मंगलवार, सितंबर 28, 2010

स्त्री विमर्श की कसौटी पर नागार्जुन की गौरी


    - डॉ. शरद सिंह

       नागार्जुन मानवीय संवेदना के चितेरे उपन्यासकार थे। उनके कथा साहित्य में जहां एक ओर बिहार के मिथिलांचल के ग्राम्य जीवन, सामाजिक समस्याओं, राजनीतिक आन्दोलनों एवं सांसकृतिक जीवन की अभिव्यक्ति दिखाई पड़ती है वहीं उनके उपन्यासों में मानवीय दशाओं एवं चरित्रों का अद्भुत खरापन उभर कर सामने आता है। जिस वातावरण से उनके कथा-पात्र आते हैं उसी वातावरण का निर्वहन समूची कथावस्तु-विस्तार में होता चलता है। नागार्जुन के कथा समाज में स्त्री-पुरुष, युवक-युवतियां, वर्ण और जातिगत भेद , सम्पन्न-विपन्न तथा पोषण एवं शोषण के ऐसे पारदर्शी चित्र चित्रित मिलते हैं कि जिनके आर-पार देखते हुए समाज की बुनियादी दशाओं को बखूबी टटोला तथा परखा जा सकता है।
समाज में स्त्री के स्थान पर चिन्तन, स्त्री के अधिकारों पर चिन्तन, स्त्री की आर्थिक अवस्थाओं पर चिन्तन तथा स्त्री की मानसिक एवं शारीरिक अवस्थाओं पर चिन्तन - इन तमाम चिन्तनों के द्वारा पुरुष के समकक्ष स्त्री को उसकी सम्पूर्ण गरिमा के साथ स्थायित्व प्रदान करने का विचार ही स्त्री विमर्श है। नागार्जुन के उपन्यासों में स्त्री विमर्श का एक परिष्कृत रूप दिखाई पड़ता है। 
        नागार्जुन के साहित्य में ग्राम्य जीवन की प्रमुखता है। ग्रामीण परिवेश में जीवनयापन करने वाली स्त्रियों की दशा को रेखांकित करने में नागार्जुन ने अपनी पैनी दृष्टि का भरपूर उपयोग किया है। उनके उपन्यासों की नायिकाएं परम्परागत भारतीय स्त्री होते हुए भी अपने भीतर अनेक प्रश्न समेटे हुए दिखाई देती हैं। उनका बाह्य कलेवर भले ही शोषित स्त्री का हो किन्तु उनके भीतर एक विद्रोहणी की झलक स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। यही कारण है कि बाबा नागार्जुन के उपन्यासों की नायिकाएं व्यवस्था को ललकारती हुईं समाज के समक्ष सवालों की तरह आ खड़ी होती हैं।
      गौरी रतिनाथ की चाचीउपन्यास की नायिका है। गौरी के व्यक्तित्व में विपरीतध्रुवीय दो पक्ष दिखायी देते हैं। एक पक्ष में गौरी एक परम्परागत् गृहस्थ स्त्री के रूप में सामने आती है। जो अधेड़ रोगी पति की मृत्यु के कारण विधवा हो जाती है। अपने दुष्कर्मी देवर जयनाथ की कामवासना की शिकार होती है। यह वह घरेलू अपराध है जिसे घर की चार दीवारों के भीतर दबा कर रखा जाता है। यदि औरत इस बारे में अपना मुंह खोलती है तो वही दोषी मानी जाती है। अपने देवर की कुचेष्टा के संबंध में गौरी कहती है- मैं और कुछ नहीं जानती, वह भादों का महीना था। अमावस्या की रात थी। एक घनी और अंधेरी छाया मेरे बिस्तर की तरफ बढ़ आयी, उसके बाद क्या हुआ इस बात का होश अपने को नहीं रहा ।
गर्भवती गौरी को सामाजिक अपमान सहन करना पड़ता है। अन्य औरतें उसे व्यभिचारिणी और कुलटा कहती हैं। इतना ही नहीं उसका अपना बेटा उमानाथ अपने पिता की बरसी पर जब घर आता है तो वह मां को चरित्रहीन मान कर उसके बाल पकड़ कर खींचता है तथा पैरों से ठोकर मारता है। गौरी एक परम्परागत गृहणी की भांति सारा मान अपमान एवं मार-पीट सहती रहती है। उसका दान-धर्म में भी अगाध विश्वास है।
       गौरी का दूसरा पक्ष ठीक विपरीत है। अपने दूसरे पक्ष में वह एक जागरूक स़्त्री के रूप में दिखायी पड़ती है। गांव में मलेरिया फैलने पर दवा की मुफ्त दवा बंाटती है, जमींदारों के विरुद्ध संघर्ष करने वाली क्रांतिकारी किसान सभा संगठन में अपना दो साल पुराना फटा कम्बल दे कर सहायता करती है तथा अखिल भारतीय सूत प्रतियोगिता में अव्वल आती है। यह जागरूक गौरी अपने सगे पुत्र से मिलने वाला अपमान पी कर अपने भतीजे रतिनाथ पर ममता उंढ़ेलती है। इस प्रकार नागार्जन ने गौरी के रूप में स्त्री के व्यक्तित्व को एक सामाजिक प्रश्न के रूप में सामने रखते हुए स्वयं उसका उत्तर दिया है कि एक भारतीय स्त्री अपने व्यक्तित्व को अलग-अलग कई खानों में बंाट कर भी संघर्षरत रहती है। वस्तुतः यह संघर्ष ही उसके व्यक्तित्व के तमाम हिस्सों को एक सूत्र में बांधे रहता है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्छा आलेख है। आपको कोटिशः बधाई।

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  2. राजेन्द्र राठौर जी,
    आभारी हूं विचारों से अवगत कराने के लिए ...
    बहुत-बहुत धन्यवाद...

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