहना, निर्माण सामग्री के लिए दूकानों के चक्कर लगाना, श्रमिकों के साथ सद्व्यवहार के साथ उनके काम की निगरानी रखना- यह सब काम महाराज ने पूरी लगन और निष्ठा के साथ किया। बढ़ती उम्र में विवाह करने के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों को सम्हालने आदि कारणों से वे गांव वापस चले गए। यह हमारी विवशता थी कि चाहकर भी उन्हें रोककर नहीं रख सके।

मुझे रघुनाथराव कड़वे की भी याद आती है। प्रेस में अधिकतर लोग उन्हें रघुनाथ दादा कहते थे। दुर्बल कद-काठी के रघुनाथ रातपाली के चौकीदार थे। दिन में वे म.प्र. विद्युत मंडल में चतुर्थ श्रेणी के किसी पद पर काम करते थे। रघुनाथ देखने में सुकोमल लेकिन स्वभाव में कड़क थे। मजाल है कि उनके ड्यूटी पर रहते एक कागज इधर का उधर हो जाए। हमारे एक कैशियर को भूलने की बीमारी थी, शायद जानबूझकर। वे शाम को कई बार कैशबॉक्स खुला छोड़कर घर चले जाते थे। रघुनाथ कैशबॉक्स को ताला लगाते, गोदरेज की आलमारी में बंद करते और चाबियां देने घर तक आते। उनके बारे में दिलचस्प तथ्य यह था कि उनकी उम्र का किसी को पता नहीं था। देखकर लगता था कि रिटायरमेंट का समय हो चुका है, लेकिन विद्युत मंडल में किसी जादू से हर साल उनकी सेवानिवृत्ति टल जाती थी। शायद हो कि वहां के अधिकारी भी उनकी कर्तव्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें विदा न करना चाहते हों! रघुनाथ के बेटे सतीश ने भी कुछ समय तक प्रेस में काम किया, लेकिन टिक नहीं पाए। रघुनाथराव ने शायद तीस साल से भी अधिक समय तक अखबार को अपनी सेवाएं दीं। कर्तव्यपरायणता और ईमानदारी उन दिनों भी शायद इतनी ही दुर्लभ या सुलभ थी, जितनी आज है। यह हमारा सौभाग्य था कि हमें इनके जैसी साथी-सहयोगी मिले।

इस लेखमाला की 11 अप्रैल को प्रकाशित पहली किश्त में मैंने कुछ ऐसे जनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की थी, जिनका देशबन्धु की साठसाला यात्रा में किसी न किसी वक्त पर अनमोल सहयोग मिला। आज उसी कड़ी में अपने उपरोक्त तीन सहयोगियों की चर्चा हुई है। मैंने अमेरिका के उपन्यासकार कैमरून हॉले का बहुचर्चित उपन्यास -''द एक्जीक्यूटिव सुईट'' या ''अध्यक्ष कौन हो'' 1962-63 में पढ़ा था और उससे गहरे तक प्रभावित हुआ था। इस उपन्यास का आधारबिंदु यही था कि कोई भी प्रतिष्ठान सिर्फ मशीनों और जड़ नियमों से नहीं बल्कि मानवीय सरोकारों से संचालित होता है। मैं अक्सर सोचता हूं कि बाबूजी को ऐसे साथी न मिले होते तो अखबार आगे कैसे बढ़ता! अगली किश्त शीघ्र ही, कुछ और साथियों-सहयोगियों के परिचय के साथ।
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देशबंधु में 27 जून 2019 को प्रकाशित 
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( प्रस्तुति: डाॅ शरद सिंह)
 
 

सोमवार, नवंबर 18, 2019

देशबंधु के साठ साल -1 - ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
 प्रिय ब्लाॅग मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक ल
गेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है        

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की टिप्पणी सहित लेखमाला की पहली कड़ी....


देशबंधु के साठ साल पूरे होने पर मैं एक लेखमाला लिख रहा हूँ। इसकी पहली कड़ी यहाँ प्रस्तुत है। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का यह अध्याय आपको शायद पसंद आए।
शुभकामनाएं
ललित सुरजन, रायपुर 
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Lalit Surjan

देशबंधु के साठ साल -1
- ललित सुरजन

देशबन्धु ने साठ साल का सफर तय कर लिया है। हीरक जयंती के लिए बस दो दिन शेष हैं। शुभ मुहूर्त के हिसाब से रामनवमी संवत् 2016 को रायपुर से देशबन्धु का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। प्रचलित कैलेण्डर के हिसाब से तारीख थी 17 अप्रैल 1959। वह तारीख भी छह दिन बाद ही है। हमारे घर में मालूम नहीं कब से यह मान्यता चली आ रही है कि ऐसी पांच तिथियां हैं जिनमें मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। ये हैं- बसंत पंचमी, रामनवमी, अक्षय तृतीया, दशहरा और धनतेरस। बाबूजी ने इसी विचार से शायद रामनवमी का दिन अपना स्वतंत्र व्यवसाय प्रारंभ करने के लिए चुना था। जैसा कि किसी भी उपक्रम में, और किसी भी व्यक्ति के जीवन में स्वाभाविक है, देशबन्धु को साठ साल की इस यात्रा में बहुत से उतार-चढ़ाव देखना पड़े हैं। बाबूजी को जानने वाले कहते थे कि मायाराम जी रेत में नाव चला रहे हैं। यह टिप्पणी सही भी थी और गलत भी। नाव चलाने के लिए पानी और पतवार दोनों चाहिए और आज वह क्षण है जब हम उन लोगों को याद करें जिन्होंने हमें स्नेह दिया, आत्मीयता दी, विश्वास दिया और जो समय-समय पर हमारे संबल बने।

देशबन्धु को पत्रकारिता का विश्वविद्यालय कहा जाता है। हमारे खाते में बहुत कुछ है जिस पर हमें संतोष होता है और जिस पर हम गर्व भी कर सकते हैं, लेकिन आज मैं उन लोगों का उल्लेख करना चाहता हूं जो देशबन्धु को इस मुकाम तक पहुंचाने में सहायक बने। बाबूजी के लिए रायपुर एक लगभग अपरिचित स्थान था। 1958 के अंत में जब उन्होंने एक समाचार पत्र समूह से दुखी मन से विदा ली तब उनके पास दिल्ली और बंबई के बड़े अखबारों में काम संभालने के ऑफर थे। स्व. देवदास गांधी ने उन्हें हिन्दुस्तान टाइम्स में आने का निमंत्रण दिया था। बाबूजी इसे शायद स्वीकार भी कर लेते, लेकिन सामने उन चालीस लोगों की आजीविका का प्रश्न था जो उनके साथ ही उस पत्र समूह से इस्तीफा देकर अलग हो गए थे। बाबूजी यदि चाहते तो जबलपुर, भोपाल, नागपुर में कहीं से नया अखबार निकाल सकते थे। इसके लिए भी उनके पास निमंत्रण थे। लेकिन वे अपने पूर्व नियोक्ता के साथ स्पर्द्धा करने के बजाय किसी ऐसी जगह जाना चाहते थे जहां उन्हें मानसिक शांति मिल सके।

1958 का रायपुर एक उभरता हुआ नगर था। यहां कुछ पुराने सहपाठियों के अलावा बाबूजी दो-तीन लोगों को विशेषकर जानते थे। इनमें रायपुर के विधायक और प्रभावी नेता शारदाचरण तिवारी थे जिनसे काफी पहले से पहचान थी। जब बाबूजी अखबार निकालने के लिए रायपुर आए तो कुछ दिनों के लिए तिवारीजी के घर पर ही रहे। आवास के लिए बैरन बाजार में किराए का मकान भी उन्होंने ही दिलाया और प्रेस के लिए सद्दानी चौक से श्याम टाकीज की सड़क पर प्रभुलाल हलवाई का मकान भी उनके ही सौजन्य से मिला। बाबूजी के साथ आए अधिकतर लोग ड्यूटी करने के बाद निकट स्थित तिवारीजी के श्याम टाकीज में ही जाकर विश्राम और स्नान-ध्यान करते थे।

दूसरे परिचित थे धमतरी के केशरीमल लुंकड़ जो सिने वितरक और सिने मालिक थे। केशरीमलजी बाबूजी को बहुत सम्मान देते थे। बड़ा भाई जैसा मानते थे और बाबूजी के निधन के बाद भी हम पर उनका स्नेह अंत तक बना रहा। उस शुरूआती दौर में कार नहीं थी तो केशरीमलजी ने अपनी गाड़ी भिजवा दी थी कि जब पैसा होगा तब इसकी कीमत चुका देना। मुझे यहां तीसरे सिने व्यवसायी सतीश भैया याने स्व. सतीशचंद्र जैन का ध्यान आता है। बाबूलाल टाकीज संभालने वाले सतीश भैया एक प्रबुद्ध नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता थे। वे विरल व्यापारियों में से थे जो पुस्तकें खरीदते और पढ़ते थे और जिनके साथ घंटों देश-दुनिया के विषयों पर चर्चा की जा सकती थी।

देशबन्धु का प्रकाशन इंदौर नई दुनिया के रायपुर संस्करण के रूप में प्रारंभ हुआ था। इंदौर में उसके तीन भागीदार थे- लाभचंद छजलानी याने बाबूजी, नरेन्द्र तिवारी याने चाचाजी और बसंतीलाल सेठिया याने भैयाजी। यह अपने समय की एक बेमिसाल भागीदारी थी। इंदौर वाले बाबूजी और उनके दोनों साथियों ने न सिर्फ रायपुर से अखबार निकालने में प्रारंभिक मदद की बल्कि लंबे समय तक उनका सहयोग इस अखबार को मिलता रहा। 1972 की रामनवमी को नई दुनिया रायपुर का नाम बदलकर देशबन्धु रखा गया। उसी साल देशबन्धु चितरंजन दास की जन्मशती भी थी। भागीदारी खत्म होने के बाद भी इंदौर के साथ हमारे पारिवारिक संबंध बने रहे। जब अखबार शुरू हुआ तो इंदौर से बाबूजी के पुत्र अभय छजलानी और बाद में रामचंद्र नेमा यहां काम जमाने में मदद हेतु कुछ समय के लिए आकर रहे।

जिन चालीस लोगों ने बाबूजी के साथ अपनी जमी जमाई नौकरी छोड़ दी थी उनमें से कुछ के नाम मुझे कभी नहीं भूलते। जैसे मशीनमैन छोटेलाल, कंपोजिंग फोरमैन दुलीचंद, जीतनारायण राय, गुलाब सिंह, रामप्रसाद यादव, ड्राइवर मारुतिराव, बाबूजी के स्वघोषित अंगरक्षक बाबूसिंह, फिर मोतीलाल गुप्ता इत्यादि। रामप्रसाद मुझसे उम्र में दो-एक साल बड़े थे। उद्यमी थे। उन्होंने कंपोजिंग के साथ-साथ सुबह अखबार बांटना भी शुरू किया और आगे चलकर यादव न्यूज एजेंसी भी खोली जिसे अब छोटे भाई व बेटे संभाल रहे हैं। मारुतिराव बिना कार के ड्राइवर थे और दफ्तर में जो काम समझ आए करते थे। उनकी मां जिन्हें हम सब आई कहते थे ने कठिन समय में जो हमारी मदद की उस पर बाबूजी का मार्मिक संस्मरण पठनीय है।

देशबन्धु की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता उसकी संपादकीय रीति-नीति और प्रयोगधर्मिता के कारण बनी है। बाबूजी स्वयं सिद्धहस्त पत्रकार थे और उन्होंने कुशल पत्रकारों की एक चमकदार टीम तैयार कर ली थी। पंडित रामाश्रय उपाध्याय एक तरह से इस टीम के वायस कैप्टन थे। मुझे के.आई. अहमद अब्बन, पंकज शर्मा और श्री सिद्दीकी की तिकड़ी का ध्यान आता है जो प्रारंभिक वर्षीें में सहयोगी थे और जिनकी प्रतिभा का अखबार को भरपूर लाभ मिला। पंडितजी के साथ दा याने राजनारायण मिश्र और कुछ दिन बाद सत्येन्द्र गुमाश्ता भी जुड़ गए थे। इन्होंने अखबार की धाक जमाने के लिए जो काम किया वह अविस्मरणीय है। सत्येन्द्र तो ताउम्र हमारे साथ ही काम करते रहे। वे छत्तीसगढ़ के पहले पत्रकार थे जिन्होंने अनेक देशों की यात्रा की थी। कैंसर ने उन्हें हमसे असमय छीन लिया।

देशबन्धु के आंचलिक प्रतिनिधियों और संवाददाता में दुर्ग के धीरज भैया याने धीरजलाल जैन का नाम सर्वोपरि है। वे व्यवहार कुशल पत्रकार होने के साथ व्यापार कुशल भी थे। मुझे उनका बहुत मार्गदर्शन मिला। तखतपुर के दर्शन सिंह, दल्लीराजहरा के ओंकारनाथ जायसवाल, बागबाहरा के विष्णुराम परदेसी उर्फ भगतजी के नाम भी मुझे इस क्षण याद आ रहे हैं। मैं यहां गिरधर दास डागा का उल्लेख भी करना चाहता हूं। वे सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में अधिकारी थे। बैंक में हमारी साख जमाने का बड़ा श्रेय उनको जाता है। आज हम जहां हैं उसमें सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का बहुत योगदान रहा है। इस बारे में मैं आगे कभी लिखूंगा। अभी बहुत से व्यक्ति हैं जिनके नाम मन में उमड़-घुमड़ रहे हैं उनकी भी चर्चा आगे होगी। अभी तो देशबन्धु की हीरक जयंती के अवसर पर हम अपने सभी पाठकों, अभिकर्ताओं, विज्ञापनदाताओं, मित्रों, सहयोगियों, सहकर्मियों और शुभचिंतकों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। हमें विश्वास है कि आपका स्नेह और सहयोग आने वाले समय में भी हमें मिलता रहेगा।
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#देशबंधु में 11 अप्रैल 2019 को प्रकाशित
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( प्रस्तुति: डाॅ शरद सिंह)