गुरुवार, फ़रवरी 13, 2020

देशबन्धु के साठ साल-27- ललित सुरजन

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय मित्रो एवं सुधी पाठकों,
   हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिख रहे हैं जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। व्हाट्सएप्प पर प्राप्त लेखमाला की कड़ियां मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डाॅ. शरद सिंह उनकी अनुमति से अपने इस ब्लाग पर शेयर करती रहूंगी। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपको भी यह लेखमाला अत्यंत रोचक लगेगी।

ललित सुरजन देशबंधु पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं। वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं। वे एक जाने माने कवि व लेखक हैं. ललित सुरजन स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं तथा साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता है। 

प्रस्तुत है ललित सुरजन जी की लेखमाला की सत्ताइसवीं कड़ी....


देशबन्धु के साठ साल-27
- ललित सुरजन

आप यदि दिन के समय किसी अखबार के दफ्तर में जाएं तो आपको वहां अमूमन शांतिमय वातावरण मिलेगा। लेकिन शाम छह बजे के बाद से जो गहमागहमी शुरू होती है तो सुबह लगभग पांच बजे तक बनी रहती है। संपादन कक्ष से लेकर कंपोजिंग कक्ष तक, फिर मशीन रूम से लेकर अखबार की पार्सलें रवाना करने तक सब लोग दौड़ते-भागते नजर आते हैं। साठ साल पहले यह भागदौड़ आज की बनिस्बत दुगनी-तिगनी थी। नई तकनीकी के प्रयोग से पूर्वापेक्षा काम
Lalit Surjan
करना आसान जो हुआ है। इन दिनों देशबन्धु में जो छपाई मशीन है, उस पर एक बार में सोलह पेज एक साथ छप सकते हैं तथा उसकी गति एक घंटे में तीस हजार कॉपियां छापने की है। देश-विदेश के अनेक अखबारों में इससे भी अधिक क्षमता की मशीनों पर काम होता है। कई जगह तो ऐसी मशीनें भी हैं जो छपाई के बाद अखबार की पार्सल भी स्वचालित प्रक्रिया से बांध सकती हैं। मैं आपको उस दौर में ले जाना चाहता हूं जब फ्लैट बैड सिलिंडर मशीन पर मात्र एक हजार प्रति घंटा की गति से एक बार में सिर्फ दो पेज छापे जा सकते थे। याने आगे-पीछे चार पेज की एक हजार प्रतियां मुद्रित करने के लिए दो घंटे लगते थे। हमने कुछ समय तक वैसी ही एक और मशीन समानांतर स्थापित की ताकि इधर तरफ दो पृष्ठ मुद्रित हो जाने के बाद दूसरी तरफ के दो पेज लगभग साथ-साथ छापे जा सकें और समय की बचत हो।

गौर कीजिए कि आपके घर जो भी अखबार आता है, वह चौथाई मुड़े (क्वार्टर फोल्ड) आकार में आता है। शुरूआती दौर में अखबार की पूरी शीट को बीच से मोड़ना, फिर उसे आधा मोड़ना एक समयसाध्य और श्रमसाध्य कार्य था। अगर काम समय पर पूरा होना हो तो उसके लिए चपलता का गुण आवश्यक था। यह जिम्मेदारी फोल्डिंग विभाग के सहयोगियों पर होती थी। दो-दो करके चार पेज छपे, उन्हें लगातार मशीन की दूसरी ओर से उतार कर जमीन पर रखते जाओ, 22'' गुणा 33'' पूर्ण आकार के दो पन्नों की थप्पियां बनाओ, उन पर बीच में अंगूठे से सलवट बनाकर मोड़ो, एक-एक कर अलग करो, फिर एक बार बीच से मोड़ो और पेज के आधे आकार में लाओ। कहां, कितनी कॉपियों की पार्सल जाना है, उस हिसाब से अलग-अलग पार्सल बनाओ, उसे मोटे ब्राउन पेपर या न्यूजप्रिंट में पैक करो, ऊपर से सुतली या मोटे-मजबूत धागे (ट्वाइन) से बांध कर सुरक्षित करो और उसके ऊपर गंतव्य का लेबल चिपकाओ। इसके बाद स्टेशन और बस स्टैंड की ओर भागो।

इतना सब विवरण देने की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन पढ़कर आपने जान लिया होगा कि आप तक अखबार पहुंचाने में पत्र के फोल्डिंग विभाग की कितनी अहम भूमिका होती है। प्रेस के अन्य विभागों में दिनपाली और रातपाली में अदला-बदली कर काम करने की सुविधा होती है, लेकिन फोल्डिंग में तो सारा काम रातपाली में ही होता है। एक बंधी-बंधाई यंत्रवत् किंतु अनिवार्य ड्यूटी। इसी विभाग से संबंधित एक मजदार प्रसंग उसी शुरूआती दौर का है। एक रात 2-3 बजे बाबूजी आकस्मिक निरीक्षण के लिए प्रेस पहुंचे। सब सहकर्मी अपने काम में जुटे थे, लेकिन एक व्यक्ति चारों तरफ से बेखबर सो रहा था। बाबूजी आए हैं जान हड़बड़ा कर उठा या उठाया गया। बाबूजी नाराज हुए। काम के समय सो रहे हो। तुम्हारी छुट्टी। दिन में आकर हिसाब कर लेना। क्या नाम है तुम्हारा? साहब, नाम मत पूछिए। बाबूजी का पारा और चढ़ा। तुमसे नाम पूछ रहे हैं, नाम बताओ। धीमे स्वर में जो जवाब आया तो उसे सुनकर गुस्सा खत्म। बाबूजी के ओठों पर मुस्कुराहट आई। तुम नालायक हो। नाम मायाराम और ऐसी लापरवाही। ठीक है, काम करो, लेकिन आइंदा ऐसी गलती नहीं होना चाहिए।

जिस जगह सौ-दो सौ लोग काम करते हों, वहां ऐसे खट्टे-मीठे प्रसंग घटित होना अस्वाभाविक नहीं है। एक प्रसंग 1964 का है। रमनलाल सादानी प्रसार प्रबंधक थे। फोल्डिंग विभाग का प्रबंध उनके ही जिम्मे थे। बूढ़ापारा की भव्य सादानी बिल्डिंग उनके पिताजी रायसाहब नंदलाल सादानी ने बनवाई थी। उसी नाम पर सादानी चौक कहलाया। एक शाम एक सुंदर युवती रमन भैया (उन्हें मेरा यही संबोधन था) से मिलने आई। मुझे उनका परिचय दिया गया- ये सूसन हैं। अखबार के बंडल पर जो लेबल चिपकाते हैं, उन्हें इनसे लिखवाते हैं। तीस रुपए महीना देते हैं। इनकी सहायता हो जाती है। मैंने सुन लिया और मान लिया। कुछ दिन बाद देखा कि लेबल तो रमन भैया की लिखावट में हैं। पूछा भेद खुला कि देवीजी उनकी प्रेमिका हैं। किसी स्कूल में शिक्षिका हैं। मैंने उन्हें दिया जाने वाला मानदेय बंद करवा दिया। लेकिन बात यहां खत्म नहीं होती। रमन भैया ने कुछ साल बाद उनसे विधिवत विवाह किया और संतानों को अपना नाम दिया। रमन सादानी इकलौते पुत्र थे, बिंदास तबियत के थे, होशियार किंतु लापरवाह। जो भी हो, समय आने पर उन्होंने नैतिक दृढ़ता का परिचय दिया, यह बात मुझे अच्छी लगी। हमारे साथ संभवत: 1971-72 तक उन्होंने काम किया।

प्रसार विभाग से ही जुड़ा एक और रोचक प्रसंग ध्यान आ रहा है। यह मानी हुई बात है कि हर अखबार अपनी प्रसार संख्या बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार के उपक्रम करता है। इसमें अभिकर्ता या न्यूजपेपर एजेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आखिरकार, ग्राहक के दरवाजे तक वह स्वयं या उसका हॉकर ही जाता है। मुझे याद है कि 1967 में प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा दिल्ली में आयोजित प्रबंधन कार्यशाला में जब मैं भाग ले रहा था, तब दिल्ली की सेंट्रल न्यूज एजेंसी के प्रमुख कर्त्ताधर्ता श्री पुरी ने एक सत्र में हमें प्रसार संख्या में वृद्धि करने के गुर सिखाए थे। खैर, मैं जिस प्रसंग की चर्चा कर रहा हूं, वह इसके पहले का है। हमें ऐसा कुछ अनुमान हुआ कि रायपुर के कुछ अभिकर्त्तागण देशबन्धु की बिक्री बढ़ाने में खास दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। यह 1965 की बात है। उस समय होलाराम बुधवानी नामक एक सज्जन ने हमारी एजेंसी ली और प्रसार वृद्धि के बारे में तमाम वायदे किए। आवश्यक धरोहर निधि या कि एडवांस डिपॉजिट भी उन्होंने जमा की। उनमें व्यापार बुद्धि तो थी, लेकिन अखबार की एजेंसी चलाने के लिए जिस जीतोड़ मेहनत की आवश्यकता होती है, वह उनमें नहीं थी। असफल होकर उन्होंने कुछ ही माह में एजेंसी छोड़ दी।

बुधवानीजी करीब एक साल बाद फिर प्रेस आए। उनके चेहरे पर सफलता की चमक थी। कहां थे आप इतने दिन? कभी दिखाई तक नहीं दिए! पता चला कि वे इस बीच मॉरीशस हो आए। वहां उन्होंने व्यापार की संभावनाएं तलाशीं और शीघ्र ही भारत से समुद्री मार्ग से बड़े-बड़े ड्रमों में भरकर गंगाजल मॉरीशस को निर्यात करने लगे। वे गंगाजल कहां से भरते हैं, यह गुप्त जानकारी भी उन्होंने हम लोगों के साथ साझा की। गंगा मैया की कृपा से उनका व्यापार चल निकला। देशबन्धु की एजेंसी में जो घाटा हुआ था, उसकी भरपाई तो जल्दी ही हो गई थी।

इसी सिलसिले में पाठकों को अपने एक अभिनव प्रयोग की जानकारी देना उचित होगा। प्रेस में मेरे हमउम्र जितने साथी थे, सबने मिलकर स्कूल में पढ़ने वाले अपने छोटे भाईयों को जोड़ा। अनुज न्यूज एजेंसी नाम से एजेंसी बनाई। मेरे छोटे भाई दीपक, वरिष्ठ साथी शरद जैन के छोटे भाई अनिल और इस तरह लगभग एक दर्जन किशोरों की टीम तैयार हो गई। इन्होंने घर-घर जाकर ग्राहक बनाए। जिनके घर जाते वे परिचय जानकर प्रसन्न हो जाते। खुशी-खुशी ग्राहक बनते। इस तरह 1973-74 मेंं प्रसार संख्या में लगभग एक हजार प्रतियों का इजाफा हुआ जो उस वक्त के लिहाज से बड़ी उपलब्धि थी।
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#देशबन्धु में 23 जनवरी 2020 को प्रकाशित
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प्रस्तुति : डॉ शरद सिंह

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