शनिवार, सितंबर 28, 2019

लहना सिंह की सूबेदारनी और स्त्री के भीतर की स्त्री - डॉ शरद सिंह

लहना सिंह की सूबेदारनी और स्त्री के भीतर की स्त्री - डॉ शरद सिंह
    लिखे जाने के लगभग 105 वर्ष बाद भी प्रासंगिक लगती है गुलेरी जी की कहानी ‘‘उसने कहा था’’ .... सूबेदारनी का लहना के प्रति प्रेम किसी परिधि में बंधा हुआ नहीं था। उसके साथ न तो कोई सम्बोधन जुड़ा हुआ था और न कोई रिश्ता। वस्तुतः ‘उसने कहा था’’ कहानी में सूबेदारनी एक औरत का बाहरी स्वरूप था। उसके भीतर की औरत अपनी भावनाओं को दो तरह से जी रही थी। एक पति के प्रति समर्पिता और दूसरी अपने उस प्रेमी की स्मृति को संजोए हुए जिसको कभी उसने दुनियावी प्रेमी की दृष्टि से शायद देखा ही नहीं था।
      जिसने भी चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ पढ़ी है, उसे वह संवाद कभी नहीं भूल सकता कि लहना लड़की से पूछता है-‘तेरी कुड़माई हो गई?’ और लड़की ‘धत्’ कह कर शरमा जाती है। लहना का इस तरह पूछना लड़की के मन को गुदगुदाया तो अवश्य होगा, जब कभी अकेले में यह प्रश्न उसके मन में कौंधा होगा। ‘कुड़माई’ का न होना लहना के लिए सुखद था क्यों कि तब उसके मन में लड़की को पा लेने की सम्भावना थी। यह पा लेना ‘दैहिक’ नहीं ‘आत्मिक’ था। फिर भी लहना को वह लड़की नहीं मिली। लड़की ने एक दिन ‘तेरी कुड़माई हो गई’ का उत्तर दे दिया कि ‘हां, हो गई....!’ लहना विचलित हो गया। और वह लड़की? उस लड़की का विवाह जिससे हुआ, वह आगे चल कर सेना में सूबेदार बना और वह लड़की कहलाई सूबेदारनी। एक भरा-पूरा परिवार, वीर, साहसी पति, वैसा ही वीर, साहसी बेटा। आर्थिक सम्पन्नता। सामाजिक दृष्टि से सुखद पारिवारिक जीवन। सुबेदारनी ने अपना दायित्व निभाने में कहीं कोई कमी नहीं रखी। उससे न सूबेदार को शिकायत और न उसके परिवार के किसी अन्य सदस्य को। अपने सामाजिक रिश्तों को निभाने में सूबेदारनी ने अपने जीवन, अपनी भावनाओं को समर्पित कर दिया। मन बहुत कोमल होती है, चाहे स्त्री का हो या पुरुष का। मन अपना अलग जीवन रचता है, अपनी अलग दुनिया सजाता है और सबसे छिप कर हंस लेता है, रो लेता है।
यदि लहना सिंह उस लड़की को भुला नहीं सका तो ‘वह लड़की’ यानी सूबेदारनी के मन के गोपन कक्ष में लहना की स्मृतियां किसी तस्वीर की भांति दीवार पर टंगी रहीं। सूबेदारनी ने ही तो पहचाना था लहना सिंह को और सूबेदार से कह कर बुलवाया था अनुरोध करने के लिए। स्त्री अपने प्रति प्रकट की गई उस भावना को कभी नहीं भूलती है जो निष्कपट भाव से प्रकट किए गए हों। सूबेदारनी के बारे में सोचते हुए अकसर मुझे अपनी ये काव्य-पंक्तियां याद आती हैं-
'छिपी रहती है
हर औरत के भीतर एक औरत
अकसर हम देख पाते हैं सिर्फ़ बाहर की औरत को।'
- डॉ शरद सिंह

‘इंसाफ का तराजू’ और स्त्री-मुद्दे : वाया बॉलीवुड - डॉ शरद सिंह

 
इंसाफ का तराजू और स्त्री-मुद्दे - वाया बॉलीवुड - डॉ शरद सिंह
भारतीय सिनेमा में यदि सन् 1980 की बात की जाए तो उस वर्ष एक फिल्म रिलीज़ हुई थी-‘इंसाफ का तराजू’। बी. आर. चोपड़ा के द्वारा निर्देशित इस फिल्म की भारतीय स्क्रिटिंग की थी शब्द कुमार ने। वस्तुतः यह फिल्म हॉलीवुड की एक प्रसिद्ध मूवी ‘लिपिस्टिक’ पर आधारित थी। कहानी नायिका प्रधान थी और बलात्कार जैसे संवेदनशील विषय पर आधारित थी। सौंदर्य प्रतियोगिता में सफल रहने वाली एक सुंदर युवती पर एक अय्याश पूंजीपति का दिल आ जाता है और वह यह जानते हुए भी कि युवती किसी और की मंगेतर है, उसके साथ बलात्कार करता है। वह युवती पुलिस में रिपोर्ट लिखाती है। मुक़द्दमा चलता है और भरी अदालत में प्रतिवादी का वकील अमानवीयता की सीमाएं तोड़ते हुए युवती से अश्लील प्रश्न पूछता है और अंततः युवती को बदचलन ठहराने में सफल हो जाता है। पीड़ित युवती उस शहर को छोड़ कर दूसरे शहर में जा बसती है। उसका जीवन ग्लैमर से दूर एकदम रंगहीन हो जाता है। फिर भी वह अपनी छोटी बहन के लिए जीवन जीती रहती है। दुर्भाग्यवश कुछ अरसे बाद उसकी छोटी बहन भी नौकरी के सिलसिले में उसी अय्याश पूंजीपति के चंगुल में फंस जाती है और बलात्कार का शिकार हो जाती है। एक बार फिर वहीं अदालती रवैया झेलने और अपनी छोटी बहन को अपमानित होते देखने के बाद वह युवती तय करती है कि अब वह स्वयं उस बलात्कारी को दण्ड देगी।
‘इंसाफ का तराजू’ पर यह आरोप हमेशा लगता रहा कि एक संवेदनशील मुद्दे को व्यावयासिक ढंग से फिल्माया गया। दूसरी ओर ‘चक्र’, ‘दमन’, ‘बाज़ार’ जैसी फिल्में पूरी सादगी से और अव्यवसायिक ढंग से स्त्री-मुद्दों को उठा रही थीं। लेकिन ‘इंसाफ का तराजू’ की अपेक्षा इनकी दर्शक संख्या न्यूनतम थी। ये फिल्में बुद्धिजीवियों और अतिसंवेदनशील दर्शकों की पहली पसंद बन पाई जबकि ‘इंसाफ का तराजू’ ने बॉक्स आफिस पर रिकार्ड तोड़ दिया।
- डॉ शरद सिंह

मंगलवार, जुलाई 30, 2019

प्रेमचंद जयंती पर.....कहानियां जो सोचने को विवश करती हैं.....कहानी - ठाकुर का कुंआ


Dr (Miss) Sharad Singh
कुछ कहानियां पढ़ने के बाद मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ जाती हैं। प्रेमचंद के कथापात्र आज भी हमारे गांव, शहर और कस्बों में दिखाई देते हैं। दृश्य बदला है लेकिन इन पात्रों की दशा में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है। प्रेमचंद का किसान साहूकार के कर्ज तले दबा हुआ था तो आज का किसान भी कर्ज के बोझ से आत्महत्या करने को विवश हो उठता है। प्रेमचंद का किसान साहूकार के निजी बहीखाते में बंधुआ था, तो आज का किसान कर्ज़माफ़ी के सरकारी बहीखाते में बंधुआ है। शराबी पिता-पुत्र के परिवार की बहू के रूप में इकलौती स्त्री ‘कफ़न’ कहानी में तड़प-तड़प कर मरती दिखाई देती है, तो आज झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली स्त्रियों की दशा इससे अलग नहीं है। प्रेमचंद ने समाज का एक समाजशास्त्री की भांति आकलन किया और सुधार के मार्ग सुझाए। उन्होंने समाज में व्याप्त विसंगतियों को अपनी कथासाहित्य के माध्यम से उजागर किया ताकि लोगों का उस ओर ध्यान आकृष्ट हो और समाज सुधार के क़दम उठाए जा सकें। उन्होंने विधवा स्त्री से विवाह कर स्वयं इस दिशा में पहल की। प्रस्तुत है प्रेमचंद की कहानी ‘ठाकुर का कुंआ’......  
ठाकुर का कुंआ (कहानी)

लेखकः प्रेमचंद

प्रस्तुतिः डॉ. शरद सिंह
(लेखक परिचयः कथा सम्राट प्रेमचंद का जन्म काशी से चार मील दूर बनारास के पास लमही नामक गांव में 31 जुलाई 1880 को हुआ था। उनका असली नाम श्री धनपतराय। प्रेमचंद आधुनिक हिन्दी कहानी के पितामह माने जाते हैं। प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि, विभिन्न साहित्य रूपों में, अभिव्यक्त हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की किन्तु प्रमुख रूप से वह कथाकार हैं। उन्हें अपने जीवन काल में हीकथा सम्राटकी उपाधि मिल गयी थी।

उनकी कृतियां हैः- उपन्यास- वरदान, प्रतिज्ञा, सेवा-सदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान, मनोरमा, मंगलसूत्र(अपूर्ण)।
कहानी संग्रह - प्रेमचंद ने कई कहानियां लिखी है। उनके २१ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए थे जिनमे 300 के लगभग कहानियां है। प्रेमचंद की कहानियों का संग्रह 'मानसरोवर' नाम से आठ भागों में प्रकाशित है। नाटक- संग्राम, कर्बला तथा प्रेम की वेदी।
जीवनियां- महात्मा शेख सादी, दुर्गादास, कलम तलवार और त्याग, जीवन-सार(आत्म कथात्मक)
बाल रचनाएं- राम चर्चा ,मनमोदक , जंगल की कहानियां, आदि।

8 अक्टूबर 1936 को प्रेमचंद का निधन हुआ।)



   जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई । गंगी से बोला-‘यह कैसा पानी है ? मारे बास के पिया नहीं जाता । गला सूखा जा रहा है और तू सडा़ पानी पिलाए देती है !’
       गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी । कुआं दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था । कल वह पानी लायी, तो उसमें बू बिलकुल न थी, आज पानी में बदबू कैसी ! लोटा नाक से लगाया, तो सचमुच बदबू थी । जरुर  कोई जानवर कुएं में गिरकर मर गया होगा, मगर दूसरा पानी आवे कहां से?
ठाकुर के कुंए पर
कौन चढ़ने देगा ? दूर से लोग डांट बताऍगे । साहू का कुआ गांव के उस सिरे पर है, परन्तु वहां कौन पानी भरने देगा ? कोई कुंआ गांव में नहीं है।
      जोखू कई दिन से बीमार हैं । कुछ देर तक तो प्यास रोके चुप पड़ा रहा, फिर बोला-‘अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता । ला, थोड़ा पानी नाक बंद करके पी लूं ।
     गंगी ने पानी न
दिया । खराब पानी से बीमारी बढ़ जाएगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देने से उसकी खराबी जाती रहती हैं । बोली-‘यह पानी कैसे पियोगे ? न जाने कौन जानवर मरा हैं। कुंए से मैं दूसरा पानी लाए देती हूं।’
        जोखू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा-‘पानी कहां से लाएगी ?’
       ‘ठाकुर और साहू के दो कुंए तो हैं। क्यों एक लोटा पानी न भरने देंगे?’
       ‘हाथ-पांव तुड़वा आएगी और कुछ न होगा । बैठ चुपके से । ब्राहम्ण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक पांच लेगें । गराबी का दर्द कौन समझता हैं ! हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झांकने नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएं से पानी भरने देंगे ?’ इन शब्दों में कड़वा सत्य था । गंगी क्या जवाब देती, किन्तु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया ।


         रात के नौ बजे थे । थके-मांदे मजदूर तो सो चुके थे, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पांच बेफिक्रे जमा थे मैदान में । बहादुरी का तो न जमाना रहा है, न मौका। कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं । कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार को एक खास मुकदमे की नकल ले आए । नाजिर और मोहतिमिम, सभी कहते थे, नकल नहीं मिल सकती । कोई पचास मांगता, कोई सौ। यहां बे-पैसे-कौड़ी नकल उड़ा दी । काम करने ढंग चाहिए ।
         इसी समय गंगी कुंए से पानी लेने पहुंची  कुप्पी की धुंधली रोशनी कुए पर आ रही थी । गंगी जगत की आड़ मे बैठी मौके का इंतजार करने लगी । इस कुंए का पानी सारा गांव पीता हैं । किसी के लिए रोका नहीं, सिर्फ ये बदनसीब नहीं भर सकते । गंगी का विद्रोही दिल रिवाजी पाबंदियों और मजबूरियों पर चोटें करने लगा-हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊंचे हैं ? इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं ? यहां तो जितने है, एक-से-एक छंटे हैं । चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें । अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिए की भेड़ चुरा ली थी और बाद मे मारकर खा गया । इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते है । काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है । किस-किस बात मे हमसे ऊंचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊंचे है, हम ऊंचे । कभी गांव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आंख से देखने लगते हैं। जैसे सबकी छाती पर सांप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊंचे हैं!
         कुंए पर किसी के आने की आहट हुई । गंगी की छाती धक-धक करने लगी । कहीं देख ले तो गजब हो जाए । एक लात भी तो नीचे न पड़े । उसाने घड़ा और रस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अंधेरे साए मे जा खड़ी हुई । कब इन लोगों को दया आती है किसी पर ! बेचारे महगू को इतना मारा कि महीनों लहू थूकता रहा। इसीलिए तो कि उसने बेगार न दी थी । इस पर ये लोग ऊंचे बनते हैं ?

कुंए पर स्त्रियां पानी भरने आयी थी। इनमें बात हो रही थीं ।
      ‘खान खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओ । घड़े के लिए पैसे नहीं है।
      ‘हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती हैं ।
      ‘हां, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियां ही तो हैं।
       ‘लौंडियां नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं ? दस-पांच रुपये भी छीन-झपटकर ले ही लेती हो। और लौंडियां कैसी होती हैं!
        ‘मत लजाओ, दीदी! छिन-भर आराम करने को जी तरसकर रह जाता है। इतना काम किसी दूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती। ऊपर से वह एहसान मानता ! यहां काम करते-करते मर जाओ, पर किसी का मुंह ही सीधा नहीं होता
        दोनों पानी भरकर चली गई, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुंए की जगत के पास आयी । बेफिक्रे चले गऐ थे । ठाकुर भी दरवाजा बंदर कर अंदर आंगन में सोने जा रहे थें । गंगी ने क्षणिक सुख की सांस ली। किसी तरह मैदान तो साफ हुआ। अमृत चुरा लाने के लिए जो राजकुमार किसी जमाने में गया था, वह भी शायद इतनी सावधानी के साथ और समझ-बूझकर न गया हो । गंगी दबे पांव कुंए की जगत पर चढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ ।
        उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला । दाएं-बाएं चौकन्नी दृष्टी से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रु के किले में सूराख कर रहा हो । अगर इस समय वह पकड़ ली गई, तो फिर उसके लिए माफी या रियायत की रत्ती-भर उम्मीद नहीं । अंत मे देवताओं को याद करके उसने कलेजा मजबूत किया और घड़ा कुंए में डाल दिया ।
         घड़े ने पानी में गोता लगाया, बहुत ही आहिस्ता । जरा-सी आवाज न हुई गंगी ने दो-चार हाथ जल्दी-जल्दी मारे । घड़ा कुंए के मुंह तक आ पहुंचा । कोई बड़ा शहजोर पहलवान भी इतनी तेजी से न खींच सकता था।
      गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखें कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाजा खुल गया । शेर का मुंह इससे अधिक भयानक न होगा।
            गंगी के हाथ रस्सी छूट गई । रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं ।
           ठाकुर ‘कौन है, कौन है ?’ पुकारते हुए कुंए की तरफ जा रहे थें और गंगी जगत से कूदकर भागी जा रही थी ।
      

 

घर पहुंचकर देखा कि लोटा मुंह से लगाए जोखू वही मैला गंदा पानी पी रहा है।

बुधवार, मार्च 27, 2019

विनम्र श्रद्धांजलि ... रमणिका गुप्त जी ... चिरविदा...कभी नहीं !!! - डॉ शरद सिंह

अलविदा "ज़िद्दी लड़की" 
तुम भले ही चली गई़ं
लेकिन तुम्हारी ज़िद कि जज़्बा हमेशा हमारे साथ रहेगा !
!!! साहसी लेखिका रमणिका गुप्त को विनम्र श्रद्धांजलि !!!
उनकी आत्मकथा "आपहुदरी" यानी एक ज़िद्दी लड़की पर लिखा था मैंने "आउटलुक" में ...
Ramanik Gupt, writer
जीवट स्त्री की साहसिक आत्मकथा       
डॉ.(सुश्री) शरद सिंह


(सोशल एक्टविस्ट एवं लेखिका रमणिका गुप्ता की आत्मकथा "आपहुदरी : एक ज़िद्दी लड़की की आत्मकथा" की मेरे द्वारा लिखी गई समीक्षा "आउटलुक" पत्रिका के 16-31 जनवरी 2016 के अंक में प्रकाशित )

रमणिका गुप्त एक जीवट महिला हैं। उन्होंने लेखनकार्य के साथ ही मजदूरोंआदिवासियोंदलितों एवं अल्पसंख्यकों के पक्ष में अनेक लड़ाइयां लड़ी हैं। उन्होंने अपनी आयु से कई गुना अधिक रंग देखे हैं जीवन के। उस उम्र में जब रूमानी अनुभवों के चटख रंग अधिक आकर्षित करते हैं और छद्मवेशी बन कर अपने शिकंजे में जकड़ने लगते हैं,किन्तु सब कुछ सुखद और अपनी मुट्ठी में लगते हुए भी फिसलने लगता हैउस उम्र के दौर में रमणिका गुप्त ने उन तमाम रंगों के साथ उन्मुक्तता से खेला और साबित कर दिया कि समाज की तमाम रूढि़यों तथा पुरुषों द्वारा स्त्रिायों पर थोपी गई बंदिशों के विरुद्ध वे एक आपहुदरी’ अर्थात् जिद्दी की तरह अडिग खड़ी रहने का माद्दा रखती हैं। शायद इसीलिए उन्होंने अपनी आत्मकथा को नाम दिया है-‘‘आपहुदरी: एक जि़द्दी लड़की की आत्मकथा’’
Aaphudari

रमणिका गुप्त की आत्मकथा की पहली कड़ी हादसेके नाम से प्रकाशित हो चुकी है और आपहुदरी’ दूसरी कड़ी है जिसमें बचपन से लेकर धनबाद तक के अनुभवों को संजोया गया है। इस आत्मकथा में एक ऐसी स्त्री के दर्शन होते हैं जिसका जितना सरोकार स्वयं के अस्तित्व की स्थापना से है उतना ही सराकार दुखी-पीडि़त इंसानों के दुखों को दूर करने से भी है। एक ऐसी स्त्री जो स्वयं के सुख की कल्पना के वशीभूत पिता से विद्रोह करके विवाह रचा सकती हैं तो धनबाद के कोयला मज़दूरों के हित की रक्षा के लिए किसी के शयनकक्ष में पहुंच कर उसकी अंकशयनी भी बन सकती है। यह स्त्री-जीवन का ऐसा कंट्रास्ट है जो पूरी दुनिया में विरले ही मिलेगा।
समाज स्त्री के साथ दोहरापन अपनाता है। अपनी स्त्री’ और पराई स्त्री’ के लिए अलग-अलग मापदण्ड होते हैं।अपनी स्त्री’ से अपेक्षा की जाती है कि वह पति अथवा परिवार के पुरुष द्वारा निर्धारित रास्ते पर चलेबिना किसी प्रतिवाद के। जबकि पराई स्त्री’ से अपेक्षा की जाती है कि वह हरसंभव तरीके से उन्मुक्तता का जीवन जिए। यह उन्मुक्तता उसी समय तक के लिए जब तक वह अपनी स्त्री’ में परिवर्तित नहीं हो जाती है। जब कोई लेखिका आत्मकथा लिखती है तो इसी दोहरेपन की पर्तें अपने अंतिम छोर तक खुली दिखाई देती हैं। अकसर लेखिकाओं की आत्मकथा पुरुषवादी समाज को कटघरे में ला खड़ा करती है। स्त्री के प्रति समाजिक सोच न कल बदली थी और न पूरी तरह से आज बदली है। आज भी स्त्री को वस्तु’ और भोग्या’ मानने वालों की कमी नहीं है। आज वे औरतें जो मुक्ति के लिए छटपटा रही हैं और उनकी मुक्ति देहमुक्ति से अलग नहीं हैं। हरहालस्त्रियों का प्रथम बंधन देह से प्रारम्भ होता है। यद्यपिदेहमुक्ति’ के विषय को बोल्डनेस’ ठहरा दिया जाता है।
अपने जीवन का अक्षरशः सच लिखना बहुत कठिन होता हैचाहे स्त्री हो या पुरुष दोनों के लिए। इंसान अपना बेहतर पक्ष ही सबके सामने रखना चाहता हैअपनी कमजोरियों को नहीं। जबकि आत्मकथा की विधा जीवन के प्रत्येक सच की मांग करती हैचाहे वह अच्छा हो या बुरा। जब भी किसी लेखिका की आत्मकथा सामने आती हैसाहित्य समाज उसके प्रति अतिरिक्त सजगता अपना लेता है कि लेखिका ने कहीं कोई ऐसी-वैसी’ बात तो नहीं लिख दी है?अपना दुखअपनी पीड़ा ही लिखी है नकहीं पीड़ा के कारणों का खुलासा तो नहीं कर दिया हैलेखिका एक स्त्री होने के साथ-साथ पुरुषों की भांति एक मनुष्य भी है जिसका अपना एक जीवन हैअपने दुख-सुख हैं और जिन्हें गोपन रखने अथवा उजागर करने का उसे पूरा-पूरा अधिकार है। उसके भीतर वे सभी संवेग होते हैं जो एक आम स्त्री में होते हैं,अन्तर मात्रा यही होता है कि आम स्त्री उन संवेगों को व्यक्त करने का साहस नहीं संजो पाती है जबकि आत्मकथा लिखने वाली स्त्री साहस के साथ सब कुछ सामने रख देती है-जो जैसा हैवैसा ही।  
Outlook..16-31 Jan 2016..Review of Aaphudari by Dr Sharad Singh

रमणिका गुप्त अपने जीवन के पन्ने पलटती हुई अपने अनुभवों का बयान तो करती ही हैं, कोयलांचल के हर स्तर में व्याप्त हर प्रकार के भ्रष्टाचार से भी रूबरू कराती हैं। उन्होंनेआपहुदरी में समाज के सकल पाखण्ड को चुनौती देते हुए अपने भीतर की स्वावलम्बी, स्वतंत्रा स्त्री के छोटे से छोटे पक्ष को भी ध्यानपूर्वक सामने रख दिया है, जो रोचक भी है,पठनीय भी और चिन्तन योग्य भी। अदम्य साहस, उन्मुखता का आह्वान और स्त्रियोचित आकांक्षाएं - सबकुछ एक साथ जी लेने की कला यदि किसी को जानना हो तो उसे रमणिका गुप्त की आत्मकथा आपहुदरी कम से कम एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए।    
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