गुरुवार, अप्रैल 28, 2011

साहब जी उर्फ एक मान्यता प्राप्त कवि (व्यंग-आलेख)


- डॉ. सुश्री शरद सिंह

    एक दिन एक अनहोनी घटना घट गई। हुआ यूं कि साहब जी ने सुबह-सवेरे रेडियो पर एक कविता सुन ली। कविता की पंक्तियां कुछ इस प्रकार थीं कि -
मुझे जो दिखता है
       ‘वो किसी को नहीं दिखता       
       जो किसी को नहीं दिखता
       कभी-कभी वह भी मुझे दिख जाता है...’

 कोई और दिन होता तो साहब जी उस कविता के रचनाकार को अंधा, पागल और न जाने किन-किन उपाधियों से विभूषित कर देते। लेकिन अनहोनी होनी थी और हुई। साहब जी को कविता पसंद आ गई। बहरहाल, साहब जी नहा-धो कर, तैयार हो कर अपने दफ्तर पहुंचे। 
     दफ्तर पहुंच कर गुमसुम से बैठ गए अपनी कुर्सी पर। साहब जी के प्रिय चमचे ने साहब जी की ये दशा देखी तो वह चिन्तित हो उठा। उसने साहस कर के पूछा -‘सब ठीक तो है न, सर...’
अपने प्रिय चमचे को उत्तर देने की बजाए साहब जी खोए-खोए अंदाज़ में बोले-

जो दिखता है/ वो नहीं दिखता
कुछ दिखता है/ कुछ नहीं दिखता.....

     साहब जी के श्रीमुख से ये अटपटे वचन सुन कर पहले तो चमचा चौंका फिर दूसरे ही पल बोल उठा-‘वाह सर जी! क्या कविता है, वाह ...’
        इस पर साहब जी सकुचा कर बोले- ‘ये मेरी नहीं है। इसे मैंने आज सुबह रेडियो पर सुना था। ठीक से तो याद नहीं लेकिन कुछ इसी प्रकार की थी।’
            जो मस्का न लगाए वो चमचा कैसा....चमचे ने तारीफ के पुल बांधते हुए कहा-‘ऐसा कहना आपका बड़प्पन है, सर! वरना ऐसी कविता आपके अलावा और कोई लिख ही नहीं सकता है। अब देखिए न, आप खुद ही कह रहे हैं कि रेडियो वाली कविता कुछ इसी प्रकार की थी लेकिन यही तो नहीं थी। इसका अर्थ ये है कि ये आपकी मौलिक कविता है।’
इस प्रकार चमचे ने तर्क सहित साहब जी को कवि घोषित कर दिया। साहब जी गदगद हो उठे। उन्हें लगा कि उनका चमचा सच कह रहा है, ये तो उनकी अपनी पंक्तियां हैं। बिलकुल मौलिक।
             इधर साहब जी कविता की मौलिकता पर मंत्रा-मुग्ध हुए और उधर चमचा कमरे से बाहर लपका, सबको बताने। वेतन में कटौती या इंक्रीमेंट की बढ़ोत्तरी की ख़बर के समान यह ख़बर भी चुटकी बजाते पूरे दफ़्तर में फैल गई। फिर इस ख़बर का देखते ही देखते स्वरूप बदल गया।

 एक ने कहा कि  -‘साहब जी कविताएं लिखते हैं।’

 दूसरे ने कहा कि -‘साहब जी एक वरिष्ठ कवि हैं।’

तो, तीसरे ने दावा ठोंक दिया कि -‘साहब जी जन्मजात कवि हैं.’

     दफ्तर के लोग बारी-बारी से आने लगे और साहब जी से उनकी कविता सुन -सुन कर अपने कानों को धन्य करने लगे। शाम होते-होते तक साहब जी अपने अधीनस्थों और चमचों के द्वारा मान्यता प्राप्त कवि बन गए।
       साहब जी के प्रिय चमचे ने देखा कि मामला उसके हाथ से निकला जा रहा है और उसके सहकर्मी चमचागिरी में उससे बाज़ी मार रहे हैं तो वह फड़क उठा। उसने आनन-फानन में अपने आवास पर एक कवि गोष्ठी आयोजित कर डाली और साहब जी को उसमें कविता-पाठ का आमंत्राण दे डाला। चमचा जानता था कि तीर निशाने पर लगेगा ही क्यों कि कोई साहित्यिक संस्था तो साहब जी को बुलाने से रही।
       साहब जी गोष्ठी में पहुंचे। साहब जी ने न केवल अपनी कविता सुनाई बल्कि अध्यक्षीय भाषण भी दिया। गोष्ठी में उपस्थित चमचा-मंडली ने अपनी सामर्थ्य से भी बढ़-चढ़ कर साहब जी की प्रशंसा की। यहां तक कि गद्य और पद्य का भेद भुला कर साहब जी को प्रसाद, पंत, निराला और रामचन्द्र शुक्ल से भी महान कवि कह डाला। गोष्ठी से घर लौटते समय तक साहब जी को भी विश्वास हो गया कि वे सचमुच एक महान और मौलिक कवि हैं। उनसे बड़ा कवि न तो अब तक हुआ है और न होगा।
      वह दिन था कि आज का दिन । साहब जी ने यहां-वहां से जोड़े-बटोरे गए सजावटी सामानों को एक ओर धकिया कर आलमारियों और मेजों को कविताओं की क़िताबों से भर दिया है। इन्हीं क़िताबों में तो उनका कवित्व बसा हुआ हैं। जी हां दस-बारह क़िताबों से पचीस-तीस शब्द उठाना उन्हें बारह-पन्द्रह लकीरों का रूप दे कर कविता तैयार करना, साहब जी का नित्य प्रातः कर्म बन गया है। उनकी कठिन से कठिन अबूझ से अबूझ कविता भी उनके चमचों के द्वारा रोगी के पथ्य के समान सुपाच्य ठहरा दी जाती है।
  अब तो साहब जी को प्रतीक्षा है, एक अदद अखिल भारतीय पुरस्कार की । क्योंकि उनके चमचों ने उन्हें विश्वास दिला दिया है कि वह पुरस्कार शत-प्रतिशत उन्हीं को मिलना है।

27 टिप्‍पणियां:

  1. सरस, रोचक शैली का आकर्षण अंत तक बांधे रखता है।
    और चमचागिरी की तो हद है। साहब जी जब पुरस्कृत हो कर नाम कमा लें तो हमें भी बताइएगा।

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  2. खुदा ऐसे चमचे सबको दे...साडे ब्लॉग को भी अपने कमेन्ट से नवाजो तुस्सी...

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  3. सुन्दर लेखन, गहरे भाव. बधाई ............. !

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  4. "pitaaji khaa karte the -"khushaamad main badi takat ,khushaamd hi se aamad hai "
    "khushaamad "-Maskaa ,Chamchaagiree ,
    "aamad "-aamadni .
    behtreen vyangy vinod -
    "sahibji si ek tukbandi -
    kabse unko dhoondh rhaa man ,
    milne ko unse be -chain ,
    naa din chain, naa raat me chain ,
    kahte log mujhe be -chain "
    ek prayogvaadi kavitaa sahibji kee aur bhi hai -
    KHADI EK BALAA,LIYE HAATH BHALAA ,
    ADHARON SE LGAAYE CHAAY KAA PYAALAA "
    veerubhai .

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  5. मनोज कुमार जी,
    मेरे व्यंग लेख को सराहने के लिए हार्दिक आभार...

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  6. रंजना जी,
    सुखद लगा जानकर कि मेरा व्यंग लेख आपको पसन्द आया..हार्दिक धन्यवाद...

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  7. वानभट्ट जी,
    आपकी दुआ के लिए आमीन...
    मेरे व्यंग लेख को सराहने के लिए हार्दिक आभार...

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  8. रूप जी,
    मेरे व्यंग लेख पर अपने विचारों से अवगत कराने के लिए हार्दिक आभार...

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  9. वीरूभाई जी,
    मेरे व्यंग लेख को सराहने के लिए हार्दिक आभार...

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  10. प्रवीण पाण्डेय जी,
    आपको मेरा व्यंग लेख आपको पसन्द आया यह जानकर सुखद लगा...हार्दिक धन्यवाद एवं आभार...

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  11. चमचों की मेहरबानी ने साहबजी को अखिल भारतीय स्तर का कवि बना दिया । भई वाह...

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  12. वाह शरद जी ,

    यथार्थ की भावभूमि पर बड़ा ही हनकदार, मनोरंजक और प्रवाहमय व्यंग्य लेख है आपका |

    बहुत अच्छा लगा पढ़कर ...

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  13. मै भी आपकी खुशामद करते हुवे कह रहा हूँ की पहली बार इतना शानदार व्यंग लेख आपके ब्लॉग पर देखा मैंने!
    कृपया यही प्रवृत्ति आगे के लेखों में भी बनाए रखिये.
    निराशा में एक आशा की ज्योति जलाई है आपने!!
    धन्यवाद...........

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  14. सुशील बाकलीवाल जी,
    मेरे व्यंग लेख पर अपने विचारों से अवगत कराने के लिए हार्दिक आभार...

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  15. सुरेन्द्र सिंह झंझट जी,
    आपको मेरा व्यंग लेख आपको पसन्द आया यह जानकर सुखद लगा...हार्दिक धन्यवाद एवं आभार...

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  16. मदन शर्मा जी,
    सुखद लगा जानकर कि मेरा व्यंग लेख आपको पसन्द आया..हार्दिक धन्यवाद...
    विचारों से अवगत कराने के लिए हार्दिक आभार...

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  17. बहुत सुन्दर भाव के साथ रोचक लेख! उम्दा पोस्ट!

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  18. :):) बढ़िया प्रस्तुति ..चमचे जो न कर जाएँ कम है

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  19. हाहाहाहा....बहुत खूब, ऐसे चमचे भगवान सभी को दें!!!

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  20. जय हो कवि श्रेष्ट की...


    बहुत सन्नाटेदार रहा यह चपाटा तो!!! :)

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  21. वाह शरद जी ,

    सरस, रोचक शैली में लिखा गया बहुत ही करारा व्यंग्य .

    ( शरद जोशी और हरिशंकर परसाई जी की याद ताज़ा हो गई .)

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