रविवार, अप्रैल 17, 2011

समकालीन हिन्दी कथा साहित्य की कुछ प्रमुख विशेषताएं

- डॉ. शरद सिंह


साहित्य की किसी विधा की विशेषताओं को कुछ बिन्दुओं में प्रस्तुत करना अति संक्षेपीकरण माना जा सकता है तथापि मेरी दृष्टि में समकालीन हिन्दी कथा साहित्य की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नानुसार हैं-

1- पहले की अपेक्षा अधिक यथार्थवादी कथानक
2- सामाजिक सरोकारों के साथ राजनीतिक एवं आर्थिक मूल्यों की चर्चा
3-स्त्री विमर्श पर आधारित कथानक
4-अपने अस्तित्व के लिए जूझती हुई, दोयम दर्जे से ऊपर उठती नायिका
5-दलित चेतना पर केन्द्रित कथावस्तु
6-स्त्रियों और दलितो की आन्तरिक पीड़ा का मुखर प्रस्तुतिकरण
7-फंतासी के बदले प्रेम का अधिक यथार्थ एवं व्यवहारिक वर्णन
8-भारतेन्दुयुग की कहानियों की तुलना में परिवर्तन के अधिक प्रभावी आग्रह
9-अलंकारिकता के आडम्बर  से परे सरल, सहज, आम बोलचाल की भाषा
10-निरन्तर प्रयोगधर्मी शैली
11-स्थानीय शब्दों और मुहावरों का अधिक प्रयोग
12-आंचलिक परिवेश की कहानियां
13-प्रेमचन्द और यशपाल से शुरू हो कर निरन्तर विकसित होता कथा-शिल्प
14-जीवन के नित नवीन पक्षों को उजागर करती कहानियां

23 टिप्‍पणियां:

  1. आपने प्रमुख बिंदुओं का बखूबी वर्णन किया है. बहुत अच्छा लिखा जा रहा है किन्तु आवश्यकता है इस लेखन को एक व्यापक जनाधार देने की. मुझे मालूम है कि कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारी कुछ अच्छा लेखन पाने के लिए तरसते है क्योंकि उन्हें मालूम नहीं होता कि कहाँ क्या लिखा जा रहा है. आज भी प्रेमचंद, बच्चन आदि से आगे हिंदी साहित्य का आम पाठक नहीं बढ़ पाया है. मेरी भी कोशिश है और सभी हिंदी प्रेमियों कि यह कोशिश होनी चाहिए कि आधुनिक हिंदी साहित्य विश्वविद्यालय आदि से निकलकर आम जनता तक पहुंचे.

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  2. धीरेन्द्र सिंह जी,
    बिलकुल सही कहा आपने कि आज भी प्रेमचंद, बच्चन आदि से आगे हिंदी साहित्य का आम पाठक नहीं बढ़ पाया है!

    मेरे इस छोटे से प्रयास को आपने सराह कर मेरा जो उत्साहवर्द्धन किया हैं उसके लिए मैं आपकी हृदय से आभारी हूं।

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  3. आज के साहित्य के बारे में सटीक बिंदु पेश किये हैं ...आभार

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  4. शरद जी एकदम सही विवेचना की है आपने. एह सच्चाई शायद कथा या साहित्य के अलावा अन्य सभी क्षेत्रों में भी होती जा रही है सभी कुछ सीधा सपाट. फिर चाहें वो रिश्ते हों, संगीत हो या खाना हो.

    आभार और अभिनन्दन सुंदर आलेख के लिए.

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  5. संगीता स्वरुप जी,
    जानकर प्रसन्नता हुई कि मेरा लेख आपको रूचिकर लगा।
    इसी तरह अपने अमूल्य विचारों से अवगत कराती रहें।
    हार्दिक धन्यवाद।

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  6. रचना दीक्षित जी,
    आपके विचारों ने मेरा उत्साह बढ़ाया. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार. कृपया इसी तरह सम्वाद बनाए रखें।

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  7. वर्तमान समय में प्रचलित कथा साहित्य के मुख्य बिंदुओं पर संक्षिप्त किन्तु सूक्ष्म जानकारी आपके इस लेख में दिखाई दे रही है । पाठकों के सामान्य ज्ञानवर्द्धन में उपयोगी इस आलेख हेतु आभार सहित...

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  8. har jagah brand bikta hai. pepsi ke aage lassi fail ho jaati hai. purane lekhak abhi bhi is assurance ke saath padhe jaate hain ki pusatk ka daam jaya nahin jayega. kitabein itani mahngi ho gayein hai aur sara ka sara dhyan book ke title khojane par rahta hai ki public ko kya appeal karega. tv/internet ke yug main pathakon ko baandh pana mushkil hai. naye pathakon ko khinchna to namumkin lagta hai. phir bhi padhane walon ke liye bahut kuchh likha ja raha hai. aaj aisi hi ek web site ka jikra mila http://vatsanurag.blogspot.com. likhiye, likhiye aur likhate rahiye, padhane ale khud mil jayeinge. ye baat sabhi bade aur chhote lekhakon par lagoo hoti hai. pahale bhasha panch mel khichadi thi ab hinglish ka tadka lagne se bhasha aur rochak ho gayi hai. us par bhi b4u/u r ok/c u type ki bhasha ka prayog rachnaon ko naye aayam de raha hai. accept and enjoy the change...

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  9. दिशा इंगित करते बिन्दुओं से पढ़ना सरल हो जाता है।

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  10. सुशील बाकलीवाल जी,
    बहुत-बहुत धन्यवाद....
    अत्यन्त आभारी हूं आपकी....विचारों से अवगत कराने के लिए।

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  11. वाणभट्ट जी,
    आपने बहुत तथ्यपूर्ण टिप्पणी की है। भाषा, साहित्य और शिल्प पर आपकी गहन दृष्टि देख कर प्रसन्नता हुई।
    इसी तरह अपने अमूल्य विचारों से अवगत कराते रहें।
    हार्दिक धन्यवाद।

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  12. प्रवीण पाण्डेय जी,
    आपके विचारों ने मेरा उत्साह बढ़ाया. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार. कृपया इसी तरह सम्वाद बनाए रखें।

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  13. समकालीन हिंदी साहित्य की विशेषताओं को आपने बड़े सलीके से सूत्रबद्ध किया है. बधाई
    ---देवेंद्र गौतम

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  14. देवेंद्र गौतम जी, (ghazalganga)
    बहुत-बहुत धन्यवाद....
    अत्यन्त आभारी हूं आपकी....विचारों से अवगत कराने के लिए।
    मेरे ब्लॉग्स पर आपका सदा स्वागत है।

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  15. समकालीन कहानियों में न वैचारिक जकड़बन्दी है, न सीमित जीवनानुभव पर आधारित कलाबाज़ी। आज का कहानीकार अपने समय को बृहत्तर सच को उसकी पूरी विविधता में चित्रित करने में लगा हुआ है। आज हमारे जीवन पर वैश्वीकरण, उदारीकरण, मीडिया आदि का प्रभाव है। दबाव है। इन दबावों को पहचानना और इनके बीच से जीवन का रास्ता तलाशना आज के कहानीकार की जिम्मेदारी है। और समकालीन कहानीकार इस जिम्मेदारे के प्रति सचेत दिखते हैं।
    विभिन्न कहानी आन्दोलनों ने हिन्दी कहानी को एक नयी दिशा दी है, साथ ही इसके कारण कहानी के कथ्य और शिल्प में व्यापक परिपर्तन आया है और इसकी कुछ सीमाएं भी तय हुई हैं।
    आपका अलेख बहुत खूबी के साथ समकालीन हिन्दी कथा साहित्य की प्रमुख विशेषताओं को चित्रित करता है।

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  16. मनोज कुमार जी,
    समकालीन कहानियों पर आपके विचारों को जानकर प्रसन्नता हुई।
    आपके विचारों ने मेरा उत्साह बढ़ाया. हार्दिक धन्यवाद एवं आभार. कृपया इसी तरह सम्वाद बनाए रखें।

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  17. दिलबाग विर्क जी,
    बहुत-बहुत धन्यवाद....
    अत्यन्त आभारी हूं आपकी....विचारों से अवगत कराने के लिए।

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  18. अबनीश सिंह चौहान जी,
    जानकर प्रसन्नता हुई कि मेरा लेख आपको रूचिकर लगा।
    इसी तरह अपने अमूल्य विचारों से अवगत कराते रहें।
    हार्दिक धन्यवाद।

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  19. यह सही है कि वर्तमान कहानी लेखक आंचलिक परिवेष पर कहानियां लिख रहे है जीवन के नये पक्षों को उजाकर कर रहे है आम बोलचाल की भाषा का भी प्रयोग हो रहा है धृष्टता क्षमा करे उस बोलचाल की भाषा में कहानी कार कुछ अभद्र शब्दों का भी प्रयोग कर रहे है। यथार्थ प्रेम के वर्णन पर कहानी अश्लीलता की हदें भी छूने लग गई है। नारी विमर्श ,दलित साहित्य श्रजन अच्छा है मगर प्राचीन साहित्य और उसके रचयिता की आलोचना करना ,उनकी कहानी से अपनी कहानी श्रेष्ठ बतलाना , कहानी की आलोचना तक ही बात सीमित नहीं रहती कहानीकार की भी आलोचना होरही है। कुछ सम्पादकों के सम्पादकीय है कि पुराने साहित्य को अलमारियों में बन्द कर रख देना चाहिये । ऐसा तो नहीं है कि पुरानों ने सब अनर्गल ही लिखा हो। खैर । साहित्य के सम्बंध में आपका लेख अच्छा लगा

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  20. बृजमोहन श्रीवास्तव जी,
    अपने विचारों से अवगत कराने के लिए अत्यन्त आभारी हूं।
    हार्दिक धन्यवाद।

    साहित्य में शीलता और अश्लीलता सदा विवाद के विषय रहे हैं... किसी समाज में स्त्री के सिर के बालों का दिखना भी आपत्तिजनक होता है और किसी समाज में समुद्रतट पर लघुवस्त्रों में स्त्री का धूप लेना भी सामान्य-सी बात होती है...वस्तुतः यह अन्तर दृष्टिकोण का होता है...

    पुनः हार्दिक धन्यवाद एवं आभार.
    कृपया इसी तरह सम्वाद बनाए रखें।

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  21. "kaabulivaalaa ","Usne khaa thaa ",se shuru kahaani vaachan aur padhne kaa safar
    "Kamleshvarji" ke daur me "saarikaa "kee tarh sir chadhke bolne lgaa .Uske baad sevaakaaleen saahitiyik mitron kaa aisaa sang saath milaa jo aadinaank naseeb hai ,isiliye padhne kaa rogaanu havaa se rakt me aa gyaa hai .
    Aapke aalochnaatmak mukhtsar sey safar ko samkaaleen saahitya kee pravrittion par aapkitippaniyon se naa -ittefaaak rakhnaa mumkin hi nahin hai ,asambhav bhi hai .
    Achchhaa lgaa aapkaa aalekh .
    veerubhai .

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