सोमवार, जनवरी 18, 2021

बैठकी | कहानी | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

 

Baithaki, Story of Dr. (Miss) Sharad Singh

कहानी

             बैठकी

              - डॅा. (सुश्री) शरद सिंह


उसका नाम था सुखिया। ठीक उसी तरह जैसे अंधे का नाम नैनसुख। इसीलिए सुखिया और दुख-कष्टों का मानो सहेलियों जैसा नाता रहा। सुखिया की जल्दी शादी कर दी गई और शादी के बाद पांच-छः सालों में सुखिया की गोद में एक के बाद एक पांच बच्चे आ गए। सेहत गिर गई, स्तनों में दूध उतरना बंद हो गया। बच्चे ज़्यादा और आमदनी अनिश्चित। अब, बच्चों की भूख मार-पीट से तो दबाई नहीं जा सकती। इसीलिए सुखिया ने अपनी पड़ोसन की मदद से बीड़ी बनाने का काम जुटा लिया। पांच बच्चों के बीच बैठ कर बीड़ी बनाना कोई हंसी-खेल तो था नहीं। एक को भूख लगती तो दूसरा टट्टी-पेशाब जाने के लिए निकर उतरवाने आ खड़ा होता। एक बेटी वहीं बाजू में बैठ कर जुंए मारने लगती और दूसरी उसकी की पीठ पर धौल जमा कर उसे झगड़े के लिए उकसाने लगती। सुखिया गोद वाली बेटी को झूलने में डाल कर पास ही बैठ जाती मगर जब झूलने वाली बेटी झूलने में पड़ी-पड़ी पेशाब कर देती तो सुखिया को बीड़ी-पत्ते और तंबाकू का सूपा तत्काल हटाना पड़ता। वरना पत्ते या तंबाकू खराब हो सकते थे।

 

इतनी सारी मुसीबतों से जूझती हुई सुखिया बीड़ी बना कर जब ठेकेदार के पास ले जाती तो वह उनमें दर्जनों नुख़्स निकाल कर पैसे काट लेता। झुंझलाई हुई सुखिया घर लौटती तो अपनी संतानों पर बरस पड़ती। आखिर उसकी खीझ और क्रोध कहीं तो निकलता ही। 

 

यूं तो सुखिया अपनी ज़िन्दगी से तंग आ गई थी लेकिन उसका हौसला अभी टूटा नहीं था। उसने सोचा कि ऐसे तो ज़िन्दगी कटने से रही, कुछ और करना ही होगा। अपनी उसी पड़ोसन से सलाह-मशविरा करने के बाद सुखिया को यह विचार पसन्द आया कि साप्ताहिक बाज़ार में जा कर सब्ज़ी बेेची जाए। सुखिया ने अपने पति से कहा कि वह सवेरे सायकिल से सब्ज़ी-मंडी जा कर सब्ज़ी ले आया करे लेकिन पति को इस काम में अपनी इज़्जत कम होती लगी। एक ठेकेदार के यहां चौकीदारी का काम करने वाले पति को यह मंज़ूर नहीं हुआ। अतः सुखिया ने स्वयं सब्जी-मंडी जाने का निर्णय लिया। 


साप्ताहिक-हाट की सुबह सुखिया सब्ज़ी-मंडी जा पहुंची। सब्ज़ियों से भरे हुए बोरे और उन्हें खरीदने के लिए चल रही मारा-मारी को देख कर सुखिया घबरा गई। फिर साहस करके वह भी कूद पड़ी भाव-ताव के मैदान में। पन्द्रह मिनट में उसने वे सब्ज़ियां खरीद लीं जिन्हें वह हाट में बेच सकती थी। अब समस्या थी सब्ज़ियों को घर ले जाने की। हाट तो दोपहर से लगती थी। चिन्ता में डूबी सुखिया सोच ही रही थी कि उसे किसी ने टोका।


वह राजू था, मुहल्ले का लड़का। राजू के पूछने पर सुखिया ने उसे बताया कि वह सब्ज़ी खरीदने आई थी। सब्जी तो उसने खरीद ली लेकिन अब उन्हें घर ले जाने की दिक्कत है। ऑटो-रिक्शा वाले ज़्यादा पैसे मांग रहे हैं और टेम्पो-स्टेंड दूर है ।


इस पर राजू मुस्कुरा कर बोला-‘बस, इतनी-सी बात? चलो, मैं ले चलता हूं तुम्हारी सब्ज़ियां। मोपेड है मेरे पास। चलो तुम भी पीछे बैठ जाओ।’ 


सुखिया सकुचा कर बोली- ‘नहीं-नहीं, तुम सब्जियां भर ले जाओ, मैं टेम्पो से आ जाऊंगी।’ 


तब राजू ने झिड़की भरे स्वर में कहा-‘टेम्पो में पैसे खर्च करोगी? इत्ते पैसे हो गए?’ 


इस पर सुखिया मना न कर सकी। वह डरती-सहमती राजू की मोपेड की पिछली सीट पर बैठ गई। वह जीवन में पहली बार किसी मोपेड पर सवार हुई थी। अच्छा लगा उसे। उसने सोचा कि सब्ज़ियां बेच-बेच कर जब चार पैसे हो जाएंगे उसके पास तो वह भी अपने पति के लिए मोपेड खरीदेगी। 


घर पहुंचते ही राजू ने मुसकुराते हुए सुखिया से एक कप चाय की मांग कर दी। राजू का यूं हंस कर चाय मांगना सुखिया को अच्छा तो नहीं लगा लेकिन यह सोच कर तसल्ली भी हुई कि वह पहली बार बाज़ार में सब्जी ले कर बैठने जा रही है, वहां कोई जान-परिचय वाला होना जरूरी है। 


दोपहर हुई। राजू आ धमका। राजू ने एक अनुभवी की तरह सलाह दी कि हाट तक उसकी मोपेड पर ही चली चले वरना उसे सब्जियां ले जाने में परेशानी होगी। सलाह मानने के अलावा और चारा ही क्या था। सुखिया राजू की मोपेड में बैठ कर हाट जा पहुंची। 


राजू ने बाज़ार में अपनी दुकान सजाते हुए कहा- ‘मेरे साथ ही बैठ जाओ, भौजी! नहीं तो अलग से बैठकी देनी पड़ेगी।’ 


‘बैठकी’ सुखिया के लिए यह शब्द नया था। फिर राजू ने उसे बताया कि हाट में सामान बेचने के लिए बैठने की जगह पाने के लिए जो फीस देनी पड़ती है उसी को ‘बैठकी’ कहते हैं।


‘कितने पैसे लगते हैं ?’ सुखिया ने चिन्तित हो कर पूछा।


‘आठ, दस, पन्द्रह... ये तो वसूली वाले तय करते हैं। खैर, तुम चिन्ता मत करो, तुम तो मेरे साथ बैठो। मैं कह दूंगा कि तुम मेरे घर की हो.... घरवाली जैसी !’ राजू बेशर्मी से हंस कर बोला।


‘क्या?’ सुखिया चौंक कर बोली।


‘मैं तो मज़ाक कर रहा था। वैसे, मेरे घर की हो तुम, ये तो कहना ही पड़ेगा।’ राजू पूर्ववत् हंस कर बोला। 


मन मसोस कर रह गई सुखिया। ज़रूरत भी क्या-क्या दिन दिखा देती है। थोड़ी देर में बैठकी वसूलने वाले आए। राजू ने उसे अपने घर की बता कर उसकी बैठकी के पैसे बचवा दिए। इसके बाद तीन-चार घंटे हाट की गहमागहमी में डूबे रहे दोनों।


शाम ढले सुखिया को हाट से वापस घर पहुंचाते समय सुखिया ने दस रुपए का नोट राजू को थमाते हुए कहा- ‘ये रख लो, बैठकी के पैसे।’


‘ग़ज़ब करती हो भौजी, तुमसे रुपए लूंगा बैठकी के?’ कहते हुए राजू ने दस का नोट वापस सुखिया की मुट्ठी में दबा दिया। इस प्रक्रिया में उसने अपने दोनों हाथों से सुखिया की मुट्ठी पकड़ी और अपने सीने से लगा लिया। सुखिया कंाप कर रह गई। संकेत स्पष्ट था। अनपढ़ ही सही लेकिन सुखिया थी तो औरत ही। राजू के जाने के बाद भी सुखिया के शरीर से कंपकपी गई नहीं। वह हताशा से भर कर ज़मीन पर बैठ गई।

  

वह सोचने लगी। बैठकी तो देनी ही होगी उसे, अब बाज़ार-वसूली वालों की बैठकी दे या राजू की ‘बैठकी’? राजू को ‘बैठकी’ नहीं देगी तो वह उसकी मदद नहीं करेगा लेकिन राजू की ‘बैठकी’ की वसूली का कोई अंत होगा क्या? वसूली वालों की बैठकी तो दस-पन्द्रह रुपयों पर जा कर ठहर ही जाएगी मगर राजू? वह परिवार का सुख बनाने के लिए घर से निकली है या सुख मिटाने के लिए? 


सुखिया सोच-विचार कर ही रही थी कि उसकी चौथी बेटी आ कर उसके कंधों से चिपट गई। बेटी का स्पर्श पाते ही सुखिया को ख़याल आया कि यदि वह राजू का प्रस्ताव मानती है तो उसकी इन बेटियों का भविष्य क्या होगा? क्या माहौल मिलेगा इन्हें? राजू जैसे लोगों इनके आसपास मंडराएंगे....।


‘नहीं ! नहीं चाहिए मुझे राजू का सहयोग।’ बेटी के लाड़ भरे स्पर्श ने ही सुखिया को निर्णय पर पहुंचा ही दिया। उसने तय कर लिया कि अगले हाट में वह वसूली वालों को ही बैठकी देगी। भले ही उसे मंडी से सिर पर सब्जी ढोनी पड़े, भले ही उसे हाट तक सब्जी ढोनी पड़े, भले ही उसे हाट में बैठने को अच्छी जगह न मिले। बस, एक पल का निर्णय पूरी ज़िन्दगी को स्वर्ग या नर्क बना सकता है और वह निर्णय सुखिया ने ले लिया था। निर्णय लेते ही सुखिया का दिल हल्का हो गया और वह अपनी बेटी को गोद में बिठा कर दुलारने लगी।

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12 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी,
    यह मेरे लिए अत्यंत सुखद अनुभूति है कि आपने मेरी कहानी को
    चर्चा मंच में शामिल किया है।
    आपका हार्दिक धन्यवाद एवं बहुत-बहुत आभार!!!
    सादर नमन 🌹🙏🌹
    - डॉ. शरद सिंह

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  2. अनपढ़ ही सही लेकिन सुखिया थी तो औरत ही।..........बैठकी तो देनी ही होगी उसे, अब बाज़ार-वसूली वालों की बैठकी दे या राजू की ‘बैठकी’?....वाह! बहुत ही संवेदनशील पंक्तियाँ। बहुत सुंदर कहानी।

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    1. विश्वमोहन जी, कहानी के मर्म को रेखांकित करती आपकी अमूल्य टिप्पणी के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद🌹🙏🌹

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  3. इज्जत से खाई हुई आधी रोटी भी बहुत सुख देती है। सुंदर कहानी।

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