रविवार, सितंबर 25, 2016

विमर्श रास्ता है तो विवाद रुकावट

Dr (Miss) Sharad Singh
‘‘सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के जुलाई-सितम्बर 2016 अंक में मेरा संपादकीय ...
("सामयिक सरस्‍वती", संपादक Mahesh Bhardwaj, कार्यकारी संपादक Sharad Singh) जुलाई-सितम्बर 2016 अंक )
विमर्श रास्ता है तो विवाद रुकावट
- शरद सिंह
वर्षा ऋतु का आगमन... चिलचिलाती धूप के बाद एक सुखद अनुभव...किसी वृद्ध के चेहरे-सी गहरी झुर्रियों वाली सूखी हुई धरती पर रौनक लौटाती बूंदें... रेत से धूसर हो चले परिदृश्य पर हरियल अंकुराते सपने। हर बार की तरह इस बार भी पावस ने सूखे के द्वार पर दस्तक दी कि लो, मैं आ गया। उन राज्यों में राहत की लहर दौड़ गई जहां किसान आकाश की ओर टकटकी बांधे देख रहे थे।
पावस... हां, पावस में ही होती है ‘‘पावस व्याख्यानमाला’’। 23-24 जुलाई 2016 को हिन्दी भवन, भोपाल में आयोजित दो दिवसीय 23वीं पावस व्याख्यानमाला में ‘‘समकालीन उपन्यासों में थर्ड जेंडर की सामाजिक उपस्थिति’’ विषय पर मैंने अपना व्याख्यान देते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘इस मंच से थर्ड जेंडर विमर्श को आरम्भ किए जाने की मैं घोषणा करती हूं।’’ वहां उपस्थित बुद्धिजीवियों ने मेरी इस घोषणा का स्वागत किया। मेरी इस बात का भी कि थर्ड जेंडर को सामाजिक समानता के अधिकार दिलाने में साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और आवश्यकता है ऐसे साहित्य पर एक स्वतंत्रा विमर्श की। ...और मैंने अनुभव किया कि सभी उत्सुक हैं इस नए विमर्श के आगाज़ के लिए। मैंने अपनी बात के तर्क में थर्ड जेंडर से जुड़ी जमीनी सच्चाइयों के साथ ही हिन्दी के उन उपन्यासों पर विस्तार से चर्चा की जो थर्ड जेंडर पर आधारित हैं। इस विषय पर मेरी एक पुस्तक भी आने वाली है। वैसे सच कहूं तो हिन्दी साहित्य में थर्ड जेंडर पर अलग से विमर्श की आवश्यकता का अनुभव मुझे तब हुआ जब मैंने वरिष्ठ कथाकार चित्रा मुद्गल का उपन्यास ‘‘पोस्ट बॉक्स 203 नाला सोपारा’’ पढ़ा। इस उपन्यास की कथा अपने आप में अद्भुत है और मन की गहराइयों तक उतर जाने में सक्षम है क्यों कि यह उपन्यास समाज में थर्ड जेंडर की दशा को नहीं वरन् थर्ड जेंडर की ओर से उसकी स्वयं की मनोदशा का बारीकी से विश्लेषण करता है।
विमर्श और विवाद दोनों ही ‘वि’ से शुरू होते हैं लेकिन एक विचारों को नया रास्ता देता है तो दूसरा विचारों की राह में रुकावट बन जाता है, यदि वह विवाद साहित्यिक चोरी का हो या घोस्ट राईटिंग के रहस्य के उद्घाटन का। ‘पल्प फिक्शन’ के क्षेत्रा में घोस्ट राईटिंग आम बात रही है। मोटे, धूसर काग़ज़ पर छपने वाले पॉकेटबुक उपन्यासों की दुनिया में घोस्ट  राईटर्स की कोई कमी नहीं है। कोई नाम लेखक के तौर पर ‘ब्रांड’ बन जाने पर उस छद्म नाम पर विभिन्न लेखकों से उपन्यास लिखवाए जाते रहे हैं। आमतौर पर घोस्ट राईटर पैसों की तंगी से निपटने के लिए मजबूरी में यह रास्ता अपनाते  हैं। इसीलिए जब कोई विवशता न हो और फिर भी घोस्ट राईटिंग की जाए, वह भी किसी वास्तविक नाम के लिए तो मामले को समझना ज़रा मुश्क़िल हो जाता है। अनेक बार ऐसे विवाद सामने आ चुके हैं जिनमें कभी किसी लेखिका पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगा तो  कभी किसी लेखक ने दूसरे साहित्यकार के लिए सृजन का दावा किया। ताज़ा विवाद ‘जोशी बनाम जोशी’ का है। जिसमें प्रभु जोशी ने भालचन्द्र जोशी के लेखन पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए खुलासा किया है कि वे भालचन्द्र जोशी की कहानियों को विस्तार दिया करते थे।  सभी आरोपां को नकारते हुए भालचन्द्र जोशी ने इसे ‘हताश और कुंठित व्यक्ति की मनःस्थिति’ करार दिया है। पत्रिका के इस अंक में इस विवाद के दोनों पक्षों को उन्हीं के शब्दों में पाठकों के सामने यथावत् रखा जा रहा है। ‘सामयिक सरस्वती’ के प्रबुद्ध पाठक सत्य का आकलन कर ही लेंगे।
मानव चरित्रा और मानव मन को समझ पाना सबके बस की बात नहीं होती। समाज विज्ञान और मानविकी पर अधिकारपूर्वक व्याख्यान देने वाले विद्वान तथा वर्तमान में महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र वर्तमान शिक्षा पद्धति को ले कर चिन्तित हैं। उनका कहना है कि ‘‘दुर्भाग्यवश आज की शिक्षापद्धति की आधारभूमि बर्तानवी औपनिवेशिक शासन की उस नीति में थी, जिसका उद्देश्य शासकों और शासितों के बीच  बिचौलिए पैदा करना था। इसके लिए पश्चिमी शिक्षा की अंग्रेजी माध्यम से नींव डाली गयी।’’ उनकी चिन्ता स्वाभाविक है। शिक्षा से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों और उनके उत्तरों के साथ ‘रचना, आलोचना और साक्षात्कार’ में इस बार प्रो. गिरीश्वर मिश्र हैं .... उनसे महत्वपूर्ण बातचीत की है अशोक मिश्र ने और उनके कृतित्व पर आलोचनात्मक टिप्पणी की है बलराम शुक्ल ने।
आलोचकों की प्रथम पंक्ति में जिनका नाम आता है उनमें से एक हैं नामवर सिंह। हिन्दी साहित्य में नामवर सिंह होने का अर्थ क्या है? इस पर बड़ी सजगता से कलम चलाई है सदानंद शाही ने।
हमेशा की तरह इस अंक में भी  कहानियां, कविताएं, लेख और पुस्तक समीक्षा। लेकिन हर एक के तेवर अलग, हर एक की ज़मीन अलग। शशिकला त्रिपाठी का लेख ‘साम्प्रदायिकता और हिन्दी फिल्में’ एक दिलचस्प दिशा देता है हिन्दी फिल्मों के बारे में विचार करने को। हॉलीवुड की फिल्मों से हमारी हिन्दी फिल्मों, विशेषरूप से कामर्शियल फिल्मों में एक सबसे बड़ा अन्तर है गानों का।  हिन्दी फिल्मों में गायक और गाने फिल्मों को जनमानस की स्मृतियों से जोड़े रखने में सेतु का काम करते हैं। ‘कभी तनहाइयों में हमारी याद आएगी...’ जिस आवाज़ में यह मशहूर गाना गाया गया था वो आवाज़ मुबारक़ बेगम की थी जिन्हें पिछले दिनों हमने खो दिया। किसी समय लाखों दिलों पर राज करने वाली पार्श्व गायिका मुबारक बेगम का लंबी बीमारी के बाद मुंबई में जोगेश्वरी स्थित घर में निधन हो गया। वह 80 साल की थीं। मुबारक बेगम ने 1950 से 1970 के बीच कई फिल्मों में गाने गाए। मुबारक़ बेगम भले ही ज़मीदोज़ हो गईं लेकिन उनकी आवाज़ हमेशा हवाओं में तैरती रहेगी।
विगत दिनों हमने कई कला और साहित्य के कई दिग्गजों को खोया। कालजयी कृति ‘हज़ार चौरासी की मां’ की लेखिका महाश्वेता देवी का देहावसान  साहित्यजगत को स्तब्ध कर गया। जनजातीय समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हीं के शब्दों में ‘‘एक लम्बे अरसे से मेरे भीतर जनजातीय समाज के लिए पीड़ा की जो ज्वाला धधक रही है, वह मेरी चिता के साथ ही शांत होगी।’’   उनके उपन्यास गहन शोध पर आधारित हैं। 1956 में प्रकाशित अपने पहले उपन्यास ‘झांसीर रानी’ की तथ्यात्मक सामग्री जुटाने के लिए उन्होंने सन् 1857 की जनक्रांति से संबद्ध क्षेत्रों झांसी, जबलपुर, ग्वालियर, ललितपुर, कालपी आदि की यात्रा की थी। वे अपने विशिष्ट लेखन के लिए सदा स्मरणीय रहेंगी।
जिस रास्ते से भी जाऊं/ मारा जाता हूं / मैंने सीधा रास्ता लिया/ मारा गया/ मैंने लम्बा रास्ता लिया/ मारा गया.... ये पंक्तियां हैं नीलाभ अश्क़ की, जिन्हें हमने खो दिया है। प्रसिद्ध साहित्यकार उपेंद्रनाथ अश्क के पुत्रा एवं जाने माने कवि, पत्राकार, नाटककार, अनुवादक, आलोचक और जुझारू  साथी  नीलाभ अश्क। उन्होंने अरूंधति राय की पुस्तक ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ का अनुवाद ‘मामूली चीजों का देवता’ शीर्षक से किया था। शेक्सपीयर, ब्रेख्त और लोर्का के कई नाटकों का काव्यात्मक अनुवाद और लेर्मोन्तोव के उपन्यास का अनुवाद भी किया। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की त्रौमासिक पत्रिका ‘नटरंग’ के संपादक रहे। वे ‘नीलाभ का मोर्चा’ नाम का ब्लॉग भी लिखते थे।
एक और महत्वपूर्ण कवि, अनुवादक, अध्यापक एवं पत्राकार को हमने खोया ... वे है वीरेन्द्र डंगवाल। उनके काव्य-सृजन  की विशेषता थी उन्मुक्तता के साथ बौद्धिकता और लोकत्व के गुण। पहाड़ की प्रतिध्वनियों से भरीपूरी अभिव्यक्ति ने काव्यप्रेमियों को उनकी ओर सहज आकर्षित किया। वीरेन डंगवाल ने पाब्लो नेरूदा, बर्टोल्ट ब्रेख्त, वास्को पोपा, मीरोस्लाव होलुब, तदेऊश रोजेविच और नाजिम हिकमत की कविताओं के अनुवाद भी किए।
कलम और तूलिका भावनाओं को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम हैं। जो संवाद एक कविता या कहानी कर सकती है वही संवाद एक पेंटिंग भी करती है। शब्दों से रंग और रंगों से शब्द  ध्वनित होना ही कला और साहित्य को परस्पर जोड़ता है। कलम के धनी अशोक वाजपेयी और तूलिका के धनी सैयद हैदर रज़ा की मित्राता अभिन्न रही। भारत के तीन सर्वोच्च सम्मान पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री से सम्मानित विश्वविख्यात चित्राकार सैयद हैदर रज़ा का निधन कलाजगत के लिए एक अपूर्णीर्य क्षति है।
रिश्ता चाहे संगीत का हो, चित्राकला का हो या फिर साहित्य का, अपनों का बिछड़ना सदा पीड़ादायक होता है। यह चिरविछोड़ उस सत्य का भी पाठ पढ़ाता है कि जीवन नश्वर है, ज़िंदगी की शाम कभी भी हो सकती है तो फिर परस्पर लडाई, झगड़ा, विवाद, वैमनस्य क्यों?
खोने से पहले पा लेना ही जीवन की थाती रह जाता है वरना बचता है एक खालीपन ही तो। ... और अंत में  इसी सत्य का अनुमोदन करती मेरी यह कविता-
सुना तो बहुत था
धूप की चादर में लिपटे हुए ख़्वाब
कभी पूरे नहीं होते
अब ये जाना
तुमको खो कर
कि लोग सच कहते थे।
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Samayik Saraswati, July-September 2016 - Editorial (1)
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