शनिवार, सितंबर 28, 2019

लहना सिंह की सूबेदारनी और स्त्री के भीतर की स्त्री - डॉ शरद सिंह

लहना सिंह की सूबेदारनी और स्त्री के भीतर की स्त्री - डॉ शरद सिंह
    लिखे जाने के लगभग 105 वर्ष बाद भी प्रासंगिक लगती है गुलेरी जी की कहानी ‘‘उसने कहा था’’ .... सूबेदारनी का लहना के प्रति प्रेम किसी परिधि में बंधा हुआ नहीं था। उसके साथ न तो कोई सम्बोधन जुड़ा हुआ था और न कोई रिश्ता। वस्तुतः ‘उसने कहा था’’ कहानी में सूबेदारनी एक औरत का बाहरी स्वरूप था। उसके भीतर की औरत अपनी भावनाओं को दो तरह से जी रही थी। एक पति के प्रति समर्पिता और दूसरी अपने उस प्रेमी की स्मृति को संजोए हुए जिसको कभी उसने दुनियावी प्रेमी की दृष्टि से शायद देखा ही नहीं था।
      जिसने भी चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ पढ़ी है, उसे वह संवाद कभी नहीं भूल सकता कि लहना लड़की से पूछता है-‘तेरी कुड़माई हो गई?’ और लड़की ‘धत्’ कह कर शरमा जाती है। लहना का इस तरह पूछना लड़की के मन को गुदगुदाया तो अवश्य होगा, जब कभी अकेले में यह प्रश्न उसके मन में कौंधा होगा। ‘कुड़माई’ का न होना लहना के लिए सुखद था क्यों कि तब उसके मन में लड़की को पा लेने की सम्भावना थी। यह पा लेना ‘दैहिक’ नहीं ‘आत्मिक’ था। फिर भी लहना को वह लड़की नहीं मिली। लड़की ने एक दिन ‘तेरी कुड़माई हो गई’ का उत्तर दे दिया कि ‘हां, हो गई....!’ लहना विचलित हो गया। और वह लड़की? उस लड़की का विवाह जिससे हुआ, वह आगे चल कर सेना में सूबेदार बना और वह लड़की कहलाई सूबेदारनी। एक भरा-पूरा परिवार, वीर, साहसी पति, वैसा ही वीर, साहसी बेटा। आर्थिक सम्पन्नता। सामाजिक दृष्टि से सुखद पारिवारिक जीवन। सुबेदारनी ने अपना दायित्व निभाने में कहीं कोई कमी नहीं रखी। उससे न सूबेदार को शिकायत और न उसके परिवार के किसी अन्य सदस्य को। अपने सामाजिक रिश्तों को निभाने में सूबेदारनी ने अपने जीवन, अपनी भावनाओं को समर्पित कर दिया। मन बहुत कोमल होती है, चाहे स्त्री का हो या पुरुष का। मन अपना अलग जीवन रचता है, अपनी अलग दुनिया सजाता है और सबसे छिप कर हंस लेता है, रो लेता है।
यदि लहना सिंह उस लड़की को भुला नहीं सका तो ‘वह लड़की’ यानी सूबेदारनी के मन के गोपन कक्ष में लहना की स्मृतियां किसी तस्वीर की भांति दीवार पर टंगी रहीं। सूबेदारनी ने ही तो पहचाना था लहना सिंह को और सूबेदार से कह कर बुलवाया था अनुरोध करने के लिए। स्त्री अपने प्रति प्रकट की गई उस भावना को कभी नहीं भूलती है जो निष्कपट भाव से प्रकट किए गए हों। सूबेदारनी के बारे में सोचते हुए अकसर मुझे अपनी ये काव्य-पंक्तियां याद आती हैं-
'छिपी रहती है
हर औरत के भीतर एक औरत
अकसर हम देख पाते हैं सिर्फ़ बाहर की औरत को।'
- डॉ शरद सिंह

‘इंसाफ का तराजू’ और स्त्री-मुद्दे : वाया बॉलीवुड - डॉ शरद सिंह

 
इंसाफ का तराजू और स्त्री-मुद्दे - वाया बॉलीवुड - डॉ शरद सिंह
भारतीय सिनेमा में यदि सन् 1980 की बात की जाए तो उस वर्ष एक फिल्म रिलीज़ हुई थी-‘इंसाफ का तराजू’। बी. आर. चोपड़ा के द्वारा निर्देशित इस फिल्म की भारतीय स्क्रिटिंग की थी शब्द कुमार ने। वस्तुतः यह फिल्म हॉलीवुड की एक प्रसिद्ध मूवी ‘लिपिस्टिक’ पर आधारित थी। कहानी नायिका प्रधान थी और बलात्कार जैसे संवेदनशील विषय पर आधारित थी। सौंदर्य प्रतियोगिता में सफल रहने वाली एक सुंदर युवती पर एक अय्याश पूंजीपति का दिल आ जाता है और वह यह जानते हुए भी कि युवती किसी और की मंगेतर है, उसके साथ बलात्कार करता है। वह युवती पुलिस में रिपोर्ट लिखाती है। मुक़द्दमा चलता है और भरी अदालत में प्रतिवादी का वकील अमानवीयता की सीमाएं तोड़ते हुए युवती से अश्लील प्रश्न पूछता है और अंततः युवती को बदचलन ठहराने में सफल हो जाता है। पीड़ित युवती उस शहर को छोड़ कर दूसरे शहर में जा बसती है। उसका जीवन ग्लैमर से दूर एकदम रंगहीन हो जाता है। फिर भी वह अपनी छोटी बहन के लिए जीवन जीती रहती है। दुर्भाग्यवश कुछ अरसे बाद उसकी छोटी बहन भी नौकरी के सिलसिले में उसी अय्याश पूंजीपति के चंगुल में फंस जाती है और बलात्कार का शिकार हो जाती है। एक बार फिर वहीं अदालती रवैया झेलने और अपनी छोटी बहन को अपमानित होते देखने के बाद वह युवती तय करती है कि अब वह स्वयं उस बलात्कारी को दण्ड देगी।
‘इंसाफ का तराजू’ पर यह आरोप हमेशा लगता रहा कि एक संवेदनशील मुद्दे को व्यावयासिक ढंग से फिल्माया गया। दूसरी ओर ‘चक्र’, ‘दमन’, ‘बाज़ार’ जैसी फिल्में पूरी सादगी से और अव्यवसायिक ढंग से स्त्री-मुद्दों को उठा रही थीं। लेकिन ‘इंसाफ का तराजू’ की अपेक्षा इनकी दर्शक संख्या न्यूनतम थी। ये फिल्में बुद्धिजीवियों और अतिसंवेदनशील दर्शकों की पहली पसंद बन पाई जबकि ‘इंसाफ का तराजू’ ने बॉक्स आफिस पर रिकार्ड तोड़ दिया।
- डॉ शरद सिंह

मंगलवार, जुलाई 30, 2019

प्रेमचंद जयंती पर.....कहानियां जो सोचने को विवश करती हैं.....कहानी - ठाकुर का कुंआ


Dr (Miss) Sharad Singh
कुछ कहानियां पढ़ने के बाद मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ जाती हैं। प्रेमचंद के कथापात्र आज भी हमारे गांव, शहर और कस्बों में दिखाई देते हैं। दृश्य बदला है लेकिन इन पात्रों की दशा में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है। प्रेमचंद का किसान साहूकार के कर्ज तले दबा हुआ था तो आज का किसान भी कर्ज के बोझ से आत्महत्या करने को विवश हो उठता है। प्रेमचंद का किसान साहूकार के निजी बहीखाते में बंधुआ था, तो आज का किसान कर्ज़माफ़ी के सरकारी बहीखाते में बंधुआ है। शराबी पिता-पुत्र के परिवार की बहू के रूप में इकलौती स्त्री ‘कफ़न’ कहानी में तड़प-तड़प कर मरती दिखाई देती है, तो आज झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली स्त्रियों की दशा इससे अलग नहीं है। प्रेमचंद ने समाज का एक समाजशास्त्री की भांति आकलन किया और सुधार के मार्ग सुझाए। उन्होंने समाज में व्याप्त विसंगतियों को अपनी कथासाहित्य के माध्यम से उजागर किया ताकि लोगों का उस ओर ध्यान आकृष्ट हो और समाज सुधार के क़दम उठाए जा सकें। उन्होंने विधवा स्त्री से विवाह कर स्वयं इस दिशा में पहल की। प्रस्तुत है प्रेमचंद की कहानी ‘ठाकुर का कुंआ’......  
ठाकुर का कुंआ (कहानी)

लेखकः प्रेमचंद

प्रस्तुतिः डॉ. शरद सिंह
(लेखक परिचयः कथा सम्राट प्रेमचंद का जन्म काशी से चार मील दूर बनारास के पास लमही नामक गांव में 31 जुलाई 1880 को हुआ था। उनका असली नाम श्री धनपतराय। प्रेमचंद आधुनिक हिन्दी कहानी के पितामह माने जाते हैं। प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि, विभिन्न साहित्य रूपों में, अभिव्यक्त हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की किन्तु प्रमुख रूप से वह कथाकार हैं। उन्हें अपने जीवन काल में हीकथा सम्राटकी उपाधि मिल गयी थी।

उनकी कृतियां हैः- उपन्यास- वरदान, प्रतिज्ञा, सेवा-सदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि, गोदान, मनोरमा, मंगलसूत्र(अपूर्ण)।
कहानी संग्रह - प्रेमचंद ने कई कहानियां लिखी है। उनके २१ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए थे जिनमे 300 के लगभग कहानियां है। प्रेमचंद की कहानियों का संग्रह 'मानसरोवर' नाम से आठ भागों में प्रकाशित है। नाटक- संग्राम, कर्बला तथा प्रेम की वेदी।
जीवनियां- महात्मा शेख सादी, दुर्गादास, कलम तलवार और त्याग, जीवन-सार(आत्म कथात्मक)
बाल रचनाएं- राम चर्चा ,मनमोदक , जंगल की कहानियां, आदि।

8 अक्टूबर 1936 को प्रेमचंद का निधन हुआ।)



   जोखू ने लोटा मुंह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई । गंगी से बोला-‘यह कैसा पानी है ? मारे बास के पिया नहीं जाता । गला सूखा जा रहा है और तू सडा़ पानी पिलाए देती है !’
       गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी । कुआं दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था । कल वह पानी लायी, तो उसमें बू बिलकुल न थी, आज पानी में बदबू कैसी ! लोटा नाक से लगाया, तो सचमुच बदबू थी । जरुर  कोई जानवर कुएं में गिरकर मर गया होगा, मगर दूसरा पानी आवे कहां से?
ठाकुर के कुंए पर
कौन चढ़ने देगा ? दूर से लोग डांट बताऍगे । साहू का कुआ गांव के उस सिरे पर है, परन्तु वहां कौन पानी भरने देगा ? कोई कुंआ गांव में नहीं है।
      जोखू कई दिन से बीमार हैं । कुछ देर तक तो प्यास रोके चुप पड़ा रहा, फिर बोला-‘अब तो मारे प्यास के रहा नहीं जाता । ला, थोड़ा पानी नाक बंद करके पी लूं ।
     गंगी ने पानी न
दिया । खराब पानी से बीमारी बढ़ जाएगी इतना जानती थी, परंतु यह न जानती थी कि पानी को उबाल देने से उसकी खराबी जाती रहती हैं । बोली-‘यह पानी कैसे पियोगे ? न जाने कौन जानवर मरा हैं। कुंए से मैं दूसरा पानी लाए देती हूं।’
        जोखू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा-‘पानी कहां से लाएगी ?’
       ‘ठाकुर और साहू के दो कुंए तो हैं। क्यों एक लोटा पानी न भरने देंगे?’
       ‘हाथ-पांव तुड़वा आएगी और कुछ न होगा । बैठ चुपके से । ब्राहम्ण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेगें, साहूजी एक पांच लेगें । गराबी का दर्द कौन समझता हैं ! हम तो मर भी जाते है, तो कोई दुआर पर झांकने नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएं से पानी भरने देंगे ?’ इन शब्दों में कड़वा सत्य था । गंगी क्या जवाब देती, किन्तु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया ।


         रात के नौ बजे थे । थके-मांदे मजदूर तो सो चुके थे, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पांच बेफिक्रे जमा थे मैदान में । बहादुरी का तो न जमाना रहा है, न मौका। कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं । कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार को एक खास मुकदमे की नकल ले आए । नाजिर और मोहतिमिम, सभी कहते थे, नकल नहीं मिल सकती । कोई पचास मांगता, कोई सौ। यहां बे-पैसे-कौड़ी नकल उड़ा दी । काम करने ढंग चाहिए ।
         इसी समय गंगी कुंए से पानी लेने पहुंची  कुप्पी की धुंधली रोशनी कुए पर आ रही थी । गंगी जगत की आड़ मे बैठी मौके का इंतजार करने लगी । इस कुंए का पानी सारा गांव पीता हैं । किसी के लिए रोका नहीं, सिर्फ ये बदनसीब नहीं भर सकते । गंगी का विद्रोही दिल रिवाजी पाबंदियों और मजबूरियों पर चोटें करने लगा-हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊंचे हैं ? इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं ? यहां तो जितने है, एक-से-एक छंटे हैं । चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें । अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिए की भेड़ चुरा ली थी और बाद मे मारकर खा गया । इन्हीं पंडित के घर में तो बारहों मास जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते है । काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है । किस-किस बात मे हमसे ऊंचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊंचे है, हम ऊंचे । कभी गांव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आंख से देखने लगते हैं। जैसे सबकी छाती पर सांप लोटने लगता है, परंतु घमंड यह कि हम ऊंचे हैं!
         कुंए पर किसी के आने की आहट हुई । गंगी की छाती धक-धक करने लगी । कहीं देख ले तो गजब हो जाए । एक लात भी तो नीचे न पड़े । उसाने घड़ा और रस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अंधेरे साए मे जा खड़ी हुई । कब इन लोगों को दया आती है किसी पर ! बेचारे महगू को इतना मारा कि महीनों लहू थूकता रहा। इसीलिए तो कि उसने बेगार न दी थी । इस पर ये लोग ऊंचे बनते हैं ?

कुंए पर स्त्रियां पानी भरने आयी थी। इनमें बात हो रही थीं ।
      ‘खान खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओ । घड़े के लिए पैसे नहीं है।
      ‘हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती हैं ।
      ‘हां, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस, हुकुम चला दिया कि ताजा पानी लाओ, जैसे हम लौंडियां ही तो हैं।
       ‘लौंडियां नहीं तो और क्या हो तुम? रोटी-कपड़ा नहीं पातीं ? दस-पांच रुपये भी छीन-झपटकर ले ही लेती हो। और लौंडियां कैसी होती हैं!
        ‘मत लजाओ, दीदी! छिन-भर आराम करने को जी तरसकर रह जाता है। इतना काम किसी दूसरे के घर कर देती, तो इससे कहीं आराम से रहती। ऊपर से वह एहसान मानता ! यहां काम करते-करते मर जाओ, पर किसी का मुंह ही सीधा नहीं होता
        दोनों पानी भरकर चली गई, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुंए की जगत के पास आयी । बेफिक्रे चले गऐ थे । ठाकुर भी दरवाजा बंदर कर अंदर आंगन में सोने जा रहे थें । गंगी ने क्षणिक सुख की सांस ली। किसी तरह मैदान तो साफ हुआ। अमृत चुरा लाने के लिए जो राजकुमार किसी जमाने में गया था, वह भी शायद इतनी सावधानी के साथ और समझ-बूझकर न गया हो । गंगी दबे पांव कुंए की जगत पर चढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ ।
        उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला । दाएं-बाएं चौकन्नी दृष्टी से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रु के किले में सूराख कर रहा हो । अगर इस समय वह पकड़ ली गई, तो फिर उसके लिए माफी या रियायत की रत्ती-भर उम्मीद नहीं । अंत मे देवताओं को याद करके उसने कलेजा मजबूत किया और घड़ा कुंए में डाल दिया ।
         घड़े ने पानी में गोता लगाया, बहुत ही आहिस्ता । जरा-सी आवाज न हुई गंगी ने दो-चार हाथ जल्दी-जल्दी मारे । घड़ा कुंए के मुंह तक आ पहुंचा । कोई बड़ा शहजोर पहलवान भी इतनी तेजी से न खींच सकता था।
      गंगी झुकी कि घड़े को पकड़कर जगत पर रखें कि एकाएक ठाकुर साहब का दरवाजा खुल गया । शेर का मुंह इससे अधिक भयानक न होगा।
            गंगी के हाथ रस्सी छूट गई । रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं ।
           ठाकुर ‘कौन है, कौन है ?’ पुकारते हुए कुंए की तरफ जा रहे थें और गंगी जगत से कूदकर भागी जा रही थी ।
      

 

घर पहुंचकर देखा कि लोटा मुंह से लगाए जोखू वही मैला गंदा पानी पी रहा है।

बुधवार, मार्च 27, 2019

विनम्र श्रद्धांजलि ... रमणिका गुप्त जी ... चिरविदा...कभी नहीं !!! - डॉ शरद सिंह

अलविदा "ज़िद्दी लड़की" 
तुम भले ही चली गई़ं
लेकिन तुम्हारी ज़िद कि जज़्बा हमेशा हमारे साथ रहेगा !
!!! साहसी लेखिका रमणिका गुप्त को विनम्र श्रद्धांजलि !!!
उनकी आत्मकथा "आपहुदरी" यानी एक ज़िद्दी लड़की पर लिखा था मैंने "आउटलुक" में ...
Ramanik Gupt, writer
जीवट स्त्री की साहसिक आत्मकथा       
डॉ.(सुश्री) शरद सिंह


(सोशल एक्टविस्ट एवं लेखिका रमणिका गुप्ता की आत्मकथा "आपहुदरी : एक ज़िद्दी लड़की की आत्मकथा" की मेरे द्वारा लिखी गई समीक्षा "आउटलुक" पत्रिका के 16-31 जनवरी 2016 के अंक में प्रकाशित )

रमणिका गुप्त एक जीवट महिला हैं। उन्होंने लेखनकार्य के साथ ही मजदूरोंआदिवासियोंदलितों एवं अल्पसंख्यकों के पक्ष में अनेक लड़ाइयां लड़ी हैं। उन्होंने अपनी आयु से कई गुना अधिक रंग देखे हैं जीवन के। उस उम्र में जब रूमानी अनुभवों के चटख रंग अधिक आकर्षित करते हैं और छद्मवेशी बन कर अपने शिकंजे में जकड़ने लगते हैं,किन्तु सब कुछ सुखद और अपनी मुट्ठी में लगते हुए भी फिसलने लगता हैउस उम्र के दौर में रमणिका गुप्त ने उन तमाम रंगों के साथ उन्मुक्तता से खेला और साबित कर दिया कि समाज की तमाम रूढि़यों तथा पुरुषों द्वारा स्त्रिायों पर थोपी गई बंदिशों के विरुद्ध वे एक आपहुदरी’ अर्थात् जिद्दी की तरह अडिग खड़ी रहने का माद्दा रखती हैं। शायद इसीलिए उन्होंने अपनी आत्मकथा को नाम दिया है-‘‘आपहुदरी: एक जि़द्दी लड़की की आत्मकथा’’
Aaphudari

रमणिका गुप्त की आत्मकथा की पहली कड़ी हादसेके नाम से प्रकाशित हो चुकी है और आपहुदरी’ दूसरी कड़ी है जिसमें बचपन से लेकर धनबाद तक के अनुभवों को संजोया गया है। इस आत्मकथा में एक ऐसी स्त्री के दर्शन होते हैं जिसका जितना सरोकार स्वयं के अस्तित्व की स्थापना से है उतना ही सराकार दुखी-पीडि़त इंसानों के दुखों को दूर करने से भी है। एक ऐसी स्त्री जो स्वयं के सुख की कल्पना के वशीभूत पिता से विद्रोह करके विवाह रचा सकती हैं तो धनबाद के कोयला मज़दूरों के हित की रक्षा के लिए किसी के शयनकक्ष में पहुंच कर उसकी अंकशयनी भी बन सकती है। यह स्त्री-जीवन का ऐसा कंट्रास्ट है जो पूरी दुनिया में विरले ही मिलेगा।
समाज स्त्री के साथ दोहरापन अपनाता है। अपनी स्त्री’ और पराई स्त्री’ के लिए अलग-अलग मापदण्ड होते हैं।अपनी स्त्री’ से अपेक्षा की जाती है कि वह पति अथवा परिवार के पुरुष द्वारा निर्धारित रास्ते पर चलेबिना किसी प्रतिवाद के। जबकि पराई स्त्री’ से अपेक्षा की जाती है कि वह हरसंभव तरीके से उन्मुक्तता का जीवन जिए। यह उन्मुक्तता उसी समय तक के लिए जब तक वह अपनी स्त्री’ में परिवर्तित नहीं हो जाती है। जब कोई लेखिका आत्मकथा लिखती है तो इसी दोहरेपन की पर्तें अपने अंतिम छोर तक खुली दिखाई देती हैं। अकसर लेखिकाओं की आत्मकथा पुरुषवादी समाज को कटघरे में ला खड़ा करती है। स्त्री के प्रति समाजिक सोच न कल बदली थी और न पूरी तरह से आज बदली है। आज भी स्त्री को वस्तु’ और भोग्या’ मानने वालों की कमी नहीं है। आज वे औरतें जो मुक्ति के लिए छटपटा रही हैं और उनकी मुक्ति देहमुक्ति से अलग नहीं हैं। हरहालस्त्रियों का प्रथम बंधन देह से प्रारम्भ होता है। यद्यपिदेहमुक्ति’ के विषय को बोल्डनेस’ ठहरा दिया जाता है।
अपने जीवन का अक्षरशः सच लिखना बहुत कठिन होता हैचाहे स्त्री हो या पुरुष दोनों के लिए। इंसान अपना बेहतर पक्ष ही सबके सामने रखना चाहता हैअपनी कमजोरियों को नहीं। जबकि आत्मकथा की विधा जीवन के प्रत्येक सच की मांग करती हैचाहे वह अच्छा हो या बुरा। जब भी किसी लेखिका की आत्मकथा सामने आती हैसाहित्य समाज उसके प्रति अतिरिक्त सजगता अपना लेता है कि लेखिका ने कहीं कोई ऐसी-वैसी’ बात तो नहीं लिख दी है?अपना दुखअपनी पीड़ा ही लिखी है नकहीं पीड़ा के कारणों का खुलासा तो नहीं कर दिया हैलेखिका एक स्त्री होने के साथ-साथ पुरुषों की भांति एक मनुष्य भी है जिसका अपना एक जीवन हैअपने दुख-सुख हैं और जिन्हें गोपन रखने अथवा उजागर करने का उसे पूरा-पूरा अधिकार है। उसके भीतर वे सभी संवेग होते हैं जो एक आम स्त्री में होते हैं,अन्तर मात्रा यही होता है कि आम स्त्री उन संवेगों को व्यक्त करने का साहस नहीं संजो पाती है जबकि आत्मकथा लिखने वाली स्त्री साहस के साथ सब कुछ सामने रख देती है-जो जैसा हैवैसा ही।  
Outlook..16-31 Jan 2016..Review of Aaphudari by Dr Sharad Singh

रमणिका गुप्त अपने जीवन के पन्ने पलटती हुई अपने अनुभवों का बयान तो करती ही हैं, कोयलांचल के हर स्तर में व्याप्त हर प्रकार के भ्रष्टाचार से भी रूबरू कराती हैं। उन्होंनेआपहुदरी में समाज के सकल पाखण्ड को चुनौती देते हुए अपने भीतर की स्वावलम्बी, स्वतंत्रा स्त्री के छोटे से छोटे पक्ष को भी ध्यानपूर्वक सामने रख दिया है, जो रोचक भी है,पठनीय भी और चिन्तन योग्य भी। अदम्य साहस, उन्मुखता का आह्वान और स्त्रियोचित आकांक्षाएं - सबकुछ एक साथ जी लेने की कला यदि किसी को जानना हो तो उसे रमणिका गुप्त की आत्मकथा आपहुदरी कम से कम एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए।    
                  ___________________

गुरुवार, मार्च 21, 2019

रंगों की कथा कहती - डॉ शरद सिंह

Holi Ghazal by Dr (Miss) Sharad Singh
रंगों  की  कथा  कहती  होली  की रवानी है
देखो तो   हंसी   मौसम   पर छाई जवानी है
मिलते हैं सभी खिलकर फूलों की तरह देखो
उल्लास   भरी  चाहत  होती   ही  सुहानी है

सोमवार, मार्च 18, 2019

Dr Sharad Singh in Muni Kshama Sagar Kavita Vimarsh Celebration 2019 (4)

Dr Sharad Singh in Muni Kshama Sagar Kavita Vimarsh Celebration 2019(3)

Dr Sharad Singh in Muni Kshama Sagar Kavita Vimarsh Celebration 2019 (2)

Dr Sharad Singh in Muni Kshama Sagar Kavita Vimarsh Celebration 2019(1)

Dr Sharad Singh's Lecture on International Women's Day 2019 at Bandri Co...

Dr Sharad Singh's Lecture on International Women's Day 2019 at Bandri Co...

Dr Sharad Singh's Lecture on International Women's Day 2019 at Bandri Co...

बुधवार, फ़रवरी 20, 2019

विदा नामवर सिंह... विनम्र श्रद्धांजलि...- डॉ (सुश्री) शरद सिंंह

विदा नामवर सिंह... विनम्र श्रद्धांजलि...- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
"श्रद्धेय नामवर सिंह वे विरले साहित्यालोचक थे जिन्होंने अपना मानक स्वयं गढ़ा। विनम्र श्रद्धांजलि !" - डॉ शरद सिंह

"आलोचकों की प्रथम पंक्ति में जिनका नाम आता है उनमें से एक हैं नामवर सिंह। हिन्दी साहित्य में नामवर सिंह होने का अर्थ क्या है? इस पर बड़ी सजगता से कलम चलाई है सदानंद शाही ने।"
- ‘‘सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के जुलाई-सितम्बर 2016 अंक में मेरे संपादकीय से...डॉ शरद सिंह

"वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने टिप्पणी की थी कि ‘‘अपनी आलोचनात्मक क्षमता के द्वारा मुक्तिबोध ने प्रमाणित कर दिया कि कोई भी चीज तभी स्पष्ट होती है जब कम-से-कम एक ईमानदार व्यक्ति मौजूद हो।’’" - ‘‘सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के अप्रैल-जून 2017 अंक में मेरे संपादकीय से...डॉ शरद सिंह

शुक्रवार, जनवरी 18, 2019

चर्चित कथाकार और स्त्री-विमर्शकार लेखिका शरद सिंह की नई किताब ' थर्ड जेंडर विमर्श '

Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh
यही है मेरी नई किताब "थर्ड जेंडर विमर्श" ... इसकी सामग्री आपको चौंकाएगी और समाज के उस पक्ष से परिचित कराएगी जिसे अभी आप ठीक से नहीं जानते हैं और जानते भी हैं तो सिर्फ़ किन्नर, हिजड़ा, छक्का जैसे संबोधनों तक.... यदि जानना चाहते हैं अधिक तो मेरी इस किताब को एकबार जरूर पढ़िए......
-  डॉ शरद सिंह

  
Third Gender Vimarsh - Book of Dr Sharad Singh (Book Cover)

आप इस पुस्तक को क्रय करने हेतु निम्नलिखित कोई भी सुविधा का उपयोग कर सकते हैं।
सामयिक प्रकाशन
थर्ड जेंडर विमर्श - डॉ. शरद सिंह
₹ 495.00 हार्ड बाउंड
₹ 250.00 पेपर बैक्स


आप +917065507086 न. पर Paytm द्वारा सीधे अपनी रुचि की किताबों का भुगतान कर दें।
Aap On line Payment kar Sakte hain
Our Bank Account Details
Account Name Samayik Prakashan
Bank Name Canara Bank Daryaganj New Delhi 110002
Account No 0388256010566
IFSC Code CNRB0000388
MICR Code. 110015006

इसके बाद अपना पोस्टल एड्रेस और मोबाइल न. भेज दें। किताबें आपको वहीं प्राप्त हो जायेगी।
Our Email id & Contact No
samayikprakashan@
gmail.com
01123282733
01123270715

07065507086
( Paytm, whatsapp , sms & call )

गुरुवार, जनवरी 10, 2019

शब्दों का उत्सव ... ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203---नाला सोपारा’ - संपादकीय - शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh, Editor & Author
‘‘सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के जनवरी - मार्च 2019 अंक में मेरा संपादकीय ...
 
("सामयिक सरस्‍वती", कार्यकारी संपादक Sharad Singh, संपादक Mahesh Bhardwaj जनवरी - मार्च 2019 अंक )


संपादकीय
शब्दों का उत्सव ... 

‘पोस्ट बॉक्स नं. 203---नाला सोपारा’
- शरद सिंह
शब्दों का उत्सव ज़ारी है। वर्ष 2018 ने जाते-जाते सामयिक प्रकाशन को जो उपहार दिया वह न केवल सामयिक प्रकाशन वरन् हिन्दी के समस्त साहित्य सर्जकों के लिए उत्सवी माहौल पैदा कर रहा है। हिन्दी की वरिष्ठ लेखिका चित्रा मुद्गल को वर्ष 2018 का प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलना उस लेखकीय प्रतिबद्धता का सम्मान है जो समाज के शोषित पक्ष की निरंतर पैरवी कर रही है। चित्रा जी की सत्यनिष्ठा और सादगी यह कि साहित्य अकादमी पुरस्कार की घोषणा होने पर उन्होंने कहा कि ‘‘यह वंचित तबकों के प्रति मेरी सामाजिक प्रतिबद्धता और उससे उपजे मेरे साहित्य का सम्मान है।’’
हिन्दी साहित्य जगत् का एक विश्वस्त नाम हैं चित्रा मुद्गल। एक लम्बा जीवन-अनुभव ही नहीं वरन् अनवरत साहित्यिक प्रतिबद्धता चित्रा मुद्गल को दो लेखकीय पीढ़ियों के बीच सेतु के समान स्थापित किए हुए है। उन्होंने समय की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए समकालीन धरातल से जिस प्रकार स्वयं को जोड़े रखा है, वह युवा ही नहीं वरन् अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत कहा जा सकता है। व्यक्तिगत जीवन के उतार-चढ़ाव के झंझावातों से गुज़रते हुए परपीड़ा को आत्मसात करके उसे शब्दों में उतारना और औपन्यासिक विन्यास में पिरो कर सर्वजन के समक्ष रखना असीम धैर्य, गहन संवेदना और अभिव्यक्ति की सक्षमता का द्योतक है। ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203-- नाला सोपारा’ जैसा उपन्यास यूं ही नहीं लिखा जा सकता है। इस उपन्यास के कथानक को चुनने और फिर कथानक को उपन्यास के रूप में ढालने के बीच जिस मनोदशा से चित्रा जी गुज़री हैं उसे उनके साक्षात्कारों से जाना और समझा जा सकता है, फिर भी बहुत कुछ छूटा हुआ है अभी भी उनके भीतर। कोई भी व्यक्ति अपनी संवेदना को अक्षरशः बयां नहीं कर सकता है लेकिन उसी संवेदना को उसकी रचना के पात्रा रेशा-रेशा बयां कर देते हैं।
‘‘मैं पेड़ नहीं बनना चाहता, मैं पेड़ का मतलब होना चाहता हूं।’’ नोबेल पुरस्कार विजेता टर्किश लेखक ओरहान पामुक जब यह कहते हैं तो वे पेड़ को जी रहे होते हैं। यही तो है कि जब बात किसी अनुभव के पर्याय बनने की होती है तो आवश्यक हो जाता है उसमें ढल कर उसी के जैसे हो जाया जाए। यहां ध्यान देने की बात है कि ‘वह नहीं’ अपितु ‘उसी के जैसे’। वही हो जाने में अभिव्यक्ति उसी की तरह अवरुद्ध हो जाएगी, मौन रह जाएगी जबकि उसका पर्याय बनने में उसकी पीड़ा, उसकी प्रसन्नता, उसकी संवेदना और उसके स्वप्नों को बयां किया जा सकता है। शहद के छत्ते से शहद की बूंदें कभी अपने-आप नहीं रिसती हैं। शहद की मिठास तक पहुंचने के लिए छत्ते के चक्रव्यूह को भेदना पड़ता है। ठीक इसी तरह पात्रों को चुनना और उन पात्रों के मनोभावों के तह तक पहुंचने के लिए उनके परिवेश को भेदना जरूरी हो जाता है। जो कथाकार जितनी सजगता और तन्मयता से अपने पात्रों के गोपन तक पहुंच जाता है और उसे उसके अनुरुप अभिव्यक्ति दे देता है, वही कालजयी कथाएं रचता है। ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203---नाला सोपारा’ जैसी कालजयीकृति को पढ़ना एक उपेक्षित समाज से तादात्म्य स्थापित कर लेने के समान है।
‘पो. बॉक्स नं. 203- नालासोपारा’ हिन्दी साहित्य में ऐसा पहला उपन्यास है जो किसी किन्नर की उस भावना से साक्षात्कार कराता है जो उसे उसके जैविक परिवार से सदैव जोड़े रखता है। यह उपन्यास समाज में किन्नरों की मनोदैहिक उपस्थिति को रेखांकित करता है। ‘पो. बॉक्स नं. 203- नालासोपारा’ की लेखिका चित्रा मुद्गल ने अपनी सिद्धहस्त लेखनी से एक मां और उसके किन्नर पुत्रा के परस्पर प्रेम को जिस मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है, वह अद्भुत है। ‘एक ज़मीन अपनी-सी’, ‘आवां’, ‘गिलिगडू’ जैसे सामाजिक सरोकारों के बहुचर्चित उपन्यासों की लेखिका चित्रा मुद्गल समाजसेवा से जुड़ी हैं। उनके ज़मीनी अनुभव उनके उपन्यासों को दस्तावेज़ी बना देते हैं। उनका उपन्यास ‘पो. बॉक्स नं. 203- नालासोपारा’ भी अपने आप में यथार्थ का एक ऐसा दस्तावेज़ सामने रखता है जिसका एक-एक शब्द पढ़ते हुए कभी रोमांच होता है तो कभी सिहरन, तो कभी मानसिक उद्वेलन। लेखिका ने अपने उपन्यास के माध्यम से यह प्रश्न उठाया है कि यदि कोई शिशु लिंग दोष के साथ जन्म लेता है तो भला उसमें इसका क्या दोष? 
आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि प्रत्येक किन्नर अपने समुदाय के बीच पला-बढ़ा होता है इसलिए उसकी सारी संवेदनाएं, सारे सरोकार अपने समुदाय के प्रति ही रहते हैं किन्तु इस मिथक को तोड़ते हुए चित्रा मुद्गल ने यह पक्ष  उजागर किया है कि माता-पिता की स्मृतियां ठीक उसी तरह उनके साथ भी रहती हैं जैसे कि किसी सामान्य व्यक्ति के साथ। ‘नाला सोपारा’ एक ऐसे किन्नर की कथा है जो अपनी मां का पता लगाकर उसके साथ पत्रा व्यवहार करता है। मां भी परिवार से छिपा कर अपने बेटे को उसके पत्रों के उत्तर देती है। लेकिन वह पत्राचार को गोपनीय रखती है। उसे इस बात का भय है कि यदि लोगों को उसकी किन्नर संतान का पता चल गया तो उसकी दूसरी संतानों के वैवाहिक संबंध में भी रुकावट आ जाएगी। उपन्यास पत्रा शैली में है। इस उपन्यास में कई चुभते हुए प्रसंग हैं जो मन-मस्तिष्क को झकझोरने में सक्षम हैं। सरकार ‘थर्ड जें़डर’ को आरक्षण दिए जाने पर विचार कर रही होती है तब उपन्यास का किन्नर नायक कहता है कि ‘‘सरकार को चाहिए कि वह किन्नरों के लिए आरक्षण के बजाय मां-बाप को दंडित करने का प्रावधान करे। अगर भ्रूण के लिंग परीक्षण करने पर आप सजा का प्रावधान कर सकते हैं तो ऐसे मां-बाप को क्यों नहीं दंडित किया जाना चाहिए जो अपने किन्नर बच्चों को कहीं छोड़ आते हैं या फिर किन्नरों को दे देते हैं?’’
बाज़ारवाद, भू-मण्डलीकरण अथवा अपसंस्कृति का विश्लेषण एवं विवेचन करते समय समाज का वह हिस्सा छूट जाता है जिसके जीवन पर चिन्तन करना सदियों पहले शुरू कर दिया जाना चाहिए था। समाज का अभिन्न हिस्सा ही तो हैं किन्नर, और उन्हें भी समाज में सम्मान एवं समानता पाने का अधिकार है।
चित्रा जी के अब तक लगभग तेरह कहानी संग्रह, तीन उपन्यास, तीन बाल उपन्यास, चार बाल कथा संग्रह, पांच संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. बहुचर्चित उपन्यास ’आवां’ के लिए उन्हें व्यास सम्मान से भी सम्मनित जा चुका है। इसके अलावा उन्हें इंदु शर्मा कथा सम्मान, साहित्य भूषण, वीर सिंह देव सम्मान आदि प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार इनमें सबसे ताज़ा सम्मान है।
कथाएं काव्य से अधिक मुखर हो कर तत्कालीन परिवेश के रंगों को साहित्य में उभार देती हैं, इसीलिए काव्य में भी कथाएं रची गईं। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ कथात्मक महाकाव्य हैं। बुंदेलखण्ड के कवि जगनिक ने ‘‘आल्हाखण्ड’’ में आल्हा-ऊदल के वीरता के किस्से काव्यबद्ध किए हैं। बुंदेली लोककवि ईसुरी ने भी काव्य में कथा रची। लेकिन वह है प्रेयसी ‘रजऊ’ के प्रति उनकी प्रेमकथा। जिसका विन्यास कथात्मक न होते हुए भी प्रेमकथा के दृश्य उकेरता चलता है। विगत दिनों एक किताब आई है ‘‘लोककवि ईसुरी’’ जिसके लेखक हैं श्यामसुंदर दुबे। इस पुस्तक को ईसुरी के काव्य-साहित्य की पुनर्व्याख्या कहा जा सकता है। ईसुरी ने जिस तरह का काव्य रचा उसे ‘फाग’ कहा जाता है। ईसुरी ने फागों की एक विशिष्ट शैली  ‘चौघड़िया फाग’ को जन्म दिया। वहीं यह भी माना जाता है कि ईसुरी ने अपनी प्रेमिका ‘रजऊ’ को अपने कृतित्व में अमर कर दिया। 
जो तुम छैल छला हो जाते परे उंगरियन राते
मां पांछत गालन खों लगते कजरा देत दिखाते
घरी-घरी घूंघट खोलत में नजर के सामें राते
ईसुर दूर दरस के लानें ऐसे कायं ललाते।
वसंत निरगुणे ने लिखा है कि ‘‘मेरी दृष्टि में ईसुरी ने रजऊ में उस विराट स्त्रा के दर्शन कर लिए थे, जिसे ब्रह्मा ने पहली बार रचा था। यह ईसुरी का लोक रहा जिसमें रजऊ बार-बार आती है और स्त्रा की नई व्याख्या ईसुरी के छंद में उतरती जाती है।’’ वस्तुतः ईसुरी के काव्य में स्त्रा के स्वरूप को समझे बिना ईसुरी के काव्य को समझा नहीं जा सकता है। लेकिन इस समझ की फ़़ुरसत किसे है? हिन्दी काव्य से पारम्परिक छंद ही धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं। कभी-कभी लगता है मानो हमारे लोक काव्य से ईसुरी जैसे कवि विलुप्ति के कगार पर जा पहुंचे हैं और छंदमुक्त कविता को ‘टूल’ मानकर यथार्थ की दुंदुभी बजाने का भ्रम पाले हुए कवियों का हुजूम काव्य की सरसता को सोखता जा रहा है। छंदमुक्त कविता में भी सरसता हो सकती है, बशर्ते वह नारे के सपाटपन से आगे बढ़ कर उतार-चढ़ावमय ध्वन्यात्मकता को अपनाए।
कथा के प्रति आश्वस्ति और काव्य के प्रति चिंतन के साथ ही ‘सामयिक सरस्वती’ की ओर से सभी रचनाधर्मियों एवं सुधी पाठकों को नववर्ष 2019 की हार्दिक शुभकामनाएं!
और अंत में एक कामना, मेरी कविता के रूप में-
नए साल की धूप
जब-जब माथे को चूमे
तो लिख जाए -
एक कथा, एक कविता, एक लेख
उनके नाम
जिन तक कभी पहुंची ही नहीं धूप।
----------
----------------------------

Samayik Saraswati Jan.-March 2019 Cover

Also can read on this Link ...